असुरक्षित जेलें (जनसत्ता)


उत्तर प्रदेश के बागपत जेल में कुख्यात मुन्ना बजरंगी की हत्या से एक बार फिर यह सवाल पैदा हुआ है कि जिन जेलों को उच्च स्तरीय सुरक्षा के दायरे में माना जाता है, वहां इतनी बड़ी लापरवाही कैसे बरती जाती है। आमतौर पर बड़े और खतरनाक अपराधियों को कैद में रखने वाले बैरकों पर विशेष नजर रखने की बात कही जाती है। लेकिन हैरानी है कि बागपत जेल के बैरक में मुन्ना बजरंगी के साथ बंद एक कैदी बंदूक ले गया और उसे छिपा कर रखने में कामयाब रहा। खबरों के मुताबिक उसी कैदी ने मौका पाते ही मुन्ना बजरंगी पर दस गोलियां चलार्इं, जिससे उसकी मौत हो गई। सवाल है कि खतरनाक प्रकृति के जिन अपराधियों को एक साथ एक बैरक में बंद रखा गया था, क्या जेल प्रशासन को उनके बारे में अंदाजा नहीं था कि वे क्या कर सकते हैं! जेल के मुख्य दरवाजे से भीतर जाने वाले हर व्यक्ति की जांच की जाती है और कोई भी संवेदनशील चीज अंदर ले जा पाना संभव नहीं है। फिर वहां अपने बैरक तक एक अपराधी बंदूक ले जाने में कैसे कामयाब हो गया? हालांकि देश की अन्य जेलों से भी मोबाइल, चार्जर या शराब जैसी कई चीजों की बरामदगी की खबरें आती रही हैं। लेकिन बंदूक कोई ऐसी चीज नहीं है, जिसे किसी जेल कर्मचारी या सुरक्षाकर्मी की मिलीभगत के बिना परिसर में आसानी से ले जाया जा सके!

पिछले कुछ समय से उत्तर प्रदेश सरकार का दावा रहा है कि वह अपराधियों पर लगाम लगाने के लिए हर स्तर की सख्ती बरतेगी। लेकिन जब जेल में बंद कैदियों की सुरक्षा व्यवस्था का आलम यह है कि एक कुख्यात माफिया की हत्या हो जाती है, तो बाकी जगहों पर कानून-व्यवस्था के दावे पर कितना भरोसा किया जाए! यह अलग बात है कि मुन्ना बजरंगी खुद ही अपराध की दुनिया का एक कुख्यात नाम था। लेकिन उसके पकड़े जाने के बाद उसे सजा के अंजाम तक पहुंचाने तक उसकी सुरक्षा सुनिश्चित करना सरकार और जेल-प्रशासन की जिम्मेदारी थी। हाल ही में मुन्ना बजरंगी की पत्नी ने भी यह आशंका जताई थी कि उसके पति की हत्या हो सकती है। इस आशंका के मद्देनजर मुन्ना बजरंगी की सुरक्षा पर निगरानी ज्यादा सख्त क्यों नहीं की गई? अब लापरवाही के आरोप में जेल अधीक्षक और कुछ अन्य जेलकर्मियों को निलंबित कर दिया गया है, लेकिन इस घटना ने वहां मौजूद कई स्तरों की खामियां उजागर कर दी हैं।


किसी भी अपराध में शामिल व्यक्ति को गिरफ्तार कर जेल में रखना और अदालत के जरिए सजा दिलाना सरकार और उसके संबंधित महकमों की जवाबदेही होती है। हर स्तर पर कानूनी प्रक्रिया का पालन इसलिए भी सुनिश्चित किया जाता है, ताकि आम जनता का न्यायिक व्यवस्था पर विश्वास बहाल रहे। लेकिन अगर सुरक्षित जेलों में बंद किसी कुख्यात अपराधी को भी इस तरह मार डाला जाता है तो क्या इसे न्यायिक प्रक्रिया के बाधित होने के रूप में नहीं देखा जाएगा? आखिर जेलों के भीतर खूंखार अपराधियों को विशेष सुरक्षा घेरे और निगरानी में लापरवाही क्यों बरती जाती है? जो सामान जेल के भीतर ले जाना प्रतिबंधित है, उसे लेकर कोई व्यक्ति कैसे चला जाता है? यह ध्यान रखने की जरूरत है कि जेलों में निर्धारित क्षमता से काफी ज्यादा संख्या में कैदियों को रखा जाना, संसाधनों की हालत, अधिकारियों से लेकर सुरक्षाकर्मियों तक के स्तर पर बरती जाने वाली लापरवाही जैसी तमाम वजहें भारतीय जेलों को असुरक्षित बनाती हैं। न्यायिक प्रक्रिया की राह में बाधा पैदा करने वाली इस स्थिति में तत्काल सुधार की जरूरत है।

सौजन्य – जनसत्ता।



Updated: July 11, 2018 — 10:22 am

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