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श्रम-रोजगार : कोरोनाकाल में अगस्त तक 2.1 करोड़ वेतनभोगी हुए बेरोजगार

महेश व्यास  



भारत में लॉकडाउन के दौरान वेतनभोगी कर्मचारियों के रोजगार पर मार पडऩे का सिलसिला जारी है। इन पांच महीनों में रोजगार गंवाने वालों में सबसे बड़ी संख्या वेतनभोगी कर्मचारियों की है। दूसरे तरह के रोजगार कमोबेश शुरुआती झटकों से उबरने में सफल रहे हैं और कुछ श्रेणियों के रोजगार में तो बढ़ोतरी भी हुई है लेकिन रोजगार गंवाने वाले वेतनभोगी कर्मचारियों की संख्या बढ़ती ही जा रही है। आर्थिक वृद्धि के साथ या उद्यमिता में वृद्धि की स्थिति में भी वेतनभोगी रोजगार हमेशा नहीं बढ़ता है। लेकिन मौजूदा आर्थिक विपदा में सबसे ज्यादा मार इस पर ही पड़ रही है।

एक रोजगार को सामान्यत: वेतनभोगी तब माना जाता है जब किसी व्यक्ति को एक संगठन नियमित आधार पर काम पर नियुक्त करता है और नियमित अवधि पर उसे वेतन देता है। भारत में यह अंतराल एक महीने का होता है। यह नियोक्ता सरकार हो सकती है या किसी भी आकार का निजी क्षेत्र का उद्यम या फिर गैर-सरकारी संगठन। वैसे भारत के लोग सबसे ज्यादा सरकारी नौकरियों को पसंद करते हैं। ये सभी मोटे तौर पर औपचारिक क्षेत्र की वेतनभोगी नौकरियां हैं। हालांकि वेतनभोगी रोजगार का दायरा इसके आगे भी है। घरों में काम करने वालों को भी मासिक वेतन दिया जाता है। लिहाजा घरेलू नौकर, रसोइया, ड्राइवर, माली और चौकीदार भी वेतनभोगी कर्मचारी की श्रेणी में आएंगे, बशर्ते उन्हें तय समय पर तय वेतन दिया जाता हो। लेकिन इस तरह के रोजगार अमूमन अनौपचारिक क्षेत्र में आते हैं। सभी तरह के वेतनभोगी रोजगार की संख्या भारत के कुल रोजगार का 21-22 फीसदी है। वेतन पाने वालों से अधिक संख्या किसानों की है और उनसे भी कहीं अधिक दिहाड़ी मजदूर हैं। अगर किसानों एवं दिहाड़ी मजदूरों को एक साथ जोड़ दें तो वे भारत की कुल कामकाजी जनसंख्या का करीब दो-तिहाई हो जाते हैं।


कामकाजी आबादी की यह संरचना सबसे तेजी से बढ़ रही प्रमुख अर्थव्यवस्था कहे जाने वाले देश के लिए बहुत मुनासिब नहीं है। भारत की तीव्र वृद्धि के बावजूद वेतनभोगी रोजगार का अनुपात धीमी गति से बढ़ रहा है। वर्ष 2016-17 में 21.2 फीसदी पर रहा अनुपात 2017-18 में 21.6 फीसदी हो गया और उसके अगले साल यह 21.9 फीसदी दर्ज किया गया। इस अवधि में वास्तविक सकल मूल्य संवद्र्धन (जीवीए) सालाना 6-8 फीसदी की दर से बढ़ा। फिर 2019-20 में अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर 4 फीसदी पर आने के बीच वेतनभोगी कर्मियों का अनुपात गिरकर 21.3 फीसदी रह गया।


पिछले वर्षों में भारत की समुचित आर्थिक वृद्धि के बावजूद वेतनभोगी नौकरियों में आया यह ठहराव अकेली नाकामी नहीं है। यह भी अटपटा ही है कि उद्यमशीलता में तीव्र वृद्धि होने के बावजूद वेतनभोगी नौकरियां उस अनुपात में नहीं बढ़ी हैं। वर्ष 2016-17 में उद्यम में मिलने वाला रोजगार कुल रोजगार का 13 फीसदी था। वर्ष 2017-18 में यह अनुपात बढ़कर 15 फीसदी हो गया और अगले दो वर्षों में यह क्रमश: 17 फीसदी और 19 फीसदी रहा है।  उद्यमियों की संख्या में वृद्धि के अनुपात में वेतनभोगी रोजगार नहीं बढ़ा है। वर्ष 2016-17 में उद्यमियों की संख्या 5.4 करोड़ थी जो 2019-20 में बढ़कर 7.8 करोड़ हो गई। लेकिन इस दौरान वेतनभोगी कर्मचारियों की संख्या 8.6 करोड़ पर ही स्थिर बनी रही। उद्यमियों की संख्या बढऩे के बावजूद वेतनभोगी नौकरियों की संख्या में वृद्धि न होना सहज ज्ञान के उलट है। ऐसा होने की एक वजह यह है कि इनमें से अधिकतर उद्यमी स्वरोजगार में लगे हैं और वे किसी दूसरे को काम पर नहीं रख रहे हैं। इसका सीधा मतलब यह है कि वे बहुत छोटे स्तर के उद्यमी हैं।


सरकार ने तो यह संकल्पना रखी है कि लोगों को रोजगार मांगने के बजाय रोजगार देने वाला बनना चाहिए। यह मकसद पूरी तरह हासिल होता हुआ नहीं नजर आ रहा है। उद्यमिता रोजगार सृजन का तरीका होने के बजाय अक्सर बेरोजगारी के चंगुल से बचने की एक सायास कोशिश होती है। भारत 2016-17 के बाद से जिस तरह की उद्यमशीलता का उभार देख रहा है, वह वेतनभोगी रोजगार पैदा करने वाली नहीं दिख रही है।


महामारी पर काबू पाने के लिए देश भर में लगाए गए लॉकडाउन के दौरान बेरोजगार हुए लोगों के लिए कृषि अंतिम शरणस्थली रही है। अगस्त 2020 तक कृषि क्षेत्र में रोजगार 1.4 करोड़ बढ़ गया। वर्ष 2019-20 में कृषि क्षेत्र में 11.1 करोड़ लोग लगे हुए थे। लॉकडाउन में उद्यमी के तौर पर रोजगार भी शुरू में घटा था लेकिन अगस्त आने तक यह संख्या करीब 70 लाख बढ़ गई। इसके पहले 7.8 करोड़ लोग उद्यमशील गतिविधियों में संलिप्त थे।


लॉकडाउन का ज्यादा नुकसान तो वेतनभोगी कर्मियों एवं दिहाड़ी मजदूरों को उठाना पड़ा। दिहाड़ी मजदूरी सबसे ज्यादा अप्रैल में प्रभावित हुई थी। उस महीने बेरोजगार हुए 12.1 करोड़ लोगों में से 9.1 करोड़ दिहाड़ी मजदूर ही थे। लेकिन अगस्त तक दिहाड़ी मजदूरों की हालत काफी हद तक सुधर गई। वर्ष 2019-20 के 12.8 करोड़ दिहाड़ी रोजगार के बरक्स अब केवल 1.1 करोड़ दिहाड़ी रोजगार का ही नुकसान रह गया है। वहीं अगस्त आने तक सर्वाधिक असर वेतनभोगी रोजगार पर पड़ा है। अप्रैल में बेरोजगार हुए कुल 12.1 करोड़ लोगों में से वेतनभोगी तबका सबसे कम था। लेकिन अगस्त में वेतनभोगी नौकरियों में आई गिरावट कृषि एवं उद्यमी रोजगार में सुधरी स्थिति पर भारी पड़ी है।


अगस्त के अंत तक करीब 2.1 करोड़ वेतनभोगी कर्मचारी नौकरी गंवा चुके हैं। वर्ष 2019-20 में वेतनभोगी रोजगार की संख्या 8.6 करोड़ थी लेकिन अगस्त 2020 में यह संख्या 6.5 करोड़ ही रह गई है। नौकरियों में आई 2.1 करोड़ की गिरावट सभी तरह के रोजगारों में आई सबसे बड़ी गिरावट है। जुलाई में करीब 48 लाख वेतनभोगी बेरोजगार हुए थे और अगस्त में 33 लाख अन्य लोगों की नौकरियां चली गईं।  ऐसा नहीं है कि नौकरियां गंवाने वालों में केवल सहयोगी स्टाफ के लोग ही शामिल हैं। चोट काफी गहरी है और इसकी चपेट में औद्योगिक कामगारों के साथ-साथ दफ्तरों में बैठने वाले भी शामिल हैं।

(लेखक सीएमआईई के प्रबंध निदेशक एवं मुख्य कार्याधिकारी हैं)

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।


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जापान में नेतृत्व परिवर्तन और भारत-जापान रिश्ते (बिजनेस स्टैंडर्ड)

श्याम सरन



शिंजो आबे ने बतौर जापानी प्रधानमंत्री आठ वर्ष का असाधारण कार्यकाल पूरा करने के बाद अपने पद से इस्तीफा दे दिया। इस दौरान वह सबसे लंबे समय तक पद पर रहने वाले जापानी प्रधानमंत्री बने। जापान में उन्हें ऐसे प्रधानमंत्री के रूप में याद किया जाएगा जिसने विस्तारवादी मौद्रिक नीति, लचीली राजस्व नीति और उत्पादकता बढ़ाने एवं वृद्धि बहाल करने वाले ढांचागत सुधारों के साथ अधिक अग्रसोची आर्थिक नीति तैयार की।

शायद वह ये सब नहीं हासिल कर पाते लेकिन जापान के लंबे समय तक चले आर्थिक ठहराव ने इसका अवसर प्रदान किया। कोविड-19 महामारी ने जापान की अर्थव्यवस्था को तगड़ा झटका दिया और अब इसमें सुधार के लिए शायद उसकी आवश्यकता पड़ेगी जिसे 'आबेनॉमिक्स' का नाम दिया गया। ऐसे में आशा की जानी चाहिए कि आबे की आर्थिक विरासत बरकरार रहेगी।


आबे के कार्यकाल में जापान एशिया और उसके बाहर कम लचीली शक्ति के रूप में उभरा। उन्होंने ऐसे क्षेत्र में अपने देश की हैसियत मजबूत की जहां चीन की ताकत तेजी से बढ़ रही थी।


उन्हें एक तनी हुई रस्सी पर चलना था जहां एक तरफ चीन था जिसके साथ जापान की अर्थव्यवस्था बहुत गहराई से जुड़ी हुई थी और दूसरी ओर अमेरिका था जिसके चीन के साथ तीव्र मतभेद थे लेकिन वह जापान समेत अपने ही सहयोगियों के साथ एक हद तक अप्रत्याशित और अस्थिर व्यवहार करने वाला था। आबे इन नाजुक हालात को संभालने में कामयाब रहे। परंतु कोविड-19 के बाद की बंटी हुई दुनिया में हालात और कठिन हो जाएंगे, ध्रुवीकरण बढ़ेगा और छोटी और बड़ी तमाम अर्थव्यवस्थाएं संरक्षणवाद की शरण में जाएंगी। आबे ने इस बदले आर्थिक माहौल से निपटने के क्रम में जापान को अपेक्षाकृत बेहतर परिस्थिति में छोड़ा है। उनके ही नेतृत्व में प्रशांत पार साझेदारी जैसा बड़ा क्षेत्रीय मुक्त व्यापार समझौता बच सका जबकि अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने समझौते से दूरी बना ली थी। जापान क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी (आरसेप) में भी शामिल है जिसमें 10 आसियान देश, जापान, दक्षिण कोरिया, चीन, ऑस्टे्रलिया और न्यूजीलैंड शामिल हैं। भारत ने बातचीत के अंतिम चरण में आरसेप वार्ता से दूरी बनाकर जापान तथा अन्य आरसेप साझेदारों को निराश किया। भारत की चिंता यह थी कि चीन भारतीय बाजारों को सस्ती चीजों से पाट देगा। ऐसे में जापान एशिया की उभरती अर्थव्यवस्था और व्यापार ढांचे को आकार देने में अहम भूमिका निभाएगा।


 इसका अर्थ यह हुआ कि टोक्यो में बनने वाली नई सरकार अमेरिका के उस रुख का साथ शायद ही दे जो चीन की अर्थव्यवस्था को अलग थलग करने का हामी है। हालांकि वह अपने बाह्य आर्थिक हितों को चीन पर अत्यधिक निर्भरता से परे और अधिक विविधतापूर्ण बनाएगा। भारत के नीति निर्माताओं को इसकी सराहना करनी चाहिए क्योंकि यहां ऐसी अतिरंजित धारणा है कि जापान की पूंजी चीन से बाहर निकलना चाहती है और भारत उनके लिए एक वैकल्पिक केंद्र है। आबे क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव को लेकर अत्यधिक सतर्क थे और उन्होंने जापानी उद्योग और व्यापार जगत को इस बात के लिए प्रोत्साहित किया कि वे भारत को विकल्प के तौर पर देखें। भारत ने उन्हें निराश किया और बीते कुछ वर्षों में चीन में जापान की रुचि बढ़ी। आबे के उत्तराधिकारी शायद इस क्षेत्र में कूटनयिक और सुरक्षा भूमिका में विस्तार और सक्रियता को लेकर उतनी रुचि न रखें।


भारत के साथ साझेदारी को लेकर रुचि भी कम हो सकती है। जब भारत ने चीन की बेल्ट और रोड पहल (बीआरआई) में शामिल होने से इनकार किया था तब जापान ने भी दूरी बरती थी। बहरहाल, फिलहाल जापान बीआरआई परियोजनाओं में चीन के साथ सहयोग और प्रतिस्पर्धा दोनों कर रहा है। सन 2016 में जोरशोर से घोषित भारत-जापान-अफ्रीका कॉरिडोर परियोजना अब कहीं नजर नहीं आ रही। भारत-जापान सामरिक साझेदारी का आर्थिक स्तंभ कमजोर है और आबे के बाद यह और कमजोर हो सकता है।


आबे के कार्यकाल में सबसे अधिक सुधार भारत-जापान सुरक्षा रिश्तों में हुआ। अगस्त 2007 में बतौर प्रधानमंत्री उनके पहले और छोटे कार्यकाल की भारत यात्रा के दौरान आबे ने दो सागरों के मेल की बात कही थी जो बाद में मुक्त और खुले हिंद-प्रशांत क्षेत्र की अवधारणा बनी। उन्होंने हिंद प्रशांत क्षेत्र में लोकतांत्रिक देशों के नए शक्ति संतुलन की संभावना पहचान ली थी। उनकी पहल पर ही भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया ने मनीला में 2007 में बैठक की लेकिन अमेरिका ने बाद में ईरान और उत्तर कोरिया के परमाणु मसले पर चीन और रूस का समर्थन गंवाने के डर से ऐसा नहीं होने दिया। सन 2017 में आबे ने भारत को सहमत कर इसमें नई जान फूंकी क्योंकि वह सुरक्षा साझेदार के रूप में भारत की भूमिका को लेकर आश्वस्त थे। अब दोनों देशों के विदेश और रक्षा मंत्री साल में दो-दो बार मिलते हैं और आपसी सहयोग बढ़ा है। दोनों देशों के बीच अगली बैठक में रक्षा सुविधाओं को लेकर द्विपक्षीय अधिग्रहण और क्रॉस सर्विसिंग समझौता होने की आशा है। यह कहना होगा कि आबे के कार्यकाल में दोनों देशों के सुरक्षा रिश्ते तेजी से विकसित हुए। देखना होगा कि टोक्यो का नया सत्ता प्रतिष्ठान उसी ऊर्जा और उत्साह से काम करता है या नहीं। सन 2017 के भारत-जापान नाभिकीय समझौते में आबे की व्यक्तिगत भूमिका को भी कम नहीं आंकना चाहिए। भारत-अमेरिका नाभिकीय समझौते के बाद यही सबसे मजबूत समझौता है। परंतु कम ही लोगों को मालूम होगा कि आबे ने भारत को परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह में रियायत दिलाई थी। सन 2007 में मैं विशेष दूत के रूप में टोक्यो गया था और तत्कालीन जापानी विदेश मंत्री तारो असो से मुलाकात की थी। औपचारिक बैठक में उन्होंने अधिकारियों द्वारा दिया गया अपेक्षाकृत कड़ा और हतोत्साहित करने वाला वक्तव्य पढ़ा। बहरहाल उन्होंने लिफ्ट में मुझसे कहा कि मैं भारतीय प्रधानमंत्री को जापानी प्रधानमंत्री आबे का यह संदेश दे दूं कि एनएसजी में जापान भारत का समर्थन करेगा। इसने हमारी बहुत मदद की।


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और आबे के बीच भी काफी करीबी रिश्ता रहा जिससे दोनों देशों की सामरिक साझेदारी को गति मिली। यह स्पष्ट नहीं है कि आबे का उत्तराधिकारी कौन होगा लेकिन भारत के लिए यह आवश्यक है कि वह नए नेता के साथ जल्द से जल्द तालमेल कायम करे। भारत और जापान का रिश्ता भारत के आर्थिक और सुरक्षा हितों की दृष्टि से अहम है।


(लेखक पूर्व विदेश सचिव और सीपीआर के सीनियर फेलो हैं)

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।


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पर्यावरण संरक्षण (बिजनेस स्टैंडर्ड)



औद्योगिक एवं बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के पर्यावरण प्रभाव आकलन (ईआईए) को लेकर सरकार की मसौदा अधिसूचना की जिस कदर आलोचना हुई है, वह इस बात का स्पष्ट संकेत है कि इसमें सबकुछ ठीक नहीं है। मसौदे को सार्वजनिक टिप्पणियों के लिए प्रस्तुत करने वाले पर्यावरण मंत्रालय को करीब 20 लाख आपत्तियां मिली हैं और अभी इनका सिलसिला जारी है। अंशधारकों का कहना है कि उन्हें अधिसूचना की बारीकियों का अध्ययन करने के लिए और अधिक समय चाहिए। ध्यान देने वाली बात यह है कि पर्यावरण कार्यकर्ता ही इस पर हमलावर नहीं हैं बल्कि कई छात्र, वैज्ञानिक, राजनेता, राज्य सरकारें और यहां तक कि स्थायित्व वाले पर्यावरण को लेकर संयुक्त राष्ट्र के प्रतिवेदक ने भी इस अधिसूचना में खामियां पाई हैं।

एक सामान्य आपत्ति यह है कि विकास परियोजनाओं को मंजूरी देने वाले मानकों में प्रस्तावित बदलाव, पर्यावरण संरक्षण और मानव सुरक्षा के बजाय कारोबारी सुगमता को अधिक महत्त्व देता प्रतीत होते हैं। अनिवार्य सार्वजनिक मशविरे (ग्राम सभाओं की सहमति) की मौजूदा व्यवस्था को परियोजनाओं के एक बड़े हिस्से के लिए समाप्त किया जा रहा है। इतना ही नहीं कुछ प्रकार की गतिविधियों को या तो ईआईए की जवाबदेही से मुक्त करने का प्रस्ताव है या प्रथम दृष्टया भारी दुर्घटना की आशंका होने के बावजूद उनके लिए मामूली निगरानी की व्यवस्था प्रस्तावित है। रेड और ऑरेंज श्रेणी में वर्गीकृत 25 से अधिक उद्योगों को ए श्रेणी (इसके लिए विशेषज्ञों का कड़ा आकलन आवश्यक है) से हटाकर बी1 और बी2 श्रेणी में डाला जा सकता है। इन दोनों श्रेणियों में पर्यावरण प्रभाव आकलन के लिए सार्वजनिक मशविरे की बाध्यता समाप्त कर दी गई है। इसमें कई नुकसानदेह रसायन प्रसंस्करण और तेजाब बनाने वाले संयंत्र शामिल हैं। यह साफ तौर पर आंध्र प्रदेश में हाल में घटी एलजी पॉलिमर गैस रिसाव जैसी त्रासदियों को आमंत्रण है। उस घटना में 12 लोगों की जान गई थी और अनेक घायल हो गए थे। असम के बागजान में गैस से लगी आग भी ऐसी ही घटना थी जो दो सप्ताह तक भड़की रही और लोगों को बड़े पैमाने पर सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाना पड़ा।


परियोजना तैयार होने के बाद मंजूरी देने संबंधी प्रावधानों पर भी विवाद है। यह प्रावधान ऐसी कई विवादित परियोजनाओं की राह खोल देगा जो बिना जरूरी मंजूरी के बन गई हैं। इसके अलावा इससे जानबूझकर देनदारी में चूक करने वालों को भी प्रोत्साहन मिलेगा। केंद्र द्वारा बिना मानक वर्गीकरण के सामरिक घोषित की गई परियोजनाओं के लिए सार्वजनिक मशविरा या सूचना प्रसारित करने की जरूरत को खत्म करने का प्रस्ताव भी ऐसा ही है। इससे परियोजनाओं के वर्गीकरण में मनमानेपन की गुंजाइश बनेगी। आश्चर्य नहीं कि करीब 500 वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं और विभिन्न आईआईटी के शिक्षकों एवं विद्वानों ने पर्यावरण मंत्री को खुला पत्र लिखकर इस मसौदे पर चेतावनी दी है। उन्होंने अधिसूचना वापस लेने की मांग की है और कहा है कि यह देश के पर्यावास और पर्यावरण की सुरक्षा की दृष्टि से उचित नहीं है।


ऐसे विरोध को देखते हुए बेहतर यही होगा कि पर्यावरण मंत्रालय खुले दिमाग से अधिसूचना की समीक्षा करे। इस दौरान आपत्तियों और अहम सुझावों पर भी ध्यान देना चाहिए। इसमें दो राय नहीं कि परियोजनाओं को मंजूरी की प्रक्रिया तेज करना जरूरी है लेकिन पर्यावरण संरक्षण और लोगों की सुरक्षा भी उतनी ही अहम है। विश्व पर्यावरण प्रदर्शन सूचकांक (2018) में भारत 180 देशों में 177 वें स्थान पर था। इससे अधिक गिरावट ठीक नहीं। ऐसे में वक्त आ गया है कि पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक विकास के विरोधाभासी मुद्दों के बीच संतुलन साधा जाए। इस दौरान दोनों को तवज्जो देनी होगी। यह काम कठिन है लेकिन और कोई विकल्प भी नहीं है।

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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Boosting Indian R&D and patent filing (The Economic Times)



The figures reveal that nearly eight out of 10 of all patent applications filed in India over the last 13 years were made by researchers abroad. We clearly need to policy-induce innovation here, and Indian corporates must step up patenting and translational research. True, the share of Indian patenting activity has risen steadily and, as per the latest data, is now 30% of the filings. Yet, our innovation ecosystem needs much revamping. Of course, we must raise total R&D expenditure. But it is also important to rid industry of easy pickings by way of steep import protection, inflated project costs and lax regulation, to force it to make money from doing good, globally competitive business. That would compel industry to value R&D.

Research must improve at our 870-odd universities, so that pure research becomes very much a part and parcel of applied research. And the latter then can be gainfully incorporated into translational and industrial research for new products and services. India is now a global platform for research and development (R&D). Multinational corporations (MNCs) have set up over 1,165 R&D centres here. A recent Capgemini study finds that Bengaluru has displaced Tokyo as the most preferred R&D destination for MNCs, even as the local research activity is rapidly moving away from mere cost advantage to value arbitrage when it comes to cutting-edge technologies across myriad domains.


Policy must foster openness and reduce tariff barriers in a time-bound manner. The recent rationalisation of tax treatment of R&D expenditure in the budget is a move in the right direction; but India ranks poorly in the global rankings when it comes to ease of starting a business, resolving insolvency, paying taxes, pupil-teacher ratio at the secondary level, environmental performance or even access to information and communication technology. The relevant parameters for nations that rank high on R&D have been far better, for years. Hence the need for forward-looking economic and technology policies to channel funds into patenting activity and R&D. A miracle could follow.


Courtesy - The Economic Times.

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नई चीन नीति गढ़ने का मौका (हिन्दुस्तान)

विवेक काटजू, पूर्व राजदूत



विदेश सचिव हर्ष शृंगला ने 4 सितंबर को कहा, ‘भारत-चीन सीमा पर एक अभूतपूर्व स्थिति बन गई है। 1962 के बाद कभी भी इस तरह से हालात नहीं बिगडे़ थे।’ उन्होंने मौजूदा ‘तनातनी से पहले की स्थिति बहाल’ करने की मांग भी की। हालांकि, न तो उन्होंने और न ही सरकार के किस नुमाइंदे ने, न दोनों देशों की सेनाओं की साझा-वार्ता संबंधी बयानों और न ही कूटनीतिक बातचीत में यह बताया गया कि ‘हालात’ आखिर खराब क्यों हुए या स्थिति कैसे इतनी बिगड़ गई?

इस संदर्भ में मीडिया में जो भी खबरें आई हैं, वे या तो ‘ऑफ द रिकॉर्ड’ बातचीत यानी सूत्रों के हवाले से तैयार की गईं या फिर लीक सूचनाओं के आधार पर। आधिकारिक बयानों में साफगोई नहीं दिखी। जैसे, चीन के अपने समकक्ष के साथ भारतीय रक्षा मंत्री की मॉस्को-वार्ता के बाद रक्षा मंत्रालय ने जो बयान जारी किया, उसमें बीजिंग पर यह आरोप लगाया गया कि यथास्थिति में एकतरफा बदलाव की उसकी कोशिशों से मुश्किलें बढ़ गई हैं। लेकिन क्या उसका प्रयास सफल हुआ? अगर नहीं, तो फिर विदेश सचिव ने यथास्थिति बहाल करने की जो मांग की है, उसके क्या निहितार्थ हैं?

बेशक सीमा-विस्तार की चीन की गतिविधियों पर हमने कोई आधिकारिक बयान नहीं दिया है, लेकिन जो स्पष्ट है, वह यह कि बीजिंग ने अपनी हरकतों से ‘आपसी विश्वास में सेंध’ लगाई है। पूर्व विदेश मंत्री जसवंत सिंह ने इन शब्दों का इस्तेमाल पाकिस्तान के खिलाफ किया था, जब उसने कारगिल युद्ध में नियंत्रण रेखा का उल्लंघन किया था। जाहिर है, चीनी अतिक्रमण बहुत बड़ा और गंभीर है। 

अब यही माना जाना चाहिए कि भारत की मौजूदा चीन-नीति काम की नहीं रही, क्योंकि इसकी बुनियाद आपसी विश्वास ही थी। यह नीति सन 1988 में राजीव गांधी ने बनाई थी और बाद की सभी सरकारें इसी पर आगे बढ़ती रहीं। इसमें शांत व स्थिर वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी), सीमा विवाद का स्थाई समाधान और कारोबार सहित हर क्षेत्र में भारत-चीन संबंधों की स्वाभाविक प्रगति की वकालत की गई है।

सवाल है कि नई नीति क्या होनी चाहिए? इसके लिए जरूरी है कि भारत और चीन में आज जो ताकत का असंतुलन है, उसे स्वीकार किया जाए। अभी चीन के साथ हमारी तुलना ठीक उसी तरह से हो सकती है, जिस तरह से पाकिस्तान की हमारे साथ। मगर इसमें एक बड़ा अंतर यह है कि पाकिस्तान जितना भी साधन जुटा ले, वह भारत से कमजोर ही रहेगा, जबकि भारत और चीन के बारे में ऐसा नहीं कहा जा सकता। बेशक भारत को आगे बढ़ने के लिए काफी कुछ करना होगा, लेकिन पिछले चार दशकों में दोनों देशों के बीच में बन आई खाई को पाटने की पर्याप्त क्षमता हमारे पास है। हां, इसके लिए राष्ट्रीय सहमति बनाना आवश्यक है, लेकिन यह किया जा सकता है और किया जाना चाहिए भी।

जब तक पाकिस्तान-भारत-चीन का मौजूदा शक्ति असंतुलन बना रहेगा, तब तक पाकिस्तान की भारत-नीति पर गौर करना कारगर हो सकता है। इस नीति के मूल में नियमित टकराव है और यह आर्थिक व वाणिज्यिक सहित किसी भी तरह के सहभागी रिश्ते को विकसित होने से रोकती है। उल्लेखनीय है कि साल 1996 में चीन के तत्कालीन राष्ट्रपति जियांग जेमिन ने पाकिस्तान को सलाह यह दी थी कि वह चीन-भारत रिश्तों का मॉडल अपनाए, जिसमें आपसी मतभेदों को दूर करते हुए अन्य क्षेत्रों में सामान्य संबंध बनाने और उसे विस्तार देने की बात कही गई है।

मगर जियांग जेमिन के विचारों को नजरंदाज किया गया, क्योंकि पाकिस्तानी सेना का स्वाभाविक तौर पर यही मानना है कि यदि कारोबारी और आर्थिक रिश्ते मजबूत बनाए गए, तो युद्ध या जंग की हालत में भारत को फायदा मिल सकता है। इसके अलावा, इस तरह के संबंध बनने से भारत जम्मू-कश्मीर पर बातचीत करने से भी बचेगा। लिहाजा, इस्लामाबाद ने अपने तीन पारंपरिक नजरिए के साथ ही आगे बढ़ने का फैसला किया- परमाणु हथियारों और उनसे जुड़ी आपूर्ति-व्यवस्था का विकास, नियंत्रण रेखा पर सैन्य संतुलन और आतंकवाद का इस्तेमाल। बीते तीन दशकों में पाकिस्तान जितना दिवालिया हुआ है, उसमें एक बड़ा योगदान उसकी इस भारत-नीति का भी है।

जाहिर है, चीन-नीति में हमें उन गलतियों से सबक लेना होगा, जो पाकिस्तान ने अपनी भारत-नीति में की हैं। संभव हो, तब भी एक बडे़ पड़ोसी देश के खिलाफ आतंकवाद या तनातनी की नीति पर आगे बढ़ना अपने पांव पर कुल्हाड़ी मारने जैसा ही होगा। मगर भारत को अपनी परमाणु क्षमता इस रूप में जरूर मजबूत करनी चाहिए कि वह थल, नभ और जल, तीनों स्थितियों में मारक हो। चीन के दखल को रोकने के लिए वास्तविक नियंत्रण रेखा की सुरक्षा हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता हो। बेशक, इसके लिए पूंजीगत निवेश की जरूरत होगी, लेकिन मौजूदा आर्थिक परेशानियों के बावजूद इसको टाला नहीं जा सकता है।

चीन-नीति के अन्य पहलुओं पर भी गहन विचार की दरकार है, जो आर्थिक और वाणिज्यिक संबंधों से जुडे़ हुए हैं। असल में, आज चीन से शुरू होने वाली कुछ आपूर्ति शृंखलाओं पर भारत की निर्भरता रणनीतिक रूप से काफी शोचनीय है। फार्मास्यूटिकल्स जैसे कई उद्योगों पर यह बात लागू होती है। हमें इनका आयात कम से कम करना होगा और जैसा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ‘आत्मनिर्भर भारत’ योजना की संकल्पना है, इनका जल्द से जल्द घरेलू उत्पादन करना होगा। 

इसके अलावा, चीन की आक्रामक नीतियों से खार खाए छोटे-बड़े देशों के साथ भी भारत को अपने रिश्ते और अधिक सींचने होंगे। नई दिल्ली को अपनी पारंपरिक सोच से ऊपर उठना होगा और यह समझना होगा कि वह इतना बड़ा मुल्क है कि किसी भी ताकतवर देश से कंधे से कंधा मिला सकता है। और अंत में, चीन-पाकिस्तान की दुरभि-संधि तोड़ने के लिए पाकिस्तान की कमजोर नसों को दबाना भी अनिवार्य है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)



सौजन्य - हिन्दुस्तान।

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चौथी क्रांति के जरूरी हथियार

प्रांजल शर्मा, डिजिटल नीति विशेषज्ञ



वक्त आ गया है, भारत आत्मनिर्भरता के लिए अपनी तकनीकी बुनियाद तैयार करे। भारत को तकनीकी संप्रभुता की ओर तेजी से बढ़ना होगा। इस बात का क्या मतलब है? आज हम एक ऐसी दुनिया में हैं, जहां 3डी प्रिंटिंग, ऑटोमेशन, इंटरनेट ऑफ थिंग्स और ड्रोन जैसे कनेक्टेड डिवाइस सभी तरह की गतिविधियों के लिए मौलिक हो गए हैं। ये सब चौथी औद्योगिक क्रांति के आधार तत्व हैं। जो देश इन तकनीकों का उपयोग अपने खुद के प्लेटफॉर्म बनाने के लिए नहीं करेगा, उसे समाधान की तलाश में बाहरी शक्तियों पर निर्भर रहना पडे़गा। प्रौद्योगिकीय आत्मनिर्भरता हमारी आर्थिक सुरक्षा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

भारत को अपनी तकनीकी क्षमताओं के निर्माण के लिए अपने निवेश और कोशिशों को तेज कर देना चाहिए। हमें गौर करना चाहिए कि चीन ने अमेरिका के तकनीकी मुकाबले के लिए क्या-कया कदम उठाए थे? वह 2030 तक अमेरिका की तकनीकी बराबरी कर लेने के लक्ष्य के साथ बढ़ रहा है। अनेक मामलों में चीन की आलोचना हो सकती है, लेकिन हमें सीखना चाहिए कि दूरगामी रणनीति बनाकर तकनीकी संप्रभुता को कैसे हासिल किया जा सकता है। दवा क्षेत्र पर हमें सबसे ज्यादा ध्यान केंद्रित करना होगा। ज्यादातर दवाओं के लिए 60 से 80 प्रतिशत सामग्री चीन से आयात की जाती है। ऐसा पिछले 15 वर्ष में हुआ है, जब हमने आयात को मंजूरी देते हुए अपने देश में निर्माण को खत्म या कम होने दिया। 

आज तकनीकी संप्रभुता का मोल बहुत अधिक है, हमारा उद्देश्य भारत को डिजिटल बुनियादी ढांचे के मामले में आत्मनिर्भर बनाना होना चाहिए। हमारे व्यवसायों और सरकारी कामकाज में लगे अधिकांश हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर पर हमारा अपना नियंत्रण होना चाहिए। आइए, हम कुछ ऐसे क्षेत्रों को लेते हैं, जहां संप्रभु नियंत्रण की जरूरत है। संप्रभु नियंत्रण का मतलब यह नहीं कि सरकार ही डिजिटल बुनियादी ढांचे की मालिक हो जाए। इसका मतलब है, सरकार को व्यापक जनहित के लिए इस क्षेत्र या काम को विनियमित करने में सक्षम होना चाहिए।

हमें सबसे पहले डाटा और साइबर सुरक्षा चाहिए। भारत दुनिया में सबसे बडे़ खुले बाजार वाला लोकतंत्र है। एक अरब से अधिक नागरिकों से जुड़े डाटा को घरेलू संस्थानों द्वारा ही नियंत्रित और विनियमित किया जाना चाहिए। पिछले कुछ वर्षों में डाटा के स्थानीयकरण और गोपनीयता पर जीवंत बहस चली है और एक अच्छे लोकतंत्र में यह बहस होनी चाहिए। भारत को डाटा के उपयोग को लेकर स्पष्ट कानून बनाने होंगे। डाटा संरक्षण कानून पर अभी भी संसद में चर्चा चल रही है और उम्मीद है, इसी साल एक सशक्त और व्यावहारिक कानून बन जाएगा। इसी से जुड़ा है साइबर सुरक्षा का मामला। आज नकद सब्सिडी देने से लेकर करोड़ों के कारोबार तक ऑनलाइन हो गए हैं। व्यवसाय के हर आयाम को साइबर सुरक्षा की जरूरत है। आज की दुनिया में साइबर हमला सीमा पर हमले की तुलना में अधिक हानिकारक हो सकता है। फिलहाल भारत को साइबर सुरक्षा प्रबंधन के लिए भारतीय या मित्र देशों द्वारा विकसित सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल करना होगा। हमें समान विचारधारा वाली कंपनियों के साथ ठीक उसी तरह काम करना चाहिए, जैसे हमने आतंकवाद विरोधी गठबंधन बनाया है। सरकार साइबर सुरक्षा नवाचार के लिए राष्ट्रीय उत्कृष्टता केंद्र बना रही है। आगामी वर्षों में करोड़ों लोग डिजिटल मुख्यधारा में शामिल होंगे, उन्हें डिजिटल माहौल के हिसाब से प्रशिक्षित करने का काम हो सकेगा। 

दूसरी जरूरत है सुरक्षित सामाजिकता और संवाद विकसित करना। इंटरनेट ऐंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया (आईएएमएआई) की ताजा रिपोर्ट में भारत में डिजिटल बाजार पर प्रकाश डाला गया है। देश में 50 करोड़ से अधिक सक्रिय इंटरनेट यूजर्स हैं, जिनमें से 50 प्रतिशत से अधिक गांवों में हैं। लगभग 14 प्रतिशत यूजर्स 5 से 11 वर्ष की आयु वर्ग में हैं। इसका मतलब है, 7.10 करोड़ नाबालिग मोबाइल या होम वाई-फाई का उपयोग कर रहे हैं। ये सभी भी यूजर्स असुरक्षित श्रेणी में है। चीनी ऐप पर प्रतिबंध लगाने से इन लाखों यूजर्स की सुरक्षा हुई है। रोपोसो और चिनगारी जैसे भारतीय सोशल वीडियो एप का तेजी से उदय हुआ है। 

तीसरी जरूरत है डिजिटल ढांचा और विनिर्माण पर ध्यान देना। मोबाइल फोन संचार के हार्डवेयर से लेकर रक्षा विनिर्माण तक, पेमेंट गेटवे से ऊर्जा उत्पादन उपकरण तक, सभी क्षेत्रों में भारत को आत्मनिर्भरता का विकास करना चाहिए। नेशनल पेमेंट कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया ने मास्टरकार्ड और वीजा जैसे वैश्विक दिग्गजों के एकाधिकार का मुकाबला करने के लिए भारत इंटरफेस फॉर मनी (भीम) एप और रूपे कार्ड से भुगतान की शुरुआत की है। यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस (यूपीआई) का निर्माण, जिस पर भीम और रूपे काम करते हैं, भारत की आत्मनिर्भरता की ओर उठाया गया शानदार कदम है। यूपीआई के तहत जून 2020 में 35 अरब डॉलर से भी अधिक के 1.34 अरब लेन-देन हुए हैं। 

भारत को अपनी नीतियों में सुधार करने के साथ ही उपयोगी शिक्षा में निवेश बढ़ाना चाहिए। अच्छी खबर है कि सरकार सभी मोर्चों पर उत्सुकता से आगे बढ़ रही है। ‘इंटरनेट ऑफ थिंग्स’ और ‘मशीन लर्निंग’ जैसे पद अब सरकार की चिंता का हिस्सा हैं। पिछले बजट में यह वादा किया गया था कि पांच साल में 80 अरब रुपये खर्च करके डाटा सेंटर पार्क, नेशनल मिशन ऑन क्वांटम टेक्नोलॉजी और अप्लिकेशंस बनाए जाएंगे। सरकार ने ग्रामीण क्षेत्रों को भारत नेट फाइबर-टू-होम कनेक्टिविटी प्रदान करने के लिए 60 अरब रुपये का प्रावधान भी कर रखा है। उम्मीद है, त्रुटिपूर्ण डाटा संग्रह प्रणालियों को नई प्रक्रियाओं के साथ तेजी से ठीक किया जाएगा।

कोविड बाद की दुनिया में भारत आत्मनिर्भरता के लिए प्रतिबद्ध दिख रहा है। हालांकि यही पर्याप्त नहीं है। शी जिनपिंग ने चीन और उसके संस्थानों में 2025 तक एक ट्रिलियन डॉलर से अधिक के निवेश की घोषणा कर रखी है। इसके साथ ही, भारत को समान विचारधारा वाले देशों के साथ गठबंधन बनाना चाहिए। भारत और अन्य देशों को चीन के नेतृत्व वाले नियमों में फंसने से बचने के लिए प्रौद्योगिकी के अपने मानक गढ़ने होंगे। तकनीक हमारे भविष्य का नेतृत्व करे, यह हमारी आर्थिक सुरक्षा के लिए उतना ही महत्वपूर्ण है, जितना देश की सीमाओं की रक्षा। आज सीमाएं आभासी हो गई हैं, जहां कृत्रिम बुद्धिमत्ता की शक्ति तोपखाने की मारक क्षमता से भी अधिक मायने रखती है। चौथी औद्योगिक क्रांति की प्रौद्योगिकियां खुली और समतावादी हैं। भारत को एक वैश्विक नेता के रूप में चमकने के लिए अपनी तकनीकी क्षमताओं का विकास करना ही होगा।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

सौजन्य - हिन्दुस्तान।

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'केशवानंद भारती बनाम स्टेट ऑफ केरल', धर्म और कानून का अद्भुत संगम

विराग गुप्ता



संविधान के संरक्षक के तौर पर सर्वोच्च न्यायालय के 13 जजों ने वर्ष 1973 में एक ऐसा फैसला दिया था, जिसकी वजह से केशवानंद भारती मृत्यु के बाद भी देश के सांविधानिक इतिहास में अमर हो गए हैं। कांग्रेस की आंतरिक कलह और पाकिस्तान से युद्ध के बाद प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने बैंकों का राष्ट्रीयकरण, प्रिवी पर्स खत्म करने और राज्यों में भूमि अधिग्रहण कानून को संविधान की नौवीं अनुसूची में शामिल करने जैसे कई कानून बनाए और संसद के माध्यम से संविधान में 24वां, 25वां और 29वां संशोधन कर दिया। 


'केशवानंद भारती बनाम स्टेट ऑफ केरल' मामले में पांच महीनों तक 68 दिन रोज सुनवाई हुई, जो सुप्रीम कोर्ट में सबसे लंबी सुनवाई का रिकॉर्ड है। अयोध्या मामले में 40 दिन की सुनवाई के बाद पांच जजों ने 1,045 पृष्ठों में सर्वसम्मति से राम मंदिर के पक्ष में अपना फैसला दिया था, जबकि केशवानंद भारती मामले में तेरह में से सात जजों ने बहुमत से लगभग 800 पृष्ठों में अपना फैसला दिया था। कुल 2,144 पैरे के इस फैसले में 11 अलग-अलग फैसले शामिल थे, जिनमें संविधान के अधिकांश प्रावधानों का पुनरावलोकन किया गया। इस फैसले के अनुसार, कानून का शासन, न्यायपालिका की स्वतंत्रता, शक्तियों का बंटवारा, केंद्र-राज्य की संघीय व्यवस्था, गणतंत्र और संसदीय प्रणाली संविधान के मूलभूत ढांचे का हिस्सा हैं, जिन्हें संविधान संशोधन से नहीं बदला जा सकता। 

इस फैसले के बाद सरकार, संसद और सर्वोच्च न्यायालय में भारी उलटफेर हुआ। अगले दिन प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति एस एम सीकरी के रिटायर होने के बाद इंदिरा सरकार ने तीन जजों की वरिष्ठता को नजर अंदाज कर जस्टिस रे को प्रधान न्यायाधीश बना दिया, जिसके विरोध में तीन वरिष्ठ जजों ने त्यागपत्र दे दिया। प्रसिद्ध संविधानविद सीके दफ्तरी ने इस घटनाक्रम को भारतीय लोकतंत्र का काला दिन बताया था। मौलिक अधिकारों को आपातकाल में पूरी तरह से कुचल दिया गया। एडीएम, जबलपुर मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मौलिक अधिकारों को प्रश्रय देने के बजाय, सरकारी दमन पर कोर्ट की मुहर लगा दी। केशवानंद भारती का फैसला सुप्रीम कोर्ट की तेजस्विता को दर्शाता है। 

केशवानंद फैसले के अनेक प्रावधानों को इंदिरा सरकार ने 42वें संविधान संशोधन के कानून से खारिज कर दिया। हालांकि जनता पार्टी सरकार ने इंदिरा सरकार के ऐसे तमाम फैसलों को रद्द कर दिया। इंदिरा सरकार ने संविधान की प्रस्तावना में 'धर्मनिरपेक्षता' और 'समाजवाद' जैसे शब्दों को शामिल किया था, जिन्हें नहीं हटाया जा सका। संविधान का मूलभूत हिस्सा मानकर अब उन प्रावधानों को हटाने पर आपत्ति की जा रही है। सवाल है कि जो प्रावधान संविधान संशोधन से शामिल किए गए, उन्हें बहुमत वाली सरकार द्वारा संविधान संशोधन के माध्यम से क्यों नहीं हटाया जा सकता। केशवानंद का मामला सरकार और न्यायपालिका के बीच प्रभुत्व के लिए हुए टकराव के तौर पर भी देखा जाता है। प्रधान न्यायाधीश की नियुक्ति में मनमानी से इंदिरा गांधी ने न्यायपालिका पर तात्कालिक बढ़त हासिल कर ली थी। लेकिन इस फैसले के नौ साल बाद एस पी गुप्ता मामले से जजों ने नियुक्ति में कॉलेजियम व्यवस्था के माध्यम से पूर्ण वर्चस्व स्थापित कर लिया। 


वर्ष 2015 में पांच जजों की पीठ ने जजों की असंगत नियुक्ति प्रणाली पर कठोर टिप्पणी की, लेकिन कॉलेजियम व्यवस्था में अब तक कोई सुधार नहीं हुआ। सुशांत सिंह राजपूत मामले में फिल्म इंडस्ट्री में वंशवाद पर बहस चल रही है। लेकिन इस संयोग पर कम बहस होती है कि केशवानंद मामले में फैसला देने वाले छह से ज्यादा जजों के बेटे या भतीजे हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जज और चीफ जस्टिस बन गए।


केशवानंद का फैसला भारत के साथ बांग्लादेश और पाकिस्तान की अदालतों में भी नजीर बन गया। केशवानंद मामले में केरल सरकार के अलावा उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार और राजस्थान समेत अन्य राज्यों की तरफ से कई नामी वकीलों ने बहस की थी। उस मामले में बहस करने वाले सोली सोराबजी तो आज भी सुप्रीम कोर्ट में संविधान के प्रकाश स्तंभ माने जाते हैं। 47 साल बाद आज भी केशवानंद मामले का हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के अनेक फैसलों में जिक्र किया जाता है।


सौजन्य - अमर उजाला।

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चीन के दोहरेपन से क्यों संभलकर रहना होगा हमें, बता रहे हैं हर्ष कक्कड़

हर्ष कक्कड़



लद्दाख में गतिरोध चीनियों के पक्ष में जा रहा था, इसलिए अब तक बातचीत की प्रक्रिया धीरे चल रही थी। बातचीत के लिए भारत के अनुरोध का न सिर्फ चीन अपने ढंग से जवाब दे रहा था, बल्कि वार्ता का नतीजा भी नहीं निकला था। चीनियों ने कदाचित मान लिया था कि माहौल उनके पक्ष में है, भारत रक्षात्मक है और एक बफर जोन बनने से शारीरिक संघर्ष की संभावना लगभग न के बराबर है। गलवां घाटी का डर, जिसने पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) के मिथक को तोड़ दिया था, पीछे छूट चुका था। वे आश्वस्त थे कि उन्होंने अपना लक्ष्य हासिल कर लिया है और वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) की सीमा को अपने लाभ के लिए आगे बढ़ा सकते हैं।


लेकिन अगस्त के अंत में भारत ने जवाबी हमले के जरिये चीन को हैरान करते हुए सुनियोजित एवं समन्वित ढंग से उसके प्रभुत्व के खाली इलाके पर हमला किया, तो चीनियों की नींद उड़ गई। एक ही झटके में भारत ने माहौल को अपने पक्ष में कर लिया। चीनियों ने महसूस किया कि उन्हें परास्त किया गया है और उनकी ओर से कोई भी कदम भारतीय निगरानी और वर्चस्व के तहत होगा। तिब्बती शरणार्थी वार्डों में शामिल स्पेशल फ्रंटियर फोर्स (विकास बटालियन) को तैनात करना एक और मास्टरस्ट्रोक था। इसने संदेश दिया कि भारत ने अपनी 'एक चीन नीति' त्याग दी है। चीन ने यह दावा करते हुए प्रतिक्रिया दी कि भारत ने एलएसी का उल्लंघन किया था, जिसे उसने खुद एक दिन पहले तक स्वीकारने से इन्कार कर दिया था और

भारतीयों की वापसी की मांग की थी। चीन की चोट और बढ़ाने तथा उसके सॉफ्टवेयर उद्योग पर असर डालने के लिए भारत ने फिर से कई चीनी एप पर प्रतिबंध लगा दिए हैं। नतीजतन अचानक चीन से हर स्तर पर बातचीत की मांग की गई।

ब्रिगेड कमांडर्स लगभग एक हफ्ते तक लगातार बिना किसी नतीजे के मिलते रहे, क्योंकि भारत ने चीनी मांगों को स्वीकारने से इन्कार कर दिया था। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के मुखपत्र ने अपना दुष्प्रचार लगातार जारी रखा। चीन ने दोनों देशों के रक्षा मंत्रियों के बीच बैठक का अनुरोध भी किया, जो शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) की बैठक में मॉस्को में हुआ। चीन की तरफ से यह तीसरा अनुरोध वर्चस्व वाली ऊंचाइयों पर कब्जा करने की भारत की आगे बढ़कर की गई कार्रवाई के बाद किया गया था। जाहिर है, चीन समाधान चाह रहा था। दोनों पक्षों ने एक दूसरे पर एलएसी के उल्लंघन का आरोप लगाते हुए बयान जारी किए। चीनी विदेश मंत्री ने बैठक के बाद अपनी प्रेस विज्ञप्ति में कहा कि 'भारत और चीन के बीच सीमा पर मौजूदा तनाव का सच और कारण स्पष्ट है, और यह जिम्मेदारी पूरी तरह से भारत की है।


चीन अपनी सीमा खो नहीं सकता, और चीनी सेना राष्ट्रीय संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा करने में सक्षम है।' इसके विपरीत भारत का बयान था कि 'बड़ी संख्या में चीनी सैनिकों की कार्रवाई उनके आक्रामक व्यवहार और एकतरफा यथास्थिति को बदलने का प्रयास द्विपक्षीय समझौतों का उल्लंघन था। भारतीय सैनिकों ने हमेशा सीमा प्रबंधन के लिए जिम्मेदार दृष्टिकोण अपनाया है, पर भारत की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा के हमारे दृढ़ संकल्प के बारे में किसी को संदेह नहीं होना चाहिए।' जैसी कि अपेक्षा थी, दोनों रक्षा मंत्रियों के बीच बैठक बेनतीजा रही। दोनों पक्ष एक-दूसरे को जिम्मेदार ठहराते रहे। ढाई घंटे से ज्यादा समय तक चली इस बैठक में सिर्फ अगले स्तर की वार्ता के लिए मंच तैयार किया गया, जो मॉस्को में आगामी 10 सितंबर को विदेश मंत्रियों के बीच होगा।


भारत अप्रैल 2020 की स्थिति की बहाली और क्षेत्र से अतिरिक्त सैनिकों की वापसी की मांग करता है, जबकि चीन चाहता है कि भारत एलएसी के उसके रुख को स्वीकार करे और हाल ही में कब्जे वाले इलाके से पीछे हट जाए। इस समय चीनी रवैए के कारण दोनों देशों के बीच विश्वास की भारी कमी है। यदि चीन भारत के प्रस्ताव को स्वीकार कर अप्रैल, 2020 की अपनी स्थिति पर वापस लौटता है, तो इससे उसकी छवि को नुकसान पहुंचेगा और पीएलए की वैश्विक प्रतिष्ठा प्रभावित होगी। यदि वर्तमान स्थिति जारी रहती है, तो उसकी स्थिति और गतिविधियां भारतीय निगरानी और वर्चस्व के अधीन होंगी। मोल्डो स्थित उसके मुख्य शिविर को निशाना बनाया जा सकता है। भारतीय सेनाओं को खदेड़ने के लिए किसी भी सैन्य कार्रवाई से चीनी जीवन को भारी नुकसान होगा, क्योंकि वहां भारत का दबदबा है। भारतीय सेना चीनी दुस्साहस का सामना करने के लिए तैयार है।


भारत को यह भरोसा नहीं है कि चीन स्वीकृत समझौतों का पालन करेगा। चीन ने लेफ्टिनेंट जनरल स्तर की वार्ता में बनी सहमति को मानने से इन्कार कर दिया है। भारत को चीन के इरादे पर संदेह है और वह इसको लेकर भी अनिश्चित है कि चीन ऊंचाई पर कब्जे की कोशिश करेगा, जिस पर अभी भारत का कब्जा है। वर्ष 1965 में सिक्किम के जेलेप ला में चीन ने ऐसा किया था और दोकलम में वह अपने क्षेत्र में लगातार बुनियादी ढांचे का निर्माण कर रहा है। ऐसी गतिविधियां भारत के लिए समस्या पैदा करेंगी। इसके अलावा चीन आगे भी एलएसी का उल्लंघन कर सकता है। इसका सबसे अच्छा समाधान है लद्दाख में एलएसी सीमा का निर्धारण, पर यह चीन को स्वीकार्य नहीं हो सकता, क्योंकि यह उसे उस क्षेत्र में दुस्साहस करने

से रोकेगा। 


दूसरा समाधान यह हो सकता है कि जब तक सीमा समझौता नहीं होता, तब तक यथास्थिति बरकरार रखी जाए। ऐसे में दोनों सेनाएं एक-दूसरे से दूरी बनाए रखेंगी। इससे दोनों देश प्रभावित होंगे, क्योंकि लद्दाख में लंबे समय तक भारी संख्या में सैन्य बल को बनाए रखना होगा। यह फिर से चीन को अस्वीकार्य हो सकता है, क्योंकि वैसे में उसकी चौकियां चौबीसों घंटे भारत की निगरानी में रहेंगी। मौजूदा संकट का समाधान कैसे होगा, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि दोनों विदेश मंत्री किस तरह से वार्ता करते हुए एक सौहार्दपूर्ण समाधान तक पहुंचते हैं। ऐसे में, भारतीय राजनयिकों को सावधान रहना होगा कि वे त्वरित समाधान की तलाश में मौजूदा सैन्य बढ़त को खोने न दें।


सौजन्य - अमर उजाला।

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शिखर आंदोलनकारी की असमय विदाई

शेखर पाठक



वर्ष 1983 का वह न जाने, कौन-सा महीना था। सिल्यारा, चम्याला समेत बालगंगा घाटी के अनेक गांवों की सैकड़ों महिलाएं घणसाली के रेंज ऑफिस में चीड़ के छिलकों की मशाल जलाकर पहुंची थीं। लगता था कि यह चिपको की बची ताकत और एक जन आंदोलन की आंतरिक पुकार थी। महिलाएं कटान रोकने के साथ वनाधिकार की मांग कर रही थीं। कुछ वर्षों बाद चेतना आंदोलन को विकसित करने वाले त्रेपन सिंह चौहान तब कक्षा सात के विद्यार्थी थे। उनकी चेतना का अंकुरण यहीं से हुआ था।


वर्ष 1980 के आसपास चिपको के उतार और टिहरी बांध आंदोलन के बिखराव ने भिलंगना घाटी के चिपको से जुड़े या प्रेरित नौजवानों को संगठित होने और नई परिस्थितियों में अपनी राह परिभाषित करने को विवश किया। पांच जून, 1995 को चेतना आंदोलन जन्मा। शुरू में यह भ्रष्टाचार के विरोध के अलावा जंगलों, चरागाहों और नदियों के मुद्दों पर केंद्रित रहा। भ्रष्टाचार विरोध के कारण 1996 में चेतना आंदोलन के कार्यकर्ताओं पर निहित स्वार्थों ने अनेक मुकदमे दायर किए। कार्यकर्ताओं के लिए काम करना मुश्किल हो गया। उन्हें असामाजिक तत्व घोषित किया गया। उस समय सुंदरलाल बहुगुणा सहित विभिन्न सामाजिक कार्यकर्ता चेतना आंदोलन के समर्थन में आए। समूह फिर अपने काम में जुट गया।

1980 के बाद चिपको के अनेक अच्छे परिणाम आने के बावजूद 1949 में उत्तर प्रदेश में विलीन टिहरी रियासत (जिला टिहरी और उत्तरकाशी) में 1998 तक भी वन पंचायतों का गठन नहीं हो सका। अगले पांच साल तक चेतना आंदोलन ने वन पंचायतों की स्थापना हेतु काम किया। अनेक वन पंचायतें बनीं, पर उनमें जंगल नहीं थे। इस तरह वृक्षारोपण और घेराबंदी के प्रयास हुए, ताकि स्वयं जंगल उग सकें। कुछ सफलता मिली। लोगों को पता चला कि पेड़ों की हिफाजत के कारण घास का उत्पादन बढ़ा है तथा अतिरिक्त जलावन उपलब्ध हुआ है। गंगा देवी, जगदेई देवी, झड़ीदेवी तथा यशोधरा देवी जैसी कर्मठ, सामाजिक नेत्रियों का उदय पंचायतों और वन पंचायतों से हुआ। ये सभी चेतना आंदोलन की आधार बनीं।

मार्च, 2004 में जब भिलंगना नदी पर फलिन्डा में 22.5 मेगावाट की भिलंगना फेज1 जलविद्युत परियोजना बिना स्थानीय समुदायों की सहमति के बनने लगी, तो चेतना आंदोलन ने तब से अप्रैल, 2006 तक आंदोलन किया। जन सुनवाइयां कीं। दर्जनों लोग गिरफ्तार किए गए और जेल में रखे गए। समस्त ग्रामीणों के विरोध के बावजूद यह योजना बनी, पर जन आंदोलन के कारण ग्रामीण समाज के सिंचाई तथा मुर्दाघाट के अधिकारों को स्वीकारा गया। इसके बाद चेतना आंदोलन ने महिलाओं को सुसंगठित करना शुरू किया। ग्राम प्रधान के चुनावों में उन्हें उतारा। चालीस में से पैंतीस उम्मीदवारों को जीत हासिल हुई। दूसरी ओर, 2012 से देहरादून में असंगठित क्षेत्र के मजदूरों को संगठित करना शुरू किया।


ग्राम्य जीवन को अर्थवान और आकर्षक बनाने के साथ पुरानी उपयोगी परंपराओं को जीवित और फिर से परिभाषित करने हेतु चेतना आंदोलन ने 'घसियारी उत्सव' की शुरुआत की। टिहरी जिले के घणसाली ब्लॉक के गांवों में आयोजित इस उत्सव में श्रेष्ठ घसियारियों को 'बेस्ट इकोलॉजिस्ट' घोषित कर उन्हें नकद धनराशि के साथ चांदी के मुकुट पहनाए जाते हैं। इन सब में त्रेपन सिंह चौहान का योगदान तो था ही, उन्होंने स्थानीय ग्रामीणों की 'बालगंगा हाइड्रो इलेक्ट्रिक कंपनी' भी बनाई, जिसमें एक मेगावाट बिजली बनाने की योजना थी।


सामाजिक आंदोलन के साथ त्रेपन सिंह ने लेखन भी जारी रखा। उत्तराखंड की स्थितियों पर केंद्रित उनके दो उपन्यास यमुना और हे ब्वारी बेहद चर्चित रहे। जहां भी अधिकारों की लड़ाई होती, त्रेपन वहां जरूर पहुंचते। सौभाग्य से उसकी तरह के कुछ साथी पहाड़ों में थे। लेकिन अंततः वह मोटर न्यूरॉन जैसी दुर्लभ बीमारी की चपेट में आ गया, जो मशहूर वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंग को थी। फिर भी विज्ञान और समाज ने हॉकिंग को 76 साल का जीवन दिया। दूसरी ओर, त्रेपन की बीमारी चालीसवें साल में शुरू हुई और वह पचास भी पार नहीं कर पाया। कितना तो अभी उसे लिखना था। कितना तो अभी उसे चलना था। घसियारियां उसके ठीक होने का इंतजार कर रही थीं और भिलंगना व बालगंगा भी। खतलिंग ग्लेशियर तथा गंगी गांव भी चाहते थे कि त्रेपन उसका स्पर्श करे। उन आंखों में जितनी चमक और उम्मीद थी, उतनी ही विनम्रता थी। चेहरे से वह आंदोलनकारी नहीं लगता था, पर उसके अंदर रचनात्मकता की आग थी।


हम जानते थे कि उसे ज्यादा दिन नहीं जीना। शायद उसे भी पता था। इसीलिए अपने तीसरे उपन्यास पर वह तेजी से काम कर रहा था, पर उसे आधा ही लिख सका। त्रेपन के रचे शू्न्य को कौन भरेगा? क्या सुमन या नगेंद्र सकलानी का शून्य भरा जा सका है? शैलानी, प्रसून, शिखर और भवानी को भी जल्दी थी।


सौजन्य - अमर उजाला।

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Shifting faith : Pakistan is caught in the intrigues within the Islamic world

Luv Puri  



In 1979, Pakistan changed the name of its third-largest populated city, Lyallpur, located on the banks of the river, Chenab, in Pakistani Punjab to Faisalabad in honour of the late King Faisal of the Kingdom of Saudi Arabia. Lyallpur was the name given in honour of the then British lieutenant-governor of Punjab, James Broadwood Lyall, in the early 20th century.


The KSA gave money for the construction of the picturesque Faisal mosque in Islamabad, again named in honour of the late king. The relationship between the KSA and the Islamic Republic of Pakistan has often been cast in terms of ties between two fraternal Sunni Muslim majority countries. One was the country where Islam was founded and another was created in the name of Islam. So the Pakistani foreign minister, Shah Mehmood Qureshi, surprised many by publicly admonishing the KSA leadership for its failure to convene a foreign ministers’ meeting of the KSA-led 57-member Organisation of Islamic Cooperation. “If they will not play their role, then I will ask Prime Minister Imran Khan to go ahead with or without Saudi Arabia.”


This was preceded by Pakistan repaying the KSA’s loan of $1 billion (USD) out of $3 billion with China’s help before the maturity period. The reason cited was that the KSA was facing financial difficulties because of the recent decrease in oil exports owing to the ongoing pandemic. The reason didn’t convince many as the KSA has several hundred billions parked in foreign assets and a sovereign wealth fund was established to diversify its investments. The loan to Pakistan was at an interest rate of 3.2 per cent. In addition to this, an old agreement signed between Pakistan and the KSA for the provision of $3.2 billion worth of oil on deferred payments per annum by the KSA was not renewed after May, 2020.



Given the manner in which the two countries have locked themselves in the last few decades, this was a rare instance of criticism of the KSA leadership. The KSA, being one of the financial benefactors, has often shaped political developments in Pakistan. In a deal that was believed to be brokered by the KSA, the former prime minister, Nawaz Sharif, was allowed to leave Pakistan by Pervez Musharraf a year after the general had deposed Sharif  in a military coup. In the late 1970s and the 1980s, the KSA and Pakistan became the most important frontal allies of the United States of America in its bid to bleed and defeat the Soviet Union. The KSA, along with the US, provided funds to Pakistan’s military to train and arm the mujahideen in Afghanistan. In fact, as is widely known, some KSA nationals, including Osama bin Laden, had fought alongside the Afghan mujahideen. After the retreat of the Soviet Union and the defeat of the local groups it supported in Afghanistan, the victorious mujahideen coalesced to form the Taliban and took advantage of the political vacuum. Only the KSA, the United Arab Emirates and Pakistan recognized the Taliban leadership when they took power in Afghanistan.


The relationship has other aspects. Pakistani troops have been deployed in the KSA at various critical moments, including the Gulf war in 1991, as part of a strategy to deter any potential Iraqi attack. The KSA had helped Pakistan to weather international sanctions after the 1998 nuclear tests in the form of a “four-year deferred oil financing facility worth roughly $3.4 billion”. Although the KSA, officially, is a non-nuclear-weapons state, its public commitment hinges on whether or not its regional foe, Iran, acquires the nuclear bomb. It is widely believed that nuclear-armed Pakistan may be one of the countries that will enable the KSA to acquire nuclear capability.


Pakistan’s singular obsession with raising the Kashmir issue and the KSA’s desire to remain equidistant from the Indo-Pak rivalry seem to be the trigger behind Qureshi’s outburst. That may not be all. In the last year or so, Pakistan’s foreign policy has put itself in the cross hairs of the renewed rivalry between the KSA and Turkey. This rivalry has its roots in the four-centuries’ old Arab-Ottoman animosity as the Ottomans had colonized vast tracts of present-day Middle East. Pakistan’s prime minister, Imran Khan, has lavished praise on the Turkish president, Recep Tayyip Erdogan, and encouraged Pakistan’s State media to broadcast the famous Turkish show, Ertugrul, and dub it in Urdu. Khan stated that in contrast to Hollywood and Bollywood, Turkish television shows are more in conformity with Islamic and family values. Musharraf used to refer to Kemal Atatürk, the founder of modern Turkey, as his role model. Atatürk, the polar opposite of Erdogan, secularized the country’s polity with an iron hand.


The KSA-Turkey animosity has acquired topical salience in the last few years. Turkey’s decision to deploy more troops in Qatar, which was facing a blockage from the KSA, exacerbated the tensions between the KSA and Turkey. In July 2020, Erdogan visited Qatar to further cement the strategic relationship between the two countries.  The KSA and Turkey are following divergent foreign policy goals in many places. For instance, in Libya, Turkey is backing Libya’s Government of National Accord to push back Khalifa Haftar’s Libyan National Army, which is supported by the KSA. The tensions had become more apparent after the killing of the Saudi journalist, Jamal Khashoggi, in the KSA’s Istanbul consulate in 2018. The facts presented by the Turkish authorities hinted at the direct involvement of Crown Prince Mohammed Bin Salman in the killing. A trial had already started in Turkey that accused 20 KSA citizens in absentia; the KSA has declined to extradite them. There is a counter-reaction sweeping within the KSA as the leadership has decided to refer to the Ottoman rule over its territory in the context of colonialism and revise textbooks. In Riyadh, a sign bearing the name of the Ottoman sultan, Suleiman the Magnificent, was reportedly removed from one of the main streets.


The global challenge to the KSA’s leadership in the Muslim world is at play. In December 2019, Erdogan along with the former Malaysian prime minister, Mahathir Mohamad, had taken the initiative to organize an Islamic summit in Kuala Lumpur. This initiative was seen by the KSA monarchy as a threat to replace the Jeddah-headquartered OIC, which is under Saudi Arabia’s de facto leadership. In a statement, the OIC secretary-general, Yousef al-Othaimeen, had said, “It is not in the interest of an Islamic nation to hold summits and meetings outside the framework of the (OIC), especially at this time when the world is witnessing multiple conflicts.” Although Malaysia and Turkey supported the position of Khan on Jammu and Kashmir-related issues in the context of the developments after August 5, 2019, the KSA leadership convinced Pakistan’s prime minister not to attend the summit. The deference is not unexpected. Apart from financial support, at least 2.6 million Pakistani nationals of all professional classes work in the KSA and they are the biggest source of remittances to Pakistan.


At a time of a grand contestation taking place between the two big powers of the Islamic world, Pakistan faces a choice between the KSA, which is expected to invest $20 billion in Pakistan as part of a memorandum of understanding signed between the two countries in February 2019, or join hands with Turkey, the KSA’s arch rival in the Muslim world.


Courtesy - DH

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