वह दिन जब दुनिया हिल उठी (हिन्दुस्तान)


अशोक पांडेय, वरिष्ठ पत्रकार
भिंची हुई मुट्ठियां और उठे हुए हाथ इतिहास लिखते हैं, चाहे वह 15 अगस्त,1947 का स्वर्णिम इतिहास हो या 6 दिसंबर, 1992 की स्याह इबारत। आज पूरे पच्चीस बरस हो गए बाबरी विध्वंस को। हो सकता है कि कुछ जमातें इसे ‘शौर्य’ और ‘काला दिवस’ के रूप में फिर मनाएं, कुछ इसे ‘क्रांति के उद्घोष’ की रजत जयंती भी बता सकते हैं, पर सच्चाई यह है कि 6 दिसंबर को जन्मे सांप्रदायिक उन्माद की आंधी ने विश्व के सबसे बड़े धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक राष्ट्र के सामने कई यक्ष प्रश्न खड़े कर दिए थे। वे सारे सवाल आज तक अनुत्तरित हैं। संपूर्ण ब्रह्मांड का भरण-पोषण और लालन-पालन करने वाले आदिनायक ‘रामलला’ इन तमाम सवालों का उत्तर खोजते-खोजते लगभग संज्ञाशून्य हो गए हैं। जिनकी कृपा से करोड़ों-करोड़ लोगों को सुख-संपदा प्राप्त होती है, वही आज ‘फटेहाल तिरपाल’ में जीवन जीने की विवशता झेल रहे हैं। जहां रोजाना सैकड़ों मन मिष्ठान का भोग लगता था, अगरू-धूप-चंदन से जन्मभूमि और आस-पास का क्षेत्र सुवासित रहता था, वहां अब दो समय दो-चार लड्डुओं का स्वाद चखाकर मर्यादा पुरुषोत्तम वहां रह रहे हैं। ‘रामलला हम आएंगे, मंदिर वहीं बनाएंगे’ का कलरव अब देश में कहीं सुनाई नहीं दे रहा है। वे आएंगे या नहीं, यह तो कोई नहीं बता सकता, पर देश के अवाम की रामलला से यही गुजारिश है कि 6 दिसंबर इस देश में दोबारा न आए।
महात्मा गांधी और इंदिरा गांधी की हत्या के बाद भी ऐसी सांप्रदायिक और जातीय ज्वाला नहीं भड़की थी, जैसी उस 6 दिसंबर ने भड़काई। देश ने एक बार फिर विनाश की विभीषिका देखी। 25 वर्ष बहुत होते हैं, लेकिन इतने वर्षों के बाद भी घाव हरे हैं, पीड़ा यथावत है। एक पीढ़ी गुजर गई है, नई पीढ़ी ने इस सांप्रदायिक विभीषिका को पढ़ा है, सुना है, पर सहा नहीं है, शायद इसी कारण पीड़ा के ये किस्से और चित्र उन्हें मनोरंजन देते हैं, चुभन नहीं देते। श्रीरामजन्मभूमि में उमड़ा जनसैलाब जब तरह-तरह के नारे लगा रहा था, तब ऐसा प्रतीत हो रहा था कि राष्ट्र की अस्मिता और सौहार्द खतरे में है। बाबरी मस्जिद के मलबे में अब ये नारें जमींदोज हो चुके हैं, अब यह ज्वालामुखी कभी न फूटे, तो अच्छा ही रहेगा। हम यह नहीं कह सकते कि संघ, भाजपा, विहिप या अन्य हिंदू संगठनों ने अच्छा किया या बुरा, पर यह तय है कि देश को इसका परिणाम भोगना पड़ा और यह भी उस मर्यादित चरित्र के नाम पर, जो विश्व कल्याण और समता-समरसता के सिद्धांत का ‘पुरुषोत्तम’ था। राम के भक्तों ने ‘रामलला’ का सर्वाधिक अहित किया। फटे टेंट में पता नहीं कैसे उनकी मर्यादा की रक्षा हो रही है?
अयोध्या में उस दिन जो कुछ हुआथा, वह स्वत: स्फूर्त था। नेताओं के मन में धूर्तता भले ही रही हो, पर धर्मभीरू भीड़ पर नियंत्रण नहीं था। धर्म के नाम पर जनता की भावनाओं से खेलना इस देश के लिए नया नहीं है। राजनीतिक लाभ की लड़ाइयों में आम आदमी हमेशा से ही इस्तेमाल होता रहा है। आज भी देश में जो सांप्रदायिक वैमनस्य है, उसके पीछे कोई बड़ा कारण नहीं है। लोगों को एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा किया जा रहा है, कहीं धर्म के नाम पर, तो कहीं जाति के नाम पर। हम धर्म की उपेक्षा नहीं करते। धर्म मनुष्य को पशु से देवता बना देता है, पर उसके नाम पर आज जो कुछ हो रहा है, वह धर्म कदापि नहीं। जब हम अखंड भारत का सपना देखते हैं, तो उसमें सांप्रदायिक उन्माद की इस दरार को भरना ही होगा, क्योंकि हम सभी को यहीं पर साथ-साथ रहना है और साथ-साथ ही आगे बढ़ना है।
इसमें कोई दो राय नहीं है कि भगवान राम विश्व की एक-तिहाई आबादी के आराध्य हैं। इसी तरह इसमें भी ज्यादा संशय नहीं है कि उनका जन्म अयोध्या में हुआ था। वैदिक गणना और ज्योतिष रत्नाकर के अनुसार श्रीराम का जन्म ईसा से 1,25,56,100 वर्ष पूर्व 24वें त्रेता युग में चैत्र शुक्ल नवमी को हुआ था। रामायण के रचनाकार महर्षि वाल्मीकि अब तक के 28 व्यासों में से 24वें व्यास हैं। मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम भारतीय जनमानस ही नहीं, संपूर्ण विश्व की आस्था के केंद्र हैं। उनकी लीला और कथा, दोनों ही सुखदायिनी, हर्ष प्रदायिनी हैं। वे चाहे तुलसी के राम हों या कबीर के, उनका हर आचरण मानव मात्र के लिए कल्याणकारी प्रेरणा है। जीवन में राम का महत्व तो है ही, मृत्यु के उपरांत भी ‘राम नाम सत्य है’ की प्रासंगिकता है। राम आदर्शों और सिद्धांतों के समुच्चय का नाम है। गोस्वामी जी ने लिखा है, राका रजनी भगति तव राम नाम सोई सोय अर्थात राम ही चंद्रमा हैं, उनकी भक्ति चांदनी रात है। मुसलमानों के हर पुण्य कार्य की शुरुआत चंद्र दर्शन से होती है। हिंदू बच्चों के मामा हैं चांद। इस लिहाज से राम को सांप्रदायिक एकता और सौहार्द का सबसे बड़ा प्रतीक होना चाहिए। कबीर ने राम के चार रूपों का वर्णन किया है, एक राम घट-घट में बोले, दूजो राम दशरथ घर डोले, तीसर राम का सकल पसारा, ब्रह्म राम है सबसे प्यारा। कबीर राम के एकत्व बोध की ओर इशारा करते हैं। राम ही सर्वोच्च है, उनके बिना जगत नि:सार है।
बाबरी विध्वंस की 25वीं बरसी पर वे सारे सवाल अब भी अपनी जगह हैं, जो 25 साल पहले खड़े हुए थे या उसके भी पहले से मौजूद थे। इस बीच सर्वाेच्च न्यायालय में अयोध्या विवाद पर फिर से सुनवाई आरंभ हो चुकी है। वैसे पिछले 133 साल से मंदिर का यह मुकदमा चल रहा है। अब तक की गई सभी कोशिशें नाकाम हुई हैं। धर्म और आस्था का प्रश्न मानव मन की निजता से जुड़ा है, न्यायालय का फैसला क्या होगा, यह वक्त जाने, पर उसे कौन और कैसे मानेगा, यह तो ‘रामलला’ ही तय करेंगे। बस खुदा करे कि देश को एक और 6 दिसंबर 1992 न देखना पड़े।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

सौजन्य – हिन्दुस्तान।


Updated: December 6, 2017 — 10:11 am

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