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Sunday, September 6, 2020

कोविड और अर्थव्यवस्था आपस में जुड़े हैं?

नीलकंठ मिश्रा 



देश में कोविड-19 महामारी के शिकार लोगों की तादाद बढ़ती जा रही है लेकिन आर्थिक गतिविधियों के अधिकांश सूचकांकों में बहुत धीमा सुधार देखने को मिल रहा है। सुधार की गति में नाटकीय धीमापन आया है लेकिन सुधार नजर आ रहा है। केंद्र की ओर से कानूनों में रियायत दी गई है लेकिन देश के कई राज्यों तथा इलाकों में स्थानीय स्तर पर लॉकडाउन अभी तक लगाया जा रहा है। इन हालात में भी निरंतर सुधार होता दिख रहा है। सवाल यह है कि क्या अर्थव्यवस्था ने स्वयं को वायरस से असंबद्ध कर लिया है?


देश में रोज कोविड के रोज नए सामने आने वाले मामलोंं की गति धीमी पड़ी है लेकिन बीमारी के प्रसार के बारे में जानकारी जुटाने में इस बात की कोई खास प्रासंगिकता नहीं है: देश के कई बड़े शहरों में कराए गए सीरो अध्ययन से पता चला है कि संक्रमण का स्तर जाहिर स्तर से 20 से 50 गुना तक अधिक है। इस अध्ययन में लोगों के रक्त में कोविड ऐंटीबॉडी की मौजूदगी देखी जाती है। यदि रक्त में यह ऐंटीबॉडी मौजूद है तो उक्त व्यक्ति कोविड से संक्रमित हो चुका है। इन अध्ययन में जिस तादाद में मामले सामने आ रहे हैं उससे यही पता चलता है कि जांच की मौजूदा प्रणाली में कई संक्रमण पकड़े नहीं जा रहे। इससे रोज सामने आ रहे नए मामलों की प्रासंगिकता ही समाप्त हो रही है। सीरो अध्ययन के माध्यम से महामारी के भौगोलिक प्रसार को अवश्य चित्रित किया जा सकता है। परंतु कई राज्यों और जिलों में सकारात्मक जांच नतीजों के अनुपात को देखते हुए उक्त नतीजों में भी खामी होने की पूरी संभावना है क्योंकि सकारात्मक मामले कहीं बहुत अधिक हैं तो कहीं कम।


कोविड-19 से देश में रोज 900 से 1,000 लोगों की मौत हो रही है। यह स्तर काफी अधिक है लेकिन देश में कुल मौतों मेंं इसका योगदान केवल 4 फीसदी है। चिंता इस बात को लेकर भी है कि कोविड से होने वाली मौतों का आंकड़ा कम करके बताया जा रहा है। हालांकि यह समस्या केवल भारत में नहीं है। सीरो अध्ययन बताता है कि संक्रमण से होने वाली मौत के मामले एक प्रतिशत के भी दसवें हिस्से से कम हैं। ध्यान रहे कि कोई भी संक्रमण तभी दर्ज किया जाता है जब मरीज जांच में सकारात्मक निकलता है।


दिल्ली, मुंबई और पुणे जैसे शहरों में आबादी का 30 से 50 फीसदी पहले ही संक्रमित है और वहां संक्रमण के दर्ज मामलों में भी निरंतर कमी आ रही है। दिल्ली में नए मामलों और कोविड से होने वाली मौतों के मामले कम होने के बाद आशा की जा रही थी कि भले ही महामारी पर नियंत्रण हमारी समग्र प्रशासनिक क्षमताओं से परे नजर आ रहा हो लेकिन शायद कुछ महीनों में यह महामारी स्वयं समाप्त हो जाए। ऐसे में भले ही कई जिलों में रोज 100 से अधिक मामले दर्ज किए जा रहे हैं लेकिन यह प्राकृतिक रूप से समाप्त हो जाएगी। महामारी से होने वाली मौतें भी पहले जताई गई आशंका से बहुत कम रही हैं।


परंतु सच्चाई तो यह है कि जब कोई महामारी सही मायनों में समाप्त होती है तो पीडि़तों के आंकड़े स्थिर नहीं रहते बल्कि उनमें गिरावट आती है। अमेरिका का न्यूयॉर्क शहर या ब्राजील का मानाउस कस्बा इसके उदाहरण हैं। मुंबई में समुचित जांच के अभाव और उच्च संक्रमण अनुपात के बाद हमने यह अध्ययन किया कि ऐसे कितने बेड इस्तेमाल में हैं जहां ऑक्सीजन की आवश्यकता पड़ रही है। मई और जून में इनमें इजाफा हुआ लेकिन जुलाई में यह 6,300 पर स्थिर हो गया। उसके पश्चात गिरावट आने लगी। हालांकि कई सप्ताह तक आंकड़ा 5,400 के नीचे नहीं आया। इसी प्रकार पुणे में सीरो अध्ययन में 50 फीसदी संक्रमण की बात कहे जाने के बावजूद नए मामले और मौत के आंकड़े निरंतर बढ़ रहे हैं।


वायरस को लेकर हमारी समझ बढऩे के साथ-साथ वैश्विक और स्थानीय स्तर पर कुछ लोगों में दोबारा संक्रमण के मामले सामने आए हैं। कुछ लोग तो छह सप्ताह के भीतर दोबारा संक्रमित हो गए। राष्ट्रीय व्याधि नियंत्रण केंद्र (एनसीडीसी) के एक अध्ययन से भी पता चला हैकि पहले संक्रमित रह चुके 208 में से 97 लोगों के शरीर में कोरोना के ऐंटीबॉडी नहीं मिले। शायद ऐसा इसलिए हुआ कि कुछ लोगों में तात्कालिक ऐंटीबॉडी विकसित हुईं या फिर शायद वायरस के कई स्वरूप हैं। इससे सामूहिक प्रतिरोध की अवधारणा को भी नुकसान पहुंचा है और विकसित हो रहे टीकों को लेकर भी सवाल उठे हैं। अब हम महामारी के प्राकृतिक रूप से समाप्त होने की बात भी नहीं कर सकते। हमें टीके के बनने तक महामारी के साथ ही जीना होगा। अब संपर्क का पता लगाकर प्रसार रोकने का विकल्प समाप्त हो चुका है। इसका अर्थव्यवस्था पर क्या असर होगा?


ऐसी आर्थिक गतिविधियां जिनमें बंद माहौल में लोग एक दूसरे के संपर्क में आते हैं उनमें अभी कुछ महीनों तक रोक रह सकती है। विद्यालय तथा रेस्तरां ऐसी ही जगह हैं। हालांकि सरकार ज्यादा से ज्यादा गतिविधियां शुरू करना चाहती है। मॉल खुल गए हैं लेकिन खाली पड़े हैं जबकि ई-कॉमर्स कंपनियों के कारोबार में दोगुना इजाफा हुआ है। लोगों का डर जाने मेंं अभी वक्त लगेगा।


आबादी का एक बड़ा हिस्सा यूं भी बाहर निकलेगा। कुछ लोग जोखिम लेने की आदत के चलते तो कुछ आजीविका कमाने के लिए और कुछ अन्य लॉकडाउन से बोर होकर बाहर निकलेंगे। परंतु आर्थिक हालत सामान्य होने के लिए जरूरी है कि बड़े पैमाने पर आबादी घरों से निकले।


जून तिमाही मेंं सकल घरेलू उत्पाद में भारी गिरावट आई। इस बीच निजी क्षेत्र का खपत और व्यय रुझान दोबारा सुधार की दिशा में अग्रसर होगा ऐसा अनुमान है। परंतु कारोबारियों और उद्यमियों के नैसर्गिक उत्साह को देखते हुए कहा जा सकता है कि सरकार की ओर से राजकोषीय और नीतिगत कदमों की मदद से मजबूत आर्थिक वृद्धि की दिशा में प्रतिबद्धता देखने को मिलेगी। आने वाले समय में यह कारोबारियों में उत्साह पैदा करने का काम करेगी। ऐसा होने पर उस नुकसान की भरपाई की जा सकती है जो टीका न बनने के कारण महामारी के कारण आर्थिक गतिविधियों को हो रहा है।

(लेखक क्रेडिट सुइस के एशिया-प्रशांत रणनीति सह-प्रमुख एवं भारत रणनीतिकार हैं)


सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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