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Monday, November 25, 2019

Unreliably variable employment numbers ( The Economic Times)


The drop in unemployment rates, revealed by the labour force indicators for urban areas released by the National Statistical Office, should not lull us into complacence. The unemployment rate of 9.3% in January-March 2019 quarter, the lowest in four quarters, and the marginal drop in unemployment among the 15-29-year olds, who account for a third of the population, to 22.5% from 23.7% in the preceding quarter, must be understood in the context of multiple factors: a drop in those seeking work, resulting in a lower labour force participation rate, and improved social security systems. Then again, regions with stronger social safety nets, informal or state-sponsored, tend to show higher rates of unemployment, rendering unemployment not a particularly accurate index of social distress in India.

Unemployment data for April-June 2018 is missing. A person is considered as unemployed in a week if she did not work even for one hour during that week. The figures on labour force participation rate, that is, the number of people of seeking employment as a proportion of the total population, edged up between April and December 2018 — it was at 38.2% in the last quarter of 2018 — up from 37.7% in the March quarter of 2018. However, it recorded a dip in the March quarter of 2019 to 36%. Women’s share among employment seekers has also registered a dip. These fluctuations in the number of people seeking employment need further investigation.

With the same number of people working, if the number of those seeking work falls, the unemployment rate would fall. Enhanced social security would also, at the margin, depress the number of job seekers. The government needs to ensure steady collection, analysis and availability of data, regardless of how happy a picture the data shows.
Courtesy - The Economic Times.

युवाओं को कुशल बनाने के मोर्चे पर पिछड़ता भारत (हिन्दुस्तान)

जयंतीलाल भंडारी, अर्थशास्त्री
भारत सहित पूरी दुनिया में आईएमडी बिजनेस स्कूल स्विट्जरलैंड द्वारा प्रकाशित ग्लोबल टैलेंट रैंकिंग 2019 को गंभीरतापूर्वक पढ़ा जा रहा है। भारत 63 देशों की इस सूची में पिछले वर्ष के 53वें स्थान से छह पायदान फिसलकर 59वें स्थान पर आ गया है। रैंकिंग में स्विट्जरलैंड लगातार छठे साल शीर्ष पर है। डेनमार्क दूसरे व स्वीडन तीसरे स्थान पर है। चीन इसमें 42वें स्थान पर है। रूस 48वें और दक्षिण अफ्रीका 50वें स्थान पर है। 


प्रतिभाओं के विकास, उन्हें आकर्षित करने, उन्हें देश से ही जोड़े रखने तथा उनकी शैक्षणिक गुणवत्ता के लिए किए जा रहे निवेश के आधार पर रैंकिंग तय की गई है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि टैलेंट पूल की गुणवत्ता के मामले में भारत का प्रदर्शन औसत से बेहतर है, लेकिन कुछ मोर्चे हैं, जिन पर यह देश पिछड़ रहा है।

भारत में शैक्षणिक प्रणाली की गुणवत्ता कमतर है। सरकारी शिक्षा क्षेत्र में निवेश की कमी है। ज्यादातर युवा गुणवत्तापूर्ण प्रशिक्षण और जीवन से वंचित हैं। प्रतिभाओं को आकर्षित करने और उन्हें बनाए रखने की क्षमता भी कम है। स्वास्थ्य सेवाओं का स्तर बहुत अच्छा नहीं है। श्रमबल में महिलाओं की पर्याप्त भागीदारी नहीं है। इसके अलावा, निवेश और विकास के मामले में भारत सूची में शामिल देशों में बहुत पीछे है। ग्लोबल टैलेंट रैंकिंग में बहुत पीछे रहने पर चिंतित होना और सबक लेना इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि देश की नई पीढ़ी को योग्य या कुशल बनाकर ही रोजगार की संभावनाओं को साकार किया जा सकता है। 


हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि भारत में करीब पचास प्रतिशत आबादी ऐसी है, जिसकी उम्र पच्चीस साल से कम है। भारत की 65 प्रतिशत आबादी 35 साल से कम आयु की है। चूंकि भारत के पास विकसित देशों की तरह रोजगार बढ़ाने के विभिन्न संसाधन और आर्थिक शक्तियां उपलब्ध नहीं हैं, इसलिए यह देश अपनी युवा आबादी और उसकी योग्यता को ही अपनी ताकत बनाकर आगे बढ़ सकता है। 


हाल ही में केंद्रीय सांख्यिकीय कार्यालय ने श्रमबल के नवीनतम आंकड़े जारी करते हुए कहा है कि वर्ष 2017-18 के दौरान देश में बेरोजगारी की दर 6.1 फीसदी रही है। देश में बेरोजगारी की यह दर 45 साल में सर्वाधिक है। इसमें कोई दो मत नहीं कि भारतीय अर्थव्यवस्था में श्रम का आधिक्य है, लेकिन कौशल की काफी कमी है। उच्च शिक्षा और कौशल प्रशिक्षण से लैस भारतीय युवाओं के लिए देश-विदेश में नौकरियों की कमी नहीं है। इन युवाओं के अलावा भी ऐसी आबादी है, जिसके पास खूब डिग्रियां हैं, लेकिन योग्यता के अभाव में नौकरी नहीं मिल रही है। 


वास्तव में इस समय दुनिया के साथ-साथ देश का भी रोजगार परिदृश्य तेजी से बदल रहा है। ऐसे बदलते परिदृश्य में रोजगार की जरूरतें भी बदल रही हैं। तकनीक की प्रधानता बढ़ रही है। दुनिया के अनेक देश योग्य-कुशल भारतीय युवाओं की राह देख रहे हैं। खासतौर से देश में मेक इन इंडिया की सफलता के लिए भी प्रशिक्षित युवाओं की जरूरत है। ख्याति प्राप्त स्टाफिंग फर्म मैनपावर ग्रुप की एक स्टडी रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में उद्योग-कारोबार के लिए पर्याप्त संख्या में टैलेंटेड प्रोफेशनल्स नहीं मिल रहे हैं।

भारत में अभी भी उतने योग्य युवा आगे नहीं आ रहे हैं, जितनों की जरूरत है। ऐसे में, जरूरी है कि सरकार प्रतिभाओं के विकास पर पूरी ईमानदारी से ध्यान दे। दक्ष प्रतिभाओं का निर्माण करे। योग्य युवा ही आसानी से रोजगार पैदा कर सकते हैं और रोजगार पा सकते हैं।


गौर करने की बात है कि सरकार द्वारा देश में कौशल विकास एवं उद्यमिता मंत्रालय गठित करके कौशल विकास को गतिशील बनाने की पहल के भी आशाजनक परिणाम नहीं आए हैं। इस विभाग ने वर्ष 2016 से 2020 तक एक करोड़ लोगों को प्रशिक्षण देने के लिए प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना आरंभ की थी, लेकिन अक्तूबर 2016 से जून 2019 तक कोई 52 लाख लोगों को ही ट्रेनिंग दी जा सकी है। इनमें भी सबको नौकरी नहीं मिल सकी है। यदि हम चाहते हैं कि भारतीय प्रतिभाएं देश की मिट्टी को सोना बना दें, तो हमें ग्लोबल टैलेंट  रैंकिंग 2019 को ध्यान में रखते हुए बहुत सारे प्रभावी कदम उठाने होंगे। 
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
सौजन्य- हिन्दुस्तान।

महामना, उन्हें माफ करें (हिन्दुस्तान)

महामना, उन्हें माफ करें
भारत सिर्फ हिंदुओं का देश नहीं है। यह मुसलमानों, ईसाइयों और पारसियों का भी देश है। यह तभी मजबूत होगा और उन्नति कर सकेगा, जब सभी धर्मों तथा समुदायों के लोग परस्पर भाईचारे के साथ इसमें रहेंगे। मेरी पूर्ण आशा और प्रार्थना है कि ज्ञान का यह जो केंद्र अस्तित्व में आ रहा है, वह ऐसे विद्यार्थी तैयार करेगा, जो न सिर्फ बौद्धिक श्रेष्ठता में दुनिया के अपने समकक्ष विद्यार्थियों की बराबरी करेंगे, बल्कि एक उत्कृष्ट जीवन भी बिताएंगे, अपने देश से प्रेम करेंगे और ईश्वर के प्रति समर्पित होंगे।


हम काशी हिंदू विश्वविद्यालय के लोग क्या ‘मालवीय जी महाराज’ की ये पंक्तियां भूल गए? ऐसा न होता, तो विश्वविद्यालय के संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय में डॉक्टर फिरोज खान को अपनी नियुक्ति के शुरुआती दो हफ्ते विवादों की अनचाही आंच में झुलसते हुए न गुजारने पड़ते।


उनके खिलाफ रोष के पटाखे फोड़ने की कोशिश उसी समय शुरू हो गई थी, जब वह सात नवंबर को विश्वविद्यालय में योगदान के लिए दाखिल हुए थे। उनके विरोध में छात्रों की एक टोली विभाग के द्वार पर बैठी थी। उस दिन से संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय की कक्षाओं को चलने नहीं दिया जा रहा था और दो-तीन दर्जन छात्रों का जत्था कुलपति आवास के बाहर ढोल-मंजीरे बजा रहा था। हमारे ये नौजवान अपने कुलपति की नींद क्यों हराम कर रहे थे? कारण स्पष्ट करते हुए एक नौजवान ने एक फटाफट चैनल से कहा कि कोई ‘अनार्य’ हमें धर्म कैसे पढ़ा सकता है? उसे पता नहीं कि डॉक्टर खान की नियुक्ति साहित्य विभाग में हुई है। वह साहित्य पढ़ाएंगे, धर्म नहीं। इस संकाय में आठ विभाग हैं, जिनमें से सात में धर्म के अलावा काफी कुछ पढ़ाया जाता है। यहां जैन और बौद्ध दर्शन भी पढ़ाया जाता है। इन धर्मों का उदय क्यों और कैसे हुआ था, क्या यह भी बताने की जरूरत है?


साफ है, उन्हें संकाय के नाम पर बरगलाया गया था। मैं नहीं जानता कि नाराजगी प्रकट कर रहे उन नौजवानों ने जर्मन विद्वान गेटे, मोनियर विलियम्स अथवा मैक्समूलर का नाम सुना है या नहीं? यकीनन, वे जनरल कनिंघम के बारे में भी नहीं जानते होंगे, इन ‘अनार्यों’ का हम संस्कृत और संस्कृति प्रेमियों पर बड़ा एहसान है। गेटे और मैक्समूलर ने संस्कृत के ‘क्लासिक’ ग्रंथों को मदमाते यूरोपीय समाज में स्थापित किया था। जनरल कनिंघम पेशे से फौज में इंजीनियर थे, पर उन्होंने भारतीय पुरातत्व पर गजब का काम किया। हमारी संस्कृति और संस्कृत जिन परदेशियों की ऋणी है, उनकी सूची लंबी है। उससे पहले ये लोग हमारे बारे में क्या सोचते थे, जानना हो, तो मैकाले की वह रपट पढ़ लीजिए, जो भारत आने के बाद उसने लंदन में विराज रहे अपने आकाओं को भेजी थी।


जो लोग डॉक्टर खान का विरोध कर रहे थे, वे शायद यह भी नहीं जानते होंगे कि मुगल राजकुमार दारा शिकोह काशी में वेद पढ़ने आया था। उसे यह अलौकिक ज्ञान सौंपते हुए तब के पंडितों ने कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की थी, क्यों? क्या इसलिए कि वह राजकुमार था अथवा हम तब अपेक्षाकृत उदार थे? ऐसा नहीं है कि भाषा, संस्कृतियों और धर्मों पर परस्पर प्रभाव का यह रिश्ता एकतरफा है।

इसी काशी हिंदू विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग में प्रोफेसर महेश प्रसाद सहित तमाम हिंदुओं ने योगदान किया। खुद मुझे प्रोफेसर निसार अहमद ने इसी विश्वविद्यालय में मुद्राशास्त्र पढ़ाया था। गुप्त युग के सिक्कों पर धार्मिक प्रतीकों के बारे में उन्होंने जो ‘लेक्चर’ दिया था, वह मुझे आज तक जस का तस याद है। वह चीफ प्रॉक्टर जैसे महत्वपूर्ण पद पर भी रहे। उनका ज्ञान और काम उनके प्रति श्रद्धा पैदा करता था।


इंसानियत अगर एक-दूसरे की उन्नति का रास्ता प्रशस्त न करे, तो हम इंसान कैसे? काशी हिंदू विश्वविद्यालय में कुछ छात्रों का भटकाव इस भावना पर चोट पहुंचा रहा था। यहां डॉक्टर फिरोज खान के बारे में जानना जरूरी है। फिरोज जयपुर से कुछ दूर गांव बगरू के रहने वाले हैं। उन्होंने जयपुर के राष्ट्रीय संस्कृत शिक्षा संस्थान से एमए करने के बाद डॉक्टरेट की उपाधि ली। उनके पिता रमजान खान भी संस्कृत में शास्त्री हैं। रमजान साहब गौशाला जाते हैं और मंदिरों में कृष्ण भक्ति के भजन गाते हैं। माथे पर टीका लगाए शुद्ध संस्कृत और ब्रजभाषा का उच्चारण करते रमजान खान अपने आचरण और भाव-भंगिमा से क्या एहसास देते हैं?

यह बताने कि जरूरत नहीं कि उन्हें यह सब कुछ अपने पिता गफूर खान से मिला, जो खुद भी संगीत विशारद् थे और गौ-प्रेमी थे। ये लोग अरबी-फारसी नहीं, संस्कृत के पुजारी हैं। पुराने दिन होते, तो शायद उन्हें ‘पंडित’ की उपाधि दे दी गई होती। रमजान खान दुख से कहते हैं, यह विवाद उपजने के बाद मालूम पड़ा कि हम मुसलमान हैं। जिस व्यक्ति की वंश परंपरा ऐसी हो, क्या उसे धर्म के आधार पर उसके कर्तव्य से वंचित किया जा सकता है? न भारत का संविधान, न काशी हिंदू विश्वविद्यालय का यूजीसी द्वारा निर्देशित विधान और न ही हमारी परंपरा ऐसा कहती है।


मैं यहां आपको डॉक्टर असहाब अली से परिचित कराना चाहूंगा। 1977 में उन्होंने गोरखपुर विश्वविद्यालय में बहैसियत सहायक प्रवक्ता आमद दर्ज कराई थी। दो बरस बाद जब विश्वविद्यालय के सहायक प्रवक्ताओं को स्थाई किया जा रहा था, तब यह खबर उड़ी कि डॉक्टर असहाब के मुकाबले हिंदू प्रत्याशियों को तरजीह दी जा रही है। इससे छात्र भड़क उठे। डॉक्टर अली 2010 तक इस विश्वविद्यालय की सेवा में रहे और छात्रों की दो पीढ़ियों ने उनकी योग्यता के चलते उन्हें सिर-आंखों पर बिठाया। हालांकि, इस बीच वह हज पर गए और तब से उन्होंने धोती-कुरता छोड़ मुस्लिम परिधान पहनने शुरू कर दिए, पर इससे उनकी लोकप्रियता में कोई फर्क नहीं आया। बीएचयू के आंदोलनकारी छात्रों को यह भी बताया जाना चाहिए था कि संसार के तमाम उच्च शिक्षण संस्थानों में इस्लाम धर्म की शिक्षा मुस्लिमों के अलावा ईसाई और यहूदी भी देते हैं। शिक्षक अपनी शिक्षा से जाना जाता है, चेहरे, धर्म अथवा वेश-भूषा से नहीं। हमारे चारों ओर ऐसे शिक्षकों के उदाहरण बिखरे पडे़ हैं।


काशी हिंदू विश्वविद्यालय में इसका उलट हुआ। इससे विश्वविद्यालय की छवि को आघात लगा है और ‘महामना’ की भावना भी चोटिल हुई है। अगर संयम से काम लिया जाता, तो ‘सर्वविद्या की राजधानी’ (बीएचयू के कुलगीत का मुखड़ा) दुनिया के लिए नजीर पेश करती नजर आती। अफसोस, ऐसा न हो सका। महामना उन्हें माफ करें, वे नहीं जानते थे कि वे क्या कर रहे हैं।

सौजन्य- हिन्दुस्तान।

हर नागरिक को सुरक्षा देने के लिए (हिन्दुस्तान)

सी उदय भास्कर, निदेशक, सोसाइटी ऑफ पॉलिसी स्टडीज
इस लक्ष्य से सभी सहमत होंगे कि देश का हर नागरिक पूर्ण रूप से ‘सुरक्षित’ महसूस करे। आज लोगों की सुरक्षा-चिंताओं का दायरा बड़ा और व्यापक है। हमारी राष्ट्रीय संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के सामने जो बाहरी खतरा मौजूद है, उससे प्रभावी और वहनीय तरीकों से निपटा जाना चाहिए, हमारा आंतरिक सुरक्षा ढांचा भी इस तरह तैयार होना चाहिए कि नागरिकों को ‘योगक्षेमं’ (कल्याण) का आश्वासन राष्ट्र की विभिन्न इकाइयों से मिलता रहे। ‘योगक्षेमं’ को चाणक्य ने किसी भी शासक (आज के दौर में शीर्ष नेतृत्व) की मुख्य जिम्मेदारी बताया है। आज हमारा देश कितना सुरक्षित है? इस सवाल का जवाब तलाशने में ‘माहौल’ शब्द हमारे लिए उपयोगी साबित होगा। कल हम मुंबई हमले (26/11) की 11वीं बरसी मनाने जा रहे हैं। 26 नवंबर, 2008 को हुए इस आतंकी हमले की बरसी हमारे लिए एक ताकीद है कि भारत किस तरह की सुरक्षा मुश्किलों से जूझ रहा है और किस कदर इसकी बाहरी व भीतरी चुनौतियां आपस में जुड़ी हुई हैं।

साल 2008 के नवंबर में राष्ट्र-प्रायोजित आतंकी हमले से भारतीय राज्य और इसकी क्षेत्रीय अखंडता व शुचिता को चोट पहुंचाई गई थी। इससे पहले, 1999 की गरमियों में पाकिस्तानी फौज और उसकी खुफिया एजेंसी आईएसआई ने संयुक्त रूप से कारगिल की पथरीली ऊंचाइयों पर दुस्साहसिक घुसपैठ की थी। बेशक हमारी फौज ने उसका माकूल जवाब दिया, लेकिन बदले में हमारे सैकड़ों सैनिक भी खेत रहे। अगर इससे भी पहले के दौर में वापस लौटें, जब भारत ने आजादी हासिल की थी, तो अक्तूबर, 1962 में चीन के साथ हुए संघर्ष ने देश के शीर्ष राजनीतिक नेतृत्व में सुरक्षा को लेकर अपर्याप्त चिंता, अक्षम सैन्य नेतृत्व और रक्षा प्रबंधन के शीर्ष स्तर पर मतभिन्नता को सार्वजनिक किया था। जवाहरलाल नेहरू- वीके कृष्ण मेनन- वीएम थापर की सामूहिक विफलता भारत के लिए एक शर्मनाक स्थिति लेकर आई। अतीत का यह प्रसंग हमारे लिए ऐसा उपयोगी संदर्भ है, जिसकी रोशनी में हम देश की समग्र सैन्य सुरक्षा के भविष्य की रूपरेखा तैयार कर सकते हैं। जब चीन की फौज भारत से उलझ रही थी, तब नेहरू प्रधानमंत्री, मेनन रक्षा मंत्री और थापर सेना प्रमुख थे।

भारतीय सैन्य व खुफिया ढांचे की गहन समीक्षा और पुनर्गठन की जरूरत को अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) सरकार ने समझा। उल्लेखनीय है कि उसी दौर में 1999 की कारगिल घुसपैठ भी हुई थी। दिवंगत के सुब्रह्मण्यम के नेतृत्व में एक समिति ने अध्ययन किया, जिसका निष्कर्ष सरकार के सामने औपचारिक रूप से ‘कारगिल समीक्षा कमेटी (केआरसी) रिपोर्ट’ के रूप में पेश किया गया। केआरसी के निष्कर्ष चौंकाते हैं। इस रिपोर्ट में लिखा गया है कि ‘भारत की सुरक्षा प्रबंधन प्रणाली में कई गंभीर खामियां हैं’। रिपोर्ट आगे बताती है, ‘राष्ट्रीय सुरक्षा प्रबंधन शांति-काल में भी सुस्त पड़ा रहा... कमेटी शिद्दत से महसूस करती है कि कारगिल का अनुभव, निरंतर जारी छद्म युद्ध और प्रबल हो रहे परमाणु हथियार सुरक्षा प्रबंधन को देखते हुए यह जरूरी है कि राष्ट्रीय सुरक्षा तंत्र की संपूर्णता में गहन समीक्षा की जाए’

हालांकि, भारत की सैन्य सुरक्षा प्रणाली और इससे जुड़े तंत्र की पूर्ण संस्थागत समीक्षा फिर भी न हो सकी। सुरक्षा प्रणाली के नजदीकी तंत्र में रक्षा उत्पादन, अनुसंधान व विकास (आरऐंडडी), आयुध कारखाने, प्रौद्योगिकी आदि सभी शामिल हैं। अच्छी बात है कि 19 साल बाद अब नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली एनडीए सरकार इस दिशा में आगे बढ़ती हुई दिख रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त को राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में ‘चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ’ (सीडीएस) नामक पद बनाने की घोषणा की। इसे हकीकत बनाने के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल के नेतृत्व में एक कार्यान्वयन समिति का गठन किया गया है, और माना जा रहा है कि पहले सीडीएस की नियुक्ति अगले महीने हो जाएगी। शुरुआती रिपोर्ट से पता चलता है कि सीडीएस केंद्र सरकार को सैन्य-संबंधी सलाह देने वाला एकमात्र सलाहकार होगा। मगर यह बहुत कुछ इस बात पर भी निर्भर करेगा कि यह कार्यालय भारतीय शासन प्रणाली की बहुस्तरीय जटिलता और गहरे जड़ें जमाए नागरिक-सैन्य असहमति से भला कैसे तालमेल बिठा पाएगा। इन सबके बीच सीडीएस को आखिर कितनी तवज्जो मिल सकेगी?

आज, जब फैसले लेने की प्रक्रिया में कारोबारी नियम और प्रासंगिकता की बात सामने आती है, तो पूर्व नौसेना प्रमुख एडमिरल अरुण प्रकाश के शब्दों के मुताबिक, अंगों के प्रमुख ‘तीन अदृश्य पुरुषों’ की तरह बन जाते हैं। उम्मीद यही होगी कि जब सीडीएस की नियुक्ति की विधिवत घोषणा की जाएगी, तो वह ‘चौथे’ नहीं बनेंगे। एक और उम्मीद देश की संसद से है कि वह सैन्य साजो-सामान, घरेलू अनुसंधान-विकास व उत्पादन, और नई तकनीक को अपनाने के लिए संसाधनों का पर्याप्त आवंटन करेगी। ऐसा करना इसलिए भी जरूरी है कि दुनिया भर में एक बड़ी ताकत होने की हमारी छवि या सामरिक स्वायत्तता का हमारा दावा उस वक्त जमींदोज हो जाता है, जब हमारी गिनती दुनिया भर में सैन्य उपकरणों के शीर्ष आयातक देशों में होती है।

पड़ोस की यदि बात करें, तो चीन सहित विभिन्न क्षेत्रीय चुनौतियों से लड़ने को दिल्ली सर्वोच्च प्राथमिकता देगी। हालांकि, आंतरिक सुरक्षा के मोर्चे पर भी समस्या कम नहीं है। बीते मार्च तक भारत ने आतंकी घटनाओं में अपने करीब 20,000 नागरिकों और सुरक्षाकर्मियों को गंवाया है, और जम्मू-कश्मीर की आंतरिक स्थिति अब तक साफ नहीं हो सकी है। वहां अगली गरमियों में जटिल सुरक्षा चुनौतियों का हमें सामना करना पड़ सकता है। जाहिर है, हमारा सुरक्षित भविष्य पूरी तरह से देश की व्यापक राष्ट्रीय क्षमताओं पर आधारित है। मजबूत आर्थिक और सैन्य संकेतकों के अलावा, राजनीतिक संकल्प, संस्थागत अखंडता और राष्ट्रीय सुरक्षा की जरूरतों को लेकर प्रतिबद्धता दिखाने की जरूरत है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
सौजन्य- हिन्दुस्तान।