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वित्तीय स्थिरता का बचाव (बिजनेस स्टैंडर्ड)

अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व की फेडरल मुक्त व्यापार समिति ने वर्ष 2019 में अपनी नीतियों में बदलाव किया। यह बदलाव अमेरिका-चीन व्यापार विवाद समेत अन्य वजहों से बढ़ रही आर्थिक अनिश्चितता से निपटने के लिए किया गया। फेड ने वर्ष 2019 में दरों में तीन बार कटौती की जबकि 2018 में इसमें चार बार इजाफा किया गया था। ताजा अनुमान बताते हैं कि अमेरिकी केंद्रीय बैंक 2020 में ब्याज दरों को अपरिवर्तित रख सकता है।

इस बीच यूरोपीय केंद्रीय बैंक ने अपनी जमा दर को नकारात्मक करने के बाद परिसंपत्ति खरीद का दौर शुरू किया है। बैंक ऑफ जापान ने वृद्धि और कीमतों को समर्थन देने के लिए परिसंपत्ति खरीद का सिलसिला जारी रखा है। ऐसा प्रतीत होता है कि वैश्विक वित्तीय हालात निकट भविष्य में उदार बने रहेंगे। उदार मौद्रिक नीति जहां वैश्विक वृद्धि के लिए मददगार साबित होगी, वहीं यह परिसंपत्ति कीमतों और नकदी की स्थिति में सुधार कर वित्तीय तंत्र के लिए जोखिम भी बढ़ा सकती है। अनुभव बताता है कि अमेरिकी मौद्रिक नीति वैश्विक वित्तीय चक्र पर बहुत असर डालती है।

इस संदर्भ में देखें तो भारत को भी अपने हितों का बचाव करना होगा। नीति निर्माताओं को भी वित्तीय स्थिरता का संरक्षण करने के लिए हस्तक्षेप करने होंगे। हाल के वर्षों में मौद्रिक सख्ती और नरमी का अध्ययन करने वाली रेटिंग एजेंसी क्रिसिल का एक नया अध्ययन बताता है कि सख्ती के दिनों में विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (एफपीआई) में कमी आई जबकि नरमी के दिनों में वह बेहतर रहा। वित्तीय संकट के बाद की मौद्रिक सहजता के दौर में एफपीआई की आवक मजबूत थी, हालांकि उस दौर में घरेलू वृहद स्थिति कमजोर थी। बहरहाल, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) की राह इससे अलग थी और वह घरेलू अर्थव्यवस्था से अधिक करीबी से जुड़ी रही। नरमी के दिनों से तुलना करें तो भारत को सख्ती के दिनों में अधिक एफडीआई हासिल हुआ क्योंकि उस दौर में वृद्धि मजबूत थी।

वित्त वर्ष 2014-19 के दरमियान अर्थव्यवस्था 7.3 फीसदी की दर से विकसित हुई। अर्थव्यवस्था में धीमापन आने के साथ एफडीआई की आवक भी धीमी हुई। देश को आर्थिक वृद्धि में नई जान फूंकनी होगी ताकि बचत के अंतर को पाटने के लिए पूंजी जुटाई जा सके। चालू खाते का घाटा पाटने के लिए पोर्टफोलियो आवक पर अधिक निर्भरता जोखिम बढ़ा सकती है। फेड की नीतिगत उदारता से बाह्य वाणिज्यिक उधारी भी बढ़ सकती है। हालांकि भारतीय रिजर्व बैंक ने हाल के दौर में नीतिगत दरों में 135 आधार अंकों की कमी की है लेकिन इसका असर दरों में कमी के रूप में नहीं दिखा है। इससे देश के कारोबारियों को बाहर से ऋण लेने का प्रोत्साहन मिल सकता है। खबरों के मुताबिक इस वर्ष के आरंभिक 10 महीनों में भारतीय कंपनियों ने विदेश से 13.74 अरब डॉलर की राशि जुटाई। पिछले वर्ष की समान अवधि में यह मात्रा 1.65 अरब डॉलर थी।

बाहरी उधारी और पोर्टफोलियो आवक में उच्च वृद्धि आरबीआई को चुनौती दे सकती है। यह रुपये पर दबाव बना सकती है और निर्यात को प्रभावित कर सकती है। वास्तविक प्रभावी विनिमय दर में अधिमूल्यन नजर आ रहा है। इसने हाल के वर्षों में निर्यात पर असर डाला है। हालांकि वस्तु एवं सेवा कर के क्रियान्वयन की दिक्कतों की भी भूमिका है। यदि आरबीआई एक बार फिर हस्तक्षेप करता है तो तंत्र में रुपया बढ़ेगा जो मुद्रास्फीति को प्रभावित कर सकता है। ऐसे में वैश्विक माहौल के मद्देनजर भारत को विदेशी फंड प्रवाह की प्राथमिकता समझदारी से तय करनी होगी। भारत एफडीआई के लिए माहौल बना सकता है और ऋण प्रवाह पर निर्भरता कम कर सकता है। हालांकि चालू खाता घाटा सहज स्तर पर रह सकता है लेकिन धीमी वृद्धि के समय डॉलर डेट में इजाफा और बढ़ता राजकोषीय दबाव वित्तीय स्थिरता को प्रभावित कर सकते हैं।
सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।
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