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Tuesday, January 19, 2021

भारत के ऊर्जा क्षेत्र का विरोधाभास, 75 प्रतिशत जिले चरम जलवायु घटनाओं की चपेट में (अमर उजाला)

ब्रतोती राय  

हाल के शोध से पता चलता है कि 75 प्रतिशत भारतीय जिले चरम जलवायु घटनाओं की चपेट में हैं। अंतरराष्ट्रीय जलवायु वार्ता में भारत का प्रदर्शन बताता है कि वह जलवायु परिवर्तन के परिणामों से अच्छी तरह वाकिफ है। पेरिस में संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन-2015 के दौरान, भारत सरकार ने 2030 तक गैर-जीवाश्म स्रोतों से लगभग 40 प्रतिशत बिजली उत्पन्न करने का संकल्प लिया। हालांकि, नवीकरणीय ऊर्जा और ऊर्जा संक्रमण की आवश्यकता की बातचीत के बावजूद भारत में कोयला का उपयोग बढ़ रहा है और भारत इस प्रकार के ऊर्जा उपयोग से दूर जाने के बजाय जीवाश्म ऊर्जा वाहक के साथ अपने  संबंधों को गहरा करने की प्रक्रिया में है।


भारत अब 2023-24 तक सालाना एक अरब टन कोयला निकालने की राह पर है। पहले से ही निजी कंपनियों को कोयला खनन के लिए 41 कोयला ब्लॉकों की नीलामी शुरू की गई है, जिसमें जनजातीय समुदायों द्वारा लगाए गए प्राचीन जंगल और समृद्ध जैव विविधता के क्षेत्र शामिल हैं। यह नई कोयला खदानों के लिए अगले 55 ब्लॉकों की नीलामी करने और अगले पांच वर्षों में कम से कम 193 वर्तमान खानों का विस्तार करने की योजना के अतिरिक्त है। तर्क दिया जाता है कि आर्थिक विकास और रोजगार के लिए उद्योगों एवं सेवाओं का विस्तार, बिजली तक पहुंच में सुधार और ऊर्जा के मामलों में गरीबों के लिए स्वच्छ रसोई ईंधन जैसे विकास कार्यों के लिए कोयले की जरूरत है। 



हालांकि भारत की बिजली का सबसे बड़ा और सबसे तेजी से बढ़ने वाला उपभोक्ता उद्योग है, जो लगभग 40 प्रतिशत बिजली की खपत करता है, जबकि घरों के लिए यह आंकड़ा 25 प्रतिशत से कम है, घरेलू खपत में भारी असमानता है। कोयले की पूरी आपूर्ति शृंखला के कारण भारी सामाजिक और पर्यावरणीय कीमत चुकानी होती है। समग्र आर्थिक विकास के लिए उत्पादित कोयला पर्यावरणीय संकट पैदा करता है और स्वाभाविक रूप से भूमि की बेदखली, आजीविका के विनियोग, और जल और वायु प्रदूषण से जुड़ा हुआ है। कोयला आधारित बिजली संयंत्रों के आसपास रहने वाली आबादी में समय से पहले मृत्यु दर 80,000 से 1,15,000 प्रति वर्ष होती है। कोयला खदानों के आसपास के लोगों और उसमें काम करने वाले श्रमिकों को कई तरह बीमारियों का सामना करना पड़ता है, जिनमें प्रमुख है फेफड़ा काला होने की बीमारी और प्रदूषित जल जनित बीमारी।


नतीजतन कोयला देश भर में विरोध और संघर्ष का विषय बन गया है। ये संघर्ष भारत में व्यापक पर्यावरण न्याय आंदोलन का एक हिस्सा हैं, जो लोगों और पृथ्वी की चिंताओं का निपटारा किए बिना देश के विकास के समक्ष स्वायत्तता और सामाजिक-पारिस्थितिक कल्याण का दावा करते हैं। कोयले के खिलाफ इनमें से कई विरोध दशकों से चल रहे हैं। ऐसा ही एक संघर्ष झारखंड के हजारीबाग जिले में 2004 से ही चल रहा है, क्योंकि न केवल जैव विविधता वाले जंगलों  और कृषि भूमि पर इसके प्रतिकूल प्रभाव पड़ते हैं, बल्कि इस क्षेत्र में खोजे गए प्रागैतिहासिक महापाषाण काल पर भी। कोविड-19 संकट के बीच भी असम में देहिंग पटकाई वन्यजीव अभयारण्य में कोयला खनन को रोकने के लिए ऑनलाइन आंदोलन देखा गया। भारत को अपने जलवायु लक्ष्यों के प्रति सच्चे बने रहने और देश में जलवायु परिवर्तन के तीव्र प्रभावों को कम करने के लिए चरणबद्ध तरीके से कोयले के उपयोग को खत्म करने की आवश्यकता है। हालांकि, इस चरण में दो चीजों को शामिल करना होगा जो भारत सरकार की वर्तमान योजना से गायब हैं।


सबसे पहले, सरकार को ‘खदान में कोयले’ को छोड़ देना चाहिए, भले ही यह अब भी  ‘आर्थिक रूप से व्यवहार्य’ माना जाता है, तब भी इसके खनन को रोकना चाहिए। दूसरा, लोगों, सरकार और व्यवसायियों के एक जबर्दस्त संयुक्त प्रयास की आवश्यकता है कि ऊर्जा प्रणाली को न केवल जीवाश्म ईंधन और नाभिकीय ऊर्जा से नवीकरणीय ऊर्जा में परिवर्तित किया जाए, बल्कि एक भारी पूंजीकृत, केंद्रीकृत प्रणाली से स्थानीय रूप से नियंत्रित एक विकेंद्रीकृत ऊर्जा प्रावधान की तरफ बढ़ा जाए। 


(-लेखिका बर्सिलोना के स्वायत्त विश्वविद्यालय के पर्यावरण विज्ञान और प्रौद्योगिकी संस्थान में एन्वाजस्टिस टीम का हिस्सा हैं।)

सौजन्य- अमर उजाला।

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