सत्ता की आस में लुटे दलित (राष्ट्रीय सहारा)


बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर ने सत्ता को वह कुंजी बताई थी, जिससे सारे ताले खुल जाते हैं। उस समय की परिस्थितियों के अनुसार काफी हद तक सत्ता सभी क्षेत्रों को नियंत्रित करती थी, लेकिन अब परिस्थितियां बदल गई हैं। वोल्सेविक क्रांति के बाद दुनिया के तमाम देश साम्यवादी होते जा रहे थे और वहां राजसत्ता सब कुछ नियंत्रित रखती थी। यूरोपीय देशों में भी राजसत्ता काफी प्रभाशाली रही। कांशीराम जी ने जब बहुजन समाज पार्टी बनाई तो लक्ष्य इतना बड़ा रखा कि उसको हासिल करना आसान नहीं था। बामसेफ से लेकर बीएसपी तक लोगों से कहते रहे हम सत्ता में आएंगे तो समस्याओं का समाधान अपने आप हो जाएगा। समर्थक भी विास करते हुए काम करने लगे और उत्तर प्रदेश में सरकार भी बनाई। यदि कोई और दूसरा सामाजिक राजनैतिक कार्य करने की कोशिश किया तो उसे बदनाम ज्यादा होना पड़ा कि बसपा को सत्ता में आने से रोकने का षड्यंत्र है। निजीकरण, ठेकेदारी, आउटसोर्संिग, अत्याचार, शिक्षा, स्वास्य और महंगाई आदि की बात करने वाला अम्बेडकरवाद और बसपा विरोधी माना जाने लगा। बसपा का प्रभाव 1990 के दशक में शुरू होता है और वही समय था जब निजीकरण की शुरु आत हुई। नरसिम्हा राव की पहली सरकार थी, जिसने निजीकरण की शुरुआत की और धीरे-धीरे गति तेज हो गई। ठेकेदारी प्रथा और आउटसोर्सिग जैसे तरीके अपनाकर सरकारी नौकरियां खत्म की जाती रही । मंडल कमीशन लागू होने के बाद एक मुहीम चल गई कि सरकारी विभाग निकम्मे और भ्रष्ट हो गए हैं इसलिए समस्याओं का समाधान निजीकरण है। 1993 में कोलेजियम सिस्टम के द्वारा उच्च न्यायपालिका में जजों की नियुक्ति होने लगी जिससे परिवारवाद, जातिवाद और क्षेत्रवाद बढ़ा। अभिजात्य वर्ग ने इस असंवैधानिक कार्य के खिलाफ कुछ नहीं किया क्योंकि यह उनके हित में था। संविधान में कहीं भी प्रावधान नहीं है कि जज ही जज को बनाएंगे। राजनैतिक दल गरीब, दलित, आदिवासी और पिछड़ा के खिलाफ नीति योजना स्वयं तो विरोध में बनवा नहीं सकते थे तो वह कार्य न्यायपालिका से करवाने लगे। सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए मंडल जजमेंट में अनुसूचित जाति का आरक्षण विषय नहीं था फिर भी जजों ने अपनी राय रखी, जिससे पांच आरक्षण विरोधी आदेश 1997 में जारी हुए। अनुसूचित जाति/जनजाति परिसंघ ने संघर्ष किया और अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने तीन संवैधानिक संशोधन करके इसे ठीक किया। यहां तक की 2007 में बहन मायावती मुख्यमंत्री बनीं, तब उनकी सरकार में अनुसूचित जाति/जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम 1989 में बड़ा संशोधन किया कि इस कानून का प्रयोग हत्या और बलात्कार में होगा, तब परिसंघ ने इलाहबाद हाईकोर्ट में याचिका दायर कर उस निर्देश को निरस्त कराया। पदोन्नित में आरक्षण का मुकदमा परिसंघ की पैरवी से 2006 में सुप्रीम कोर्ट में जीता जाता है और जब मायावती मुख्यमंत्री थी तो 4 जनवरी 2011 को लखनऊ हाईकोर्ट में पदोन्नित में आरक्षण इसलिए खत्म कर देती है कि उसकी पैरवी ठीक से नहीं हुई। स्पेशल कंपोनेंट प्लान, ट्राइबल सब प्लान कभी ईमानदारी से लागू नहीं किया गया। इस पर कभी कोई आवाज इनके तरफ से नहीं उठी। कार्यालय आदेशों से आरक्षण लागू होता रहा है, जबकि इसे कानून के शक्ल में बदल देना चाहिए था, लाखों खाली पद केंद्र सरकार से लेकर राज्य सरकार में लगातार खाली रहे हैं। उच्च न्यायपालिका में दलितों और पिछड़ों की भागीदारी नहीं के बराबर रही। सत्ता के सपने में दलित उपरोक्त भयंकर नुकसान को समझ नहीं पाया और बस एक ही धुन में लगे थे कि सत्ता आएगी तो सब ठीक हो जाएगा। नेतृत्व ने सोचने ही नहीं दिया कि जो अधिकार एक दिन में नहीं मिलते और ये रोजमर्रा के हिसाब से मिलते और छीनते भी हैं। अगर इस सोच के आधार पर चले होते तो उपरोक्त समस्याओं को लेकर संसद से सड़क तक जैसे अन्य पार्टयिां अपने मुद्दे पर लड़ती, ये भी लड़े होते। कितनी बड़ी त्रासदी है कि जब दलित आधारित पार्टी बनती है तो सामानांतर अधिकार छीनते जाते हैं और वह पार्टी बूथ स्तर पर सक्रिय होकर सांसद -विधायक बनाने में ही मस्त रहती है। सोच का अभाव कहें या स्वार्थ कि यह सोचना चाहिए था कि राजसत्ता कमजोर हो गई है, कुछ ताकत मीडिया के पास तो कुछ उच्च न्यायपालिका और कॉपरेरेट जगत के पास। सुप्रीम कोर्ट के दो जज का फैसला देश का कानून बन जाता है, जबकि संसद में कानून बनाना विधेयक पारित कराना बड़ी मुश्किल का काम है। हमारे ही देश में कुछ ऐसे वर्ग हैं, जो राजसत्ता में स्वयं ही सीधी भागीदारी नहीं चाहते फिर भी अपनी बाते मनवाते रहते हैं। दलितों को यह समझ लेना चाहिए कि जाति व्यवस्था खत्म होने वाली नहीं है। जाति व्यवस्था की मानसिकता यह होती है कि अपने से नीचे वाले को स्वाभाविक रूप से अपना नेतृत्व नहीं मानता, मजबूरी और स्वार्थ में तो कुछ भी होता रहता है। ब्राह्मण अपने को तीनों वर्णो से ऊपर समझता है, क्षत्रिय अपने से नीचे पिछड़ा वर्ग एवं दलित का नेतृत्व नहीं सह सकता। पिछड़ा अपने से नीचे दलित के साथ भी यही सोचता है और ऐसे में मजबूरी और खुदगर्जी न हो तो दलितों का और कोई नेतृत्व स्वीकार नहीं करेगा। इन परिस्थितयों में क्या दलित सत्ता पर काबिज हो सकेगा। पिछड़ा वर्ग अभी न इधर का है और न उधर का। ऐसे में जब तक सत्ता नहीं मिलती तो क्या सब कुछ खो दिया जाए? जितनी ताकत समाज ने बसपा को दी, अगर उसका एक चौथाई भी मुझे दिया होता तो अधिकार छीनने की बजाय और ज्यादा मिला होता। कम ताकत मिलने के बावजूद; मेरी उपलब्धियों की सूची लंबी है। बाबा साहेब के हाथ में खुद सत्ता नहीं थी, तब कैसे इतने अधिकार दिला सके? सत्ता की प्राप्ति की लड़ाई लड़ते रहना चाहिए। सड़क पर संघर्ष लगातार जारी रहे और अपने चुने हुए प्रतिनिधियों को रोकना नहीं बल्कि कहना चाहिए कि संसद और विधानसभा में लगातार मुद्दों को उठाएं।


सौजन्य – राष्ट्रीय सहारा।

Updated: June 13, 2018 — 3:10 pm

Leave a Reply

Your email address will not be published.

संपादकीय:Editorials (Hindi & English) © 2016