Day: January 16, 2018

कृषि की फिक्र (जनसत्ता)

उदारीकरण के दौर में जीडीपी की वृद्धि दर पर ही सारा जोर दिया जाता रहा है, यहां तक कि यही विकास का एकमात्र पैमाना हो गया है। लेकिन क्या सचमुच जीडीपी की वृद्धि दर ही सबकुछ है? अगर यह विकास का पर्याय है तो क्या कारण है कि डेढ़ दशक तक ऊंची वृद्धि दर के […]

संतुलित रुख (जनसत्ता)

कश्मीर समस्या की बाबत सेना प्रमुख जनरल रावत के ताजा बयान की अहमियत जाहिर है। कोई साल भर पहले घाटी में सेना ने पहले से अधिक सख्त रुख अख्तियार किया था। लेकिन अब सेना प्रमुख ने ‘राजनीतिक-सैन्य’ रुख अपनाने की वकालत की है। साफ है कि वे अब राजनीतिक कदम को भी जरूरी मानते हैं। […]

सेल्फी संहिता से ही बचाव संभव (दैनिक ट्रिब्यून)

आलोक पुराणिक सेल्फी लेते हुए दो नौजवानों की मौत की खबर सामने है। देश पर मरने की खबरें पुरानी हुईं, खुद को देखते-देखते, खुद की ही फोटू खींचते-खींचते निकल लिये। कर चले हम फिदा जानो तन साथियो, ऐसा सेल्फी जतन हुआ साथियो। जनहित में एक सेल्फी संहिता जारी की जा रही है, इसे अपनाकर सुरक्षित […]

बनी रहे न्याय व्यवस्था की साख (दैनिक ट्रिब्यून)

अनूप भटनागर उच्चतम न्यायालय के चार वरिष्ठतम न्यायाधीशों की प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा के खिलाफ खुली ‘बगावत’ की असाधारण घटना से जहां दुनिया भर में भारत की न्यायपालिका के निष्पक्ष और स्वतंत्र होने संबंधी दावों पर सवाल लग गया वहीं अब यह न्यायपालिका का अंदरूनी मामला भर नहीं रह गया। चार न्यायाधीशों की संयुक्त प्रेस […]

भ्रष्टाचार की जड़ों पर करें प्रहार (दैनिक ट्रिब्यून)

भरत झुनझुनवाला प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गुजरात के मुख्यमंत्री के अपने कार्यकाल में आम आदमी को भ्रष्टाचार मुक्त शासन उपलब्ध कराया था। उस समय अहमदाबाद में टैक्सी ड्राइवर ने बताया था कि अब ड्राइवर लाइसेंस बनवाने के लिए घूस नहीं देनी पड़ती। इस उपलब्धि को हासिल करने की मोदी की पालिसी के दो अंग थे। […]

सही नहीं है मोदी सरकार की माली हालत, घट रही है आय और बढ़ रहे हैं खर्चे- जानिए (दैनिक जागरण)

नई दिल्ली [ डॉ. भरत झुनझुनवाला ]। केंद्र सरकार का वित्तीय घाटा बढ़ रहा है। सरकार की आय कम हो और खर्च ज्यादा हो तो अंतर को पाटने के लिए सरकार बाजार से ऋण लेती है। इस ऋण को वित्तीय घाटा कहा जाता है। वित्तीय घाटे को अच्छा नहीं माना जाता है, ठीक वैसे ही […]

बापू के देश में आमजन से दूर होती स्वास्थ्य व्यवस्था और चरमराती शिक्षा व्यवस्था क्यों हैं, जानिए (दैनिक जागरण)

नई दिल्ली [ जगमोहन सिंह राजपूत ]। शहरों में हजारों लाखों लोग गांवों से रोजगार की तलाश में आते हैं। इन्हें अप्रवासी श्रमिक की श्रेणी में गिना जाता है। आने के मुख्य कारक रोजगार पाने के अतिरिक्त बच्चों को अच्छे स्कूल में शिक्षा दिलाने की लालसा भी होती है। यहां ये परिवार सहित अनेक प्रकार […]

न्यायपालिका ही तलाशे समाधान (अमर उजाला)

सुभाष कश्यप हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश के बाद आने वाले चार वरिष्ठतम जजों ने प्रेस कांफ्रेंस करके प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्र के कामकाज के तरीके पर सवाल उठाए। यह सुप्रीम कोर्ट के इतिहास की सबसे दुखद और अप्रत्याशित घटना है। इन जजों ने प्रधान न्यायाधीश पर निरंकुश और मनमाने ढंग से […]

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