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ब्याज पर ब्याज लगाने का सवाल

आलोक जोशी 



‘सवाल चक्रवृद्धि ब्याज का है। राहत के लिए किस्त भरने से छूट और जुर्माने के तौर पर ब्याज एक साथ नहीं चल सकते। रिजर्व बैंक को यह बात साफ करनी होगी।’ यह कहना है सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस आर सुभाष रेड्डी का। सुप्रीम कोर्ट ने बैंक कर्ज पर किस्त न भरने की छूट बढ़ाई तो नहीं है, लेकिन यह निर्देश जरूर दे दिया है कि जिन देनदारों का कर्ज 31 अगस्त तक एनपीए नहीं किया गया है, अब उसे इस मामले पर फैसला होने तक एनपीए नहीं किया जा सकता। 

आपको या हमको इसमें होम लोन, कार लोन या पर्सनल लोन की अपनी ईएमआई पर राहत नजर आ रही है। हालांकि, जानकार बार-बार सलाह देते रहे हैं कि अगर बहुत जरूरी न हो, तो इस मोरेटोरियम या राहत का फायदा न उठाएं, क्योंकि आगे चलकर यह बहुत महंगा पड़ सकता है। महंगा पड़ने की वजह वही चक्रवृद्धि ब्याज या कंपाउंड इंटरेस्ट है, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाया है। कारण यह है कि छूट का एलान करते समय ही आरबीआई ने साफ कह दिया था कि छूट सिर्फ किस्त भरने में दी जा रही है और इस छूट के दौरान भी बकाया रकम पर ब्याज जुड़ना जारी रहेगा। इस वक्त ब्याज का यही हिसाब झगड़े का कारण बना हुआ है। अदालत इस बात पर सवाल उठा रही है कि ब्याज पर ब्याज कैसे वसूला जा रहा है? सरकार और बैंकों के संगठन आईबीए की तरफ से यह दलील लगातार दी जा रही है कि ब्याज पर ब्याज ही तो बैंकिंग सिस्टम को चलाता है। 

भारत में होम लोन देने वाली सबसे बड़ी कंपनी एचडीएफसी के चेयरमैन तो इस पूरे मसले को ही दुर्भाग्यपूर्ण बता चुके हैं। अपने शेयरधारकों के नाम जारी सालाना चिट्ठी में उन्होंने लिखा कि मोरेटोरियम के मामले पर सुप्रीम कोर्ट आरबीआई से सवाल पूछे, यही दुर्भाग्यपूर्ण है। जिन बुनियादी सिद्धांतों पर वित्तीय प्रणाली चलती है, उन पर ही देश के केंद्रीय बैंक को अदालत के सामने जवाबदेह क्यों होना चाहिए? कोटक महिंद्रा बैंक के मुखिया उदय कोटक और स्टेट बैंक के चेयरमैन रजनीश कुमार भी मोरेटोरियम बढ़ाए जाने के पक्ष में नहीं हैं।  उनके लिए मुश्किल और बड़ी है, क्योंकि वहां बात सिर्फ घर या कार के कर्ज की नहीं है। उद्योग और व्यापार में लगे बहुत सारे लोगों, खासकर छोटे और मझोले कारोबारियों के लिए कर्ज चुकाना मुश्किल हो रहा है। सिर्फ स्टेट बैंक का करीब पांच लाख तिरसठ हजार करोड़ रुपये का कर्ज इस वक्त मोरेटोरियम के दायरे में है। 

रिजर्व बैंक की ताजा फाइनेंशियल स्टेबिलिटी रिपोर्ट से पता चलता है कि सरकारी बैंकों से खुदरा लोन लेने वाले करीब 80 फीसदी लोग मोरेटोरियम की शरण में जा चुके हैं, यानी अब किस्त नहीं भर रहे हैं। नॉन बैंकिंग फाइनेंस कंपनियों के लिए यह आंकड़ा 45.9 प्रतिशत बताया गया और छोटे बैंकों के लिए 73.2 प्रतिशत। छोटे बैंकों के लिए मुसीबत कितनी बड़ी है, इसका अंदाजा इसी से लगता है कि जहां स्टेट बैंक, आईसीआईसीआई, कोटक महिंद्रा और एक्सिस जैसे बड़े बैंकों के करीब 30 प्रतिशत से कम कर्ज मोरेटोरियम के दायरे में हैं, वहीं बंधन बैंक के लिए यह अनुपात 71 प्रतिशत है। बंधन बैंक ज्यादातर कर्ज बहुत छोटे व्यापारियों को देता है। बैंकों को डर है कि अभी न जाने और लोग किस्तें न चुकाने की छूट मांगने वाले हैं। 

जाहिर है, इस वक्त बैंक, आरबीआई और सरकार, सभी इस मुसीबत से निकलने का रास्ता ढूंढ़ रहे हैं। उन्हें तीर भी चलाना है और परिंदों को भी बचाना है, यानी बैंक और कर्जदार, दोनों को ही बचाने का रास्ता निकालना है। मुसीबत बहुत बड़ी है और इतिहास में कोई उदाहरण नहीं है, जिसे नजीर बनाकर आगे का रास्ता देखा जा सके। इसीलिए वित्त मंत्री बैंक प्रमुखों के साथ बैठकें कर रही हैं और रिजर्व बैंक भी उपाय तलाशने में जुटा है। 

वित्त मंत्री ने पिछले दिनों बैंकरों की एक बैठक बुलाई और हिसाब लिया कि कहां किसको कितनी राहत दी जा चुकी है या दी जा रही है? खासकर एमएसएमई, यानी सूक्ष्म, लघु और मझोले उद्योगों के लिए जो तीन लाख करोड़ रुपये की क्रेडिट गारंटी स्कीम लाई गई है, उसका जायजा लिया गया। बैंकों ने बताया कि अगस्त के अंत तक एक लाख साठ हजार करोड़ रुपये के आसपास के लोन पास हुए, जिनमें से एक लाख ग्यारह हजार करोड़ रुपये के लोन दिए जा चुके हैं। वित्त मंत्री का ज्यादा जोर इस बात पर था कि त्योहारी मौसम आने से पहले जितनी राहत दी जा सकती है, उसे कर्जदारों तक पहुंचाने का इंतजाम किया जाए। 

बैंकों और एनबीएफसी कंपनियों की सबसे बड़ी चिंता यह है कि कोरोना के पहले तक जिस कर्ज पर एक महीने किस्त नहीं आती थी, उसे वे एनपीए मानकर इंतजाम शुरू कर देते थे। यही सीमा अब तीन महीने कर दी गई है, और यह तीन महीने भी तब से गिने जाएंगे, जब मोरेटोरियम की मियाद खत्म हो जाए। यानी 1 सितंबर से गिनती शुरू होती, लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा करने पर भी रोक लगा दी है, जब तक वह इस बारे में अगला आदेश न सुना दे। बैंकों और रिजर्व बैंक, दोनों के लिए इसमें संकट यह है कि उन्हें इस बात का पता ही नहीं चल पाएगा कि कितना कर्ज वापस आने वाला है और कितना डूबने का खतरा है! यही बात वे सुप्रीम कोर्ट में स्पष्ट करने की कोशिश कर रहे हैं। 

जहां तक ब्याज का सवाल है, तो बैंक में रखी रकम पर आपको मूल के साथ ब्याज पर भी ब्याज मिलता है और इस बात की आशंका काफी ज्यादा है कि अगर कहीं अदालत ने वह ब्याज माफ करने का आदेश दे  दिया, तो उसका खामियाजा बैंक में पैसा रखने वाले खाताधारकों को भुगतना पड़ सकता है। उनकी बचत पर ब्याज पहले ही बहुत कम हो चुका है, और ऐसी हालत  में बैंक उसे और घटाने पर मजबूर हो सकते हैं, यानी मुसीबत के मारों में एक बिरादरी और शामिल हो जाएगी। 

ऐसी सूरत में जिम्मेदारी सरकार पर आ सकती है कि बैंकों को होने वाले नुकसान की भरपाई वह अपने खजाने से करे, लेकिन उसके खजाने का जो हाल है, उसे देखते हुए यह समझना भी मुश्किल नहीं है कि ऐसा हुआ, तब भी उसका बोझ आम भारतीय के सिर पर ही आएगा। उम्मीद करनी चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट इस पर फैसला करते समय इस पहलू को भी ध्यान में रखेगा। 

(ये लेखक के अपने विचार हैं)


सौजन्य - हिन्दुस्तान।

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