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ट्रंप की ईरान नीति और भारत का नुकसान

हर्ष वी पंत, प्रोफेसर, किंग्स कॉलेज लंदन


अपने शीर्ष कमांडर कासिम सुलेमानी के कत्ल का ईरान ने त्वरित प्रतिशोध लिया है। अमेरिकी सैनिकों के इराक स्थित दो हवाई अड्डों पर उसने दर्जन भर से अधिक बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं। पहले से ही तनावग्रस्त हालात इस हमले के बाद ज्यादा गंभीर हो गए हैं। जाहिर है, पश्चिम एशिया से जिन देशों के हित जुड़े रहे हैं, वे स्थिति को और अधिक न बिगाड़़ने की अपील कर रहे हैं, और भारत भी इसका अपवाद नहीं है। अमेरिका-ईरान रिश्ते में भारत की स्थिति बेहद नाजुक रही है, लेकिन इस वक्त दांव पर काफी कुछ लग सकता है।

मई 2019 तक भारत ईरान से कच्चे तेल खरीदने वाला दूसरा बड़ा देश था, पहले पायदान पर चीन है। लेकिन ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंधों में मिली छूूट के खात्मे के बाद भारत और ईरान की ऊर्जा संधियों में बदलाव आ गया। दरअसल, इसी छूट के कारण भारत को ईरान से तेल आयात की सुविधा हासिल हुई थी। तेहरान ने मुफ्त शिपिंग और विस्तारित उधार जैसी सुविधाओं के जरिए भारत को आकर्षित किया था, पर ईरान से तेल आयात बंद करने के अमेरिकी दबाव ने नई दिल्ली को अपना गुणा-गणित बदलने को विवश कर दिया।

बढ़ते अमेरिकी दबाव के बावजूद साल 2018-19 में भारत ने ईरान से रोजाना 4,79,500 बैरल तेल खरीदा था। यह इसके पूर्व वित्तीय वर्ष से कहीं अधिक था। ईरान पर फिर से प्रतिबंध लगाने के बाद अमेरिका ने सऊदी अरब व संयुक्त अरब अमीरात जैसे अपने तेल उत्पादक मित्र देशों को इस बात के लिए प्रोत्साहित किया कि वे अपना उत्पादन बढ़ाएं, ताकि अंतरराष्ट्रीय तेल बाजारों में स्थिरता बनी रहे। बहरहाल, एक दिलचस्प बदलाव यह आया है कि पारंपरिक आपूर्तिकर्ता देशों के मुकाबले अमेरिका से भारतीय तेल आयात तेजी से बढ़ रहा है। फिर यूएई ने भी आश्वस्त किया है कि मौजूदा हालात में भारत को जो भी कमी पड़ेगी, वह पूरी करेगा। लेकिन फारस की खाड़ी और इसके आसपास के इलाके में गहराते तनाव ने भारत की चिंताएं बढ़ा दी हैं।

इस संकट के कारण नुकसान और ज्यादा बढ़ सकता है, क्योंकि आयातित तेल पर भारत की निर्भरता पिछले साल बढ़कर 84 फीसदी पर पहुंच गई थी। हाल के वर्षों में भारत में तेल की खपत जहां तेजी से बढ़ी है, वहीं भारत का घरेलू तेल उत्पादन गिर गया है। साल 2015-16 में जहां यह उत्पादन 3.69 करोड़ टन था, वह पिछले वित्तीय वर्ष में 3.42 करोड़ टन रह गया। ऐसे में, अपनी ऊर्जा सुरक्षा को लेकर भारत का चिंतित होना लाजिमी है। भारत के लिए यह महत्वपूर्ण है कि पश्चिम एशिया में स्थिरता कायम रहे। कोई भी सैन्य टकराव इसके हितों के प्रतिकूल होगा। पश्चिम एशिया के देशों के साथ भारत के गहरे कारोबारी और निवेश ताल्लुकात तो हैं ही, सुरक्षा व अवाम से अवाम के संबंध भी हैं। पिछले साल अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो से मुलाकात में भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर ने यही कहा था।

इसमें दोराय नहीं कि अमेरिकी प्रतिबंधों ने भारत-ईरान संबंधों को प्रभावित किया है। तेल आयात पर रोक के अलावा दक्षिण-पूर्वी ईरान में महत्वाकांक्षी चाबहार बंदरगाह परियोजना में भी भारत ने बड़ा दांव लगा रखा है। यही नहीं, ईरान के तेल और गैस क्षेत्र में भी भारत ने अच्छा-खासा निवेश कर रखा है। हालांकि भारत ने पूर्व में यह कहा था कि वह सिर्फ संयुक्त राष्ट्र द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों का पालन करता है, न कि किसी अन्य देश द्वारा लगाई गई एकतरफा पाबंदी का, पर वास्तव में अमेरिका की ईरान नीति पर उसका रुख साफ नहीं दिखा। भारत की तेल कंपनियां ईरान के साथ कारोबार करने से कतरा रही हैं, यहां तक कि यूरोप की कंपनियां भी चाबहार परियोजना में भागीदारी करने से इनकार कर रही हैं।

साफ है, भारत-अमेरिकी संबंधों में ईरान एक बडे़ मसले के रूप में उभरा है। हालांकि ऐसे संकेत मिले हैं कि अपने द्विपक्षीय रिश्तों को देखते हुए अमेरिका एक हद के आगे दबाव नहीं बनाएगा, मगर ट्रंप प्रशासन ने भारतीय कूटनीति के लिए परेशानियां तो पैदा कर ही दी हैं। भारत पश्चिम एशिया के तीन धु्रवों- अरब देश, इजरायल और ईरान के बीच पारंपरिक रूप से एक संतुलन रखता आया है। लेकिन ट्रंप ने जिस तरह से ईरान पर शिकंजा कस दिया है, भारत की पश्चिम एशिया संबंधी नीति में अस्थिरता पैदा होगी।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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