साथिया का साथ (नवभारत टाइम्स)

राष्ट्रीय किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम के तहत देश के 26 करोड़ किशोर-किशोरियों को हमउम्र शिक्षकों के जरिए सेहत संबंधी महत्वपूर्ण सूचनाओं से लैस करने की ताजा सरकारी पहल दिलचस्प है। बच्चे शिक्षकों या अभिभावकों से जब कोई बात सुनते हैं तो अमूमन उसे उपदेश के रूप में लेते हैं। उन बातों के प्रति सहज अरुचि उनमें […]

संयत रहें प्रधानमंत्री (नवभारत टाइम्स)

उत्तर प्रदेश के चुनाव प्रचार में प्रधानमंत्री से लेकर छुटभैये नेता तक अपने विरोधियों के लिए जितनी कड़वाहट भरी और अभद्र भाषा का प्रयोग कर रहे हैं, वह चिंता का विषय है। इससे एक बार फिर यह साफ हो गया है कि हमारे नेताओं में इतना आत्मविश्वास नहीं है कि वे ठोस मुद्दों पर बात […]

सांस्कृतिक गौरव बढ़ाती मातृभाषा (अतुल कनक) (पत्रिका)

विश्व मातृभाषा दिवस आज- यह बात सही है कि विभिन्न भाषाओं का ज्ञान हमारी अभिव्यक्तिको समृद्ध बनाता है। भाषाएं एक-दूसरे की विरोधी नहीं होती लेकिन मातृभाषा के प्रति लगाव अलग ही गौरव का आभास कराता है। ऐसे में हमारे लिए यह मौका है कि हम सब अपनी-अपनी मातृभाषा की ताकत को पहचानें। भाषाएं केवल अभिव्यक्ति […]

बच्चों को मिले हक (पत्रिका)

हर बच्चे को मां-बाप का प्यार पाने का हक है लेकिन हर बच्चे को ये हक मिलता नहीं। दिल्ली हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में ये व्यवस्था दी है लेकिन हकीकत में ऐसा होता नहीं। दिल्ली हाईकोर्ट ही क्यों, देश की तमाम अदालतें अलग-अलग मौकों पर लडऩे-झगडऩे वाले मां-बाप को ऐसी नसीहतें देती आई हैं। […]

पहले निपटें चीन से टकराव के मुद्दे (प्रो. स्वर्ण सिंह) (पत्रिका)

भारत-चीन के बीच रणनीतिक वार्ता 22 फरवरी को होगी। डोनाल्ड ट्रंप के ट्रांस पैसेफिक पार्टनरशिप (टीपीपी)से पीछे हटने और यूरोपीय यूनियन के ‘ब्रेग्जिट’ में उलझे होने के कारण भारत -चीन के लिए जरूरी हो गया है कि वे आपसी मसलों को सुलझाकर क्षेत्रीय और वैश्विक मुद्दों में योगदान की समझ विकसित करें। हमारे विदेश मंत्रालय […]

रिसोर्ट की राजनीति (पत्रिका)

देश की राजनीति रिसोर्टों की बंधक हो गई है। तमिलनाडु में ‘लोकसेवक’ होने का दम भरने वाले विधायक लगभग हफ्ते भर तक समुद्र तट पर स्थित गोल्डन-बे रिसोर्ट में डेरा जमाए रहे। रोज टीवी चैनलों पर रिसोर्ट की तस्वीरें दिखाई जातीं। लक्जरी एसयूवी गाडिय़ों में आते-जाते नेता मीडिया से कुछ यूं मुंह छिपाते थे कि […]

वेतन तो ‘पूर्णमासी का चांद’ (पत्रिका)

व्यंग्य राही की कलम से हर भारतीय बापू यानी पिता का सपना होता है कि बेटा बड़ा होकर सरकारी अफसर बने। इसका कारण भी है। अंग्रेजों के जमाने से ही सरकारी मुलाजिमी को मलाईदार दूध समझा जाता रहा है। आप कर्मचारी से अफसर बन गए तो कहना ही क्या? दसों अंगुलिया घी में और सिर […]

निकम्मे निकाय (पत्रिका)

भुवनेश जैन आखिरकार राज्य सरकार ने अपने कुप्रबंध का ठीकरा मेहनतकश जनता के सिर फोड़ दिया है। एक फरमान जारी कर जिम, ब्यूटी पार्लर, बेकरी, कैंटीन, कैफे आदि को भी लाइसेंस के दायरे में ला दिया है। हो सकता है आने वाले दिनों में पान की दुकानों, हेयर ड्रेसरों और टी स्टालों को भी रोजी-रोटी […]

गरम मौसम के खिलाफ (हिन्दुस्तान)

लगभग डेढ़ महीने पहले जब यह साल शुरू हुआ था, तो उत्साह का माहौल था। ग्लोबल वार्मिंग के खतरों की बातें अपनी जगह थीं, लेकिन उन चीजों का जिक्र भी हो रहा था, जो सकारात्मक हैं। कहा जा रहा था कि सौर ऊर्जा के क्षेत्र में दुनिया ने जो तरक्की की है, वह बहुत बड़ी […]

हमारे लोकतंत्र में महिलाएं (हिन्दुस्तान)

नजीमा बीबी का नाम सुना है आपने? न सुना हो, तो मैं बता देता हूं। वह देश के एक गुमनाम हिस्से में नया इतिहास रचने की कोशिश कर रही हैं। कट्टरपंथियों ने उन्हें धमकाया है कि इसके परिणाम बुरे होंगे, इतने बुरे कि उन्हें मरने के बाद दफन के लिए कब्र भी नसीब नहीं होगी। […]

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