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-Rajeev Kumar (Editor-in-chief)

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Saturday, April 17, 2021

अफगानिस्तान: शांति की राह में रोड़े कम नहीं (अमर उजाला)

कुलदीप तलवार  

अमेरिका के नए राष्ट्रपति जो बाइडन पद संभालने के बाद से अफगानिस्तान में शांति बहाली के लिए भरपूर कोशिशें कर रहे हैं। बाइडन ओबामा के दौर में उप राष्ट्रपति थे, उनका मानना रहा है कि अमेरिका व नाटो सैनिकों को अफगानिस्तान से निकल जाना चाहिए। वह अब भी अपने इरादे पर कायम है। लेकिन अफगानिस्तान के मौजूदा हालात को देखते हुए और अमेरिकी हितों को नजर में रखकर पूर्व राष्ट्रपति ट्रंप ने तालिबान के साथ पहली मई तक सैनिकों को निकालने का समझौता कर लिया था, उस पर वह अमल को तैयार नहीं है। ट्रंप अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों को निकालने की जल्दबाजी में थे। 



लेकिन बाइडन काफी सतर्क हैं, फूंक-फंककर कदम बढ़ा रहे हैं। उन्हें अमेरिकी खुफिया एजेंसियों ने पहले ही आगाह कर दिया था कि अफगानिस्तान में सत्ता के बंटवारे से समझौते से पहले अमेरिकी सैनिकों को अफगानिस्तान से बाहर निकाला गया, तो तालिबान सारे देश पर कब्जा कर लेंगे। बाइडन दूसरे देशों को साथ, जो अफगानिस्तान में शांति चाहते हैं, लेकर चल रहे हैं। वह नाटो को मजबूत करना चाह रहे हैं। जबकि ट्रंप नाटो गठबंधन में तनाव का शिकार रहे। ऐसा लगता है कि बाइडन पाकिस्तान को अपना सहयोगी नहीं समझते। इसलिए उन्होंने रक्षामंत्री आस्टिन को पिछले दिनों पाकिस्तान नहीं भेजा, जबकि उन्हें भारत और अफगानिस्तान भेजा गया। ताकि अफगानिस्तान में हिंसा के खात्मे और शांति बहाली के लिए गहन विमर्श किया जाए और हालात को सुधारने के लिए जरूरी कदम उठाए जाएं। इससे पता चलता है कि पाकिस्तान उसके लिए सामरिक महत्व का देश नहीं रह गया। ट्रंप उससे धोखा खाते रहे और पाकिस्तान को तालिबान से समझौता कराने में मददगार समझते रहे। 



गरज ये कि बाइडन का काम करने का रवैया ट्रंप से बिल्कुल अलग है। वह अफगानिस्तान में हिंसा को खत्म करने व शांति बहाली के लिए वहां से अमेरिकी सैनिकों को अभी निकाल नहीं रहे। निस्संदेह गरीब अफगानियों के लिए यह एक राहत की बात है। तस्वीर का दूसरा रुख यह है कि अफगानिस्तान में शांति बहाली के रास्ते में सभी पक्षों-तालिबान, अफगान सरकार व शांति चाहने वाले देशों में गंभीर मतभेद हैं। अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी कह रहे हैं कि वह शांति बहाली के लिए देश में नए चुनाव कराने को तैयार हैं, पर मिली-जुली सरकार के लिए बिल्कुल तैयार नहीं हैं। उनका मानना है कि देश में तब्दीली केवल लोकतांत्रिक तरीके से हो सकती है। 


ताजिकिस्तान की राजधानी दुशांबे में बेशक अफगानिस्तान और उससे जुड़ी चिंताओं को रेखांकित किया गया, पर जो देश इस सम्मेलन में शामिल थे अधिकांश का मानना था कि अगर भारत अफगानिस्तान में बड़ा रोल अदा करना चाहता है, तो उसे ज्यादा बड़ी जिम्मेदारी भी संभालनी होगी। यानी भारत को अफगानिस्तान में सेना की तैनाती भी करनी होगी। जबकि अबतक भारत की सरकारें इसे नकारती रही हैं। भारत का मानना है कि अफगानिस्तान में पहले हिंसा खत्म होनी चाहिए और वहां पाकिस्तान की भूमिका सीमित करके ही शांति कायम हो सकती है। दरअसल बाइडन प्रशासन भी इस बात को अच्छी तरह समझ गया है। पर्दे के पीछे पाक खुफिया एजेंसी आईएसआई तालिबान को ताकत दे रही है। एक तरह से तालिबान आईएसआई के लिए अफगान सरकार के खिलाफ भाड़े पर युद्ध कर रहा है। इधर रूस व अमेरिकी संबंधों में दिन-ब-दिन कशीदगी बढ़ती जा रही है। अगले कुछ समय में रूस अमेरिका को अफगानिस्तान से निकालने का फैसला ले सकता है। 


तालिबान पहले ही बाइडन को धमकी दे चुके कि वह अमेरिकी सेना को जल्दी ही वहां से निकाल लें, वरना वे हमले तेज कर देंगे। अफगानिस्तान में रूस भारत को उपयोगी नहीं मानता, जबकि भारत का वहां बहुत कुछ दांव पर लगा हुआ है। उसकी नजरों में भारत और अमेरिका की घनिष्ठता भी खटक रही है। वर्ष 2019 की तुलना में 2020 में नागरिकों की मौत के बारे में ही 45 फीसदी की वृद्धि है। इस साल भी हालत बेहतर नहीं हुई। यही कहा जा सकता है कि अफगानिस्तान में अभी शांति बहाली मुश्किल नजर आ रही है। 

सौजन्य - अमर उजाला।

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कोरोना वायरस: मास्क से दूरी, आखिर हम जिम्मेदार कब बनेंगे (अमर उजाला)

सुरेंद्र कुमार, पूर्व राजदूत  

पिछले छह दिनों से लगातार भारत में एक लाख से ज्यादा कोरोना पॉजिटिव मामले दर्ज किए गए हैं, जो अमेरिका के बाद इसे दुनिया का दूसरा सर्वाधिक कोविड संक्रमित राष्ट्र बनाता है। यह गर्व करने लायक स्थिति नहीं है! ऐसा क्यों हुआ, यह समझने के लिए रॉकेट विज्ञान का विशेषज्ञ होना जरूरी नहीं। हम जानते हैं कि क्या किया जा सकता है, पर कुछ सरल और प्रभावी उपाय करने में हम अनिच्छुक लगते हैं। हम जीतने की अथक इच्छा से ग्रस्त राजनेताओं की अनदेखी कर सकते हैं, क्योंकि उनकी रैलियों में आने वाले हजारों समर्थकों में कुछेक सौ अगर संक्रमित हो जाते हैं, तो उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ेगा। राजनेतागण अपने चुनावी भाषणों की शुरुआत इस एक पंक्ति के साथ क्यों नहीं कर सकते, 'इससे पहले कि मैं अपना भाषण शुरू करूं, आप अपने चेहरे पर मास्क लगा लीजिए।

अगर आपके पास मास्क नहीं है, तो कृपया अपने मुंह और नाक को गमछे या अंगोछे से ढक लीजिए।' यदि पार्टियां रैलियों के आयोजन पर करोड़ों रुपये खर्च कर सकती हैं, तो वे रैली के आयोजन स्थल पर मुफ्त मास्क भी वितरित कर सकती हैं। वे अपने आयोजकों और समर्थकों को सोशल डिस्टेंसिंग बनाए रखने के लिए क्यों नहीं कह सकतीं? फिर इहलोक और परलोक में हमारे भाग्य के रखवाले भी हैं, जो इस जन्म के सभी पापों को धोने तथा अगले जन्म की बेहतरी के लिए लाखों श्रद्धालुओं को पवित्र डुबकी लगाने के लिए आमंत्रित करते हैं, लेकिन मास्क और सोशल डिस्टेंसिंग का ख्याल उनके मन में भी नहीं आता। 

मगर पढ़े-लिखे शहरी युवाओं को क्या कहा जाए? वे प्रधानमंत्री से लेकर सभी नामचीन हस्तियों को मास्क लगाने और सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करने की अपील करते हुए टीवी पर देखते हैं, ताकि संक्रमण रोकने में मदद मिले। पर वे इन अपीलों की अवहेलना करते दिखते हैं। वे दिल्ली जैसे महानगर में कोविड संक्रमण के प्रसार में सहायक हैं। हमारे नेता जनसांख्यिकीय लाभांश का बखान करते हुए कभी नहीं थकते और बताते हैं कि 65 फीसदी भारतीय 35 वर्ष से कम आयु के हैं। पर अगर युवा राष्ट्रीय संकट के प्रति संवेदनशीलता नहीं दिखाते और मास्क लगाने व सोशल डिस्टेंसिंग के पालन की अवहेलना करते हैं, तो उन्हें कल्पनाशील तरीके से संदेश देना चाहिए। हमें उन्हें दूसरों को खतरे में डालने की अनुमति नहीं देनी चाहिए।


मैं दिल्ली के मयूर विहार फेज-1 में रहता हूं। यदि कोई शाम सात बजे पास के सिक्का प्लाजा (खाने की छोटी-सी जगह और फास्ट फूड चेन की दुकान) जाए, तो वहां 18 से 25 वर्ष के करीब 300 युवाओं की भीड़ होती है, जिनमें से 90 फीसदी बिना मास्क लगाए होते हैं। आप कॉलेज जाने वाली दर्जनों लड़कियों को धूम्रपान कर विद्रोही भावना प्रकट करते देख सकते हैं, पर मास्क लगाने में उनकी भी दिलचस्पी नहीं होती। यदि आप उस समूह में से किसी को मास्क लगाने की सलाह देने की हिम्मत करते हैं, तो वह इतने गंदे तरीके और आक्रामकता के साथ देखेगा, मानो आपको दूर जाने के लिए कह रहा हो। वे अपेक्षाकृत अच्छे कपड़े पहने होते हैं, घंटों वहां बैठकर खाते-पीते हैं और अपने इस्तेमाल किए हुए प्लेट और ग्लास टेबिल पर ही छोड़ देते हैं! यह कितनी अनुशासनहीन और गैर-जिम्मेदार युवा पीढ़ी है! 


सहयोग अपार्टमेंट की बगल में एक डीडीए पार्क है-विवेकानंद पार्क। वहां सुबह छह से दस बजे के बीच करीब दो हजार लोग मार्निंग वॉक करने आते हैं, जिनमें से 90 फीसदी लोग बिना मास्क के होते हैं। आप बीस वर्ष से कम उम्र के दर्जनों लोगों को बगैर मास्क लगाए कोर्ट में बैंडमिंटन खेलते हुए देख सकते हैं। इसके अलावा 60 से 70 की उम्र के बुजुर्गों को बिना मास्क पहने आप जोर-जोर से राम-राम एक, राम-राम दो गाते हुए सुन सकते हैं। माइक्रोस्कोप से देखने पर भी न तो आपको पूरे पार्क में कहीं फूल दिखेंगे और न ही पांच वर्ष से चल रहे स्वच्छ भारत अभियान के बावजूद चालू स्थिति में कोई शौचालय। हममें से अधिकांश ऐसे गैर-जिम्मेदार नागरिक क्यों हैं? क्या हममें कुछ आत्म अनुशासन, नागरिक भावना और अपने साथी नागरिकों की भलाई के विचार नहीं हैं?


अगर लेफ्टिनेंट गवर्नर (एलजी) दिल्ली के मुख्य प्रशासक हैं, जैसा कि अदालतों ने कहा है, तो वह कोविड-19 से लड़ाई में सबसे आगे क्यों नहीं हैं? पुलिस उनके अधीन है, तो वह शाम के समय सिक्का प्लाजा जैसी जगहों पर दो-तीन पुलिसकर्मियों को क्यों नहीं भेज सकते, जो मौके पर ही बिना मास्क पहने लोगों को जुर्माना लगाएं। जो जुर्माना नहीं देते, उन्हें शर्मिंदा करना चाहिए। इस तरह से लोगों को मास्क पहनने के लिए प्रेरित किया जा सकता है। डीडीए पार्क भी एलजी के अधिकार क्षेत्र में है, तो वह बिना मास्क लगाए लोगों के पार्क में प्रवेश पर प्रतिबंध क्यों नहीं लगाते हैं? नियम का उल्लंघन करने वाले को मौके पर ही दंडित किया जाना चाहिए। खान मार्केट में मास्क के बगैर ग्राहकों को दुकानों में प्रवेश की इजाजत नहीं है। हर दुकान के बाहर स्टैंड पर सैनिटाइजर लगा हुआ है, जिसे पैरों से चलाया जाता है, जो दुकान में प्रवेश से पहले ग्राहकों को सैनिटाइज किया जाना सुनिश्चित करता है। इसे सभी शॉपिंग क्षेत्र में अनिवार्य किया जाना चाहिए।


पिछले हफ्ते से रात के दस बजे से सुबह के छह बजे तक लगाया जा रहा रात्रि कर्फ्यू खानापूर्ति का उदाहरण है। यह प्राइम टाइम टीवी समाचार की सुर्खियां बनता है, चिकित्सीय आपातकालीन स्थिति का सामना कर रहे नागरिकों के लिए असुविधा का कारण बनता है, लेकिन कोविड के प्रसार को रोकने में कोई योगदान नहीं करता, क्योंकि कोरोना महामारी प्रसार के लिए दस बजे रात्रि तक की प्रतीक्षा नहीं करती। मोहल्ला क्लिनिक, डिस्पेंसरी और सरकारी व निजी अस्पतालों के जरिये 21 साल से ऊपर के सभी लोगों के टीकाकरण से दिल्ली में कोविड के मामलों में बढ़ोतरी पर लगाम लगाया जा सकता है। कोविड वैक्सीन लगाने के लिए आरडब्ल्यूए की मदद से विभिन्न आवासीय परिसरों में शिविरों का आयोजन करके सबको टीका लगाना सबसे आसान तरीका है। टीकाकरण को युद्ध स्तर पर लागू किया जाना चाहिए।

सौजन्य - अमर उजाला।

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Friday, April 16, 2021

अफगानिस्तान: शांति की राह में रोड़े कम नहीं (अमर उजाला)

कुलदीप तलवार  

अमेरिका के नए राष्ट्रपति जो बाइडन पद संभालने के बाद से अफगानिस्तान में शांति बहाली के लिए भरपूर कोशिशें कर रहे हैं। बाइडन ओबामा के दौर में उप राष्ट्रपति थे, उनका मानना रहा है कि अमेरिका व नाटो सैनिकों को अफगानिस्तान से निकल जाना चाहिए। वह अब भी अपने इरादे पर कायम है। लेकिन अफगानिस्तान के मौजूदा हालात को देखते हुए और अमेरिकी हितों को नजर में रखकर पूर्व राष्ट्रपति ट्रंप ने तालिबान के साथ पहली मई तक सैनिकों को निकालने का समझौता कर लिया था, उस पर वह अमल को तैयार नहीं है। ट्रंप अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों को निकालने की जल्दबाजी में थे। 



लेकिन बाइडन काफी सतर्क हैं, फूंक-फंककर कदम बढ़ा रहे हैं। उन्हें अमेरिकी खुफिया एजेंसियों ने पहले ही आगाह कर दिया था कि अफगानिस्तान में सत्ता के बंटवारे से समझौते से पहले अमेरिकी सैनिकों को अफगानिस्तान से बाहर निकाला गया, तो तालिबान सारे देश पर कब्जा कर लेंगे। बाइडन दूसरे देशों को साथ, जो अफगानिस्तान में शांति चाहते हैं, लेकर चल रहे हैं। वह नाटो को मजबूत करना चाह रहे हैं। जबकि ट्रंप नाटो गठबंधन में तनाव का शिकार रहे। ऐसा लगता है कि बाइडन पाकिस्तान को अपना सहयोगी नहीं समझते। इसलिए उन्होंने रक्षामंत्री आस्टिन को पिछले दिनों पाकिस्तान नहीं भेजा, जबकि उन्हें भारत और अफगानिस्तान भेजा गया। ताकि अफगानिस्तान में हिंसा के खात्मे और शांति बहाली के लिए गहन विमर्श किया जाए और हालात को सुधारने के लिए जरूरी कदम उठाए जाएं। इससे पता चलता है कि पाकिस्तान उसके लिए सामरिक महत्व का देश नहीं रह गया। ट्रंप उससे धोखा खाते रहे और पाकिस्तान को तालिबान से समझौता कराने में मददगार समझते रहे। 



गरज ये कि बाइडन का काम करने का रवैया ट्रंप से बिल्कुल अलग है। वह अफगानिस्तान में हिंसा को खत्म करने व शांति बहाली के लिए वहां से अमेरिकी सैनिकों को अभी निकाल नहीं रहे। निस्संदेह गरीब अफगानियों के लिए यह एक राहत की बात है। तस्वीर का दूसरा रुख यह है कि अफगानिस्तान में शांति बहाली के रास्ते में सभी पक्षों-तालिबान, अफगान सरकार व शांति चाहने वाले देशों में गंभीर मतभेद हैं। अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी कह रहे हैं कि वह शांति बहाली के लिए देश में नए चुनाव कराने को तैयार हैं, पर मिली-जुली सरकार के लिए बिल्कुल तैयार नहीं हैं। उनका मानना है कि देश में तब्दीली केवल लोकतांत्रिक तरीके से हो सकती है। 


ताजिकिस्तान की राजधानी दुशांबे में बेशक अफगानिस्तान और उससे जुड़ी चिंताओं को रेखांकित किया गया, पर जो देश इस सम्मेलन में शामिल थे अधिकांश का मानना था कि अगर भारत अफगानिस्तान में बड़ा रोल अदा करना चाहता है, तो उसे ज्यादा बड़ी जिम्मेदारी भी संभालनी होगी। यानी भारत को अफगानिस्तान में सेना की तैनाती भी करनी होगी। जबकि अबतक भारत की सरकारें इसे नकारती रही हैं। भारत का मानना है कि अफगानिस्तान में पहले हिंसा खत्म होनी चाहिए और वहां पाकिस्तान की भूमिका सीमित करके ही शांति कायम हो सकती है। दरअसल बाइडन प्रशासन भी इस बात को अच्छी तरह समझ गया है। पर्दे के पीछे पाक खुफिया एजेंसी आईएसआई तालिबान को ताकत दे रही है। एक तरह से तालिबान आईएसआई के लिए अफगान सरकार के खिलाफ भाड़े पर युद्ध कर रहा है। इधर रूस व अमेरिकी संबंधों में दिन-ब-दिन कशीदगी बढ़ती जा रही है। अगले कुछ समय में रूस अमेरिका को अफगानिस्तान से निकालने का फैसला ले सकता है। 


तालिबान पहले ही बाइडन को धमकी दे चुके कि वह अमेरिकी सेना को जल्दी ही वहां से निकाल लें, वरना वे हमले तेज कर देंगे। अफगानिस्तान में रूस भारत को उपयोगी नहीं मानता, जबकि भारत का वहां बहुत कुछ दांव पर लगा हुआ है। उसकी नजरों में भारत और अमेरिका की घनिष्ठता भी खटक रही है। वर्ष 2019 की तुलना में 2020 में नागरिकों की मौत के बारे में ही 45 फीसदी की वृद्धि है। इस साल भी हालत बेहतर नहीं हुई। यही कहा जा सकता है कि अफगानिस्तान में अभी शांति बहाली मुश्किल नजर आ रही है। 


सौजन्य - अमर उजाला।

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कोरोना वायरस: मास्क से दूरी, आखिर हम जिम्मेदार कब बनेंगे (अमर उजाला)

सुरेंद्र कुमार, पूर्व राजदूत  

पिछले छह दिनों से लगातार भारत में एक लाख से ज्यादा कोरोना पॉजिटिव मामले दर्ज किए गए हैं, जो अमेरिका के बाद इसे दुनिया का दूसरा सर्वाधिक कोविड संक्रमित राष्ट्र बनाता है। यह गर्व करने लायक स्थिति नहीं है! ऐसा क्यों हुआ, यह समझने के लिए रॉकेट विज्ञान का विशेषज्ञ होना जरूरी नहीं। हम जानते हैं कि क्या किया जा सकता है, पर कुछ सरल और प्रभावी उपाय करने में हम अनिच्छुक लगते हैं। हम जीतने की अथक इच्छा से ग्रस्त राजनेताओं की अनदेखी कर सकते हैं, क्योंकि उनकी रैलियों में आने वाले हजारों समर्थकों में कुछेक सौ अगर संक्रमित हो जाते हैं, तो उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ेगा। राजनेतागण अपने चुनावी भाषणों की शुरुआत इस एक पंक्ति के साथ क्यों नहीं कर सकते, 'इससे पहले कि मैं अपना भाषण शुरू करूं, आप अपने चेहरे पर मास्क लगा लीजिए।

अगर आपके पास मास्क नहीं है, तो कृपया अपने मुंह और नाक को गमछे या अंगोछे से ढक लीजिए।' यदि पार्टियां रैलियों के आयोजन पर करोड़ों रुपये खर्च कर सकती हैं, तो वे रैली के आयोजन स्थल पर मुफ्त मास्क भी वितरित कर सकती हैं। वे अपने आयोजकों और समर्थकों को सोशल डिस्टेंसिंग बनाए रखने के लिए क्यों नहीं कह सकतीं? फिर इहलोक और परलोक में हमारे भाग्य के रखवाले भी हैं, जो इस जन्म के सभी पापों को धोने तथा अगले जन्म की बेहतरी के लिए लाखों श्रद्धालुओं को पवित्र डुबकी लगाने के लिए आमंत्रित करते हैं, लेकिन मास्क और सोशल डिस्टेंसिंग का ख्याल उनके मन में भी नहीं आता। 



मगर पढ़े-लिखे शहरी युवाओं को क्या कहा जाए? वे प्रधानमंत्री से लेकर सभी नामचीन हस्तियों को मास्क लगाने और सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करने की अपील करते हुए टीवी पर देखते हैं, ताकि संक्रमण रोकने में मदद मिले। पर वे इन अपीलों की अवहेलना करते दिखते हैं। वे दिल्ली जैसे महानगर में कोविड संक्रमण के प्रसार में सहायक हैं। हमारे नेता जनसांख्यिकीय लाभांश का बखान करते हुए कभी नहीं थकते और बताते हैं कि 65 फीसदी भारतीय 35 वर्ष से कम आयु के हैं। पर अगर युवा राष्ट्रीय संकट के प्रति संवेदनशीलता नहीं दिखाते और मास्क लगाने व सोशल डिस्टेंसिंग के पालन की अवहेलना करते हैं, तो उन्हें कल्पनाशील तरीके से संदेश देना चाहिए। हमें उन्हें दूसरों को खतरे में डालने की अनुमति नहीं देनी चाहिए।


मैं दिल्ली के मयूर विहार फेज-1 में रहता हूं। यदि कोई शाम सात बजे पास के सिक्का प्लाजा (खाने की छोटी-सी जगह और फास्ट फूड चेन की दुकान) जाए, तो वहां 18 से 25 वर्ष के करीब 300 युवाओं की भीड़ होती है, जिनमें से 90 फीसदी बिना मास्क लगाए होते हैं। आप कॉलेज जाने वाली दर्जनों लड़कियों को धूम्रपान कर विद्रोही भावना प्रकट करते देख सकते हैं, पर मास्क लगाने में उनकी भी दिलचस्पी नहीं होती। यदि आप उस समूह में से किसी को मास्क लगाने की सलाह देने की हिम्मत करते हैं, तो वह इतने गंदे तरीके और आक्रामकता के साथ देखेगा, मानो आपको दूर जाने के लिए कह रहा हो। वे अपेक्षाकृत अच्छे कपड़े पहने होते हैं, घंटों वहां बैठकर खाते-पीते हैं और अपने इस्तेमाल किए हुए प्लेट और ग्लास टेबिल पर ही छोड़ देते हैं! यह कितनी अनुशासनहीन और गैर-जिम्मेदार युवा पीढ़ी है! 


सहयोग अपार्टमेंट की बगल में एक डीडीए पार्क है-विवेकानंद पार्क। वहां सुबह छह से दस बजे के बीच करीब दो हजार लोग मार्निंग वॉक करने आते हैं, जिनमें से 90 फीसदी लोग बिना मास्क के होते हैं। आप बीस वर्ष से कम उम्र के दर्जनों लोगों को बगैर मास्क लगाए कोर्ट में बैंडमिंटन खेलते हुए देख सकते हैं। इसके अलावा 60 से 70 की उम्र के बुजुर्गों को बिना मास्क पहने आप जोर-जोर से राम-राम एक, राम-राम दो गाते हुए सुन सकते हैं। माइक्रोस्कोप से देखने पर भी न तो आपको पूरे पार्क में कहीं फूल दिखेंगे और न ही पांच वर्ष से चल रहे स्वच्छ भारत अभियान के बावजूद चालू स्थिति में कोई शौचालय। हममें से अधिकांश ऐसे गैर-जिम्मेदार नागरिक क्यों हैं? क्या हममें कुछ आत्म अनुशासन, नागरिक भावना और अपने साथी नागरिकों की भलाई के विचार नहीं हैं?


अगर लेफ्टिनेंट गवर्नर (एलजी) दिल्ली के मुख्य प्रशासक हैं, जैसा कि अदालतों ने कहा है, तो वह कोविड-19 से लड़ाई में सबसे आगे क्यों नहीं हैं? पुलिस उनके अधीन है, तो वह शाम के समय सिक्का प्लाजा जैसी जगहों पर दो-तीन पुलिसकर्मियों को क्यों नहीं भेज सकते, जो मौके पर ही बिना मास्क पहने लोगों को जुर्माना लगाएं। जो जुर्माना नहीं देते, उन्हें शर्मिंदा करना चाहिए। इस तरह से लोगों को मास्क पहनने के लिए प्रेरित किया जा सकता है। डीडीए पार्क भी एलजी के अधिकार क्षेत्र में है, तो वह बिना मास्क लगाए लोगों के पार्क में प्रवेश पर प्रतिबंध क्यों नहीं लगाते हैं? नियम का उल्लंघन करने वाले को मौके पर ही दंडित किया जाना चाहिए। खान मार्केट में मास्क के बगैर ग्राहकों को दुकानों में प्रवेश की इजाजत नहीं है। हर दुकान के बाहर स्टैंड पर सैनिटाइजर लगा हुआ है, जिसे पैरों से चलाया जाता है, जो दुकान में प्रवेश से पहले ग्राहकों को सैनिटाइज किया जाना सुनिश्चित करता है। इसे सभी शॉपिंग क्षेत्र में अनिवार्य किया जाना चाहिए।


पिछले हफ्ते से रात के दस बजे से सुबह के छह बजे तक लगाया जा रहा रात्रि कर्फ्यू खानापूर्ति का उदाहरण है। यह प्राइम टाइम टीवी समाचार की सुर्खियां बनता है, चिकित्सीय आपातकालीन स्थिति का सामना कर रहे नागरिकों के लिए असुविधा का कारण बनता है, लेकिन कोविड के प्रसार को रोकने में कोई योगदान नहीं करता, क्योंकि कोरोना महामारी प्रसार के लिए दस बजे रात्रि तक की प्रतीक्षा नहीं करती। मोहल्ला क्लिनिक, डिस्पेंसरी और सरकारी व निजी अस्पतालों के जरिये 21 साल से ऊपर के सभी लोगों के टीकाकरण से दिल्ली में कोविड के मामलों में बढ़ोतरी पर लगाम लगाया जा सकता है। कोविड वैक्सीन लगाने के लिए आरडब्ल्यूए की मदद से विभिन्न आवासीय परिसरों में शिविरों का आयोजन करके सबको टीका लगाना सबसे आसान तरीका है। टीकाकरण को युद्ध स्तर पर लागू किया जाना चाहिए।


सौजन्य - अमर उजाला।

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आचार संहिता का दायरा: चुनाव आयोग की भूमिका पर फिर छिड़ी बहस (अमर उजाला)

अवधेश कुमार  

वर्तमान विधानसभा चुनावों के मध्य चुनाव आयोग की भूमिका फिर बहस के केंद्र में है। राजनीतिक-वैचारिक विभाजन आज इतना तीखा हो गया है कि किसी भी विषय पर निष्पक्ष एवं न्यायपूर्ण तरीके से एक राय कायम करना संभव नहीं। मूल प्रश्न तो यही है कि चुनाव आयोग ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के खिलाफ जो कदम उठाया, वह संविधान द्वारा प्रदत उसके दायित्वों तथा चुनाव संबंधी नियमों के अनुकूल है या नहीं? इसके विरोध में ममता के धरने को किस तरह देखा जाए? चुनाव आयोग ने चुनावी आचार संहिता के उल्लंघन का दोषी मानते हुए ममता बनर्जी को 24 घंटे के लिए प्रतिबंधित किया। अल्पसंख्यकों से वोट बंटने न देने की अपील और महिलाओं से सुरक्षाबलों का घेराव करने के आह्वान को लेकर आयोग ने दो नोटिस जारी किए थे। 



ममता के जवाब से असंतुष्ट आयोग ने उनके चुनाव प्रचार को प्रतिबंधित किया और उन्हें आगे से इस तरह का बयान न देने की सख्त हिदायत भी दी। आयोग ने पाया कि उन्होंने चुनाव आचार संहिता के साथ ही जनप्रतिनिधित्व कानून, 1951 की धारा 123 (3) और भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 186, 189 और 505 का भी उल्लंघन किया है। अल्पसंख्यक शब्द का जो भी अर्थ बताइए, लेकिन यहां का निहितार्थ ममता सहित सभी के सामने बिल्कुल स्पष्ट था। इसी तरह केंद्रीय सशस्त्र बलों के घेराव का अर्थ उनके काम में बाधा डालना था। चुनाव आयोग ने भड़काऊ भाषण देने पर भाजपा नेता राहुल सिन्हा के प्रचार करने पर 48 घंटे का प्रतिबंध लगाया है। इसके अलावा उसने प्रदेश भाजपा अध्यक्ष दिलीप घोष को नोटिस थमाया है और नंदीग्राम में ममता बनर्जी के खिलाफ चुनाव लड़ रहे शुभेंदु अधिकारी को भी चेतावनी दी है।



चुनावी कानून एवं भारतीय दंड संहिता के अनुसार, आपराधिक मामलों में मुकदमा भी दर्ज किया जा सकता था। चुनाव आयोग अपनी कानूनी सीमाओं को समझता है और इसीलिए सबसे हल्का दंड दिया है। पिछले अनेक वर्षों से चुनाव आयोग यही करता है। नेताओं को चेतावनी देता है, आवश्यक होने पर नोटिस जारी करता है और कई बार जवाब से असंतुष्ट होने पर या बिना नोटिस के भी चुनाव प्रचार पर कुछ दिन या घंटों के लिए रोक लगा देता है। कई बार आयोग ने नेताओं के खिलाफ प्राथमिकी भी दर्ज कराई, किंतु उनमें से ज्यादातर मामले आगे नहीं बढ़े। वास्तव में चुनाव आयोग राजनीतिक प्रतिष्ठान या नेताओं से मुकदमेबाजी में उलझने से बचता है और सामान्यतः यही यथेष्ट है। हमारी व्यवस्था में शासन के सभी अंगों, विशेषकर सांविधानिक संस्थाओं के बीच संतुलन बनाने के साथ संबंधों की मर्यादा रेखाएं बनाई गई हैं। सबको इसका पालन करना चाहिए।


राजनीतिक दलों की भूमिका इसमें सर्वोपरि है। अंततः नेतृत्व उन्हीं को करना है। दुर्भाग्य से अनेक दल और नेता अपने इस दायित्व का पालन नहीं कर पाते। वर्तमान चुनाव प्रक्रिया के बीच ममता बनर्जी प्रतिबंधित होने वाली अकेली नेता नहीं हैं। तमिलनाडु में द्रमुक के स्टार प्रचारक पूर्व केंद्रीय मंत्री ए राजा को 48 घंटे के लिए प्रतिबंधित किया गया। उन्होंने या द्रमुक ने ममता या तृणमूल की तरह विरोधी व्यवहार नहीं किया। भाजपा की आप चाहे जितनी आलोचना कीजिए, लेकिन चुनाव आयोग के ऐसे फैसलों पर उसकी विरोधी प्रतिक्रिया सामने नहीं आती। असम में हेमंत विस्व सरमा भी प्रतिबंधित हुए हैं। उससे पहले भी उसके नेताओं पर प्रतिबंध लगे। 


इसके विपरीत तृणमूल के सांसद डेरेक ओ ब्रायन ने इसे लोकतंत्र का काला दिन घोषित कर दिया। ममता बनर्जी लगातार चुनाव आयोग को मोदी और शाह के इशारे पर काम करने वाली संस्था बता रही हैं, तो उनकी पार्टी के दूसरे नेता कैसे पीछे रहेंगे। अगर सांविधानिक संस्थाओं की छवि हमने कलंकित कर दी, तो फिर देश में बचेगा क्या? हर राजनीतिक दल एवं नेता को अपने लिए लोकतंत्र के प्रहरी की निर्धारित भूमिका का ध्यान रखते हुए चुनाव आयोग जैसी संस्था के सम्मान, गरिमा और छवि को बचाए रखने की पूरी कोशिश करनी चाहिए।


सौजन्य - अमर उजाला।

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Thursday, April 15, 2021

संक्रमण चार्ट में शीर्ष पर भारत: नीति, नैतिकता, राजनीति और कोरोना (अमर उजाला)

शंकर अय्यर  

कोविड संक्रमितों के आंकड़े बिल्कुल डरावने हैं। कोविड की दूसरी लहर की तीव्रता आंकड़ों में परिलक्षित हो रही है। भारत एक बार फिर संक्रमण चार्ट में शीर्ष पर है। बुधवार को देश में कोविड-19 संक्रमण के 1.8 लाख नए मामले और 900 से ज्यादा मौतें दर्ज की गई, यानी प्रति मिनट सौ से ज्यादा नए मामले और हर दो मिनट पर एक मौत। कुछ महामारी विशेषज्ञों का आकलन है कि जिस तेजी से मामले बढ़ रहे हैं, मई के मध्य तक दैनिक मामलों की संख्या तिगुनी हो सकती है और मरने वालों की संख्या प्रति दिन 2,000 के पार जा सकती है। पूरे देश से जो परिदृश्य उभर कर सामने आता है, वह नीतिगत, राजनीतिक एवं व्यक्तिगत व्यवहार के मामले में कई स्तरों की विफलता को दर्शाता है। 



सबसे अहम यह है कि ये सांदर्भिक चूकों को दिखा रहा है-सारे राज्यों में सामूहिक जवाबदेही ध्वस्त हो गई, विवेक क्वारंटीन में है और सक्रिय लोकनीति लॉकडाउन में। मामला बहुत नाजुक है। ऐसा लगता है कि फरवरी के बाद से भारत और भारतीय महामारी के ऐसे चरण में प्रवेश कर चुके हैं, जहां वे सिर्फ नियति के भरोसे हैं। कुछ लोग असाधारण होने का भरोसा करने लगे, मृत्यु के स्पष्ट सबूतों के बीच कुछ अमरत्व जैसा। महाभारत के यक्ष प्रश्न की तरह। लोगों का व्यवहार सत्ता में बैठे महत्वपूर्ण लोगों से प्रभावित होता है और दुखद है कि राजनीतिक वर्ग का 'सब ठीक है' वाला रवैया बेपरवाही को बढ़ावा देता है।



सत्ता में बैठे लोगों की विफलता त्रासदी को और गहरा करती है। शनिवार को निर्वाचन आयोग ने राजनीतिक दलों को पिछले साल उसके द्वारा जारी कोविड-19 दिशा-निर्देश का पूरी गंभीरता से पालन करने के लिए कहा। क्या चुनाव आयोग को 2020 में जारी दिशा-निर्देशों का पालन करने की याद चुनाव प्रचार और मतदान की प्रक्रिया शुरू होने के छह हफ्ते बाद दिलानी चाहिए, इससे लापरवाही की स्थिति का पता चलता है। क्या टी एन शेषन के उत्तराधिकारी कुछ बेहतर तरह से पेश नहीं आ सकते थे? यकीनन रैलियों की संख्या को सीमित करना, रैलियों में भीड़ को सीमित करना और मास्क लगाने पर जोर देने जैसा काम किया जा सकता है। रैलियों में भारी भीड़ के चित्र और वीडियो तेजी से संक्रमण फैलाने के लक्षणों को दर्शाते हैं और बताते हैं कि क्या किया जा सकता है। केंद्र और राज्यों में हर राजनीतिक दल इसके लिए जिम्मेदार है कि कैसे महामारी का प्रबंधन या कुप्रबंधन किया जा रहा है। सवाल उठता है कि उनकी इतनी रैलियां कैसे कोविड के लिए उपयुक्त थीं। एक चुनावी राज्य में एक वरिष्ठ मंत्री ने मास्क पहनने के खिलाफ तर्क भी दिया था! 


दुख की बात है कि जो लोग सत्ता में हैं और लोगों को प्रभावित कर सकते हैं, वे कोई मिसाल पेश नहीं करते-जरा कल्पना कीजिए, उस संदेश की क्या ताकत होती, अगर लोगों को हर रैली की शुरुआत में ही मास्क पहनने और उचित व्यवहार करने के लिए याद दिलाया जाता! निश्चित रूप से व्यावहारिक और कुछ अनुकूल लक्ष्य हासिल करने के लिए राजनीतिक कहानी को आगे बढ़ाने वाले लोग संदेशों और सीमाओं के विपरीत तर्क दे सकते हैं, पर सवाल उठता है कि ऐसा क्यों नहीं है। एक तरफ एक उच्च न्यायालय ने कहा है कि मास्क सबको पहनना जरूरी है, भले ही कोई कार में अकेला क्यों न बैठा हो। दूसरी तरफ रैलियों में हजारों लोग बिना मास्क के इकट्ठा हो रहे हैं। क्या एक राजनीतिक रैली वायरस के लिए विशेष है या वह प्रतिरक्षित है! और अगर शादियों एवं अंत्येष्टि के लिए सीमा हो सकती है, तो राजनीतिक रैलियों के लिए क्यों नहीं?


राजनीतिक दलों और सरकारों पर सारा दोष डालना बहुत आसान है। और वास्तव में राजनेताओं और उनके शासन के पास इसका जवाब देने के लिए काफी कुछ है। समान रूप से यह पूछना भी महत्वपूर्ण है कि क्या केवल सरकारें ही इसके लिए दोषी हैं। मामले की बढ़ती संख्या और मौतें बड़े पैमाने पर जनता के लापरवाह व्यवहार के कारण हो रही हैं। गरीबी और जनसंख्या के घनत्व को देखते हुए भारत में सोशल डिस्टेंसिंग हमेशा से चुनौतीपूर्ण रही है। लेकिन सुरक्षा के लिए मास्क पहनने के प्रति लचर रवैये को क्या कहा जा सकता है? एक तो लोग मास्क पहनते नहीं हैं, अगर मास्क पहनते भी हैं, तो उसे फैशन की तरह इस्तेमाल करते हैं। कोविड को लेकर कुछ सच्चाई है-सामान्य चीजें करने में असमर्थ होने के कारण मन पर भार पड़ सकता है। लेकिन यह जान जोखिम में डालने का बहाना नहीं बन सकता है। एक व्हाट्सएप संदेश ने मनोदशा को स्पष्ट किया-  'दस लाख में से कोई एक ही लॉटरी जीत सकता है, लेकिन संक्रमण के मामले में ऐसा नहीं है।' 


महामारी के दौर में जीवन और आजीविका के बीच में तालमेल बिठाना एक कठिन कार्य है। हां, सरकारों ने बाजार खोल दिए हैं, लेकिन आर्थिक जुड़ाव व्यक्तिगत और सामूहिक जिम्मेदारी से मुक्ति नहीं दिला सकता है। क्या साधन संपन्न लोगों ने वंचितों को सूचित करने के लिए मिसाल पेश करने की ताकत का इस्तेमाल किया-क्या सार्वजनिक परिवहन, इमारतों, लिफ्टों, दुकानों, बाजारों में एवं एलीवेटर पर मास्क लगाने पर जोर डाला? हालांकि कई लोगों ने ऐसा किया, पर आम प्रवृत्ति अनदेखा करने की है। और इस उपेक्षा ने जीवन और आजीविका, दोनों को नुकसान पहुंचाया है। विलियम फोस्टर लॉयड और गैरेट हार्डिन ने इस विचार को सामने रखा था कि व्यक्ति किस तरह से अपने हित में काम करता है और जनसाधारण की भलाई के खिलाफ होता है। उन्होंने इसे जनसाधारण की त्रासदी के रूप में चित्रित किया था। भारतीय संदर्भ में व्यक्तिगत व्यवहार स्वयं और सार्वजनिक हित, दोनों की अवज्ञा करता है। इस महामारी का परिदृश्य ज्ञात और अज्ञात से अटा पड़ा है। जैसा कि नोबेल पुरस्कार विजेता और व्यवहार विज्ञान के विशेषज्ञ डैनियल काहनमैन ने कहा कि हम प्रत्याशित स्मृतियों के संदर्भ में भविष्य के बारे में सोचते हैं-हम यह कल्पना करते हैं कि जैसा हम सामान्य स्थिति में याद करेंगे, वैसा ही होगा। आखिरकार भविष्य क्या हो सकता है, सामान्य स्थिति कैसी दिख सकती है, यह एक रहस्य है।


हर बार लहर के कमजोर पड़ने पर यह उम्मीद करना स्वाभाविक है कि सामान्य स्थिति बहाल हो जाएगी, लेकिन सावधानी बरतना छोड़कर लापरवाह हो जाना भयंकर गलती है। महामारी शाश्वत सतर्कता की मांग करती है और यह मौके की असमान प्रतियोगिता है-वायरस को सिर्फ एक मौके की जरूरत होती है।

सौजन्य - अमर उजाला।

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Monday, April 12, 2021

क्या मौलिक श्रेष्ठता को संरक्षण की जरूरत नहीं (अमर उजाला)

गौतम चटर्जी  

मृणाल सेन के बेटे कुणाल सेन ने पिछले दिनों पिता की बची-खुची पांडुलिपियां शिकागो विश्वविद्यालय की लाइब्रेरी को प्रदान कर दीं। बची-खुची इसलिए, क्योंकि मृणाल सेन स्वभाव से अतीतरागी यानी नॉस्टैल्जिक नहीं थे और अपनीफिल्म स्क्रिप्ट स्वयं ही फाड़कर फेंक देते थे, या फिर संभाल कर नहीं रखते थे। वह अतीतजीवी नहीं थे, इसलिए उनकी मृत्यु के बाद अमेरिका से कोलकाता आकर कुणाल ने पहला काम यह किया कि किताबें समेत मृणाल सेन के सारे सामान उनके दोस्तों को दे दिए। बची हुई पटकथाएं एवं अन्य फिल्म सामग्री वे अपने साथ शिकागो ले गए और अब लाइब्रेरी को दे दी। बौद्धिक श्रेष्ठता के अनासक्त संरक्षण का यह अनुपम उदाहरण है। थोड़ा पीछे जाएं, तो एक फिल्म में ऐसा एक दृश्य भी देखने को मिल जाएगा। हंगरी की महिला फिल्मकार मार्टा मेजरोज ने 1969 में अपनी दूसरी फिल्म बनाई थी- बाइंडिंग सेंटिमेंट्स। इस फिल्म के एक दृश्य में नायिका एक शाम अपने दिवंगत पति के करीब दो दर्जन मित्रों को घर बुलाती हैं और उनसे अनुरोध करती हैं कि वे उनके पति की लाइब्रेरी से अपनी पसंद की कोई भी किताब चुनें और घर ले जाएं। 



यह वयस्क नायिका अपने अतीत का कोई चिह्न जीवन में रखना नहीं चाहती, जो उसके पति से जुड़ा हो। थोड़ा और पीछे चलें। रूमी के समय में एक सूफी कहानी ने उस समय के लोगों का ध्यान अद्भुत ढंग से आकर्षित किया था। कहानी में एक राजा राजमहल के सारे कमरों को हीरे जवाहरात, बेशकीमती वस्तुओं और दुर्लभ पांडुलिपियों से भर देता है और अपने सभी लोगों से कहता है कि वे जो चाहें, इन कमरों से ले जाएं। इन लोगों में कई गुलाम भी हैं और गुलामों में वह भी, जो राजा से प्रेम करता है। राजा भी उससे प्रेम करता है और उस गुलाम के प्रेम की परीक्षा लेना चाहता है। उसे छोड़ सभी सब ले जाते हैं। राजा अंत में उससे पूछता है कि आखिर उसने कुछ क्यों नहीं लिया, वह क्या चाहता है, गुलाम उत्तर देता है, वह राजा को ही चाहता है। शेष सभी यानी राजा समेत सभी या तो सब ले लेना चाहते हैं या संरक्षित करने की विधियां ढूंढ लेते हैं। कभी यह विधि आसक्त होती है, तो कभी अनासक्त। 



अब प्रश्न बनता है कि बौद्धिक श्रेष्ठता के संरक्षण के लिए तो हमारी निगाह तैयार है, या तो लाइब्रेरी में या फिर क्लाउड में, किंतु हम अपनी मौलिक श्रेष्ठता का संरक्षण कैसे कर सकते हैं? मौलिक श्रेष्ठता से आशय है शाश्वत जीवन-मूल्य, ऐसा प्रातिभ ज्ञान, जिसने किसी अनुशासन विशेष में कुछ जोड़ कर उसे और श्रेष्ठ बनाया है, जैसे यूक्लिड ने पाइथागोरस की ज्यामिति में, कात्यायन ने गणित के शुल्ब सूत्रों में, तारकोव्स्की ने बर्गमैन के सिनेमैटोग्राफी शिल्प में, या फिर अभिनवगुप्त ने वसुगुप्त की शैवदृष्टि में। मौलिक श्रेष्ठता बौद्धिक संपदा से भिन्न अनुभव है। संपदा संरक्षित की जा सकती है। मौलिक श्रेष्ठता संपदा नहीं बन पाती, क्योंकि उसमें समय का स्पर्श अपना स्तर या तहें नहीं बना पाता। वह प्रकट होती है और अदृश्य हो जाती है। जिसके लिए अज्ञेय कहा करते थे कि मैं लिख-लिख कर मिटाता रहता हूं। 


जिसके लिए सूफी साहित्य को रेगिस्तान की खुशबू कहा गया। जिसके लिए नागार्जुन ने शून्यता सप्तति की रचना की और शून्य या ‘कुछ नहीं’ का भारतीय दर्शन बुद्ध की ओर से इस पृथ्वी पर प्रतिष्ठित हुआ। तो क्या मौलिक श्रेष्ठता को संरक्षण की जरूरत नहीं? इस पर रवीन्द्रनाथ ने एक लंबी कविता लिखी थी आमी, जो गीतांजलि में संकलित नहीं, न ही साहित्य अकादमी की रवीन्द्र रचनावली में। मनुष्य सभ्यताओं में इस मौलिक श्रेष्ठता का उपयोग क्या है? यदि पांच हजार साल की सभ्यता में हम सिर्फ लेना, वसूल करना, लूटना और संग्रह करना सीख पाए हैं, तो फिर सभ्य जीवन की इस असभ्य दुर्नीति में मौलिक श्रेष्ठता के लिए जगह कहां है? बुद्ध होने के बाद गौतम ऐसी रुग्ण सभ्यता के लिए एक चिकित्सक की तरह देह में रहे। बोध हो जाने या ज्ञान प्राप्त करने के बाद अज्ञानियों के दुख का प्रतिकार ज्ञानी की स्वाभाविक करुणा है।


इस करुणा के कारण ही कभी श्रेष्ठता के संरक्षण भाव में आसक्ति है, तो कभी अनासक्ति। वैदिक ऋषियों ने इस मौलिक श्रेष्ठता को अपौरुषेय घोषित किया और कहा कि वेद हमने नहीं रचे। जबकि उन्होंने तीन तरह की भाषा रचना की। पहली भाषा थी काव्य भाषा। इस कारण ही ऋषियों को कवि कहा गया। दूसरी भाषा की रचना ने वैदिक ज्ञान को लोगों में सहज और सुगम बनाया। यह थी आख्यान भाषा। तीसरी भाषा सबसे कठिन समझी गई। यह है संध्या भाषा। संध्या भाषा में कही गई कबीर की बात को गोरख ही समझ सकते हैं। यह वह शैली है, जिसे कोई अपवित्र नहीं कर सकता। मौलिक श्रेष्ठता को बचाने में यहां भाषा ही पर्याप्त है। दुर्नीति के समय में दुर्बोध जरूरी है, ऐसा ये संत समझते थे। अप्राकृतिक दुरावस्था और थकी हुई वृद्ध सभ्यता के इस रचनासमय में मौलिक श्रेष्ठता का वरण हम अपनी मौलिकता के उद्घाटन में कर सकते हैं, जिसके लिए हमारे पास अपार्थिव हृदय भी है और कोई विराट पवित्र मौन भी।

सौजन्य - अमर उजाला।

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धर्म और अध्यात्म का समन्वय: महाकुंभ केवल धार्मिक आस्था वाले लोगों का समागम नहीं बल्कि युवाओं का महापर्व है (अमर उजाला)

डॉ. प्रणव पंड्या  

देवभूमि उत्तराखंड के द्वार पर बसा हरिद्वार का विशेष आध्यात्मिक महत्व है और 12 वर्ष के अंतराल पर होने वाले महाकुंभ का इस वर्ष यहां होना अपने आप में एक सुखद प्रसंग है। कुंभ का पौराणिक और धार्मिक महत्व सर्वविदित है। दुनिया भर के लोग कुंभ के अवसर पर गंगा में डुबकी लगाने आते हैं। प्रचीन समय से ऐसी मान्यता है कि साधु, संतों के बताए जीवन-आदर्श को व्यावहारिक जीवन में उतारने से कायाकल्प सुनिश्चित है और सफलता के द्वार भी खुलने लगते हैं। कुंभ स्नान वास्तव में एक रूपक या मेटाफर है। पुराण और धार्मिक स्तर पर इसका महत्व किसी से छिपा नहीं है, पर ऐसा नहीं है कि सिर्फ कुंभ स्नान करने भर से सबके पाप धुल जाएंगे। तो उपभोक्तावादी माहौल में जी रहे युवाओं के लिए इसकी क्या प्रासंगिकता है? वास्तव में कुंभ देश ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में हिंदू धर्म का सबसे बड़ा धार्मिक आयोजन और समागम है। इसमें सारा भारत इकट्ठा होता है। 



प्रवासी भारतीयों का जमघट लगता है और विभिन्न संस्कृतियों का एक जगह मेल होता है। ऐसे मे युवाओं को धर्म की प्रगतिशील परिभाषा के साथ-साथ और देश व विश्व की संस्कृति को भी समझने का भी मौका मिलता है। यह मौका बार-बार नहीं आता है, बल्कि 12 वर्षों में एक बार ही आता है, वह भी ग्रहों और राशियों की विशेष युति होने पर


आध्यात्मिक स्तर पर देखें, तो पूरे कुंभ के दौरान मानव शरीर में कई जैव-रासायनिक परिवर्तन आते हैं और अमृत तत्व की प्रधानता बढ़ जाती है। हरिद्वार में 1998 एवं 2012 मे आयोजित कुंभ के दौरान ब्रह्मवर्चस में वातावरण और मानव में होने वाले परिवर्तनों पर शोध किया गया था, जिसमें पाया गया कि मानव में उन तत्वों की प्रधानता बढ़ जाती है, जो हमारी कार्य क्षमता और चिंतन पर बेहतर और अनुकूल प्रभाव डालते हैं और मानव में अच्छी भावनाओं व खुशियों को जन्म देते हैं।


इस वर्ष का महाकुंभ कोरोना काल में शांतिकुंज के स्वर्ण जयंती के अवसर पर आया है। इस संबंध में देव संस्कृति विश्वविद्यालय, शांतिकुंज, ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान में विभिन्न स्तर पर प्रयोग चल रहे हैं। यज्ञोपैथी से लेकर साधकों के भाव पक्ष, सूक्ष्म तंतुओं में होने वाले परिवर्तन को विभिन्न स्तरों पर देखा-परखा जा रहा है। अमृत मंथन को भी इसी संदर्भ में लिया जा सकता है। मानव शरीर के विषैले तत्वों का इस काल में थोड़े से प्रयत्नों से आसानी से क्षय होता है।


जिन्हें कुण्डलिनी जागरण की जानकारी है, वे जानते हैं कि महाकुंभ स्नान का समय कुण्डलिनी जागरण और ऋद्धि-सिद्धि के लिए सबसे अनुकूल काल होता है। सामान्य लोगों को भी चाहिए कि ऐसे समय का सर्वोत्तम उपयोग करें। वे भले कुंभ स्नान की तिथियों पर गंगा स्नान न कर पाएं, तो कोई बात नहीं, पर स्नान, उपासना जरूर करें, ताकि वातावरण में फैली दैविक और आध्यात्मिक शक्तियों का लाभ मिल सके। शारीरिक और मानसिक शुद्धिकरण के लिए इससे बेहतर समय और कोई नहीं हो सकता है। यहां  तक कि कुंभ के दौरान धर्म के शुद्धिकरण का भी मार्ग प्रशस्त होने लगा है।


एक और तथ्य जो अध्यात्म और धर्म से थोड़ा हटकर जरूर है, पर वह भी कहीं-न-कहीं इन सबसे जुड़ा हुआ है। वह है जलवायु परिवर्तन का। चारों ओर जलवायु परिवर्तन को लेकर जो चर्चा हो रही है, कुंभ से लोगों में उसके प्रति और जागरूकता बढ़ेगी। इससे हमें जलवायु के परिशोधन के लिए काम करने का अवसर मिलेगा और इस बारे में आगे सोचने का मौका भी मिलेगा। महाकुंभ केवल धार्मिक आस्था वाले लोगों का समागम भर नहीं है, बल्कि यह ऊर्जावान लोगों और युवाओं का महापर्व है। इसमें प्रयोगधर्मिता के साथ-साथ ऊर्जा पाने, उसे सकारात्मक कार्यों में लगाने और देश भर की संस्कृतियों, आस्थाओं और धर्म के गूढ़ रहस्यों को समझने का महत्वपूर्ण अवसर मिलता है। कुंभ स्नान से सारे पापों के धुलने और मोक्ष प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होने के रूपक के पीछे यही राज है और 21वीं सदी में इसकी प्रासंगिकता भी यही है। 


-लेखक हरिद्वार स्थित देव संस्कृति विश्वविद्यालय के कुलाधिपति हैं।

सौजन्य - अमर उजाला।

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विचार: गुजरात मॉडल का विस्तार, बहस और असहमति के लिए सिकुड़ती जा रही जगह (अमर उजाला)

रामचंद्र गुहा  

मैं इन दिनों गुजरात के 2002 के दंगों पर एक नई किताब पढ़ रहा हूं, जिसका शीर्षक है, अंडर कवरः माई जर्नी इनटू द डार्कनेस ऑफ हिंदुत्व। इसे आशीष खेतान ने लिखा है, जिन्होंने दंगों के बाद शानदार रिपोर्टिंग की थी, खासतौर से उन हमलावरों के बारे में, जो सजा से बच गए। दो दशक पहले हुए उस खूनी नरसंहार को समझने के लिए अंडर कवर एक महत्वपूर्ण स्रोत है। हालांकि यह वर्तमान के बारे में भी बात करती है, क्योंकि तब जो  उस राज्य में शासन कर रहे थे, वही आज केंद्र में हैं। मोदी के गुजरात में, खेतान लिखते हैं कि, यदि किसी नौकरशाह या पुलिस अधिकारी को आगे बढ़ना होता था, तो उसे पूरी तरह से व्यवस्था के छल-कपट का हिस्सा बनना पड़ता था। प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री के रूप में अमित शाह के आने के बाद केंद्र सरकार के लिए भी यह बात सच है। 2014 से पहले भारत सरकार द्वारा जारी किए जाने वाले आधिकारिक आर्थिक आंकड़ों की उनकी विश्वसनीयता के कारण दुनिया भर में तारीफ होती थी। अब, अध्येता उन पर विश्वास नहीं करते। प्रत्येक क्षेत्र में, चाहे  वह अर्थव्यवस्था हो या स्वास्थ्य या शिक्षा या चुनावी फंडिंग, सत्य या पारदर्शिता के बजाय चालाकी और उपेक्षा सरकार के व्यवहार की विशेषता है। 



देश भर में गुजरात मॉडल अपनाने का नतीजा यह हुआ है कि बहस और असहमति के लिए जगह सिकुड़ती जा रही है। खेतान लिखते हैं : गुजरात में बारह साल से अधिक समय तक जिन टूल्स का इस्तेमाल किया गया, उनका इस्तेमाल अब राष्ट्रीय स्तर पर असहमति को दबाने और आतंकित करने के लिए किया जा रहा है, मोदी के आलोचकों को राष्ट्र विरोधी और राष्ट्र के लिए खतरा बताकर अक्सर जेल में डाल दिया जाता है। शांतिपूर्ण विरोध को दबाने के लिए मोदी-शाह की सत्ता ने मनमाने ढंग से राज्य शक्ति का बेतहाशा इस्तेमाल किया है। पिछले साल दिल्ली पुलिस ने फरवरी के दंगों की आड़ लेकर छात्र नेताओं और महिला कार्यकर्ताओं के खिलाफ कठोर कार्रवाई की, जिनका इन दंगों से कोई लेना देना नहीं था, वहीं दूसरी ओर उसने उन शीर्ष भाजपा नेताओं के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने से इन्कार कर दिया, जो खुलेआम हिंसा के लिए उकसा रहे थे। दंगों के मामले में पुलिस के पक्षपाती रवैये के बारे में जूलियो रिबेरो ने लिखा : दिल्ली पुलिस के खांटी अन्याय वाले रवैये ने इस बूढ़े पुलिस वाले की अंतरात्मा को झकझोर दिया। 



राज्य की दुर्भावनापूर्ण मंशा पुलिस की कार्रवाई में दिखती है, जिसने सप्ताहांत में गिरफ्तारियां कीं, जब अदालतें बंद होती हैं और वकील उपलब्ध नहीं होते। यह यूएपीए (गैरकानूनी गतिविधि निरोधक अधिनियम) के नियमित इस्तेमाल से भी प्रकट होती है। यह असाधारण तरीके से कठोर कानून है, जिसके प्रावधान (जैसा कि एक कानूनी विश्लेषक ने लिखा), आपराधिक रूप से अत्यधिक, व्यापक रूप से अस्पष्ट और मौलिक अधिकारों का राज्य प्रायोजित उल्लंघन का मनमाना कानून है। 


पुलिस का पक्षपात भरा रवैया सबूत है कि वह राजनीतिक वैचारिकता के अनुरूप व्यवहार करती है। अहिंसक किसानों के समर्थन में ट्वीट करने पर एक पर्यावरण कार्यकर्ता को देशद्रोह के आरोप में जेल भेज दिया जाता है, जबकि सरकार के विरोधियों को गोली मार देने के लिए कहने वाले राजनेता का मंत्री पद बचा रहता है। वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों द्वारा सत्ताधारी राजनेताओं से आदेश लेना भारत में पुरानी परंपरा है। महाराष्ट्र का मामला इसका ताजा उदाहरण है। पर मोदी-शाह सरकार जिस तरह पुलिस बल को सांप्रदायिक बना रही है, वह ज्यादा परेशान करता है। द इंडियन एक्सप्रेस में पिछले दिनों छपे एक लेख में सेवानिवृत्त पुलिस अधिकारी विभूति नारायण राय ने, जिनकी साख रिबेरो जैसी है, मध्य प्रदेश के कुछ मुस्लिम घरों में हिंदू उपद्रवियों द्वारा सिलसिलेवार हमलों का ब्योरा दिया है। इन हमलों के 'एक वीडियो में दिखता है कि भगवा झंडे और त्रिशूल लिए बढ़ते दो हिंदू उपद्रवियों के बीच एक पुलिस इंस्पेक्टर का सिर शर्म से झुका हुआ है।' राय लिखते हैं कि वह इंस्पेक्टर शर्मिंदा था, क्योंकि कुछ गुंडे घरों को लूट रहे थे और असहाय स्त्री-पुरुषों को पीट रहे थे, तब वह इंस्पेक्टर और उनके साथी यह सब कुछ चुपचाप देखने के लिए विवश थे। इस दृश्य ने राय को झकझोर दिया। इस कारण उन्हें लिखना पड़ता है, 'मध्य प्रदेश पुलिस का एक नया अलिखित मैनुअल सामने आया है, जिसके मुताबिक, पुलिस को अब कानून तोड़ने वालों को नहीं रोकना है। इसके बजाय उसे पीड़ितों को अपना घर छोड़कर बाहर चले जाने के लिए कहना है, ताकि उपद्रवियों को सुविधा हो।' 


भारतीय राजनीति में पैसे और राज्य तंत्र की भूमिका हमेशा ही रही है, पर 2014 से पहले ये ऐसी निर्णायक भूमिका में नहीं थे। चुनाव आयोग द्वारा विभिन्न राज्यों के लिए तैयार किया गया चुनावी शेड्यूल लगता है कि सत्तारूढ़ दल के प्रचार अभियान की सुविधा के लिए तैयार किया जाता है। राजनीतिक विरोधियों को परेशान करने के लिए सीबीआई और ईडी का इस्तेमाल कांग्रेस के समय भी होता रहा था, पर भाजपा इसे एक अलग स्तर पर ले गई है। केंद्रीय ताकत की धमकी और भाजपा की भरी जेब के तालमेल से विपक्ष की सरकार गिराने का ताजा उदाहरण छोटा-सा केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी है। और जब यह कॉलम लिखा जा रहा था, तब तमिलनाडु में एक बड़े विपक्षी दल के परिवार पर छापा पड़ा, तो असम में भाजपा के एक मंत्री ने अपने एक विरोधी को धमकी दी कि उसके पीछे एनआईए को लगा दिया जाएगा।


गुजरात में पूर्ण सत्ता की लक्ष्य पूर्ति में मोदी-शाह के तीन सहयोगी थे : प्रतिबद्ध आईएएस अधिकारी व पुलिस बल, आज्ञाकारी तथा प्रोपेगैंडा फैलाने वाला मीडिया और वशवर्ती न्यायपालिका। केंद्र में भी मोदी-शाह ने वही तरीका अपनाया है। इसमें उन्हें थोड़ी कम सफलता मिली है, तो इसके तीन कारण हैं: कई बड़े राज्य भाजपा शासित नहीं हैं, बेशक बड़े हिंदी अखबार और ज्यादातर अंग्रेजी व हिंदी टीवी चैनल्स भाजपा की लाइन पर चलते हैं पर कुछ अंग्रेजी अखबार व वेबसाइट्स अब भी स्वतंत्र हैं, तथा बेशक अदालतें कमजोर हैं पर कुछ न्यायाधीश कुछ अवसरों पर व्यक्तिगत अधिकार तथा अभिव्यक्ति की आजादी के पक्ष में खड़े होते हैं। इसके बावजूद मोदी-शाह जो चाहते हैं, और भारत जिस दिशा में बढ़ रहा है, वह स्पष्ट है। आशीष खेतान को आखिरी बार उद्धृत करता हूं : 'बहुसंख्यकवाद के शासन को कानून की बाधा नहीं, लोकतंत्र के मुलम्मे में संविधान पर जोर नहीं, अल्पसंख्यकों खासकर मुस्लिमों को कमतर बताना, हिंदू दंगाइयों के लिए दंडमुक्ति, जबकि विरोधी विचारधारा वालों की गिरफ्तारी व जेल, कार्यकर्ताओं व मानवाधिकार संगठनों के खिलाफ मुकदमे, राजनीतिक विपक्ष और विरोधियों को निशाना बनाने के लिए सांस्थानिक और न्यायिक प्रक्रियाओं का दुरुपयोग-किसी भी विपक्ष को तोड़ने के लिए मोदी जिस व्यवस्थागत तरीके से राज्यशक्ति का इस्तेमाल करते हैं, भारत में उसकी मिसाल नहीं है।' 


जिस समाज में लोग पुलिस पर भरोसा करने के बजाय उससे डरते हों, जहां किसी की निर्दोषिता या दोष का निर्धारण उसके धर्म या राजनीतिक वैचारिकता के आधार पर हो-यही तो 'गुजरात मॉडल' के नतीजे हैं। सांस्थानिक स्तर पर आज हम संविधान के आदर्शों से आपातकाल के दौर से भी बहुत दूर चले गए हैं, जबकि सामाजिक और नैतिक स्तरों पर 26 जनवरी, 1950 से बहुत दूर चले गए हैं, जब संविधान को लागू किया गया था। 

सौजन्य - अमर उजाला।

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Saturday, April 10, 2021

बीजापुर नक्सल हमला: अब रणनीति बदलने की है जरूरत (अमर उजाला)

मारूफ रजा, सामरिक विश्लेषक  

माओवादियों ने छत्तीसगढ़ के बीजापुर में हुई मुठभेड़ के दौरान बंधक बनाए गए सीआरपीएफ के कोबरा कमांडर राकेश्वर सिंह मनहास को सामाजिक कार्यकर्ता धर्मपाल सैनी और आदिवासी नेता तेलम बोरइया की मौजूदगी में छोड़ दिया है। तीन अप्रैल को बीजापुर के तर्रेम के जंगल में माओवादियों के साथ मुठभेड़ में सीआरपीएफ, एसटीएफ और डीआरजी के 22 जवान शहीद हो गए थे। इस घटना के बाद क्या इस बात की समीक्षा होगी कि आखिर क्यों माओवादी मध्य भारत के जंगल में लगातार सफल होते जा रहे हैं? बस्तर में सुरक्षा बलों के भारी-भरकम दस्ते पर घात लगाकर किया गया माओवादियों का यह हमला मध्य भारत के माओवाद प्रभावित क्षेत्रों में किए गए अतीत के दूसरे हमलों जैसा ही था। अक्सर घात लगाने का उनका तरीका अतीत में किए गए हमले जैसा ही होता है। 

सुरक्षा बलों पर या तो तब हमला किया जाता है, जब जंगलों में थका देने वाले ऑपरेशन के बाद वे कैम्प की ओर लौट रहे होते हैं या फिर जब वह ऐसे पुलिस कैम्प में होते हैं, जिसकी पुख्ता सुरक्षा न हो। ऐसे जनसंहार को रोकने के तरीके हैं। इस चुनौती से निपटने के लिए ऊपर से नीचे की ओर देखने के दृष्टिकोण की जरूरत है, न कि नीचे से ऊपर की ओर देखने वाले दृष्टिकोण की। माओवादियों ने विगत तीन दशकों में भारत के मध्य हिस्से में विस्तार किया है और वह समय-समय पर पशुपति (नेपाल) से लेकर तिरुपति (दक्षिण भारत) तक लाल गलियारे में अपनी ताकत दिखाते रहते हैं। कुछ वर्ष पूर्व अपने चरम में देश के दो सौ जिले माओवादी हिंसा से प्रभावित थे और उस समय तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने आधिकारिक तौर पर कहा था कि देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए माओवादी हिंसा सबसे बड़ी चुनौती है। 



दिल्ली से किए जाने वाले प्रयास आज भी पहले जैसे ही अनियमित हैं। एक समस्या देश की संघीय प्रकृति और राज्य सरकारों के विरोध से जुड़ी हुई है। यह चुनौतियों से निपटने के लिए केंद्र सरकार के समग्रता में किए जाने वाले प्रयास को बाधित कर सकता है। एक राज्य के विद्रोही किसी दूसरे राज्य के वोट बैंक नहीं हो सकते! यह दुखद है कि नागरिकों की सुरक्षा के मामले में राजनीति अक्सर अतीत की चूकों का अनुसरण करने लगती है। इस क्षेत्र में जरूरत से अधिक तनाव झेलते हुए पुलिस जवान पर्याप्त वरिष्ठ नेतृत्व के काम करते रहते हैं। एक दशक पहले सीआरपीएफ के एक डीजीपी ने मुझे बताया था कि उनके लिए यह एक बड़ी चुनौती है कि कैसे वह सीआरपीएफ के वरिष्ठ अधिकारियों (आईजी और डीआईजी) को शहरों की आरामदायक जिंदगी से बाहर निकालकर जंगलों में तैनात बल की कमान संभालने के लिए भेजें। 


हमारे प्रायः सारे पुलिस बल का नेतृत्व आईपीएस अधिकारी करते हैं और उनमें से अनेक पुलिस के कार्य में दक्ष हैं और वे नक्सलियों या उग्रवादियों से मुकाबला करने के लिए सिविल सेवा से नहीं जुड़े हैं। इसके अलावा उनके पास न तो नक्सली हिंसा से लड़ने का अनुभव है और न ही वह दिलचस्पी। वे ऑपरेशनल एरिया में तैनाती के प्रति अनिच्छुक होते हैं। एक तरीका है कि सेना के उग्रवाद विरोधी ऑपरेशन के अनुभव वाले वरिष्ठ अधिकारियों (कर्नल से लेकर जनरल) को केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन आने वाले अर्धसैनिक बल सीआरपीएफ के जवानों का नेतृत्व करने की जिम्मेदारी दी जाए। यदि सेना गृह मंत्रालय या पीएमओ के अधीन आने वाले एनएसजी या 'एस्टेब्लिशमेंट 22' (विशेष सीमांत बल) के लिए अधिकारी उपलब्ध करा सकती है, तो फिर माओवाद विरोधी अभियान के लिए क्यों नहीं? इसी तरह से ऐसे ऑपरेशन में हेलीकॉप्टर के इस्तेमाल के बारे में भी विचार करना चाहिए। 


नक्सली और चरमपंथी रोजगार और आधारभूत ढांचे से वंचित स्थानीय लोगों से समर्थन जुटाते हैं। माओवादियों से निपटने के लिए तीन स्तरीय रणनीति पर काम हो सकता हैः (1) आवश्यक सैन्य बल का इस्तेमाल (2) स्थानीय लोगों की बुनियादी मुश्किलों के समाधान के साथ ही आधारभूत ढांचे का समयबद्ध निर्माण (3) जमीनी स्तर पर स्थिति के नियंत्रित होने और सैन्य ऑपरेशन के कम होने के बाद स्थानीय लोगों की राजनीतिक मांगों को सुलझाने के लिए बातचीत की पहल।

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छोटी बचत पर आखिर किसकी नजर, इस वजह से है लोकप्रिय (अमर उजाला)

 नारायण कृष्णमूर्ति, वरिष्ठ पत्रकार

छोटी बचत योजनाएं हमारे देश में काफी लोकप्रिय हैं। इनसे बचतकर्ताओं के साथ सरकार को भी अपनी वित्ती जरूरतें पूरी करने में मदद मिली हैं। लेकिन इन योजनाओं में ब्याज दर पर कटौती से छोटे बचतकर्ताओं को नुकसान होता है। सरकार को इसके उद्देश्यों पर ध्यान देना चाहिए।


भारत में छोटी बचत योजनाओं की लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि यह लोगों के लिए 1.5 लाख डाकघरों में उपलब्ध है, जो पूरे देश भर में इस योजना की पेशकश करते हैं। वर्षों से इस योजना की लोकप्रियता इसकी सादगी, ब्याज दरों पर सरकारी गारंटी, जमा की सुरक्षा और कुछ मामलों में कर बचत के कारण ऊंची रही है। एक तरह से डाकघर जमा, पब्लिक प्रोविडेंट फंड (पीपीएफ), नेशनल सेविंग सर्टिफिकेट (एनएससी), किसान विकास पत्र (केवीपी) जैसी योजनाओं ने सीमित साधनों वाले लोगों को इन योजनाओं में कम से कम पांच रुपये से बचत करने के लिए अलग-अलग तरीके प्रदान किए हैं। भारत सरकार ने इन साधनों के माध्यम से भारी मात्रा में संग्रह करने की क्षमता को महसूस किया है, ताकि डाकघर नेटवर्क के माध्यम से इनका लाभ उठाया जा सके। सरकार के पास इन योजनाओं के तहत धन एकत्र करने के कारण हैं, क्योंकि एकत्रित राशि से एक कोष तैयार होता है, जिसे राष्ट्रीय लघु बचत कोष (एनएसएसएफ) के रूप में जाना जाता है। एनएसएसएफ की स्थापना 1999 में भारत के सार्वजनिक खाते में की गई थी और इसे संविधान के अनुच्छेद 283 (1) से उत्पन्न राष्ट्रीय लघु बचत कोष (निगरानी और निवेश) नियम, 2001 के तहत वित्त मंत्रालय द्वारा प्रबंधित किया जाता है। 



एनएसएसएफ के तहत रखे गए धन का उपयोग केंद्र और राज्यों द्वारा अपने वित्तीय घाटे को पूरा करने के लिए किया जाता है, जबकि शेष राशि का निवेश केंद्र और राज्य सरकार की प्रतिभूतियों में किया जाता है। इसलिए यह सरकार को अपनी वित्तपोषण आवश्यकताएं पूरी करने के लिए धन को अपनी तरफ हस्तांतरित करने में मदद करता है। 14 वें वित्त आयोग की सिफारिशों के अनुसार, केरल, दिल्ली, अरुणाचल प्रदेश, और मध्य प्रदेश को छोड़कर भारत के सभी राज्य अपनी वित्तपोषण आवश्यकताओं के लिए एनएसएसएफ फंड का उपयोग करते हैं, क्योंकि केरल, दिल्ली, अरुणाचल प्रदेश, और मध्य प्रदेश को ब्याज की कम दरों पर ऋण मिलता है। उदाहरण के लिए, फूड कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (एफसीआई) को लें, जिसने अपनी वेबसाइट पर मौजूद आंकड़ों के अनुसार, 2018-19 में अपनी वित्तीय जरूरतों के दो-तिहाई से अधिक की राशि एनएसएसएफ से उधार ली। एफसीआई ने एनएसएसएफ से वित्त वर्ष 2019 में 1.86 लाख करोड़ रुपये, वित्त वर्ष 2018 में 1.21 लाख करोड़ रुपये और उससे पहले के साल वित्त वर्ष 2017 में 70,000 करोड़ रुपये उधार लिए। 



साफ है कि एनएसएसएफ संग्रह, जिसमें छोटे बचतकर्ता योगदान करते हैं, सरकार के बचाव के काम में आता है और इसकी बजटीय कमी दूर करने की आवश्यकता है। छोटी बचत पर ब्याज दरें वर्षों से 2016 तक अछूती रहीं, जब छोटी बचत योजना की नई ब्याज दरों को बाजारों के साथ मिलाया गया और सालाना के बजाय तिमाही समीक्षा की गई। इस कदम का मतलब है कि छोटी बचत पर ब्याज दरें अब 10 साल के बांड पर प्रचलित सरकारी प्रतिभूति दरों से ज्यादा मेल खाती हैं और इनकी तिमाही समीक्षा की गई है। इसका असर यह हुआ कि पिछले एक दशक में छोटी बचत पर ब्याज दरों में लगातार गिरावट आई है। इसी अवधि के दौरान कुछ छोटी बचत संरचना में कुछ बदलाव लाए गए हैं, जो जरूरी नहीं कि छोटे बचतकर्ता के अनुकूल हों। मिसाल के तौर पर, जबसे सेक्शन 80 सी की सीमा के तहत आयकर बचत की सीमा को एक लाख से बढ़ाकर 1.5 लाख कर दिया गया है; पीपीएफ में योगदान की ऊपरी सीमा समय के साथ 60,000 रुपये से बढ़ाकर 1.5 लाख रुपये कर दी गई।


इसी तरह, नई बचत योजनाएं, जैसे कि वरिष्ठ नागरिक बचत योजना (एससीएसएस), जिसे 2004 में शुरू किया गया था और सुकन्या समद्धि योजना, जो 2015 में शुरू की गई थी, छोटी बचत के दायरे में हैं, फिर भी इन्हें कुछ बैंकों द्वारा भी पेश किया जाता है। इसी तरह पीपीएफ पर अब केवल डाकघरों का एकाधिकार नहीं रह गया है, इसे भी सार्वजनिक और निजी, दोनों क्षेत्र के बैंकों द्वारा उपलब्ध कराया जाता है, जैसे एसबीआई, आईसीआईसीआई, इत्यादि। स्वीकृत लघु बचत योजनाओं पर कर बचत का मतलब है कि कई बड़े बचतकर्ता कर रियायत के साथ-साथ योजनाओं द्वारा प्रदान किए जाने वाले सुनिश्चित लाभ (रिटर्न) के लिए छोटी बचत योजनाओं को तवज्जो देते हैं।


इस पृष्ठभूमि में छोटी बचत पर ब्याज दरों में किसी भी गिरावट से छोटे बचतकर्ताओं को सबसे अधिक नुकसान होता है; खासकर वैसे लोगों को जो ज्यादातर संगठित क्षेत्र के रोजगार का हिस्सा नहीं हैं। दूसरा तबका, जो छोटी बचत पर ब्याज दरों में कटौती से प्रभावित होता है, वह है सेवानिवृत्त वर्ग, जो अक्सर इन योजनाओं से मिलने वाले सुनिश्चित रिटर्न के आधार पर अपनी सेवानिवृत्ति आय की योजनाएं बनाते हैं। उदाहरण के लिए, 2012 तक एससीएसएस पर ब्याज दर नौ फीसदी थी और तब से यह घटकर 7.4 फीसदी तक आ गई है, जिसका अर्थ है 10 लाख रुपये की जमा राशि पर वार्षिक आय 90,000 रुपये से घटकर 74,000 रुपये हो गई यानी आय में 17 फीसदी की गिरावट आई। यदि कोई इसी अवधि के दौरान की मुद्रास्फीति से इसे समायोजित करे, तो पैसे की कीमत बहुत कम हो जाएगी। 


वर्तमान में उच्च कर सीमा के दायरे में आने वाले लोग पीपीएफ, एससीएसएस, सुकन्या समृद्धि और यहां तक कि पांच साल की कर बचत जमा योजना जैसी छोटी बचत  से लगातार कर रियायत का लाभ उठाते हैं, क्योंकि इन योजनाओं में निवेश करने पर कर रियायत दी जाती है। तथ्य यह है कि इनमें से अधिकांश योजनाएं पैसे की निकासी पर कर नहीं लगाती हैं, इसलिए यह बड़े आयकर दाताओं के बीच पसंदीदा  विकल्प बन गया है। जबकि, इन योजनाओं से होने वाली आय पर निर्भर छोटे बचतकर्ता, अपने जीवन की बचत पर ब्याज दर में कटौती से आहत और इन सरल वित्तीय साधनों पर निर्भरता महसूस करते हैं। ऐसे में अब समय आ गया है कि इन बचत योजनाओं पर ब्याज दरों में कटौती का कठोर फैसला लेने से पहले सरकार छोटी बचत के उद्देशों पर एक बार फिर से नजर डाले। 

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Friday, April 9, 2021

रूस और तालिबान: अफगानिस्तान में दुश्मन बने दोस्त (अमर उजाला)

मरिआना बाबर 

अपने जीवनकाल में मैंने भू-राजनीति में इतने बदलाव देखे हैं कि अपने क्षेत्र में बदलती भू-राजनीति अब मुझे जरा भी हैरान नहीं करती। कौन भूल सकता है कि कुछ दशक पहले वह सोवियत संघ ही था, जिसकी लाल सेना ने चारों तरफ से घिरे अफगानिस्तान पर कब्जा जमा लिया था। तब यही लगा था कि अफगानिस्तान जैसे छोटे मुल्क के पास महाशक्ति देश के सामने खड़े होने की कभी ताकत भी नहीं होगी। लेकिन जल्द ही दर्जनों देशों ने संसाधन भेजे और फिर अफगान मुजाहिदीन का उदय हुआ, जो सोवियत संघ से लड़ने के लिए उठ खड़ा हुआ। आखिरकार महाशक्ति देश को शर्मिंदा होकर लौटने पर मजबूर होना पड़ा और अपने पीछे वह अराजकता व दशकों के युद्ध से जर्जर एक देश छोड़ गया। पाकिस्तान ने देखा कि अफगानिस्तान से सोवियत संघ की वापसी के बाद न सिर्फ दूसरे देशों की काबुल में दिलचस्पी खत्म हो गई है, बल्कि अफगानिस्तान की बदहाली का खामियाजा उसे खुद भी भुगतना पड़ा। पाकिस्तान को तब दुनिया की सबसे बड़ी शरणार्थी आबादी को तो झेलना पड़ा ही था, क्योंकि लाखों अफगानों ने डुरंड रेखा को पार कर पाकिस्तान को अपना घर बना लिया था, हजारों शरणार्थी अब भी पाकिस्तान में हैं। फिर अफगान शरणार्थियों को उदारता से दी जाने वाली अंतरराष्ट्रीय सहायता भी धीरे-धीरे बंद हो गई। अब संयुक्त राष्ट्र से भी बहुत कम सहायता राशि आ रही है। 



अफगान शरणार्थियों के साथ पाकिस्तान को सोवियत निर्मित क्लाशिन्कोव राइफल भी विरासत में मिली, जिसके चलते हमारे समाज ने खुद को हथियारबंद करना शुरू किया। हेरोइन का भी प्रचलन शुरू हुआ, जो अब अफगानिस्तान से आ रहा है और पाकिस्तानी समाज के लिए लगातार एक बड़ी समस्या बना हुआ है। इस हफ्ते अफगानिस्तान के बारे में लिखने का कारण रूसी विदेश मंत्री लावरोव सर्गेई की यात्रा है, जो इस हफ्ते नई दिल्ली से इस्लामाबाद के दौरे पर आए थे। इससे पहले 2012 में रूस के विदेश मंत्री पाकिस्तान आए थे। रूसी विदेश मंत्री के पाकिस्तान दौरे की एक प्रमुख वजह अफगानिस्तान के बिगड़ते हालात भी हैं। हालांकि वक्त के साथ-साथ पाकिस्तान और रूस के रिश्ते सुधरे हैं, लिहाजा बैठक में कुछ अन्य साझा मुद्दों पर भी चर्चा हुई। सर्गेई शीर्ष राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व से मिले, जिसमें प्रधानमंत्री इमरान खान, विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी और सेना प्रमुख कमर जावेद बाजवा भी शामिल थे। 



जब मैं भू-राजनीतिक हकीकतों के बदलने की बात करती हूं, तब उसका मतलब यह है कि आज रूस उन्हीं अफगान मुजाहिदीन के साथ खड़ा है, जिन्होंने उसे हराया था। हालांकि आज उन्हें अफगान मुजाहिदीन नहीं कहा जाता, बल्कि सामान्य तौर पर वे अब अफगान तालिबान के नाम से जाने जाते हैं। और अफगान तालिबान भी अब सोवियत रूस से नहीं लड़ रहे, बल्कि अपने ही अफगानी भाइयों और वहां मौजूद विदेशी सैनिकों से लड़ने में व्यस्त हैं। रूसी विदेश मंत्री को अफगान तालिबान को भावी अफगानी व्यवस्था में शामिल करने का समर्थन करते हुए सुनना वाकई दिलचस्प था। समय किस तरह बदल चुका है! सोवियत संघ के जमाने में जो दुश्मन था, वह आज भावी अफगान सरकार के लिए जरूरी और महत्वपूर्ण हिस्सा है! भारत दौरे में भी रूसी विदेश मंत्री सर्गेई ने अफगानिस्तान की भावी सरकार में अफगान तालिबान को शामिल करने के बारे में बात की। भारत भी अब इस जमीनी हकीकत को स्वीकार करता है कि अफगान तालिबान की अनदेखी नहीं की जा सकती, और पहली बार यह सुनने को मिला कि मोदी सरकार ने अफगानिस्तान के भविष्य में अफगान तालिबान की भूमिका मानने को हरी झंडी दे दी। सर्गेई ने इस्लामाबाद में मीडिया को बताया कि 'हम अफगानिस्तान में सुरक्षा के मोर्चे पर बिगड़े हालात, आतंकवादी गतिविधियों में बढ़ोतरी तथा देश के उत्तर व पूर्व में इस्लामिक स्टेट के उभार से भी परेशान हैं।'


पाक विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी से बातचीत के बाद सर्गेई ने कहा, 'दोनों पक्ष अफगानिस्तान में शांति बहाली पर सहमत हैं। हमें अफगानिस्तान में विरोधाभासी और शत्रुतापूर्ण पक्षों को आगे बढ़ाकर एक समझौते पर पहुंचने और समावेशी बातचीत के जरिये गृहयुद्ध को समाप्त कराने की जरूरत है।' दूसरे शब्दों में, रूस अब पाकिस्तान से अफगान तालिबान पर अपने असर का इस्तेमाल करने के लिए कह रहा है, ताकि वे अपने हथियार डाल दें, लड़ाई बंद कर दें और अमन को एक मौका दें। हालांकि हकीकत यह है कि आज अफगान तालिबान पर पाकिस्तान का पूर्ण नियंत्रण नहीं है। वे आजाद हैं और यह देख सकते हैं कि लड़ने की उनकी रणनीति कामयाब हो चुकी है। अब जब हर कोई थक चुका है, तब वे अपनी सफलता का स्वाद पाना चाहते हैं। पाकिस्तान भी उन्हें नाराज नहीं करना चाहता, क्योंकि वह पश्चिमी सीमाओं पर नाराज पड़ोसी नहीं चाहता। अफगानिस्तान के हालात जल्दी नहीं सुधरने वाले। अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन के इस एलान से भी मुश्किलें खड़ी हो गई हैं कि अमेरिकी सैनिक मई में अफगानिस्तान नहीं छोड़ रहे। बाइडन के इस एलान से अफगान तालिबान नाराज हैं और उन्होंने ज्यादा से ज्यादा इलाकों पर कब्जा जमाने के लिए अपनी लड़ाई तेज करने की धमकी दी है। 


आम पाकिस्तानी के लिए हालांकि अफगानिस्तान से ज्यादा यह खबर मायने रखती है कि कोरोना महामारी से लड़ने के लिए रूस स्पूतनिक वैक्सीन की डेढ़ लाख खुराक भेजेगा। इससे पहले पाकिस्तान के निजी क्षेत्र ने स्पूतनिक की 50 हजार खुराकें खरीदी थीं, पर देश के अमीरों में वे खप गईं। चूंकि यह महामारी जल्दी खत्म नहीं होने वाली, ऐसे में, पाकिस्तान और रूस ने स्पुतनिक वैक्सीन तैयार करने के लिए पाकिस्तान में फैक्टरी लगाने पर भी विचार किया है। अभी तक पाकिस्तान के लिए टीकों की सबसे बड़ी सौगात चीन से आई है, जिसे पाकिस्तान सरकार मुफ्त में बांट रही है। इसके साथ-साथ निजी क्षेत्र ने भी चीनी टीके खरीदे हैं और लोग पैसे देकर टीका लगवाना चाहते हैं। 

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जीएम फसलों पर लगी रोक जरूरी, जानिए क्यों (अमर उजाला)

के. सी. त्यागी  

संसद सत्र की लगभग समाप्ति पर पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के एक लिखित जवाब में जीएम (जेनेटिक मॉडिफाइड) फसलों के जमीनी परीक्षण को लेकर दिए गए जवाब से इसके समर्थक एवं विरोधियों में पुनः वाक् युद्ध प्रारंभ हो गया है। मंत्रालय ने जमीनी परीक्षण की अनुमति से पहले राज्यों की सहमति को जरूरी माना है। इससे पूर्व परीक्षण का फैसला करने का अधिकार जीईएसी (जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रेजल कमेटी) को प्राप्त था। उसके बाद राज्यों की सहमति से वहां परीक्षण किया जा सकता है, पर अब राज्यों की सहमति से पहले जीईएसी कोई सिफारिश नहीं करेगी।


दरअसल, काफी समय से नीति आयोग जीएम फसलों के इस्तेमाल को लेकर अड़ा हुआ है। उसके कार्यबल की रपट में दलहन और तिलहन का उत्पादन बढ़ाने के लिए जीएम फसलों के इस्तेमाल, बिजली पर सब्सिडी को तर्कसंगत बनाने और किसानों को उपज के भुगतान के लिए प्राइस डिफिशिएंसी पेमेंट प्रणाली अपनाने की सिफारिश भी की जा चुकी है। जीएम फसलों के समर्थकों का एकमात्र तर्क यह है कि इसके इस्तेमाल से फसलों का उत्पादन बढ़ेगा। जबकि दिल्ली के बॉर्डर पर लंबे अरसे से धरने पर बैठे किसान संगठनों के बड़े वर्ग द्वारा समय-समय पर जमीनी परीक्षण का विरोध किया जाता रहा है। अखिल भारतीय किसान सभा और भारतीय किसान यूनियन इसके मुख्य विरोधी रहे हैं। स्वदेशी जागरण मंच और भारतीय किसान संघ भी समय-समय पर अपनी नाराजगी एवं विरोध का प्रदर्शन करता रहा है। यह सच है कि इससे कम अवधि के लिए फसलों के उत्पादन में वृद्धि होती है, पर इसके दूरगामी परिणाम नुकसानदेह होते हैं। वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार जीएम प्रक्रिया के अंतर्गत पौधों में कीटनाशक के गुण सम्मिलित हो जाते हैं, जिससे फसलों की गुणवत्ता का प्रभावित होना लाजमी है। इसका एक बड़ा कारण यह भी है कि यह प्राकृतिक फसलों को भी बड़े पैमाने पर संक्रमित करता है। 



प्रसिद्ध कृषि वैज्ञानिक एम. एस. स्वामीनाथन जीएम फसलों के प्रयोग से पहले भूमि परीक्षण अनिवार्य करने की सिफारिश कर चुके हैं। अमेरिका में मात्र एक फीसदी भाग में मक्के की खेती की गई थी। इसने 50 फीसदी गैर जीएम खेती को संक्रमित कर दिया। उत्पादन बढ़ाने की होड़ में चीन ने भी अपनी जमीन पर जीएम चावल एवं मक्के की खेती की। महज पांच वर्ष के अंदर ही वहां के किसानों को नुकसान उठाना पड़ा। वर्ष 2014 के बाद से वहां जीएम खेती को बंद कर दिया गया है। भारत में बीटी कॉटन की खेती का अनुभव आंख खोलने वाला है। पंजाब के कपास किसानों को बीटी कॉटन बीज के कारण काफी नुकसान उठाना पड़ा है। निश्चित रूप से शुरू में कपास उत्पादन में वृद्धि हुई, पर बाद में अहितकारी परिणाम सामने आए और सर्वाधिक आत्महत्याएं कपास किसानों द्वारा ही की गईं। संसद की स्थायी समिति ने अपनी 301वीं रिपोर्ट में काफी टिप्पणियां इसके बारे में की हैं। 'कल्टीवेशन ऑफ जेनेरिक मॉडिफाइड फूड क्रॉप : संभावना और प्रभाव' नामक रिपोर्ट में लिखा है कि बीटी कपास की खेती करने से कपास उत्पादक किसानों की माली हालत सुधारने के बजाय बिगड़ने लगी। 


पिछले कई वर्षों में अकेले महाराष्ट्र के यवतमाल जिले में दो दर्जन से अधिक किसानों की मौत हो चुकी है। आश्चर्यजनक है कि किसानों को लामबंद करने वाला महाराष्ट्र शेतकरी संगठन जीएम फसलों का गुणगान कर रहा है। इसके अध्यक्ष अनिल धनवत आजकल किसानों को जीएम फसलों का महत्व समझा रहे हैं। वह किसान आंदोलन पर बनी सुप्रीम कोर्ट की समिति के सदस्य हैं। यह दिलचस्प है कि सर्वाधिक किसान आत्महत्याओं की खबरें विदर्भ और मराठवाड़ा से ही आती हैं। मुख्यमंत्री रहते हुए देवेंद्र फडणवीस भी इन प्रयोगों पर बैन लगा चुके थे। कंपनियों ने उत्पादन और गुणवत्ता के नाम पर अनुवांशिक संशोधित फसलों के उत्पादन का खेल शुरू किया है। इसके उत्पादन के लिए जिन कीटनाशक दवाओं का प्रयोग हो रहा है, वे मानव जाति के विनाश की आहट है। केंद्र सरकार द्वारा किसानों के व्यापक हित में टाले गए इस फैसले की सर्वत्र प्रशंसा हो रही है।  

-लेखक ज.द.(यू) के प्रधान महासचिव हैं।

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Thursday, April 8, 2021

कोरोना वायरस: ठेका श्रमिकों की बढ़ीं मुश्किलें, ऐसे कर रहे गुजारा (अमर उजाला)

रोहित शिवहर 

हमारे देश में बिजली पैदा करने का प्रमुख संसाधन कोयला है, पर धरती की छाती चीरकर उसे निकालने वाले मजदूरों की बदहाली जहां-की-तहां है। पिछले साल कोविड-19 के कारण देश भर में लगे ‘लॉकडाउन’ के दौरान कोयला खदानों में काम कर रहे ठेका मजदूरों का रोजगार तो कमोबेश नहीं छीना गया, पर आसपास की बदहाली ने उन्हें मौत के मुहाने पर खड़ा कर दिया। मार्च, 2020 में देश भर में कोरोना महामारी के चलते लगे संपूर्ण लॉकडाउन के दौरान जहां एक ओर देश भर के बहुत सारे कामगार अचानक सड़कों पर आ गए थे, वहीं कोयला क्षेत्रों में लगातार लॉकडाउन के दौरान भी काम चालू रहने की वजह से कामगारों का रोजगार बरकरार रहा। हालांकि कोयला खदानों में भी कुछ मजदूरों का काम प्रभावित हुआ, लेकिन उनकी संख्या बहुत कम थी। ऐसे में हमें यह नहीं समझना चाहिए कि कोयला खदान में काम कर रहे मजदूरों, खासकर ठेका मजदूरों का जीवन लॉकडाउन में आसान रहा होगा। इन ठेका मजदूरों की पहले की समस्याओं और उस पर कोरोना महामारी ने उनके जीवन को गंभीर संकट की चपेट में ले लिया था।



मध्य प्रदेश के सिंगरौली जिला मुख्यालय से लगभग 15 किलोमीटर की दूरी पर ‘निगाही मोड़’ नाम की जगह है, जहां मुख्य सड़क के किनारे आसपास के कोयला खदानों में काम करने वाले ठेका मजदूरों की अस्थायी बस्तियां हैं। बस्ती के ठीक बगल से खुली नाली बहती है। इन बस्तियों में ज्यादातर झोपड़ियां हैं। ये घर एक-दूसरे से लगभग हाथ भर की दूरी पर बने हैं। पूरी बस्ती में शायद ही किसी घर में शौचालय की व्यवस्था होगी। इन बस्तियों में पीने व निस्तार के पानी की भी कोई स्थायी व्यवस्था नहीं है। इसी बस्ती में रहने वाले ठेका मजदूर वीरेन बताते हैं कि सरकार या प्रशासन उन्हें भले ही अस्थायी मानते हों, पर उनका परिवार 10-15 वर्षों से इन्हीं कोयला खदानों में मजदूरी करके जीवनयापन कर रहा है। अब यही हमारा घर है। कोल इंडिया के अंतर्गत आने वाली ‘नॉर्दर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड’ में 34,000 लोग विभिन्न कामों में लगे हैं। इनमें से 14 हजार लोग स्थायी रोजगार वाले हैं और बाकी के 20 हजार ठेका पर काम करते हैं। ठेका कामगारों को 170 से 280 रुपये तक प्रतिदिन के हिसाब से वेतन मिलता है। 


ठेका मजदूर गणेश, जो ‘अम्लोरी खदान’ में कोयला निकालने का काम करते हैं, बताते हैं कि ठेकेदार से रोज का 200 से 250 रुपये, जितना भी तय होता है, उसी के अनुसार हमें वेतन मिलता है। सरकारी नियमानुसार, इन कोयला खदानों में काम करने वाले ठेका मजदूरों को सरकार ने चार श्रेणियों में बांटा है। जिनमें ‘अकुशल मजदूर,’ ‘अर्ध-कुशल मजदूर,’ ‘कुशल मजदूर’ और ‘उच्च-कुशल मजदूर’ शामिल हैं। इन्हें इसी क्रम में प्रतिदिन के हिसाब से क्रमशः 906, 941, 975-1010 रुपये वेतन देने की व्यवस्था है। पर जमीनी हकीकत इससे कोसों दूर है। इन्हीं खदानों में काम करने वाले ठेका मजदूर संजय (बिहार) बताते हैं कि लॉकडाउन के दौरान शुरुआत के महीनों में ठेकेदार ने मुझे काम पर आने से मना कर दिया था। 


इसके चलते मेरा परिवार चलाना बहुत कठिन हो गया था। मुझे 200 रुपये रोजाना वेतन मिलता था, जिससे कुछ बचा पाना संभव नहीं था। उसके बाद ठेकेदार ने मेरा वेतन 220 रुपये कर दिया। किराया और बाकी चीजें महंगी हो गई हैं। ऐसे में महामारी के वक्त घर का गुजारा चलाना, कम साधन होने की वजह से हमारे लिए बहुत ही कठिन हो रहा है। अगर गलती से भी हमें यह बीमारी हो गई, तो हमें कोई उम्मीद नहीं है कि सही इलाज मिल भी पाएगा या नहीं।’ कोरोना महामारी के इतने भीषण समय में भी कोयला खदानें निरंतर चलती रहीं। 


कोयला खदानों को चलाने वाले मजदूरों, खासकर ठेका मजदूरों की बदहाल जिंदगी में कोई सकारात्मक परिवर्तन तो नहीं आया, उल्टे महामारी के संकट ने इनके जीवन को और भी अभावग्रस्त बना दिया। महामारी के दौरान कोयला खदान उत्पादन तो करती रही हैं और इसी वजह से हमारे और आप जैसों की बिजली की जरूरतें भी पूरी होती रहीं, पर इस पूरे समय में कोयला खदानों के मजदूरों की बदहाल जिंदगी को सरकार ने बीमारी के मुहाने पर खड़ा कर दिया है। (सप्रेस)

सौजन्य - अमर उजाला।

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कोरोना वायरस: ठेका श्रमिकों की बढ़ीं मुश्किलें, ऐसे कर रहे गुजारा (अमर उजाला)

रोहित शिवहर 

हमारे देश में बिजली पैदा करने का प्रमुख संसाधन कोयला है, पर धरती की छाती चीरकर उसे निकालने वाले मजदूरों की बदहाली जहां-की-तहां है। पिछले साल कोविड-19 के कारण देश भर में लगे ‘लॉकडाउन’ के दौरान कोयला खदानों में काम कर रहे ठेका मजदूरों का रोजगार तो कमोबेश नहीं छीना गया, पर आसपास की बदहाली ने उन्हें मौत के मुहाने पर खड़ा कर दिया। मार्च, 2020 में देश भर में कोरोना महामारी के चलते लगे संपूर्ण लॉकडाउन के दौरान जहां एक ओर देश भर के बहुत सारे कामगार अचानक सड़कों पर आ गए थे, वहीं कोयला क्षेत्रों में लगातार लॉकडाउन के दौरान भी काम चालू रहने की वजह से कामगारों का रोजगार बरकरार रहा। हालांकि कोयला खदानों में भी कुछ मजदूरों का काम प्रभावित हुआ, लेकिन उनकी संख्या बहुत कम थी। ऐसे में हमें यह नहीं समझना चाहिए कि कोयला खदान में काम कर रहे मजदूरों, खासकर ठेका मजदूरों का जीवन लॉकडाउन में आसान रहा होगा। इन ठेका मजदूरों की पहले की समस्याओं और उस पर कोरोना महामारी ने उनके जीवन को गंभीर संकट की चपेट में ले लिया था।



मध्य प्रदेश के सिंगरौली जिला मुख्यालय से लगभग 15 किलोमीटर की दूरी पर ‘निगाही मोड़’ नाम की जगह है, जहां मुख्य सड़क के किनारे आसपास के कोयला खदानों में काम करने वाले ठेका मजदूरों की अस्थायी बस्तियां हैं। बस्ती के ठीक बगल से खुली नाली बहती है। इन बस्तियों में ज्यादातर झोपड़ियां हैं। ये घर एक-दूसरे से लगभग हाथ भर की दूरी पर बने हैं। पूरी बस्ती में शायद ही किसी घर में शौचालय की व्यवस्था होगी। इन बस्तियों में पीने व निस्तार के पानी की भी कोई स्थायी व्यवस्था नहीं है। इसी बस्ती में रहने वाले ठेका मजदूर वीरेन बताते हैं कि सरकार या प्रशासन उन्हें भले ही अस्थायी मानते हों, पर उनका परिवार 10-15 वर्षों से इन्हीं कोयला खदानों में मजदूरी करके जीवनयापन कर रहा है। अब यही हमारा घर है। कोल इंडिया के अंतर्गत आने वाली ‘नॉर्दर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड’ में 34,000 लोग विभिन्न कामों में लगे हैं। इनमें से 14 हजार लोग स्थायी रोजगार वाले हैं और बाकी के 20 हजार ठेका पर काम करते हैं। ठेका कामगारों को 170 से 280 रुपये तक प्रतिदिन के हिसाब से वेतन मिलता है। 


ठेका मजदूर गणेश, जो ‘अम्लोरी खदान’ में कोयला निकालने का काम करते हैं, बताते हैं कि ठेकेदार से रोज का 200 से 250 रुपये, जितना भी तय होता है, उसी के अनुसार हमें वेतन मिलता है। सरकारी नियमानुसार, इन कोयला खदानों में काम करने वाले ठेका मजदूरों को सरकार ने चार श्रेणियों में बांटा है। जिनमें ‘अकुशल मजदूर,’ ‘अर्ध-कुशल मजदूर,’ ‘कुशल मजदूर’ और ‘उच्च-कुशल मजदूर’ शामिल हैं। इन्हें इसी क्रम में प्रतिदिन के हिसाब से क्रमशः 906, 941, 975-1010 रुपये वेतन देने की व्यवस्था है। पर जमीनी हकीकत इससे कोसों दूर है। इन्हीं खदानों में काम करने वाले ठेका मजदूर संजय (बिहार) बताते हैं कि लॉकडाउन के दौरान शुरुआत के महीनों में ठेकेदार ने मुझे काम पर आने से मना कर दिया था। 


इसके चलते मेरा परिवार चलाना बहुत कठिन हो गया था। मुझे 200 रुपये रोजाना वेतन मिलता था, जिससे कुछ बचा पाना संभव नहीं था। उसके बाद ठेकेदार ने मेरा वेतन 220 रुपये कर दिया। किराया और बाकी चीजें महंगी हो गई हैं। ऐसे में महामारी के वक्त घर का गुजारा चलाना, कम साधन होने की वजह से हमारे लिए बहुत ही कठिन हो रहा है। अगर गलती से भी हमें यह बीमारी हो गई, तो हमें कोई उम्मीद नहीं है कि सही इलाज मिल भी पाएगा या नहीं।’ कोरोना महामारी के इतने भीषण समय में भी कोयला खदानें निरंतर चलती रहीं। 


कोयला खदानों को चलाने वाले मजदूरों, खासकर ठेका मजदूरों की बदहाल जिंदगी में कोई सकारात्मक परिवर्तन तो नहीं आया, उल्टे महामारी के संकट ने इनके जीवन को और भी अभावग्रस्त बना दिया। महामारी के दौरान कोयला खदान उत्पादन तो करती रही हैं और इसी वजह से हमारे और आप जैसों की बिजली की जरूरतें भी पूरी होती रहीं, पर इस पूरे समय में कोयला खदानों के मजदूरों की बदहाल जिंदगी को सरकार ने बीमारी के मुहाने पर खड़ा कर दिया है। (सप्रेस)

सौजन्य - अमर उजाला।

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Wednesday, April 7, 2021

फिर लगी आग, धधकते जंगल से आखिर कैसे निपटें (अमर उजाला)

रोहित कौशिक 

उत्तराखंड के जंगल एक बार फिर धधक रहे हैं। इस राज्य में एक अक्तूबर, 2020 से लेकर चार अप्रैल 2021 की सुबह तक जंगलों में आग लगने की 989 घटनाएं हो चुकी हैं। इन घटनाओं में 1297.43 हेक्टेयर जंगल जल चुके हैं। हाल ही में मध्यप्रदेश के उमरिया जिले में स्थित बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में भी भीषण आग लग गई थी। यह दुर्भाग्यपूर्ण ही है कि कभी प्राकृतिक कारणों से जंगलों में आग लगती है, तो कभी अपने निहित स्वार्थों के कारण जानबूझकर जंगलों में आग लगा दी जाती है। इस वर्ष फरवरी और मार्च का महीना औसत से ज्यादा गर्म रहा। इसलिए उत्तराखंड के जंगलों में भी आग लगने की आशंकाएं पहले ही बढ़ गई थी। कुछ समय पहले भी जंगलों में लगी आग से उत्तराखंड की जैवविविधता एवं पर्यावरण को काफी हानि हुई थी।



दरअसल जंगलों की आग से न केवल प्रकृति झुलसती है, बल्कि प्रकृति के प्रति हमारे व्यवहार पर भी सवाल खड़ा होता है। गर्मियों के मौसम में उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर के जंगलों में आग लगने की घटनाएं अक्सर प्रकाश में आती रहती हैं। जंगलों में लगी आग से जान-माल के साथ-साथ पर्यावरण को भारी नुकसान होता है। पेड़-पौधों के साथ-साथ  जीव-जन्तुओं की विभिन्न प्रजातियां जलकर राख हो जाती हैं। जंगलों में विभिन्न पेड़-पौधे और जीव-जन्तु मिलकर समृद्ध जैवविविधता की रचना करते हैं। पहाड़ों की यह समृद्ध जैवविविधता ही मैदानों के मौसम पर अपना प्रभाव डालती हैं। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि ऐसी घटनाओं के इतिहास को देखते हुए भी कोई ठोस योजना नहीं बनाई जाती है। एक अध्ययन के अनुसार, पूर्व एशिया, दक्षिण एशिया, दक्षिण पूर्व एशिया और समुद्र तटीय क्षेत्रों में जंगलों में आग लगने की समस्या बढ़ती जा रही हैं।



इस आग से लोगों का स्वास्थ्य, पर्यटन, अर्थव्यवस्था और परिवहन उद्योग गंभीर रूप से प्रभावित हो रहा है। पूर्व एशिया में तो आग की बारंबारता, उसका पैमाना, उससे होने वाली क्षति और आग बुझाने में होने वाला खर्च सभी कुछ बढ़ा है। जंगल में आग लगने की घटनाओं में वृद्धि के पीछे ज्यादा समय तक सूखा पड़ने, मौसम में बदलाव, बढ़ते प्रदूषण जैसे बहुत से कारक हैं। गौरतलब है कि दक्षिण एशिया में आग से नष्ट होने वाले 90 फीसदी जंगल भारत के हैं। पहाड़ों पर चीड़ के वृक्ष आग जल्दी पकड़ते हैं। कई बार वनमाफिया अपने स्वार्थ के लिए वनविभाग के कर्मचारियों के साथ मिलकर जंगलों में आग लगा देते हैं। यह विडंबना ही है कि पहाड़ों के जंगल हमारे लोभ की भेंट चढ़ रहे हैं। 

 

जंगलों में यदि आग विकराल रूप धारण कर लेती है, तो उसे बुझाना आसान नहीं होता है। कई बार जंगल की आग के प्रति स्थानीय लोग भी उदासीन रहते हैं। दरअसल हमारे देश में ऐसी आग बुझाने की न तो कोई उन्नत तकनीक है और न ही कोई स्पष्ट कार्ययोजना। विदेशों में जंगल की आग बुझाने के लिए युद्ध स्तर पर कार्य होता है। पिछले दिनों नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने जंगलों की आग पर तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा था कि पर्यावरण मंत्रालय और अन्य प्राधिकरण वन क्षेत्र में आग लगने की घटना को हल्के में लेते हैं। जब भी ऐसी घटनाएं घटती हैं, तो किसी ठोस नीति की आवश्यकता महसूस की जाती है। लेकिन बाद में सब कुछ भुला दिया जाता है। 


जंगलों में आग लगने से पर्यावरण में कार्बन की मात्रा बढ़ जाती है, जिससे तापमान में वृद्धि होने की आशंका रहती है। पिछले दिनों विश्व बैंक ने चेतावनी दी थी कि यदि तापमान वृद्धि पर समय रहते काबू नहीं पाया गया, तो दुनिया से गरीबी कभी खत्म नहीं होगी। समुद्र का जलस्तर बढ़ने से बांग्लादेश, मिस्र, वियतनाम और अफ्रीका के तटवर्ती क्षेत्रों में खाद्यान्न उत्पादन को तगड़ा झटका लगेगा, जबकि दुनिया के अन्य हिस्सों में सूखा कृषि उपज के लिए भारी तबाही मचाएगा। इससे दुनिया में कुपोषण के मामलों में वृद्धि होगी। इसके साथ ही उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में तूफान और चक्रवातों का प्रकोप बढ़ेगा। इसलिए अब समय आ गया है कि हम जंगलों की आग से निपटने के लिए ठोस योजनाएं बनाएं।

सौजन्य - अमर उजाला।

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बीजापुर में 22 जवानों की शहादत दुखद, इस हमले का सबक (अमर उजाला)

अजय साहनी  

छत्तीसगढ़ के बीजापुर में नक्सलियों के साथ हुई मुठभेड़ में सुरक्षा बलों के 22 जवानों की शहादत दुखद है और इसकी जितनी निंदा की जाए, वह कम है। ऐसे हमले बार-बार होते रहते हैं। हालांकि इस हमले के ज्यादा ब्योरे अभी सामने नहीं आए हैं, पर इससे पहले जो ऐसे हमले हुए हैं, उनमें अक्सर यह देखा गया है कि आमतौर पर सुरक्षा बलों की कोई न कोई भारी चूक रहती है। अभी जो इस हमले की तस्वीरें दिखी हैं, उसमें नजर आता है कि बहुत से शहीद हुए जवानों के शव एक ही जगह पड़े थे। इसका मतलब है कि वे बहुत पास-पास चल रहे थे। यह भी रिपोर्ट आ रही है कि ये दो पहाड़ी के बीच से गुजर रहे थे और ऊपर से इन पर मशीनगन, ग्रेनेड लांचर, आदि, से हमला किया गया। इससे लगता है कि इन्हें जाल में फंसाकर मारा गया है। 



ऑपरेशन से संबंधित सुरक्षा बलों की मानक प्रक्रिया के जो दिशा-निर्देश होते हैं, अगर उनका पालन किया जाता, तो इतने ज्यादा जवान नहीं मारे जाते। ऑपरेशन से संबंधित सुरक्षा बलों की जो मानक प्रक्रिया होती है, उसमें अग्रिम दस्ता भेजकर इलाके का सर्वेक्षण किया जाता है, उसके बाद ऑपरेशन को भी बिखर कर अंजाम दिया जाता है। सुरक्षा बल इकट्ठा होकर नहीं चलते हैं, ऐसे में अगर कहीं हमला भी होता है, तो कम नुकसान होता है और उतनी देर में शेष सुरक्षा बल जवाबी कार्रवाई कर हावी हो जाते हैं। माओवादी तो हर वक्त इस ताक में रहते हैं कि सुरक्षा बल चूक करें और जब सुरक्षा बल कोई बड़ी चूक करते हैं, तो नुकसान भी बड़ा होता है। 



इसमें यह भी मालूम हो रहा है कि सुरक्षा बलों को खुफिया जानकारी मिली थी कि नक्सल कमांडर माडवी हिड़मा भी उस इलाके में मौजूद था, जिसके खिलाफ सुरक्षा बल सर्च ऑपरेशन करने निकले थे। यह भी हो सकता है कि यह खुफिया जानकारी नक्सलियों ने ही इनके पास भिजवाई हो, अपने जाल में फंसाने के लिए, क्योंकि नक्सली बहुत तैयारी में थे और जहां यह हमला हुआ है, वह जगह सीआरपीएफ के कैंप से बहुत ज्यादा दूर नहीं है। बिना जांच के अभी यह कह देना कि खुफिया विभाग की चूक नहीं थी, यह एक बयानबाजी भर है, जिसका कोई महत्व नहीं है। जांच के बाद ही असलियत का पता चलेगा कि इंटेलिजेंस की क्वालिटी क्या थी, और फोर्स से कहां चूक हुई। 


जहां यह हमला हुआ है, उस क्षेत्र में सुरक्षा बल रोज पेट्रोलिंग पर निकलते हैं। इसलिए यह भी नहीं कह सकते कि वहां की भौगोलिक स्थिति से अनजान होने के कारण सुरक्षा बल इसका शिकार हुए। मुझे लगता है कि सुरक्षा बलों की रणनीति में गड़बड़ी हुई है और मानक प्रक्रियाओं पर ठीक से अमल नहीं किया गया होगा। अगर आप दो पहाड़ी के बीच से निकल रहे हैं, तो बुनियादी सावधानी तो बरतनी चाहिए थी। अगर उस इलाके का सर्वे किया जाता और पहाड़ी के ऊपर एक-दो जवान जाते, तो उनके साथ मुठभेड़ होती या वे लौटकर खबर देते। ऐसे में एकाध जवान ही मारा जाता। इसके अलावा मार्चिंग का पैटर्न होता है, जिसमें जवान एक-दूसरे से दूरी बनाकर चलते हैं। फासले पर चलने से भी कम से कम जवान मारे जाते, बाकी लोग सतर्क होकर जवाबी कार्रवाई करते। 


जहां तक माओवादियों की ताकत या कमजोरी देखने की बात है, तो उसके लिए ट्रेंड देखने की आवश्यकता है। साउथ एशिया टेररिज्म पोर्टल के मुताबिक, ट्रेंड दिखा रहा है कि 2010 में नक्सली हमलों में 1179 लोग मारे गए थे, लेकिन 2020 में 239 आदमी मारे गए। जाहिर है, हिंसा की घटनाएं कम हो गईं। एक जमाने में 20 प्रदेशों  के 223 जिलों में माओवादी फैले थे, उसमें से 66 ऐसे जिले थे, जिन्हें सर्वाधिक प्रभावित जिला बताया जा रहा था। आज हमारे आंकड़ों के मुताबिक, कुल 9 प्रदेशों में 41 जिले हैं, जहां माओवादी फैले हुए हैं और उसमें से दो या तीन जिले ही सर्वाधिक प्रभावित रह गए हैं। पूरे के पूरे इलाके खाली हो गए हैं। पश्चिम बंगाल में पिछले चार साल से एक भी आदमी नहीं मारा गया। बिहार, आंध्र प्रदेश का आप नाम नहीं सुनते हैं, इस वक्त सिर्फ छत्तीसगढ़, ओडिशा का थोड़ा-सा हिस्सा और थोड़ा-सा हिस्सा झारखंड में बाकी रह गया है। 


और छत्तीसगढ़ के भी मात्र तीन जिले हैं, जो माओवाद से ज्यादा प्रभावित हैं। माओवादी कमजोर जरूर हुए हैं, पर यह नहीं कहा जा सकता कि माओवादी खत्म हो गए हैं। यह सभी मानते हैं कि जिस इलाके में यह हादसा हुआ है और जहां सुरक्षा बल ऑपरेशन चला रहे हैं, वह माओवादियों का आखिरी किला है। अगर आप आंकड़े देखेंगे, तो पता चलेगा कि ज्यादातर तो नक्सली ही मारे जा रहे हैं, कुछेक सुरक्षा बल भी मारे जाते हैं और कुछ नागरिकों को नक्सली पुलिस का मुखबिर बताकर मार देते हैं।


नक्सली ऐसे हमले अपनी ताकत और अपना वर्चस्व दिखाने के लिए करते हैं। इससे नक्सलियों के बचे-खुचे कैडरों का मनोबल बढ़ता है और वे नए रंगरूटों की भर्ती करते हैं। पहले नक्सली बारूदी सुरंग बिछाकर हमले करते थे, लेकिन इस हादसे में आमने-सामने की लड़ाई हुई दिखती है। इसकी वजह है कि सुरक्षा बलों की गतिविधियां उस क्षेत्र में बढ़ी हैं, जिस कारण माओवादियों को बारूदी सुरंग बिछाने का मौका नहीं मिल पाता और वे आमने-सामने की लड़ाई के लिए विवश होते हैं। इस मामले में उन्होंने योजनाबद्ध तरीके से सुरक्षा बलों को फंसाकर आमने सामने की लड़ाई की, वरना वे आमने-सामने की लड़ाई से भी बचते फिरते हैं। कभी पूर्व प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह ने कहा था कि माओवाद देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा है, लेकिन आज ऐसा नहीं कहा जा सकता। फिर भी यह सवाल तो है कि माओवाद की समस्या से कैसे निपटा जाए। 


किसी भी हिंसक आंदोलन को रोकने और प्रभावित इलाकों पर वर्चस्व पाने के लिए बलों का प्रयोग करना जरूरी होता है। पर इस तरह नहीं, जैसे इस मामले में जंगल में 2,000 जवानों को लड़ने के लिए भेज दिया गया और वे माओवादियों के जाल में फंस गए। कई तरीके अपनाए जा सकते हैं। ड्रोन के इस्तेमाल से इलाके का सर्वेक्षण हो सकता है। विद्रोही गुट के नेतृत्व को धीरे-धीरे खत्म किया गया है, और आज कुछ ही कमांडर बच रहे हैं। इस तरह, जो-जो इलाके कब्जे में आते जाएं, वहां सरकार एवं सरकारी योजनाओं को प्रभावी तरीके से लागू करना चाहिए। सबसे अंत में विद्रोही गुटों के साथ बातचीत का रास्ता निकालना चाहिए – लेकिन यह तब हो, जब वे सुलह करने के लिए तैयार हो जाएं। तभी इस समस्या का निदान संभव है। 

सौजन्य - अमर उजाला।

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Tuesday, April 6, 2021

फिर लगी आग, धधकते जंगल से आखिर कैसे निपटें (अमर उजाला)

रोहित कौशिक  

उत्तराखंड के जंगल एक बार फिर धधक रहे हैं। इस राज्य में एक अक्तूबर, 2020 से लेकर चार अप्रैल 2021 की सुबह तक जंगलों में आग लगने की 989 घटनाएं हो चुकी हैं। इन घटनाओं में 1297.43 हेक्टेयर जंगल जल चुके हैं। हाल ही में मध्यप्रदेश के उमरिया जिले में स्थित बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में भी भीषण आग लग गई थी। यह दुर्भाग्यपूर्ण ही है कि कभी प्राकृतिक कारणों से जंगलों में आग लगती है, तो कभी अपने निहित स्वार्थों के कारण जानबूझकर जंगलों में आग लगा दी जाती है। इस वर्ष फरवरी और मार्च का महीना औसत से ज्यादा गर्म रहा। इसलिए उत्तराखंड के जंगलों में भी आग लगने की आशंकाएं पहले ही बढ़ गई थी। कुछ समय पहले भी जंगलों में लगी आग से उत्तराखंड की जैवविविधता एवं पर्यावरण को काफी हानि हुई थी।

दरअसल जंगलों की आग से न केवल प्रकृति झुलसती है, बल्कि प्रकृति के प्रति हमारे व्यवहार पर भी सवाल खड़ा होता है। गर्मियों के मौसम में उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर के जंगलों में आग लगने की घटनाएं अक्सर प्रकाश में आती रहती हैं। जंगलों में लगी आग से जान-माल के साथ-साथ पर्यावरण को भारी नुकसान होता है। पेड़-पौधों के साथ-साथ  जीव-जन्तुओं की विभिन्न प्रजातियां जलकर राख हो जाती हैं। जंगलों में विभिन्न पेड़-पौधे और जीव-जन्तु मिलकर समृद्ध जैवविविधता की रचना करते हैं। पहाड़ों की यह समृद्ध जैवविविधता ही मैदानों के मौसम पर अपना प्रभाव डालती हैं। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि ऐसी घटनाओं के इतिहास को देखते हुए भी कोई ठोस योजना नहीं बनाई जाती है। एक अध्ययन के अनुसार, पूर्व एशिया, दक्षिण एशिया, दक्षिण पूर्व एशिया और समुद्र तटीय क्षेत्रों में जंगलों में आग लगने की समस्या बढ़ती जा रही हैं।



इस आग से लोगों का स्वास्थ्य, पर्यटन, अर्थव्यवस्था और परिवहन उद्योग गंभीर रूप से प्रभावित हो रहा है। पूर्व एशिया में तो आग की बारंबारता, उसका पैमाना, उससे होने वाली क्षति और आग बुझाने में होने वाला खर्च सभी कुछ बढ़ा है। जंगल में आग लगने की घटनाओं में वृद्धि के पीछे ज्यादा समय तक सूखा पड़ने, मौसम में बदलाव, बढ़ते प्रदूषण जैसे बहुत से कारक हैं। गौरतलब है कि दक्षिण एशिया में आग से नष्ट होने वाले 90 फीसदी जंगल भारत के हैं। पहाड़ों पर चीड़ के वृक्ष आग जल्दी पकड़ते हैं। कई बार वनमाफिया अपने स्वार्थ के लिए वनविभाग के कर्मचारियों के साथ मिलकर जंगलों में आग लगा देते हैं। यह विडंबना ही है कि पहाड़ों के जंगल हमारे लोभ की भेंट चढ़ रहे हैं। 

 

जंगलों में यदि आग विकराल रूप धारण कर लेती है, तो उसे बुझाना आसान नहीं होता है। कई बार जंगल की आग के प्रति स्थानीय लोग भी उदासीन रहते हैं। दरअसल हमारे देश में ऐसी आग बुझाने की न तो कोई उन्नत तकनीक है और न ही कोई स्पष्ट कार्ययोजना। विदेशों में जंगल की आग बुझाने के लिए युद्ध स्तर पर कार्य होता है। पिछले दिनों नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने जंगलों की आग पर तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा था कि पर्यावरण मंत्रालय और अन्य प्राधिकरण वन क्षेत्र में आग लगने की घटना को हल्के में लेते हैं। जब भी ऐसी घटनाएं घटती हैं, तो किसी ठोस नीति की आवश्यकता महसूस की जाती है। लेकिन बाद में सब कुछ भुला दिया जाता है। 


जंगलों में आग लगने से पर्यावरण में कार्बन की मात्रा बढ़ जाती है, जिससे तापमान में वृद्धि होने की आशंका रहती है। पिछले दिनों विश्व बैंक ने चेतावनी दी थी कि यदि तापमान वृद्धि पर समय रहते काबू नहीं पाया गया, तो दुनिया से गरीबी कभी खत्म नहीं होगी। समुद्र का जलस्तर बढ़ने से बांग्लादेश, मिस्र, वियतनाम और अफ्रीका के तटवर्ती क्षेत्रों में खाद्यान्न उत्पादन को तगड़ा झटका लगेगा, जबकि दुनिया के अन्य हिस्सों में सूखा कृषि उपज के लिए भारी तबाही मचाएगा। इससे दुनिया में कुपोषण के मामलों में वृद्धि होगी। इसके साथ ही उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में तूफान और चक्रवातों का प्रकोप बढ़ेगा। इसलिए अब समय आ गया है कि हम जंगलों की आग से निपटने के लिए ठोस योजनाएं बनाएं।

सौजन्य - अमर उजाला।

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Monday, April 5, 2021

क्या सचमुच संभव है विपक्षी एकता, ममता ने भाजपा का रथ रोकने के लिए लगाई है गुहार (अमर उजाला)

आलोक मेहता, वरिष्ठ पत्रकार 

ममता ने भाजपा का रथ रोकने के लिए विपक्षी नेताओं से एकजुट होने की गुहार की है, लेकिन वह एकता दिख नहीं रही। बंगाल के चुनावी समर में चारों ओर से घिरी ममता बनर्जी ने विपक्षी दलों के नेताओं को पत्र लिखकर सत्ता विस्तार के जयघोष के साथ बढ़ रही भाजपा के राजनीतिक अश्व को रोकने के लिए एकजुट होने का आग्रह किया है। लेकिन मुश्किल यह है कि विपक्षी दलों में एकता नहीं दिख रही। कांग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी तो जी-जान से उनका सिंहासन ही नहीं, पूरा किला ही ध्वस्त करने में लगे हुए हैं। इसी तरह पुराने दुश्मन वामपंथी दल ममता को मैदान से बाहर करने में लगे हैं।



राजद नेता तेजस्वी या आप नेता अरविंद केजरीवाल क्या भाजपा का रथ रोकने जैसी ताकत रखते हैं? उद्धव ठाकरे, शरद पवार, सुखबीर बादल, अखिलेश यादव, मायावती,स्टालिन आदि अपने घर-आंगन तक सीमित हैं। वे अपनी हवेली बचाने में व्यस्त रहते हैं। गांधी परिवार के पुराने वफादार कांग्रेसी लगभग सात वर्षों से कह रहे हैं कि केवल राहुल बाबा डूबते जहाज की कमान संभालकर सत्ता दिला सकते हैं। लेकिन विडंबना यह है कि राहुल को पुराने कारतूस की तरह पुराने बुजुर्ग चेहरे, उनकी कार्य-शैली और राय तक रास नहीं आती। उन्हें नए युवा अंग्रेजीदां कारिंदे पसंद हैं, जो गूगल ज्ञान, फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम आदि से फिल्मी डायलॉग, सस्ती भद्दी भाषा-भाषण प्रस्तुत कर अपनी मूंछ पर ताव देते रहते हैं। अपने भाई की मदद के लिए प्रियंका वाड्रा बहुत देर से मैदान में आई हैं और भावनाओं के साथ खतरों को भी समझती हैं। फिर उनके और परिवार के लिए रॉबर्ट के काम-धंधे बोझ की तरह बाधा बनते रहते हैं।



ममता बनर्जी इस समय अपने नए-पुराने साथियों की चुनावी तलवारबाजी से घायल हैं। उनकी पुकार पर सहानुभूति दिखाने वाले बुजुर्ग सेनापति शरद पवार महाराष्ट्र के सिंहासन के आसपास खड़े पृथ्वीराज चव्हाण जैसे नेताओं के खतरों से चिंतित हैं। गांधी परिवार से पुराने मीठे-खट्टे, कड़वे अनुभवों के पन्ने अब तक विचलित करते हैं। अब एक नए ठाकरे परिवार में महारानी, महाराज, युवराज के पुण्य अथवा पापों का बोझ शरद पवार के हाथों को और कमजोर कर रहा है। वह पहले मोदी दरबार में पेशी दे चुके, हाल में उन्होंने रात के अंधेरे में भाजपा के शाह से रहस्यमयमुलाकात की। ममता या राहुल को शायद यह नहीं मालूम है कि शरद पवार कबड्डी के खेल और संगठनों से निकलकर राजनीति में उतरे थे। कबड्डी के अच्छे खिलाड़ी सामान्यतः दूसरे पाले में जाकर वापस आने में माहिर होते हैं। तभी तो मराठा क्षत्रप अपने पाले के परिजनों को बचाने में सफल रहे हैं। वह  सत्ता के रथ को रोकने के लिए युद्ध नहीं चाहेंगे।


ममता के पड़ोसी नवीन पटनायक ने हमेशा अपनी सीमाओं और सिंहासन को सुरक्षित रखने का सिद्धांत बना रखा है और दो दशकों से एकछत्र राज कर रहे हैं। संघर्ष का तो सवाल ही नहीं, दिल्ली दरबार के दर्शन भी बहुत जरूरी होने पर करते हैं। वह तो सत्ता के अश्व को रास्ता भी देते रहे हैं। दूसरे पड़ोसी नीतीश अब ममता की पुकार पर कोई नई लड़ाई लड़ने को तैयार नहीं हो सकते हैं। तेजस्वी तेजी से आगे बढे हैं, लेकिन जल्दबाजी खतरों से भरी है। लालू यादव के मुकदमे, जेल का सिलसिला थम भी जाए, तो भाई-बहनों का हिसाब-किताब तेजस्वी को बिहार के बाहर हाथ-पैर मारने की ताकत नहीं दे सकता है। यही स्थिति कुछ हद तक अखिलेश यादव की है। कांग्रेस और बसपा के साथ समझौतों का परिणाम वह देख चुके हैं। अजित सिंह परिवार पर भरोसे का तो सवाल ही नहीं पैदा होता।


उधर असम और अन्य पूर्वोत्तर राज्यों के नेताओं को क्षेत्रीय हितों की चिंता रहती है। दिल्ली में जो भी राज करे, वे उनके हितों की रक्षा करते रहे हैं। दक्षिण भारत के राज्यों में भी स्थानीय हित सर्वोपरि हैं। इस दृष्टि से नरेंद्र मोदी राज में पूरब, पश्चिम, उत्तर दिशा में जनता का व्यापक समर्थन सत्ता के रथ का स्वागत करता दिख रहा और अश्वमेघ के अश्व को रोकने का सामर्थ्य फिलहाल किसी नेता और दल में नहीं है। वैसे भी 2024 के लोकसभा चुनाव में तीन साल का समय है। इतनी लंबी लड़ाई लड़ने के लिए संगठन और साधन कितनों के पास है?


सौजन्य - अमर उजाला।

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दूसरी लहर से निपटने की चुनौती: अब लॉकडाउन कोई समाधान नहीं (अमर उजाला)

डॉ. चंद्रकांत लहरिया 

कोविड से मुकाबले में टीके बेहद कारगर साबित होने वाले हैं। अगले तीन महीने में व्यापक टीकाकरण होता है, तो तीसरी लहर को रोका जा सकता है। पर टीकाकरण का पूरा लाभ तभी होगा, जब इससे हिचकने वाले व खतरे की श्रेणी में आने वाले लोग टीका लगवाने आगे आएं।



भारत कोविड-19 महामारी की दूसरी लहर की चपेट में है। बहुत जल्दी हमारे यहां दैनिक संक्रमितों की संख्या पिछले साल के दैनिक संक्रमण के चरम को पार कर जाएगी। दूसरे देशों में भी महामारी की दूसरी या तीसरी-चौथी लहर में पहली लहर की तुलना में दैनिक संक्रमण ज्यादा दिखा है। अपने यहां संक्रमण के मामले अब टियर 2 और 3 शहरों तथा ग्रामीण इलाकों में बढ़ रहे हैं। सिर्फ यही नहीं कि संक्रमण वृद्धि की दर पहली लहर से अधिक है, बल्कि वायरस के नए वेरिएंट्स भी चिंता का कारण बन रहे हैं। हालांकि दूसरी लहर के दौरान कुछ सकारात्मक चीजें भी हैं।



जैसे, महामारी तथा वायरस के फैलाव के बारे में अब लोगों में बेहतर समझ है। मृत्यु दर भी पहले की तुलना में कम है, हालांकि संक्रमण के नए मामले बड़ी तेजी से बढ़ रहे हैं, ऐसे में, मरने वालों का दैनिक आंकड़ा पिछले साल की तुलना में अधिक हो सकता है। अस्पतालों में पहले की तुलना में महामारी से निपटने की बेहतर तैयारी है। और सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि इन दिनों टीकाकरण रफ्तार पकड़ रहा है। सार्स कोव-2 और कोविड-19 महामारी का स्वरूप चौंकाने वाला है। इसलिए देश के सभी राज्यों को संक्रमण की बढ़ती रफ्तार का मुकाबला करने के लिए तैयार रहना होगा। इसमें पिछले साल सीखे गए सबक सबसे कारगर साबित होंगे।


सबसे बड़ा सबक यह है कि अब लॉकडाउन कोई समाधान नहीं है। लॉकडाउन लागू करने का उद्देश्य हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था को महामारी का मुकाबला करने के लिए तैयार करना और लोगों को इसके अनुरूप बदलने के लिए समय देना था। कोविड के कारण लोगों का व्यवहार बदला है और वे लगातार हाथ धोने, मास्क लगाने और व्यक्तिगत दूरी बरतने आदि पर जोर देने लगे हैं। यह बदलाव हममें स्वतः ही आना चाहिए। अगर लोग इन बदलावों को अमल में नहीं लाते, तो उन्हें और समय देने का भी कोई लाभ नहीं होगा। वैसे में हमें वैकल्पिक तरीका अपनाना होगा। यह भी तथ्य है कि लॉकडाउन का आम तौर पर अर्थव्यवस्था पर तथा खासकर गरीबों और हाशिये के लोगों पर बेहद प्रतिकूल असर पड़ा है। यहां तक कि सप्ताहांत में लगाए जाने वाले कर्फ्यू और प्रतिबंध भी नुकसानदेह साबित होंगे।


इसे ऐसे समझें कि सप्ताहांत के लॉकडाउन का मतलब होगा कि उस दिन लोग काम के लिए बाहर नहीं निकलेंगे। ऐसे में, उसके अगले दिन, जब प्रतिबंध नहीं रहेगा, तब सड़कों और बाजारों में स्वाभाविक ही भीड़ बढ़ जाएगी। इसके बावजूद अधिक संक्रमण वाले इलाकों में, जहां स्वास्थ्य सुविधाओं के प्रभावित होने की आशंका है, प्रतिबंध लगाना एक विकल्प तो है ही। महामारी की दूसरी लहर का मुकाबला करने के लिए सरकार और समाज, दोनों को अपनी जिम्मेदारियां निभानी होंगी। जैसे कि सरकार को खासकर ग्रामीण इलाकों में कोविड की जांच बढ़ानी होगी, कांटेक्ट ट्रेसिंग की शिथिल पड़ चुकी प्रक्रिया को फिर से सक्रिय करना होगा, जरूरतमंदों के लिए क्वारंटीन सुविधाएं तथा आइसोलेशन बेड्स हैं या नहीं, यह देखना होगा। यह ध्यान रखने की जरूरत है कि खासकर ग्रामीण इलाकों में निजी अस्पतालों में आइसोलेशन बेड्स की व्यवस्था कारगर नहीं होने वाली, क्योंकि वहां आम तौर पर मुफ्त आइसोलेशन बेड्स की ही अपेक्षा रहती है। और कुछ महीनों तक सामाजिक और धार्मिक जमावड़े पर भी प्रभावी तरीके से प्रतिबंध लगाना होगा। दूरस्थ क्षेत्रों और उन जिलों में ज्यादा ध्यान देने की आवश्यकता है, जहां पर्याप्त कदम नहीं उठाए गए हैं।


कोविड की पिछली लहर के विपरीत इस दूसरी लहर में परिवार के अनेक सदस्यों के एक साथ संक्रमित होने की रिपोर्टें आ रही हैं। इसका सामाजिक असर पड़ सकता है, लिहाजा इससे निपटने के लिए प्रभावितों के वेतन या उनकी मजदूरी के नुकसान की भरपाई करने जैसे विशेष कदम भी उठाए जाने चाहिए। हमने यह देखा है कि जन भागीदारी के बगैर कानूनी उपाय बहुत प्रभावी और स्थायी नहीं होते। यह स्पष्ट है कि महामारी से मुकाबला लंबा चलेगा, इसमें कम से कम छह से नौ महीने लगेंगे। इसलिए सरकारों द्वारा शहरी इलाकों में रेजिडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशन तथा ग्रामीण इलाकों में पंचायत सदस्यों के साथ बेहतर तालमेल बनाने की जरूरत है। सिविल सोसाइटी संगठनों की भी इसमें सक्रियता जरूरी है, जिसमें पार्षदों तथा विधायकों जैसे स्थानीय प्रतिनिधियों की मौजूदगी भी होनी चाहिए। इसके जरिये स्थानीय स्तर लोगों में महामारी के बारे में जागरूकता फैलाने तथा लोगों को इसके अनुरूप व्यवहार करने के लिए प्रेरित करना चाहिए।


इस पहल से कोविड के टीके के प्रति लोगों में जो एक हिचक है, उसे भी दूर किया जा सकेगा। देश में टीकाकरण चल रहा है, और कोविड से मुकाबले में टीके बेहद कारगर साबित होने वाले हैं। हालांकि टीके का दूसरा डोज लेने के दो सप्ताह बाद प्रतिरोधक क्षमता बनती है। यानी यह प्रतिरोधक क्षमता टीके के पहले डोज के छह से दस सप्ताह बाद बनती है। इसलिए महामारी की इस लहर में टीके का लाभ न्यूनतम ही है। लेकिन अगले तीन महीने में अगर व्यापक टीकाकरण होता है, तो इससे महामारी की संभावित  तीसरी लहर को रोका जा सकता है या फिर उसके असर को कम किया जा सकता है। संभव है कि टीका लगाने वाले ज्यादातर लोग वही हों, जिन्होंने कोविड के दौरान अपना रहन-सहन बदला है और जो ज्यादा जागरूक हैं। ऐसे में, टीकाकरण बढ़ाने और अलग-अलग आयु वर्ग के लिए इसे खोलने का भी बहुत लाभ नहीं होगा। टीकाकरण का लाभ तभी होगा, जब इससे हिचकने वाले तथा खतरे की श्रेणी में आने वाले लोग टीका लगवाने के लिए स्वत: आगे आएं।


कोविड की दूसरी लहर के बीच अनेक राज्य सभी बालिगों के टीकाकरण की मांग कर रहे हैं। लेकिन यह सही रणनीति नहीं होगी, क्योंकि ऐसे में, हमारे सीमित स्वास्थ्य संसाधन पूरी तरह टीकाकरण पर ही केंद्रित हो जाएंगे, जबकि दूसरी लहर का मुकाबला करने के साथ-साथ गैर कोविड आवश्यक स्वास्थ्य सुविधाएं बरकरार रखना भी जरूरी है। अगर टीकाकरण अभियान अपने लक्ष्य पर खरा उतरा, तो महामारी की अगली लहर को रोकने में हम कामयाब हो सकते हैं। भारत ने अतीत में कई चुनौतियों का सामना किया है और साथ मिलकर इस चुनौती से भी हम बाहर निकल आएंगे।


-लेखक जननीति और स्वास्थ्य तंत्र विशेषज्ञ हैं।


सौजन्य - अमर उजाला।

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