आखिर मिले हाथ

अमेरिका और चीन के बीच लगभग दो साल के ट्रेड वॉर के बाद हुए व्यापार समझौते की खबर से दुनिया ने राहत की सांस ली है। इसे समझौते का पहला चरण कहा जा रहा है, जिसके तहत चीन व्यापार शुल्क का एक हिस्सा हटाए जाने की एवज में अगले दो साल में अमेरिका से 200 अरब डॉलर की सालाना खरीदारी करेगा। इसमें 50 अरब डॉलर के कृषि उत्पाद भी शामिल हैं, जो अमेरिकी चुनाव में भावनात्मक मुद्दे का रूप ले सकते हैं। इसके अलावा अमेरिकी बौद्धिक संपदा अधिकार का सम्मान करने और अपनी मुद्रा की विनिमय दरों में कृत्रिम बदलाव न करने की बात चीन बाकायदा लिखकर दे रहा है। अमेरिकी वित्त मंत्रालय ने मुद्रा के साथ छेड़छाड़ करने वाले देश का बिल्ला चीन से पहले ही हटा लिया था।

दुनिया की दोनों चोटी की अर्थव्यवस्थाओं में तनाव 22 जनवरी 2018 को शुरू हुआ, जब ट्रंप ने चीन में बने सौर पैनलों और वाशिंग मशीनों पर शुल्क लगाने की घोषणा कर दी। इसके बाद एक-दूसरे पर जवाबी शुल्क का हमला शुरू हो गया। इस व्यापार युद्ध में अमेरिका ने चीन से आने वाले 550 अरब डॉलर के उत्पादों पर शुल्क बढ़ा दिया, जबकि चीन ने ऐसी ही कार्रवाई अमेरिका से आने वाली 185 अरब डॉलर की वस्तुओं पर की। अमेरिका ने चीन पर टेक्नॉलजी चोरी करने और अपनी मुद्रा की कीमत नीचे रखने का आरोप भी लगाया। दरअसल, अमेरिका और ज्यादातर पश्चिमी देश तकनीक के मामले में चीन की रफ्तार से खासे परेशान हैं।

अमेरिका ने ट्रेड वॉर की आड़ लेकर उसकी तकनीकी प्रगति में अड़ंगा डालने की चाल चली लेकिन जल्द ही इसका खामियाजा खुद अमेरिका को ही भुगतना पड़ गया। पिछले कुछ समय से अर्थशास्त्रियों की यह गुहार अलग-अलग कोनों से सुनाई देने लगी है कि पूरे विश्व में स्लोडाउन आ रहा है, जिसकी कुछ जवाबदेही चीन-अमेरिका ट्रेड वॉर पर भी आती है। इससे अमेरिकी वोटरों में संदेश यह जा रहा है कि राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने अपनी जिद के चलते वर्ल्ड इकॉनमी को खतरे में डाल दिया है। चुनावी साल में ट्रंप यह कलंक अपने सिर नहीं लेना चाहते। कई सर्वेक्षणों से साबित हुआ है कि अमेरिकियों का एक बड़ा तबका ट्रेड वॉर को नापसंद करता है।

चीन भले ही अमेरिका से उतना न खरीदता हो जितना उसे बेचता है, लेकिन अमेरिका के कई उद्योगों और उनमें मौजूद नौकरियों का अस्तित्व चीन से आने वाले अधबने सामानों पर ही निर्भर करता है। यही नहीं, अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेड के अर्थशास्त्रियों का अनुमान है कि सामानों की बढ़ी कीमतों के चलते एक औसत अमेरिकी परिवार पर सालाना 6 हजार डॉलर का बोझ बढ़ गया है। इन बातों ने ट्रंप को अपने कदम वापस खींचने पर मजबूर किया है। बहरहाल, यह समझौते की शुरुआत है और देर-सबेर इसके दूसरे चरण के लिए भी बातचीत शुरू हो जाएगी। उम्मीद करें कि इससे विश्व व्यापार में जो सकारात्मक माहौल बनेगा, उसकी लहर ट्रेड वॉर को पूरी तरह खत्म कर देगी।

Share on Google Plus

About Editor

This is a short description in the author block about the author. You edit it by entering text in the "Biographical Info" field in the user admin panel.
    Blogger Comment
    Facebook Comment

0 comments:

Post a Comment