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शिखर आंदोलनकारी की असमय विदाई

शेखर पाठक



वर्ष 1983 का वह न जाने, कौन-सा महीना था। सिल्यारा, चम्याला समेत बालगंगा घाटी के अनेक गांवों की सैकड़ों महिलाएं घणसाली के रेंज ऑफिस में चीड़ के छिलकों की मशाल जलाकर पहुंची थीं। लगता था कि यह चिपको की बची ताकत और एक जन आंदोलन की आंतरिक पुकार थी। महिलाएं कटान रोकने के साथ वनाधिकार की मांग कर रही थीं। कुछ वर्षों बाद चेतना आंदोलन को विकसित करने वाले त्रेपन सिंह चौहान तब कक्षा सात के विद्यार्थी थे। उनकी चेतना का अंकुरण यहीं से हुआ था।


वर्ष 1980 के आसपास चिपको के उतार और टिहरी बांध आंदोलन के बिखराव ने भिलंगना घाटी के चिपको से जुड़े या प्रेरित नौजवानों को संगठित होने और नई परिस्थितियों में अपनी राह परिभाषित करने को विवश किया। पांच जून, 1995 को चेतना आंदोलन जन्मा। शुरू में यह भ्रष्टाचार के विरोध के अलावा जंगलों, चरागाहों और नदियों के मुद्दों पर केंद्रित रहा। भ्रष्टाचार विरोध के कारण 1996 में चेतना आंदोलन के कार्यकर्ताओं पर निहित स्वार्थों ने अनेक मुकदमे दायर किए। कार्यकर्ताओं के लिए काम करना मुश्किल हो गया। उन्हें असामाजिक तत्व घोषित किया गया। उस समय सुंदरलाल बहुगुणा सहित विभिन्न सामाजिक कार्यकर्ता चेतना आंदोलन के समर्थन में आए। समूह फिर अपने काम में जुट गया।

1980 के बाद चिपको के अनेक अच्छे परिणाम आने के बावजूद 1949 में उत्तर प्रदेश में विलीन टिहरी रियासत (जिला टिहरी और उत्तरकाशी) में 1998 तक भी वन पंचायतों का गठन नहीं हो सका। अगले पांच साल तक चेतना आंदोलन ने वन पंचायतों की स्थापना हेतु काम किया। अनेक वन पंचायतें बनीं, पर उनमें जंगल नहीं थे। इस तरह वृक्षारोपण और घेराबंदी के प्रयास हुए, ताकि स्वयं जंगल उग सकें। कुछ सफलता मिली। लोगों को पता चला कि पेड़ों की हिफाजत के कारण घास का उत्पादन बढ़ा है तथा अतिरिक्त जलावन उपलब्ध हुआ है। गंगा देवी, जगदेई देवी, झड़ीदेवी तथा यशोधरा देवी जैसी कर्मठ, सामाजिक नेत्रियों का उदय पंचायतों और वन पंचायतों से हुआ। ये सभी चेतना आंदोलन की आधार बनीं।

मार्च, 2004 में जब भिलंगना नदी पर फलिन्डा में 22.5 मेगावाट की भिलंगना फेज1 जलविद्युत परियोजना बिना स्थानीय समुदायों की सहमति के बनने लगी, तो चेतना आंदोलन ने तब से अप्रैल, 2006 तक आंदोलन किया। जन सुनवाइयां कीं। दर्जनों लोग गिरफ्तार किए गए और जेल में रखे गए। समस्त ग्रामीणों के विरोध के बावजूद यह योजना बनी, पर जन आंदोलन के कारण ग्रामीण समाज के सिंचाई तथा मुर्दाघाट के अधिकारों को स्वीकारा गया। इसके बाद चेतना आंदोलन ने महिलाओं को सुसंगठित करना शुरू किया। ग्राम प्रधान के चुनावों में उन्हें उतारा। चालीस में से पैंतीस उम्मीदवारों को जीत हासिल हुई। दूसरी ओर, 2012 से देहरादून में असंगठित क्षेत्र के मजदूरों को संगठित करना शुरू किया।


ग्राम्य जीवन को अर्थवान और आकर्षक बनाने के साथ पुरानी उपयोगी परंपराओं को जीवित और फिर से परिभाषित करने हेतु चेतना आंदोलन ने 'घसियारी उत्सव' की शुरुआत की। टिहरी जिले के घणसाली ब्लॉक के गांवों में आयोजित इस उत्सव में श्रेष्ठ घसियारियों को 'बेस्ट इकोलॉजिस्ट' घोषित कर उन्हें नकद धनराशि के साथ चांदी के मुकुट पहनाए जाते हैं। इन सब में त्रेपन सिंह चौहान का योगदान तो था ही, उन्होंने स्थानीय ग्रामीणों की 'बालगंगा हाइड्रो इलेक्ट्रिक कंपनी' भी बनाई, जिसमें एक मेगावाट बिजली बनाने की योजना थी।


सामाजिक आंदोलन के साथ त्रेपन सिंह ने लेखन भी जारी रखा। उत्तराखंड की स्थितियों पर केंद्रित उनके दो उपन्यास यमुना और हे ब्वारी बेहद चर्चित रहे। जहां भी अधिकारों की लड़ाई होती, त्रेपन वहां जरूर पहुंचते। सौभाग्य से उसकी तरह के कुछ साथी पहाड़ों में थे। लेकिन अंततः वह मोटर न्यूरॉन जैसी दुर्लभ बीमारी की चपेट में आ गया, जो मशहूर वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंग को थी। फिर भी विज्ञान और समाज ने हॉकिंग को 76 साल का जीवन दिया। दूसरी ओर, त्रेपन की बीमारी चालीसवें साल में शुरू हुई और वह पचास भी पार नहीं कर पाया। कितना तो अभी उसे लिखना था। कितना तो अभी उसे चलना था। घसियारियां उसके ठीक होने का इंतजार कर रही थीं और भिलंगना व बालगंगा भी। खतलिंग ग्लेशियर तथा गंगी गांव भी चाहते थे कि त्रेपन उसका स्पर्श करे। उन आंखों में जितनी चमक और उम्मीद थी, उतनी ही विनम्रता थी। चेहरे से वह आंदोलनकारी नहीं लगता था, पर उसके अंदर रचनात्मकता की आग थी।


हम जानते थे कि उसे ज्यादा दिन नहीं जीना। शायद उसे भी पता था। इसीलिए अपने तीसरे उपन्यास पर वह तेजी से काम कर रहा था, पर उसे आधा ही लिख सका। त्रेपन के रचे शू्न्य को कौन भरेगा? क्या सुमन या नगेंद्र सकलानी का शून्य भरा जा सका है? शैलानी, प्रसून, शिखर और भवानी को भी जल्दी थी।


सौजन्य - अमर उजाला।

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