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-Rajeev Kumar (Editor-in-chief)

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Saturday, January 23, 2021

भारतीय अर्थव्यवस्था का भविष्य (बिजनेस स्टैंडर्ड)

टी. एन. नाइनन  

देश की विनिर्माण गाथा की विफलता को लेकर नीति निर्माता चिंतित हैं। आत्मनिर्भर भारत जैसी पहल इसकी अप्रत्यक्ष स्वीकारोक्ति है क्योंकि यह मान लिया गया है कि बिना व्यापारिक और शुल्क संबंधी संरक्षण के देश, विनिर्माण क्षेत्र के विकास में सक्षम नहीं है। एक बार इस दिशा में बढऩे के बाद कारोबारी लॉबियां नीतियों को और अधिक संरक्षणवादी बनाने का दबाव बनाने लगेंगी। यह हो भी रहा है। उत्पादन से संबंधित प्रोत्साहन कार्यक्रम के अधीन आने वाली कंपनियां और अधिक केंद्रित लक्ष्यों की मांग कर रही हैं और कह रही हैं कि अधिक तादाद में क्षेत्रों को संरक्षण कार्यक्रम में शामिल किया जाए।


शायद अब यह स्वीकार करने का वक्त आ गया है कि भारत पूर्वी एशियाई देशों की निर्यात आधारित विनिर्माण गाथा को दोहराने नहीं जा रहा। वह शायद बांग्लादेश जैसा प्रदर्शन भी नहीं कर पाए। जैसा कि सन 2012 से हमारा आधिकारिक लक्ष्य भी है, यदि देश विनिर्माण को जीडीपी के बढ़े घटक के रूप में तैयार करता है तो यह घरेलू बाजार पर आधारित होगा और इसकी लागत भी अधिक होगी। वह लागत घरेलू उपभोक्ताओं को वहन करनी होगी जबकि अर्थव्यवस्था प्रमुख कारोबारी समूहों से बाहर रहेगा और निर्यात के मोर्चे पर नुकसान उठाएगा।


इसकी भरपाई सेवा क्षेत्र से होगी। दुनिया भर में सेवा व्यापार तीसरा सबसे बड़ा व्यापार है। भारत में यह अनुपात लगभग दोगुना यानी 60 प्रतिशत है। यदि श्रम निर्यात के कारण देश में आने वाले धन को शामिल किया जाए तो यह शायद और अधिक होगा। यह पूंजी की आवक के बजाय सेवा निर्यात से होने वाली आय है। बीते पांच वर्ष में देश के निर्यात में पारंपरिक सेवा निर्यात की भी अहम हिस्सेदारी रही है। वाणिज्यिक निर्यात की हिस्सेदारी आधी से कम रह गई है। भारत जैसी विकास अवस्था वाली अर्थव्यवस्था के लिए यह अत्यंत विशिष्ट बात होगी। इससे रुपया भी उस स्तर तक बढ़ेगा जहां विनिर्माण निर्यात बहुत महंगा हो जाएगा।


यह पसंद आए या नहीं लेकिन सेवा क्षेत्र मूल्यवद्र्धन का वह क्षेत्र है जिसके सूचना प्रौद्योगिकी संबंधी तुलनात्मक लाभ तथा अन्य कौशल का लाभ उठाना होगा। देश में स्थित उपक्रम चाहे वे देसी हों या विदेशी उन्हें उनकी तकनीकी सेवा संबंधी विशेषज्ञता के कारण न केवल वैश्विक अर्थव्यवस्था का सेवा केंद्र बनाना होगा बल्कि नए क्षेत्रों मसलन कृत्रिम मेधा और डेटा आदि के रचनात्मक क्षेत्र में भी विशेषज्ञता हासिल करनी होगी। हमें चिप निर्माण के बजाय चिप डिजाइन करना होगा। इस क्षेत्र में अभी ताइवान, अमेरिका और कोरिया का एकाधिकार है। इसी तरह हमें विमान इंजन बनाने के बजाय उसका डिजाइन तैयार करना होगा।


भारत पहले ही उपभोक्ताओं के डिजिटलीकरण की तेज गति के साथ दुनिया को अपनी क्षमता दिखा चुका है। मैकिंजी ग्लोबल इंस्टीट्यूट ने इसका उल्लेख सबसे बड़े और तेज बढऩे वालों में किया। प्रति मोबाइल उपभोक्ता औसत डेटा खपत भी चीन से अधिक और कोरिया के समान है। यह जियो जैसी कंपनियों के कारण संभव हुआ क्योंकि उन्होंने सस्ता डेटा दिया। इसके अलावा कम लागत पर तत्काल भुगतान का बुनियादी ढांचा तैयार हुआ और देश में खुदरा डिजिटल भुगतान सालाना 50 प्रतिशत की दर से बढ़ा। वस्तु एवं सेवा कर व्यवस्था में जहां एक मंच पर एक करोड़ से अधिक उद्यम मौजूद हैं, उसे तकनीकी क्षमता मुहैया कराई गई। 1.2 अरब लोगों के पंजीयन के साथ डिजिटल पहचान व्यवस्था कायम की गई। सरकारी योजनाओं का प्रत्यक्ष लाभ दिलाने के लिए सॉफ्टवेयर पैकेज तैयार किया गया। इन मंचों का इस्तेमाल करके कई कारोबार खड़े किए गए। देश में बड़ी तादाद में यूनिकॉर्न (स्टार्टअप जिनका कारोबार 100 करोड़ डॉलर से अधिक हो) होने की यह भी एक वजह है। मूल्यांकन में उछाल अभी शुरू ही हुआ है क्योंकि निवेशक  पैसा लगा रहे हैं। औद्योगिक संगठन नैसकॉम का कहना है कि डिजिटल अर्थव्यवस्था 10 लाख करोड़ डॉलर तक पहुंच सकती है। उसका कहना है कि हर पांचवीं स्टार्टअप वैज्ञानिक या अभियांत्रिकी संबंधी चुनौतियों के हल पर केंद्रित है और यह सबसे तेज विकसित होने वाला हिस्सा है। बड़े उद्यमों को डेटा विश्लेषण मुहैया कराया जा रहा है और पहली स्टार्ट अप विदेशी बाजारों में प्रवेश कर चुकी है। उत्पादकता में व्यापक सुधार हो सकता है। यदि समुचित विपणन नीतियां तैयार की गईं तो कृषि क्षेत्र की आय में भी सुधार हो सकता है। बिचौलियों की कीमत पर उत्पादक का मूल्यवर्धन करके ऐसा किया जा सकता है।


इस मॉडल पर बनी अर्थव्यवस्था में कुशल-अकुशल कर्मियों की तुलना में पेशेवर कामगार बढ़ेंगे। इससे कम शिक्षित तबके को नुकसान होगा क्योंकि उसका जीवन अनिश्चित होगा। संपत्ति अधिक संकेंद्रित होगी। वित्त मंत्री के लिए अंतिम स्तर पर वित्तीय हस्तांतरण अपरिहार्य हो जाएगा। यदि शीर्ष पर संकेंद्रित संपत्ति पर कर नहीं लगाया गया तो यह फंडिंग मुश्किल होगी।

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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शेयरों में उछाल से मामूली सुकून (हिन्दुस्तान)

अरुण कुमार, अर्थशास्त्री 


कोरोना महमारी की वजह से पैदा हुए आर्थिक संकट से क्या हम तेजी से उबरने लगे हैं? गुरुवार को बंबई शेयर सूचकांक आश्चर्यजनक रूप से 50 हजार के आंकड़े के पार चला गया। अपने 145 साल के इतिहास में पहली बार बीएसई ने इस ऊंचाई को छुआ है। दूसरी तरफ, रिजर्व बैंक का मानना है कि देश की जीडीपी दर सकारात्मक होने के करीब है, और वित्त वर्ष 2020-21 की तीसरी तिमाही में यह बढ़कर 0.1 फीसदी हो सकती है। सरकार यह भी मान रही है कि चालू वित्त वर्ष में अर्थव्यवस्था में 7.7 फीसदी की ही गिरावट हो सकती है, जो पहले 10 फीसदी आंकी गई थी। जाहिर है, ये आंकड़े किसी को भी सुकून दे सकते हैं। मगर इन्हीं आंकड़ों के आधार पर पूरी अर्थव्यवस्था को सेहतमंद बता देना भ्रम पैदा करने जैसा होगा। सबसे पहले बात शेयर बाजार की। यह लोगों की आकांक्षाओं को प्रतिबिंबित करता है। अपने यहां अब भी महज तीन फीसदी आबादी इक्विटी म्यूचुअल फंड में पैसे लगाती है। इसकी तुलना यदि अमेरिका जैसे देश से करें, तो वहां शेयर बाजार में लगभग आधी आबादी निवेश करती है।  दिक्कत यह भी है कि अपने यहां 0.1 फीसदी कारोबारी ही पूरे शेयर बाजार पर हावी हैं। ये वे लोग हैं, जिनकी कंपनियां अच्छा प्रदर्शन कर रही हैं। जैसे कि तकनीक और प्रौद्योगिकी से जुड़ी कंपनियां, एफएमसीजी यानी उपभोक्ता वस्तु बनाने वाली कंपनियां आदि। इसीलिए शेयर बाजार की इस उछाल को आम लोगों की आर्थिक तरक्की से नहीं जोड़ सकते। सेंसेक्स की इस तेजी की एक वजह और भी है। अब बैंक जैसे वित्तीय संस्थानों में ब्याज कम हो गए हैं। इनमें ब्याज दरें लगातार घटती गई हैं, जिसके कारण निवेशक नए विकल्प तलाश रहे हैं। रियल एस्टेट उनके निवेश का एक रास्ता जरूर था, लेकिन पिछले कुछ वर्षों से उसमें भी मंदी छाई हुई है। अच्छी बात है कि कोरोना संकट को देखते हुए अमेरिका, यूरोप जैसे देशों के बाजार में वहां के केंद्रीय बैंकों ने तरलता बढ़ाई है। अपने यहां भी नौ लाख करोड़ रुपये की नकदी बाजार में आने की बात कही जा रही है। चूंकि बैंकों की हालत अभी खस्ता है और रियल एस्टेट से आमद कम, इसलिए स्वाभाविक ही शेयर बाजार की तरफ लोगों का रुझान बढ़ा है।

जनवरी 2020 की तुलना में भी हमारी अर्थव्यवस्था अब भी लगभग 10 फीसदी कम है। लॉकडाउन हटने के बाद कुछ ही कंपनियां खुद को संभाल सकी हैं। विमानन उद्योग, पर्यटन उद्योग, होटल-रेस्तरां आदि की हालत तो अब भी खस्ता है। आकलन यह है कि ऐसी स्थिति अभी एक-डेढ़ साल तक बनी रहेगी। इसका सीधा मतलब है कि इतने दिनों तक बाजार में भी अनिश्चितता बनी रहेगी। उम्मीद जरूर कोरोना टीकाकरण अभियान से है, और माना जा रहा है कि जैसे-जैसे इसमें गति आती जाएगी, अर्थव्यवस्था में सुधार दिखने लगेंगे। मगर टीकाकरण की रफ्तार को देखकर यही कहा जा सकता है कि देश की 60 फीसदी आबादी को टीका लगने में एक साल का वक्त लग जाएगा। यानी बाजार अभी अनिश्चितता में फंसा रहेगा। ऐसे में, शेयर बाजार की यह तेजी इसलिए भी छलावा साबित हो सकती है, क्योंकि अब भी यह ठीक-ठीक नहीं कहा जा सकता कि कोविड-19 संक्रमण की नई लहर अपने यहां नहीं आएगी। कई देशों में कोरोना संक्रमण बढ़ने पर फिर से लॉकडाउन लगाया गया है। इसलिए जब तक हम ‘हर्ड इम्यूनिटी’ विकसित नहीं कर लेते, बाजार के स्थिर होने का दावा नहीं कर सकते। अपने यहां साल 2007 के दिसंबर में सेंसेक्स पहली बार 21 हजार के पार गया था। उस वक्त दुनिया भर में जबर्दस्त तेजी थी। मगर सब-प्राइम संकट की वजह से जब अमेरिका में प्रॉपर्टी बाजार का गुब्बार फूटा, तो पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था डूब गई। हर देश के शेयर बाजार 50 फीसदी से भी ज्यादा गिर गए। अपने यहां भी तब सूचकांक घटकर 9,000 पर आ गया था। 1990 के दशक के हर्षद मेहता घोटाले ने भी आम लोगों की जमा-पूंजी को डूबा दिया था। इसीलिए शेयर बाजार को असल अर्थव्यवस्था से अलग माना जाता है।

रही बात सकल घरेलू उत्पाद की, तो इसके तिमाही आंकड़े लगातार अच्छी तस्वीर दिखा रहे हैं। यह वाजिब भी है। हमने अब अपने बाजार पूरी तरह से खोल दिए हैं। लॉकडाउन के दौरान देशव्यापी बंदी की जो स्थिति थी, वह अब पूरी तरह से खत्म हो गई है। ऐसे में, उत्पादन का बढ़ना बिल्कुल स्वाभाविक है, जिसका असर बाजार पर भी दिख रहा है और आंकड़ों में भी। मगर सकल घरेलू उत्पाद के आंकड़ों में मुख्यत: संगठित क्षेत्र को शामिल किया जाता है। इसमें कृषि को छोड़कर किसी असंगठित क्षेत्र की गिनती नहीं होती। हमारी अर्थव्यवस्था में 14 फीसदी हिस्सा कृषि का है, जबकि 31 प्रतिशत के करीब हिस्सेदारी गैर-कृषि असंगठित क्षेत्र की है। वित्तीय संस्थाएं यह मान बैठती हैं कि संगठित क्षेत्र की तरक्की के साथ-साथ असंगठित क्षेत्र भी समान गति से आगे बढ़ते हैं। वास्तव में, यह सोच गलत है।

यदि असंगठित क्षेत्र को भी जीडीपी के आंकड़ों में शामिल कर लें, तो अब भी हमारी अर्थव्यवस्था नकारात्मक 10 फीसदी होगी और उसकी सालाना गिरावट निगेटिव 29 फीसदी। यह भी इस आधार पर अंदाजा लगाया गया है कि जनवरी में पांच फीसदी की गिरावट के बावजूद फरवरी में हमारी अर्थव्यवस्था साल 2019 के स्तर पर आ जाएगी। असंगठित क्षेत्रों की हालत कितनी बिगड़ी हुई है, इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि एक महीने पूर्व सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग की 20 फीसदी इकाइयां अपना कर्ज वापस करने में सक्षम नहीं थीं। इसका अर्थ है कि उनके पास पैसे नहीं हैं, जबकि असंगठित क्षेत्र की बुनियाद पर ही संगठित क्षेत्र आगे बढ़ सकता है। साफ है, दो महीने की तुलना में अभी जीडीपी दर बेशक ज्यादा है, लेकिन साल 2019 के बनिस्बत यह अब भी काफी कम है। लॉकडाउन के समय हमारे यहां उत्पादन में लगभग 75 फीसदी की गिरावट आई थी, और यह अब भी 10 फीसदी कम है। इसलिए अगले वित्तीय वर्ष की पहली तिमाही में हम अप्रत्याशित वृद्धि भी देख सकते हैं। लेकिन इसको अर्थव्यवस्था की सही तस्वीर तो नहीं ही कहेंगे।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

सौजन्य - हिन्दुस्तान।

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Friday, January 22, 2021

एकता का संदेश (प्रभात खबर)

ऐसे समय में जो बाइडेन ने राष्ट्रपति का पदभार संभाला है, जब अमेरिका कई समस्याओं से घिरा है तथा दुनिया में भी उसका प्रभाव कम हुआ है. चुनाव अभियान के दौरान और जीत के बाद वे इन चुनौतियों को रेखांकित करते रहे थे. बतौर राष्ट्रपति अपने पहले संबोधन में उन्होंने समाज और राजनीति में विभाजन को समाप्त कर सभी अमेरिकियों के राष्ट्रपति के रूप में काम करने का भरोसा दिलाया है.



उन्होंने महामारी की मुश्किल और लोगों की रोजी-रोटी पर इसके भयावह असर से भी देश को निकालने का वादा किया है. एक महाशक्ति होने के नाते वैश्विक राजनीति और आर्थिकी में अमेरिका के महत्व को भी बाइडेन ने स्पष्ट किया है. वैसे यह संबोधन एक औपचारिक संदेश था, लेकिन जब हम इसके संदर्भों को देखते हैं, तो यह एक ऐतिहासिक संदेश के रूप में स्थापित होता है.



एक पखवाड़े पहले अमेरिकी लोकतंत्र के केंद्र पर पूर्व राष्ट्रपति ट्रंप के समर्थकों का उत्पात हर उस संकट का प्रतीक है, जिससे अमेरिका आज जूझ रहा है. अश्वेत समुदाय और अवैध आप्रवासियों के विरुद्ध अमानवीय आचरण, उग्र श्वेत श्रेष्ठता का विस्तार तथा सत्ता प्रतिष्ठानों से लेकर समाज के बड़े हिस्से में हिंसा और विषमता को स्वाभाविक मानने की बढ़ती प्रवृत्ति जैसे कारकों ने देश को दो भागों में बांट दिया है. संबोधन का मुख्य स्वर इस बंटवारे को चिन्हित करना और इसे पाटने के लिए देश को एकजुट करना है.


अपने भाषण में उन्होंने ‘हम’ शब्द का सर्वाधिक प्रयोग किया है और राष्ट्रीय विभाजन को ‘असभ्य युद्ध’ की संज्ञा दी है. ‘हम’, ‘हमें’ और ‘हमारा’ जैसे सर्वाधिक प्रयुक्त शब्द जहां एकता का आह्वान करते हैं, वहीं कई बार बोले गये ‘मैं’ और ‘मेरा’ इंगित करते हैं कि बाइडेन देश का नेतृत्व करने के लिए कृतसंकल्प हैं तथा वे लोगों से भी उनके ऊपर भरोसा करने का निवेदन कर रहे हैं.


महामारी और ट्रंप प्रशासन की विफलताओं से अमेरिकी अर्थव्यवस्था बेहाल है. इसीलिए राष्ट्रपति के पहले संबोधन में संक्रमण की रोकथाम के साथ रोजगार और कारोबार चिंता प्राथमिकताओं में है. जलवायु परिवर्तन और बढ़ते तापमान को लेकर हालिया अमेरिकी बेपरवाही से धरती बचाने के अंतरराष्ट्रीय प्रयासों को धक्का लगा है. इन समस्याओं से अमेरिका भी प्रभावित है.


बाइडेन के संबोधन में इस वैश्विक चुनौती का उल्लेख प्रमुखता से हुआ है और उन्होंने पहले ही दिन पेरिस जलवायु समझौते में अमेरिका के फिर से शामिल होने की घोषणा की है. यह शेष विश्व के लिए एक सकारात्मक पहल है. ‘अमेरिका फर्स्ट’ की ट्रंप नीति से देश को क्या फायदा हुआ, यह तो बहस की बात है, पर इस रवैये के कारण अपने मित्र देशों और दुनिया से अमेरिका के संबंध कमजोर हुए. बाइडेन ने इन संबंधों को प्राथमिकता देने की बात कही है, जो भारत व दक्षिण एशिया के लिए अच्छा संकेत है. बाइडेन की राह आसान तो नहीं होगी, पर संबोधन में उनके अनुभव और संकल्प स्पष्ट रूप से प्रतिबिंबित होते हैं.

सौजन्य - प्रभात खबर।

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प्रशासनिक सुधारों का सही समय (प्रभात खबर)

By जीएन बाजपेयी 

 

केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने वर्ष 2020-21 के बजट के रूप में एक युगांतकारी- सदी का विशिष्ट- बजट प्रस्तुत करने के अपने इरादे को सार्वजनिक तौर से जाहिर किया है. नीतियों की घोषणा और संसाधनों के आवंटन के संदर्भ में इस बात का मतलब अपने-अपने ढंग से निकाला जा सकता है, परंतु व्यापक विचार-विमर्श ने उन्हें अर्थव्यवस्था के सभी पहलुओं से संबंधित ढेर सारे सलाह उपलब्ध कराये हैं, लेकिन यह भी है कि इनमें से अधिकांश सलाह करों में छूट, वित्तीय विवेक, भौतिक एवं सामाजिक इंफ्रास्ट्रक्चर और उपभोग वृद्धि में संसाधनों के उदार आवंटन से संबंधित हैं.



वर्तमान राजनीतिक कार्यपालिका ने संरचनात्मक सुधारों से संबंधित उपादान उत्पादकता (फैक्टर प्रोडक्टिविटी) को कमोबेश पूरा कर लिया है. आशा है कि अनुभव से सीखते जाने की प्रक्रिया में भूमि, श्रम एवं पूंजी में सुधार तथा बेहतरी के प्रयास भी बरकरार रहेंगे. यदि आवंटन से जुड़ी कुशलता में बेहतरी आती है, तो संरचनात्मक सुधारों से अर्थव्यवस्था लाभान्वित होगी. संसाधनों की आवंटन की प्रभावोत्पादकता मध्यस्थता की गुणवत्ता से निर्धारित होती है. भारत में मध्यस्थ संस्थानों के कामकाज का रिकॉर्ड बहुत गौरवपूर्ण नहीं है.



कई वर्षों के कामकाज के दौरान हर एक संस्थान में ऐसे लोग पैदा हो जाते हैं, जो उत्पादकता या प्रदर्शन में बिना किसी समुचित योगदान के धन हासिल करने की कोशिश करते हैं. इसी तरह निहित स्वार्थ भी अस्तित्व में आ जाते हैं. राज्य के संगठन, कार्यपालिका की सहनशीलता और जनता के धैर्य के हिसाब से ऐसे तत्वों की संख्या बढ़ती रहती है.


स्वार्थी और धन बनाने पर आमादा तत्व अवरोध पैदा कर, बाड़ लगाकर और धन के गलत बहाव के लिए तंत्र में छेद बनाकर काम के पूरा होने या सेवा को सही जगह पहुंचने या उत्पादन की प्रक्रिया की अवधि बढ़ाते हैं और संसाधनों के समुचित आवंटन की क्षमता को नुकसान पहुंचाते हैं.


भारत ने विरासत में स्वतंत्रता से पहले के कुछ शासकीय संस्थानों को हासिल किया था, जिनमें न्यायपालिका और प्रशासन सबसे महत्वपूर्ण थे. जनसंख्या में बढ़ोतरी, राज्य के गठन में परिवर्तनों, अर्थव्यवस्था की संरचना तथा भारत के लोगों की आकांक्षाओं में बदलाव आदि के बावजूद इन संस्थानों में बहुत मामूली बदलाव ही हुए हैं. ऐसे में पूरी प्रणाली घुमावदार, मनमानीपूर्ण, निराशाजनक और बेमतलब हो चुकी है.


विश्व बैंक की वर्ष 2018 की रिपोर्ट के अनुसार, ठेकों को निर्धारित समय पर पूरा करने के मामले में दुनिया में भारत का स्थान 164वां है. पहली ही अदालत में किसी कंपनी के एक व्यावसायिक विवाद का निपटारा होने में औसतन 1445 दिन लग जाते हैं तथा इस कार्यवाही में विवादित मूल्य का 30 प्रतिशत खर्च हो जाता है.


संस्थाओं के स्वरूप में बदलाव, उनके कार्य क्षेत्र का पुनर्निर्धारण और कामकाज के तौर-तरीकों का पुनर्लेखन आज की प्राथमिक आवश्यकता है. बीते कुछ दशकों से प्रशासनिक सुधारों की मांग हो रही है. अनेक सरकारों ने इस मुद्दे को गंभीरता से लेते हुए कामकाज में बेहतरी लाने की कोशिश की है, लेकिन सेवाओं को सही ढंग से प्रदान करने तथा लक्षित लोगों की संतुष्टि के मामले में बेहतरी में मामूली बढ़ोतरी ही हो सकी है.


वर्तमान सरकार ने भी प्रशासनिक आयोग की सिफारिशों तथा विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों द्वारा प्रस्तावित परिवर्तनों पर ध्यान दिया है. राजस्व जिले की मौजूदा रूप-रेखा ब्रिटिश सरकार द्वारा मुख्य रूप से इसलिए बनायी गयी थी कि राजस्व की वसूली हो सके. यह कारण अब इतना अहम नहीं है कि जिला प्रशासन के कार्मिकों की इतनी बड़ी सेना रखी जाए. संस्था की क्षमता, संस्कृति और समन्वय उसी के इर्द-गिर्द बनायी गयी थी. इसलिए आज भी जिलाधिकारी या उपायुक्त ‘हुजूर’ बने हुए हैं.


जिलों और शहरों में प्रशासनिक तंत्र का आज जो प्रमुख उद्देश्य है, वह है विभिन्न नागरिक और कल्याण सेवाओं को मुहैया कराना तथा आर्थिक विकास को सहयोग देना. प्रशासन की अक्षमता और अकुशलता से समाज का असंतोष कभी-कभी अशालीन तरीकों के रूप में बाहर आता है. प्रणाली और प्रक्रिया में छोटे-मोटे बदलाव से संतोष को नहीं बढ़ाया जा सकता है.


ऐसी स्थिति में यदि सांस्थानिक रूप-रेखा और संरचना में पूरी तरह फेर-बदल संभव नहीं है, तो कम-से-कम उनकी दिशा का पुनर्निर्धारण करना तथा उन्हें उद्देश्य और अपेक्षित परिणाम से फिर जोड़ना अत्यावश्यक हो गया है. किसी संस्थान की कार्य क्षमता सूचना, प्रोत्साहन, दंड तथा उत्तरदायित्व से गुंथे अधिकार से निर्धारित होती है. हालांकि आयकर प्रशासन में दूरगामी बदलाव हुए हैं तथा सेवाओं के प्रदान करने में बेहतरी आयी है, लेकिन करदाताओं का भरोसा अभी भी पूरी तरह बहाल नहीं हुआ है, जिससे परिणामों पर बहुत गंभीर असर पड़ रहा है.


ऐसी ही स्थिति न्यायिक सेवाओं के साथ भी है. इस क्षेत्र में अनेक बदलाव की कोशिशें हुई हैं. इनमें से एक प्रयास अलग व्यावसायिक न्यायालयों और ट्रिब्यूनलों की स्थापना भी है. इसके बावजूद लोगों की मुश्किलें अब भी बर्दाश्त के बाहर हैं. यहां तक कि इन्सॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड जैसे बेहद व्यावहारिक कानून के डिजाइन ने भी मामूली मदद की है. यह एक चिंताजनक स्थिति है. इसके कारण बिल्कुल स्पष्ट हैं.


व्यवस्था की बनावट और कामकाज की प्रक्रियाएं पुरानी प्रकृति का ही अवतार हैं. निहित स्वार्थों तथा किसी भी तरह धन बनाने की जुगत में लगे लोग अब भी आराम से अपना काम कर रहे हैं. यदि न्याय देना उद्देश्य है, तो फिर ‘न्याय में देरी न्याय देने से इनकार है.' जब तक नये न्याय शास्त्र का निर्माण नहीं हो जाता है, तब तक पुराना न्याय शास्त्र और न्यायिक मनमानी अपनी प्रभुता नहीं चला सकते हैं. समानता के सिद्धांत से संचालित व्यवस्था में अपेक्षित परिणाम ही निर्धारक कारक होने चाहिए.


‘सदी का विशिष्ट बजट’ में ‘शासन के संस्थानों’ के पूरी तरह से फिर से रचने-गढ़ने का उद्देश्य समाहित होना चाहिए, जहां आम आदमी लाभों को ग्रहण करने में आगे रहे तथा साधन संपन्न लोगों को परिणामों के अपहरण की अनुमति नहीं होनी चाहिए.


ऐसा करना आज की सबसे अहम जरूरत है. यह सच है कि ऐसा एक साल में ही नहीं हो सकता है, लेकिन भविष्य के लिए एक कार्ययोजना बजट के दस्तावेज में स्पष्ट रूप से रेखांकित होनी चाहिए. अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति स्वर्गीय जॉन एफ केनेडी ने एक अर्थपूर्ण बात कही थी कि ‘जब सूरज चमक रहा हो, तब छत की मरम्मत का समय होता है.’ इस महत्वपूर्ण युगांतकारी परिवर्तन को हमारी संसद के दोनों सदनों द्वारा स्वीकृति देने और इसके लिए समाज की एकचित्तता का यही समय है.

सौजन्य - प्रभात खबर।

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बड़े बदलाव के पुरोधा कर्पूरी ठाकुर (प्रभात खबर)

केसी त्यागी, पूर्व सांसद एवं प्रधान, महासचिव, जद (यू)

 

जननायक कर्पूरी ठाकुर का 24 जनवरी को जन्म दिवस है. देश इसे समता और स्वाभिमान दिवस के रूप में स्मरण करता है. बिहार के लगभग सभी राजनीतिक दल कार्यक्रमों और जनसभाओं का आयोजन करते हैं. रोचक है कि इसमें वे नेता एवं संगठन भी शामिल होते हैं, जो उनके जीवन-काल में उनके विचारों एवं कार्यक्रमों के विरोधी रहे. समता, जाति प्रथा का विनाश और स्वाभिमान से जीने की चाह का सपना सच में बदलने का प्रयास कर्पूरी ठाकुर द्वारा किया गया.



दुर्बल एवं साधनहीन लोगों में चेतना लाना, उन्हें संगठित करना और परिवर्तन का वाहक दस्ता बनाना असंभव जैसा कार्य है. विचारों की प्रखरता, अडिग विश्वास ने कर्पूरी जी को कभी विचलित नहीं होने दिया. डॉ आंबेडकर और कर्पूरी ठाकुर के आरक्षण, विशेष अवसर का सिद्धांत, समता, जाति-विनाश की राजनीति का विरोध कर रहे संगठन एवं व्यक्तियों के समूह उनके जन्म-मृत्यु दिवस पर भव्य कार्यक्रम आयोजित कर रहे हैं.



कर्पूरी ठाकुर जिन विचारों और कार्यक्रमों को जमीन पर उतारने में समर्पित रहे, वे डॉ लोहिया द्वारा प्रतिपादित थे. गैर-कांग्रेसवाद की राजनीति के जनक डॉ लोहिया बहुप्रयोगधर्मी थे. पार्टी के संगठनात्मक ढांचे और मंत्रिमंडल में भी विभिन्न वर्गों को आनुपातिक प्रतिनिधित्व दिलाने के लिए डॉ लोहिया आजीवन प्रयासरत रहे. जब 1967 में डॉ लोहिया की मृत्यु हुई, उस समय बिहार, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश, पंजाब समेत आधा दर्जन से अधिक प्रांतों में गैर-कांग्रेसी मुख्यमंत्री बने.


सोशलिस्ट पार्टी के असर वाले राज्यों की बागडोर पिछड़े वर्ग के नेताओं के हाथ में रही. उत्तर प्रदेश में चौधरी चरण सिंह, बिहार में कर्पूरी ठाकुर और हरियाणा में राव बीरेंदर सिंह पिछड़े वर्गों के स्थापित नेता थे. डॉ आंबेडकर 1942 में दलित एवं आदिवासी समूहों के लिए आरक्षण का प्रश्न उठा चुके थे, जो स्वतंत्र भारत में संभव हो सका. पिछड़े वर्गों की आधी से अधिक आबादी शिक्षा और नौकरी से दूर थी. स्वतंत्रता के बाद हिस्सेदारी को लेकर समय-समय पर आंदोलन भी होते रहे और आयोग भी गठित हुए.


पहला आयोग काका कालेलकर की अध्यक्षता में गठित हुआ, जिसने इन वर्गों की नगण्य हिस्सेदारी पर अफसोस जाहिर किया और आरक्षण लागू कर इन समूहों की हिस्सेदारी की जोरदार सिफारिश की. ये सिफारिशें लंबे समय तक धूल चाटती रहीं. निःसंदेह कांग्रेस पार्टी ऐसे किसी बड़े परिवर्तन की हिमायती नहीं रही. वर्ष 1967 के गैर-कांग्रेसी प्रयोग और 1977 में जनता पार्टी के गठन से परिस्थितियां बदलीं. उत्तर प्रदेश में राम नरेश यादव, बिहार में कर्पूरी ठाकुर, हरियाणा में चौधरी देवीलाल, पंजाब में प्रकाश सिंह बादल, उड़ीसा में नीलमणि राउत, गुजरात में बाबू भाई पटेल और बाद में महाराष्ट्र में शरद पवार किसान जातियों एवं पिछड़े वर्गों के मुख्यमंत्री बने.


कर्पूरी ठाकुर के सिर पर कांटों का ताज था. पार्टी के अंदर और बाहर निहित स्वार्थों के प्रतिनिधि मोर्चा लगाये हुए थे. 11 नवंबर, 1978 को बिहार विधानसभा में पिछड़ी जातियों के आरक्षण का प्रस्ताव आया, तो जनता पार्टी दो फाड़ हो गयी. कर्पूरी जी के कई साथी भी अपनी जाति समूहों के साथ चिपक गये. आरक्षण में आरक्षण का प्रस्ताव कई पिछड़ी जातियों के स्थापित नेताओं को भी नागवार गुजरा. जब अति पिछड़ों के लिए 12 प्रतिशत, सामान्य पिछड़ों के लिए आठ प्रतिशत, महिलाओं के लिए तीन प्रतिशत और सामान्य श्रेणी के लिए तीन प्रतिशत आरक्षण की घोषणा की गयी, तो कर्पूरी जी सबके निशाने पर आ गये. किसी ने उन्हें उत्तर भारत का पेरियार घोषित कर दिया, तो किसी ने उन्हें आंबेडकर. कुछ ने उन्हें महात्मा फुले और साहू जी महाराज का उत्तराधिकारी बताया. सामाजिक न्याय के इस संघर्ष में उनका मुख्यमंत्री पद चला गया, लेकिन वह शीर्षस्थ नेता के रूप में स्थापित हुए. आज वे हमारे बीच नहीं है, पर पूरे देश में कर्पूरी ठाकुर के आरक्षण फार्मूले पर अमल हो रहा है.


सामान्य श्रेणी के लिए संविधान में आरक्षण की कोई व्यवस्था नहीं थी, लेकिन पहले बिहार में नीतीश सरकार ने सवर्ण आयोग गठित कर इन वर्गों के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण की घोषणा की. बाद में केंद्र की मोदी सरकार ने आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण को लागू किया. महिलाओं के आरक्षण की चर्चा पहली बार कर्पूरी फार्मूले में शामिल हुई. पिछले दिनों मोदी सरकार ने कर्पूरी फार्मूले पर अमल करने हेतु ‘कोटा के अंदर कोटा’ सिद्धांत को लागू करने के लिए जी रोहिणी आयोग का गठन किया है.


कुछ राज्यों में पहले से ही अति पिछड़े इन सुविधाओं का लाभ उठा रहे हैं. बिहार में कर्पूरी ठाकुर के मानस पुत्र नीतीश कुमार ने अत्यंत पिछड़ों के साथ-साथ महादलित आयोग के जरिये अत्यंत दुर्बल वर्गों के आर्थिक-सामाजिक सशक्तीकरण का मार्ग प्रशस्त कर दिया है. आज किसी दल, व्यक्ति, समूह में इतना दम-खम नहीं है कि कर्पूरी फार्मूले का विरोध कर सके. सभी दलों, सभ्य समाज के प्रतिनिधि वर्ग को स्वर्गीय कर्पूरी ठाकुर को विनम्र श्रद्धांजलि देते हुए उन्हें भारतरत्न देने का आह्वान करना चाहिए, ताकि उनके अनुयायी गौरवान्वित महसूस कर सकें.

सौजन्य - प्रभात खबर।

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बाइडन का भाषण, घायल अमरीकी मन पर मरहम (पत्रिका)

कुमार प्रशांत

राजनीतिक रूप से अत्यंत अप्रभावी, सामाजिक रूप से बेहद विछिन्न और आर्थिक रूप से लडख़ड़ाते अमरीका के 46वें राष्ट्रपति बनने के बाद कैपिटल हिल की ऐतिहासिक सीढिय़ों पर खड़े हो कर जो बाइडन ने जो कुछ कहा, वह ऐतिहासिक महत्त्व का है। क्यों? इसलिए कि अमरीका के इतिहास का ट्रंप-काल बीतने के बाद बाइडन को जो कुछ भी कहना था वह अपने अमरीका से ही कहना था, और ऐसे में वे जो भी कहते वह ऐतिहासिक ही हो सकता था। इसलिए तब खूब तालियां बजीं, जब बाइडन ने कहा कि यह अमरीका का दिन है, यह लोकतंत्र का दिन है। यह एकदम सामान्य-सा वाक्य था जो ऐतिहासिक लगने लगा, क्योंकि पिछले पांच सालों से अमरीका ऐसे वाक्य सुनना और गुनना भूल ही गया था। यह वाक्य घायल अमरीकी मन पर मरहम की तरह लगा।

लोकतंत्र है ही ऐसी दोधारी तलवार जो कलुष को काटती है, शुभ को चालना देती है। यह अलग बात है कि तमाम दुनिया में लोकतंत्र की आत्मा पर सत्ता के भूख की ऐसी गर्द पड़ी है कि वह खुली सांस नहीं ले पा रहा है। तंत्र ने उसका गला दबोच रखा है। हम पहले से जानते थे कि बाइडन, बराक ओबामा की तरह मंत्रमुग्ध कर देने वाले वक्ता नहीं हैं, बल्कि वह एक मेहनती राजनेता हैं। चूंकि अमरीका को ट्रंप से मुक्ति चाहिए थी, इसलिए भी इतिहास ने इस भूमिका के लिए बाइडन का कंधा चुना। ट्रंप बौद्धिक रूप से इतने सक्षम थे ही नहीं कि अपने देश की राजनीतिक व सांस्कृतिक विरासत को समुन्नत करने की स्वाभाविक व पदसिद्ध जिम्मेवारी को समझ पाते। इस जिम्मेवारी के निर्वहन में विफल कितने ही महानुभाव हमें इतिहास के कूड़ाघर में मिलते हैं। डंपिंग ग्राउंड केवल नगरपालिकाओं के पास नहीं होता, इतिहास के पास भी होता है।

शपथ ग्रहण करने के बाद बाइडन जब कहते हैं कि हम एक महान राष्ट्र हैं, हम अच्छे लोग हैं तब वह अमरीका के मन को ट्रंप के दौर की संकीर्णता से बाहर निकालने की कोशिश करते हैं। जब उन्होंने कहा कि मैं सभी अमरीकियों का राष्ट्रपति हूं- सारे अमरीकियों का, हमें एक-दूसरे की इज्जत करनी होगी और यह सावधानी रखनी होगी कि सियासत ऐसी आग न बन जाए जो सबको जलाकर राख कर दे तो वह गहरे बंटे हुए अपने समाज के बीच पुल भी बना रहे थे और अमरीकियों को सत्ता व राजनीति की मर्यादा भी समझा रहे थे।

बाइडन ने अमरीकी सीमा के बाहर के लोगों से यानी दुनिया से सिर्फ इतना ही कहा कि हमें भविष्य की चुनौतियों से ही नहीं, आज की चुनौतियों से भी निबटना है। ट्रंप ने आज को ही तो इतना विद्रूप कर दिया है कि भविष्य की बातों का बहुत संदर्भ नहीं रह गया है। राष्ट्र को संबोधित करने की यह परंपरा अमरीका के पहले राष्ट्रपति जॉर्ज वाशिंगटन ने 30 अप्रेल 1789 को शुरू की थी। यह परंपरा और कुछ नहीं, राष्ट्र-मन को छूने और उसे उदात्त बनाने की कोशिश है। बाइडन के इस सामान्य भाषण में असामान्य था अनुभव की लकीरों से भरे उनके आयुवृद्ध चेहरे से झलकती ईमानदारी। वह जो कह रहे थे मन से कह रहे थे और अपने मन को अमरीका का मन बनाना चाहते थे। वहां शांति, धीरज व जिम्मेवारी के अहसास से भरा माहौल था।

उन्होंने गलती से भी ट्रंप का नाम नहीं लिया जैसे उस पूरे दौर को पोंछ डालना चाहते हों। चुनावी उथलापन, खोखली बयानबाजी, अपनी पीठ ठोकने और सीना दिखाने की कोई छिछोरी हरकत उन्होंने नहीं की। गीत-संगीत व संस्कृति का मोहक मेल था लेकिन कहीं चापलूसी और क्षुद्रता का लेश भी नहीं था। यह एक अच्छी शुरुआत थी। लेकिन बाइडन न भूल सकते हैं, न अमरीका उन्हें भूलने देगा कि भाषण का मंच समेटा जा चुका है। अब वह हैं और कठोर सच्चाइयों के सामने खुला उनका सीना है। इनका मुकाबला वह कैसे करते हैं और अमरीका का मानवीय चेहरा दीपित करते हैं, यह हम भी और दुनिया भी देखना चाहती है।

(गांधी शांति प्रतिष्ठान,दिल्ली के अध्यक्ष)

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नवाचार: 'स्मार्ट' शहरों की नींव बनेगी लिडार तकनीक! (पत्रिका)

डैल्विन ब्राउन,
(इनोवेशंस रिपोर्टर)

भविष्य के शहरी समुदायों के निर्माण के लिए मोबिलिटी विश्लेषक, शहरी नियोजक और आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस कंपनियां लिजार तकनीक को अहम कड़ी की तरह देख रही हैं। उनका मानना है कि इस तकनीक का सहारा लेकर स्मार्ट शहरों की नींव रखी जा सकती है जहां ऑटोनमस वाहन, स्मार्ट घर और आधारभूत ढांचा आपसी तालमेल के साथ काम करते हैं। 'लाइट डिटेक्शन एंड रेंजिंग' (लिडार), सेंसर आधारित तकनीक है और जब ट्रैफिक लाइट, पार्किंग स्थलों और अधिकांश वाहनों पर इसे लगा दिया जाता है तो तकनीक की मदद से शहर ऊर्जा और सुरक्षा का बेहतर प्रबंधन करने में सक्षम हो सकते हैं। यातायात अवरुद्ध होने की समस्या का निवारण भी इसकी मदद से संभव है।

हालांकि यह तकनीक बीती सदी के ७० के दशक से अस्तित्व में है, लेकिन इसे व्यापक इस्तेमाल के लिए बहुत महंगा और जटिल समझा जाता रहा है। दक्षिण कोरिया स्थित कम्प्यूटर विजन कंपनी सोल रोबोटिक्स के संस्थापक हानबिन ली के मुताबिक, 'अब तक ऐसा था, लेकिन अब नहीं है। कीमतें अब इतनी नीचे आ चुकी हैं कि आइफोन के नवीनतम मॉडल में भी यह तकनीक पाई जाती है। इस साल के वैश्विक तकनीक सम्मेलन सीईएस में पेश किए गए कई उत्पादों के केंद्र में यही तकनीक है।' फैक्ट्री, रिटेलर, ऑटोमेकर आदि के लिए लाइट व राडार डेटा का विश्लेषण करने वाली सॉफ्टवेर व हार्डवेयर सर्विस 'डिस्कवरी' को हाल ही सोल रोबोटिक्स ने लांच भी किया है। कंपनी इसे इस्तेमाल में आसान 'प्लग एंड प्ले' लिडार प्रणाली बता रही है, जिसके 3-डी सेंसर की मदद से कई तरह की संस्थाएं लाभान्वित हो सकती हैं।

साभार : द वाशिंगटन पोस्ट

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दुधारू विभाग (पत्रिका)

- भुवनेश जैन

कितने 'गर्व' की बात है कि राजस्थान पथ परिवहन निगम अपना खर्च चलाने के लिए 400 करोड़ रुपए का कर्ज लेने जा रहा है। इस उपलब्धि के लिए परिवहन मंत्री को तमगा दिया जाना चाहिए। शायद मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ की राह पर चलते हुए राजस्थान में वे भी रोडवेज को समाप्त करने का 'श्रेय' हासिल कर लें।

राजस्थान में रोडवेज ही नहीं, पूरा परिवहन विभाग ही गर्त में जा रहा है। राजस्थान रोडवेज तो 15 साल से घाटे में है। सरकार के अनुदान के भरोसे किसी तरह गाड़ी चल रही है। ऋण का भार बढ़ता जा रहा है। इसे चुकाएगा कौन, इसकी चिन्ता किसी को नहीं है। आखिर में पैसा आम नागरिकों से ही वसूला जाएगा। रोडवेज में ऊपर से नीचे तक भ्रष्टाचार का बोलबाला है। हर माह औसतन 100 परिचालक बिना टिकट यात्री ले जाते पकड़े जाते हैं। परिचालक और डिपो मैनेजर की मिलीभगत के मामले भी पकड़े जा चुके हैं। पर ये अपने आकाओं की कृपा से फिर उसी सीट पर आ बैठते हैं। स्पष्ट है कि भ्रष्टाचार की कमाई ऊपर तक जाती है। भ्रष्टाचार के मामले में एपीओ हुए अफसरों को वापस उसी सीट पर लगा दिया जाता है। बसों की खरीद में और बड़े घपले होते हैं।

हाल ही में चौंकाने वाली यह बात सामने आई कि राजस्थान रोडवेज की बसों से मिलती-जुलती अवैध बसें रोडवेज के रूटों पर चल रही हैं। रोडवेज की बसें उन रूटों से हटा ली गईं। क्या इतना बड़ा भ्रष्टाचार बिना ऊपरी संरक्षण के हो सकता है? परिवहन विभाग की हालत तो और भी ज्यादा खराब है। इंस्पेक्टर व बाबू एक सीट पर ज्यादा नहीं जम पाए, इसके लिए रोस्टर प्रणाली बनाई गई। यह दिखावा बनकर रह गई। निजी बसें और अन्य वाहन धड़ल्ले से बिना परमिट के चल रहे हैं। मंत्री स्तर पर यह निर्णय लिए जा रहे हैं कि कौन किस सीट पर बैठेगा। कमाई वाली सीटों की बोली भी ऊंची लगती है। पिछले साल भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ने मासिक बंधी के आरोप में आठ दलालों और छह अफसरों को पकड़ा था। अब उन्हें भी वापस पोस्टिंग देने की कोशिश हो रही है। ऑटोमैटिक ड्राइविंग ट्रैक का काम निजी कंपनी को दे दिया गया और इसके लिए लाइसेंस फीस बढ़ा दी गई। फिर परिवहन विभाग की फौज किस काम के लिए है?

परिवहन विभाग में बार-बार रोडवेज के निजीकरण की चर्चा हो रही है। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ की तरह राजस्थान में भी बहुत से राजनेताओं की बसें चल रही हैं। ऐसे ही नेताओं ने मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में रोडवेज का बंटाधार करवाया है। एक-एक नेता की दो-दो सौ बसें चल रही हैं। जिन मार्गों पर यात्री भार कम होता है, वहां ये निजी बसें चलती ही नहीं। दूरस्थ गांव-कस्बों के हजारों यात्री परेशान हैं। दोनों प्रदेशों में सरकारों को ऐसे यात्रियों की तकलीफों से कोई मतलब नहीं है। कहने को तो लोकतंत्र में 'लोक' की तकलीफें दूर करने के दावे किए जाते हैं, पर बस माफियाओं से गठजोड़ जनता की पीड़ा पर भारी पड़ता है। चाहे भारतीय जनता पार्टी हो या कांग्रेस, परिवहन विभाग को दोनों पार्टियों ने अपने-अपने शासन में जम कर दुहा है। 'लोक कल्याण' के मुखौटे के पीछे जनता की लूट-खसोट राजनीतिक पार्टियों के चरित्र में शामिल हो चुकी है।

पानी रे पानी

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