हर नागरिक को सुरक्षा देने के लिए (हिन्दुस्तान)

सी उदय भास्कर, निदेशक, सोसाइटी ऑफ पॉलिसी स्टडीज


इस लक्ष्य से सभी सहमत होंगे कि देश का हर नागरिक पूर्ण रूप से ‘सुरक्षित’ महसूस करे। आज लोगों की सुरक्षा-चिंताओं का दायरा बड़ा और व्यापक है। हमारी राष्ट्रीय संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के सामने जो बाहरी खतरा मौजूद है, उससे प्रभावी और वहनीय तरीकों से निपटा जाना चाहिए, हमारा आंतरिक सुरक्षा ढांचा भी इस तरह तैयार होना चाहिए कि नागरिकों को ‘योगक्षेमं’ (कल्याण) का आश्वासन राष्ट्र की विभिन्न इकाइयों से मिलता रहे। ‘योगक्षेमं’ को चाणक्य ने किसी भी शासक (आज के दौर में शीर्ष नेतृत्व) की मुख्य जिम्मेदारी बताया है। आज हमारा देश कितना सुरक्षित है? इस सवाल का जवाब तलाशने में ‘माहौल’ शब्द हमारे लिए उपयोगी साबित होगा। कल हम मुंबई हमले (26/11) की 11वीं बरसी मनाने जा रहे हैं। 26 नवंबर, 2008 को हुए इस आतंकी हमले की बरसी हमारे लिए एक ताकीद है कि भारत किस तरह की सुरक्षा मुश्किलों से जूझ रहा है और किस कदर इसकी बाहरी व भीतरी चुनौतियां आपस में जुड़ी हुई हैं।

साल 2008 के नवंबर में राष्ट्र-प्रायोजित आतंकी हमले से भारतीय राज्य और इसकी क्षेत्रीय अखंडता व शुचिता को चोट पहुंचाई गई थी। इससे पहले, 1999 की गरमियों में पाकिस्तानी फौज और उसकी खुफिया एजेंसी आईएसआई ने संयुक्त रूप से कारगिल की पथरीली ऊंचाइयों पर दुस्साहसिक घुसपैठ की थी। बेशक हमारी फौज ने उसका माकूल जवाब दिया, लेकिन बदले में हमारे सैकड़ों सैनिक भी खेत रहे। अगर इससे भी पहले के दौर में वापस लौटें, जब भारत ने आजादी हासिल की थी, तो अक्तूबर, 1962 में चीन के साथ हुए संघर्ष ने देश के शीर्ष राजनीतिक नेतृत्व में सुरक्षा को लेकर अपर्याप्त चिंता, अक्षम सैन्य नेतृत्व और रक्षा प्रबंधन के शीर्ष स्तर पर मतभिन्नता को सार्वजनिक किया था। जवाहरलाल नेहरू- वीके कृष्ण मेनन- वीएम थापर की सामूहिक विफलता भारत के लिए एक शर्मनाक स्थिति लेकर आई। अतीत का यह प्रसंग हमारे लिए ऐसा उपयोगी संदर्भ है, जिसकी रोशनी में हम देश की समग्र सैन्य सुरक्षा के भविष्य की रूपरेखा तैयार कर सकते हैं। जब चीन की फौज भारत से उलझ रही थी, तब नेहरू प्रधानमंत्री, मेनन रक्षा मंत्री और थापर सेना प्रमुख थे।

भारतीय सैन्य व खुफिया ढांचे की गहन समीक्षा और पुनर्गठन की जरूरत को अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) सरकार ने समझा। उल्लेखनीय है कि उसी दौर में 1999 की कारगिल घुसपैठ भी हुई थी। दिवंगत के सुब्रह्मण्यम के नेतृत्व में एक समिति ने अध्ययन किया, जिसका निष्कर्ष सरकार के सामने औपचारिक रूप से ‘कारगिल समीक्षा कमेटी (केआरसी) रिपोर्ट’ के रूप में पेश किया गया। केआरसी के निष्कर्ष चौंकाते हैं। इस रिपोर्ट में लिखा गया है कि ‘भारत की सुरक्षा प्रबंधन प्रणाली में कई गंभीर खामियां हैं’। रिपोर्ट आगे बताती है, ‘राष्ट्रीय सुरक्षा प्रबंधन शांति-काल में भी सुस्त पड़ा रहा... कमेटी शिद्दत से महसूस करती है कि कारगिल का अनुभव, निरंतर जारी छद्म युद्ध और प्रबल हो रहे परमाणु हथियार सुरक्षा प्रबंधन को देखते हुए यह जरूरी है कि राष्ट्रीय सुरक्षा तंत्र की संपूर्णता में गहन समीक्षा की जाए’

हालांकि, भारत की सैन्य सुरक्षा प्रणाली और इससे जुड़े तंत्र की पूर्ण संस्थागत समीक्षा फिर भी न हो सकी। सुरक्षा प्रणाली के नजदीकी तंत्र में रक्षा उत्पादन, अनुसंधान व विकास (आरऐंडडी), आयुध कारखाने, प्रौद्योगिकी आदि सभी शामिल हैं। अच्छी बात है कि 19 साल बाद अब नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली एनडीए सरकार इस दिशा में आगे बढ़ती हुई दिख रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त को राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में ‘चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ’ (सीडीएस) नामक पद बनाने की घोषणा की। इसे हकीकत बनाने के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल के नेतृत्व में एक कार्यान्वयन समिति का गठन किया गया है, और माना जा रहा है कि पहले सीडीएस की नियुक्ति अगले महीने हो जाएगी। शुरुआती रिपोर्ट से पता चलता है कि सीडीएस केंद्र सरकार को सैन्य-संबंधी सलाह देने वाला एकमात्र सलाहकार होगा। मगर यह बहुत कुछ इस बात पर भी निर्भर करेगा कि यह कार्यालय भारतीय शासन प्रणाली की बहुस्तरीय जटिलता और गहरे जड़ें जमाए नागरिक-सैन्य असहमति से भला कैसे तालमेल बिठा पाएगा। इन सबके बीच सीडीएस को आखिर कितनी तवज्जो मिल सकेगी?

आज, जब फैसले लेने की प्रक्रिया में कारोबारी नियम और प्रासंगिकता की बात सामने आती है, तो पूर्व नौसेना प्रमुख एडमिरल अरुण प्रकाश के शब्दों के मुताबिक, अंगों के प्रमुख ‘तीन अदृश्य पुरुषों’ की तरह बन जाते हैं। उम्मीद यही होगी कि जब सीडीएस की नियुक्ति की विधिवत घोषणा की जाएगी, तो वह ‘चौथे’ नहीं बनेंगे। एक और उम्मीद देश की संसद से है कि वह सैन्य साजो-सामान, घरेलू अनुसंधान-विकास व उत्पादन, और नई तकनीक को अपनाने के लिए संसाधनों का पर्याप्त आवंटन करेगी। ऐसा करना इसलिए भी जरूरी है कि दुनिया भर में एक बड़ी ताकत होने की हमारी छवि या सामरिक स्वायत्तता का हमारा दावा उस वक्त जमींदोज हो जाता है, जब हमारी गिनती दुनिया भर में सैन्य उपकरणों के शीर्ष आयातक देशों में होती है।

पड़ोस की यदि बात करें, तो चीन सहित विभिन्न क्षेत्रीय चुनौतियों से लड़ने को दिल्ली सर्वोच्च प्राथमिकता देगी। हालांकि, आंतरिक सुरक्षा के मोर्चे पर भी समस्या कम नहीं है। बीते मार्च तक भारत ने आतंकी घटनाओं में अपने करीब 20,000 नागरिकों और सुरक्षाकर्मियों को गंवाया है, और जम्मू-कश्मीर की आंतरिक स्थिति अब तक साफ नहीं हो सकी है। वहां अगली गरमियों में जटिल सुरक्षा चुनौतियों का हमें सामना करना पड़ सकता है। जाहिर है, हमारा सुरक्षित भविष्य पूरी तरह से देश की व्यापक राष्ट्रीय क्षमताओं पर आधारित है। मजबूत आर्थिक और सैन्य संकेतकों के अलावा, राजनीतिक संकल्प, संस्थागत अखंडता और राष्ट्रीय सुरक्षा की जरूरतों को लेकर प्रतिबद्धता दिखाने की जरूरत है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

सौजन्य- हिन्दुस्तान।
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