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पर्यावरण बचाने का दशक

भारत डोगरा


अनेक प्रतिष्ठित वैज्ञानिकों ने धरती की जीवनदायिनी क्षमता की रक्षा की दृष्टि से इस नए दशक को दूरगामी महत्व का बताया है। कुछ चर्चित जलवायु विशेषज्ञों ने लगभग एक साल पहले पृथ्वी को बचाए रखने से संबंधित एक चेतावनी जारी की थी। बुलेटिन ऑफ द एटॉमिक साइंटिस्ट्स से अनेक नोबेल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिक जुड़े रहे हैं। इनकी ओर से प्रति वर्ष एक प्रतीकात्मक घड़ी ‘डूमस्डे क्लॉक’ जारी की जाती है। इस  घड़ी में रात के 12 बजे को धरती के विनाश का समय माना जाता है। वर्ष 2019 में घड़ी की सुइयों को 12 बजने से दो मिनट पहले पर सेट किया गया। इससे पहले इस प्रतीकात्मक घड़ी की सुइयों को विनाश के इतने नजदीक कभी सेट नहीं किया गया था। दो आधारों पर जलवायु विशेषज्ञ इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि पृथ्वी विनाश के नजदीक है। ये हैं- जलवायु परिवर्तन और महाविनाशक हथियार। इन दोनों मुद्दों के विस्तृत आकलन से वैज्ञानिक इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि धरती विनाश के इतने निकट कभी नहीं थी, जितनी इन दिनों है। इस तरह की पहली बड़ी चेतावनी 1992 में दी गई थी। उसके 25 वर्ष पूरे होने पर जब इसका आकलन वैज्ञानिकों ने किया, तो उन्होंने पाया कि जिन बिंदुओं के आधार पर वह चेतावनी दी गई थी, उनमें से एक (ओजोन परत) को छोड़कर शेष सभी ममलों में स्थिति पहले से और बिगड़ गई है। इस तथ्यात्मक स्थिति की ओर ध्यान दिलाते हुए इस चेतावनी की दोहराया गया, और इस पर लगभग 15,000 वैज्ञानिकों और जलवायु विशेषज्ञों ने दस्तखत किए।

अतः नए दशक के आरंभ में विश्व स्तर पर सबसे बड़ी जिम्मेदारी यही है कि धरती की जीवनदायिनी क्षमता की रक्षा के लिए एक बहुत बड़ा प्रयास किया जाए और इसके लिए संकीर्ण सरोकारों को छोड़कर विश्व स्तर पर एक बड़ी एकता कायम की जाए। इसके लिए अमन-शांति, पर्यावरण रक्षा और न्याय-समता के जन-आंदोलनों में एक बड़ा उभार लाना होगा व उनकी परस्पर एकता व एकजुटता कायम करनी होगी, ताकि वे परस्पर मिलकर एक बड़ी ताकत बन सकें। इस पूरे प्रयास में युवाओं और महिलाओं की भूमिका महत्वपूर्ण होगी।

क्या यह संभव है कि जबर्दस्त जन-शक्ति के उभार से विश्व स्तर पर हम सबसे बड़ी समस्या के समाधान की ओर तेजी से बढ़ें? स्वीडन की एक किशोरी ग्रेटा थनबर्ग ने पर्यावरण को बचाने की लड़ाई में जो भूमिका अख्तियार की, ट्रंप के रवैये के खिलाफ वह जिस तरह खड़ी हुई, यह इसका एक उदाहरण है। थनबर्ग की इस भूमिका को सराहा गया और वह टाइम मैग्जीन की पर्सन ऑफ द ईयर चुनी गई। दुनिया भर में इस तरह के व्यक्तित्वों के उभार और आंदोलन की जरूरत है। पर्यावरण की लड़ाई लड़ने के लिए व्यापक सोच की जरूरत है। आज धरती की रक्षा की बड़ी जिम्मेदारी के सामने संकीर्णताओं के लिए जरा भी स्थान नहीं है, हमें पूरी दुनिया की भलाई के बारे में सोचना है और भावी पीढ़ियों की चिंता करनी है। इन जिम्मेदारियों के अनुरूप जीवन-मूल्यों को अपनाना जरूरी है और इसमें शिक्षा की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका है।

विश्व के मौजूदा संकट की गंभीरता की ओर ध्यान दिलाने वालों में भी कई बार व्यापक सोच का अभाव दिखता है। वे जलवायु बदलाव जैसी समस्या के समाधान के तकनीकी पक्ष को तो रेखांकित करते हैं, पर यह नहीं बताते कि इसके साथ युद्ध व हिंसा, सांप्रदायिकता व भेदभाव, अन्याय व शोषण को रोकना भी जरूरी है। जब व्यापक सोच व निरंतरता से कार्य होगा, तो समस्याओं के समाधान भी मिलेंगे। यही नए दशक का सबसे बड़ा मकसद होना चाहिए।
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