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सीएबी और असम का पेच (अमर उजाला)

सुबीर भौमिक
देश के संवेदनशील पूर्वोत्तर राज्य असम में राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) को अद्यतन करने के बाद संसद के दोनों सदनों में विवादास्पद नागरिकता संशोधन विधेयक (सीएबी) का पारित होना धार्मिक आधार पर मतदाताओं को ध्रुवीकृत करने के भाजपा के इरादे को चिह्नित करता है। लेकिन देश के पूर्वी और पूर्वोत्तर क्षेत्र में इन दोनों कदमों ने भाजपा को मुश्किल में डाल दिया है। इसका आखिरी परिणाम, जैसा कि बंगाली में कहावत है,आम और बोरी दोनों खो देने, जैसा हो सकता है। दोनों सदनों में नागरिकता संशोधन विधेयक का सुगमतापूर्वक पारित होना व्यक्तिगत रूप से गृह मंत्री अमित शाह की बड़ी उपलब्धि है, क्योंकि वह राज्यसभा में पर्याप्त संख्या बल जुटाने में कामयाब रहे। इससे पहले मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में यह विधेयक पर्याप्त संख्या बल न होने के कारण राज्यसभा में गिर गया था। यह उन्हें महाराष्ट्र की त्रिशंकु विधानसभा में सरकार बनाने में शरद पवार द्वारा दिए गए झटके से उबरने में मदद कर सकता है।

लेकिन इससे पहले कि यह विधेयक राज्यसभा में पारित होता, असम और त्रिपुरा में हिंसा भड़क उठी। अमित शाह इनर लाइन परमिट (आईएलपी) वाले और छठी अनुसूची की स्वायत्तता के प्रावधानों वाले राज्यों व क्षेत्रों को इससे बाहर रखने का फैसला करके पूरे पूर्वोत्तर में तबाही रोकने में कामयाब रहे। इसलिए पूरा नगालैंड (जहां हाल ही में दीमापुर तक आईएलपी बढ़ाया गया है), मिजोरम, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर (जहां आईएलपी बढ़ाया गया है) और मेघालय को सीएबी के दायरे में नहीं लाया गया है। पर इसने निश्चित तौर पर असम और त्रिपुरा के मूल स्थानीय लोगों को परेशान किया है, जिन्हें लगता है कि उनके साथ धोखा हुआ है, क्योंकि उन्हें डर है कि उन्हें बंगाली हिंदुओं को नागरिकता देने वाले सीएबी का बोझ उठाना पड़ेगा। त्रिपुरा में बंगाली हिंदू बहुसंख्यक हैं और उनकी संख्या 70 फीसदी है, जबकि असम में बंगाली हिंदुओं की संख्या 13 फीसदी है।

वर्ष 2016 में भाजपा असम राज्य विधानसभा का चुनाव इसलिए जीती थी, क्योंकि असमिया, आदिवासी और बंगाली हिंदुओं, सभी ने अलग-अलग कारणों से उसे वोट दिया। एनआरसी को प्रभावी ढंग से लागू करने के भाजपा के वादे से असमिया और आदिवासी उत्साहित थे, और बंगाली हिंदुओं ने नागरिकता संशोधन विधेयक को लागू करने के पार्टी के वादे का स्वागत किया। अब लगभग 20 लाख लोग एनआरसी से बाहर हो गए हैं, जिसमें 11 लाख से ज्यादा बंगाली हिंदू हैं, एक लाख नेपाली हिंदू हैं और कुछ हिंदू आदिवासी हैं। एनआरसी की कवायद का समर्थन करने वाली भाजपा ने इस पर जमकर हंगामा किया और असम के मंत्री हेमंत विस्वा शर्मा ने फिर से एनआरसी की मांग की। अमित शाह ने इसे देश के बाकी हिस्सों के साथ करने का वादा किया। यहीं पेच फंसा है, अगर इन हिंदुओं को नागरिकता नहीं मिलती, तो भाजपा बंगाली हिंदुओं का समर्थन खो देगी और बिना उनके समर्थन के उसके लिए सत्ता में बने रहना मुश्किल होगा। लेकिन असम में संघर्ष कभी धार्मिक नहीं रहा, वहां जातीय और भाषायी संघर्ष रहा। जातीय असमियों के लिए बंगाली (हिंदू और मुस्लिम, दोनों) अवांछित घुसपैठिए हैं, जो पड़ोसी राज्य त्रिपुरा की तरह राज्य की जनसांख्यिकी को बदल सकते हैं। इसलिए अगर भाजपा असम में बंगाली हिंदुओं को नागरिकता देने के लिए सीएबी का इस्तेमाल करती है, तो असमिया और आदिवासी इसका विरोध करेंगे। पिछले दो दिनों के हिंसक विरोध प्रदर्शन ने 1980 के दशक के असम आंदोलन के सबसे बुरे दिनों को फिर से जीवित कर दिया है।

लेकिन अगर भाजपा असम में बंगाली हिंदुओं को नागरिकता देने के लिए सीएबी का इस्तेमाल करने में विफल रहती है, तो इसका पश्चिम बंगाल में भाजपा के भविष्य पर बहुत बुरा असर पड़ सकता है। ममता बनर्जी ने पहले ही एनआरसी का राजनीतिकरण करते हुए असम में मुस्लिमों की तुलना में बंगाली हिंदुओं के बहिष्करण का हवाला देकर दावा किया है कि यह 'न सिर्फ मुस्लिम विरोधी है, बल्कि उससे ज्यादा बंगाली विरोधी' है। पश्चिम बंगाल में हाल में तीनों उपचुनावों में भाजपा उम्मीदवारों की हार उन्हें सही साबित करती है। पश्चिम बंगाल के राज्य भाजपा प्रमुख दिलीप घोष मानते हैं कि 'एनआरसी ने हमारी संभावनाओं को बुरी तरह प्रभावित किया है।' खड़गपुर, जहां 2016 में वह आराम से जीते थे और जहां लोकसभा के चुनाव में उन्होंने 45,000 मतों की बढ़त पाई थी, भाजपा के उम्मीदवार तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार से 21,000 मतों से हार गए। ममता और उनके समर्थक पहले से ही पश्चिम बंगाल में एनआरसी और सीएबी के खिलाफ अभियान चला रहे हैं, और अमित शाह को इन्हें राज्य में लागू करने की चुनौती देते हैं। भाजपा के लिए असम, त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल में बंगाली हिंदुओं का समर्थन प्राप्त करने का एकमात्र तरीका सीएबी को प्रभावी ढंग से लागू करना और उन्हें नागरिकता सुनिश्चित करना है। अन्यथा भाजपा आक्रामक ममता के खिलाफ पश्चिम बंगाल में 2021 के चुनाव में बैकफुट पर रहेगी। लेकिन असम में पश्चिम बंगाल के साथ चुनाव होंगे और असम में सीएबी को आगे बढ़ाने पर असमिया और आदिवासी परेशान होंगे। यह भी आशंका है कि जब अमित शाह पश्चिम बंगाल में एनआरसी और सीएबी को लागू करने की कोशिश करें, तो वहां भी हिंसा भड़क सकती है।

एनआरसी और सीएबी की कवायद ने पश्चिम बंगाल और पूर्वोत्तर में अनिश्चितता व निराशा की धुंध बिछा दी है और यह मोदी की लुक ईस्ट पॉलिसी के लिए अच्छा नहीं है, जिसे वह अगले सप्ताह जापान के प्रधानमंत्री शिंजो अबे के साथ गुवाहाटी में शिखर बैठक करके बढ़ावा देना चाहते हैं। हो सकता है कि हिंसा के कारण उन्हें आयोजन स्थल बदलने के लिए मजबूर होना पड़े। और यह निश्चित रूप से पूर्व और पू्र्वोत्तर क्षेत्र में जापानी निवेश को बाधित करेगा, जिसके लिए प्रधानमंत्री मोदी प्रयत्नशील हैं।

सौजन्य - अमर उजाला
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