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-Rajeev Kumar (Editor-in-chief)

Wednesday, January 20, 2021

नेपाल को संदेश और सहयोग (हिन्दुस्तान)

पुष्परंजन, संपादक, ईयू-एशिया न्यूज 


नेपाल के विदेश मंत्री प्रदीप ज्ञावाली काठमांडू के त्रिभुवन अंतरराष्ट्रीय विमान स्थल पर शनिवार को जैसे ही उतरे, पत्रकारों का सबसे पहला सवाल था, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आपसे मिले क्यों नहीं? ज्ञावाली ने इसका जवाब न देकर 15 जनवरी, 2021 को भारत-नेपाल संयुक्त आयोग की छठी बैठक में क्या कुछ हुआ, उसकी प्रमुख बातें बताकर पत्रकारों से पीछा छुड़ाया। नेपाली विदेश मंत्री ने यह जरूर जोड़ा कि भारतीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह से मैं मिला, और सुरक्षा सहयोग पर चर्चा के साथ कालापानी पर भी मैंने नेपाल का पक्ष रखा। इतना बयान दे देने भर से यह विषय नेपथ्य में नहीं गया है। विक्रम और वेताल की तरह बात वहीं आ जाती है कि प्रधानमंत्री मोदी मिले क्यों नहीं? नेपाली अखबारों के संपादकीय, वहां का सोशल मीडिया, समवेत स्वर में यह टिप्पणी कर रहे हैं, ‘21 अगस्त, 2019 को भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर जब पांचवीं बैठक के वास्ते काठमांडू आए थे, तब प्रधानमंत्री ओली से भेंट हुई थी। प्रधानमंत्री मोदी ने समय न देकर नेपाल के राष्ट्राभिमान को आहत किया है।’ इससे यही प्रतीत होता है कि सातवीं बैठक काठमांडू में हुई, तो वहां के राष्ट्रवादियों का प्रयास होगा कि नेपाल के प्रधानमंत्री भारतीय विदेश मंत्री को मिलने का समय न दें।

लेकिन क्या यह प्रोटोकॉल का अनिवार्य हिस्सा है कि नेपाली विदेश मंत्री संयुक्त बैठक के वास्ते पधारें, तो प्रधानमंत्री से मिलें ही? इसे कूटनीतिक शिष्टाचार का निर्वाह कह लीजिए कि प्रधानमंत्री विदेश से पधारे बड़े नेताओं से मिल लेते हैं। 23 साल से मुर्दा पडे़ इस संयुक्त आयोग को विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के रहते फिर से जिंदा किया गया था। सुषमा स्वराज और उनके तत्कालीन समकक्ष महेंद्र बहादुर पांडे ने काठमांडू में 26 जुलाई, 2014 को पहली ‘जेसीएम’ अर्थात ज्वॉइंट कमीशन मीटिंग की थी। मोदी काल में भारत-नेपाल संयुक्त आयोग की बैठकों को पुनर्जीवित करना अच्छा फैसला था, जिससे दोनों पक्षों की शंकाओं के निवारण और सहयोग के नए आयाम ढूंढे़ जाते हैं। इस समय नेपाल को तत्काल कोविड वैक्सीन की आवश्यकता है। भारत से वैक्सीन नेपाल पहुंच जाएं, तो इसे विदेश मंत्री प्रदीप ज्ञावाली को अपनी दिल्ली यात्रा की उपलब्धि माननी चाहिए। 15 जनवरी, 2021 की बैठक में स्वयं विदेश मंत्री प्रदीप ज्ञावाली ने कोविशील्ड व कोवैक्सीन के लिए भारत को बधाई दी है, और वह वैक्सीन की एक करोड़ 20 लाख डोज भेजने का आग्रह कर गए हैं। उधर चीन भी नेपाल में वैक्सीन कूटनीति खेलने के प्रयास में है। ज्ञावाली यह भी प्रस्ताव दे गए हैं कि नेपाल को इसके निर्माता सीरम इंस्टीट्यूट से वैक्सीन खरीदने की अनुमति दी जाए। भारत को इस पर त्वरित कार्रवाई करने की जरूरत है।

संयुक्त आयोग की बैठक में ज्ञावाली के साथ उपस्थित विदेश मंत्री एस जयशंकर, विदेश सचिव हर्षवद्र्धन शृंगला, उनके नेपाली समकक्ष भरत राज पौडेल ने कनेक्टिविटी, अर्थ-व्यापार, ऊर्जा, तेल और गैस, जल संसाधन, सुरक्षा, सीमा प्रबंधन, पर्यटन, शिक्षा, संस्कृति के क्षेत्र में आदान-प्रदान जैसे विषयों पर विस्तार से चर्चा की। मोतिहारी से अमलेखगंज तक पेट्रोलियम पाइपलाइन को चितवन तक विस्तार देने, इससे इतर पूर्वी क्षेत्र में सिलीगुड़ी से झापा तक ऐसी ही पाइपलाइन लगाने पर चर्चा हुई। जयनगर से नेपाल के कुर्था तक बड़ी रेल लाइन लग जाने से इस इलाके का कायाकल्प होना है, इसे नेपाली पक्ष भी महसूस करता है। रक्सौल से काठमांडू ब्रॉड गेज रेल पर यदि काम शुरू होता है, तो यह सबसे बड़ी उपलब्धि मानी जाए। साझा बैठक में पशुपतिनाथ रिवर फ्रंट बनाने, ऐतिहासिक पाटन दरबार का भंडारखाल बगैचा के कायाकल्प समेत पंचेश्वर बहुउद्देश्यीय परियोजना पर भी चर्चा हुई। मुश्किल यह है कि नेपाली मीडिया का पूरा ध्यान नकारात्मक खबरों पर केंद्रित रहा है। वहां इस बात की खोज होती रही कि कालापानी-लिपुलेख मुद्दे को विदेश मंत्री प्रदीप ज्ञावाली ने कितने पुरजोर तरीके से उठाया, और भारतीय पक्ष की ओर से क्या उत्तर मिला? मगर, भारतीय विदेश मंत्रालय ने इस बैठक पर जो प्रेस विज्ञप्ति जारी की है, उसमें कालापानी-लिपुलेख की चर्चा नहीं है। ज्ञावाली शायद ऐसा सोचकर दिल्ली आए थे कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात में इस विषय पर चर्चा करूंगा। संभवत: यही वह बिंदु है, जिसकी वजह से प्रधानमंत्री भेंट को टाल गए। नेपाल के लिए यह राजनीतिक संक्रमण काल है। संसद भंग है और सड़क पर शीर्ष नेता हिसाब-किताब कर रहे हैं। प्रचंड ने आरोप लगाया कि ओली की कुरसी प्रधानमंत्री मोदी की वजह से टिकी हुई है, वरना वह  निपट गए होते। ऐसे संदेह वाले माहौल में नरेंद्र मोदी का ज्ञावाली से न मिलना, कूटनीतिक विवेक और गंभीरता को ही दर्शाता है। कालापानी-लिपुलेख से भी बड़ा विषय भारत-नेपाल के बीच 1950 की संधि को बनाए रखना है। ओली और प्रचंड का राष्ट्रवाद समय-समय पर इस विषय को लेकर जगता रहा है। इसमें पलीता लगाने में भूगोलवेत्ता, राष्ट्रीय जनसंख्या आयोग के अध्यक्ष डॉक्टर हर्क गुरूंग की बड़ी भूमिका थी। 23 सितंबर, 2006 को गुरूंग हेलीकॉप्टर दुर्घटना में मारे गए, मगर अपने जीवनकाल में यह निष्कर्ष दे गए कि 1950 संधि की धाराएं बदली जाएं। नेपाली कम्युनिस्टों को आपत्ति 1950 संधि के अनुच्छेद 2 पर है, जिसमें क्षेत्रीय अखंडता की चर्चा है, अनुच्छेद 5 को बदलकर नेपाल तीसरे मुल्क से हथियारों का अबाध आयात चाहता है, अनुच्छेद 6 में आर्थिक बाध्यताएं हैं, और अनुच्छेद 7को संशोधित करने के बाद भारतीय मूल के लोग वर्क परमिट के आधार पर ही नेपाल में काम कर सकेंगे। इन अनुच्छेदों में बदलाव दोनों देशों के नागरिकों के लिए परेशानियों से भरा होगा। 1950 की संधि को दुरुस्त करने के वास्ते, जुलाई 2016 में भारत-नेपाल के प्रसिद्ध लोगों का आठ सदस्यीय समूह बना, जिसका नाम रखा था ईपीजी (इमीनेंट पर्सन्स ग्रुप)। नेपाल की ओर से इस समूह के संयोजक हैं राजदूत भेख बहादुर थापा और भारत में भगत सिंह  कोश्यारी इसका नेतृत्व कर रहे हैं। ‘ईपीजी’ की रिपोर्ट अब तक सार्वजनिक नहीं हुई है, मगर नेपाली मीडिया पूरे विश्वास से कह जाता है कि भारत 1950 की संधि बदलने को तैयार है। ईपीजी की अवधि 2018 में पूरी हो गई, पर प्रधानमंत्री मोदी को रिपोर्ट अभी सौंपी नहीं गई है। रिपोर्ट चाहे जब भी सार्वजनिक हो, मानकर चलिए कि बर्र के छत्ते में हाथ डालने के बराबर है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

सौजन्य - हिन्दुस्तान।

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