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'केशवानंद भारती बनाम स्टेट ऑफ केरल', धर्म और कानून का अद्भुत संगम

विराग गुप्ता



संविधान के संरक्षक के तौर पर सर्वोच्च न्यायालय के 13 जजों ने वर्ष 1973 में एक ऐसा फैसला दिया था, जिसकी वजह से केशवानंद भारती मृत्यु के बाद भी देश के सांविधानिक इतिहास में अमर हो गए हैं। कांग्रेस की आंतरिक कलह और पाकिस्तान से युद्ध के बाद प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने बैंकों का राष्ट्रीयकरण, प्रिवी पर्स खत्म करने और राज्यों में भूमि अधिग्रहण कानून को संविधान की नौवीं अनुसूची में शामिल करने जैसे कई कानून बनाए और संसद के माध्यम से संविधान में 24वां, 25वां और 29वां संशोधन कर दिया। 


'केशवानंद भारती बनाम स्टेट ऑफ केरल' मामले में पांच महीनों तक 68 दिन रोज सुनवाई हुई, जो सुप्रीम कोर्ट में सबसे लंबी सुनवाई का रिकॉर्ड है। अयोध्या मामले में 40 दिन की सुनवाई के बाद पांच जजों ने 1,045 पृष्ठों में सर्वसम्मति से राम मंदिर के पक्ष में अपना फैसला दिया था, जबकि केशवानंद भारती मामले में तेरह में से सात जजों ने बहुमत से लगभग 800 पृष्ठों में अपना फैसला दिया था। कुल 2,144 पैरे के इस फैसले में 11 अलग-अलग फैसले शामिल थे, जिनमें संविधान के अधिकांश प्रावधानों का पुनरावलोकन किया गया। इस फैसले के अनुसार, कानून का शासन, न्यायपालिका की स्वतंत्रता, शक्तियों का बंटवारा, केंद्र-राज्य की संघीय व्यवस्था, गणतंत्र और संसदीय प्रणाली संविधान के मूलभूत ढांचे का हिस्सा हैं, जिन्हें संविधान संशोधन से नहीं बदला जा सकता। 

इस फैसले के बाद सरकार, संसद और सर्वोच्च न्यायालय में भारी उलटफेर हुआ। अगले दिन प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति एस एम सीकरी के रिटायर होने के बाद इंदिरा सरकार ने तीन जजों की वरिष्ठता को नजर अंदाज कर जस्टिस रे को प्रधान न्यायाधीश बना दिया, जिसके विरोध में तीन वरिष्ठ जजों ने त्यागपत्र दे दिया। प्रसिद्ध संविधानविद सीके दफ्तरी ने इस घटनाक्रम को भारतीय लोकतंत्र का काला दिन बताया था। मौलिक अधिकारों को आपातकाल में पूरी तरह से कुचल दिया गया। एडीएम, जबलपुर मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मौलिक अधिकारों को प्रश्रय देने के बजाय, सरकारी दमन पर कोर्ट की मुहर लगा दी। केशवानंद भारती का फैसला सुप्रीम कोर्ट की तेजस्विता को दर्शाता है। 

केशवानंद फैसले के अनेक प्रावधानों को इंदिरा सरकार ने 42वें संविधान संशोधन के कानून से खारिज कर दिया। हालांकि जनता पार्टी सरकार ने इंदिरा सरकार के ऐसे तमाम फैसलों को रद्द कर दिया। इंदिरा सरकार ने संविधान की प्रस्तावना में 'धर्मनिरपेक्षता' और 'समाजवाद' जैसे शब्दों को शामिल किया था, जिन्हें नहीं हटाया जा सका। संविधान का मूलभूत हिस्सा मानकर अब उन प्रावधानों को हटाने पर आपत्ति की जा रही है। सवाल है कि जो प्रावधान संविधान संशोधन से शामिल किए गए, उन्हें बहुमत वाली सरकार द्वारा संविधान संशोधन के माध्यम से क्यों नहीं हटाया जा सकता। केशवानंद का मामला सरकार और न्यायपालिका के बीच प्रभुत्व के लिए हुए टकराव के तौर पर भी देखा जाता है। प्रधान न्यायाधीश की नियुक्ति में मनमानी से इंदिरा गांधी ने न्यायपालिका पर तात्कालिक बढ़त हासिल कर ली थी। लेकिन इस फैसले के नौ साल बाद एस पी गुप्ता मामले से जजों ने नियुक्ति में कॉलेजियम व्यवस्था के माध्यम से पूर्ण वर्चस्व स्थापित कर लिया। 


वर्ष 2015 में पांच जजों की पीठ ने जजों की असंगत नियुक्ति प्रणाली पर कठोर टिप्पणी की, लेकिन कॉलेजियम व्यवस्था में अब तक कोई सुधार नहीं हुआ। सुशांत सिंह राजपूत मामले में फिल्म इंडस्ट्री में वंशवाद पर बहस चल रही है। लेकिन इस संयोग पर कम बहस होती है कि केशवानंद मामले में फैसला देने वाले छह से ज्यादा जजों के बेटे या भतीजे हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जज और चीफ जस्टिस बन गए।


केशवानंद का फैसला भारत के साथ बांग्लादेश और पाकिस्तान की अदालतों में भी नजीर बन गया। केशवानंद मामले में केरल सरकार के अलावा उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार और राजस्थान समेत अन्य राज्यों की तरफ से कई नामी वकीलों ने बहस की थी। उस मामले में बहस करने वाले सोली सोराबजी तो आज भी सुप्रीम कोर्ट में संविधान के प्रकाश स्तंभ माने जाते हैं। 47 साल बाद आज भी केशवानंद मामले का हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के अनेक फैसलों में जिक्र किया जाता है।


सौजन्य - अमर उजाला।

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