पुनर्सतुलन की कोशिश (राष्ट्रीय सहारा)


अरब दुनिया और भारत के बीच इतिहास से वर्तमान तक संबंधों में निरंतरता बनी हुई है। लेकिन बावजूद इसके संबंधों में निकटता व खिंचाव का अक्स देखा जा सकता है। विचार करने की जरूरत है कि खिंचाव हमारी विदेश नीति में मौजूद खामियों का हिस्सा हैं, या नियंतण्र कूटनीति में होने वाले परिवर्तनों के साथ संतुलन न बनने का परिणाम? यह भी है कि भारत फॉर्वड एवं फास्ट ट्रैक पर चले या संतुलन की विदेश नीति पर? वैश्वीकरण के युग में नियंतण्र राजनय में दो विकल्प मान्य होते दिख रहे हैं-प्रथम चीन की चेक डिप्लोमेसी और द्वितीय अमेरिका का पावर गेम। भारत इनका अनुसरण करे या फिर कोई तीसरा विकल्प खोजे?प्रधानमंत्री की खाड़ी के तीन देशों-फिलस्तीन, यूएई और ओमान की चार दिन की यात्रा के दौरान भारत और खाड़ी देशों के बीच व्यापार, निवेश, सुरक्षा, आतंकवाद के खिलाफ सहयोग, ऊर्जा समेत कई महत्वपूर्ण द्विपक्षीय संबंधों को एक नया आयाम तो दिया ही जाना था, और इसके साथ ही संबंधों में पुनर्सतुलन स्थापित करने के साथ-साथ क्षतिपूरक प्रभाव वाली व्यवस्था भी करनी थी। इस यात्रा की शुरुआत में प्रधानमंत्री रामल्ला (फिलस्तीन) पहुंचे। दोनों देशों के बीच पांच करोड़ डॉलर यानी करीब 325 करोड़ रुपये के छह समझौते हुए। प्रधानमंत्री ने संयुक्त बयान में स्पष्ट किया कि भारत फिलस्तीन की शांति और संप्रभुता के लिए प्रतिबद्ध है। लेकिन फिलस्तीन सिर्फ इतने की अपेक्षाएं यहीं तक सीमित नहीं हैं। गौर से देखें तो प्रधानमंत्री की फिलस्तीन यात्रा उनकी इस्रयल यात्रा से उपजे प्रभावों की क्षतिपूर्ति करने का प्रयास करती नजर आ रही है। फिलस्तीन भारत केवल आवासन ही नहीं चाहता, बल्कि उसकी अपेक्षा है कि भारत इस्रयल पर राजनैतिक दबाव बनाए और यरुशलम में इस्रयल द्वारा अवैध बस्तियों के निर्माण के बारे में कुछ कहे। दरअसल, भारत के सामने यहां पर बड़ा प्रश्न है कि अपनी रक्षा और सुरक्षा को पुख्ता करने तथा हिन्द महासागर में चीनी ताकत को काउंटर करने के लिए इस्रयल के साथ रणनीतिक साझेदारी स्थापित करे, अपनी कृषि अर्थव्यवस्था के सुधार में इस्रयल से सहयोग ले या फिलस्तीन को उसका मौलिक अधिकार दिलाने के लिए इस्रयल पर दबाव बनाए। भारत इस फ्रंट पर कुछ कदम आगे और कुछ पीछे हटने की नीति पर चल रहा है। ध्यान रहे कि कुछ समय पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने यरुशलम को इस्रयल की राजधानी मानने की घोषणा की थी, और संयुक्त राष्ट्र में को लेकर वोटिंग हुई तो भारत ने फिलस्तीनियों के पक्ष में मत दिया था। जुलाई, 2015 में भारत ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में इस्रयल के खिलाफ ¨नदा प्रस्ताव की वोटिंग से ख़ुद को अलग रखा जबकि इस्रयल चाहता था कि भारत प्रस्ताव का समर्थन न करे। फिलहाल, इन दोनों मुद्दों पर इस्रयल भारत से नाराज हुआ था। प्रधानमंत्री जब इस्रयल गए थे, तो कुछ घंटों के लिए फिलस्तीन जा सकते थे लेकिन सिर्फ इसलिए नहीं गए कि इस्रयल को खुश करना था। अब उन्हें फिलस्तीन जाना पड़ा। हालांकि प्रधानमंत्री मोदी पिछले वर्ष जब इस्रयल यात्रा पर गए थे तब स्पष्ट किया गया था कि भारत का इस्रयल और फिलस्तीन के साथ रिश्ता ‘‘डी-हाइफनेटेड’ हो जाएगा यानी दोनों देशों के साथ हम अलग-अलग और स्वतंत्र रूप से संबंध बनाए रखेंगे।यूएई में 26 लाख भारतीय मुसलमानों की मजबूत और बड़ी आबादी, जो यूएई की आबादी की करीब 30 प्रतिशत है, के बावजूद भारत लंबे समय तक अच्छी साझेदारी नहीं कर सका। ध्यान रहे कि 1970 के दशक से अरब देशों का जिस तरह से इस्लामीकरण हुआ और पाकिस्तान ने जिस तरह से उसका लाभ उठाया, वह भारत के लिए नुकसानदेह साबित हुआ। भारत और संयुक्त अरब अमीरात ने 2017 में व्यापक रणनीतिक साझेदारी समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। अब और 12 समझौतों पर हस्ताक्षर हुए हैं, जिससे दोनों के पारस्परिक लाभ के रिश्तों को और गति मिलेगी। यहीं पर प्रधानमंत्री ने ‘‘र्वल्ड गवर्नमेंट समिट’ के छठे संस्करण में हिस्सा लिया जहां उन्होंने मानवता और प्रति के सह-अस्तित्व पर र्चचा की तथा ‘‘6 आर’ का मंत्र दिया, जैसा कि वे प्राय: देते हैं। इस 6 आर में एक आर-रिडय़ूस (कम करना) है, दूसरा-रीयूज (दोबारा उपयोग), तीसरा-रिसाइकिल (पुनर्चक्रण), चौथा-रिकवर (सुधार लाना), पांचवां-रिडिजाइन (दोबारा डिजाइन करना) और छठा- रि-मैन्युफैक्चर (पुनर्विनिर्माण)।जहां तक ओमान का सवाल है तो ओमान भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। उल्लेखनीय है कि जब ओमान के सुल्तान कबूस बिन सैद अल-सैद ने जुलाई, 1970 में सत्ता अपने हाथों में ली तो उस समय दो ही देशों के साथ उनके कूटनीतिक रिश्ते बने थे, और ये देश थे-भारत और ब्रिटेन। लेकिन ईरानी क्रांति के बाद ओमान इस्लामी शासन के प्रभाव से बचना चाहता था क्योंकि उसकी आबादी में 40 फीसदी सुन्नी हैं। इसलिए उसने सऊद अरब और ईरान के बीच खिंची विभाजक रेखा के एक तरफ होना स्वीकार कर लिया यानी ईरान के साथ चला गया। खास बात यह रही कि ओमान पाकिस्तान के साथ संबंध रखने के बावजूद भारत के पक्ष में रहा। लेकिन पिछले डेढ़ दशक में भारत और ओमान के बीच दूरियां बढ़ गई। मोटे तौर पर इसलिए कि भारत की ओमान के प्रति उदासीनता और अवहेलना रही। फिलहाल, प्रधानमंत्री की यात्रा में रिफॉर्म, रिबैलेंसिंग, रिअवेकनिंग और रिबॉण्डिंग जैसी विशेषताएं दिख रही हैं, जो प्रतिफलित होती हैं, तो भारत लाभांश की स्थिति में रहेगा। भारत की जरूरत भी है कि खाड़ी देशों से रिश्तों के बॉण्ड मजबूत कर हिन्द महासागर में उभरने वाली चुनौतियों को काउंटर करने की रणनीति पर चले। जरूरी है कि इंडियन ओशियन रिम एसोसिएशन (इंडियन ओशियन रिम इनीशिएटिव) को (विशेषकर ओमान व संयुक्त राज्य अमीरात जैसे सदस्यों के संदर्भ में) सुधार के जरिए ऐसा मंच बनाने की कोशिश हो जिससे भारत को हिन्द महासागर में शक्ति संतुलन स्थापित करने और बढ़ने का अवसर मिले।


सौजन्य – राष्ट्रीय सहारा।

Updated: February 13, 2018 — 9:42 pm

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