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लॉक और अनलॉक की आंख मिचौली : Hindustan Editorial


आलोक जोशी, वरिष्ठ पत्रकार 
                          
कंपनियों के तिमाही नतीजे आने लगे हैं। यह उसी तिमाही के नतीजे हैं, जिसके तीन में से दो महीने पूरी तरह लॉकडाउन में स्वाहा हो चुके हैं। अप्रैल और मई महीने। जून में कारोबार खुलना शुरू हुआ और कई जगह काफी हद तक खुल भी गया, पर अनलॉक का काम अभी चल ही रहा है। देश के अनेक हिस्सों में तो लॉक और अनलॉक के बीच आंख मिचौली जारी है। अनलॉकिंग का असर क्या होगा और कब होगा, यह जानने के लिए पहले समझना जरूरी है कि लॉकडाउन का असर क्या हुआ। 
कंपनियों के तिमाही नतीजों पर नजर डाले बिना ही सबको पता है कि रिजल्ट क्या होने वाला है। वही, जो कई राज्यों में छात्रों का हो रहा है। इम्तिहान ही पूरे नहीं हो पाए और अब बिना इम्तिहान के अगले दर्जे में जाना है। कारोबार चलाने वाले के पास अगले दर्जे में जाने का रास्ता तो है नहीं। कोई बड़ी फैक्टरी अगर आधे घंटे के लिए बंद हो जाए, तो उसे वापस पटरी पर आने में करीब-करीब दो दिन लग जाते हैं। अपने आसपास की किसी दुकान में जाकर देखिए कि दो या तीन महीने बंद रहने के बाद जब शटर फिर खुला, तो भीतर सामान का हाल क्या था, कितनी धूल जमी थी और कितनी चीजें खराब हो गईं। 
यही हाल इस वक्त पूरे देश का है। भारत की सबसे बड़ी आईटी कंपनी टीसीएस के तिमाही नतीजे खराब होने की आशंका थी, पर जो परिणाम आया, वह तो आशंका से भी कमजोर है। मुनाफे में 13.81 प्रतिशत की गिरावट के साथ कंपनी ने अप्रैल से जून के बीच 7,008 करोड़ रुपये कमाए हैं। यह वह कारोबार है, जिसमें सबसे ज्यादा वर्क फ्रॉम होम संभव है और हो रहा है। लेकिन जहां लोगों का आना-जाना जरूरी है, यानी फैक्टरियां, दुकानें और इस तरह के दफ्तर या अन्य कारोबार, उनकी क्या स्थिति है? लगातार दूसरे महीने भारत सरकार ने औद्योगिक उत्पादन सूचकांक, यानी आईआईपी के आंकड़े सामने रखने से इनकार कर दिया है। सरकार का कहना है कि अप्रैल और मई में पूरी तालाबंदी की वजह से यह सही नहीं होगा कि इस दौर के आंकड़े को पिछले साल के इन्हीं महीनों के आंकड़ों के साथ रखकर देखा जाए। फिर भी, जानना जरूरी है कि मई के महीने में हालात अप्रैल से कुछ सुधरे जरूर, पर जितनी जानकारी सांख्यिकी कार्यालय ने सामने रखी है, उसका हिसाब जोड़कर समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने कहा है कि मई में भारत का फैक्टरी आउटपुट 37.8 प्रतिशत कम रहा है। जून में लॉकडाउन हटने के बाद से हालात सुधरने चाहिए, लेकिन जून का आंकड़ा अगस्त में आएगा। 
इस बीच उद्योग संगठन फिक्की और कंसल्टिंग फर्म ध्रुव एडवाइजर्स ने देश के 100 से ज्यादा चोटी के कारोबार चलाने वाले प्रबंधकों के बीच सर्वे किया है। जून के अंत में हुए इस सर्वे में पाया गया कि अभी सिर्फ 30 प्रतिशत संस्थानों में 70 प्रतिशत या उससे ज्यादा क्षमता पर काम चल रहा है, लेकिन 45 प्रतिशत को उम्मीद है कि जल्दी ही उनका कामकाज भी 70 प्रतिशत से ऊपर होने लगेगा। इनकी उम्मीदें अनलॉक के साथ बढ़ गई हैं। 22 प्रतिशत प्रबंधकों का कहना है कि उनका निर्यात बढ़ने लगा है। 25 प्रतिशत प्रबंधक कहते हैं, ऑर्डर बुक सुधर रही है और 30 प्रतिशत कंपनियों का कहना है कि उनकी आपूर्ति शृंखला पटरी पर आ रही है। 
हालांकि फिक्की की प्रेसिडेंट संगीता रेड्डी का कहना है कि जितनी गहरी मार पड़ी है, उससे उबरने का काम काफी धीरे-धीरे ही हो पाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि इस वक्त ऐसे कदम उठाने जरूरी हैं, जिनसे कारोबारियों को न सिर्फ मौजूदा संकट से निकलने में मदद मिले, बल्कि वे लंबे दौर में आने वाले मौकों के लिए भी खुद को तैयार कर सकें। लेकिन इस बीच कोरोना के झटके लग रहे हैं और सरकारें भी लॉकडाउन में कभी ढिलाई, तो कभी कड़ाई कर रही हैं। एक तरफ, बीमारी फैलने का डर है, तो दूसरी तरफ, अर्थव्यवस्था के डूबने का खतरा। यही वजह है कि पिछले 15 दिनों में तमिलनाडु, कर्नाटक, तेलंगाना, बिहार, यूपी और असम के कई इलाकों में लॉकडाउन लग चुका है। देश के दस राज्यों में 45 करोड़ से ज्यादा लोग लॉकडाउन में ही हैं। 
इसका सीधा असर काम, रोजगार और कमाई पर पड़ना तय है। कारोबार के वापस पटरी पर लौटने की उम्मीद पाले कंपनियों का कहना है कि इस तरह बार-बार बंदी होती रही, तो फिर आर्थिक वापसी मुश्किल होती जाएगी। अप्रैल में ही इस बारे में जब सवाल उठे थे, तब मारुति उद्योग के चेयरमैन आर सी भार्गव ने कहा था कि फैक्टरी में या आसपास 20,000 लोगों के रहने का इंतजाम संभव नहीं है। अब फिक्की ने जो सुझाव दिए हैं, उसमें यह मांग शामिल है कि सरकार कामगारों के लिए उनके काम की जगह के आसपास सस्ती रिहाइश का इंतजाम करने में मदद करे। रिटेलर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया ने मांग की है कि केंद्र सरकार पूरे देश में लॉकडाउन लगाने और हटाने पर एक केंद्रीय व्यवस्था बनाए। 
व्यापार जगत और सरकार के बीच चर्चा चल रही है, सुझाव भी लिए-दिए जा रहे हैं, लेकिन रोजगार के मोर्चे पर हालत कितनी खराब है, इसकी खुलकर बात नहीं हो रही है। अभी तक का हाल समझना हो, तो म्यूचुअल फंडों के संगठन ‘एम्फी’ की ताजा रिपोर्ट को देखना जरूरी है। जून के महीने में इक्विटी म्यूचुअल फंड में लगने वाले पैसे में 95 प्रतिशत की गिरावट आई है और लगातार तीसरे महीने एसआईपी यानी किस्तों में आने वाले पैसे में गिरावट दिखाई पड़ी है। साफ संकेत है कि लोगों के पास पैसा बच नहीं रहा है। नोबेल पुरस्कार से सम्मानित अर्थशास्त्री अभिजित बनर्जी से लेकर भारत के तमाम उद्योग संगठन तक केंद्र सरकार से लगातार मांग कर रहे हैं कि लोगों की जेब में पैसा डालिए, ताकि वे खर्च कर सकें। बस यही एक रास्ता है। 
और ऐसे में, अगर बार-बार छोटे-बडे़ लॉकडाउन लगते रहे, तो खतरा और गंभीर होने जा रहा है। रिजर्व बैंक के गवर्नर ने शनिवार को कहा है कि यह स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था के लिए सौ साल का सबसे बड़ा संकट है। जाहिर है, अपने-अपने मोर्चे पर लड़ना होगा, पर एक से निपटने के चक्कर में दूसरे को नजरंदाज करना बहुत महंगा साबित होगा और दर्दनाक भी।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

सौजन्य - हिन्दुस्तान।
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