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Thursday, November 19, 2020

Editorial : राजनीति: पूर्ण राज्य के दर्जे का पेच

मनोज कुमार मिश्र दिल्ली को पूर्ण राज्य बनाने का मुद्दा कोरोना महामारी के दौर में भले कमजोर पड़ता दिखा हो, लेकिन जैसे ही महामारी का जोर कम पड़ेगा, दिल्ली पर शासन कर रही आम आदमी पार्टी (आप) इसे फिर से प्रमुख मुद्दा बनाने में जुट जाएगी। 

दिल्ली में महामारी से बिगड़े हालात और इससे निपटने के उपायों के बाद यह धारणा पक्की हुई कि अगर दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा मिला होता और नगर निगमों से लेकर केंद्र्र सरकार तक के अस्पताल एक ही शासन तंत्र के अधीन होते तो कोरोना महामारी से बचाव की तैयारी कहीं ज्यादा बेहतर तरीके से हो सकती थी। नगर निगमों की स्वायत्तता के कारण एक सीमा के बाद दिल्ली सरकार इनमें हस्तक्षेप नहीं कर पा रही है। इतना ही नहीं, केंद्र सरकार की मर्जी के बिना केंद्र सरकार की स्वास्थ्य सेवाएं दिल्ली सरकार को सहयोग नहीं कर सकतीं। दिल्ली में नगर निगम चुनाव साल 2022 के शुरू में होंगे। सभी दल इसकी तैयारियों में जुटने लगे हैं। लेकिन अगले पूरे साल दिल्ली में निगम चुनावों का ही साया छाया रहेगा और इसमें पूर्ण राज्य मुद्दा भी उठता रहेगा। 

आम आदमी पार्टी को मलाल है कि वह 2017 के चुनाव में तीनों में से एक नगर निगम पर भी काबिज नहीं हो पाई थी। डेढ़ दशक तक दिल्ली की मुख्यमंत्री रहीं शीला दीक्षित को स्वशासित नगर निगम शुरू से ही खलता रहा था। वे दिल्ली नगर निगम को उसी तरह दिल्ली सरकार के मातहत लाना चाहती थीं जैसे अन्य राज्यों में नगर निगम सरकारों के अधीन होते हैं। पर वे इस प्रयास में वे सफल नहीं हुईं। तब उन्होंने निगमों का पुनर्गठन के लिए कमेटी बनाई। पहले निगम की सीटें एक सौ अड़तीस से बढ़ा कर दो सौ बहत्तर की गर्इं, फिर उसे तीन हिस्सों में बांटा गया। दिल्ली के सत्तासी फीसद इलाकों में दिल्ली सरकार के समानांतर दिल्ली नगर निगमों की सत्ता चलती है। 

विधानसभा बनने से पहले दिल्ली की असली सत्ता निगम के पास ही थी। बाद में बिजली, पानी, दमकल, होमगार्ड, सीवर, बड़ी सड़कें आदि अपने अधीन करके दिल्ली सरकार ताकतवर बनी। बावजूद इसके आज भी गृह कर, लाइसेंस, प्राथमिक स्वास्थ्य सहित कुछ बड़े अस्पताल, प्राथमिक विद्यालय, पार्क, पार्किंग आदि निगमों के अधीन हैं। तीन निगमों में से दो (पूर्वी और उत्तरी) अपने खर्चे का बोझ नहीं उठा पा रहे हैं। इसलिए आए दिन दिल्ली सरकार और निगमों में पैसे की लड़ाई चलती रहती है। कोरोना काल में यह लड़ाई और तेज हो गई है। दिल्ली के विकास साथ-साथ यहां की प्रशासनिक व्यवस्था भी बदलती गई। दिल्ली को पहले कम अधिकारों वाली विधानसभा मिली, लेकिन वह ज्यादा समय नहीं चल पाई। सन 1957 में दिल्ली नगर निगम और 1966 में महानगर परिषद बनी। महानगर परिषद को भंग करके सरकारिया आयोग और बालाकृष्ण कमेटी की सिफारिशों के अनुरूप 1991 में उनहत्तरवें संविधान संशोधन के माध्यम से दिल्ली को सीमित अधिकारों वाली विधानसभा मिली। कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में संविधान सभा की उस बहस का भी जिक्र किया था, जिसमें डॉ भीम राव आंबेडकर ने दिल्ली को राज्य बनाने का विरोध किया था। इतना ही नहीं, उस बहस में ज्यादातर नेताओं ने भी देश की राजधानी को राज्य बनाने का विरोध किया था। तभी यह तय हो गया था कि दिल्ली केंद्र शासित प्रदेश ही रहेगी। 

भारत के संविधान (अनुच्छेद 239 एए और अनुच्छेद 239 एबी) में कहा गया है कि उसका ही विस्तार संसद से पारित राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र शासन अधिनियम, 1991 में किया गया है। उसी के आधार पर राष्ट्रपति से पारित कामकाज की नियमावली और कार्य आवंटन नियमावली बनी। राष्ट्रपति इसके शासक हैं और वे अपने प्रतिनिधि (उप राज्यपाल) के माध्यम से दिल्ली का शासन चलाते हैं। दिल्ली विधानसभा को राज्य सूची के छियासठ में से तिरसठ विषय सौंपे गए हैं। इन पर दिल्ली मंत्रिमंडल स्वतंत्र रूप से फैसला ले सकता है। आम आदमी पार्टी के पहले दिल्ली में कांग्रेस और भाजपा (पहले जनसंघ, फिर जनता पार्टी) ही ताकतवर होती थीं। केंद्र में ज्यादातर शासन कांग्रेस रहा, इसलिए दिल्ली को राज्य बनाने और बाद में दिल्ली को पूर्ण राज्य बनाने का आंदोलन भाजपा ही चलाती रही। कांग्रेस ने तो पहली बार दिल्ली में शीला दीक्षित की सरकार बनने पर यह मुद्दा उठाया था। साल 2002 में केंद्र में भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार थी और दिल्ली सरकार के एक आला अधिकारी के पत्र को लेकर विवाद हो गया था। इस अधिकारी ने सभी तिरसठ गैर आरक्षित विषयों की फाइलें उप राज्यपाल के दफ्तर को नहीं भेजे जाने की सलाह दी थी। इस पर तत्कालीन उप राज्यपाल विजय कपूर ने केंद्र सरकार से दो परिपत्र जारी करवा दिए, जिनके मुताबिक अब कोई भी विधेयक पेश करने से पहले भी केंद्र सरकार की इजाजत जरूरी होगी। तब शीला दीक्षित ने इसका विरोध किया, संसद तक विधायकों के साथ मार्च निकाला और विधानसभा में दिल्ली को पूर्ण राज्य के दर्जे का प्रस्ताव पास किया। 

लेकिन केंद्र सरकार ने उसमें कोई बदलाव नहीं किया। अलबत्ता भाजपा अपने वायदे के अनुरूप अपनी सरकार के आखिरी दिनों में दिल्ली राज्य विधेयक, 2003 ले आई। उसमें नई दिल्ली नगर पालिका परिषद (एनडीएमसी) इलाके को छोड़ कर बाकी दिल्ली को पूर्ण राज्य बनाने का प्रस्ताव था। उस बिल को प्रवर समिति में भेजा गया और लोकसभा भंग होने से वह विधेयक इतिहास की बात बन कर रह गया। दिल्ली सरकार के अधिकार बढ़ाने के लिए शीला दीक्षित ने दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) और दिल्ली पुलिस को तीन हिस्सों में करके थाने की पुलिस और यातायात पुलिस को दिल्ली सरकार के अधीन करवाने का प्रयास किया था। उनका मानना था कि वीआइपी सुरक्षा में लगी पुलिस केंद्र सरकार के अधीन रहे। उनका यह फार्मूला भी उनकी पार्टी की केंद्र सरकार ने आगे नहीं बढ़ने दिया। तब उन्होंने दिल्ली सरकार के समानांतर सत्ता केंद्र बने नगर निगम को पूरी तरह से दिल्ली सरकार के अधीन करने की मुहिम चलाई। इसमें उन्हें आंशिक सफलता ही मिली। निगम के वार्ड छोटे हुए, उनका तीन जगह विभाजन हुआ, लेकिन उनकी स्वशासी व्यवस्था नहीं बदली। दिल्ली सरकार का शहरी विकास सचिव निगमों की देखरेख करता है, लेकिन दिल्ली के तीनों निगम उप राज्यपाल के अधीन हैं। साफ-सफाई आदि के लिए वित्त आयोग की सिफारिशों के आधार पर दिल्ली सरकार निगमों को पैसा देती है। 

यह विवाद हमेशा बना रहा है कि दिल्ली सरकार कहती है कि केंद्र उसे उसके हिस्से का पूरा पैसा नहीं देता और निगमों की शिकायत रहती है कि दिल्ली सरकार उन्हें उनके हिस्से का पूरा पैसा नहीं देती। यह विवाद सड़कों पर भी आता रहता है। दिल्ली सरकार कहती है कि निगमों में भ्रष्टाचार के चलते घाटा है, सरकार तो पूरा पैसा दे रही है। इसी तरह के कई और मुद्दे हैं जो बार-बार उठते रहे हैं। जब से दिल्ली सरकार में आप सरकार काबिज हुई है, तब से अघिकारों का मुद्दे को लेकर भी विवाद गहराए हैं। इसमें कोई शक नहीं है कि दिल्ली को विधानसभा देते समय जिस तरह से हर मुद्दे पर बहस होनी चाहिए थी, वह नहीं हुई। तभी अनेक सेवाएं विधानसभा ने प्रस्ताव करके निगम से ले लीं। पुलिस, जमीन और सेवाएं आरक्षित विषय होने से सरकार को दैनिक काम करने में कठिनाई आती है। 

नगर निगमों की कार्यप्रणाली और उनके विभाजन पर भी दिल्ली विधानसभा को और अधिकार मिलने का मुद्दा उठाया जाना जरूरी है। समाधान केवल चुनावी मुद्दा बनाने से नहीं होगा। दिल्ली विधानसभा में दो बार जीत का रिकार्ड बनाने वाली आप को लगातार तीन बार से निगमों में भाजपा की जीत जरूर परेशान करती होगी। पिछले कुछ चुनावों में आप ने कांग्रेस की जगह लेकर उसे हाशिए पर पहुंचा दिया है। इसलिए आप का प्रयास किसी भी तरह से निगमों के चुनाव जीतना होगा।


सौजन्य - जनसत्ता।

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