भारतीय, राष्ट्रवादी और मुस्लिम (बिजनेस स्टैंडर्ड)

शेखर गुप्ता
भारतीय गणराज्य को मशहूर लेखिका-सामाजिक कार्यकर्ता अरुंधती रॉय का शुक्रगुजार होना चाहिए। उन्होंने अकेले अपने बूते पर देश को सशस्त्र माओवादी बगावत से बचाया।

ऐसा तब हुआ जब उन्होंने देश के माओवादियों को 'बंदूक वाले गांधीवादी' करार दिया। यह ऐसा उद्धरण था जो लंबे समय तक जिंदा रहेगा। इसने माओवादियों के पीडि़त होने को लेकर रही-सही सहानुभूति भी समाप्त कर दी। मार्केटिंग जगत का एक पुराना सच यह है कि झूठ सबसे तेजी से गिरता है। आप एक साथ गांधीवादी और माओवादी नहीं हो सकते। दिल्ली में बहादुर शाह जफर मार्ग स्थित मेरे कार्यस्थल से 15 मिनट की दूरी पर या कहें एक मेट्रो स्टेशन भर की दूरी पर स्थित 17वीं सदी की जामा मस्जिद की सीढिय़ों पर शुक्रवार को जो हजारों मुस्लिम एकत्रित थे, उन्हें देखते हुए मैं सोच रहा था कि अरुंधती इन्हें क्या नाम देतीं?

इन मुस्लिमों का 'पहनावा' मुस्लिमों जैसा है। मुझे यह इसलिए कहना पड़ रहा है क्योंकि हमारे प्रधानमंत्री ने अभी हाल में कहा है कि लोग जो कपड़े पहनते हैं उनसे उनके इरादों का पता लग जाता है। ये तिरंगे, संविधान और बाबा साहेब आंबेडकर और कुछेक तो महात्मा गांधी की तस्वीरों से 'लैस' थे। वे 'जन गण मन' और हिंदुस्तान जिंदाबाद के नारे लगा रहे थे। वाम-उदारवादी विश्वदृष्टि के अनुसार राष्ट्रवाद के आक्रामक प्रतीकों यानी राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्रगान का प्रदर्शन तो बहुसंख्यक राष्ट्रवाद का ही अतिरंजित प्रतीक है और यह अंध राष्ट्रवाद की दिशा में अंतिम कदम है।

क्या होता है जब गणतंत्र का सबसे बड़ा अल्पसंख्यक समूह अपनी सबसे पवित्र मस्जिद की सीढिय़ों पर एकत्रित होकर कहता है कि वे सबसे पहले भारतीय हैं, वे संविधान, देश के ध्वज और राष्ट्रगान में आस्था रखते हैं और इस विचार को खारिज करते हैं कि कोई इस गणराज्य को नए सिरे से परिकल्पित कर सकता है चाहे उसे कितना भी बड़ा बहुमत क्यों न हासिल हो। देश में आए बदलाव को समझने के लिए गहराई से सोचना होगा। मुस्लिम भारतीय देशभक्ति पर बहुसंख्यकों के प्राथमिक दावे को प्रश्नांकित कर रहे हैं। यह काफी कुछ वैसा ही है जैसा ब्रिटेन में चार दशक पहले नस्लवाद के उभार के बाद प्रवासी (जिनमें अच्छे खासे भारतीय थे) कहा करते थे: चाहे कुछ भी हो हम यहीं रहने वाले हैं।

उनसे कोई लड़ नहीं सकता। उनके ऊपर गोली चलाने की कोई वजह नहीं है। देश बदल चुका है। आज की भाषा में कहा जा सकता है: मेरा देश बदल गया है, मित्रों। आप उन्हें सीएसएस और एनआरसी के बीच, नागरिक और शरणार्थी के बीच का भेद भी नहीं समझा जा सकते। आप पहले ही काफी कुछ कह चुके हैं, खासतौर पर 2021 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए। आपने दो चीजें हासिल करने के लिए यह कदम उठाया।

एक, असम में एनआरसी में फंसे बंगाली हिंदुओं को बचाना और बंगाली मुस्लिमों को निकालना। दूसरा, पश्चिम बंगाल के हिंदुओं को इसे दोहराने के वादे से बहलाना। असम में एक आग बुझाने और पश्चिम बंगाल में दूसरी लगाने के क्रम में आपने दिल्ली में आग लगा दी। जामा मस्जिद राष्ट्रपति भवन से महज 7 किलोमीटर की दूरी पर है। वहां धारा 144 लगी थी और उसकी अवमानना कौन और कैसे कर रहा था?

कपड़े जिसमें टोपियां, बुरका, हिजाब और हरा रंग शामिल हैं, मुस्लिमों की सबसे बड़ी पहचान रही हैं। उनके मजहबी नारों को भी इसमें शामिल किया जा सकता है। ऐसी ही एक पहचान उन दो युवा महिलाओं में से एक के फेसबुक पन्ने से उठाई गई जो अपने एक पुरुष मित्र को बचाने के लिए ढाल बन गई थीं। इससे यह नतीजा निकाल कर प्रचारित किया गया कि वे राष्ट्रवाद या धर्मनिरपेक्षता के प्रति किसी प्रतिबद्धता से नहीं बल्कि कट्टर इस्लाम से प्रेरित हैं। नाराज मुस्लिमों के इससे भी कठोर प्रतीक रहे हैं। मसलन एके-47, आरडीएक्स, कई मुजाहिदीन और लश्कर, अलकायदा और आईएसआईएस आदि। उन क्रोधित मुस्लिमों से लडऩा और उन्हें परास्त करना आसान है। हाल ही में जयपुर की एक अदालत ने ऐसे चार लोगों को सिलसिलेवार धमाकों के इल्जाम में मौत की सजा सुनाई। करीब तीन दशक से असल चिंता यह रही है कि यदि मुस्लिम वाकई हताश होकर आतंक की राह पर गए तो क्या होगा?

सिमी से लेकर इंडियन मुजाहिदीन तक छोटे समूहों ने इस धारणा की पुष्टि की है। यहां तक कि डॉ. मनमोहन सिंह जैसे उदार और दूरदर्शी व्यक्ति ने 2009 में कॉन्स्टीट्यूशन क्लब में वरिष्ठ पत्रकारों के साथ बातचीत में कहा था कि मुस्लिमों को विशेष तरजीह देने की शिकायत कर रहे लोगों को समझना चाहिए कि यदि देश की कुल मुस्लिम आबादी का एक फीसदी भी यह सोच लेता है कि भारत में भविष्य नहीं है तो देश शासन करने लायक नहीं रह जाएगा। वह संप्रग का दौर था जहां मुस्लिमों के प्रति इसलिए उदारता जरूरी थी कि कहीं वे गलत राह न पकड़ लें।

फिर भी कुछ मुस्लिम उस राह पर गए। संप्रग उनसे उतनी ही कड़ाई से निपटा जितना शायद आज राजग करे। बाटला हाउस मुठभेड़ इसकी बानगी है। आज इन तथ्यों की कई तरह की व्याख्या हो सकती है। परंतु निष्कर्ष एक ही होगा। एक पक्ष मुस्लिमों के प्रति अफसोस के साथ संतुष्ट करना चाहता है ताकि वे राष्ट्र विरोधी न हों। दूसरा एक आंख के बदले दोनों आंखें चाहता है। बल्कि वह बहुसंख्यक वर्ग से जवाबी आतंकी बचाव भी चाहता है। दोनों ही मुस्लिमों को संदेह से देखते हैं। भारतीय मुस्लिमों की एक अन्य नकारात्मक बात उनके धार्मिक नेता- जामा मस्जिद के बुखारी, मदनी और वे दाढ़ी वाले जो चैनलों पर आकर हास्यास्पद फतवों का बचाव करते दिखते हैं।

इनकी तादाद बहुत ज्यादा है। आपको हमेशा कोई न कोई बुखारी या मदनी किसी न किसी मुद्दे पर राय देते दिख जाएंगे। बाबरी-अयोध्या निर्णय को ही देखिए या बुखारी का यह कहना कि सीएए-एनआरसी मुस्लिमों के लिए खतरा नहीं है। परंतु वह उस मस्जिद की सीढिय़ों पर एकत्रित हजारों लोगों से यह बात कहने का साहस नहीं कर सकते जिसके वह संरक्षक हैं।

हो सकता है सबकुछ एकदम बेहतरीन न हो लेकिन आज इन नकारात्मक छवियों को चुनौती मिल रही है। कलमा की जगह 'जन गण मन', हरे झंडे की जगह तिरंगा, काबा के बजाय आंबेडकर और गांधी की तस्वीरें तथा हिंदुस्तान जिंदाबाद के नारे सुनाई दे रहे हैं। एक चीज जो नहीं बदली है, वह हैं कपड़े। जैसा हमने पहले कहा, ये मुस्लिमों के पहनावे वाले मुस्लिम हैं। वे हमें याद दिला रहे हैं किसी भारतीय के पहनावे और उसकी देशभक्ति में कोई विरोधाभास नहीं है। या एक नागरिक के रूप में उनसे संविधान की अपेक्षाओं पर भी इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। एक बड़ी रूढि़ टूट रही है।

जो लोग भारतीय मुस्लिमों को 'सभ्यताओं के संघर्ष' के चश्मे से देखते हैं वे बड़ी गलती कर रहे हैं। सन 1947 में भारतीय मुस्लिमों का एक बड़ा हिस्सा जिन्ना के साथ अपने नए मुल्क पाकिस्तान चला गया। जिन्ना के बाद के 72 वर्षों में उन्होंने किसी मुस्लिम को अपना नेता नहीं माना। उन्होंने हमेशा गैर मुस्लिम पर यकीन किया।

अभी भी बहुत कुछ शेष है क्योंकि हर कोई उतना संयत और समझदार नहीं है जितना कि जामा मस्जिद की सीढिय़ों पर एकत्रित लोग। जामा मस्जिद से सटे पुरानी दिल्ली के दरियागंज में कारें जलाई गईं। उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, गुजरात हर जगह हिंसक तत्त्व सक्रिय हैं। पश्चिम बंगाल हिंसा के मुहाने पर है। परंतु इनमें से कोई उस बदलाव को ढक नहीं सकता जो भारतीय मुस्लिमों ने दिल्ली में दिखाया है। वे नए भारतीय मुस्लिमों के उभार का संकेत दे रहे हैं। वे मुस्लिम दिखने से नहीं डरते और न ही अपने राष्ट्रवाद का प्रदर्शन करने से। वे संविधान, भारतीय ध्वज, राष्ट्रगान, आंबेडकर और गांधी के साथ हिंदुस्तान जिंदाबाद का नारा लगाते हुए अपनी लड़ाई जारी रखना चाहते हैं। ऐसे समय में शायर राहत इंदौरी का शेर प्राय: दोहराया जा रहा है: सभी का खून है शामिल यहां की मिट्टी में, किसी के बाप का हिंदोस्तान थोड़ी है। वह यकीनन मुस्करा रहे होंगे।
सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।
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