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-Rajeev Kumar (Editor-in-chief)

Saturday, November 7, 2020

Editorial : महामारी से उपजी कर्ज की कहानियां, कौन इनकी सुध लेगा?

पत्रलेखा चटर्जी  

अब तक कोविड-19 से 1,23,600 से ज्यादा भारतीयों की मौत हो चुकी है। किसी को नहीं पता कि महामारी खत्म होने से पहले और कितने लोग इससे मारे जाएंगे। हम मृतकों का शोक मनाते हैं, जैसा कि हमें करना चाहिए। लेकिन उन लोगों का क्या, जो जीवित हैं और गंभीर वित्तीय संकट में फंसे हैं? उन लोगों के दुख की परवाह कौन कर रहा है, जिनकी बचत समाप्त हो गई है और जिन्हें अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए उधार लेना पड़ रहा है? 


पिछले हफ्ते मेरी एक व्यक्ति से बात हुई, जिन्हें मैं कई वर्षों से जानती हूं। कुमार नामक यह व्यक्ति दक्षिणी दिल्ली के एक ब्यूटी पार्लर में काम करते हैं। कुमार के तीन बच्चे हैं और अपने परिवार में वह इकलौते कमाने वाले हैं। लॉकडाउन के दौरान अप्रैल और मई के महीनों में कुमार ने एक पैसा भी नहीं कमाया। जिस पार्लर में वह काम करते हैं, वह बंद था। वह पार्लर जून में फिर से खुल गया है, लेकिन ग्राहक बहुत कम आते हैं। इसलिए उन्हें वेतन का केवल एक तिहाई भुगतान किया जाता है। ऐसे में कुमार दस हजार रुपये से भी कम अपने घर ले जा पाते हैं।

इस बीच, अप्रैल में उन्होंने बीस हजार रुपये कर्ज लिए। हालांकि ब्यूटी पार्लर में ग्राहकों की संख्या धीरे-धीरे बढ़ी है, लेकिन उन्हें पहले वाला वेतन नहीं मिल रहा है। वह कहते हैं कि उन्हें बहुत दुख होता है, जब वह अपने तीन बच्चों के लिए दूध और फल भी नहीं खरीद पाते हैं। वह कहते हैं, 'मैं उनके लिए दूसरा स्मार्टफोन भी नहीं खरीद सकता, ताकि वे अपना होमवर्क पूरा कर सकें। मेरे घर में एक ही स्मार्टफोन है, जो दिन भर मेरे पास रहता है। मैं रात नौ या दस बजे अपने घर लौटता हूं। तभी बच्चों को पता चलता है कि उनके शिक्षकों ने उस दिन क्या व्हाट्सएप किया था। वे अपना काम करने के लिए देर रात तक जगते हैं, क्योंकि सबेरे मैं घर से निकल जाता हूं।' 

कुमार कहते हैं कि उनके पास कोई विकल्प नहीं है। वह अपनी नौकरी नहीं बदल सकते, क्योंकि बाजार में कोई नौकरी नहीं है। कर्ज ली गई राशि का ब्याज जमा होता जा रहा है और कर्ज बढ़ रहा है। दिल्ली सरकार ने लॉकडाउन के महीनों के दौरान गरीबों को मुफ्त भोजन वितरित किया था। लेकिन अब मुफ्त भोजन वितरित नहीं होता है। और खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ गई हैं। कुमार गरीबों में सबसे गरीब नहीं हैं। देश भर में गहरे कर्ज में डूबे लोगों की अनगिनत कहानियां हैं। असम के कोकराझार जिले की पुलिस के अनुसार, इस हफ्ते वित्तीय समस्याओं ने कथित तौर पर एक व्यक्ति, उसकी पत्नी और तीन बेटियों को आत्महत्या करने के लिए मजबूर कर दिया। 45 वर्षीय निर्मल पॉल रसोई गैस की सब-एजेंसी चलाते थे। पुलिस ने मीडिया को बताया कि उन्होंने बैंकों और स्थानीय साहूकारों से लगभग पच्चीस से तीस लाख रुपये कर्ज लिए थे। 


पिछले कुछ महीनों से उनका परिवार कर्ज की किस्त (ईएमआई) नहीं चुका पा रहा था। पिछले दिनों घर में उनकी लाश पाई गई। लेकिन हम जो तबाही देख रहे हैं, उससे वास्तव में आश्चर्य नहीं होना चाहिए। हाल ही में इंडियन जर्नल ऑफ लेबर इकोनॉमिक्स में लाइव्स, लाइवलीहुड्स ऐंड द इकोनॉमी: इंडिया इन पैनडेमिक शीर्षक से प्रकाशित आलेख में प्रख्यात अर्थशास्त्री दीपक नैयर ने उल्लेख किया कि लॉकडाउन ने अर्थव्यवस्था के लगभग दो-तिहाई हिस्से को बंद कर दिया। नायर लिखते हैं, 'इसके आनुषंगिक नुकसान व्यापक हैं। इसके चलते ढाई से तीन करोड़ प्रवासी अपने घरों से दूर, बिना काम और सम्मान के राज्य सरकारों या धर्मार्थ संगठनों द्वारा प्रदान किए गए भोजन व आश्रय की दया पर अक्सर भूखे और बेघर शहरों में फंसने को मजबूर हो गए, जिससे एक अप्रत्याशित मानवीय संकट पैदा हो गया। 


विनिर्माण, खनन, निर्माण, व्यापार, होटल व रेस्तरां तथा परिवहन, जो उत्पादन एवं रोजगार, दोनों में 40 फीसदी से ज्यादा का योगदान करते हैं, पूरी तरह बंद हो गया। इस प्रकार, 15 करोड़ लोग, जो कुल कार्यबल का एक-तिहाई हिस्सा हैं और जो दैनिक मजदूरी पर आकस्मिक श्रम या बिना किसी सामाजिक सुरक्षा के असंगठित रोजगार क्षेत्र में शामिल थे, अपनी आजीविका से वंचित हो गए। इस बोझ का अधिकांश हिस्सा गरीबों द्वारा वहन किया गया था, अक्सर स्व-नियोजित लोगों द्वारा, जो क्रमशः ग्रामीण और शहरी परिवारों के 75 फीसदी और 50 फीसदी हिस्सा हैं। लघु, सूक्ष्म और मध्यम वर्ग के उपक्रम, जो देश के उत्पादन में 32 फीसदी और रोजगार में 24 फीसदी का योगदान करते हैं, पर इसका प्रभाव विनाशकारी रहा है। 


इस तरह से गरीबों और छोटे कारोबारियों का अस्तित्व खतरे में पड़ गया।' असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले लोगों की कहानियां और भी भयावह हैं। इनमें से अधिकांश लोग दिहाड़ी मजदूरी करने वाले या ठेला लगाकर स्व-रोजगार करने वाले हैं। हालांकि केंद्र एवं राज्य सरकारों ने अपने-अपने स्तर पर राहत देने के लिए कई कदम उठाए, लेकिन उनका लाभ उन्हें उतना नहीं मिल पाया, जितना मिलना चाहिए था। इसकी एक बड़ी वजह है कि सरकारी योजनाओं का लाभ उठाने के लिए कागजी कार्रवाई पूरी करनी होती है, जिसके लिए उन्हें रोजी-रोटी कमाने का चक्कर में वक्त नहीं मिल पाता है। उनमें से अधिकांश लोगों में जागरूकता की कमी होती है। इसके अलावा, इनमें से ज्यादातर लोग स्थानीय साहूकारों से कर्ज लेते हैं। सरकार ने कर्ज लेने वाले लोगों के लिए ईएमआई में मोरेटोरियम की जो व्यवस्था की थी, उसका लाभ मध्यवर्गीय लोगों को तो मिला, लेकिन असंगठित क्षेत्र में काम करने वालों को नहीं मिल पाया। 


विभिन्न सरकारों ने लॉकडाउन के दौरान मकान मालिकों से किराया न वसूलने की अपील की थी, लेकिन व्यावहारिक रूप से यह सफल नहीं पाया। इसके कारण भी लोगों को शहरों से हजारों किलोमीटर दूर अपने गांव-घर लौटना पड़ा। कोविड-19 के मद्देनजर मानवीय संकट लगातार सामने आ रहे हैं। आने वाले दिनों में, शोधकर्ताओं और अर्थशास्त्रियों को उम्मीद है कि आर्थिक मंदी और महामारी के कारण भारतीयों में ऋणग्रस्तता के बारे में आंकड़े सामने आएंगे। लेकिन अपने बच्चों के लिए फल खरीदने में असमर्थ पिता के दुख को कौन समझेगा और उसका हौसला कौन बढ़ाएगा, क्योंकि कर्ज बढ़ता जा रहा है और बचत खत्म हो गई है? 


सौजन्य - अमर उजाला।

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