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संपादकीय : सबक लेना जरूरी - Business Standard Editorial

भारत और चीन की ओर से लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर सैन्य तनाव कम करने के निर्णय की एक साथ की गई घोषणा का स्वागत किया जाना चाहिए। यह घोषणा कई दौर की वार्ताओं के बाद हुई। इस दौरान सैन्य स्तर पर, दोनों देशों के विदेश मंत्रियों के बीच और आखिरकार दोनों देशों के विशेष प्रतिनिधियों के बीच बातचीत हुई। कहा जा सकता है कि सैनिकों को पीछे हटाने की इस कवायद से सीमा पर व्याप्त तनाव में कमी आएगी और लंबे समय से चला आ रहा गतिरोध समाप्त होगा और दोनों देशों के बीच वह शांति एक बार पुन: स्थापित हो सकेगी जो सन 1993 के बाद से आपसी विश्वास पैदा करने वाले कई समझौतों से हासिल हुई थी। लंबी दुश्मनी दोनों देशों के हित में नहीं है।
हालांकि दोनों देशों के सैन्य कमांडरों और विशेष प्रतिनिधियों के बीच सेनाओं की वापसी को लेकर जो भी शर्त तय की गई वह गोपनीय है लेकिन ऐसा प्रतीत होता है मानो चीन दो कदम आगे बढऩे और एक कदम पीछे लौटने की अपनी नीति में कामयाब रहा है। इस वापसी से अप्रैल की यथास्थिति वापस बरकरार नहीं हो रही है। उस समय चीन के सैनिकों ने कई भारतीय हिस्सों पर कब्जा करके एलएसी को प्रभावी तौर पर बदल दिया था। कोई भी समझौता सम्मानजनक तभी माना जाता जब दोनों देश अपनी पुरानी स्थिति को लौट जाते। परंतु ऐसा नहीं हो रहा है। इसके बजाय चीन के सैनिक जो भारत के नियंत्रण वाले क्षेत्र में कई किलोमीटर भीतर घुस आए थे, वे अब अप्रैल की स्थिति में वापस लौट रहे हैं। इस बीच भारतीय सैनिक उस सीमा से पीछे हट रहे हैं जो चीन के सैनिकों ने मई में निर्धारित की है। यह भारतीय क्षेत्र का ही भीतरी इलाका है। ऐसे में दोनों सेनाओं के बीच का असैन्य इलाका 'बफर जोन' है। यह वह इलाका है जो अप्रैल के अंत तक भारतीय क्षेत्र था।

इसके निहितार्थ समझना कोई मुश्किल काम नहीं। जमीन का एक हिस्सा जो हाल तक भारतीय था, वह अब 'नो मेन्स लैंड' है। इतना ही नहीं चीन ने देपसांग और पैंगॉन्ग सो के आसपास भारतीय जमीन पर अतिक्रमण बरकरार रखा है और इस तरह उसने एलएसी को नए सिरे से तय कर दिया है। पैंगॉन्ग सो के निकट फिंगर 8 और गलवान में पीपी14 समेत भारतीय सेना के कई पारंपरिक गश्ती इलाके अब पहुंच से बाहर हैं। यानी भारत की गश्त अब और सीमित हो गई है और सेना अब एलएसी के भारत के दावे वाली जगह तक गश्त नहीं कर पाएगी। परंतु अभी तो घटनाक्रम चल ही रहा है इसलिए अंतिम निर्णय की प्रतीक्षा रहेगी। फिलहाल चीन की नीति जमीनी हालात बदलकर नई परिस्थिति में मोलतोल करने की है। वह इसमें कामयाब होता दिख रहा है।

ऐसा कुछ हद तक अपरिहार्य था क्योंकि कोविड-19 में उलझा भारत चीन पर ध्यान नहीं दे सका। परंतु सांत्वना की बात है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय भारत के साथ खड़ा दिखा और भारत ने दूसरों की मदद के बजाय मामले से खुद निपटना बेहतर समझा। फिर भी इस अनुभव से सबक लेना जरूरी है। सबसे अहम सबक यह है कि रक्षा व्यय को इतना किया जाए कि हम दुश्मनों के खिलाफ विश्वसनीय पारंपरिक प्रतिरोध तैयार कर सकें। ऐसा इसलिए क्योंकि ऐसे मामूली सीमा विवादों में परमाणु प्रतिरोध कारगर न होगा। भारत का यह मानना गलत था कि व्यक्तिगत रिश्तों की कूटनीति के चलते देश की भौगोलिक अखंडता को कोई खतरा नहीं है। हकीकत में देश की संप्रभुता और सुरक्षा युद्ध संबंधी तैयारी और सैन्य बलों की सतर्कता पर काफी हद तक निर्भर है। इसमें कोई चूक ऐसे हालात को जन्म दे सकती है जिनका सामना हमने अभी-अभी किया।

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।
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