Day: September 10, 2019

भारत को अरबपति नहीं, लखपति चाहिए (प्रभात खबर)

प्रभु चावला एडिटोरियल डायरेक्टर द न्यू इंडियन एक्सप्रेस जब बाजार एवं अर्थ-केंद्रित अर्थशास्त्रियों द्वारा धकेली आपूर्ति मांग से आगे निकल जाती है, तो 116 वर्षों पुराना एक आर्थिक सिद्धांत उनके प्रवचन का सर्वप्रमुख उद्देश्य बन जाता है- ‘बीमार भारतीय अर्थव्यवस्था हेतु सुधारों के लिए दबाव दो, मगर पुराने नुस्खों के इस्तेमाल पर जोर डालो.’ वर्ष...

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हांगकांग का संकट (पत्रिका)

सरकारें चाहे लोकतंत्र की हो अथवा राजतंत्र की, जनता से बड़ी नहीं हो सकतीं। आज सरकारें अपनी-अपनी हुकुमतों को कानूनी जामा पहनाकर स्थायी रूप देने का प्रयास कर रही हैं। कुछ वर्षों बाद यह भ्रम भी दूर हो जाता है। जनता ही जनार्दन है। सत्ता का अंहकार ही भ्रम दूर करने का माध्यम बनता है।...

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चौपाल: इंटरनेट की लत, मुफ्त का नुकसान व बड़ा कदम (जनसत्ता)

‘देश में प्रतिदिन 1.5 जीबी का इंटरनेट डेटा युवाओं को उनकी बेरोजगारी का अहसास नहीं होने दे रहा है!’ इस गंभीर बात के स्पष्ट रूप से दो पहलू हैं। एक तरफ देश में तेजी से बेरोजगारी बढ़ रही है तो दूसरी तरफ युवाओं की एक बड़ी संख्या ‘साइबर एडिक्शन’ यानी इंटरनेट के आभासी संसार में...

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दुनिया मेरे आगे: मुक्ति का सफर (जनसत्ता)

कविता भाटिया पिछले दिनों पारिवारिक आयोजन के दौरान मेरा एक रेस्तरां में जाने का संयोग बना। उस दौरान मैंने बदलती हुई एक नई सामाजिक प्रवृत्ति को देखा। लगभग आठ-दस महिलाएं जिनकी उम्र पचास से सत्तर वर्ष के बीच रही होगी, वे रेस्तरां के कोने में बड़ी टेबल पर आपस में मिल-जुल कर खा-पी रही थीं,...

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संपादकीय: अशांति का रास्ता (जनसत्ता)

तालिबान और अमेरिका के बीच शांति वार्ता का टूटना अफगानिस्तान के लिए फिर एक बुरे दौर की वापसी का संकेत है। अब तक यह उम्मीद बनी हुई थी कि आने वाला वक्त अफगान लोगों के लिए जल्द ही कोई अच्छी खबर लेकर आने वाला होगा। लेकिन अब इन उम्मीदों पर पानी फिर गया लगता है।...

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संपादकीय: जमीन का जीवन (जनसत्ता)

पिछले कुछ दशकों के दौरान हमारे देश में खेती के लगातार घाटे का सौदा होने की समस्या पहले ही गंभीर होती गई है। इससे इतर एक बड़ी मुश्किल यह खड़ी हो गई है कि तेजी से शहरीकरण और ग्रामीण इलाकों में भी रिहाइशी इलाकों के विस्तार की वजह से जिस तरह खेती-योग्य जमीन का रकबा...

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संपादकीय: गरीबों की बिगड़ती सेहत (जनसत्ता)

पंकज चतुर्वेदी चिकित्सा सेवा के मामले में भारत के हालात श्रीलंका, भूटान और बांग्लादेश से भी बदतर हैं। अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य पत्रिका ‘लांसेट’ की ताजा रिपोर्ट ‘ग्लोबल बर्डन आफ डिजीज’ में बताया गया है कि स्वास्थ्य सेवाओं के मामले में भारत दुनिया के एक सौ पनच्यानवे देशों की सूची में एक सौ पैंतालीसवें स्थान पर है।...

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Belated realisation: On Trump’s peace negotiation with Taliban (The Hindu)

In a dramatic set of posts on Twitter, U.S. President Donald Trump announced the cessation of peace negotiations with the Taliban while also revealing that the insurgent group’s representatives were to have participated in secret talks at the Camp David retreat in Maryland. This is yet another instance of the stock that the maverick President...

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A controversial transfer: On Tahilramani’s transfer (The Hindu)

The unusual transfer of the Chief Justice of the Madras High Court, Justice Vijaya Kamlesh Tahilramani, to Meghalaya High Court has caused understandable disquiet among lawyers. While the Constitution does provide for such transfers from one high court to another, it is extremely rare that the senior-most Chief Justice in the country is shifted from...

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भरोसे के बावजूद पुलिस का डर (अमर उजाला)

शाकिब अयाज भारतीय पुलिस, जिसकी स्थापना 1843 में हुई और जो अब भी काफी हद तक ब्रिटिश कालीन भारतीय पुलिस अधिनियम, 1861 के अनुसार काम करती है, भारत के वर्ग, जाति, लिंग और धार्मिक विविधता के साथ तालमेल बिठाने के लिए संघर्ष कर रही है। इसका कारण प्रशिक्षण, संवेदनशीलता का अभाव और/या स्टेटस ऑफ पुलिसिंग...

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