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Editorials : असुरक्षित बेटियां

हाथरस, होशियारपुर से लेकर बल्लभगढ़ तक बेटियों के साथ क्रूरता की हदें पार करती घटनाओं ने पूरे देश के अंतर्मन को झिंझोड़ा है। इन घटनाओं के अलावा भी बेटियों के साथ यौन हिंसा की घटनाओं का अंतहीन सिलसिला जारी है। यह बात अलग है कि ये घटनाएं राजनीतिक निहितार्थों के अभाव और मीडिया की चूक के कारण राष्ट्रीय परिदृश्य में विमर्श का हिस्सा नहीं बन पातीं। 

सोमवार को बल्लभगढ़ में बी.कॉम. अंतिम वर्ष की छात्रा के अपहरण की असफल कोशिश के बाद दिनदहाड़े हुई हत्या कानून व्यवस्था के प्रति अपराधियों के बेखौफ होने को दर्शाती है। यह घटना जहां अपराधी के निरंकुश व्यवहार को दर्शाती है, वहीं पुलिस की कार्यशैली पर सवाल खड़े करती है। छात्रा के अपहरण की कोशिश दो वर्ष पूर्व भी हुई थी। यदि इस मामले में सख्त कार्रवाई होती तो शायद छात्रा आज जिंदा होती। उस पर हरियाणा के गृहमंत्री का संवेदनहीन बयान कि पुलिस के द्वारा व्यक्तिगत सुरक्षा कर पाना संभव नहीं है।


 शासन-प्रशासन का संवैधानिक दायित्व बनता है कि व्यक्ति विशेष के जीवन पर आने वाले किसी भी खतरे से उसकी रक्षा की जाये। खासकर लड़कियों की शिक्षण संस्थाओं के बाहर तो सुरक्षा इंतजाम ऐसे होने चाहिए कि बेटियां सिरफिरे आशिकों से अपनी रक्षा करने में सक्षम हो सकें। सवाल समाज में पनप रही आपराधिक मनोवृत्ति का भी है कि क्यों और कैसे पथभ्रष्ट युवा हाथरस, होशियारपुर और बल्लभगढ़ जैसी घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं और बेकसूर बेटियों को उनकी क्रूरता का शिकार बनना पड़ रहा है। 

हाल ही में आये एक सर्वेक्षण में इस बात का खुलासा हुआ था कि समाज में बेटियों के प्रति सकारात्मक सोच विकसित हो रही है। अभिभावक अब बेटियों के परिवार में आने का स्वागत कर रहे हैं और बिना किसी भेदभाव के उनका बेहतर ढंग से भरणपोषण कर रहे हैं। लेकिन बेटियों के प्रति लगातार बढ़ रहे अपराधों से उनका उत्साह कम हो सकता है। इन आशंकाओं को दूर करना शासन-प्रशासन का दायित्व बनता है।


दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट ने हाथरस में यौन हिंसा की शिकार हुई युवती को न्याय दिलाने की दिशा में सार्थक पहल की है। मंगलवार को शीर्ष अदालत ने फैसला सुनाया कि हाथरस कांड मामले में सीबीआई की जांच की निगरानी इलाहाबाद हाईकोर्ट करेगा। हाईकोर्ट मामले की जांच के बाद फिर तय करेगा कि केस का स्थानांतरण उत्तर प्रदेश से दिल्ली किया जाये या नहीं। साथ ही पीड़िता के परिजनों व गवाहों की सुरक्षा पर भी उच्च न्यायालय ध्यान देगा। 

दरअसल, इस सारे प्रकरण में प्रदेश सरकार की कारगुजारियों के मद्देनजर पीड़ित परिवार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी कि मामले का ट्रायल दिल्ली में हो। मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति एस. ए. बोबड़े की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय खंडपीठ ने एक जनहित याचिका व वकीलों की ओर से दायर हस्तक्षेप याचिकाओं पर पंद्रह अक्तूबर को अपना फैसला सुरक्षित कर लिया था। आशंका जतायी जा रही थी कि उत्तर प्रदेश में निष्पक्ष सुनवाई की संभावना कम है। जांच को बाधित करने के आरोप लगाये गये थे। ऐसी आशंकाएं 14 सितबंर को यौन हिंसा की शिकार युवती के शव का आनन-फानन में परिवार की गैर मौजूदगी में रात में अंतिम संस्कार करने के बाद जतायी जा रही थी। दरअसल, इस सारे प्रकरण से उत्तर प्रदेश पुलिस व शासन सवालों के घेरे में आ गया था।

 इस मामले में भारी राजनीतिक विरोध के बाद योगी सरकार ने मामले की जांच पहले एसआईटी को सौंपी थी और बाद में जांच सीबीआई से कराने की सिफारिश की गई। मामले में राजनीतिक विरोध और पीड़ित परिवार की आशंकाओं के बीच अदालत ने मामले में हस्तक्षेप किया। 

इससे पूर्व योगी सरकार की ओर से शीर्ष अदालत में दायर हलफनामे में कहा गया था कि पीड़ित परिवार और गवाहों को तीन स्तरीय सुरक्षा प्रदान की गई है। बहरहाल, बेटियों के खिलाफ होने वाली हिंसा को रोकने के लिये पुलिस-प्रशासन को संवेदनशील व जवाबदेह बनाने की जरूरत है। वहीं समाज को भी मंथन करना होगा कि युवा पीढ़ी को पथभ्रष्ट होने से कैसे बचाया जाये।

सौजन्य - दैनिक ट्रिब्यून।

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Editorials : BECA समझौताः अमेरिका से दोस्ती

आखिरकार भारत और अमेरिका के बीच उस बेसिक एक्सचेंज एंड कोऑपरेशन एग्रीमेंट (बेका) पर समझौता हो गया जिस पर बरसों से काम चल रहा था। यह दोनों देशों के बीच सामरिक सहयोग बढ़ाने की समझ के तहत किया जाने वाला चौथा समझौता है। इससे पहले दोनों देश 2002 में जनरल सिक्यॉरिटी ऑफ मिलिट्री इनफॉर्मेशन एग्रीमेंट, 2016 में लॉजिस्टिक्स एक्सचेंज मेमोरैंडम ऑफ एग्रीमेंट और 2018 में कॉम्पैटिबिलिटी एंड सिक्यॉरिटी एग्रीमेंट पर दस्तखत कर चुके हैं। माना जा रहा है कि

बेका समझौता दोनों देशों के बीच रक्षा और भू-राजनीति के क्षेत्र में सहयोग और तालमेल को पूर्णता प्रदान करने वाला है। हालांकि अमेरिका जैसी सुपरपावर के साथ रक्षा सहयोग बढ़ाने की बात जब भी उठती है तब उसके साथ कई तरह की आशंकाएं भी जुड़ी होती हैं। इसी बेका समझौते को लेकर जब बातचीत शुरू हुई तो तत्कालीन यूपीए सरकार ने कई तरह की चिंताएं जाहिर की थीं। समझौते के इस बिंदु तक पहुंचने में अगर इतना वक्त लगा तो उसका कारण यह था कि लंबी बातचीत के जरिए दोनों पक्षों ने एक-दूसरे की आशंकाओं को दूर करने के रास्ते खोजे और फिर सहमति को पक्का किया।

बहरहाल, इस समझौते के बाद अब भारत को अमेरिकी सैन्य उपग्रहों द्वारा जुटाई जानी वाली संवेदनशील सूचनाएं और चित्र रियल टाइम बेसिस पर उपलब्ध हो सकेंगे। अमेरिका वैसे महत्वपूर्ण आंकड़े, मैप आदि भी भारत के साथ शेयर कर सकेगा जिनके आधार पर अपने सामरिक लक्ष्य पूरी सटीकता से हासिल करना भारत के लिए आसान हो जाएगा। खासकर दो पड़ोसी राष्ट्रों के साथ मौजूदा तनावपूर्ण रिश्तों के संदर्भ में देखें तो यह समझौता विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो जाता है। लेकिन ऐसे समझौते तात्कालिक संदर्भों तक सीमित नहीं होते। न ही ये एकतरफा तौर पर फायदेमंद होते हैं। ध्यान रहे, यह समझौता ऐसे समय हुआ है जब अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव अपने अंतिम दौर में है। दो देशों के बीच कोई समझौता यूं भी किसी खास सरकार का मामला नहीं होता, लेकिन अमेरिकी आम चुनाव की मतदान तिथि से ऐन पहले हुआ यह समझौता इस बात को भी रेखांकित करता है कि दोनों देशों के संबंध अब खास नेताओं के बीच की पर्सनल केमिस्ट्री पर निर्भर नहीं रह गए हैं। यह दोनों देशों के बीच बढ़ते सहयोग और बेहतर होते तालमेल का ठोस संकेत है। किसी भी अन्य रिश्ते की तरह यह नजदीकी भी दोनों देशों को लाभ पहुंचा रही है। सिर्फ रक्षा क्षेत्र की बात करें तो भारत-अमेरिका सहयोग बढ़ना शुरू होने के बाद से, यानी 2007 से अब तक अमेरिकी कंपनियां भारत को 21 अरब डॉलर से ज्यादा के हथियार बेच चुकी हैं। बदली परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए दोनों देशों के रिश्तों में बढ़ता तालमेल न केवल भारत और अमेरिका के राष्ट्रीय हितों की दृष्टि से बल्कि विश्व शांति और क्षेत्रीय संतुलन के लिए भी उपयोगी है।


सौजन्य - NBT।

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Editorials : राहत की बात

भारत को कोरोना विषाणु महमाारी के विरुद्ध लड़़ाई के हर क्षेत्र में सफलता मिल रही है। निश्चित तौर पर इसका श्रेय अस्पतालों में भर्ती मरीजों की देखभाल करने वाले चिकित्साकर्मियों सहित महामारी के चिकित्सकीय प्रबंधन करने में शामिल केंद्र और राज्यों के बीच बेहतर तालमेल को दिया जाना चाहिए। 


इसी बेहतर तालमेल का मिलाजुला परिणाम यह है कि अक्टूबर के इस महीने में बीते सोमवार को दूसरी बार २४ घंटे के भीतर ५० हजार से कम नये मामले सामने आए। पिछले आठ महीने के बाद मृत्यु दर भी घटकर ८.५ फीसद पर आ गई है। साढ़े  तीन महीने बाद एक दिन में महामारी से होने वाली मौतों का मामला भी ५०० से नीचे आ गया है। 


प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी समय–समय पर राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ महामारी की समीक्षा करते रहे हैं और संबंधित एजेंसियों को निर्देश भी जारी करते रहे हैं। उन्होंने देश के नागरिकों को कई बार सावधान भी किया है। त्योहारों से पहले पिछले मंगलवार को उन्होंने देशवासियों को सावधान किया था कि लॉकड़ाउन भले हट गया है‚ लेकिन कोरोना का वायरस नहीं गया है। उन्होंने नारा भी दिया कि‚ ‘जब तक दवाई नहीं‚ तब तक ढिलाई नहीं।' प्रधानमंत्री की चेतावनियों का नागरिकों के साथ–साथ महामारी की रोकथाम में जुटे लोगों पर भी पड़़ रहा है।


 पिछले दिनों प्रधानमंत्री कार्यालय ने संकेत दिया था कि अगले वर्ष फरवरी–मार्च तक महामारी का टीका भी बाजार में उपलब्ध हो जाएगा। इन दिनों केंद्र सरकार टीके के समुचित वितरण की तैयारियों में जुट गई है। केंद्रीय मंत्री प्रताप चंद्र सारंगी ने कहा है कि केंद्र सरकार ने हर नागरिक को कोरोना का टीका प्रदान करने के लिए ५० हजार करोड़़ रुûपये की व्यवस्था की है। देश के सभी नागरिकों को मुफ्त में टीका दिया जाएगा। यह खबर सभी देशवासियों के लिए राहत भरी है। क्योंकि पिछले दिनों बिहार विधानसभा चुनाव के घोषणा पत्र में भाजपा ने सूबे के हर व्यक्ति को मुफ्त में कोरोना का टीका देने का वादा किया है। 


उसके बाद यह विवाद का विषय बन गया था। शायद इसीलिए केंद्रीय मंत्री प्रताप चंद्रको यह कहना पड़़ा है कि हर देशवासियों को मुफ्त में टीका दिया जाएगा। जाहिर है जब कोरोना का टीका का फासला बहुत कम रह गया है तो हमें पहले से और ज्यादा सतर्क रहने की जरूरत है। क्योंकि किसी एक व्यक्ति की मौत भी उसके परिवार‚ देश और समाज के लिए भारी पड़़ रही है। 


सौजन्य - राष्ट्रीय सहारा।

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Editorials : क्लाइमेट पॉलिसी वक्त की मांग

एक समय था जब यह माना जाता था कि दुनिया खत्म होगी आणविक युद्ध के माध्यम से। जब शीत युद्ध का माहौल था‚ लेकिन अब यह दुनिया अपनी विलासिता और मूर्खता के कारण तबाह होगी‚ जिसके लक्षण दिखाई भी दे रहे हैं। भूराजनीतिक वर्चस्व आज भी विदेश नीति की धार बना हुआ है। चीन की बेपनाह शक्ति प्रदर्शन और शीर्ष पर पहुंचने की बेताबी ने दुनिया को एक ऐसे मोड़ पर ला खड़ा किया है‚ जहां से तबाही का मंजर हर किसी को नजर आ रहा है। अमेरिका अपनी जिद पर अड़ा हुआ है कि वह ग्रीन एनर्जी की प्राथमिकता को स्वीकार कर दोयम दरजे की शक्ति नहीं बनना चाहता। इसलिए अमेरिकी राष्ट्रपति ने पेरिस समझौते से हाथ खींच लिया था। अगर कार्बन जनित ऊर्जा की बात करें तो चीन इसमें सबसे अव्वल है‚ उसका कार्बन एमिशन (उत्सर्जन) भी सबसे ज्यादा है। 

अमेरिका और चीन मिलकर तकरीबन ४० प्रतिशत से ज्यादा गंदगी वायुमंडल में फैलाते हैं। अगर उसमें यूरोपीय देशो को शामिल कर लिया जाए तो यह औसत ७५ प्रतिशत के ऊपर चला जाता है। मालूम है कि १७ शताब्दी के उतरार्द्ध से लेकर अभी तक वायुमंडल का तापमान १।१ सेंटीग्रेड बढ़ चुका है। इसके लिए मुख्यतः दोषी यूरोपीय औद्यौगिक देश और अमेरिका है‚ जिनके कारण पिछले २०० वर्षो में पृथ्वी का तापमान इस हालत में पहुंच चुका है कि समुद्री तट पर स्थित देश जलमग्न होने से आक्रांत है। इसमें भारत के भी कई शहर हैं। छोटे–छोटे देशों ने परम्परागत ऊर्जा के साधन जैसे कोयला‚ डीजल और पेट्रोल से हाय तौबा कर लिया है‚ लेकिन उनके आकार इतने छोटे हैं कि समस्या का समाधान नहीं हो सकता। 


 यूरोपीय देशों में भी ग्रीन इÈधन की ललक बढ़ी है। उनका भी दायरा छोटा है। प्रश्न उठता है कि क्या चीन‚ अमेरिका और दर्जनों मध्यम दरजे की शक्तियां अपनी विदेश नीति को सीधे क्लाइमेट पालिसी (जलवायु नीति) बनाने के लिए तैयार है कि नहींॽ अगर नहीं तो दुनिया की समाप्ति भी सुनिश्चित है। तीन महkवपूर्ण प्रश्न हैं‚ जिसका विश्लेषण जरूरी है। पहला‚ भारत के लिए हरित ऊर्जा एक विकल्प नहीं बल्कि जरूरत है। दरअसल‚ यह जरूरत केवल भारत की नहीं बल्कि पूरे विश्व की है। १९९२ में सम्पन्न ‘रियो सम्मलेन' से लेकर २०१५ के बीच कई अंतरराष्ट्रीय सम्मलेन सयुक्त राष्ट्र संघ के तत्वावधान में संपन्न हुए। हर बार चेतावनी दी गई। चेतावनी का वैज्ञानिक आधार था। ब्यूनर्स आयर्स में १९९८ में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में वैज्ञानिकों ने कहा था कि अगर २०२० तक फॉसिल फ्यूल एनर्जी को बुनियादी रूप से कम नहीं किया गया तो २०२० में आपातकालीन स्तिथि पैदा हो सकती है‚ जिसका अंदाजा किसी को भी नहीं होगा। २०२० में कोरोना की अद्भुत महामारी से दुनिया सिकुड़ कर घरों में बंद हो गई। न्यूयार्क और पेरिस जैसे शहर जो कभी बंद नहीं होते थे‚ सन्नाटा पसर गया। २०१५ के पेरिस मीटिंग में चेतावनी एक सच्चाई बन गई। कहा गया कि २०५० तक अगर कार्बन मुक्त ऊर्जा का बंदोबस्त दुनिया के बड़े और विकसित देश नहीं कर लेते तो मानवता हर तरीके से खतरे में है। विश्व को तबाह करने के लिए आणविक युद्ध की जरूरत नहीं पड़ेगी। दुनिया अपने कर्मों के भार से समाप्त हो जाएगा। 


आश्चर्य इस बात का है कि इतना सब कुछ होने के बाद भी दुनिया के पुरोधा इस बात को समझने की कोशिश नहीं कर रहे हैं। जिस डाली पर बैठे हैं उसी डाली को काटने की मूर्खता कर रहे हैं। दुनिया के वैज्ञानिक मानते हैं कि वातावरण के गर्म होने का खमियाजा पूरी दुनिया के लिए मुसीबत है‚ लेकिन भारत और भारत के पडÃोसी देशों के लिए संकट ज्यादा तीखा और बहुरंगी है। चूंकि भारत सहित भारत के पडÃोसी देश ट्रॉपिकल जोन में आते हैं। घनीभूत आबादी है। आÌथक व्यवस्था कमजोर है। विकास की गति को भी बढ़ाना है। इसलिए भारत सहित पूरे दक्षिण एशिया के देशों में हरित ऊर्जा के अलावा और कोई विकल्प शेष नहीं है। दरअसल‚ सुखद आश्चर्य यह है कि भारत की वर्तमान सरकार हरित ऊर्जा को बहाल करने की जुगत में जुट गई है। यह कागजों से उतरकर जमीनी स्तर पर दिखाई भी देने लगा है॥। भारत में ऊर्जा का मुख्य उपयोग के कई खंड है‚ सबसे बड़ा ढांचा बिजली उत्पादन का है‚ जिसके सहारे अन्य व्यवस्थाएं चलती है। दूसरा परिवहन का है‚ जिसमें रेल और रोड ट्रांसपोर्ट के साथ कार्गो और हवाई जहाज आते हैं। तीसरा फैक्टरी का है‚ जिसमें मूलतः लोहा और सीमेंट फैक्टरी को ज्यादा इÈधन की जरूरत पड़ती है‚ चौथा घरेलू जरूरतें हैं और पांचवा कृषि व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए ऊर्जा की जरूरत पड़ती है। भारत ने पिछले ६ सालों में सौर ऊर्जा का आकर १७ जीबी से बढÃाकर ७८ जीबी कर लिया है। प्रधांनमंत्री नरेन्द्र मोदी की कोशिश दुनिया में एक स्मार्ट सौर ग्रिड के जरिये दुनिया को जोड़ने की है‚ जिसमें एक सूर्य‚ एक ग्रिड और एक विश्व की परिकल्पना भारत की अनोखी देन है। सबसे मजेदार बात यह भी है कि सौर ऊर्जा की कीमत फॉसिल फ्यूल से चार गुणा कम है। 


हरित ऊर्जा की सबसे बड़ी मुसीबत इसकी अबाध निरंतरता है। रात में सूर्य नहीं चमकता‚ इसके लिए स्टोरेज की जरूरत पड़ेगी। वह एक चुनौती है‚ जिसे आधुनिक टेक्नोलॉजी के जरिये पूरा कर लिया जाएगा। हर तरीके से भारत २०५० तक अपनी परम्परगत ऊर्जा व्यवस्था को बदलकर हरित ऊर्जा को स्थापित करने में सक्षम है। हरित ऊर्जा हर तरीके से विकेंद्रित होगा‚ अगर भारत के प्रधानमंत्री ने तमाम विवशताओं के बावजूद ग्रीन एनर्जी के आधार को अपना संकल्प बना लिया है‚ जिसमें २०५० तक फॉसिल फ्यूल्स से स्थांतरण ग्रीन एनर्जी में हो जाएगा। नीति आयोग के द्वारा रोडमैप भी तैयार किया गया। 

 अगर भारत यह सब कुछ कर सकता है तो अमेरिका और अन्य देश क्यों नहीं कर सकतेॽ चीन क्यों नहीं करना चाहताॽ यह संघर्ष सामूहिक है। १९९८ में सयुक्त राष्ट्र संघ के तत्वावधान में सम्पान वाÌषक जलवायु अधिवेशन में यह बात कही गई थी कि अगर २०२० तक कार्बन जनित ऊर्जा में ३० प्रतिशत कमी नहीं की गई तो २०२० में आपदा की पूरी आशंका है‚ यह कितनी खतरनाक होगी इसका अंदाजा नहीं। देखना है कि दुनिया की महाशक्तियों के ज्ञान चक्षु खुलते भी है कि नहींॽ अगर ऐसा होता है तो क्लाइमेट पॉलिसी ही विदेश नीति होनी चाहिए।


सौजन्य - राष्ट्रीय सहारा।

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Dynastic form of corruption: जब भ्रष्टाचार करने वाली एक पीढ़ी को सजा नहीं मिलती तो दूसरी पीढ़ी भी भ्रष्टाचार करती

केंद्रीय जांच ब्यूरो की ओर से आयोजित एक सम्मेलन को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने भ्रष्टाचार के जिस वंशवादी रूप की चर्चा की, वह एक कटु सच्चाई है। उन्होंने उचित ही इस तरह के भ्रष्टाचार को एक विकराल चुनौती करार दिया, लेकिन बात तब बनेगी जब उससे पार पाने के जतन किए जाएंगे। प्रधानमंत्री के अनुसार भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टालरेंस की नीति अपनाई जा रही है, लेकिन यदि ऐसा है तो फिर वंशवादी भ्रष्टाचार विकराल रूप क्यों धारण किए हुए है? नि:संदेह यह वह सवाल है, जिसका जवाब सरकार और उसकी एजेंसियों को देना होगा और वह भी इसके बावजूद कि भ्रष्टाचार से लड़ना किसी एक एजेंसी का काम नहीं, बल्कि सामूहिक जिम्मेदारी है।


प्रधानमंत्री के इस आकलन से असहमत नहीं हुआ जा सकता कि जब भ्रष्टाचार करने वाली एक पीढ़ी को उचित सजा नहीं मिलती तो दूसरी पीढ़ी और ज्यादा ताकत के साथ भ्रष्टाचार करती है, लेकिन यह देखना तो सरकार और भ्रष्टाचार निरोधक एजेंसियों का ही काम है कि भ्रष्ट तत्वों को समय रहते समुचित सजा मिले। जब तक भ्रष्ट तत्वों को उनके किए की सख्त सजा नहीं मिलती, तब तक भ्रष्टाचार में लिप्त लोगों के मन में भय का संचार नहीं होने वाला।



VDO.AI



यदि कई राज्यों में पीढ़ी दर पीढ़ी चलने वाला भ्रष्टाचार राजनीतिक परंपरा का हिस्सा बन गया है और देश को दीमक की तरह खोखला कर रहा है तो फिर उससे निपटने के लिए विशेष उपाय किया जाना समय की मांग है। आखिर यह मांग कब पूरी होगी? यह सही है कि मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद शासन-प्रशासन के शीर्ष स्तर के भ्रष्टाचार पर एक हद तक लगाम लगी है, लेकिन इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि भ्रष्टाचार से जुड़े तमाम मामले जांच और अदालती सुनवाई से आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं। इसका कोई औचित्य नहीं कि भ्रष्टाचार के गंभीर मामलों में भी जांच और सुनवाई का सिलसिला लंबा खिंचता रहे। कभी-कभी तो यह इतना लंबा खिंच जाता है कि अपनी महत्ता ही खो देता है।



कायदे से तो यह होना चाहिए कि भ्रष्टाचार के बड़े और खासकर नेताओं एवं नौकरशाहों से जुड़े मामलों की जांच एवं सुनवाई प्राथमिकता के आधार पर हो। किसी को बताना चाहिए कि ऐसा क्यों नहीं होता? भ्रष्टाचार के गंभीर मामलों के शीघ्र निपटारे के लिए सरकारी एजेंसियों के साथ न्यायपालिका को भी सक्रियता दिखानी होगी। अच्छा होता कि प्रधानमंत्री अपने संबोधन में इस जरूरी बात को खास तौर पर रेखांकित भी करते, क्योंकि देश इससे हैरान भी है और परेशान भी कि 2जी स्पेक्ट्रम सरीखे बड़े घोटालों का निपटारा जल्द से जल्द करने की जरूरत क्यों नहीं समझी जा रही है?



सौजन्य - दैनिक जागरण। 

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Opinion : सामाजिक पिरामिड में महिलाएं सबसे नीचे

प्रभु चावला, एडिटोरियल डायरेक्टर, द न्यू इंडियन एक्सप्रेस


“जिस तरह से शक्तिशाली नदी मजबूत चट्टानों और पहाड़ों को तोड़ देती है, उसी तरह बुद्धिमान महिला दुष्टों के छल को ध्वस्त कर देती है. ऐसी बुद्धिमान महिलाओं को हमें नमन करना चाहिए”– ऋग्वेद. ताकत की राह गुणा-गणित की नक्शानवीशी से होकर गुजरती है. प्राचीन भारत में महिलाओं को ऊंचा दर्जा हासिल था. यजुर्वेद कहता है- “हे नारी! तुम पृथ्वी की तरह मजबूत हो और उच्च स्थान पर हो. दुनिया को बुराई और हिंसा के मार्ग से बचाओ.” आज उसे ही सुरक्षित किये जाने की जरूरत है.



आश्चर्य नहीं है कि आज महिलाएं सामाजिक पिरामिड में सबसे निचले स्थान पर हैं. केवल चुनाव प्रचार के दौरान ही महिलाएं देवी बन जाती हैं. इस वर्ष 25 मार्च से 31 मार्च के बीच लॉकडाउन के दौरान महिलाओं के साथ घरेलू हिंसा के 1477 मामले दर्ज हुए. बीते 10 वर्षों में इस अवधि के दौरान यह संख्या सर्वाधिक है.



सदियों से, महिलाएं अपशब्द और उपासना दोनों का ही विषय रही हैं. पश्चिम बंगाल सर्वोच्च माता के रूप में काली की पूजा करता है. मान्यताओं में देवियों को ऊंचा स्थान प्राप्त है- सरस्वती ज्ञान और लक्ष्मी धन-समृद्धि प्रदान करती हैं और दुर्गा पापियों को दंड देती हैं. वास्तव में भारतीय महिलाओं के साथ देवदासियों या शूर्पणखा जैसा बर्ताव किया जाता है और चुनावी मंचों से राजनेताओं द्वारा उनके प्रति दिखावटी सहानुभूति प्रदर्शित की जाती है.


कमलनाथ ने अपनी ही सहयोगी को ‘आइटम’ कह दिया है, हालांकि, बाद में उन्होंने खेद व्यक्त किया. इससे पहले समाजवादी पार्टी के नेता आजम खान ने राजनीतिक विरोधी जया प्रदा के खिलाफ अपशब्दों का इस्तेमाल किया था. हाल ही में भाजपा महासचिव कैलाश विजयवर्गीय ने प्रियंका गांधी के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी करते हुए उन्हें कांग्रेस का ‘चॉकलेटी चेहरा’ कहा था.


वास्तव में, बिजनेस से लेकर राजनीति तक हर क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी बढ़ने से उनका उपहास उड़ाना सामान्य सी बात हो गयी है. वरिष्ठ समाजवादी नेता शरद यादव महिलाओं पर टिप्पणी के कारण कई बार घिर चुके हैं. डीएमके नेता नांजिल संपत ने पुदुचेरी की एलजी किरण बेदी के बारे में कहा कि ‘हम नहीं जानते कि वे पुरुष हैं या महिला.’ महिलाएं एक प्रकार का वोटबैंक बन गयी हैं, जिनसे हर चुनावी लड़ाई में लुभावने वादे किये जाते हैं. महिला मतदाताओं के प्रति दरियादिली दिखाने के लिए सभी नेता आपस में होड़ करते हैं.


जातिगत राजनीति वाले राज्य बिहार में महिला मतदाताओं के लिए खूब वादे किये गये हैं. महिला उद्यमिता के क्षेत्र में बिहार की शायद ही कोई पहचान हो. फिर भी, महिला नवउद्यमियों के लिए 50 प्रतिशत ब्याज मुक्त पांच लाख तक के ऋण की घोषणा की गयी है. शायद ही कोई विधानसभा या लोकसभा चुनाव होता हो, जिसमें महिलाओं के सशक्तीकरण के लिए विशेष घोषणाएं न होती हों. हिंदू परंपराओं के इतर, महिला सशक्तीकरण की कवायद, मौद्रिक मदद, घर में और बाहर सुरक्षा के लिए कानूनी प्रावधान तथा शासन-प्रशासन में नाममात्र की भागीदारी तक ही सीमित होती है.


उन्हें शायद ही कभी नेतृत्व का जिम्मा दिया जाता है. यहां तक कि पंचायती राज जैसे संवैधानिक अधिनियम के बावजूद राजनीतिक पितृसत्ता उनकी भूमिका को प्रभावित करती है. जब महिलाओं ने अधिकारों और भागीदारी की मांग की, तो पुरुषवादी प्रतिष्ठान ने शक्तिहीन संस्थानों जैसे महिला आयोग (केंद्र और राज्य स्तर पर) का गठन कर दिया. उन्हें सभी सुविधाएं और शक्तियां दी गयीं, लेकिन उन पर मंत्रियों का प्रशासनिक नियंत्रण बरकरार रहा. महिलाओं के कल्याण हेतु लगभग सभी राज्यों में अलग से मंत्रालय की व्यवस्था है.


उनके बजट सीमित होते हैं. न तो आयोग और न ही मंत्रालय महिलाओं के मुद्दों का हल निकाल पाते हैं. लड़कियों और महिलाओं की मदद के लिए भारत में कल्याणकारी योजनाएं मेडिकल कॉलेजों से कहीं अधिक हैं. प्रत्येक मुख्यमंत्री और कई केंद्रीय मंत्री लड़कियों के लिए विवाह अनुदान से लेकर विधवा पेंशन तक कई मुफ्त योजनाओं की घोषणा करते हैं. लेकिन, यह केवल दिखावे के लिए ही होती हैं. महिलाओं को सम्मानजनक स्थान केवल धार्मिक समारोहों या विवाह के दौरान ही दिया जाता है, जबकि धर्मग्रंथों के अनुसार, महिलाओं की भागीदारी के बगैर कोई भी अनुष्ठान पूर्ण नहीं होता.


बेहतर शिक्षा और कौशल प्राप्त करने के बाद भी उन्हें अहम जिम्मेदारियों से महरूम रखा गया. केंद्र स्तर पर केवल 12 प्रतिशत महिला अधिकारी सचिव स्तर के पदों पर हैं. महिला प्रशासक शायद ही रक्षा, वित्त, गृह, वाणिज्य, कार्मिक और रेल जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालयों की प्रमुख बन पाती हैं. वास्तविक शक्तियों से दूर रखकर महिलाओं को अधिक नुकसान पहुंचाया गया है. उनके खिलाफ अपराधों में निरंतर वृद्धि हुई है. सोशल और डिजिटल मीडिया पर उन्हें निशाना बनाया जाता है. प्रत्येक सात में से एक ट्वीट महिलाओं के खिलाफ अपशब्दों से भरा होता है, प्रत्येक पांच में से एक ट्वीट लैंगिक भेदभाव से जुड़ा होता है.


राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार, रोजाना औसतन 88 बलात्कार होते हैं. उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश और प बंगाल में बच्चियों के साथ यौन उत्पीड़न महिला सुरक्षा पर बड़े सवाल खड़े करता है. साल 2019 में महिलाओं के साथ अपराध के चार लाख मामले दर्ज हुए, इससे पहले 3.75 लाख दर्ज हुए थे. दो दशकों से अधिक समय से लंबित महिला आरक्षण विधेयक लैंगिक भेदभाव नहीं है, तो क्या है? जाति आधारित पार्टियां इसका विरोध करती हैं. लेकिन, राष्ट्रीय पार्टियां चुप क्यों हैं? क्या इसलिए मौका मिलने पर महिलाएं अधिक सफलता प्राप्त करती हैं?


पिछले 70 वर्षों में अब तक केवल एक महिला प्रधानमंत्री बनी हैं और लगभग एक दर्जन ही मुख्यमंत्री बन पायी हैं. प्रत्येक भारतीय पुरुष मंदिर की चारदीवारी में महिलाओं को देवी के तौर पर सीमित रखना चाहता है. पौराणिक कथाओं के दायरे से बाहर महिला नेता नहीं, बल्कि अनुयायी बनी हुई हैं. ऋग्वेद भारतीय नारियों से कहता है कि “आप साम्राज्ञी बन सकती हैं और सभी का नेतृत्व कर सकती हैं.” भारतीय पुरुषों के लिए वह साम्राज्ञी तो है, लेकिन वह केवल किचन और घर की, यहां तक कि इसमें किचन कैबिनेट भी नहीं शामिल है.


(ये लेखक के निजी विचार हैं.) 


सौजन्य-  प्रभात खबर।

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Opinion : भारत के लिए जरूरी है ऊर्जा सुरक्षा

डॉ. अमित सिंह, सहायक प्राध्यापक, दिल्ली विश्वविद्यालय



इंडिया एनर्जी फोरम में प्रधानमंत्री ने भारत की ऊर्जा सुरक्षा को लेकर जो बातें कही हैं वह बहुत महत्वपूर्ण है़ं आनेवाले समय में यदि हमें अपनी अर्थव्यवस्था बचानी है, या फिर अपनी आंतरिक सुरक्षा और विदेश नीति के ध्येय को प्राप्त करना है, उसके लिए ऊर्जा सुरक्षा की नीति बनाना बहुत जरूरी है़ वर्तमान में भारत अमेरिका और चीन के बाद तीसरा ऐसा देश है जो सबसे ज्यादा ऊर्जा का आयात करता है़ भारत की बढ़ती जनसंख्या के मद्देनजर हमें निर्बाध रूप से ऊर्जा आपूर्ति की जरूरत है़



भारत जानता है कि यदि उसे अपनी अर्थव्यवस्था सुचारु रूप से चलानी है, आत्मनिर्भर भारत बनाना है तो उसे भी ऊर्जा आयात को कम करते हुए घरेलू उत्पादन पर ध्यान देना होगा़ पिछले कई वर्षों में भारत ने तेल और गैस के घरेलू उत्पादन पर काफी पैसा खर्च किया है़ विदेशी कंपनियों के साथ नये-नये संयुक्त उद्यम हुए है़ं वर्ष 2014 के बाद मोदी सरकार ने सौर ऊर्जा पर भी ध्यान दिया और बहुत बड़े-बड़े सौर ऊर्जा पार्क भी बनाये, जिसके माध्यम से हमें ऊर्जा की प्राप्ति भी हो रही है़



अभी भी हम अपनी तेल एवं गैस जरूरतों का 80 प्रतिशत हिस्सा बाहर से ही मंगाते है़ं आनेवाले समय में हमारे देश की ऊर्जा जरूरतें काफी बढ़ेंगी़ वर्तमान में भारत के ऊर्जा उपभोग का 50 प्रतिशत कोयले पर, 30 प्रतिशत तेल पर और 10 प्रतिशत गैस पर निर्भर है़ हाइड्रोइलेक्ट्रिसिटी और परमाणु ऊर्जा का उपभाेग क्रमश: दो प्रतिशत और एक प्रतिशत ही है़ भारत में कोयले की बहुत सी खदानें हैं फिर भी उसे अच्छी गुणवत्ता का कोयला विदेशों से आयात करना पड़ता है़


भारत के कोयले के खदान भी धीरे-धीरे खत्म होते जा रहे हैं और आने वाले समय में ऊर्जा जरूरतों के बढ़ने की संभावना है़ ऐसे में हमारी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में प्राकृतिक गैस एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है़ यही कारण है कि पिछले छह वर्षों में मोदी सरकार ने कई ऊर्जा सम्मेलन किये हैं, बड़ी कंपनियों के साथ संयुक्त उद्यम किया है और कई ऐसे सुधार भी किये हैं जिसके माध्यम से विदेशी कंपनियां भारत में निवेश कर पाये़ं वर्तमान में हमें अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए वैकल्पिक ऊर्जा स्रोत तलाशने की जरूरत है़


जलवायु परिवर्तन को देखते हुए आज ज्यादातर देश गैस आधारित अर्थव्यवस्था चाहते है़ं इसका लाभ होगा. कोयला, डीजल या तेल की तुलना में गैस की ज्यादा खपत से प्रदूषण में कमी आयेगी़ मोदी सरकार इस बात को समझती है, इसलिए गैस आधारित अर्थव्यवस्था बनाने की बात हो रही है़ गैस आधारित अर्थव्यवस्था से पर्यावरण बचेगा और जलवायु परिवर्तन के हिसाब से भी यह अच्छा होगा़


इसके जरिये विदेशी कंपनियां भारत में निवेश करेंगी, जिससे अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलने के साथ ही नौकरियों का सृजन भी होगा़ पर्यावरण भी बचेगा और आनेवाले समय में हम ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर भी हो पायेंगे़ इतना ही नहीं, भारत अभी भी तेल एवं गैस की जरूरतों को पूरा करने के लिए पश्चिम एशिया के देशों पर बहुत ज्यादा निर्भर है़ इन देशों में बहुत ज्यादा राजनीतिक अस्थिरता रहती है, जिसका असर तेल की कीमतों पर पड़ता है़


इसका नकारात्मक प्रभाव हमारी अर्थव्यवस्था पर भी होता है़ साथ ही, अंतरराष्ट्रीय घटनाओं पर जिस तरह से अमेरिका प्रतिक्रिया देता है, उसका असर भी व्यापार और तेल एवं गैस की आपूर्ति पर पड़ता है़. मोदी ने ऑयल रिफाइनिंग की वर्तमान क्षमता बढ़ाने की भी बात भी कही है़ इसका एक कारण है कि हमारी ज्यादातर ऑयल रिफाइनरियां ईरान के तेल को ही रिफाइन करने में सक्षम है़ं रिफाइनरी की संख्या बढ़ने से ईरान के अलावा दूसरे देशों से आनेवाले तेल को भी हम अच्छी तरह रिफाइन कर पायेंगे.


इसके लिए सरकार को कई मोर्चों पर काम करना होगा़ 'वन नेशन वन गैस ग्रिड' की बात भी प्रधानमंत्री ने कही है, जो बहुत अच्छी बात है, लेकिन इसके लिए काम करने की जरूरत है. क्योंकि जब निवेश के लिए कल कंपनियां आयेंगी तो वे चाहेंगी कि गैस भी जीएसटी के दायरे में आये़ जीएसटी के दायरे में गैस के आने से सभी जगह गैस के दाम एक जैसे हो जायेंगे़ इससे दाम भी कम होगा और कंपनिया भी मुनाफा कमा पायेंगी़ केंद्र को भी उचित फायदा मिलेगा़


दूसरे, अभी गैस का जो भी उत्पादन होता है, वह राज्य या ज्योग्राफिकल लोकेशन के आधार पर होता है और गैस का अधिकतम उपभोग भी उसी राज्य में हो जाता है़ लेकिन जब राष्ट्र के स्तर पर इसको चैनलाइज किया जायेगा तब एक तरीके की गैस या एक ही माध्यम से पूरे देश में इसकी आपूर्ति होगी़ रिस्पांसिबल फ्यूएल प्राइसिंग का अर्थ भी पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों में जानबूझकर या राजनीतिक अस्थिरता के कारण होनेवाली बेतहाशा वृद्धि पर रोक लगाने की एक पहल है़


भविष्य में इस बात की पूरी संभावना है कि राष्ट्रों के मध्य ऊर्जा संसाधनों को लेकर युद्ध हों, इसलिए भारत को ऊर्जा सुरक्षा पर बल देने की जरूरत है तभी उसका चहुंमुखी विकास होगा और वह आत्मनिर्भर हो पायेगा़ भारत की ऊर्जा सुरक्षा आर्थिक दृष्टिकोण से भी आवश्यक है और पर्यावरण संरक्षण एवं जलवायु परिवर्तन के दृष्टिकोण से भी़ स्वच्छ एंव आत्मनिर्भर भारत के स्वप्न को साकार करने के लिए विदेश नीति के माध्यम से राष्ट्रीय हितों को साधने में भी यह सार्थक होगा़


(ये लेखक के निजी विचार हैं.)


सौजन्य-  प्रभात खबर।

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Opinion : संयुक्त सैन्य कमान

भारत को लगातार युद्धों, लड़ाइयों, अतिक्रमण और घुसपैठ का सामना करना पड़ता है. आज यह चुनौती पहले से कहीं अधिक गंभीर है. इससे प्रभावी ढंग से निपटने के लिए सेना के तीनों अंगों के बीच समायोजन, सहकार और सहभागिता को बढ़ाने की आवश्यकता लंबे समय से महसूस की जा रही है. इस वर्ष के प्रारंभ में डिफेंस स्टाफ के प्रमुख के रूप में जनरल बिपिन रावत की नियुक्ति इस दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल थी. दुनिया की ताकतवर सेनाओं में यह व्यवस्था पहले से ही है. अब इस प्रक्रिया को विस्तार देते हुए सरकार ने पांच सैन्य थिएटर कमान की स्थापना करने का निर्णय लिया है.



ऐसे कमान में एक शीर्ष अधिकारी के नेतृत्व में तीनों सेनाओं की शक्ति और उनके संसाधनों का नियंत्रण रहता है ताकि सुरक्षा के उद्देश्यों की प्राप्ति बेहतर ढंग से हो सके. जानकारों की मानें, तो अभी तक ऐसी व्यवस्था केवल अंडमान एवं निकोबार क्षेत्र में है. नयी व्यवस्था में उत्तरी कमान का जिम्मा लद्दाख से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक लगभग साढ़े तीन हजार किलोमीटर लंबी वास्तविक नियंत्रण रेखा की सुरक्षा का होगा. चीन के पांच ऐसे कमानों में से एक पूरी तरह भारत को लक्षित है.



पश्चिमी कमान पाकिस्तान से लगती अंतरराष्ट्रीय सीमा और नियंत्रण रेखा की निगरानी करेगी. अन्य तीन कमान द्वीपीय, वायु और सामुद्रिक सुरक्षा से संबद्ध होंगे. चीन और अमेरिका जैसे देशों के पास ऐसे कमानों की शृंखला है. चीन में पांच और अमेरिका में ग्यारह ऐसे कमान हैं. हालांकि युद्ध या संघर्ष की स्थिति में तीनों सेनाएं सम्मिलित रूप से शत्रु का सामना करती हैं, लेकिन एक सुनिश्चित नियंत्रण और सामंजस्य के अभाव में संसाधनों का समुचित उपयोग नहीं हो पाता है तथा संवाद स्थापित करने एवं निर्णय लेने में भी अक्सर मुश्किलें पैदा होती हैं.


सीमावर्ती क्षेत्रों की निगरानी के लिए भी तीनों सेनाएं अलग-अलग तंत्रों का इस्तेमाल करती हैं. केंद्रित नेतृत्व प्रणाली के रूप में कमान बनाने से सूचनाओं को एकत्र करने और संभावित चुनौतियों की तैयारी सम्मिलित रूप से की जा सकेगी तथा इसे नियंत्रित व निर्देशित करने का दायित्व एक अधिकारी पर होगा. वह स्थितियों के हिसाब से रणनीति बनाने और तैयारी करने में सक्षम हो सकेगा. उसके अधीन तमाम संसाधनों के रहने से कार्रवाई के दौरान उसे जरूरत पूरा करने के लिए इंतजार नहीं करना पड़ेगा.


उदाहरण के लिए, नौसैनिक लड़ाकू विमान को आवश्यकता होने पर तुरंत पश्चिमी क्षेत्र के रेगिस्तानी इलाकों में तैनात किया जा सकेगा और वायु सेना के युद्धकों को किसी दूसरे मोर्चे पर भेजा जा सकेगा. समुद्र में पहले से चली आ रही वर्तमान व्यवस्था में तीनों सेनाओं के अधिकारी एक कार्रवाई में सम्मिलित रूप से हिस्सा लेने के बावजूद अपनी टुकड़ियों और क्षमताओं को अलग-अलग निर्देशित करते थे. एकल कमान की स्थापना से ऐसी विसंगतियों का समाधान हो सकेगा. उम्मीद है कि तय लक्ष्य के अनुसार 2022 तक भारतीय सेना के ये नये पांच कमान मोर्चा संभाल लेंगे.


सौजन्य-  प्रभात खबर।

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Opinion : संपादकीय: दूरगामी मोर्चा

भारत और अमेरिका के बीच नई दिल्ली में मंगलवार को जो महत्त्वपूर्ण रक्षा समझौता हुआ है, वह दोनों देशों के बीच मजबूत होते रक्षा संबंधों को रेखांकित करता है। सैन्य डाटा साझा करने और भारत को क्रूज व बैलेस्टिक मिसाइलों की तकनीक देने को लेकर बनी सहमति वाला ‘बेसिक एक्सचेंज एंड कोआॅपरेशन एग्रीमेंट आॅन जिओस्पेशियल कोआॅपरेशन’ (बीका) चौथा रक्षा समझौता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि रक्षा क्षेत्र में अमेरिका और भारत एक दूसरे के सबसे करीबी सैन्य साझीदार बन गए हैं। यह करार ऐसे वक्त में हुआ है जब अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव को हफ्ता भर भी नहीं रह गया है। लेकिन सामरिक और रक्षा क्षेत्र में अमेरिका और भारत जिस तरह से एक दूसरे का सहयोग कर रहे हैं, उससे यह साफ है कि दोनों देशों के बीच ये रिश्ते स्थायी बन जाएंगे। अमेरिका में राष्ट्रपति चाहे कोई बने, भारत को लेकर रिपब्लिकन और डेमोक्रेट, दोनों ही सकारात्मक रुख रखते हैं और चुनाव प्रचार के दौरान सभी ने खुल कर यह बात कही भी है। भारत आज चारों ओर से जिस तरह की सुरक्षा संबंधी चुनौतियों का सामना कर रहा है, उसे देखते हुए देश के रक्षा तंत्र को मजबूत बनाना वक्त की मांग है। ऐसे में यह करार मील का पत्थर साबित होगा। बीका समझौता कोई एक दिन की उपलब्धि नहीं हैं। सबसे पहले साल 2002 में दोनों देशों के बीच सैन्य सूचनाओं के आदान-प्रदान के लिए करार हुआ था। यह वह दौर था जब अमेरिका पर आतंकी हमला हुआ था और उसे भारत जैसे देशों के साथ की जरूरत थी, ताकि आतंकवाद से निपटने में मिल कर काम कर सकें। इसके बाद 2016 और 2018 में रक्षा उपकरणों की आपूर्ति और सुरक्षा से संबंधित दो और समझौते हुए थे। बीका इसी कड़ी का करार है। इस करार के बाद अब भारत को अमेरिका से अतिसंवेदनशील सूचनाएं, डाटा, नक्शे आदि मिल सकेंगे। ऐसी तमाम गोपनीय सूचनाएं और जानकारियां होती हैं, जिनके अभाव में हम दुश्मन के ठिकानों तक मार नहीं कर पाते। अगर हमारे पास जटिल भौगोलिक इलाकों के नक्शे और जानकारियां हो तो दुश्मन का मुकाबला करना कहीं ज्यादा आसान होगा। इस करार के तहत युद्ध के दौरान अमेरिका अपने उपग्रहों से मिलने वाले आंकड़े और तस्वीरें भारत के साथ साझा करेगा। आज भारत को चीन और पाकिस्तान दोनों से गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। हिंद महासागर क्षेत्र में चीन की बढ़ती गतिविधियां भी सुरक्षा के लिए नया खतरा बन गई हैं। ऐसे में भारत और अमेरिका के बीच नए रक्षा करार से दोनों देश इस क्षेत्र में चीन के प्रसार को रोकने के लिए काम करेंगे। भारत संतुलन बनाए रखते हुए अपनी सैन्य क्षमता को निरंतर मजबूत कर रहा है। रूस से भी भारत सैन्य मदद ले रहा है। भारत और अमेरिका के विदेश और रक्षा मंत्रियों की बैठक में सीमा पार आतंकवाद पर भी चर्चा हुई। अमेरिकी रक्षा व विदेश मंत्री ने गलवान घाटी में शहीद हुए भारतीय सैनिकों को श्रद्धांजलि देकर यह साफ कर दिया कि चीन के साथ टकराव की स्थिति में अमेरिका भारत के साथ खड़ा है। अमेरिका भी यह बात अच्छी तरह से समझता है कि चीन से निपटने के लिए भारत को साथ रखना जरूरी है और इसके लिए पहले उसे सैन्य रूप से सुदृढ़ करना होगा। दक्षिण एशिया में चीन के प्रभाव को कम करने के लिए अमेरिका, भारत, जापान और आॅस्ट्रेलिया का संगठन- क्वाड भी पूरी तरह से सक्रिय है। चूंकि सैन्य तकनीक और प्रौद्योगिकी में भारत अभी वह मुकाम हासिल नहीं कर पाया है जो रूस और अमेरिका जैसे देश कर चुके हैं, इसलिए भारत को अमेरिका का साथ चाहिए।

सौजन्य - जनसत्ता।

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सब्जियों का समर्थन मूल्य भी तय हो, मुट्ठी भर व्यापारियों के हाथ में प्याज का कारोबार

देविंदर शर्मा, कृषि नीति विशेषज्ञ

पिछले कई वर्षों से आलू और प्याज की कीमतें जिस गति से बढ़ती हैं, उसमें एक पैटर्न नजर आता है। वह पैटर्न यह है कि हर बार इसी मौसम में (अगस्त, सितंबर, अक्तूबर के दौरान) कहा जाता है कि बारिश के कारण फसलों का काफी नुकसान हो गया, जिसके चलते प्याज की कीमतें बढ़ रही हैं। दूसरा पैटर्न यह नजर आता है कि जब भी चुनाव आता है, तो उससे पहले प्याज की कीमतें बढ़ जाती हैं, तो इसका कोई न कोई राजनीतिक निहितार्थ जरूर होगा। इसके पीछे व्यापारी जो भी कारण बताएं, लेकिन एक साल मैंने देखा कि प्याज की पैदावार में मात्र चार फीसदी की गिरावट आई थी, लेकिन कीमतों में चार सौ फीसदी की बढ़ोतरी हुई थी। इसके पीछे कारण यह है कि प्याज का व्यापार मुट्ठी भर लोगों के हाथों में है और वे उसकी कीमत नियंत्रित करते हैं।


इस साल जब प्याज की कीमतें 80 से सौ रुपये प्रति किलो हो गई, तो सरकार ने प्याज के निर्यात पर रोक लगा दी है और आयात को भी मंजूरी दे दी है। मुख्य रूप से यही कहा जा रहा है कि बरसात से फसल को नुकसान हुआ, जिससे कीमतें बढ़ गई हैं। पहली सितंबर से लेकर 30 सितंबर पर सरकारी वेबसाइट पर जो आधिकारिक आंकड़ा है, वह बता रहा है कि सितंबर में लासलगांव की मंडी, जो प्याज की एशिया की सबसे बड़ी मंडी है, में 38.84 फीसदी प्याज की ज्यादा आवक हुई है। और पूरे महाराष्ट्र में देखा जाए, तो 53.17 फीसदी प्याज की आवक ज्यादा हुई है। यानी महाराष्ट्र की मंडियों में 19.23 लाख क्विंटल अधिक प्याज आया। फिर भी कीमतें बढ़ जाती हैं, तो साफ है कि कोई तो बात है, जिसे हमें समझने की जरूरत है। 

यह तो हुई प्याज की बात, पर आलू की कीमतें भी बढ़ी हैं। अभी बाजार में साठ रुपये प्रति किलो आलू उपभोक्ताओं को खरीदना पड़ रहा है। सबसे ज्यादा आलू की पैदावार उत्तर प्रदेश में होती है और इस समय उत्तर प्रदेश में कोल्ड स्टोरेज आलू से भरे पड़े हैं, जहां 30.56 लाख टन आलू जमा है, फिर भी आलू की कीमतें बढ़ रही हैं। इसी को देखते हुए सरकार ने यह निर्देश जारी किया है कि 31 अक्तूबर तक सभी कोल्ड स्टोरेज को खाली कर दिया जाए। ऐसा इसलिए किया गया, ताकि कीमतों को नियंत्रण में लाया जा सके। उत्तर प्रदेश के कोल्ड स्टोरेज में जरूरत से 22 लाख टन ज्यादा आलू पड़ा हुआ है। साफ है कि बाजार में कमी पैदा करके कीमतों को बढ़ाया जा रहा है। इसी पर अंकुश लगाने के लिए सरकार ने 31 दिसंबर तक प्याज के खुदरा और थोक भंडारण के लिए क्रमशः दो टन और पच्चीस टन की सीमा तय की है। इसका असर भी तुरंत दिखा, जिस दिन सरकार ने यह घोषणा की, उस दिन थोक में 8,000 रुपये प्रति क्विंटल की दर थी, जो घटकर 6,000 रुपये पर आ गई। कीमतों के बढ़ने के पीछे जमाखोरी एक बहुत बड़ा कारण है, जिस पर नियंत्रण जरूरी है। 

मगर अफसोस कि जमाखोरी पर हम आज तक नियंत्रण नहीं लगा पाए हैं। जमाखोरी का मुद्दा इसलिए भी महत्वपूर्ण हो गया है कि हाल ही में केंद्र सरकार ने आवश्यक वस्तु (संशोधन) अधिनियम, 2020 पारित किया है, उसमें भंडारण की ऊपरी सीमा को हटा दिया गया है। इसका नतीजा यह हुआ कि जमाखोरी अब वैध हो गई है। ऊपरी सीमा हटाने का क्या नतीजा हो सकता है, इसका अनुमान प्याज और आलू की बढ़ रही कीमत से लगाया जा सकता है। इस संशोधन से किसानों को तो कोई फायदा नहीं होगा, हां, उपभोक्ताओं को इसका भारी नुकसान उठाना पड़ेगा। देश के उपभोक्ता यह समझ रहे हैं कि ये तीनों कानून खेती से संबंधित हैं और उसका असर किसानों पर पड़ेगा। लेकिन आलू और प्याज के उदाहरण से पता चलता है कि ऊपरी सीमा हटाने से उपभोक्ताओं पर असर पड़ेगा। यानी जिस चीज को विनियमित करना चाहिए था, या जिस बड़ी आपूर्ति शृंखला को नियंत्रित करना चाहिए था, वह न करके बड़े खिलाड़ियों को भंडारण की अनुमति दे दी गई। इससे कीमतों में जो छेड़छाड़ होती है और इसका जब तक उपभोक्ताओं को पता चलता है, तब तक वे भारी नुकसान उठा चुके होते हैं। 


कीमतों को नियंत्रित करने का एक तरीका तो यह है कि अभी हमारे पास टेक्नोलॉजी है, अन्य तमाम संसाधन हैं, तो क्यों न हम फसल उत्पादन से पहले ही यह जान लें कि हमें पूरे देश के लिए कौन-सी फसल कितनी चाहिए, और किस राज्य में किस फसल की कितनी जरूरत है और उस हिसाब से हम उसका मैपिंग करें और आपूर्ति शृंखला को नियंत्रित करें। दूसरा तरीका यह है कि बिचौलियों को नियंत्रित करने के लिए हमें एक तंत्र विकसित करना होगा। छोटे व्यापारी और बिचौलियों को हम खराब मानते हैं, पर बड़े व्यापारी व बिचौलिए भी उससे कम नहीं हैं। आप देखेंगे कि स्थानीय बाजार में अभी आलू, प्याज की जो कीमत है, उससे कम अमेजन या फ्लिफकार्ट पर नहीं है। तो दोनों में फर्क क्या है? किसान को मक्के का दाम अभी आठ से नौ रुपये प्रति किलो मिल रहा है और पैकेटबंद होकर जो मक्का बाजार में बिकने आ रहा है, उसकी कीमत 45 से 50 रुपये प्रति किलो है। हम समझते हैं कि बाजार की अदृश्य शक्तियां अपने-आप इसमें संतुलन ले आएगी, लेकिन ऐसा होता नहीं है।


जब भी आलू, प्याज के व्यापारियों पर आयकर विभाग का छापा पड़ता है, तो हंगामा मच जाता है कि इससे व्यापारियों में गलत संदेश जाएगा। पर जमाखोरी रोकने के लिए ऐसा करने की जरूरत है। जब कीमतें बढ़ती हैं, तब सारे देश में उपभोक्ताओं के हित में हंगामा होता है। पर जब किसानों को वाजिब कीमत नहीं मिलती है और वह अपनी उपज सड़कों पर फेंकता है, तब कोई हंगामा नहीं होता। क्या कारण है कि सिर्फ उपभोक्ताओं के लिए ही सरकार सक्रिय होती है, किसानों के लिए नहीं? किसान जब अपनी फसल को औने-पौने दाम में बेचने के बजाय उसे सड़कों पर फेंकता है, तो उसे कितनी पीड़ा होती होगी और उसकी आजीविका पर कितना असर पड़ता होगा, इसे समझने की जरूरत है। सरकार किसानों के लिए एक योजना लेकर आई थी 'टॉप' (टमाटर, ओनियन, पोटेटो), उसे और सुदृढ़ करने की जरूरत है और सब्जियों का एक आधार मूल्य तय करना चाहिए, अगर कीमत उससे कम होती है, तो सरकार को हस्तक्षेप करके उसकी भरपाई किसानों को करनी चाहिए। 


केरल ने सभी सब्जियों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित कर दिया है। इससे सबक लेकर सब्जियों के लिए एक आधार मूल्य पूरे देश में तय होना चाहिए। यही किसानों की असली आजादी है। पंजाब के किसान भी इसी के लिए संघर्ष कर रहे हैं। 


सौजन्य - अमर उजाला।

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