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-Rajeev Kumar (Editor-in-chief)

Tuesday, February 2, 2021

आखिर आ गया भारतीय जनता पार्टी का 'अपना बजट' (बिजनेस स्टैंडर्ड)

शेखर गुप्ता  

इस बार का बजट पिछले 30 वर्षों में भारत की राजनीतिक अर्थव्यवस्था में पहला बड़ा बदलाव लेकर आया है। यह बदलाव सही दिशा में भी है। यह वैचारिक स्तर के अलावा समझदारी के स्तर पर भी सही है। अगर इसे सियासी अंदाज में कहा जाए तो यह मोदी सरकार के समय पेश किया गया 'पहला भाजपाई बजट' है। अभी तक पेश किए गए सारे बजट में कांग्रेस की नीतियों में ही थोड़ा हेरफेर था।  

यह फैशन हो चुका है कि भारत की तमाम समस्याओं के लिए 1991 के सुधारों को जिम्मेदार ठहरा दिया जाए। दूसरी तरफ भारत का अभिशाप यह है कि सुधारों के पल बहुत कम रहे हैं। यही वजह है कि जब भी कोई सुधार दिखता है तो हम उसे स्वप्निल बजट कहने लगते हैं।


1991 के सुधारों के बाद 1997-98 में वामदलों के समर्थन से चल रही देवेगौड़ा सरकार में पी चिदंबरम वित्त मंत्रालय संभाल रहे थे। उस सरकार में इंद्रजित गुप्ता एवं चतुरानन मिश्रा जैसे वरिष्ठ वाम नेता गृह और कृषि जैसे अहम मंत्रालय संभाल रहे थे।


अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के परवर्ती 'इंडिया शाइनिंग' काल में यशवंत सिन्हा और जसवंत सिंह ने भी तीन बजट पेश किए थे। तमाम गतिरोधों और सीमा शुल्क एवं कर कटौतियों के बावजूद वह एक बढिय़ा दौर था। हालांकि सर्वोच्च न्यायालय के एक फैसले ने निजीकरण की रफ्तार रोक दी थी। नरसिंह राव और मनमोहन सिंह के समय आर्थिक सुधारों का सिलसिला करीब 18 महीनों में ही रुक गया, चिदंबरम ने एक साल ही ऐसा किया था। वाजपेयी को 2004 में मिली औचक शिकस्त के बाद बनी संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) की नई सरकार ने समावेशी विकास के नए समीकरण को अपना लिया। उस चुनावी नतीजे का यही मतलब निकाला गया था कि भारत के गरीबों ने आर्थिक प्रगति पर वाजपेयी सरकार के जोर को नकारते हुए कांग्रेस को मत दिया है। किसी ने भी इस बात पर गौर नहीं किया कि कांग्रेस और भाजपा दोनों के बीच सिर्फ सात सीटों का अंतर था।


लेकिन संप्रग सरकार का दूसरा कार्यकाल आने तक भारत में मौजूद हरेक समस्या के लिए वृद्धि को ही जिम्मेदार ठहराया जाने लगा और गरीबों की दुर्दशा के लिए भी वही दोषी माना गया। उस सरकार ने शिक्षा, खाद्य एवं रोजगार के अधिकार देने वाले कानून भी पारित किए थे। रहम की बात है कि संप्रग सरकार इतना नहीं चली कि सोनिया गांधी एवं राष्ट्रीय सलाहकार परिषद बढिय़ा मॉनसून और क्रिकेट में जीत की गारंटी देने वाले कानून भी बना दे।  


ये सरकारें कह सकती थीं कि उनके पास बहुमत नहीं है। वैसे नरेंद्र मोदी को मतदाताओं ने दो बार बहुमत देकर इस तर्क से वंचित कर दिया था। मोदी ने भूमि अधिग्रहण संशोधन विधेयक को लोकसभा में पारित कराते हुए पहला बड़ा कदम उठाया था। फिर उन पर 'सूट बूट की सरकार' चलाने का आरोप लगा और मोदी ने अपने कदम पीछे खींच लिए। इस वजह से बड़े सुधार छह वर्षों तक खयाल में भी नहीं आए। नोटबंदी ने हालात को और भी बिगाड़ दिया।


मोदी को महामारी की वजह से उपजे हालात से मदद मिली और इस बजट ने घड़ी को पीछे कर दिया। एक लोकतंत्र में स्वास्थ्य एवं शिक्षा से लेकर रक्षा, अर्थव्यवस्था, कल्याण एवं बाजार तक सब कुछ राजनीति से ही तय होता है। एक लोकतंत्र में अर्थव्यवस्था का प्रबंधन एवं दिशा राजनीति ही तय करती है।  


आप अब तरकीब से सुधार नहीं कर सकते हैं। बगीचे में नीचे लटक रहे सारे फलों को पहले ही तोड़ा जा चुका है। इसके उलट मोदी के पहले छह वर्षों में कुछ पुरानी बुरी आदतें भी लौट आई हैं- अफसरशाही नए सिरे से ताकतवर हुई है, आयात नियंत्रण एवं सीमा शुल्क का संरक्षणवादी रवैया और कर दरों की अनिश्चितता।


अर्थशास्त्री एवं लोक वित्त विशेषज्ञ ही बजट के बारीक बिंदुओं को समझ पाएंगे। मेरा नजरिया तो राजनीतिक है। मैं इसे भारत की राजनीतिक अर्थव्यवस्था में एक बदलाव के तौर पर देखता हूं। इस बजट में सबसे अच्छी खबर यह है कि कराधान पर कोई खबर नहीं है। सभी कर दरें पुराने स्तर पर ही हैं। यह एक प्रगति है और यह राजनीतिक है।


सैकड़ों बुरे खयाल चर्चा में थे। कर दरों में बढ़ोतरी, संपत्ति जब्त करने, असफल हो चुके उत्तराधिकार एवं संपत्ति करों की वापसी, अप्राप्त पूंजी लाभ पर भी कर लगाने जैसे प्रस्तावों का जिक्र हो रहा था। प्रतिष्ठित क्षेत्रों में उन विचारों पर अधिक जोर था। अगर बजट में इन खयालों पर अमल किया गया होता तो एक दिन बाद हम बजट को किस रूप में देख रहे होते?


मोदी सरकार एक बात को लेकर खासी ईमानदार है कि वह अर्थशास्त्रियों की नहीं सुनती है। इस मामले में अच्छा ही है कि उसने उनकी नहीं सुनी। इसका कारण यह है कि अर्थशास्त्रियों को बजट के बाद जवाबदेह नहीं होना पड़ता है। जवाब नेताओं को देना पड़ता है। आप पसंद करें या नहीं लेकिन मोदी सरकार ने यह अलहदा राजनीतिक फैसला लिया है।


कई दशकों तक भारत वृद्धि बनाम असमानता के द्वंद्व में उलझा रहा है। यह एक बनावटी बहस है। क्योंकि अगर वृद्धि से अधिक असमानता पैदा होती है तो वृद्धि का अभाव क्या करता है? वृद्धि से अमीर और धनवान बनता है लेकिन क्या इससे गरीब और भी गरीब हो जाता है? अमीर तो उस समय भी बढिय़ा स्थिति में होते हैं जब वृद्धि तेजी से कम हो रही होती है। महामारी के साल में करोड़ों लोगों के बेरोजगार होने के बीच भी कुछ अरबपतियों की संपत्ति बढऩे पर दुनिया भर में मचे रोने-धोने को ही देख लीजिए।


इस बजट का सियासी संकेत यह है कि मोदी सरकार अब अधिक राजस्व के लिए वृद्धि पर दांव लगा रही है। मैं वॉल स्ट्रीट में प्रकाशित माइकल डगलस गॉर्डन गेक्को के लेख में कुछ बदलाव करते हुए अपनी बात रखना चाहूंगा-- बात यह है कि किसी बेहतर शब्द के अभाव में वृद्धि अच्छा है। वृद्धि ठीक है और यह कारगर है। वृद्धि विकासवादी भावना के सार को अपनाती है। जिंदगी, प्यार एवं पैसे जैसे अपने तमाम रूपों में वृद्धि ने मानवता को उन्नत ही किया है।

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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