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सरकारी नियंत्रण से पूर्णत: मुक्त मीडिया नियामक?



वनिता कोहली-खांडेकर 
 
क्या अब सरकारी नियंत्रण से पूरी तरह मुक्त मीडिया नियामक के बारे में चर्चा होनी चाहिए? पिछले सप्ताह पांच दिन से अधिक चले उद्योग के सबसे बड़े कार्यक्रम भारतीय वाणिज्य एवं उद्योग महासंघ (फिक्की) फ्रेम्स में तस्वीर धुंधली थी। गूगल इंडिया के कंट्री मैनेजर एवंउपाध्यक्ष और फिक्की मीडिया एवं मनोरंजन समिति के चेयरमैन संजय गुप्ता ने कहा, 'अगर मैं पूरे 2020 के बारे में विचार करता हूं तो इस क्षेत्र का आकार 20 अरब डॉलर से घटकर 15 अरब डॉलर होने का अनुमान है। एक अनुमान यह भी है कि हमारे करीब 15 से 20 फीसदी कर्मचारियों की नौकरी जा सकती है।' इसका मतलब यह है कि मीडिया एवं मनोरंजन क्षेत्र में कार्यरत 50 लाख भारतीयों में से करीब 10 लाख अपनी नौकरी गंवा देंगे।
फिक्की फ्रेम्स दो विषयों-आर्थिक मंदी के तत्काल बाद आई मौजूदा महामारी के असर और नियमन पर केंद्रित रहा। इन दोनों का आपसी संबंध है। यह ऐसा साल है, जिसमें हर चीज भारत के 1,82,200 करोड़ रुपये के मीडिया एवं मनोरंजन कारोबार पर चोट कर रही है। ऐसे में नियामकीय मदद सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है। अगर इस उद्योग को सीधी बजट मदद नहीं भी दी जाती है तो कम से कम मीडिया कारोबार को चलाना आसान बनाने से ही बड़ी मदद मिलेगी। ऐसा करने में नाकामी ही पिछले 25 से अधिक वर्षों में भारत में मीडिया नियमनों की सबसे बड़ी कमजोरी रही है।

इसका उदाहरण मीडिया एवं मनोरंजन में सबसे बड़ी हिस्सेदारी रखने वाला 79,000 करोड़ रुपये का टेलीविजन उद्योग है। वर्ष 2004 से प्रसारण नियामक भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्र्राई) ने टीवी कीमतों को नियंत्रित करने में बाल की खाल निकाल रहा है। इससे कार्यक्रम नवप्रवर्तन थम गया है और भुगतान राजस्व सीमित हो गया है, जबकि स्ट्रीमिंग में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। इस साल मई की सिफारिशें उद्योग के स्वामित्व वाली रेटिंग संस्था को अद्र्ध-राष्ट्रीयकृत बना सकती हैं। अगर इन्हें लागू किया गया तो विज्ञापन राजस्व भी घटेगा। इस महामारी के प्रकोप से काफी पहले से ही टीवी राजस्व सुस्त पड़ रहा था। अब वह 25 से 40 फीसदी घटेगा।

इसके विपरीत हर बार जब नियामक मदद को आगे आए हैं तो कारोबार फला-फूला है। फिल्मों को वर्ष 2000 में 'उद्योग' का दर्जा देने के एक साधारण से फैसले की बदौलत राजस्व छह गुना से अधिक बढ़ गया। लेकिन ऐसे मददगार कदम कभी-कभार ही उठाए जाते हैं। ऐसा पिछला मददगार कदम वर्ष 2011 में केबल डिजिटलीकरण था। आम तौर पर मीडिया एवं मनोरंजन क्षेत्र की या तो अनदेखी की जाती है या अर्थव्यवस्था के आकर्षक मगर बुद्धू क्षेत्र के रूप में बरताव किया जाता है या किसी विवादित फिल्म या शो के लिए छोटे-मोटा दंड दिया जाता है। सरकार मीडिया एवं मनोरंजन को सामग्री/प्रभाव/नियंत्रण की नजर से देखती है। उस उद्योग के रूप में नहीं, जो कर और रोजगार सृजित करता है। इसका नतीजा यह हुआ है कि विश्व का दूसरा सबसे बड़ा टीवी बाजार, सबसे बड़ा फिल्म निर्माता देश या सबसे तेजी से बढ़ता इंटरनेट बाजार कमाई के मामले में बहुत पीछे है।

मीडिया और मनोरंजन क्षेत्र का सर्वोच्च नियामक सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय है, जो ट्राई, केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) जैसे अपने कई अंगों के जरिये काम करता है। इसके अलावा भारतीय प्रेस परिषद (पीसीआई) जैसी स्व-नियमन संस्थाएं हैं।

क्या अब सभी चीजों-प्रिंट, टीवी, फिल्म, म्यूजिक, रेडियो, डिजिटल आदि को सरकार के नियंत्रण से मुक्त नियामक के तहत लाया जाना चाहिए? पैनी नजर वाली यह संस्था देखेगी कि अगर टीवी का वजूद बचाना है और उसे बढ़ाना है तो शुल्क नियंत्रण खत्म करने होंगे या अगर छोटे शहरों में मल्टीप्लेक्स क्रांति लानी है तो मंजूरियों को आसान बनाया जाए। क्या ब्रिटेन के संचार नियामक ऑफकॉम जैसी कोई संस्था कारगर हो सकती है, जिसे संसद में एक अधिनियम पारित कर बनाया गया और उसका अपना स्वतंत्र बजट एवं बोर्ड है? ज्यादातर मीडिया वकील इससे सहमत नहीं हैं। साईकृष्णा ऐंड एसोसिएट्स के प्रबंध साझेदार साईकृष्णा राजगोपाल ने कहा, 'इस देश में पर्याप्त कानून हैं।' वह सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, टीडीसैट, भारतीय दंड संहिता, केबल अधिनियम की तरफ इशारा करते हैं। प्रमुख मुद्दा इनका कार्यान्वयन है।

इसके लिए उद्योग और सरकार का हाथ मिलाना जरूरी है। ऑफकॉम के बोर्ड में सरकारी-निजी मिश्रण है। इससे यह सुनिश्चित होता है कि न बीसीसी जैसा सरकारी प्रसारक और न ही स्काई जैसा निजी प्रसारक एजेंडा को नियंत्रित कर सकता है। फिक्की फ्रेम्स में बार-बार यह बात सामने आई कि ट्राई अफसरों से भरा है, जिसमें उद्योग के लोग शामिल नहीं हैं।

लॉ-एनके के वकील अभिनव श्रीवास्तव कहते हैं, 'नियामक का मुख्य उद्देश्य बाजार को एक विशेष दिशा में बढ़ाना है। अगर देश की संप्रभुता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, मौलिक अधिकारों जैसे नियमन की जरूरत वाले मुख्य सिद्धांत परिभाषित होंगे तो बाजार शक्तियों और सरकार के द्वारा स्व-नियमन कामयाब रहेगा।' वह इसके लिए भारतीय विज्ञापन मानक परिषद का उदाहरण देते हैं।

मैंने उद्योग के जिन वरिष्ठ लोगों से बात की, उनमें से लगभग सभी ने दो चीजें कहीं। पहली, कोई भी सरकार अपना नियंत्रण नहीं त्यागना चाहेगी। 'स्वतंत्र' जैसी कोई चीज नहीं है। दूसरी, पहले से ही बहुत से अधिनियम और संस्थाएं हैं, नया नियामक बनने से एक और तकलीफ बढ़ जाएगी।

फिक्की फ्रेम्स में ज्यादातर सरकारी प्र्रवक्ताओं ने 'लाइट टच' नियमन शब्दों का इस्तेमाल किया। कुछ ने स्व-नियमन की वकालत की। साफ तौर पर कुछ बुद्धिमान अभी मौजूद हैं। लेकिन अगर मीडिया और मनोरंजन को वृद्धि घटने को वर्तमान खाई से बाहर निकलना है तो बहुत कुछ करना होगा।
सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।
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