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-Rajeev Kumar (Editor-in-chief)

Monday, April 19, 2021

आपका धर्म नहीं पूछता (राष्ट्रीय सहारा)

पिछले वर्ष कोरोना ने जब अचानक दस्तक दी तो पूरी दुनिया थम गई थी। सदियों में किसी को कभी ऐसा भयावह अनुभव नहीं हुआ था। तमाम तरह की अटकलें और अफवाहों का बाजार गर्म हो गया। एक दूसरे देशों पर कोरोना फैलाने का आरोप लगने लगे। चीन को सबने निशाना बनाया। पर कुछ तो राज की बात है कोरोना कि दूसरी लहर में। जब भारत की स्वास्थ्य और प्रशासनिक व्यवस्था लगभग अस्त–व्यस्त हो गई है तो चीन में इस दूसरी लहर का कोई असर क्यों नहीं दिखाई दे रहाॽ क्या चीन ने इस महामारी के रोकथाम के लिए अपनी पूरी जनता को टीके लगवा कर सुरक्षित कर लिया हैॽ 


 कोविड की पिछली लहर आने के बाद से ही दुनिया भर के वैज्ञानिकों ने इसके मूल कारण और उसका तोड़ निकालने की मुहिम छेड़ दी थी। पर भारत में जिस तरह कुछ टीवी चौनलों और राजनैतिक दलों ने कोविड फैलाने के लिए तब्लीगी जमात को जिम्मेदार ठहराया और उसके सदस्यों को शक की नजर से देखा जाने लगा वो बड़ा अटपटा था। प्रशासन भी उनके पीछे पड़ गया। जमात के प्रांतीय अध्यक्ष के खिलाफ गैर जिम्मेदाराना भीड़ जमा करने के आरोप में कई कानूनी नोटिस भी जारी किए गए। दिल्ली के निजामुद्दीन क्षेत्र को छावनी में तब्दील कर दिया गया। यही मान लिया गया कि चीन से निकला यह वायरस सीधे तब्लीगी जमात के कार्यक्रम का हिस्सा बनने के लिए ही आया था। ये बेहद गैर–जिम्मेदाराना रवैया था। माना कि मुसलमानों को लIय करके भाजपा लगातार हिंदुओं को अपने पक्ष में संगठित करने में जुटी है। पर इसका मतलब यह तो नहीं कि जानता के बीच गैरवैज्ञानिक अंधविश्वास फैलाया जाए। 


जो भी हो शासन का काम प्रजा की सुरक्षा करना और समाज में सामंजस्य स्थापित करना होता है। इस तरह के गैर जिम्मेदाराना रवैये से समाज में अशांति और अराजकता तो फैली ही‚ जो ऊर्जा और ध्यान कोरोना के उपचार और प्रबंधन में लगना चाहिए थी वो ऊर्जा इस बेसिरपैर के अभियान में बर्बाद हो गई। हालत जब बेकाबू होने लगे तो सरकार ने कड़े कदम उठाए और लॉकडाउन लगा डाला। उस समय लॉकडाउन का उस तरह लगाना भी किसी के गले नहीं उतरा। सबने महसूस किया कि लॉकडाउन लगाना ही था तो सोच–समझकर व्यावहारिक दृष्टिकोण से लगाना चाहिए था। क्योंकि उस समय देश की स्वास्थ्य सेवाएं इस महामारी का सामना करने के लिए तैयार नहीं थी इसलिए देश भर में काफी अफरा–तफरी फैली‚ जिसका सबसे ज्यादा खामियाजा करोड़ों गरीब मजदूरों को झेलना पड़ा। बेचारे अबोध बच्चों के लेकर सैकड़ों किलोमीटर पैदल चल कर अपने गांव पहुंचे। लॉकडाउन में सारा ध्यान स्वास्थ्य सेवाओं पर ही केंद्रित रहा‚ जिसकी वजह से धीरे धीरे स्थित नियंत्रण में आती गई। उधर वैज्ञानिकों के गहन शोध के बाद कोरोना की वैक्सीन तैयार कर ली और टीका अभियान भी चालू हो गया‚ जिससे एक बार फिर समाज में एक उम्मीद की किरण जागी। इसलिए सभी देशवासी वही कर रहे थे जो सरकार और प्रधानमंत्री उनसे कह रहे थे। फिर चाहे कोरोना भागने के लिए ताली पीटना हो या थाली बजाना। पूरे देश ने उत्साह से किया। ॥ ये बात दूसरी है कि इसके बावजूद जब करोड़ों का प्रकोप नहीं थमा तो देश में इसका मजाक भी खूब उड़ा। क्योंकि लोगों का कहना था कि इसका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं था‚ लेकिन हाल के कुछ महीनों में जब देश की अर्थव्यवस्था सही रास्ते पर चलने लगी थी तो कोरोना की दूसरी लहर ने फिर से उम्मीद तोड़ दी है। आज हर तरफ से ऐसी सूचनाएं आ रही हैं कि हर दूसरे घर में एक न एक संक्रमित व्यक्ति है। अब ऐसा क्यों हुआॽ इस बार क्या फिर से उस धर्म विशेष के लोगों ने क्या एक और बड़ा जलसा कियाॽ या सभी धर्मों के लोगों ने अपने–अपने धार्मिक कार्यक्रमों में भारी भीड़ जुटा ली और सरकार या मीडिया ने उसे रोका नहींॽ तो क्या फिर अब इन दूसरे धर्मावलम्बियों को कोरोना भी दूसरी लहर के लिए जिम्मेदार ठहराया जाएॽ ये फिर वाहियात बात होगी। कोरोना का किसी धर्म से न पहले कुछ लेनादेना था न आज है। सारा मामला सावधानी बरतने‚ अपने अंदर प्रतिरोधी क्षमता विकसित करने और स्वास्थ्य सेवाओं के कुाल प्रबंधन का है‚ जिसमें कोताही से ये भयावह स्थित पैदा हुई है। इस बार स्थित वाकई बहुत गम्भीर है। लगभग सारे देश से स्वास्थ्य सेवाओं के चरमराने की खबरें आ रही है। 


 संक्रमित लोगों की संख्या दिन दूनी और रात चौगुनी बढ़ रही है और अस्पतालों में इलाज के लिए जगह नहीं है। आवश्यक दवाओं का स्टॉक काफी स्थानों पर खत्म हो चुका है। नई आपूर्ति में समय लगेगा। श्मशान घाटों तक पर लाइनें लग गई हैं। स्थिति बाद से बदतर होती जा रही है। मेडिकल और पैरा मेडिकल स्टाफ के हाथ पैर फूल रहे हैं। इस अफरा–तफरी के लिए लोग चुनाव आयोग‚ केंद्र व राज्य सरकारों‚ राजनेताओं और धर्म गुरुओं को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं‚ जिन्होंने चुनाव लड़ने या बड़े धार्मिक आयोजन करने के चक्कर में सारी मर्यादाओं को तोड़ दिया। आम जनता में इस बात का भी भारी आक्रोश है कि देश में हुक्मरानों और मतदाताओं के लिए कानून के मापदंड अलग–अलग हैं। जिसके मतों से सरकार बनती है उसे तो मास्क न लगाने पर पीटा जा रहा है या आर्थिक रूप से दंडित किया जा रहा है‚ जबकि हुक्मरान अपने स्वार्थ में सारे नियमों को तोड़ रहे हैं। 


 सोशल मीडिया पर नावæ का एक उदाहरण काफी वायरल हो रहा है। वहां सरकार ने आदेश जारी किया था कि १० से ज्यादा लोग कहीं एकत्र न हों पर वहां की प्रधानमंत्री ने अपने जन्मदिन की दावत में १३ लोगों को आमंत्रित कर लिया। इस पर वहां की पुलिस ने प्रधानमंत्री पर १.७५ लाख रुपये का जुर्माना ठोक दिया‚ यह कहते हुए अगर यह गलती किसी आम आदमी ने की होती तो पुलिस इतना भारी दंड नहीं लगाती‚ लेकिन प्रधानमंत्री ने नियम तोड़ा‚ जिनका अनुसरण देश करता है‚ इसलिए भारी जुर्माना लगाया। प्रधानमंत्री ने अपनी गलती मानी और जुर्माना भर दिया। हम भारत को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र बताते हुए नहीं थकते पर क्या ऐसा कभी भारत में हो सकता हैॽ हो सकता तो आज जनता इतनी बदहाली और आतंक में नहीं जी रही होती।


सौजन्य - राष्ट्रीय सहारा।

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कोरोना संक्रमण के बेलगाम होने के चलते कई राज्यों में लॉकडाउन की हुई वापसी, नहीं थमेगा उद्योगों का पहिया (दैनिक जागरण)

कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर की आशंका के बाद भी धार्मिक सांस्कृतिक एवं राजनीतिक कार्यक्रम और खासकर रैलियां करने की क्या जरूरत थी? कम से कम अब तो आम लोगों और नीति-नियंताओं को जरूरी सबक सीख ही लेने चाहिए।


दिल्ली में एक सप्ताह और राजस्थान में 15 दिन के लिए लॉकडाउन की घोषणा के साथ इलाहाबाद उच्च न्यायालय की ओर से उत्तर प्रदेश के पांच शहरों में 26 अप्रैल तक लॉकडाउन लगाने के आदेश के बाद यह तय है कि कुछ और राज्य इसी दिशा में आगे बढ़ेंगे। महाराष्ट्र पहले ही लॉकडाउन लगा चुका है। यदि लॉकडाउन की वापसी हो रही है तो इसीलिए कि और कोई उपाय नहीं रह गया था। लॉकडाउन की मजबूरी यह बताती है कि रात के कर्फ्यू बेअसर थे। यह अच्छा हुआ कि इस बार केंद्र सरकार ने अपने स्तर पर देशव्यापी लॉकडाउन लगाने के बजाय राज्यों पर यह छोड़ दिया कि वे अपने यहां के हालात के हिसाब से फैसला लें। राज्यों को यह ध्यान रहे कि लॉकडाउन में न तो जरूरी सेवाएं बाधित होने पाएं और न ही औद्योगिक उत्पादन थमने पाए। उन्हें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि आवश्यक वस्तुओं के साथ-साथ औद्योगिक उत्पाद एवं कच्चे माल की आवाजाही का तंत्र बिना किसी बाधा के काम करता रहे। यह ठीक नहीं कि महाराष्ट्र और दिल्ली से कामगारों की वापसी होती दिख रही है। इन कामगारों में कारखाना मजदूर भी हैं। जब औद्योगिक प्रतिष्ठान बंद नहीं किए जा रहे तो फिर कारखाना मजदूर क्यों पलायन कर रहे हैं?


यदि लॉकडाउन के कारण उद्योगों का पहिया थमा तो फिर से एक नई समस्या खड़ी हो जाएगी। ऐसे में यह आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य है कि राज्य सरकारों की ओर से जनता को यह संदेश दिया जाए कि अबकी बार अलग तरह का लॉकडाउन है, जिसमें जरूरी सतर्कता यानी कोविड प्रोटोकॉल के साथ काफी कुछ चलता और खुला रहेगा, जैसे ई-कामर्स डिलीवरी और कुछ पाबंदियों के साथ सार्वजनिक परिवहन। वास्तव में इस आशय का केवल संदेश ही नहीं दिया जाना चाहिए, बल्कि ऐसे जतन भी किए जाने चाहिए कि लॉकडाउन का अर्थव्यवस्था पर न्यूनतम असर हो। लॉकडाउन की अवधि में जिन आर्थिक-व्यापारिक गतिविधियों के लिए अनुमति दी गई है, वहां संक्रमण से बचे रहने की पूरी सावधानी बरती जाए। इसके लिए जितनी कोशिश शासन-प्रशासन को करनी होगी, उतनी ही आम लोगों को भी। यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि यदि न चाहते हुए लॉकडाउन लगाना पड़ रहा है तो कोरोना संक्रमण के बेलगाम होने के साथ-साथ कुछ भूलों के कारण भी। जैसे जनवरी-फरवरी के बाद आम जनता ने बेफिक्री दिखाई, वैसे ही उन्हें दिशा देने या उनका नेतृत्व करने वालों ने भी। समझना कठिन है कि संक्रमण की दूसरी लहर की आशंका के बाद भी धार्मिक, सांस्कृतिक एवं राजनीतिक कार्यक्रम और खासकर रैलियां करने की क्या जरूरत थी? कम से कम अब तो आम लोगों और नीति-नियंताओं को जरूरी सबक सीख ही लेने चाहिए।

सौजन्य - दैनिक जागरण।

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देश की चरमराती स्वास्थ्य व्यवस्था, कई शहरों में ऑक्सीजन की कमी, कोरोना मरीजों को अस्पतालों में भर्ती होने के लाले पड़े (दैनिक जागरण)

हमारा स्वास्थ्य ढांचा देश की जरूरतों के अनुरूप नहीं है। देश में चिकित्सकों स्वास्थ्य कर्मियों एवं अस्पतालों की संख्या आबादी के अनुपात में बहुत कम है। यदि कोरोना संक्रमण की पहली लहर के समय ही सरकारें चेत जातीं तो शायद जो स्थिति बनी उससे बचा जा सकता था।


देश भर में 162 ऑक्सीजन प्लांट लगाने की मंजूरी के बाद अब यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि ये प्लांट यथाशीघ्र कार्य करना प्रारंभ कर दें। बेहतर हो कि केंद्र के साथ राज्य सरकारें भी इस पर निगाह रखें कि ये प्लांट समय रहते कार्य शुरू करते हैं या नहीं? यह काम प्राथमिकता के आधार पर इसलिए किया जाना चाहिए, क्योंकि देश के विभिन्न शहरों में ऑक्सीजन की कमी वास्तव में महसूस की जा रही है। इसके चलते कोरोना के मरीजों और उनके परिवार वालों में चिंता व्याप्त है। चिंता पैदा करने का काम कोरोना मरीजों के उपचार में उपयोगी इंजेक्शन रेमडेसिविर की अनुपलब्धता भी कर रहा है। यह ठीक है कि फार्मा कंपनियों ने इसके दाम कम कर दिए हैं, लेकिन इसका लाभ तो तब मिलेगा, जब यह इंजेक्शन आसानी से उपलब्ध भी हो। स्पष्ट है कि इस इंजेक्शन की उपलब्धता बढ़ाने के लिए भी युद्धस्तर पर कार्य करने की जरूरत है। चिकित्सा संसाधन बढ़ाने के उपाय युद्धस्तर पर होने भी चाहिए और होते हुए दिखने भी चाहिए, क्योंकि तभी जनता को यह संदेश जाएगा कि केंद्र एवं राज्य सरकारें अपने सारे मतभेद भुलाकर आम लोगों को राहत देने के काम में जुट गई हैं। यह समय दलगत राजनीति करने अथवा आरोप-प्रत्यारोप लगाने का नहीं, बल्कि संकट का मिलजुलकर मुकाबला करने का है। यह खेद की बात है कि कुछ राजनीतिक दल अपने हिस्से की जिम्मेदारी का निर्वाह करने के बजाय सस्ती राजनीति करने का समय निकाल ले रहे हैं। उन्हें अपनी ऊर्जा उन कारणों का निवारण करने में लगानी चाहिए, जिनके चलते मरीजों को अस्पतालों में भर्ती होने के लाले पड़े हैं।


स्वास्थ्य ढांचे के समक्ष आज जो विषम स्थिति है, इसका एक कारण तो कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर का ज्यादा तेज होना है और दूसरा, इस लहर का सामना करने के लिए पूरी तैयारी न किया जाना। आखिर जब कोरोना संक्रमण की पहली लहर के वक्त ही यह स्पष्ट हो गया था कि हमारा स्वास्थ्य ढांचा देश की जरूरतों के अनुरूप नहीं है, तब फिर उसे मजबूत बनाने के प्रयास उसी समय क्यों नहीं शुरू किए गए? इस सवाल का जवाब इसलिए मिलना चाहिए, ताकि कम से कम अब तो किसी स्तर पर ढिलाई न बरती जाए। देश और प्रांत स्तर पर स्वास्थ्य तंत्र पर निगाह रखने वाले हमारे नीति-नियंता इससे अनभिज्ञ नहीं हो सकते कि अपने देश में चिकित्सकों, स्वास्थ्य कर्मियों एवं अस्पतालों की संख्या आबादी के अनुपात में बहुत कम है। यदि कोरोना संक्रमण की पहली लहर के समय ही केंद्र एवं राज्य सरकारें चेत जातीं तो शायद जो स्थिति बनी, उससे बचा जा सकता था। कम से कम अब तो सही सबक सीखा जाए।

सौजन्य - दैनिक जागरण।

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To level the playing field at work, start by levelling it at home (Hindustan Times)

By Shyel Trehan

On April 15, the Chief Justice of India (CJI) SA Bobde, while hearing a case on judicial appointments, remarked that the time had come for a woman CJI. But, he said, chief justices of high courts stated that women lawyers have often refrained from taking up judgeship citing domestic and parental responsibilities. After the initial outrage wore off, I looked at the statement again.

It is true that women in all professions disproportionately bear the responsibility of being a primary parent to their children.

Yes, women can multi-task, yes, they can have it all, and yes, they can reach the pinnacles of their chosen careers. Many women on the Bench today have raised children, been caregivers to ailing family members, yet shown how it’s done professionally.

But the statement still hurt. A lot. I convinced myself it doesn’t apply to me. I play ball with the boys. While I am a mother, and the primary parent to my son and daughter, I believe I work as hard as my male counterparts. I convinced myself it doesn’t apply to me because my husband fills in parenting gaps with pleasure when my career requires him to. Thinking back, however, reminded me how that wasn’t exactly true.

I thought back to my first pregnancy, which was over a decade ago. Visibly pregnant at eight-and-a-half months, standing in a crowded court room in the Supreme Court for several hours. I never asked anyone for a chair, because I believe that if you want to be treated as genderless, you must treat yourself as exactly that. Nor was any chair ever offered.

I thought back to a few months after that, and the sight of a female colleague walking out of a Supreme Court courtroom in tears. She had delivered a baby three weeks earlier, and the presiding judge said he would like to hear the matter after he was done with all the other cases. She explained her situation, baby in the parking lot waiting for her, in his grandmother’s arms. Still, the court did not think it appropriate to adjourn the matter for a few weeks at her request.

I thought back to the time a senior counsel retorted, “that is the most ridiculous excuse I have heard” when a female colleague told a judge that she could not stay beyond 4.30pm as she had to breastfeed her newborn baby.

Today those days feel like a different life. My children are older and my career more established. But those were the years in your career when a woman is not fungible with her spouse in carrying and feeding a baby. Those are years when you need the system to support you, in order to stay in the system.

While we look today at the minuscule number of female judges and designated senior counsel, we should recognise that these women did it despite the odds. The system did not make it easy for them or support them through the difficult years. These are the ones that made it through. I am now on to the next phase, a phase where both parents are equally equipped to parent. The CJI cited Class 12 Board exams. There is no reason why parenting cannot be an equal partnership at that stage.

I am fortunate to practice in perhaps the most gender-neutral environment of any court in the country. Today, the Delhi High Court is not a “boys club”, either at the bar or the bench, but this is not true of courts in other cities and states. We need to change that.

Historically, parenting, care-giving and domestic activities finding mention in work life was perceived to be weak or unprofessional. That’s because someone outside the workplace was performing them. Women are not asking for special treatment at the workplace. Barring the few sensitive years of childbearing, they don’t need it, if they simply receive equal treatment at home.

Shyel Trehan is a graduate of NLSIU, Bangalore and Columbia Law School. She is a counsel practising in the Delhi High Court and Supreme Court.

Courtesy - Hindustan Times.

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कोरोना के प्रति लापरवाही से पहले डॉक्टरों तथा नर्सों के बारे में भी सोच लीजिए (पंजाब केसरी)

कोरोना की दूसरी लहर से इस समय सारा देश बेहाल है अगर आपके कोरोना वायरस टैस्ट करवाने की लाइन में 20,000 लोग आपसे आगे हों, अगर टैस्ट की रिपोर्ट 14 घंटों की बजाय कम से कम 2 दिन में आए, इलाज के लिए दवाइयों, आक्सीजन

कोरोना की दूसरी लहर से इस समय सारा देश बेहाल है अगर आपके कोरोना वायरस टैस्ट करवाने की लाइन में 20,000 लोग आपसे आगे हों, अगर टैस्ट की रिपोर्ट 14 घंटों की बजाय कम से कम 2 दिन में आए, इलाज के लिए दवाइयों, आक्सीजन उपकरणों, बैड्स और वैंटीलेटर की भी कमी हो तो निश्चित रूप से दिखाई देने वाली कहानी का एक और पक्ष बेहद गंभीर होगा। संक्रमण के लगातार बढ़ते आंकड़ों के चलते अनेक राज्य किसी न किसी रूप में कफ्र्यू तथा लॉकडाऊन लगाने के लिए मजबूर हो चुके हैं। 

कोरोना से ग्रस्त गम्भीर मरीजों की जान बचाने वाली ‘रेमडेसिविर’ तथा ‘टोसिलीजुमाब’ जैसी दवाइयों की भारी किल्लत के बीच सोशल मीडिया इन्हें उपलब्ध करवाने वालों की मदद की गुहार से भर चुका है। इसके बावजूद लोग कोरोना को लेकर उतने गम्भीर नहीं हैं जितना उन्हें होना चाहिए था। स्थिति की गम्भीरता का पता इसी बात से चल रहा है कि देश के अधिकतर बड़े शहरों की स्वास्थ्य व्यवस्था पूरी तरह चरमरा चुकी है। 

पहली लहर की तुलना में दूसरी लहर से निपटने के लिए डाक्टरों तथा चिकित्सा जगत से जुड़े अन्य लोगों की शारीरिक रूप से तैयारी बेहतर होने के बावजूद सबसे अधिक ङ्क्षचता की बात यह है कि दूसरी लहर में डॉक्टरों तथा चिकित्सा जगत से जुड़े अन्य लोगों का भी हाल खराब होने लगा है। 

पहली बार की तरह उनके पास मास्क से लेकर पी.पी.ई. किटों जैसे साजो-सामान की कमी नहीं है। अधिकतर डॉक्टर, नर्सों तथा अन्य मैडीकल स्टाफ को वैक्सीन भी दी जा चुकी है परंतु इस सबके बावजूद एक साल तक कोरोना से लड़ते हुए वे शारीरिक और मानसिक रूप से थक चुके हैं। गत वर्ष मार्च में जब कोरोना ने भारत में पैर पसारने शुरू किए थे उसके बाद इस वर्ष जनवरी-फरवरी में ही कुछ समय तक उन्हें थोड़ी राहत नसीब हुई जब कोरोना के मामलों की संख्या में काफी कमी आ गई थी परंतु आज की तारीख में दूसरी लहर के चरम की ओर बढऩे के बीच उनसे यह अपेक्षा करना बेमानी होगा कि उनके हौसले भी पहले की तरह मजबूत रहें। 

कोरोना की दूसरी लहर से बुरी तरह प्रभावित भारत की वित्तीय राजधानी मुम्बई के एक अस्पताल के ‘डा. लांसलोट पिंटो’ साल भर से कोरोना मरीजों के इलाज में व्यस्त रहे हैं। जनवरी में जब मामले कुछ कम हुए तो उन्हें लगा कि वह अपने परिवार के साथ अब कुछ चैन का समय गुजार सकेंगे परंतु अप्रैल आते-आते हालात पहले साल से भी बदतर हो गए जब प्रतिदिन कोरोना संक्रमण के मामलों ने देश में पहले 1 लाख और कुछ ही दिन बाद 2 लाख के आंकड़े को पार कर लिया। डा. पिंटो के अनुसार उनकी टीम में से कोई भी इस हालत के लिए मानसिक रूप से तैयार नहीं है। वह कहते हैं, ‘‘हम जो भी कर सकते हैं कर रहे हैं परंतु अब हममें पिछले वर्ष जैसी मानसिक शक्ति नहीं है।’’ 

दिल्ली का हाल भी कुछ अच्छा नहीं है। वहां के भी लगभग सभी निजी अस्पताल भर चुके हैं। गुरुग्राम के एक अस्पताल की डा. रेशमा तिवारी बसु के अनुसार दूसरी लहर अप्रत्याशित नहीं है क्योंकि इसके बारे में पहले से अंदेशा था परंतु इस बात से बहुत निराशा है कि लोग भूल चुके हैं कि महामारी अभी खत्म नहीं हुई है। अस्पतालों के बाहर जीवन सामान्य सा प्रतीत होता है रेस्तरां और नाइट क्लब खचाखच भरे हैं, बाजारों में भीड़ है, लम्बी शादियां, अनगिनत चुनावी रैलियों में लोगों की भीड़, कुंभ मेले में लाखों की गिनती में शामिल लोगों को अपने जीवन को खतरे में डालने का अधिकार तो है लेकिन दूसरों को नहीं। डा. यतिन मेहता इस पर क्रोधित हैं। उनके अनुसार भारत ने जनवरी तथा फरवरी में मिले मौके को हाथों से फिसल जाने दिया। उस अवधि को ‘टेस्टिंग’ व ‘ट्रेसिंग’ के साथ-साथ वैक्सीनेशन बढ़ाने के लिए इस्तेमाल किया जाना चाहिए था परंतु ऐसा नहीं किया गया। 

केरल राज्य के एर्नाकुलम मैडीकल कालेज की नर्स विद्या विजयन का कहना है कि अब हम पहली लहर से भी कहीं अधिक खतरनाक दूसरी लहर का सामना कर रहे हैं। वह कहती हैं कि लोगों को याद रखना चाहिए कि हैल्थकेयर वर्कर्स अपनी क्षमता से अधिक थक चुके हैं। अन्य चिकित्सा विशेषज्ञों की तरह उन्हें भी यही लगता है कि पता नहीं इस तरह कब तक वे काम कर सकेंगे परंतु इतना तय है कि दूसरी लहर हैल्थ वर्कर्स से लेकर सम्पूर्ण चिकित्सा व्यवस्था के लिए परीक्षा साबित होगी। उनके अनुसार,‘‘चिकित्सा कर्मियों की मानसिक सेहत पर इस समय किसी का ध्यान नहीं है।

जरा सोच कर देखिए कि जो भी काम आप करते हैं, उसे आपको दिन के 24 घंटे, सप्ताह के सातों दिन, वह भी आम से 100 गुणा अधिक दबाव में करना पड़े तो आपका क्या हाल होगा- जब कोरोना की दूसरी लहर अपने चरम पर होगी तो हर डॉक्टर, नर्स तथा हैल्थकेयर वर्कर का यही हाल होगा।’’ ऐसी सभी बातों को देखते हुए हमें सभी सावधानियां और उपायों को अपनाना होगा क्योंकि कोरोना से पार पाना अभी आसान नहीं। मुझे मशहूर शायर फैज अहमद फैज के शे’र की चंद पंक्तियां याद आ रही हैं : 


अभी चिराग-ए-सरे रह को कुछ खबर ही नहीं
अभी गरानि-ए-शब में कमी नहीं आई,
नजात-ए-दीद-ओ-दिल की घड़ी नहीं आई,
चले चलो कि वो मंजिल अभी नहीं आई।

सौजन्य - पंजाब केसरी।
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आज के ‘तनावपूर्ण माहौल में’‘प्रेम और सद्भाव के रौशन चिराग’ (पंजाब केसरी)

जहां एक ओर देश में कोरोना महामारी के बीच भी जाति और धर्म के नाम पर कुछ लोग नफरत फैला कर अपने कृत्यों से देश का माहौल बिगाड़ रहे हैं वहीं अनेक स्थानों पर हिन्दू और मुस्लिम समुदाय के सदस्य भाईचारे और सद्भाव के अनुकरणीय उदाहरण

जहां एक ओर देश में कोरोना महामारी के बीच भी जाति और धर्म के नाम पर कुछ लोग नफरत फैला कर अपने कृत्यों से देश का माहौल बिगाड़ रहे हैं वहीं अनेक स्थानों पर हिन्दू और मुस्लिम समुदाय के सदस्य भाईचारे और सद्भाव के अनुकरणीय उदाहरण भी पेश कर रहे हैं : 

* 15 जनवरी को राजस्थान के ‘प्रतापगढ़’ में एक मस्जिद के उद्घाटन के अवसर पर हिन्दू और मुस्लिम धर्मगुरुओं को आमंत्रित करके स्टेज पर बिठाया गया। सभी धर्मों की शिक्षाओं के बारे में प्रवचन दिए गए और भारत माता की जय के नारे लगाए गए। 
* 19 मार्च को गाजियाबाद में एक गरीब मुसलमान बच्चे की पिटाई का वीडियो वायरल होने के बाद उसकी सहायता के लिए सोशल मीडिया पर अपील की गई तो बड़ी संख्या में लोगों ने पैसे भेजे। सबसे ज्यादा रकम देने वाले दानी सज्जन हिन्दू थे।

* 22 मार्च को उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के ‘बारा’ गांव के रहने वाले शेर अली नामक मुस्लिम व्यक्ति ने एक अनाथ हिन्दू युवक पप्पू का विवाह एक हिन्दू युवती से करवाया। चार वर्ष की आयु में अनाथ हो गए पप्पू को शेर अली ने गोद लेकर पाला था जो अब 20 वर्ष का हो गया है। 
शेर अली ने खुद उसके सिर पर सेहरा बांधा, धूमधाम से बारात निकाली, बैंड-बाजा बजवाया और हिन्दू रीति से उसकी शादी करवाने के अलावा गृहस्थ जीवन में प्रवेश कर आगे का जीवन बिताने के लिए एक मकान भी बनवाकर दिया।
* 23 मार्च को बिहार के ‘आरा’ में वेद प्रकाश नामक अध्यापक ने प्रसव पीड़ा से जूझ रही मुस्लिम महिला को खून की जरूरत का पता चलने पर फौरन अस्पताल पहुंच कर खून देकर उसकी जान बचाई। 
* 03 अप्रैल को मध्य प्रदेश में ‘विदिशा’ जिले के ‘शेरपुर’ गांव में जब कुछ मुसलमान किसान मस्जिद में नमाज पढ़ रहे थे, तभी नफीस खान नामक एक किसान के खेत से शुरू होकर आग तेज हवा के चलते आसपास के खेतों में फैलने लगी जहां गेहूं की पकी फसल की कटाई चल रही थी। इसका पता चलने पर राहुल केवट के नेतृत्व में हिंदू युवकों का एक समूह आगे आया और जान जोखिम में डाल कर आग को फैलने से रोक कर लगभग 300 बीघा क्षेत्र में खड़ी गेहूं की फसल को जलने से बचाया। 

* 07 अप्रैल को मध्य प्रदेश के गुना जिले के ‘मृगवास’ कस्बे में रहने वाले युसूफ खान के बेटे इरफान की शादी थी। इस अवसर के लिए छपवाए निमंत्रण पत्र पर उन्होंने साम्प्रदायिक सौहार्द की अनूठी मिसाल पेश की।
उन्होंने कार्ड के एक ओर ‘श्रीगणेशाय नम:’ के साथ भगवान गणेश का चित्र छपवा कर इसके नीचे लिखा ‘‘ईश्वर अल्ला के नाम से हर काम का आगाज करता हूं, उन्हीं पर है भरोसा उन्हीं पर नाज करता हूं।’’ निमंत्रण पत्र के दूसरी ओर उन्होंने मुसलमानों का शुभ सूचक अंक ‘786’ अंकित किया। 
* 11 अप्रैल को केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने सबरीमाला मंदिर में पहुंच कर भगवान अयप्पा के दर्शन किए। 
* 12 अप्रैल को बिहार के दरभंगा जिले में एक कलियुगी बेटे ने अपने पिता की कोरोना वायरस से मौत के बाद उसका शव लेने से इंकार कर दिया तो मुस्लिम भाइयों ने हिन्दू रीति से उसका अंतिम संस्कार करवाया। 
* साम्प्रदायिक सौहार्द की एक अन्य मिसाल कानपुर की डा. माहे तलत सिद्दीकी नामक एक मुस्लिम अध्यापिका ने ‘राम चरित मानस’ की चौपाइयों का उर्दू में अनुवाद करके पेश की है। 

* 14 अप्रैल को राजस्थान में उदयपुर के रहने वाले अकील मंसूर नामक युवक ने गंभीर रूप से बीमार निर्मला और अलका नामक 2 कोरोना पीड़ित महिलाओं की जान बचाने के लिए रमजान के महीने में रोजा तोड़ कर अपना प्लाज्मा उन्हें डोनेट किया जिससे दोनों महिलाओं की जान बच गई।
* 16 अप्रैल को जम्मू-कश्मीर के डोडा जिले में एक सड़क दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल होने के कारण जी.एम.सी. जम्मू के आई.सी.यू. में उपचाराधीन दीपक कुमार नामक युवक के इलाज के लिए डोडा जिले के मुसलमान भाईचारे के सदस्यों ने जुम्मे की नमाज के बाद चंदा एकत्रित किया। 

उक्त उदाहरणों से स्पष्टï है कि भले ही कुछ लोग जाति, धर्म के नाम पर समाज में घृणा फैलाते हों पर इसी समाज में ऐसे लोग भी हैं जिनकी बदौलत देश और समाज में परस्पर प्रेमपूर्वक मिल-जुल कर रहने की भावना जिंदा है। जब तक भाईचारे और सद्भाव के ये बंधन कायम रहेंगे, हमारे देश की ओर कोई टेढ़ी आंख से देखने का साहस नहीं कर सकता।—विजय कुमार 

सौजन्य - पंजाब केसरी।
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As the second Covid wave hits hard, 1918 Spanish flu offers some lessons (Livemint)

Shashi Shekhar

Why didn’t the political class do anything when there was a ‘lean period’ during the pandemic?


There is an old saying: “If things are going out of control at present, look at the past." That’s how our ancestors always dealt with tough times. The rulers are getting cold feet over the devastation caused by the second wave of covid. But they are not even ready to take a look at history to learn any lessons. As a result, by Sunday, 1,47,88,109 people in India were in the grip of this deadly disease, while 1,77,150 have lost their lives.


At such a rare time, for the rulers, I want to quote one such great story documented in the pages of history. This story also has a lesson for the common people.


On 28 September 1918, the Liberty Loan Parade was organized in Philadelphia to economically support the soldiers who fought in World War I. Intellectuals opposed the event. They were of the view that since the Spanish flu was still going strong, a crowded event may result in a new series of disasters. Ignoring such objections, Philadelphia public health director Wilmer Krusen allowed the event. It was a matter of patriotism, so more than 200,000 people gathered. What followed was along expected lines. Within the next few days, 47,000 fresh cases were reported and 12,000 people lost their lives. The second wave of Spanish flu ended up wreaking havoc on 25- to 35-year-olds. In October that year, 1,95,000 people had lost lives in the US alone.


Just relate that tragedy to what is happening in India today. In September 2020, when the first wave of covid was on its last legs, our rulers were applauded. A few were happy over the possibilities of a vaccine, while others were hoping for a bounceback in the economy. Many states started promoting tourism, while others were busy in organizing events such as the Kumbh. Elections were also to be held in five states. From the top to the bottom, all leaders started attending huge election rallies to woo voters. In such a situation, if any expert had tried to advise them to be cautious, he would have been ridiculed. The warnings of those doctors and scientists were also ignored, whose throats had dried up stating that the threat of the pandemic was not over yet.


As if the demon of covid was preparing to attack again, waiting for our sons and daughters to come out of their shells. This time it attacked with double strength. Earlier, elders were the target, now newborns to senior citizens were all equally vulnerable. Health services have collapsed, there are not sufficient numbers of ventilators, oxygen and essential medicines are scarce, while hospitals do not even have beds for serious covid patients.


Until now, we used to tremble at the pictures of the way dead bodies were buried in the US, Brazil and Italy. Now our cities are in the same category. Shocking news came from the Harishchandra Ghat in Kashi—fearing that they may fall prey to the infection while waiting in the long queues, people paid an exorbitant price to the descendants of the ‘Dom Raja’ to get them to perform the last rites. Similarly, in Surat, so many bodies had to be burnt in one day that the chimneys of the electric crematorium furnace melted. In Raipur, too, on an average 55 bodies were cremated daily. Images of long queues at funerals in Lucknow went viral on social media. To prevent the proceedings from getting captured on camera, local officials covered up the crematorium with makeshift walls. They said this was done to prevent people from getting “distracted". Even in the national capital, people had to wait for five to eight hours for the last rites of their loved ones. This is the plight of all the cities in north and west India.


In such a situation, it is the right time to question our political class, who were busy in electoral and religious events. Why didn’t they do anything when there was a ‘lean period’ during the pandemic? They knew that another wave was coming. It was a time when we could have equipped our hospitals and increased the number of laboratories. If the government did not have the resources, it could have invited private players with the necessary regulations. When privatization can be promoted in other areas, why not in this? This could not happen. As the second wave is heading towards its peak, we also need to know that the Spanish flu attacked three times. Unfortunately, sometimes history repeats itself. What could not have been done between September 2020 and February should be done now.


Prime Minister Narendra Modi on Saturday took a sensible initiative. He asked Swami Awadheshanand to keep the Kumbh symbolic. This was a necessary step. Uttarakhand has recorded a nearly 90x increase in covid cases during this period. Most saints have accepted the prime minister’s request. This may help prevent any further adverse events.


In contrast, the Election Commission has decided to continue with the poll schedule in West Bengal, where the rate of infection has gone up by 560% due to public gatherings, while three rounds of voting are yet to take place. Statistics related to the infection spread show that if decisive steps are not taken even now, things could spiral out of control. The situation there is such that if decisive steps are not taken immediately, history will compare our present political leadership with Krusen.


Shashi Shekhar is editor-in-chief, Hindustan. The views expressed are personal.


Courtesy - Livemint.

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वृद्धि में बाधा (प्रभात खबर)

कोरोना महामारी की दूसरी लहर भयावह विभीषिका में बदल रही है. इसे नियंत्रित करने के लिए जरूरी पाबंदियां लगायी जा रही हैं. हालांकि पिछले साल की तरह व्यापक लॉकडाउन नहीं लगाया गया है, लेकिन रात व सप्ताहांत के कर्फ्यू, सीमित आवाजाही और कई तरह के कारोबारों पर अस्थायी रोक से आर्थिक गतिविधियों में संकुचन आ रहा है. अनेक जगहों पर कुछ दिनों के लिए लॉकडाउन भी लगाया जा रहा है.



कोरोना वायरस के तेज संक्रमण को देखते हुए यह कह पाना मुश्किल है कि स्थिति कब तक सामान्य होगी. पिछले साल के आखिरी महीनों में पाबंदियों के हटाने के साथ ही कारोबार और कामकाज बहुत हद तक पहले की तरह होने लगे थे. उस वजह से बीते वित्त वर्ष की पहली दो तिमाहियों में ऋणात्मक हो चुके वृद्धि दर को बढ़ाया जा सका था. उस बढ़त के आधार पर यह अनुमान लगाया गया था कि चालू वित्त वर्ष में विकास दर दो अंकों में रहेगी और अगले वित्त वर्ष में यह दर 2019-20 के स्तर पर आ जायेगी.



लेकिन महामारी की दूसरी लहर से उस उम्मीद पर पानी फिर सकता है. अब विश्व बैंक का आकलन है कि 2021-22 के वित्त वर्ष में भारत की आर्थिक वृद्धि दर 7.5 से लेकर 12.5 प्रतिशत के दायरे में रह सकती है. इससे स्पष्ट है कि अर्थव्यवस्था को लेकर अनिश्चितता की स्थिति पैदा हो गयी है. इस दायरे में आंकड़ा क्या होगा, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि हम कितनी जल्दी महामारी पर काबू करेंगे क्योंकि सभी अनुमानों का आधार यह भरोसा था कि देश को दूसरी लहर का सामना नहीं करना पड़ेगा.


मांग और उत्पादन घटने के कारण बेरोजगारी दर भी बढ़ने लगी है. ऐसे में एक बड़ी उम्मीद मॉनसून से है, जिसके इस साल सामान्य रहने की आशा है और सूखे की कोई आशंका दूर-दूर तक नहीं है. अच्छी बारिश से फसलों की बुवाई अधिक होगी, जिससे ग्रामीण आमदनी में बढ़ोतरी होगी. समुचित उपज से खाद्य मुद्रास्फीति को भी नियंत्रित रखने में मदद मिलेगी. उल्लेखनीय है कि पिछले साल लॉकडाउन में और बाद में बड़ी मात्रा में कृषि उत्पादों के निर्यात से अर्थव्यवस्था को बहुत सहारा मिला था.


अनाज के भरे भंडारों की वजह से करोड़ों गरीब परिवारों को मुफ्त या सस्ता राशन मुहैया कराया जा सका था. पिछले साल अनेक चरणों में केंद्र सरकार द्वारा घोषित वित्तीय राहत, छूट, कल्याण कार्यक्रमों आदि से भी आर्थिकी को मदद मिली थी. यह भी ध्यान रखना होगा कि कृषि क्षेत्र से अपेक्षाओं पर खाद्य पदार्थों के वैश्विक मूल्यों का भी असर होगा तथा सरकारी व्यय की भी इसमें बड़ी भूमिका होगी. यही कारण है कि कृषि समेत विभिन्न क्षेत्रों को सरकारी मदद उपलब्ध कराने की मांग उठने लगी है. मौजूदा स्थिति में कुछ बजट प्रावधानों को फौरी तौर पर लागू करने की जरूरत पड़ सकती है. फिलहाल हमारा पूरा जोर बचाव के उपायों और टीकाकरण बढ़ाने पर होना चाहिए.

सौजन्य - प्रभात खबर।

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अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना की वापसी (प्रभात खबर)

By सुशांत सरीन 

 

अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना की वापसी का अनुमान तो बहुत समय से था, लेकिन बाइडेन प्रशासन के आने के बाद से यह लगभग स्पष्ट हो गया था कि सेना अधिक देर तक नहीं रहेगी. यह निर्णय बहुत सोच-समझ कर लिया गया है कि अफगानिस्तान से निकल जाना बेहतर है क्योंकि वहां रहने का उनका उद्देश्य पूरा नहीं हो रहा था. उनके सामने यह बिल्कुल साफ था कि कुछ साल और रुकने से अफगानिस्तान की आंतरिक लड़ाई का कोई और नतीजा नहीं निकलेगा.



अगर कोई नतीजा निकालना होता, तो वह दस साल पहले ही सामने आ जाता. अब अमेरिका की कोशिश यही रहेगी कि कोई भी छोटा-मोटा, ऐसा-वैसा राजनीतिक समझौता हो जाए और उसके बाद वह निकल जायेगा. अगर कोई समझौता नहीं होता है, तो वे अगले कुछ सालों तक अफगानिस्तान सरकार की कुछ मदद करते रहेंगे, कुछ सैन्य और आर्थिक सहायता देते रहेंगे. ऐसा ही रुख अमेरिका के यूरोपीय सहयोगियों का होगा. यदि अफगानिस्तान में लड़ाई जारी रहती है, तो अमेरिका का उससे कोई सरोकार नहीं होगा.



बहरहाल, अमेरिका तो अफगानिस्तान से निकल जायेगा, लेकिन इस इलाके के देशों के लिए मामला उलझ सकता है. अगर वहां अस्थिरता बरकरार रहती है, उसका असर हमारे देश पर भी जरूर होगा. यह असर सीधे तौर पर नहीं होगा क्योंकि अफगानिस्तान से हमारी सीमा नहीं लगती है. हमारे ऊपर जो भी असर होगा, वह पाकिस्तान के जरिये ही होगा, चाहे वह नशीले पदार्थों की तस्करी हो, आतंकी गुट हों या अवैध रूप से हथियारों को भेजना हो. पाकिस्तान को अफगानिस्तान के रूप में ऐसी जगह फिर मिल जायेगी, जहां वह अपने लोगों को रख सकता है, उन्हें संरक्षण दे सकता है और खुद अपने हाथ पाक-साफ दिखा सकता है.


उस दौर के असर पंजाब पर पड़े, जो दुबारा अब फिर नजर आने लगे हैं. कश्मीर प्रभावित हुआ. एक असर यह इस्लामी कट्टरपंथ और आतंकवाद की बढ़त के रूप में हुआ. इससे पूरी दुनिया प्रभावित हुई. इसकी जड़ें तो अफगानिस्तान में ही हैं. आज भी भारत समेत समूची दुनिया कट्टरपंथ और आतंकवाद की लहर की चपेट में है. वह लहर थमी नहीं है.अगर अफगानिस्तान में निकट भविष्य में तालिबान सत्ता पर काबिज होता है, तो हमें ऐसी कोई उम्मीद नहीं रखनी चाहिए कि स्थितियां बेहतर होंगी.


यदि इस बात में सच्चाई है कि तालिबान पाकिस्तान के पिछलग्गू है और उसका एक बड़ा हिस्सा पाकिस्तान के इशारों पर काम करता है, तो यह मानना बेवकूफी होगी कि वह पाकिस्तान की नीति और नीयत के खिलाफ कुछ करेगा और भारत से सहयोग बढ़ाने की कोशिश करेगा. जहां तक भारत की बात है, तो आगे के बारे में अभी कहना मुश्किल है.


भारत का रवैया अभी तक यही रहा है कि हम अफगानिस्तान के लोगों के साथ हैं और हमारी जो परियोजनाएं हैं, वे देश की भलाई के लिए हैं. हमारी सभी परियोजनाएं अफगानियों की जरूरत और उनकी मांग के अनुसार हैं. अन्य देश अभी तक खुद फैसला करते रहे हैं कि अफगानिस्तान के लिए क्या अच्छा है, क्या नहीं. भारत के इसी रवैये को विदेश मंत्री एस जयशंकर ने अपने हालिया बयान में दुहराया है. जहां तक विदेश मंत्री के संयुक्त अरब अमीरात में पाकिस्तानी प्रतिनिधियों से मिलने या संवाद करने का सवाल है, तो इस बारे में अटकलें लगायी जा रही हैं.


कूटनीतिक परिदृश्य में अक्सर ऐसा होता है कि कोई देश दो देशों के बीच संदेश के आदान-प्रदान या बातचीत का माहौल बनाने में सहयोगी की भूमिका निभाता है. संयुक्त अरब अमीरात अधिक-से-अधिक यही योगदान कर सकता है. लेकिन उनके एक राजनयिक की टिप्पणी से यह भ्रम फैला है कि भारत और पाकिस्तान के बीच संयुक्त अरब अमीरात मध्यस्थता कर सकता है. भारत की नीति स्पष्ट रही है कि कश्मीर या किसी अन्य मसले पर पाकिस्तान से बातचीत द्विपक्षीय होगी, उसमें किसी देश की मध्यस्थता का सवाल ही पैदा नहीं होता.


यदि संयुक्त अरब अमीरात को मध्यस्थता का मौका दिया जाता है, तो यह इस नीति का घोर उल्लंघन होगा. मुझे नहीं लगता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार किसी भी हाल में ऐसा कोई भी कदम उठायेगी. अधिक-से-अधिक यह हो सकता है कि संयुक्त अरब अमीरात दोनों देशों को एक मेज पर बैठाने में योगदान करे.


दशकों से जारी युद्ध और आतंक से तबाह अफगानिस्तान का पुनर्निर्माण संभव है, लेकिन अमेरिकी सेनाओं की वापसी के बाद की परिस्थितियों के बारे में निश्चित तौर पर कुछ भी कह पाना संभव नहीं है. हमें कथित शांति प्रक्रिया और संभावित समझौते से भी अधिक उम्मीद नहीं रखनी चाहिए. निकट भविष्य में अफगानिस्तान में चीन की भूमिका भी हो सकती है, संभवत: होगी भी. अभी एक खबर आयी है कि चीन अपने सैनिकों को वहां भेज सकता है, जो शांति सैनिक होंगे. पर इस खबर पर भी पूरा भरोसा नहीं किया जा सकता है. यह भी देखना होगा कि चीनी सैनिकों को लेकर तालिबान का क्या रवैया होगा.

सौजन्य - प्रभात खबर।

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इस कठिन दौर से भी जल्द उबरेंगे (प्रभात खबर)

By आशुतोष चतुर्वेदी 

 

हम सब के लिए यह कठिनतम दौर है. हम जिंदगी के ऐसे मुश्किल दौर से गुजर रहे हैं, जिसकी हमने कल्पना भी नहीं की थी. हालात बेहद चिंताजनक हैं. कुछ राज्यों में चिंता विशेष रूप से ज्यादा है, लेकिन कोई भी राज्य संतुष्ट होकर नहीं बैठ सकता है. वायरस बहुत सक्रिय है और इसने पूरे देश को अपनी गिरफ्त में ले लिया है. जब हम सोच रहे थे कि हमने वायरस को नियंत्रित करने के तरीके ढूंढ लिए हैं, तो यह वापस आ गया है.


इस दौर में यदि आप किसी अस्पताल में जाएं, तो वहां की स्थिति आपको हिला देगी. अस्पतालों में बिस्तर, वेंटिलेटर और रेमडेसिविर जैसी जीवनरक्षक दवाओं की कमी है. भर्ती होने के लिए मरीजों की लंबी कतार है. हमारे डॉक्टर और स्वास्थ्यकर्मी हर मरीज की जान बचाने की हरसंभव कोशिश करते नजर आ रहे हैं. यह सही है कि ऐसे हालात थोड़े समय तक ही रहने वाले हैं और जल्द इस पर काबू पा लिया जाएगा.



लेकिन मन खट्टा हो जाता है जब इस तरह की खबरें सामने आती हैं कि आपदा की इस घड़ी में ऑक्सीजन सिलिंडर गायब हैं और मुनाफा कमाने के लिए उसकी कीमत बढ़ा दी गयी है. इसी तरह कोरोना संक्रमण में रेमडेसिविर इंजेक्शन बहुत कारगर साबित हो रहा है. उसकी उपलब्धता पर संकट है और खबरें हैं कि इसकी कालाबाजारी हो रही हैं. यह हम सबके लिये बेहद कठिन दौर है और सभ्य समाज से ऐसे व्यवहार की अपेक्षा नहीं की जाती है.


ऐसी उम्मीद थी कि संकट की इस घड़ी में हम कंधे से कंधा मिलाकर एक दूसरे के काम आयेंगे. इसमें दो राय नहीं है कि कोरोना जाएगा लेकिन जाते-जाते हमारे जीवन में अनेक घाव छोड़ जाएगा. हमारे अनेक करीबी जिंदगी के इस सफर में हमारे साथ नहीं होंगे. लेकिन चंद लोगों के इस व्यवहार ने स्पष्ट कर दिया है कि सभ्य व चेतन समाज रूप में हमारी यात्रा अभी अधूरी है.


कोरोना ने पश्चिम बंगाल, बिहार और झारखंड में भी तेजी से अपने पांव पसारे हैं. इस शनिवार को तो काले दिन के रूप में याद किया जाएगा. इस दिन भारत में कोरोना वायरस के एक दिन में सबसे अधिक मामले ढाई लाख से अधिक मामले दर्ज किए गए. शनिवार को एक ही दिन में लगभग 1500 लोगों को हमने खो दिया. हालात की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि कई शहरों से श्मशान घाटों पर अंतिम संस्कार के लिए घंटों इंतजार करना पड़ रहा था.


इसके पहले देश में एक दिन में सबसे ज्यादा मौतें 15 सितंबर, 2020 को दर्ज की गयीं थीं. उस दिन 1284 लोगों को कोरोना के कारण अपनी जान से हाथ धोना पड़ा था. पिछली बार कोरोना मरीजों की संख्या किसी भी दिन दो लाख को पार नहीं कर पाई थी. इस बार कोरोना की रफ्तार और मारक क्षमता दोनों दोगुनी है.


जानी-मानी विज्ञान पत्रिका लांसेट जर्नल में प्रकाशित हुए एक अध्ययन में कहा गया है कि देश में जल्द ही देश में हर दिन औसतन 1750 मरीजों की मौत हो सकती है. यह संख्या बढ़कर जून के पहले सप्ताह में दो हजार से अधिक तक पहुंचने की आशंका है. रिपोर्ट के अनुसार इस बार कोरोना की मार देश के मझोले और छोटे शहरों पर अधिक है. रिपोर्ट में कहा गया है कि दूसरी लहर पहली लहर से ज्यादा खतरनाक है. इस दौरान अतिरिक्त सावधानी बरतने की जरूरत है. रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि देश में टीकाकरण की रफ्तार तेज करने की जरूरत है और सभी वयस्क लोगों को जल्द से जल्द टीका लगाया जाना चाहिए.


रिपोर्ट में कहा गया है कि लॉकडाउन जैसे कड़े कदम नुकसानदायक साबित हो सकते हैं और इनसे बचा जाना चाहिए. केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार भी कोरोना के लगभग 80 प्रतिशत मामले 10 राज्यों से हैं जिनमें महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, छत्तीसगढ़, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, गुजरात, केरल, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल शामिल हैं.


महाराष्ट्र में 15 दिनों के लिए सभी जिलों में लॉकडाउन है. छत्तीसगढ़ में 20 जिलों और मध्य प्रदेश में 15 जिलों में लॉकडाउन है. दिल्ली, चंडीगढ़, राजस्थान और ओडिशा में 10 जिलों के शहरी क्षेत्रों में वीकेंड कर्फ्यू है. उत्तर प्रदेश ने रविवार को राज्यव्यापी कर्फ्यू है. कर्नाटक, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, गुजरात, जम्मू और कश्मीर और ओडिशा में रात का कर्फ्यू लगाया गया है.


राहत की बात जरूर है कि हमारे देश में लोग तेजी से स्वस्थ भी हो रहे हैं. कई अन्य देशों की तुलना में स्वस्थ होने की दर भारत में बेहतर है. लेकिन यह बात सभी को स्पष्ट होनी चाहिए कि यह लड़ाई लंबी चलनी है. इस मामले में जरा सी भी लापरवाही न केवल आपको बल्कि आपके परिवार और पूरे समाज को संकट में डाल सकती है.

सौजन्य - प्रभात खबर।

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