Day: April 30, 2019

टिक-टाॅक गणतंत्र में परतंत्रता (दैनिक ट्रिब्यून)

आलोक पुराणिक टिक-टाॅक सिर्फ घड़ी की आवाज नहीं है, यह गणतंत्र है करीब पचास करोड़ लोगों का। टिक-टाक मोबाइल एप्लीकेशन है, पचास करोड़ लोग इसे नियमित तौर पर प्रयोग करते हैं। यह इंडिया में चलेगा या नहीं, यह घणा महत्वपूर्ण सवाल हो लिया है। कभी इस पर बैन लग जाता है, कभी बैन उठ जाता...

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सबसे तेज अर्थव्यवस्था का सच (दैनिक ट्रिब्यून)

भरत झुनझुनवाला वर्ष 2014 में भाजपा ने आर्थिक विकास के मुद्दे पर चुनाव जीते थे। भाजपा का कहना था कि कांग्रेस में निर्णय लेने की क्षमता नहीं रह गयी थी। भाजपा अर्थव्यवस्था को तेजी से आगे बढ़ाएगी, जिससे कि तमाम रोजगार उत्पन्न होंगे। बीते समय में तमाम अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं ने भारत को शाबासी भी दी...

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जाति और जनतंत्र (नवभारत टाइम्स)

विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत के चुनाव को हमेशा उत्सुकता से देखा जाता रहा है, लेकिन इस बार मामला कुछ ज्यादा खास है। भारतीय चुनावों में अमेरिका, इंग्लैंड और विभिन्न यूरोपीय देशों की ज्यादा दिलचस्पी देखी गई है। लेकिन इस बार दक्षिण-पूर्वी एशिया और खाड़ी इलाके के कई देश इसमें काफी रुचि ले रहे...

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किसान की कसक (दैनिक ट्रिब्यून)

बौद्धिक संपदा के अंतर्राष्ट्रीय कानून का डर दिखाकर बहुराष्ट्रीय कंपनी पेप्सिको ने गुजरात के आलू किसानों पर भारी-भरकम दावा ठोककर अदालत के चक्कर काटने पर मजबूर कर दिया है। किसानों में इससे बेचैनी है। तकरीबन 193 किसान नेताओं, नागरिक प्रतिनिधियों और कार्यकर्ताओं के एक समूह ने केंद्र व राज्य सरकार से किसानों के समर्थन में...

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Newspeak on poverty (The Indian Express)

Written by Christophe Jaffrelot Populists always claim that they work for the poor. The cause of the poor was already at the heart of Indira Gandhi’s rhetoric in the 1970s, when in answer to those who were chanting “Indira hatao!”, she came back with the slogan “Garibi hatao!”. Narendra Modi also seeks to exploit this...

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धार्मिक पहचान से त्रस्त सभ्य समाज: मानवीय मूल्यों का मजहब से कोई लेना-देना नहीं है (दैनिक जागरण)

[ तसलीमा नसरीन ]: कोई कह रहा था कि श्रीलंका में खून की नदियां बहीं। 253 लोगों की मौत और 500 लोगों के जख्मी होने से जो खून बहता है वह बहुत हद तक नदी की तरह ही दिखता है, लेकिन यह हत्याकांड क्यों? मनुष्यों को आखिर इतनी घृणा क्यों है? किसने किसका क्या बिगाड़ा...

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पूंजी की कठपुतली बनी राजनीति: धनबल और बाहुबल पर आत्मबल और नैतिकबल अधिक भारी (दैनिक जागरण)

[ डॉ. पुष्कर मिश्र ]: इन दिनों विश्व का सबसे बड़ा चुनाव भारत में चल रहा है। मानव इतिहास का यह सबसे बड़ा और महंगा चुनाव होने जा रहा है। माना जा रहा है कि 2016 के अमेरिकी चुनावों की तुलना में 2019 के भारतीय चुनाव डेढ़ गुने अधिक महंगे होने जा रहे हैं, जबकि...

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जाति आखिर जाती क्यों नहीं? भारतीय राजनीति आज मुद्दों से अधिक छोटे प्रपंचों में फंसती जा रही है (दैनिक जागरण)

[ गिरीश्वर मिश्र ]: भारतीय समाज कई खांचों में विभाजित है। इसी में एक अहम विभाजक रेखा जाति भी है। जाति का सीधा अर्थ समूह, विशेषता या गुण होता है। इसी अर्थ में फूल, पशु, पक्षी, अनाज, फल तथा सब्जी आदि की जाति जानी और पहचानी जाती है। जाति एक तरह की भेदक विशेषता का...

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भारत के लिए अच्छा संदेश नहीं कि बांग्लादेश के बाद एक और पड़ोसी देश में आइएस के आतंक ने दी दस्तक (दैनिक जागरण)

[ संजय गुप्त ]: पिछले रविवार को श्रीलंका में दिल दहलाने वाले बम धमाकों के बाद दक्षिण एशिया एक बार फिर खुद को असुरक्षित महसूस कर रहा है। इन धमाकों में करीब ढाई सौ लोग मारे गए और पांच सौ लोग घायल हुए। इस भीषण आतंकी हमले के लिए स्थानीय संगठन नेशनल तौहीद जमात यानी...

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चुनाव आयोग जिम्मेदार: पश्चिम बंगाल में केंद्रीय बलों की तैनाती के बावजूद चुनावी हिंसा और धांधली (दैनिक जागरण)

यह गहन चिंता का विषय है कि पश्चिम बंगाल चुनावी हिंसा से मुक्त होने का नाम नहीं ले रहा है। इस राज्य में मतदान के चौथे चरण के दौरान भी जिस तरह कई स्थानों पर हिंसा और धांधली देखने को मिली उससे यही स्पष्ट हो रहा है कि चुनाव आयोग अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह सही...

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