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Friday, November 27, 2020

किसानों का टकराव, सुधारों से जुड़े भ्रम दूर करे सरकार (दैनिक ट्रिब्यून)

देश में खासकर पंजाब में यदि किसान कृषि सुधार कानूनों के खिलाफ सड़कों पर उतरा है तो केंद्र सरकार को किसान की बात को सुनना चाहिए। निस्संदेह किसी भी सरकार का जनहित में कानून बनाना दायित्व है, लेकिन यदि इन सुधारों को लेकर कोई संशय या दुविधा है तो उसे दूर करने के भी प्रयास होने चाहिए। उसके फैसलों में पारदर्शिता नजर आनी चाहिए ताकि जिस वर्ग के लिये कानून बना हो, उसे वास्तविकता का बोध हो सके। यदि ऐसा नहीं होता तो लोगों में रोष उत्पन्न होता है और विपक्षी दलों को मुद्दा भुनाने का मौका मिल जाता है। यह इस आंदोलन की सतही व्याख्या होगी कि पंजाब में किसान आंदोलन सरकार द्वारा पोषित है क्योंकि राज्य में कांग्रेस की सरकार है, जो कृषि सुधारों के खिलाफ खड़ी है। गाहे-बगाहे देशभर से किसान आंदोलन की खबरें हैं। यह बात अलग है कि कृषि मंडियों व सरकारी खरीद का सबसे बड़ा लाभ पंजाब-हरियाणा के किसानों को ही मिला है। दूसरे शेष देश में उस स्तर की बड़ी जोत की खेती भी नहीं है जैसी इन राज्यों में है। इसके बावजूद सरकार को बातचीत के जरिये इस भ्रम को दूर करना चाहिए कि किसान मंडियों को खत्म नहीं किया जायेगा और कृषि उपजों की न्यूनतम समर्थन मूल्य योजना बरकरार रहेगी। हालांकि, सरकार ने ऐसे आश्वासन दिये हैं लेकिन इस सवाल का समाधान निकाला जाना चाहिए कि किसान उसके आश्वासन पर भरोसा क्यों नहीं कर रहे हैं? सवाल यह भी है कि नये सुधार कानून बनाते वक्त किसान संगठनों और कृषि विशेषज्ञों से सलाह क्यों नहीं ली गई? क्यों सरकार जल्दबाजी में है? क्यों सरकार को लॉकडाउन के दौरान कृषि सुधारों के लिये पिछले दरवाजे से अध्यादेश लाने पड़े? क्यों संसद में जल्दबाजी में ये कानून पारित कराये गये? ऐसे में पूंजीपतियों के हितों के पोषण के आरोप क्या तार्किक हैं? क्या कृषि क्षेत्र में निजी कंपनियों की दखल का रास्ता खुलने के बाद सरकार महंगाई पर नियंत्रण कर पायेगी?


दरअसल, विपक्ष के विरोध के बावजूद सितंबर के अंत में केंद्र सरकार द्वारा लागू किये कृषि सुधार कानूनों को लेकर किसान जो सड़कों पर उतरा है, उसके पीछे किसानों की समस्या को गंभीरता से न लेना भी है। यही वजह है कि तीन दिसंबर को किसानों को दिल्ली में वार्ता का निमंत्रण मिलने के बावजूद किसानों ने दिल्ली चलो आंदोलन नहीं टाला। इसके बावजूद बातचीत से आंदोलन को टालने के बजाय दिल्ली जाने वाले मार्गों पर किलेबंदी कर दी गई। कई किसान नेताओं की धरपकड़ भी की गई है। कई जगह किसानों का टकराव पुलिस से हुआ है और सड़कों पर आम लोगों को जाम में फंसकर भारी परेशानी का सामना करना पड़ा है। दरअसल, पंजाब में दो माह से ठप रेल यातायात खुलने और केंद्र के बातचीत के आमंत्रण के बाद उम्मीद जगी थी कि बातचीत की टेबल पर समस्या का समाधान हो जायेगा। लेकिन मौजूदा हालात से टकराव लंबा खिंचने के आसार बन रहे हैं। पंजाब पहले ही किसान आंदोलन से रेल यातायात ठप होने से भारी नुकसान उठा चुका है। ऐसे में किसानों का टकराव टालने के लिए गंभीर प्रयासों की जरूरत है। लेकिन अब तक ऐसा होता नजर नहीं आया है। केंद्र सरकार व किसान संगठनों के बीच दो दौर की वार्ताएं हुईं। दोनों ही मौकों पर विचार-विमर्श तार्किक परिणति तक नहीं पहुंच पाया। गत 14 अक्तूबर को कृषि सचिव के साथ किसानों की बैठक हुई परंतु उसमें कोई मंत्री मौजूद नहीं था। इसलिये किसानों ने वार्ता के बीच में बहिष्कार किया। इसके बाद तेरह नवंबर को कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर व रेलमंत्री पीयूष गोयल से किसानों ने बातचीत की, लेकिन वार्ता बेनतीजा रही। केंद्र सरकार को चाहिए कि खेती से जुड़े वर्गों की चिंताओं को दूर करे। वहीं किसानों को भी सोचना चाहिए कि यदि उनकी सार्वजनिक जीवन को बाधित करती नीतियां जारी रहेंगी तो वे जनता का विश्वास खो देंगे। रेल की पटरियों व सड़क पर जाम लगाने के बजाय उन्हें वार्ता की टेबल पर दबाव बनाना चाहिए।

सौजन्य - दैनिक ट्रिब्यून।

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