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-Rajeev Kumar (Editor-in-chief)

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Wednesday, May 5, 2021

‘पश्चिम बंगाल में मतदाताओं ने’ ‘दलबदलुओं को ठुकराया’ (पंजाब केसरी)

हम लिखते रहते हैं कि व्यक्ति ने जिस पार्टी में रह कर अपना रुतबा बनाया है, उसे छोड़ कर जाने की बजाय उसी पार्टी में रह कर तथा अपने समविचारक साथियों को साथ लेकर संघर्ष करके

हम लिखते रहते हैं कि व्यक्ति ने जिस पार्टी में रह कर अपना रुतबा बनाया है, उसे छोड़ कर जाने की बजाय उसी पार्टी में रह कर तथा अपने समविचारक साथियों को साथ लेकर संघर्ष करके अपनी बात पर पार्टी नेतृत्व को सहमत करने की कोशिश करनी चाहिए। इसी प्रकार पार्टी के नेताओं का भी कत्र्तव्य है कि वे इस बात को सुनिश्चित करें कि कर्मठ वर्करों की अनदेखी न हो, उनकी आवाज सुनी जाए और उन्हें उनका बनता अधिकार दिया जाए। 

हाल ही में स पन्न पश्चिम बंगाल के चुनावों से ठीक पहले कुछ ऐसा ही घटनाक्रम देखने को मिला जब मु यमंत्री ममता बनर्जी के व्यवहार से कथित रूप से नाराज और पार्टी में स्वयं को उपेक्षित महसूस करने वाले 34 विधायकों, दर्जनों अन्य नेताओं तथा अनेक अभिनेता-अभिनेत्रियों ने पाला बदल कर भाजपा का दामन थाम लिया। इनमें शुभेंदु अधिकारी, जिन्होंने नंदीग्राम से ममता बनर्जी को हराया, के अतिरिक्त ‘साऊथ बंगाल स्टेट ट्रांसपोर्ट कार्पोरेशन’ के अध्यक्ष दीप्तांगशु चौधरी, विधायक शीलभद्र दत्त, विधायक बनाश्री मैती, वैशाली डालमिया, दीपक कुमार हलदर, प्रबीर घोषाल, विश्वजीत कुंडू, वन मंत्री राजीब बनर्जी आदि प्रमुख हैं। 

यही नहीं भाजपा ने केंद्रीय मंत्री बाबुल सुप्रियो तथा 2 अन्य लोकसभा सांसदों लॉकेट चटर्जी व निशीथ प्रामाणिक तथा राज्यसभा सांसद स्वप्न दासगुप्ता को भी केंद्र से लाकर चुनाव लड़वाया परन्तु चारों ही हार गए। हालांकि बाबुल सुप्रियो, लॉकेट चटर्जी और निशीथ प्रामाणिक की लोकसभा सदस्यता तो कायम रहेगी परन्तु स्वप्न दासगुप्ता ने राज्यसभा की सदस्यता से त्यागपत्र दे दिया था, इसलिए वह न ही विधायक बन पाए और न ही सांसद रहे।

एक ओर जहां भाजपा का केंद्रीय और प्रादेशिक नेतृत्व इन दलबदलुओं को आंखें मूंद कर पार्टी में शामिल करता चला गया तो दूसरी ओर पार्टी नेताओं के एक वर्ग में इसके विरुद्ध बगावत शुरू हो गई तथा भाजपा के पुराने सदस्यों और दलबदलुओं के बीच खून-खराबा भी हुआ। 

तृणमूल कांग्रेस से आए दलबदलुओं को चुनाव लड़वाने का भाजपा का प्रयोग विफल रहा तथा 2 मई को घोषित परिणामों में 13 दलबदलू विधायकों में से सिर्फ 4 ही अपनी सीट बचा पाए, एक दलबदलू किसी अन्य सीट से जीता और अन्य 8 को भारी पराजय का सामना करना पड़ा।

‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ के कुछ नेताओं को भी दलबदलुओं को आंख मूंद कर पार्टी में शामिल करना पसंद नहीं था क्योंकि ‘संघ’ दूसरी पार्टी से आए नेताओं और उनके समर्थकों पर भरोसा करने का दृढ़ता से विरोध करता रहा है। संघ नेताओं के अनुसार,‘‘दलबदलुओं की कोई विचारधारा नहीं होती और बेहतर स्थिति अथवा प्रलोभन मिलने पर वे पाला बदल सकते हैं।’’ 

चूंकि ज्यादातर दलबदलू सत्ता के स्वार्थ की खातिर ही दूसरी पार्टी में जाते हैं, अत: यदि तृणमूल कांग्रेस के ये दलबदलू जीत भी जाते तो सरकार में किसी न किसी पद के लिए भाजपा नेतृत्व पर दबाव डालना शुरू कर देते जिससे भाजपा में भी तनातनी वाली स्थिति पैदा हो जाती।

बहरहाल जहां भाजपा नेतृत्व ने अपने चुनाव अभियान में देश के दूसरे हिस्सों से आए लोगों को प्रभावित करने में सफलता प्राप्त की वहीं वे महिलाओं और मुसलमानों सहित स्थानीय मतदाताओं को प्रभावित करने में विफल रहे जिन्होंने तृणमूल कांग्रेस की विजय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अभिनेत्री जया बच्चन ने भी अपने पति अमिताभ बच्चन की राजनीतिक प्रतिबद्धता (कांग्रेस) के दृष्टïविगत कोलकाता जाकर 4 दिन तृणमूल कांग्रेस के पक्ष में प्रचार किया। इसका भी महिलाओं पर अनुकूल प्रभाव पड़ा। 

बहरहाल अब पराजित दलबदलू नेताओं के लिए ‘न इधर के रहे न उधर के रहे’ वाली स्थिति पैदा हो गई है क्योंकि अगले 5 वर्षों तक उन्हें भाजपा में कोई नहीं पूछेगा और क्षेत्रीय लोग भी अब काम करवाने के लिए उनके पास न आकर तृणमूल कांग्रेस के विजेता विधायकों के पास ही जाएंगे।हालांकि दलबदली का यह पहला मौका नहीं परंतु निश्चय ही दलबदलुओं ने अपनी विश्वसनीयता और प्रतिष्ठïा फिर गंवाई है जिसकी उन्हें कीमत भी चुनावी पराजय के रूप में चुकानी पड़ेगी। —विजय कुमार

सौजन्य - पंजाब केसरी।

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Tuesday, May 4, 2021

दीदी : बड़ी जीत, थोड़ी हार (पंजाब केसरी)

27 मार्च से शुरू होकर 29 अप्रैल तक के ल बे अंतराल में स पन्न 4 राज्यों तमिलनाडु, असम, केरल, पश्चिम बंगाल और केंद्र शासित राज्य पुड्डïुचेरी के विधानसभा चुनावों में सब की नजरें पश्चिम बंगाल पर ही केंद्रित रहीं। जहां बंगाल में सत्ता की हैट्रिक लगाने के लिए ममता बनर्जी ने पूरा जोर लगाया वहीं राज्य में पहली बार कमल खिलाने के लिए भाजपा नेताओं ने दर्जनों रैलियां कीं। इन चुना

27 मार्च से शुरू होकर 29 अप्रैल तक के ल बे अंतराल में स पन्न 4 राज्यों तमिलनाडु, असम, केरल, पश्चिम बंगाल और केंद्र शासित राज्य पुड्डïुचेरी के विधानसभा चुनावों में सब की नजरें पश्चिम बंगाल पर ही केंद्रित रहीं। जहां बंगाल में सत्ता की हैट्रिक लगाने के लिए ममता बनर्जी ने पूरा जोर लगाया वहीं राज्य में पहली बार कमल खिलाने के लिए भाजपा नेताओं ने दर्जनों रैलियां कीं। 

इन चुनावों में जहां तीन राज्यों बंगाल, केरल और असम में सत्तारूढ़ दलों ने सत्ता पर कब्जा बनाए रखा वहीं तमिलनाडु में सत्तारूढ़ अन्नाद्रमुक को सत्ताच्युत करके 10 वर्ष के वनवास के बाद द्रमुक सत्ता में वापसी करने जा रही है लेकिन इसके लिए एम.के.स्टालिन के नेतृत्व में द्रमुक को भारी मशक्कत करनी पड़ी। 

जैसा कि कहा जा रहा था कि जयललिता की मृत्यु के बाद दोफाड़ हुई अन्नाद्रमुक समाप्त होने के कगार पर पहुंच गई है, परंतु मु यमंत्री पलानीस्वामी के नेतृत्व में पार्टी ने अच्छी चुनौती देकर सिद्ध कर दिया कि अन्नाद्रमुक की अभी भी राज्य के मतदाताओं तथा पार्टी वर्करों पर अच्छी पकड़ है। पुड्डचेरी में, जहां 22 फरवरी, 2021 को विश्वास मत पर मतदान से पहले मु यमंत्री नारायणसामी द्वारा इस्तीफा देने से कांग्रेस नीत सरकार गिर गई इस बार भाजपा गठबंधन ने पहली बार सरकार बनाने में सफलता प्राप्त कर ली है। ऐसा माना जा रहा है कि कांग्रेस ने सत्ता में लौटने के लिए न तो कोई खास रणनीति बनाई और न ही कोई खास मेहनत लगाई। 

बंगाल में भाजपा ने काफी जोर लगाया और पार्टी नेताओं ने तृणमूल कांग्रेस के भ्रष्टïाचार का मुद्दा उठाया परंतु भाजपा नेतृत्व ममता बनर्जी के राज्य की जनता के साथ मजबूत स बन्धों को तोडऩे में विफल रहा। ऐसा माना जा रहा है कि महिला वोट और ममता द्वारा किए गए सामाजिक कार्यों ने राज्य की सत्ता पर कब्जा करने का भाजपा का सपना तोड़ डाला। असम में भाजपा ने अपनी सरकार पर कब्जा कायम रखा। हालांकि यहां कांग्रेस बेहतर प्रदर्शन कर सकती थी परंतु वहां भी प्रचार के अभाव में पिछड़ गई। 

केरल के अब तक के इतिहास के अनुसार यहां बदल-बदल कर ही सरकारें आती रही हैं परंतु पिछले 40 वर्षों में यह पहला मौका है जब यहां वामदलों की सरकार दूसरी बार सत्ता में लौटने में सफल हुई है। इसका कारण केरल सरकार द्वारा कोरोना से लडऩे के लिए कुशलतापूर्वक प्रबंधन करना माना जा रहा है। जहां तक कांग्रेस का संबंध है इन चुनावों के परिणामों ने एक बार फिर सिद्ध कर दिया है कि इसके नेताओं ने अपनी अतीत की गलतियों से कुछ नहीं सीखा है। जहां केरल में कांग्रेस वामदलों का विरोध कर रही थी वहीं बंगाल में इसने वामदलों के साथ गठबंधन करके चुनाव लड़ा जिसका मतदाताओं में गलत संदेश गया।

राहुल गांधी द्वारा पश्चिम बंगाल में चुनाव प्रचार न करने का भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। बंगाल में वामदलों के साथ गठबंधन करने से दोनों दलों से नाराज मतदाताओं के वोट तृणमूल कांग्रेस को चले गए। इन चुनावों में तीन अन्य पहलू जो खुल कर सामने आए, वे हैं धु्रवीकरण, मतदान का ल बा अंतराल और चुनावों पर किया गया खर्च। यही नहीं मद्रास हाईकोर्ट ने चुनाव आयोग को कोरोना से बचाव नियमों के पालन में विफल रहने के लिए दोषी ठहराया है।

दूसरी ओर ममता ने भी नंदीग्राम मे हारने का ठीकरा ई.वी.एम. पर फोड़ा। उसे देखते हुए भी यह चर्चा छिड़ गई है कि क्या हमें अधिक अधिकारों वाला चुनाव आयोग चाहिए या टी.एन.शेषण जैसा शक्तिशाली चुनाव आयुक्त! महान दार्शनिक अरस्तु ने लिखा था कि चुनावों को 3 प्रकार से प्रभावित किया जाता है। पहला अथारिटी अर्थात अपनी शक्ति से, दूसरा तर्क से और तीसरा मतदाताओं को भावनात्मक रूप से प्रभावित करने से। यही तीसरा पहलू सभी दलों के नेताओं ने अपनाया और विभाजनकारी राजनीति द्वारा मतदाताओं की भावनाओं से खेलने की भरपूर कोशिश की। जो भी हो, इन चुनावों में सबसे बड़ी बात यह है कि नंदीग्राम से तो ममता बनर्जी चंद वोटों से हार गई हैं।

वहीं पश्चिम बंगाल में चुनावों के दौरान शुरू हुई ङ्क्षहसा अभी तक खत्म नहीं हो पा रही। हल्दिया में शुभेन्दु अधिकारी के काफिले पर जमकर पत्थरबाजी हुई। बंगाल में आरामबाग में भाजपा कार्यालय को फूंक दिया गया। ममता को अब हिंसा पर नियंत्रण पाने के लिए जल्द ही स त कार्रवाई करनी होगी। 

ममता की इस जीत पर विपक्ष के बड़े नेता जैसे शरद पवार, उद्धव ठाकरे, केजरीवाल, एम.के. स्टालिन, पिनरई विजयन तथा अन्य दिग्गजों ने भी उन्हें बधाई दी है। ममता को अब विपक्षी दल संयुक्त विपक्ष का नेता मान रहे हैं। भविष्य में क्या होगा यह कहना तो कठिन है लेकिन इस समय विपक्ष के लिए एक भारी उ मीद जरूर जागी है। वहीं ममता ने नंदीग्राम में हुई अपनी इस हार पर कहा है कि वह इस मामले में अदालत में जाएंगी। इसके साथ ही उनका यह भी कहना है कि,‘‘नंदीग्राम में जो हुआ उसे भूल जाओ, हम चुनाव जीते हैं।’’ 
 

सौजन्य - पंजाब केसरी।

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‘पोप फ्रांसिस का’ वैटिकन में ‘एक और सुधारवादी कदम’ (पंजाब केसरी)

यूं तो सभी धर्म एक जैसे ही हैं परंतु सभी में समय-समय पर कुछ त्रुटियां व्याप्त होती रही हैं जिन्हें उन धर्मों से संबंधित महान विभूतियों द्वारा दूर भी किया जाता रहा है। इनमें वर्तमान पोप फ्रांसिस

यूं तो सभी धर्म एक जैसे ही हैं परंतु सभी में समय-समय पर कुछ त्रुटियां व्याप्त होती रही हैं जिन्हें उन धर्मों से संबंधित महान विभूतियों द्वारा दूर भी किया जाता रहा है। इनमें वर्तमान पोप फ्रांसिस भी शामिल हैं। 13 मार्च, 2013 को कैथोलिक ईसाइयों की सर्वोच्च धार्मिक पीठ तथा विश्व की शक्तिशाली धार्मिक संस्थाओं में से एक ‘वैटिकन’ के 266वें पोप बने फ्रांसिस ने पद ग्रहण करते ही चर्च में घर कर चुकी कमजोरियां दूर करने के लिए सुधारवादी कदम उठाने शुरू कर दिए जिनके अंतर्गत उन्होंने : 

* 12 जून, 2013 को पहली बार स्वीकार किया कि वैटिकन में ‘गे’ (समलैंगिक) समर्थक लॉबी व भारी भ्रष्टाचार मौजूद है और उन्होंने इसकी घोर निंदा करते हुए कहा कि ‘‘दुष्टï नरक में जाएंगे।’’
* 14 जून, 2013 को पोप फ्रांसिस ने शादी से पूर्व सहमति स बन्ध  (लिव इन रिलेशनशिप) में रहने वाले कैथोलिक जोड़ों की निंदा की तथा कहा, ‘‘आज कई कैथोलिक बिना शादी किए ही इकट्ठे रह रहे हैं जो सही नहीं।’’ 

* 5 मार्च, 2014 को अमरीका में मैरोनाइट कैथोलिक गिरजाघर में एक शादीशुदा व्यक्ति को पादरी बनाकर उन्होंने एक नई पहल की।
* 4 जून, 2014 को पोप फ्रांसिस ने संतानहीन द पतियों से कहा कि ‘‘जानवरों की तुलना में अनाथ बच्चों को प्यार देना और उन्हें गोद लेना बेहतर है।’’
* 25 दिस बर, 2014 को पोप फ्रांसिस बोले, ‘‘पादरी व बिशप आदि अपना रुतबा बढ़ाने के लिए सांठ-गांठ, जोड़-तोड़ और लोभ की भावनाओं से ग्रस्त हो गए हैं। कैथोलिक ईसाइयों के सबसे बड़े धर्मस्थल वैटिकन के कामकाज में सुधार लाने की आवश्यकता है।’’ 

* 17 जून, 2017 को पोप फ्रांसिस ने कैथोलिक धर्म में घुस आए भ्रष्टाचार और माफिया तत्वों पर अंकुश लगाने के लिए कानूनी नियमावली बनाने संबंधी फैसला करते हुए इनके बहिष्कार का आह्वान किया। 
* 14 अक्तूबर, 2018 को पोप फ्रांसिस ने नाबालिगों के यौन शोषण के मामले में चिली के पूर्व आर्कबिशप ‘फ्रांसिस्को जोस’ तथा पूर्व बिशप ‘मार्को एंटोनियो’ को पादरी पद से बर्खास्त करने के आदेश दिए। इससे पहले बच्चों से यौन दुराचार करने व उनका शोषण करने वाले पादरियों को शायद ही कभी सजा मिली हो। कुछ धर्मशास्त्रियों के अनुसार बच्चों के यौन शोषण के पीछे चर्च की नीति जि मेदार है। इसके अंतर्गत पादरियों को ब्रह्मïचर्य का पालन करना पड़ता है जो सभी  के लिए संभव नहीं होता। ऐसे मामलों में चर्च केउच्च अधिकारियों पर पादरियों का बचाव करने के भी आरोप हैं। 

* 18 दिस बर, 2018 को पोप ने विभिन्न राज्याध्यक्षों के नाम संदेश में कहा कि अपने देशों की समस्याओं के लिए वे आप्रवासियों को जि मेदार न ठहराएं और जातिवादी नीतियां अपना कर समाज में अविश्वास की भावना न फैलाएं।
* 11 जनवरी, 2021 को पोप फ्रांसिस ने महिलाओं को कैथोलिक चर्च में बराबरी का दर्जा और उन्हें चर्च की प्रार्थना करवाने की प्रक्रिया में शामिल होने का अधिकार देने का निर्णय लिया और कहा कि प्रार्थना प्रक्रिया में शामिल महिलाएं किसी दिन पादरी का दर्जा भी प्राप्त करेंगी। 

* और अब 29 अप्रैल को पोप फ्रांसिस ने चर्च के बड़े पादरी (काॢडनल) सहित सभी उच्च पदाधिकारियों को अपनी स पत्तियों का खुलासा करने का आदेश देते हुए कहा है कि ‘‘आप लोग 50 डालर से अधिक मूल्य का उपहार न लें। ईश्वर के काम में जुड़े लोग भ्रष्टïाचार से मुक्त रहें और वित्तीय लेन-देन में ईमानदारी तथा पारदर्शिता बरतें।’’ 

इससे पादरियों के महंगे तोहफे लेेने की पर परा समाप्त होगी और उन्हें यह शपथ पत्र देना होगा कि वे कभी किसी भी भ्रष्ट आचरण, धोखाधड़ी, बच्चों के यौन शोषण, आतंकवाद, मनीलांड्रिंग, टैक्स चोरी जैसे अपराध में शामिल नहीं रहे और न होंगे। इसी प्रकार अब वैटिकन के पदाधिकारी टैक्स बचाने के लिए अपना धन दूसरे देशों में जमा नहीं करवा सकेंगे और क पनियों आदि के शेयर खरीद कर ब्याज भी नहीं कमा सकेंगे।

पोप फ्रांसिस ने आपराधिक आचरण के आरोपी काॢडनलों और उच्च स्तर के पादरियों पर मुकद्दमे चलाने की अनुमति भी वैटिकन को दे दी है जिसे वैटिकन में भ्रष्टाचार समाप्त करने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। 

पिछले 8 वर्षों में पोप फ्रांसिस द्वारा वैटिकन के कामकाज में किए जा रहे सुधारों में यह नवीनतम है। पोप फ्रांसिस के इस आदेश का पालन करने से पादरियों पर लगने वाले भ्रष्टïाचार के आरोपों पर रोक और चर्च की प्रतिष्ठा बढ़ाने में अवश्य सहायता मिलेगी।—विजय कुमार

सौजन्य - पंजाब केसरी।

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‘कोरोना से मृतकों के अंतिम संस्कार के लिए’ ‘लकड़ी भी कम पड़ने लगी’ (पंजाब केसरी)

समस्त विश्व को अपनी चपेट में ले चुकी कोरोना महामारी ने दूसरी लहर के दौरान देश में पिछले 15 दिनों में बहुत तेजी से र तार पकड़ी है। मात्र 2 सप्ताह पहले जहां कोरोना से होने वाले संक्रमण के

समस्त विश्व को अपनी चपेट में ले चुकी कोरोना महामारी ने दूसरी लहर के दौरान देश में पिछले 15 दिनों में बहुत तेजी से रफतार पकड़ी है। मात्र 2 सप्ताह पहले जहां कोरोना से होने वाले संक्रमण के परिणामस्वरूप प्रतिदिन लगभग 1000 लोगों के प्राण जा रहे थे वहीं अब यह सं या 3500 प्रतिदिन का आंकड़ा भी पार कर गई है। 

हालत यह है कि भारत में कोरोना से मौतों की गूंज दूर-दराज तक सुनाई दे रही है। विश्व की सबसे बड़ी अमरीकी समाचार पत्रिका ‘टाइम’ ने अपने 10 से 17 मई वाले अगले अंक के मुखपृष्ठ पर भारत में जलती चिताओं का चित्र प्रकाशित किया है। यहां रोज 3 लाख से अधिक मामले सामने आ रहे हैं और अस्पतालों में इलाज न हो पाने से बड़ी संख्या में लोग मर रहे हैं।

मृतकों के शव श्मशानघाटों तक ले जाने के लिए एम्बुलैंस तक नहीं मिल रहीं। श्मशानों में मृतकों को जगह नहीं मिलने से उनके परिजनों को अंतिम संस्कार के लिए ल बा इंतजार करना पड़ रहा है। शवों की अधिकता और जगह की कमी के कारण कई जगह जमीन पर रखकर ही मृतकों का अंतिम संस्कार किया जा रहा है। 

यही नहीं श्मशानघाटों के कर्मचारियों के लिए भी समस्या पैदा हो गई है। लगातार काम करने से थकावट और तनाव के कारण उनका बुरा हाल हो रहा है। कई जगह तो उन्हें खाने के लिए समय निकालने में भी मुश्किल आ रही है। अनेक स्थानों पर जहां रात 11 बजे तक संस्कार होते थे वहां अब चौबीसों घंटे संस्कार हो रहे हैं। बरेली स्थित संजय नगर श्मशानघाट के प्रबंधक इतना थक गए थे कि उन्होंने शव लेकर आए अनेक लोगों को यह कह कर वापस लौटा दिया कि वे अब और शव नहीं ले सकते। श्मशान भूमियों में लकडिय़ों की मांग बढ़ जाने से कई जगह इसकी कमी पैदा हो गई है तथा कीमत भी 25 प्रतिशत तक बढ़ गई है। 

राजधानी दिल्ली के सबसे बड़े ‘निगम बोध श्मशानघाट’ में कोरोना की दूसरी लहर आने से पहले प्रतिदिन 6 से 8 हजार किलो लकड़ी की खपत होती थी जो अब दूसरी लहर के दौरान काफी अधिक हो गई है। इसी को देखते हुए पूर्वी दिल्ली नगर निगम ने अधिकारियों को ईंधन के रूप में सूखे गोबर का इस्तेमाल करने का निर्देश दिया है।

झारखंड में रांची के ‘नामकूम’ स्थित ‘घाघरा मुक्ति धाम’ में लकड़ी समाप्त हो गई तो वहां अंतिम संस्कार करने आए लोगों का गुस्सा भड़क उठा और उन्होंने जबरदस्त हंगामा किया। यहीं पर बस नहीं, अनेक स्थानों पर लॉकडाऊन के चलते बाजार बंद होने के कारण पूजन सामग्री का भी अभाव हो गया है और अंतिम संस्कार के लिए सामग्री बेचने वालों के साथ-साथ जरूरतमंदों को सामग्री प्राप्त करने में भी कठिनाई हो रही है। 

हालांकि कोरोना संक्रमण से मृत लोगों के दाह संस्कार के लिए अनेक मुक्तिधामों पर कोविड प्रोटोकोल के अंतर्गत प्रबंध किए गए हैं परंतु सब जगह ऐसा नहीं है तथा श्मशानघाटों में काम करने वाले कर्मचारियों को पी.पी.ई. किट आदि उपलब्ध नहीं करवाई गईं जो नियमानुसार संक्रमित शवों को जलाते समय पहनना जरूरी है। केवल श्मशानघाटों पर काम करने वाले कर्मचारी ही परेशान और हताश नहीं हैं, बल्कि महामारी में अपनों को खोने वालों का दुख भी अंतहीन हो गया है। ये लोग पहले अपने परिजनों के इलाज के लिए अस्पतालों के चक्कर लगाते रहे और फिर मौत हो जाने की स्थिति में उनके शव को विदाई देने के लिए भी ल बे इंतजार तथा परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। 

समय के साथ-साथ लोग जागरूक हो रहे हैं और टीकाकरण भी करवा रहे हैं तथा सरकार भी स्थिति पर नियंत्रण पाने के लिए जोर लगा रही है परंतु उत्पादन कम होने के कारण देश में टीकों की कमी पैदा हो जाने से टीकाकरण अभियान अवरुद्ध हो रहा है तथा कहना मुश्किल है कि भविष्य में परिस्थितियां क्या मोड़ लेंगी। अत: जरूरत अब इस बात की है कि लोग इस महामारी से बचाव के लिए सही तरीके से मास्क से मुंह और नाक को ढांप कर रखने, बार-बार हाथों को सैनेटाइज करने और सोशल डिस्टैंसिंग के नियमों का कठोरतापूर्वक पालन करने के साथ-साथ अपने आस-पास के लोगों को भी इसके लिए जागरूक करें ताकि यह खतरा यथासंभव कम किया जा सके।—विजय कुमार 
 

सौजन्य - पंजाब केसरी।

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Friday, April 30, 2021

विश्व पर शनि की साढ़ेसाती का प्रकोप जारी, बिजली गिरने, भूकम्प, आग, हिमस्खलन, कोरोना आदि से मौतें (पंजाब केसरी)

कुछ समय से देश-विदेश के हालात देखते हुए अनेक लोगों का कहना ठीक ही लगता है कि शनिदेव नाराज हैं और विश्व पर साढ़ेसाती आई हुई है जिसका उल्लेख हम पहले भी अपने सम्पादकीय लेखों में कर चुके हैं। ‘शनि की

कुछ समय से देश-विदेश के हालात देखते हुए अनेक लोगों का कहना ठीक ही लगता है कि शनिदेव नाराज हैं और विश्व पर साढ़ेसाती आई हुई है जिसका उल्लेख हम पहले भी अपने सम्पादकीय लेखों में कर चुके हैं। 
‘शनि की इस साढ़ेसाती’ के कारण समस्त विश्व में लगातार जंगलों, अस्पतालों व नागरिक आबादी में आग, भूकंप, बाढ़, आसमानी बिजली आदि से जान-माल की भारी हानि तो पहले की तरह ही हो रही है, अब कोरोना महामारी की दूसरी लहर ने संकट और भी बढ़ा दिया है : 

* 09 अप्रैल को उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर और भदोही में 3 जगहों पर आसमानी बिजली गिरने से 2 बच्चों और एक महिला सहित 3 लोगों की मृत्यु हो गई तथा 4 अन्य गंभीर रूप से झुलस गए।
* 13 अप्रैल को उत्तराखंड में विभिन्न स्थानों पर लगभग 133 हैक्टेयर क्षेत्र में फैले जंगलों को आग से भारी क्षति पहुंची। 
* 16 अप्रैल को हरियाणा के बेरी क्षेत्र के डीघल गांव में आसमानी बिजली गिरने से एक व्यक्ति की जान चली गई। 
* 17 अप्रैल को छत्तीसगढ़ के रायपुर में एक निजी अस्पताल के आई.सी.यू. में आग लगने से 5 कोरोना पीड़ितों की मौत हो गई। 

* 20 अप्रैल को दिल्ली से पलायन करके मध्य प्रदेश में अपने घर टीकमगढ़ जा रहे प्रवासी मजदूरों की बस ग्वालियर के निकट पलट जाने से 2 प्रवासी मजदूर मारे गए और 8 घायल हो गए।
* 21 अप्रैल को नासिक के अस्पताल में ऑक्सीजन टैंक लीक होने के कारण ऑक्सीजन सप्लाई बाधित हो जाने से 24 मरीजों की मौत हो गई। 
* 21 अप्रैल को ही हिमाचल में ‘डोडराक्वार’ उपमंडल के झालटा गिल्टाड़ी के काशला जंगल में बिजली गिरने से 3 दर्जन भेड़-बकरियों की मौत हो गई।
* 22 अप्रैल को उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले के ‘तकिया’ गांव में आसमानी बिजली गिरने से खेत में काम कर रहे एक किसान की मौत हो गई। 

* 23 अप्रैल को लीबिया के तट के निकट भूमध्य सागर में एक जहाज के डूब जाने से यूरोप जाने की कोशिश कर रहे 130 से अधिक प्रवासियों के मारे जाने की आशंका है।
* 23 अप्रैल को चीन में शंघाई की एक इलैक्ट्रॉनिक्स फैक्टरी में हुए भीषण अग्निकांड में 8 लोग मारे गए।
* 23 अप्रैल को बिहार की राजधानी पटना के दानापुर इलाके में एक जीप के नदी में जा गिरने से 9 लोगों की मौत हो गई। 
* 23 अप्रैल को हिमाचल में बैजनाथ उपमंडल के ‘ढग’ नामक स्थान में हुई भारी बर्फबारी के कारण 400 भेड़-बकरियां दब कर मर गईं। 

* 23 अप्रैल को उत्तराखंड के चमोली जिले के साथ लगने वाले भारत-तिब्बत सीमा क्षेत्र में 15 मजदूरों की हिमस्खलन में दबने से मौत हो गई।
* 23 अप्रैल को महाराष्ट्र के विरार में सुबह के समय एक निजी अस्पताल के आई.सी.यू. में आग लगने से कोरोना ग्रस्त 13 मरीजों की जान चली गई।
* 24 अप्रैल को जिम्बाब्वे वायुसेना का एक हैलीकाप्टर राजधानी हरारे से 30 किलोमीटर दूर दुर्घटनाग्रस्त हो कर एक मकान के ऊपर जा गिरा जिससे चालक दल के 3 सदस्यों तथा एक बच्चे सहित 4 लोगों की मौत हो गई। 
* 24 अप्रैल को बाली द्वीप के निकट समुद्र की गहराई से बरामद हुई इंडोनेशिया की लापता पनडुब्बी के सभी 53 नौसैनिक मृत पाए गए। 

* 25 अप्रैल को ईराक की राजधानी बगदाद के एक अस्पताल में ऑक्सीजन सिलैंडर फटने से आग लगने के कारण वहां उपचाराधीन 82 कोरोना पीड़ितों की मौत हो गई तथा 110 अन्य घायल हो गए।
* 26 अप्रैल को लेह-लद्दाख के सियाचिन क्षेत्र में हिमस्खलन होने से पंजाब के 2 जवान दब कर शहीद हो गए।
* 28 अप्रैल को असम तथा पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों में 6.4 तीव्रता का भूकम्प आने से अनेक इमारतें ध्वस्त हो गईं तथा सड़कों में दरारें आ गईं। 

* 28 अप्रैल को ही महाराष्ट्र में ठाणे के निजी अस्पताल में आग लगने से 4 करोना पीड़ित रोगी मारे गए।
* 28 अप्रैल वाले दिन ही शिमला के कोटखाई में आग लगने से 6 मकान  जल कर राख हो गए तथा एक महिला की झुलस जाने से मौत हो गई।
* 28 अप्रैल को ही बिहार में पटना के ‘अलाउद्दीन चक’ नामक गांव में सुबह खाना बनाने के दौरान एक घर में आग लग जाने से 4 मासूम बच्चे  
जिंदा जल गए। एक ओर विश्व कोरोना के प्रकोप का सामना कर रहा है तो दूसरी ओर प्रकृति का प्रकोप जानें ले रहा है। शायद कुदरत हमें चेतावनी दे रही है कि : 

‘‘कृत्रिम खाद तथा कीटनाशकों के अत्यधिक इस्तेमाल से पृथ्वी को, नदियों में कारखानों का जहरीला पानी छोड़ कर जल स्रोतों को और वायुमंडल में कारखानों का विषैला धुआं छोड़ कर इसे क्षति पहुंचाना बंद कर दो वर्ना विनाश लीला के हृदय विदारक दृश्य इसी तरह चलते रहेंगे।’’—विजय कुमार 

सौजन्य - पंजाब केसरी।

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Wednesday, April 28, 2021

‘मद्रास हाईकोर्ट की’‘चुनाव आयोग को सख्त फटकार’ (पंजाब केसरी)

दूसरी लहर के दौरान देश में कोरोना महामारी का प्रकोप अत्यंत तेजी से बढ़ रहा है, जिसमें चार राज्यों पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, असम, केरल और केंद्र शासित पुड्डुचेरी में कोरोना के प्रकोप के दौरान करवाए गए चुनावों ने इसमें और वृद्धि कर दी है। यहां

दूसरी लहर के दौरान देश में कोरोना महामारी का प्रकोप अत्यंत तेजी से बढ़ रहा है, जिसमें चार राज्यों पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, असम, केरल और केंद्र शासित पुड्डुचेरी में कोरोना के प्रकोप के दौरान करवाए गए चुनावों ने इसमें और वृद्धि कर दी है। यहां तक कि पश्चिम बंगाल में जांच के दौरान हर दूसरा व्यक्ति कोरोना पॉजिटिव पाया जा रहा है और देश के अन्य राज्यों में भी स्थिति इससे अधिक भिन्न नहीं है। 

चुनावों के दौरान राजनीतिक दलों को विशाल रैलियां करके कोरोना प्रोटोकोल का उल्लंघन करने और नेताओं सहित बड़ी संख्या में लोगों के बिना मास्क पहने उनमें भाग लेने पर ध्यान न देने के लिए चुनाव आयोग इन दिनों आलोचना का पात्र बना हुआ है, जिसने कोरोना प्रोटोकोल का उल्लंघन करने वाली किसी पार्टी या नेता के विरुद्ध कार्रवाई नहीं की। 

पश्चिम बंगाल में 8 चरणों में चुनाव करवाने का आदेश देने व तीन अंतिम बचे चरणों का चुनाव एक साथ करवाने की मांग पर सहमत न होने के लिए भी चुनाव आयोग की आलोचना हो रही है, हालांकि तब तक यह स्पष्ट हो गया था कि भारत स्वास्थ्य संबंधी बहुत बड़े खतरे में घिर गया है। इन्हीं सब बातों को देखते हुए मद्रास हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश माननीय संजीव बनर्जी व न्यायमूर्ति सेंथिल कुमार राममूर्ति पर आधारित पीठ ने संक्रमण के प्रसार के लिए चुनाव आयोग को सख्त फटकार लगाई है। एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायालय ने चुनाव आयोग को सबसे गैर-जिम्मेदार संस्था बताया और कहा कि इसके अधिकारियों के विरुद्ध हत्या के आरोपों में भी मामला दर्ज किया जा सकता है। 

अदालत ने कहा, ‘‘जब राजनीतिक रैलियां हो रही थीं उस समय क्या आप किसी दूसरे ग्रह पर थे? चुनावों के लिए राजनीतिक दलों को रैलियां व सभाएं करने की अनुमति देकर कोरोना महामारी की दूसरी लहर का रास्ता साफ करने के लिए सिर्फ और सिर्फ अकेला चुनाव आयोग ही जिम्मेदार है।’’ ‘‘सार्वजनिक स्वास्थ्य का सर्वाधिक महत्व है। यह चिंता की बात है कि संवैधानिक अधिकारियों को इस संबंध में याद दिलाना पड़ रहा है। अदालत द्वारा बार-बार यह आदेश देने के बावजूद कि कोविड प्रोटोकोल का पालन करो...कोविड प्रोटोकोल का पालन करो...आपने रैलियां करने वाली राजनीतिक पार्टियों के विरुद्ध कोई कार्रवाई नहीं की।’’ 

‘‘पिछले कुछ महीनों के दौरान चुनाव आयोग ने राजनीतिक पार्टियों को कोविड प्रोटोकोल का उल्लंघन करने से न रोक कर भारी गैर-जिम्मेदारी का प्रदर्शन किया है। लोगों को मास्क पहनने, सैनेटाइजर इस्तेमाल करने और दूरी बरतने जैसे नियमों का भी पालन नहीं करवाया गया। आयोग अपने अधिकारों का प्रयोग करने में पूरी तरह विफल रहा और इसी कारण आज महामारी की दूसरी लहर कहर बरपा रही है।’’ जब चुनाव आयोग के वकील ने अदालत को बताया कि सभी जरूरी कदम उठाए जा रहे हैं तथा मतगणना केंद्रों पर भी सभी तरह के एहतियाती कदम उठाए जाएंगे तो दोनों न्यायाधीश गुस्से से बरस पड़े। 

अदालत ने चुनाव आयोग को स्वास्थ्य विभाग के सचिव से परामर्श के बाद मतगणना वाले दिन के लिए कोरोना दिशा-निर्देशों को लेकर 30 अप्रैल तक एक विस्तृत रिपोर्ट दाखिल करने का आदेश देते हुए कहा कि यदि ऐसा नहीं किया गया तो हम 2 मई को होने वाली मतगणना पर रोक लगा देंगे। मद्रास हाईकोर्ट द्वारा चुनाव आयोग को कटघरे में खड़ा करने के बाद इस विषय पर बहस शुरू हो गई है और यह अच्छा भी है क्योंकि इससे चुनाव आयोग अपनी कमियों के बारे में चिंतन-मनन करने को विवश होगा। 

जो भी हो, मद्रास हाईकोर्ट के माननीय न्यायाधीशों की टिप्पणियों की यदि उपेक्षा कर भी दी जाए तो भी इस बात से तो इंकार नहीं किया जा सकता कि सभी चुनावी राज्यों में कोरोना से बचाव संबंधी नियमों का सभी स्तरों पर घोर उल्लंघन होने के परिणामस्वरूप देश में किसी सीमा तक कोरोना के प्रसार में वृद्धि तो हुई ही है और इसके लिए जिम्मेदार लोगों के विरुद्ध उचित कार्रवाई होनी ही चाहिए।—विजय कुमार

सौजन्य - पंजाब केसरी।

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Tuesday, April 27, 2021

‘चंद आदर्श गांवों की कहानी’ जो ‘दूसरों के लिए बन रहे मिसाल’ (पंजाब केसरी)

हमारे अधिकांश गांव उपेक्षित और जीवन की बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं परंतु इसके बावजूद चंद गांवों की पंचायतें देश और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी का एहसास करते हुए लोक कल्याणकारी कदम उठाकर एक मिसाल पैदा कर रही हैं जिसके

हमारे अधिकांश गांव उपेक्षित और जीवन की बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं परंतु इसके बावजूद चंद गांवों की पंचायतें देश और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी का एहसास करते हुए लोक कल्याणकारी कदम उठाकर एक मिसाल पैदा कर रही हैं जिसके चंद उदाहरण निम्र में दर्ज हैं : 

* तेलंगाना के निजामाबाद जिले में गोदावरी नदी के किनारे स्थित ‘नालेश्वर’’ नामक गांव के प्रत्येक परिवार के सभी सदस्य चुस्त-दुरुस्त रहने के लिए हर सोमवार को उपवास रखते हैं।
* पंजाब के मोगा जिले के गांव ‘रणसींह कलां’ की पंचायत एन.आर.आई. भाईचारे के आर्थिक सहयोग से विधवाओं, बुजुर्गों और विकलांगों को पैंंशन, स्वास्थ्य बीमा आदि की सुविधाएं प्रदान कर रही है। 

‘नाना जी देशमुख राष्ट्रीय गौरव ग्राम सभा पुरस्कार’ व ‘दीनदयाल उपाध्याय पंचायत सशक्तिकरण पुरस्कार’ से सम्मानित यह पंचायत 70 जरूरतमंद विधवाओं, बुजुर्गों व विकलांगों को 750 रुपए मासिक पैंशन दे रही है। 
पंचायत छोटे किसानों को पराली न जलाने हेतु प्रोत्साहित करने के लिए 500 रुपए प्रति एकड़ क्षतिपूर्ति भी दे चुकी है। इसने अपना खुद का सीवरेज सिस्टम स्थापित करने के अलावा एक सीवरेज ट्रीटमैंट प्लांट भी लगाया है, जिसके द्वारा साफ किए हुए पानी को 100 एकड़ भूमि की सिंचाई के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। 

* श्रीनगर के गांदरबल जिले का ‘बाबा वाईल’ नामक गांव श्रीनगर का एकमात्र गांव है जहां गत 30 वर्षों से विवाह में फिजूलखर्ची, दहेज और आभूषण लेने पर पूर्ण पाबंदी है और हर समारोह सादगी से सम्पन्न होता है। कन्या पक्ष को कोई खर्च नहीं करना पड़ता। दूल्हे का परिवार लड़की वालों को खर्च के लिए 50,000 रुपए देता है। गांव के बुजुर्ग पंचायत के कामकाज पर नजर रखते हैं ताकि दहेज का लेन-देन न हो। पिछले 30 वर्षों में यहां घरेलू हिंसा और दहेज का एक भी मामला सामने नहीं आया। 

* मोगा के ‘साफूवाला’ गांव में 45 वर्ष से अधिक आयु के सभी लोगों ने कोरोना का टीका लगवा लिया है और इस प्रकार यह शत-प्रतिशत वैक्सीनेशन का लक्ष्य प्राप्त करने वाला पंजाब का पहला गांव बन गया है। हाल ही में एक दिन में 45 वर्ष से अधिक आयु के 330 गांववासियों ने टीका लगवाया। 
* मध्य प्रदेश के दमोह जिले के ‘हिनौता’ नामक गांव की पंचायत ने इस क्षेत्र में होने वाली चुनावी सभाओं में भीड़ के कारण संक्रमण का खतरा देखते हुए अपने यहां स्वैच्छिक कफ्र्यू लगा कर बाजार आदि बंद कर दिए। 

* मध्य प्रदेश में ही बैतूल के ‘बाचा’ गांव की पंचायत ने भी ‘स्वैच्छिक जनता कफ्र्यू’ लगा कर बाहरी लोगों के प्रवेश पर पाबंदी लगा दी है।
* गुजरात के ‘मेहसाणा’ जिले के ‘टरेटी’ नामक गांव में ‘सामुदायिक स्टीम बूथ’ बनाया गया है, जहां गांववासियों को गिलोय, नीम, अदरक और लौंग जैसी चीजों को उबाल कर तैयार किए गए औषधियुक्त और इम्यूनिटी बढ़ाने वाले घोल की भाप मुफ्त देने की व्यवस्था की गई है। 

* राजस्थान में सीकर जिले के ‘सुखपुरा’ गांव में पंचायत द्वारा किए गए सुरक्षात्मक उपायों का गांववासियों द्वारा सख्ती से पालन किए जाने के कारण पिछले 13 महीनों के दौरान कोरोना का एक भी केस नहीं आया। विभिन्न ग्राम पंचायतों द्वारा स्वास्थ्य ठीक रखने के लिए उपवास, विधवाओं और विकलांगों को पैंंशन व स्वास्थ्य सुविधाएं, दहेज पर रोक और कोरोना पर नियंत्रण के लिए उठाए गए कदम बहुत ही अनुकरणीय हैं। इस समय जबकि गांवों में भी कोरोना ने पैर पसारने शुरू कर दिए हैं तथा बिहार में पटना जिले के ही 100 गांव इसकी चपेट में आ गए हैं, गांवों में सुरक्षात्मक उपायों में तेजी लाना अत्यंत आवश्यक हो गया है। विशेषज्ञों ने यह चेतावनी दी है कि यदि गांवों में कोरोना फैल गया तो इस पर रोक लगाना बहुत ही मुश्किल हो जाएगा। 

ऐसे में कोरोना से बचाव के लिए ‘नालेश्वर’, ‘बाबा बाइल’, ‘साफूवाला’, ‘बाचा’, ‘हिनौता’, ‘टरेटी’ और ‘सुखपुरा’ आदि गांवों द्वारा उठाए जा रहे कदम दूसरों के लिए मिसाल हैं। देश के बाकी गांवों में भी ऐसे कदम जल्दी से जल्दी उठाने की जरूरत है ताकि इस खतरे को विकराल रूप धारण करने से रोका जा सके क्योंकि हमारे गांवों में कोरोना से बचाव के लिए जरूरी सुविधाएं तो एक ओर, अस्पताल और डाक्टर तक उपलब्ध नहीं हैं।—विजय कुमार 

सौजन्य - पंजाब केसरी।

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‘कोरोना से लड़ाई में’ ‘भारत आया अर्श से फर्श पर’ (पंजाब केसरी)

भारत कोविड-19 की दूसरी भयावह लहर के साथ संघर्ष कर रहा है। कहीं ऑक्सीजन के लिए मदद की गुहार लगा रहा है कहीं अस्पताल में एक बैड के लिए पुकार है, तो कोई दवाइयां ढूंढ रहा है। यहां तक कि इलाज के अभाव में रोगी का निधन होने पर श्मशान घाट में जगह और अंतिम संस्कार के लिए भी अब मदद चाहिए। दूसरी लहर की शुरूआत

भारत कोविड-19 की दूसरी भयावह लहर के साथ संघर्ष कर रहा है। कहीं ऑक्सीजन के लिए मदद की गुहार लगा रहा है कहीं अस्पताल में एक बैड के लिए पुकार है, तो कोई दवाइयां ढूंढ रहा है। यहां तक कि इलाज के अभाव में रोगी का निधन होने पर श्मशान घाट में जगह और अंतिम संस्कार के लिए भी अब मदद चाहिए। दूसरी लहर की शुरूआत के संकेत 1 अप्रैल से दिखाई दे रहे थे। इसके पीछे क्या कारण थे? लोग, सरकार, योजना आयोग, नौकरशाहों की नीतियां, कुम्भ मेला, चुनावी रैलियां, रमजान या सबकी अति-संतुष्ट व निशिं्चत मानसिक स्थिति कि कोरोना संक्रमण समाप्त हो गया है। यह सब घर से बाहर निकलने की व्याकुलता के कारण ऐसा हुआ! 

1 से 20 अप्रैल तक 20 दिनों में देश का चेहरा बदल गया! किसने इस स्थिति को नियंत्रण से बाहर कर दिया है, यह एक ऐसा मामला है जिसे गहराई से देखने  और जांचने की जरूरत है। फिलहाल तो पीड़ितों की मदद करने का समय है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने अपनी ओर से कोशिश की है कि न केवल दिल्ली में बल्कि अन्य जगहों में भी जहां इसकी जरूरत है, ऑक्सीजन की सप्लाई फिर से सामान्य की जा सके, और सरकार भी इसके लिए रेलों तथा हवाई जहाज से लेकर पुलिस और यहां तक कि सेना की मदद भी ले रही है।

भारतीय वायुसेना ने अपने पांच तरह के विमानों तथा हैलीकॉप्टरों को कोविड-19 के बिगड़ते हालात के बीच तैनात किया है जो लगातार देश के अलग-अलग हिस्सों में ऑक्सीजन से लेकर दूसरे जरूरी सामान की सप्लाई शुरू कर चुके हैं। जल्द से जल्द विभिन्न राज्यों तक ऑक्सीजन टैंकर विमानों से पहुंचाए जाने लगे हैं। भारतीय वायुसेना के विमान विदेशों से भी ऑक्सीजन लाने लगे हैं जिनमें सिंगापुर शामिल है। डिफैंस रिसर्च डिवैल्पमैंट ऑर्गेनाइजेशन (डी.आर.डी.ओ.) तथा डिफैंस पब्लिक सैक्टर अंडरटेकिंग्स (डी.पी.एस.यूज) भी राहत कार्यों में दिन-रात जुटे हुए हैं। डी.आर.डी.ओ. ने कई शहरों में अत्याधुनिक कोविड अस्पतालों की स्थापना की है और आगे भी कर रही है। 

ऐसे हालात में भारत की मदद के लिए बहुत से देश भी आगे आए हैं। उदाहरणस्वरूप जर्मनी। टाटा ग्रुप ने जर्मन कम्पनी ङ्क्षलडे के सहयोग के साथ 24 ऑक्सीजन ट्रांसपोर्ट टैंकों को पाने में सफलता हासिल की है जिन्हें ऑक्सीजन ट्रांसपोर्ट क्षमता को बढ़ाने के लिए भारत में एयरलिफ्ट किया जाएगा। जर्मनी की चांसलर एंजेला मार्केल ने कहा है कि उनकी सरकार भारत के लिए आपातकालीन मदद करने की तैयारी कर रही है। वहीं रिलायंस ग्रुप ने भी महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश तथा गुजरात जैसे राज्यों, जहां पर कोविड-19 के मामले बढ़ रहे हैं, में प्रतिदिन 700 टन से ज्यादा ऑक्सीजन की आपूर्ति को बढ़ाने के लिए प्रतिबद्धता जताई है। 

जहां एक ओर यू.पी. के व्यवसायी मनोज गुप्ता ने कोरोना वायरस संक्रमित मरीजों के उपचार के लिए एक रुपए की लागत से ऑक्सीजन सिलेंडरों को रिफिल करने के लिए अपना हाथ आगे बढ़ाया है, वहीं सिलीकॉन वैली के उद्यमी विनोद खोसला ने भी ऑक्सीजन के आयात को लेकर फंड देने का प्रस्ताव रखा। फ्रांसिसी गैस अग्रणी कम्पनी एयर लिक्विेड एस.ए. भारत में अपने औद्योगिक  ग्राहकों से ऑक्सीजन लेकर भारत के अस्पतालों में इसकी आपूर्ति कर रही है। इंगलैंड के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन का कहना है कि वह भारत की मदद करने के लिए तरीकों पर विचार कर रहे हैं। उनके अनुसार भारत एक महत्वपूर्ण सहयोगी है और उसे दी जाने वाली मदद में वैंटीलेटर तथा इलाज के लिए जरूरी अन्य चीजें शामिल हो सकती हैं। 

इंगलैंड की विदेश मंत्री लीसा नैंडी ने कहा कि यू.के. को भारत की हर तरह से सम्भावित मदद करनी चाहिए। उनके अनुसार यू.के. ‘जीनोम सीक्वैंसिंग’ तथा ‘एपिडेमियोलॉजी’ जैसे क्षेत्रों में भारत की मदद कर सकता है। वहीं पाकिस्तान के स्वयंसेवी समूह ‘अब्दुल सत्तार ईदी फाऊंडेशन’ ने कोविड-19 की दूसरी लहर से लड़ाई में भारत की मदद के लिए 50 एम्बुलैंस तथा सपोर्ट स्टाफ भेजने की पेशकश की है। संस्था ने भारत में अपनी एम्बुलैंसों, सपोर्ट स्टाफ, ड्राइवरों, तकनीशियनों तथा अन्यों के प्रवेश के लिए प्रधानमंत्री को पत्र लिखा है। संस्था के मैनेजिंग ट्रस्टी फैसल ईदी ने कहा, ‘‘भारत में हमारी जड़ें हैं। हमने सोचा है कि अपने पड़ोसी की ओर हमें मदद का हाथ बढ़ाना चाहिए।’’

चीन ने भी संकट की इस घड़ी में भारत की ओर मदद का हाथ बढ़ाया है। अमरीका की बात करें तो वैक्सीन तैयार करने वाले कच्चे माल के निर्यात पर लगाई गई पाबंदियों को हटाने के लिए फिलहाल वह किसी तरह का वायदा करने से कतरा रहा है परंतु सीनेटर एड मार्की का कहना है कि भारत की मदद करना अमरीका की ‘नैतिक जिम्मेदारी’ है। गौरतलब है कि गत वर्ष कोरोना की शुरूआत के बाद से ही भारत दुनिया की फार्मेसी बन गया था, जहां भारत ने हाइड्रोक्लोरोक्विन सबको भिजवाई वहीं पर 2020-21 के वित्तीय वर्ष के पहले 10 महीनों में पिछले वर्ष के मुकाबले दोगुनी ऑक्सीजन जरूरतमंद देशों को निर्यात की। भारत जो पूरे अफ्रीका, यूरोप और अन्य पूर्व एशियाई देशों में वैक्सीन की आपूर्ति कर रहा था, आज यह अर्श से फर्श पर आ गया है।

यह एक सबक है सरकार और भारत के लोगों के लिए जिसे सीखने की जरूरत है। महामारी इतनी जल्दी कहीं नहीं जा रही। अनेक देशों में इसकी तीसरी लहर भी आ चुकी है। ऐसे में केवल हमें ऐसे इंतजाम करने होंगे जिनसे निर्माण, उत्पादन, वितरण की देश भर में विशेष प्रणालियां पर्याप्त रूप में मजबूती से स्थापित की जा सकें। 

सौजन्य - पंजाब केसरी।

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पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट ने कहा- ‘लोग न सही ढंग से पहन रहे मास्क, न ही सोशल डिस्टैंसिंग और न बार-बार हाथ धो रहे’ (पंजाब केसरी)

देश में कोरोना की पहली लहर के बाद इसकी दूसरी लहर के अधिक तेजी से फैलने का एक बड़ा कारण लोगों द्वारा स्वास्थ्य विभाग के निर्धारित किए हुए बचाव के नियमों का पालन न करना भी है। स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी और नेतागण हमें बार-बार चेताते आ रहे हैं कि हमें अपने और परिवार की सुरक्षा के लिए कोरोना से बचाव के दिशा- निर्देशों का गंभीरतापूर्वक पालन करना...

देश में कोरोना की पहली लहर के बाद इसकी दूसरी लहर के अधिक तेजी से फैलने का एक बड़ा कारण लोगों द्वारा स्वास्थ्य विभाग के निर्धारित किए हुए बचाव के नियमों का पालन न करना भी है। स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी और नेतागण हमें बार-बार चेताते आ रहे हैं कि हमें अपने और परिवार की सुरक्षा के लिए कोरोना से बचाव के दिशा- निर्देशों का गंभीरतापूर्वक पालन करना चाहिए जिनमें सही ढंग से मुंह और नाक ढांप कर मास्क पहन कर रखना, सोशल डिस्टैंसिंग का पालन और बार-बार हाथ धोना शामिल है, परंतु इनका सख्ती से पालन नहीं हो रहा।

इसी को देखते हुए पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों, माननीय राजन गुप्ता और माननीय चरणजीत सिंह की खंडपीठ ने दोनों राज्यों की सरकारों तथा चंडीगढ़ के निकाय एवं स्वास्थ्य विभाग को लोगों द्वारा सही ढंग से मास्क पहनना यकीनी बनाने के निर्देश दिए हैं। उन्होंने सार्वजनिक व निजी संस्थानों के प्रमुखों को भी निर्देश दिया है कि वे अपने कर्मचारियों को ‘मास्क शिष्टïाचार’ अपनाने के लिए जागरूक करें। माननीय न्यायाधीशों ने स्पष्टï किया है कि ‘‘मास्क पहनने के नाम पर मुंह या नाक को खुला छोड़ देना गलत है जो मास्क न पहनने के बराबर ही है। अत: ऐसा करने वालों के विरुद्ध दंडात्मक कार्रवाई की जाए।’’

चूंकि सभी लोगों का घर के अंदर रह कर तो गुजारा नहीं हो सकता तथा रोजी-रोटी के लिए घर से बाहर निकलना ही पड़ेगा, अत: इस स्थिति में तो सुरक्षा नियमों का पालन करना और भी आवश्यक है क्योंकि किसी भी व्यक्ति की मृत्यु का मतलब उसके परिवार पर संकटों का पहाड़ टूट पडऩा ही है। इसी संदर्भ में हम अपने पाठकों से भी अनुरोध करेंगे कि भले ही वे अभी तक सुरक्षा संंबंधी नियमों के पालन में लापरवाही बरतते आए हों, परंतु अब उन्हें अपनी इस गलती को सुधार कर आज ही सही ढंग से मास्क पहनना, सोशल डिस्टैंसिंग व बार-बार हाथ धोने के नियमों का पालन शुरू करना चाहिए। 

अत: वर्तमान हालात में उक्त आदेश बिल्कुल सही है, जिस पर पूरे देश में ही कठोरतापूर्वक अमल होना चाहिए। इसके साथ ही हमें घरों से तभी बाहर निकलना चाहिए जब बहुत ही जरूरी हो।    
—विजय कुमार

सौजन्य - पंजाब केसरी।

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देश में ऑक्सीजन संकट: यदि चेतावनी पर ध्यान दिया होता तो आज स्थिति संकटपूर्ण न होती (पंजाब केसरी)

कोरोना महामारी के इस संकटकाल में मरीजों के इलाज के लिए वैक्सीन के एकाएक अभाव के बाद अब इलाज के लिए बहुत जरूरी ऑक्सीजन की कमी हो जाने से देश में मौतें बहुत बढ़ गई हैं। ‘ऑक्सीजन एमरजैंसी’ की स्थिति पैदा हो जाने से जहां ऑक्सीजन सिलैंडरों की ब्लैक होने लगी है, वहीं हालात इतने गंभीर हो चुके हैं कि एक अस्

कोरोना महामारी के इस संकटकाल में मरीजों के इलाज के लिए वैक्सीन के एकाएक अभाव के बाद अब इलाज के लिए बहुत जरूरी ऑक्सीजन की कमी हो जाने से देश में मौतें बहुत बढ़ गई हैं। ‘ऑक्सीजन एमरजैंसी’ की स्थिति पैदा हो जाने से जहां ऑक्सीजन सिलैंडरों की ब्लैक होने लगी है, वहीं हालात इतने गंभीर हो चुके हैं कि एक अस्पताल ने दिल्ली हाईकोर्ट में ऑक्सीजन की कमी का मुद्दा उठाकर मदद की गुहार लगाई, जिस पर न्यायालय ने केंद्र सरकार को फटकार लगाते हुए ऑक्सीजन का औद्योगिक इस्तेमाल रोकने को कहा है।

हालांकि अब केंद्र सरकार ऑक्सीजन को लेकर कड़े कदम उठाती नजर आ रही है परंतु इसी बीच यह खुलासा हुआ है कि गत वर्ष अप्रैल, अक्तूबर और फिर नवम्बर में इस संबंध में सरकार को बताया गया था। पिछले वर्ष 1 अप्रैल, 2020 को कोरोना से निपटने के संबंध में सुझाव देने के लिए केंद्र सरकार द्वारा गठित अधिकारी समूहों में से एक ने देश में आने वाले दिनों में ऑक्सीजन की सप्लाई में कमी आने की आशंका व्यक्त कर दी थी।

इसी समूह ने समस्या से निपटने के लिए ‘इंडियन गैस एसोसिएशन’ से तालमेल करके ऑक्सीजन की कमी पूरी करने का सुझाव दिया था। इस बैठक की अध्यक्षता नीति आयोग के सी.ई.ओ. अमिताभ कांत ने की थी। जिस समय यह चेतावनी दी गई थी तब देश में कोरोना संक्रमितों की संख्या मात्र 2000 थी तथा बाद में केस बढऩे के साथ-साथ ऑक्सीजन की कमी होने लगी।

इसके बाद 16 अक्तूबर, 2020 को स्वास्थ्य बारे संसद की स्थायी समिति ने मैडीकल ऑक्सीजन की उपलब्धता का मुद्दा उठाया और फिर 21 नवम्बर, 2020 को स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के सचिव ने संसद की स्थायी समिति को इस बारे लिखकर इसकी कीमत आदि तय करने को कहा था। यदि उक्त बातों पर उस समय ध्यान देकर इनकी गंभीरता समझी गई होती और अमल किया होता तो शायद आज देश में ऑक्सीजन की कमी से इतनी बड़ी संख्या में लोग नहीं मरते।
—विजय कुमार  

सौजन्य - पंजाब केसरी।

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Monday, April 19, 2021

कोरोना के प्रति लापरवाही से पहले डॉक्टरों तथा नर्सों के बारे में भी सोच लीजिए (पंजाब केसरी)

कोरोना की दूसरी लहर से इस समय सारा देश बेहाल है अगर आपके कोरोना वायरस टैस्ट करवाने की लाइन में 20,000 लोग आपसे आगे हों, अगर टैस्ट की रिपोर्ट 14 घंटों की बजाय कम से कम 2 दिन में आए, इलाज के लिए दवाइयों, आक्सीजन

कोरोना की दूसरी लहर से इस समय सारा देश बेहाल है अगर आपके कोरोना वायरस टैस्ट करवाने की लाइन में 20,000 लोग आपसे आगे हों, अगर टैस्ट की रिपोर्ट 14 घंटों की बजाय कम से कम 2 दिन में आए, इलाज के लिए दवाइयों, आक्सीजन उपकरणों, बैड्स और वैंटीलेटर की भी कमी हो तो निश्चित रूप से दिखाई देने वाली कहानी का एक और पक्ष बेहद गंभीर होगा। संक्रमण के लगातार बढ़ते आंकड़ों के चलते अनेक राज्य किसी न किसी रूप में कफ्र्यू तथा लॉकडाऊन लगाने के लिए मजबूर हो चुके हैं। 

कोरोना से ग्रस्त गम्भीर मरीजों की जान बचाने वाली ‘रेमडेसिविर’ तथा ‘टोसिलीजुमाब’ जैसी दवाइयों की भारी किल्लत के बीच सोशल मीडिया इन्हें उपलब्ध करवाने वालों की मदद की गुहार से भर चुका है। इसके बावजूद लोग कोरोना को लेकर उतने गम्भीर नहीं हैं जितना उन्हें होना चाहिए था। स्थिति की गम्भीरता का पता इसी बात से चल रहा है कि देश के अधिकतर बड़े शहरों की स्वास्थ्य व्यवस्था पूरी तरह चरमरा चुकी है। 

पहली लहर की तुलना में दूसरी लहर से निपटने के लिए डाक्टरों तथा चिकित्सा जगत से जुड़े अन्य लोगों की शारीरिक रूप से तैयारी बेहतर होने के बावजूद सबसे अधिक ङ्क्षचता की बात यह है कि दूसरी लहर में डॉक्टरों तथा चिकित्सा जगत से जुड़े अन्य लोगों का भी हाल खराब होने लगा है। 

पहली बार की तरह उनके पास मास्क से लेकर पी.पी.ई. किटों जैसे साजो-सामान की कमी नहीं है। अधिकतर डॉक्टर, नर्सों तथा अन्य मैडीकल स्टाफ को वैक्सीन भी दी जा चुकी है परंतु इस सबके बावजूद एक साल तक कोरोना से लड़ते हुए वे शारीरिक और मानसिक रूप से थक चुके हैं। गत वर्ष मार्च में जब कोरोना ने भारत में पैर पसारने शुरू किए थे उसके बाद इस वर्ष जनवरी-फरवरी में ही कुछ समय तक उन्हें थोड़ी राहत नसीब हुई जब कोरोना के मामलों की संख्या में काफी कमी आ गई थी परंतु आज की तारीख में दूसरी लहर के चरम की ओर बढऩे के बीच उनसे यह अपेक्षा करना बेमानी होगा कि उनके हौसले भी पहले की तरह मजबूत रहें। 

कोरोना की दूसरी लहर से बुरी तरह प्रभावित भारत की वित्तीय राजधानी मुम्बई के एक अस्पताल के ‘डा. लांसलोट पिंटो’ साल भर से कोरोना मरीजों के इलाज में व्यस्त रहे हैं। जनवरी में जब मामले कुछ कम हुए तो उन्हें लगा कि वह अपने परिवार के साथ अब कुछ चैन का समय गुजार सकेंगे परंतु अप्रैल आते-आते हालात पहले साल से भी बदतर हो गए जब प्रतिदिन कोरोना संक्रमण के मामलों ने देश में पहले 1 लाख और कुछ ही दिन बाद 2 लाख के आंकड़े को पार कर लिया। डा. पिंटो के अनुसार उनकी टीम में से कोई भी इस हालत के लिए मानसिक रूप से तैयार नहीं है। वह कहते हैं, ‘‘हम जो भी कर सकते हैं कर रहे हैं परंतु अब हममें पिछले वर्ष जैसी मानसिक शक्ति नहीं है।’’ 

दिल्ली का हाल भी कुछ अच्छा नहीं है। वहां के भी लगभग सभी निजी अस्पताल भर चुके हैं। गुरुग्राम के एक अस्पताल की डा. रेशमा तिवारी बसु के अनुसार दूसरी लहर अप्रत्याशित नहीं है क्योंकि इसके बारे में पहले से अंदेशा था परंतु इस बात से बहुत निराशा है कि लोग भूल चुके हैं कि महामारी अभी खत्म नहीं हुई है। अस्पतालों के बाहर जीवन सामान्य सा प्रतीत होता है रेस्तरां और नाइट क्लब खचाखच भरे हैं, बाजारों में भीड़ है, लम्बी शादियां, अनगिनत चुनावी रैलियों में लोगों की भीड़, कुंभ मेले में लाखों की गिनती में शामिल लोगों को अपने जीवन को खतरे में डालने का अधिकार तो है लेकिन दूसरों को नहीं। डा. यतिन मेहता इस पर क्रोधित हैं। उनके अनुसार भारत ने जनवरी तथा फरवरी में मिले मौके को हाथों से फिसल जाने दिया। उस अवधि को ‘टेस्टिंग’ व ‘ट्रेसिंग’ के साथ-साथ वैक्सीनेशन बढ़ाने के लिए इस्तेमाल किया जाना चाहिए था परंतु ऐसा नहीं किया गया। 

केरल राज्य के एर्नाकुलम मैडीकल कालेज की नर्स विद्या विजयन का कहना है कि अब हम पहली लहर से भी कहीं अधिक खतरनाक दूसरी लहर का सामना कर रहे हैं। वह कहती हैं कि लोगों को याद रखना चाहिए कि हैल्थकेयर वर्कर्स अपनी क्षमता से अधिक थक चुके हैं। अन्य चिकित्सा विशेषज्ञों की तरह उन्हें भी यही लगता है कि पता नहीं इस तरह कब तक वे काम कर सकेंगे परंतु इतना तय है कि दूसरी लहर हैल्थ वर्कर्स से लेकर सम्पूर्ण चिकित्सा व्यवस्था के लिए परीक्षा साबित होगी। उनके अनुसार,‘‘चिकित्सा कर्मियों की मानसिक सेहत पर इस समय किसी का ध्यान नहीं है।

जरा सोच कर देखिए कि जो भी काम आप करते हैं, उसे आपको दिन के 24 घंटे, सप्ताह के सातों दिन, वह भी आम से 100 गुणा अधिक दबाव में करना पड़े तो आपका क्या हाल होगा- जब कोरोना की दूसरी लहर अपने चरम पर होगी तो हर डॉक्टर, नर्स तथा हैल्थकेयर वर्कर का यही हाल होगा।’’ ऐसी सभी बातों को देखते हुए हमें सभी सावधानियां और उपायों को अपनाना होगा क्योंकि कोरोना से पार पाना अभी आसान नहीं। मुझे मशहूर शायर फैज अहमद फैज के शे’र की चंद पंक्तियां याद आ रही हैं : 


अभी चिराग-ए-सरे रह को कुछ खबर ही नहीं
अभी गरानि-ए-शब में कमी नहीं आई,
नजात-ए-दीद-ओ-दिल की घड़ी नहीं आई,
चले चलो कि वो मंजिल अभी नहीं आई।

सौजन्य - पंजाब केसरी।
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आज के ‘तनावपूर्ण माहौल में’‘प्रेम और सद्भाव के रौशन चिराग’ (पंजाब केसरी)

जहां एक ओर देश में कोरोना महामारी के बीच भी जाति और धर्म के नाम पर कुछ लोग नफरत फैला कर अपने कृत्यों से देश का माहौल बिगाड़ रहे हैं वहीं अनेक स्थानों पर हिन्दू और मुस्लिम समुदाय के सदस्य भाईचारे और सद्भाव के अनुकरणीय उदाहरण

जहां एक ओर देश में कोरोना महामारी के बीच भी जाति और धर्म के नाम पर कुछ लोग नफरत फैला कर अपने कृत्यों से देश का माहौल बिगाड़ रहे हैं वहीं अनेक स्थानों पर हिन्दू और मुस्लिम समुदाय के सदस्य भाईचारे और सद्भाव के अनुकरणीय उदाहरण भी पेश कर रहे हैं : 

* 15 जनवरी को राजस्थान के ‘प्रतापगढ़’ में एक मस्जिद के उद्घाटन के अवसर पर हिन्दू और मुस्लिम धर्मगुरुओं को आमंत्रित करके स्टेज पर बिठाया गया। सभी धर्मों की शिक्षाओं के बारे में प्रवचन दिए गए और भारत माता की जय के नारे लगाए गए। 
* 19 मार्च को गाजियाबाद में एक गरीब मुसलमान बच्चे की पिटाई का वीडियो वायरल होने के बाद उसकी सहायता के लिए सोशल मीडिया पर अपील की गई तो बड़ी संख्या में लोगों ने पैसे भेजे। सबसे ज्यादा रकम देने वाले दानी सज्जन हिन्दू थे।

* 22 मार्च को उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के ‘बारा’ गांव के रहने वाले शेर अली नामक मुस्लिम व्यक्ति ने एक अनाथ हिन्दू युवक पप्पू का विवाह एक हिन्दू युवती से करवाया। चार वर्ष की आयु में अनाथ हो गए पप्पू को शेर अली ने गोद लेकर पाला था जो अब 20 वर्ष का हो गया है। 
शेर अली ने खुद उसके सिर पर सेहरा बांधा, धूमधाम से बारात निकाली, बैंड-बाजा बजवाया और हिन्दू रीति से उसकी शादी करवाने के अलावा गृहस्थ जीवन में प्रवेश कर आगे का जीवन बिताने के लिए एक मकान भी बनवाकर दिया।
* 23 मार्च को बिहार के ‘आरा’ में वेद प्रकाश नामक अध्यापक ने प्रसव पीड़ा से जूझ रही मुस्लिम महिला को खून की जरूरत का पता चलने पर फौरन अस्पताल पहुंच कर खून देकर उसकी जान बचाई। 
* 03 अप्रैल को मध्य प्रदेश में ‘विदिशा’ जिले के ‘शेरपुर’ गांव में जब कुछ मुसलमान किसान मस्जिद में नमाज पढ़ रहे थे, तभी नफीस खान नामक एक किसान के खेत से शुरू होकर आग तेज हवा के चलते आसपास के खेतों में फैलने लगी जहां गेहूं की पकी फसल की कटाई चल रही थी। इसका पता चलने पर राहुल केवट के नेतृत्व में हिंदू युवकों का एक समूह आगे आया और जान जोखिम में डाल कर आग को फैलने से रोक कर लगभग 300 बीघा क्षेत्र में खड़ी गेहूं की फसल को जलने से बचाया। 

* 07 अप्रैल को मध्य प्रदेश के गुना जिले के ‘मृगवास’ कस्बे में रहने वाले युसूफ खान के बेटे इरफान की शादी थी। इस अवसर के लिए छपवाए निमंत्रण पत्र पर उन्होंने साम्प्रदायिक सौहार्द की अनूठी मिसाल पेश की।
उन्होंने कार्ड के एक ओर ‘श्रीगणेशाय नम:’ के साथ भगवान गणेश का चित्र छपवा कर इसके नीचे लिखा ‘‘ईश्वर अल्ला के नाम से हर काम का आगाज करता हूं, उन्हीं पर है भरोसा उन्हीं पर नाज करता हूं।’’ निमंत्रण पत्र के दूसरी ओर उन्होंने मुसलमानों का शुभ सूचक अंक ‘786’ अंकित किया। 
* 11 अप्रैल को केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने सबरीमाला मंदिर में पहुंच कर भगवान अयप्पा के दर्शन किए। 
* 12 अप्रैल को बिहार के दरभंगा जिले में एक कलियुगी बेटे ने अपने पिता की कोरोना वायरस से मौत के बाद उसका शव लेने से इंकार कर दिया तो मुस्लिम भाइयों ने हिन्दू रीति से उसका अंतिम संस्कार करवाया। 
* साम्प्रदायिक सौहार्द की एक अन्य मिसाल कानपुर की डा. माहे तलत सिद्दीकी नामक एक मुस्लिम अध्यापिका ने ‘राम चरित मानस’ की चौपाइयों का उर्दू में अनुवाद करके पेश की है। 

* 14 अप्रैल को राजस्थान में उदयपुर के रहने वाले अकील मंसूर नामक युवक ने गंभीर रूप से बीमार निर्मला और अलका नामक 2 कोरोना पीड़ित महिलाओं की जान बचाने के लिए रमजान के महीने में रोजा तोड़ कर अपना प्लाज्मा उन्हें डोनेट किया जिससे दोनों महिलाओं की जान बच गई।
* 16 अप्रैल को जम्मू-कश्मीर के डोडा जिले में एक सड़क दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल होने के कारण जी.एम.सी. जम्मू के आई.सी.यू. में उपचाराधीन दीपक कुमार नामक युवक के इलाज के लिए डोडा जिले के मुसलमान भाईचारे के सदस्यों ने जुम्मे की नमाज के बाद चंदा एकत्रित किया। 

उक्त उदाहरणों से स्पष्टï है कि भले ही कुछ लोग जाति, धर्म के नाम पर समाज में घृणा फैलाते हों पर इसी समाज में ऐसे लोग भी हैं जिनकी बदौलत देश और समाज में परस्पर प्रेमपूर्वक मिल-जुल कर रहने की भावना जिंदा है। जब तक भाईचारे और सद्भाव के ये बंधन कायम रहेंगे, हमारे देश की ओर कोई टेढ़ी आंख से देखने का साहस नहीं कर सकता।—विजय कुमार 

सौजन्य - पंजाब केसरी।
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Saturday, April 17, 2021

‘जजों के रिक्त स्थान जल्दी भरे जाएं’‘...ताकि करोड़ों लंबित केस जल्दी निपटें’ (पंजाब केसरी)

‘नैशनल ज्यूडीशियल डाटा ग्रिड’ (एन.जे.डी.जी.) के अनुसार देश की मातहत (हाईकोर्ट से नीचे के स्तर की) अदालतों में 3.81 करोड़ और हाईकोर्टों में 57 लाख केसों के अलावा 1 मार्च तक सुप्रीमकोर्ट में 66,000 से अधिक केस लंबित थे जबकि देश में कम से कम एक लाख से अधिक मामले ऐसे हैं जो 30 से अधिक वर्षों से लटकते आ रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट, हाईकोर्टों व निचली अदालतों में जजों की भारी कमी के चलते वहां लंबित मुकद्दमों के लग रहे अम्बार तथा हाईकोर्टों में न्यायाधीशों की नियुक्ति बारे केंद्र सरकार के रुख पर टिप्पणी करते हुए 25 मार्च को सुप्रीमकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश माननीय एस.ए. बोबडे ने कहा कि :

‘‘6 महीने पहले कोलेजियम ने जो सिफारिशें की थीं उन पर अभी तक केंद्र सरकार द्वारा कोई निर्णय न लेना चिंताजनक है जबकि सुप्रीम कोर्ट द्वारा कुछ नामों की सिफारिश किए हुए तो एक वर्ष हो गया है।’’ इसी सिलसिले में 15 अप्रैल को मुख्य न्यायाधीश बोबडे, न्यायमूर्ति संजय किशन कौल और न्यायमूर्ति सूर्यकांत पर आधारित खंडपीठ ने सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट के जजों की नियुक्ति के लिए सुप्रीमकोर्टके कोलेजियम द्वारा डेढ़ वर्ष पूर्व की गई 10 नामों की सिफारिशों पर 3 महीनों के भीतर अमल करने की हिदायत दी। इसके साथ ही माननीय न्यायाधीशों ने अटार्नी जनरल के. वेणुगोपाल से पूछा, ‘‘आखिर कोलेजियम की सिफारिशों पर अमल करने में सरकार कितना समय लगाएगी? इसके लिए कोई तर्कसंगत समय सीमा बताई जाए।’’ 

जवाब में के. वेणुगोपाल ने अदालत को आश्वस्त किया कि ‘‘जुलाई 2019 में हाईकोर्ट के जज नियुक्त करने के लिए सुप्रीमकोर्ट कोलेजियम द्वारा भेजे 10 नामों पर तीन महीने के अंदर विचार करके कोलेजियम को सूचित करेगी तथा ‘मैमोरैंडम आफ प्रोसीजर’ में तय समय सीमा का पालन किया जाएगा।’’  इसके साथ ही उन्होंने नामों को मंजूरी देने में देरी के लिए सिफारिशें समय पर नहीं भेजने के मामले में हाईकोर्टों को जिम्मेदार ठहराया। 
इस पर खंडपीठ ने कहा, ‘‘यह मामला आप हम पर छोड़ दीजिए।’’ 

जो भी हो, देश की शीर्ष अदालतों के साथ-साथ निचली अदालतों में जजों की कमी अत्यंत गंभीर मामला है जिसके कारण न्याय प्रक्रिया बाधित हो रही है। अत: इस संबंध में तमाम अड़चनों को दूर कर जजों की नियुक्ति में तेजी लाना ही समय की मांग है क्योंकि समय पर न्याय न मिलने से क्षुब्ध होकर पीड़ित कई बार कानून अपने हाथों में ले लेते हैं जिससे अपराधों में वृद्धि होती है।

-विजय कुमार                                              

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Friday, April 16, 2021

‘चंद महिलाओं द्वारा’ ‘शिक्षाप्रद और प्रेरणादायक उदाहरण’ (पंजाब केसरी)

आज प्रतिकूल हालात में जीने के बावजूद अनेक महिलाएं देश और समाज के प्रति अपने सरोकार की अभिव्यक्ति करते हुए समाज में व्याप्त बुराइयों को दूर करने और देश के विकास में अपना...

आज प्रतिकूल हालात में जीने के बावजूद अनेक महिलाएं देश और समाज के प्रति अपने सरोकार की अभिव्यक्ति करते हुए समाज में व्याप्त बुराइयों को दूर करने और देश के विकास में अपना महत्वपूर्ण योगदान डाल रही हैं, जिसके ताजा उदाहरण निम्र में दर्ज हैं : 

* हिमाचल प्रदेश के लाहौल-स्पीति जिले के काजा गांव की युवा महिला प्रधान सोनम डोलमा के नेतृत्व में गांव की पंचायत ने जुआ, खुले में शौच, इधर-उधर कूड़ा फैंक कर गंदगी फैलाने और सार्वजनिक स्थलों पर मदिरापान आदि बुराइयों को समाप्त करने में सफलता पाई है। सर्वसम्मति से पारित प्रस्ताव के अनुसार पंचायत के अधीन कहीं भी जुआ और ताश नहीं खेली जाएगी। ऐसा करते पकड़े जाने पर बालिग को 40,000 रुपए और नाबालिग को 5000 रुपए जुर्माने का प्रावधान किया गया है। खुले में कूड़ा फैंकने वाले को 1000 रुपए जुर्माना करने के अलावा उसी व्यक्ति से कूड़ा उठवाने तथा खुले में शौच करने पर 10,000 रुपए जुर्माना तय किया गया है। गांव में मौजूद शराब के दो ठेके बाहर निकालने के लिए भी पंचायत ने संबंधित अधिकारियों को लिखा है।

* मध्य प्रदेश में पिथौरागढ़ के बागेश्वर जिले के जैतोली गांव की महिलाओं ने भी अपनी ग्राम प्रधान मालती देवी के नेतृत्व में 3 वर्ष संघर्ष करके अपने गांव को शराब मुक्त करने में सफलता प्राप्त की है और यहां शराब बेचने पर 10,000 रुपए तथा पीने पर 5000 रुपए जुर्माने का नियम लागू कर दिया है। यह फैसला भी किया गया कि किसी व्यक्ति के पास शराब की खाली बोतल भी दिखाई दी तो उसे भी 500 रुपए जुर्माना किया जाएगा। महिलाओं के कड़े स्टैंड के दम पर आज यह गांव शराब की लानत से मुक्त हो चुका है। गांव की पंचायत ने जुर्माने के रूप में वसूल की गई रकम महिलाओं को विभिन्न हस्तकलाओं का प्रशिक्षण देने पर खर्च करने का निर्णय लिया है। 

* सीमाओं की सुरक्षा के मामले में भी महिलाएं किसी से पीछे नहीं हैं। हाल ही में भारतीय सेना की ‘असम राइफल्स’ में कायम किए गए ‘राइफल वुमन’ नामक अद्र्धसैनिक समूह में 200 महिलाएं शामिल की गई हैं जिन्हें म्यांमार के साथ लगती सीमा की निगरानी करने के साथ-साथ देश के उत्तर-पूर्वी भाग में हिंसा और विध्वंसक गतिविधियों पर नजर रखने की जिम्मेदारी दी गई है। महिलाओं के इस अद्र्धसैनिक बल की सहायता से अब सेना को सीमांत क्षेत्रों में महिला यात्रियों को ले जा रहे वाहनों की तलाशी लेने और नशीली दवाओं, नशीले पदार्थों तथा अवैध हथियारों की तस्करी आदि का पता लगाने में काफी आसानी हो गई है।  ये महिलाएं भारत-म्यांमार सीमा पर गश्त करती हैं, जहां चीन की सहायता से चलने वालेे गिरोहों द्वारा नशीले पदार्थों तथा अवैध हथियारों की तस्करी करवाई जा रही है। 

* नारी शक्ति का एक ताजा उदाहरण 25 मार्च को दिल्ली में ईनामी गैंगस्टर रोहित चौधरी और उसके साथियों के साथ पुलिस की मुठभेड़ में शामिल इंस्पैक्टर प्रियंका शर्मा ने पेश किया जिन्हें मुकाबले के दौरान अपराधियों द्वारा चलाई गई एक गोली भी लगी। इस मुठभेड़ में 2 गैंगस्टर मारे गए थे।
* हिमाचल प्रदेश की पहली महिला बस चालक सीमा ठाकुर ने 31 मार्च को पहली बार अंतर्राज्यीय शिमला-चंडीगढ़ रूट पर हिमाचल परिवहन की बस चला कर इतिहास रचा। सीमा ने अंग्रेजी में एम.ए. करने के बावजूद ड्राईवर की नौकरी को पेशे के रूप में चुना। 

* नारी शक्ति की एक मिसाल 7 अप्रैल को बलाचौर में बैंक से पंद्रह हजार रुपए पैंशन निकलवा कर लौट रही 70 वर्षीय बुजुर्ग फूलन कुमारी ने पेश की। एक लुटेरे ने थैला छीनने के लिए उन पर हमला कर दिया परंतु इन्होंने थैला नहीं छोड़ा और लुटेरे का डट कर मुकाबला किया। अंतत: लोगों को आते देख लुटेरा थैला छोड़ कर भाग गया। नारी शक्ति के उक्त उदाहरणों से स्पष्ट है कि आज के प्रतिकूल हालात के बीच यदि ये महिलाएं अपने दम पर और परिवार तथा समाज के सहयोग से सफलता की मंजिलें तय कर सकती हैं तो अन्य महिलाएं भी ऐसा कर सकती हैं। आवश्यकता है बस अपने भीतर की ‘दुर्गा’ को जगाने और डट जाने की तथा बकौल शायर यह महसूस कर लेने की कि : 

मैं हूं झांसी की शमशीर, मैं हूं अर्जुन का तीर,
मैं सीता का वरदान, दे सकती हूं बलिदान,
मैं भीम की हूं झंकार, लडऩे-मरने को तैयार, 
मुझे समझो न कमजोर लोगो, समझो न कमजोर।-विजय कुमार  

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Wednesday, April 14, 2021

‘बिजली के जर्जर और ढीलेे-ढाले तारों से’ ‘लोगों के सिरों पर मंडराती मौत’ (पंजाब केसरी)

देश के अनेक भागों में बेतरतीब और असुरक्षित ढंग से लटकते, ढीले-ढाले तथा सुरक्षा नियमों का पालन किए बिना लापरवाही से लगाए हुए बिजली के खम्भे तथा तार लोगों के जान-माल के लिए खतरा बने हुए हैं। कई घ

देश के अनेक भागों में बेतरतीब और असुरक्षित ढंग से लटकते, ढीले-ढाले तथा सुरक्षा नियमों का पालन किए बिना लापरवाही से लगाए हुए बिजली के खम्भे तथा तार लोगों के जान-माल के लिए खतरा बने हुए हैं। कई घनी आबादी वाले इलाकों में कई जगह ये तार इतना नीचे लटक रहे हैं कि मकानों की छतों तक को छू रहे हैं जिससे बारिश तथा आंधी-तूफान आने पर इनसे खतरा और भी बढ़ जाता है। 

देश में इस कारण होने वाली मौतों के अलावा अनेक लोग जीवन भर के लिए अपंग हो रहे हैं। 2019 में राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो द्वारा दिए गए आंकड़ों के अनुसार भारत में प्रतिदिन कम से कम 30 मौतें करंट लगने की वजह से होती हैं जिनके हाल ही के चंद ताजा उदाहरण निम्र में दर्ज हैं : 

* 17 जनवरी को राजस्थान के जालौर जिले के महेशपुरा गांव में यात्रियों से भरी बस के एक सड़क के ऊपर से गुजर रहे बिजली के तार की चपेट में आ जाने से बस में करंट दौड़ गया और 6 लोगों की मौत हो गई।
* 19 जनवरी को नोएडा में एक क्रेन बिजली के हाई टैंशन तार से टकरा जाने से क्रेन में सवार एक मजदूर झुलस कर मर गया।
* 25 फरवरी को बलिया के बैरिया थाना क्षेत्र में बिजली का नंगा तार टूट कर वहां से गुजर रहे 3 युवकों पर गिर जाने से उनकी जान चली गई।
* 11 मार्च को करनाल के नीलोखेड़ी में नंगे बिजली के तारों की चपेट में आ जाने से एक मजदूर चल बसा। 

* 26 मार्च को मथुुरा में यात्रियों से भरी एक बस सड़क के ऊपर से गुजर रहे 11000 वोल्ट के हाई टैंशन तारों की चपेट में आ गई जिससे एक व्यक्ति की मौत तथा 6 अन्य घायल हो गए।
* 26 मार्च के दिन ही लुधियाना के ढंडारीकलां की मक्कड़ कालोनी में 14 वर्षीय बच्चा घर की छत पर खेलते समय हाई टैंशन तार की चपेट में आकर बुरी तरह झुलस गया। 
* 29 मार्च को प्रतापगढ़ में खेत में टूट कर गिरे हाई वोल्टेज तार की चपेट में आने से पति-पत्नी की जान चली गई। 
* 29 मार्च को ही मैनपुरी के लहरा गांव में बहुत नीचे झूल रहे हाई टैंशन तार के करंट ने वहां से गुजर रहे 2 युवकों के प्राण ले लिए। 

* 30 मार्च को प्रयागराज में ‘खीरी’ इलाके के एक गांव के कई मकानों पर 11000 वोल्ट का हाई टैंशन तार टूट कर गिर जाने से उनमें करंट आ गया जिससे एक युवक की मौत तथा कई अन्य लोग बुरी तरह झुलस गए।
* 2 अप्रैल को आजमगढ़ के ‘घोरठ’ गांव में काफी नीचे लटक रहे हाई टैंशन तार के साथ एक बुजुर्ग का छाता छू जाने से छाते में आए करंट ने बुजुर्ग की जान ले ली।  
* 4 अप्रैल को बलिया के बैरिया थाना क्षेत्र के एक गांव में टूट कर जमीन पर गिरे बिजली के तार की चपेट में आ जाने से एक युवक मारा गया।
* 12 अप्रैल को अमृतसर में छत पर कपड़े सुखाने गई दो सगी बहनें मकान के ऊपर से गुजर रहे 66 के.वी. बिजली के तारों के टकराने से निकली चिंगारियों से झुलस गईं जिन्हें गंभीर हालत में इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती करवाया गया। 

हालांकि भारत ने हर क्षेत्र में प्रगति की है लेकिन कुछ क्षेत्र अभी भी ऐसे हैं जहां स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ। इनमें बिजली विभाग भी एक है। इसने पिछले कुछ वर्षों में कुछ क्षेत्रों में तरक्की तो की है लेकिन सुरक्षा के स्तर पर इसकी हालत अभी भी बहुत असंतोषजनक है। लोगों की आम शिकायत है कि बार-बार शिकायत करने के बावजूद  जर्जर, ढीले-ढाले तथा झूल रहे तारों को जल्दी ठीक नहीं किया जाता और न ही टूट कर गिरे हुए तारों को जल्दी उठाया जाता है। 

तेज हवा के कारण अक्सर दुर्घटनाएं होती हैं जिनसे बचने के लिए विदेशों की भांति अंडरग्राऊंड तार बिछाने की आवश्यकता है परन्तु हमारे यहां इस दिशा में कोई विशेष प्रगति नहीं हुई है। जहां तक नागरिक आबादी वाले इलाकों के ऊपर गुजर रहे तारों के जाल का संबंध है, ये दुर्घटनाएं सही ढंग से जोड़ न लगाने से हो रही हैं। अत: जब तक अधिकारी इस समस्या को दूर करने के लिए दृढ़ इच्छाशक्ति का प्रदर्शन नहीं करेंगे तब तक इस प्रकार की दुर्घटनाएं होती ही रहेंगी। इसके साथ ही बिजली के तार टूटने आदि के परिणामस्वरूप करंट लगने से होने वाली दुर्घटनाओं के पीड़ितों को मुआवजा देने व दोषी अधिकारियों एवं कर्मचारियों के लिए कठोर दंड का प्रावधान करने की भी जरूरत है।—विजय कुमार          

सौजन्य - पंजाब केसरी।

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‘समाज विरोधी तत्वों द्वारा’‘सरकारी कर्मचारियों पर हमलों में तेजी’ (पंजाब केसरी)

आज जहां देश में भ्रष्टाचार, कोरोना महामारी तथा महंगाई ने लोगों का जीना दूभर कर रखा है, वहीं समाज विरोधी तत्वों द्वारा ऐसी घड़ी में अपनी ड्यूटी निभा रहे सरकारी विभागों के कर्मचारियों पर हमलों का शर्मनाक सिलसिला लगातार जारी है। समाज

आज जहां देश में भ्रष्टाचार, कोरोना महामारी तथा महंगाई ने लोगों का जीना दूभर कर रखा है, वहीं समाज विरोधी तत्वों द्वारा ऐसी घड़ी में अपनी ड्यूटी निभा रहे सरकारी विभागों के कर्मचारियों पर हमलों का शर्मनाक सिलसिला लगातार जारी है। समाज विरोधी तत्वों के हौसले इतने बढ़ चुके हैं कि वे अपने मार्ग में बाधा बनने वाले किसी भी व्यक्ति की हत्या तक करने से संकोच नहीं करते। इनके द्वारा मात्र 18 दिनों में देश और समाज विरोधी दुष्कृत्यों के उदाहरण निम्र में दर्ज हैं: 

* 25 मार्च को मेरठ के परीक्षितगढ़ क्षेत्र में अवैध रेत खनन रोकने पहुंची वन विभाग की टीम पर खनन माफिया ने लाठियों से हमला करके वन विभाग के दारोगा सहित कई कर्मचारियों को घायल कर दिया। 
* 04 अप्रैल को भोपाल के ‘काजी कैम्प’ में नाइट कफ्र्यू के दौरान खुली दुकानें बंद करवाने पहुंची पुलिस टीम पर लोगों ने हमला कर दिया और उन पर उबलती हुई चाय की केतलियां उंडेल दीं। मकानों की छतों से महिलाओं ने भी पथराव किया जिससे एक ए.एस.आई. सहित 3 पुलिस कर्मचारी घायल हो गए। 

* 07 अप्रैल को जलालाबाद के गांव ‘ढाणी अमीर खास’ में पुलिस ने जब कुछ युवकों को अपने ‘बुलेट’ मोटरसाइकिल से पटाखे मारने से रोका तो आरोपियों ने एक ए.एस.आई. और होमगार्ड के जवान की वॢदयां फाड़ डालीं। 
* 08 अप्रैल को हिमाचल के उपमंडल ‘बंगाणा’ की ‘तनोह’ पंचायत में लोक निर्माण विभाग ‘लठियाणी’ के जूनियर इंजीनियर अशोक राज और ग्राम पंचायत प्रधान शकुंतला देवी जब गांव की एक सड़क के नवीनीकरण का निरीक्षण करने पहुंचे तो एक बाप-बेटे ने जे.ई. पर लाठी से हमला करके उसे घायल कर दिया।   
* 09 अप्रैल को कुशीनगर में ‘कप्तानगंज’ के ‘पचार’ गांव में पति-पत्नी का विवाद निपटाने पहुंची पुलिस टीम पर महिला के पति ने ईंट-पत्थर बरसाने शुरू कर दिए जिससे एक पुलिस कर्मचारी घायल हो गया। 

* 10 अप्रैल को पश्चिम बंगाल के पनतापारा में लूट की घटना के संबंध में छापेमारी करने पहुंचे बिहार के किशनगंज जिले के पुलिस अधिकारी अश्विनी कुमार को घटनास्थल पर मौजूद ग्रामीणों ने पीट-पीट कर मार डाला। उनकी मौत के सदमे में अगले दिन उनकी मां की भी मृत्यु हो गई।
* 10-11 अप्रैल की दरम्यानी रात को जालंधर के मॉडल हाऊस इलाके में नाइट कफ्र्यू के दौरान चैकिंग करने गए ‘भार्गव कैम्प’ के एस.एच.ओ. भगवंत सिंह भुल्लर पर कुछ लोगों ने हमला कर दिया जिससे उनके नाक की हड्डी टूट गई। 

* 11 अप्रैल को अबोहर में अवैध शराब तस्करों को पकडऩे गई पुलिस की टीम पर लोगों ने हमला कर दिया, जिससे कुछ पुलिस कर्मियों को चोटें आईं और लोगों ने पथराव करके डी.एस.पी. की गाड़ी के शीशे भी तोड़ दिए। 
* 11 अप्रैल को ही थाना सदर नाभा के गांव ‘धारोकी’ में ठगी के मामले में भगौड़े आरोपी को गिरफ्तार करने गई पुलिस पार्टी पर आरोपी के परिवार ने हमला कर दिया। इसके परिणामस्वरूप 2 पुलिस कर्मी घायल हो गए।
* 11 अप्रैल वाले दिन ही बिहार के ‘कटिहार’ जिले में पुलिस द्वारा पकड़े गए एक आरोपी को छुड़वाने के लिए गांव वालों ने पुलिस पार्टी पर लाठियों और डंडों से हमला करके एक ए.एस.आई. समेत 4 पुलिस कर्मियों को घायल कर दिया। 

* 11 अप्रैल को ही ‘चित्रकूट’ में लॉकडाऊन का पालन करवाने पहुंचे प्रशासनिक अधिकारियों व नगर परिषद की टीम पर लोगों ने हमला करके लगभग आधा दर्जन वाहनों के शीशे तोड़ डाले और 4 कर्मचारियों को घायल कर दिया। 
* 12 अप्रैल को पंजाब सरकार की हिदायतों पर बटाला के निकट गांव ‘पंजगराइयां’ में घर-घर जाकर बच्चों को सरकारी स्कूल में दाखिल करवाने के लिए प्रेरित कर रही अध्यापिका संतोष रानी पर अचानक पीछे से किसी व्यक्ति ने दातर से हमला करके उसे गंभीर रूप से घायल कर दिया। उक्त घटनाओं से स्पष्ट है कि आज समाज विरोधी तत्वों की ऐसी गतिविधियां किसी एक क्षेत्र तक सीमित न रह कर पूरे देश में हो रही हैं और आम आदमी ही नहीं बल्कि प्रशासन भी इनके हाथों पंगु हो रहा है। 

अत: जब तक ऐसे समाज विरोधी लोगों और उनको शह देने वाले तत्वों का पता लगा कर उनके विरुद्ध कड़ी कार्रवाई नहीं की जाएगी तब तक अपनी ड्यूटी निभाने वाले कत्र्तव्यपरायण अधिकारियों और कर्मचारियों पर समाज विरोधी तत्वों के हमले इसी प्रकार जारी रहेंगे और बाद में आम आदमी भी इसकी लपेट में आ जाएगा।—विजय कुमार 

सौजन्य - पंजाब केसरी।

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Saturday, April 10, 2021

‘अभी तक कैंसर व एड्स का इलाज नहीं मिला’ ‘क्या कोरोना का मिल जाएगा!’ (पंजाब केसरी)

दुनिया में असंख्य लोगों की मौत का कारण बन चुकी दो जानलेवा बीमारियों कैंसर और एड्स को अस्तित्व में आए एक शताब्दी से भी अधिक समय बीत चुका है। इतने वर्ष बीत जाने के बाद भी चिकित्सा जगत अभी

दुनिया में असंख्य लोगों की मौत का कारण बन चुकी दो जानलेवा बीमारियों कैंसर और एड्स को अस्तित्व में आए एक शताब्दी से भी अधिक समय बीत चुका है। इतने वर्ष बीत जाने के बाद भी चिकित्सा जगत अभी तक इनका अचूक इलाज नहीं खोज पाया जबकि गत वर्ष दुनिया में एक और खतरनाक महामारी ‘कोरोना’ ने तबाही मचानी शुरू करके चिकित्सा जगत के लिए एक और चुनौती खड़ी कर दी है। 

हालांकि कोरोना के प्रकोप में हाल ही में कुछ समय के लिए कमी आती दिखाई दी थी परंतु फिर एकाएक इसकी पहली लहर से भी अधिक खतरनाक दूसरी लहर आ जाने से इससे होने वाली मौतों में भारी वृद्धि हो गई है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार यह सोचना गलत होगा कि यह 2021 के अंत तक समाप्त हो जाएगा तथा 2022 तक भी इससे मुक्ति मिलने की संभावना नहीं है। 

इसी को देखते हुए यूरोप, अमरीका, आस्ट्रेलिया और जापान के 24 वैज्ञानिकों के एक अंतर्राष्ट्रीय समूह ने कहा है कि संभवत: यह वायरस चीन में वुहान की प्रयोगशाला की बजाय वन्य जीवों से आया होगा। अत: इसकी उत्पत्ति जानने के लिए इस मामले में नए सिरे से शोध करने की जरूरत है। 

विडम्बना यह भी है कि जानवरों से इंसानों में फैलने वाले ‘कोरोना’ वायरस की भांति और भी हजारों वायरस इंसानों में फैलने के लिए तैयार हैं। अत: इस मामले में बचाव के उपायों में तेजी लाने की आवश्यकता है। हालत यह है कि आम लोगों के साथ-साथ कोरोना पीड़ितों का इलाज करने वाले कोरोना योद्धा अर्थात डाक्टर, नर्सें आदि बड़ी संख्या में इसका शिकार हो रहे हैं। कोरोना की वर्तमान लहर में दिल्ली के सर गंगा राम अस्पताल के 37 डाक्टर कोरोना से संक्रमित पाए गए हैं। 

2 फरवरी, 2021 को राज्यसभा में सरकार ने बताया था कि भारत में इस वर्ष 22 जनवरी तक 162 डाक्टरों, 107 नर्सों और 44 आशा वर्करों की कोरोना से मौत हुई जबकि ‘इंडियन मैडीकल एसोसिएशन’ ने 3 फरवरी को इन आंकड़ों को कम बताते हुए कहा कि देश में कोरोना से 734 डाक्टरों ने प्राण गंवाए हैं। 

धार्मिक समारोहों और चुनावी रैलियों में शामिल अधिकांश लोगों के मास्क न पहनने की शिकायतों में भारी वृद्धि हुई है। इसी के दृष्टिगत चुनावी राज्यों में चुनाव प्रचार में शामिल प्रत्येक व्यक्ति के लिए मास्क का इस्तेमाल अनिवार्य बनाने के लिए दायर जनहित याचिका पर दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार और चुनाव आयोग से जवाब मांगा है।

इसी तरह की स्थिति को देखते हुए अधिकांश राज्यों में रात्रि कफ्र्यू तथा सार्वजनिक स्थलों आदि में प्रवेश के नए आदेश दिए गए हैं तथा मास्क न लगा कर सुरक्षा संबंधी नियमों का उल्लंघन करने वालों को जुर्माने किए जा रहे हैं। भारत में बढ़ रहे कोरोना के मामलों को देखते हुए ही न्यूजीलैंड आदि कुछ देशों में भारतीयों के प्रवेश पर अस्थायी रोक लगा दी गई है या वहां भारत से आने वाले यात्रियों को कुछ दिनों के लिए क्वारंटाइन किया जा रहा है। 

उल्लेखनीय है कि विकसित देशों के मुकाबले टीकाकरण में भारत इस समय पिछड़ गया है और देश की मात्र 6 प्रतिशत आबादी का ही टीकाकरण हो पाया है जबकि अमरीका में यह आंकड़ा 33 प्रतिशत है अत: स्थिति पर काबू पाने के लिए टीकाकरण तेज करना अत्यंत आवश्यक है। जो भी हो कोरोना के कारण लोगों का कामकाज प्रभावित हुआ है। कुछ राज्यों से प्रवासी श्रमिकों का पलायन एक बार फिर शुरू हो गया है और समाज के निचले वर्ग के लोगों की तकलीफें बहुत बढ़ गई हैं।इस तरह के हालात के बीच सरकार के लिए भी दुविधापूर्ण स्थिति बनी हुई है। यदि सरकार प्रतिबंध नहीं खोलती और शिक्षा संस्थानों तथा व्यापार व्यवसाय के चलने पर रोक लगाती है तो लोगों का आॢथक नुक्सान होता है और सरकार पर लोगों की रोजी-रोटी छीनने का आरोप लगता है। 

दूसरी ओर यदि हालात कुछ सामान्य होते दिखाई देने पर सरकार प्रतिबंधों में कुछ ढील देकर कारोबारी एवं शिक्षा संस्थानों, मैरिज पैलेसों, सिनेमा घरों आदि को खोल कर गतिविधियों की छूट देती है तो उस पर संक्रमण फैलाने में योगदान देने का आरोप लगता है और मूल्यवान प्राणों का नुक्सान होता है। ऐसे में सरकार द्वारा किए जा रहे सुरक्षा प्रबंधों के बावजूद समस्या जारी रहने के कारण यही कहा जा सकता है कि : न खुदा ही मिला न विसाले सनम, न इधर के रहे न उधर के रहे।—विजय कुमार 
    

सौजन्य - पंजाब केसरी।

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Friday, April 9, 2021

विश्व में संसदों की प्रतिष्ठा को आघात आस्ट्रेलिया की संसद में ‘अश्लील हरकतें’ (पंजाब केसरी)

लोकतंत्र में संसद को जनता के हितों की पहरेदार माना जाता है परंतु आज विश्व के कुछ देशों में संसदों की गरिमा पर ही आंच आने लगी है जिसके परिणामस्वरूप लोकतंत्र को आघात पहुंच रहा है। उदाहरणस्वरूप उत्तरी कोरिया में एक दशक से अधिक

लोकतंत्र में संसद को जनता के हितों की पहरेदार माना जाता है परंतु आज विश्व के कुछ देशों में संसदों की गरिमा पर ही आंच आने लगी है जिसके परिणामस्वरूप लोकतंत्र को आघात पहुंच रहा है। उदाहरणस्वरूप उत्तरी कोरिया में एक दशक से अधिक समय से सत्तारूढ़ तानाशाह ‘किम जोंग’ ने संसद के तमाम अधिकार छीन कर देश को हर लिहाज से कंगाल बना दिया है जहां आम लोगों का जीना दूभर होता जा रहा है। इसके विपरीत अतीत में इसी का अभिन्न अंग रहा दक्षिण कोरिया अपनी लोकतंत्रवादी नीतियों के चलते आज विश्व के समृद्ध देशों में गिना जाता है। 

संसदीय परम्पराओं के दमन का एक अन्य उदाहरण रूस पर सन् 2000 से काबिज राष्ट्रपति ‘व्लादिमीर पुतिन’ हैं जिन्होंने सत्ता की हवस में संसद में अपने विरोधियों की आवाज दबा कर सन 2036 तक अपने राष्ट्रपति बने रहने का विधेयक पारित करवा लिया है।

अमरीका की संसद ‘कैपिटल हिल’ को सबसे बड़ी चोट पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने 6 जनवरी को पहुंचाई जब उनके समर्थकों द्वारा ‘कैपिटल हिल’ में की जा रही भारी तोड़-फोड़ रोकने के लिए पुलिस द्वारा गोली चलाने से 4 लोगों की मौत हो गई तथा अनेक लोग घायल हो गए। इससे पूर्व अमरीकी संसदीय परम्परा को अमरीका के पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने अपने कार्यालय में एक कर्मचारी मोनिका लेविंस्की के साथ ओरल सैक्स करके ठेस पहुंचाई थी जिसके लिए उन्हें 1998 में महाभियोग का सामना करना पड़ा और देशवासियों से माफी मांगनी पड़ी थी। 

इसी प्रकार म्यांमार में सेना द्वारा संसद भंग करके वहां की लोकतांत्रिक ढंग से निर्वाचित नेता  ‘आंग-सान-सू-की’ समेत अन्य नेताओं को जेल में डालने के विरुद्ध इन दिनों आंदोलन जोरों पर है जिसमें अब तक 500 के लगभग लोगों की मौत हो चुकी है और सेना ने निर्वाचित सांसदों को अपने घर जाने के लिए कह दिया है। भारत के बारे में तो पाठकों ने 8 अप्रैल के अंक में प्रकाशित श्री शांता कुमार के लेख में पढ़ा ही होगा कि,‘‘संसद का अधिकांश समय शोर-शराबे, बॉयकाट और टोका-टोकी में बीत जाता था।’’ ‘‘जब कभी किसी बड़े नेता का स्वर्गवास हो जाता तो सदन में दो मिनट का मौन रखा जाता और सदन में पूर्णत: शांति रहती। तब मैं अक्सर कहा करता था कि लोक सभा या तो ‘शोर सभा’ बन गई है या ‘शोक सभा’।’’ 

जहां आज भी भारत की संसद में ऐसे ही दृश्य देखने को मिलते हैं, वहीं आस्ट्रेलिया की संसद तो सबसे आगे निकल गई है, जहां अनेक नेताओं पर आधा दर्जन से अधिक महिलाएं यौन शोषण के आरोप लगा चुकी हैं। संसद के भीतर महिला कर्मचारियों और महिला सांसदों तक के साथ बलात्कार और यौन शोषण के मामले लगातार सामने आ रहे हैं। एक महिला अधिकारी ने आरोप लगाया था कि संसद में सांसदों के लिए न सिर्फ देह व्यापार करने वालों को लाया जाता है बल्कि संसद के ‘प्रेयर रूम’ (प्रार्थना कक्ष) को यौन क्रियाओं के लिए इस्तेमाल किया जाता है। गत मास लीक हुए एक वीडियो में वहां सांसद सैक्स करते दिखाई दिए थे। 

23 मार्च को संसद के स्टाफ के कुछ सदस्यों द्वारा संसद के भीतर अश्लील हरकतें करने का भी एक वीडियो लीक हुआ तथा देर रात कुछ न्यूज चैनलों ने सत्तारूढ़ पार्टी के पुरुष स्टाफ मैंबरों को संसद के भीतर महिला मंत्रियों की मेजों के ऊपर हस्त मैथुन करते हुए फोटो प्रदर्शित किए। आस्ट्रेलिया में सत्तारूढ़ लिबरल पार्टी की सांसद ‘होली ह्यूज’ भी सांसदों पर यौन शोषण के गंभीर आरोप लगा चुकी है। अनेक पीड़िताओं का कहना है कि देश के किसी न किसी नेता या अधिकारी ने या तो उन्हें गलत तरीके से छुआ या उनकी बेइज्जती की। इसके विरुद्ध आवाज उठाने पर उनका चरित्र हनन किया गया और वे खामोश हो गईं क्योंकि उन पर नौकरी या न्याय में से किसी एक को चुनने के लिए दबाव बनाया गया। 

इसी कारण अनेक वर्तमान और पूर्व सांसदों ने आस्ट्रेलिया की संसद को ‘टेस्टोस्टेरॉन’ (पुरुष यौन हार्मोन) का तहखाना करार दिया है जहां प्रत्येक मंत्री के कमरों में फ्रिज शराब से भरे रहते हैं। इस बारे आस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री ‘स्कॉट मौरिसन’ की पत्नी ने तो यहां तक कहा है कि, ‘‘मेरे पति व देश के प्रधानमंत्री को एक पिता की तरह इन मामलों पर सोचना चाहिए।’’ उक्त घटनाक्रमों से स्पष्ट है कि संसदीय परम्परा और गरिमा को ठेस पहुंचाने का यह सिलसिला किसी एक देश या एक महाद्वीप तक ही सीमित नहीं है जिसे रोकना लोकतंत्र के हित में अत्यंत आवश्यक है।—विजय कुमार

सौजन्य - पंजाब केसरी।

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Welcome Move for Pre-Packed Resolution (The Economic Times)

The government has done well to allow pre-packaged insolvency resolution plans for micro, small and medium enterprises (MSMEs) with defaults up to ₹1 crore. This debtor-initiated reorganisation plan in advance with creditors on board will give MSMEs a chance to rehabilitate themselves, rather than get liquidated. And those that cannot be restored would have their assets efficiently redeployed. Essentially, pre-packs underline the fundamental purpose of the Insolvency and Bankruptcy Code (IBC): swiftly bring back into a productive framework assets trapped in failing companies, rather than help banks and vendors recover their dues. Speed is vital when a company goes into distress to better the chances of its turnaround as a going concern. So, the time limit of 120 days for completion of a pre-packaged resolution plan is in order. It will help reduce the load on the National Company Law Tribunals.


When the pre-pack process is underway, the management and control will continue with the promoters and directors of the MSME. This will cause minimal disruption in the operations and is, therefore, welcome. However, the Committee of Creditors (CoC), by a 66% vote, can vest the management with the resolution professional (RP) after seeking court approval. If the plan proposed by the MSME is rejected by the CoC or where operational creditors’ dues are impaired, the RP can invite applications for a competing plan (read: akin to Swiss challenge). So, the CoC will be in the driver’s seat. Also, a pre-pack process initiated with an intent to defraud will attract a penalty.


Hardwiring pre-packs into the IBC (through an amendment) to prevent any misuse is fine. This is the first step, and pre-packs should be opened up to bigger MSMEs once the process stabilises.

Courtesy - The Economic Times.

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Wednesday, April 7, 2021

‘अदालतों में मुकद्दमों के अम्बार के लिए’ ‘कानूनी पढ़ाई का घटिया स्तर भी जिम्मेदार’ (पंजाब केसरी)

1 मार्च, 2021 के आंकड़ों के अनुसार हमारे 25 हाईकोर्टों में जजों की अनुमोदित संख्या 1080 के मुकाबले केवल 661 तथा सुप्रीमकोर्ट में भी जजों के कुल स्वीकृत 34 पदों के मुकाबले फिलहाल 30 ही काम कर रहे हैं जबकि 23 अप्रैल को मुख्य न्यायाधीश

1 मार्च, 2021 के आंकड़ों के अनुसार हमारे 25 हाईकोर्टों में जजों की अनुमोदित संख्या 1080 के मुकाबले केवल 661 तथा सुप्रीमकोर्ट में भी जजों के कुल स्वीकृत 34 पदों के मुकाबले फिलहाल 30 ही काम कर रहे हैं जबकि 23 अप्रैल को मुख्य न्यायाधीश एस.ए. बोबडे के रिटायर हो जाने के बाद यह संख्या घट कर 29 रह जाएगी। ‘नैशनल ज्यूडीशियल डाटा ग्रिड’ (एन.जे.डी.जी.) के अनुसार देश की  निचली अदालतों में 3.81 करोड़ तथा हाईकोर्टों में 57.33 लाख केस लंबित हैं। सुप्रीमकोर्ट में इस वर्ष 1 मार्च को 66,000 से अधिक केस लंबित थे।

भारत सरकार के थिंक टैंक ‘नीति आयोग’ ने वर्ष 2018 में, जब देश की अदालतों में 2 करोड़ 90 लाख केस लंबित थे, अपने एक अध्ययन में लिखा था कि ‘‘अदालतों में लंबित मुकद्दमों की वर्तमान गति को देखते हुए सारा बैकलॉग समाप्त करने में 324 वर्ष लगेंगे।’’ इसी पृष्ठभूमि में सुप्रीमकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति एस.ए. बोबडे ने गत 25 मार्च को एक समारोह में कहा कि ‘‘देश की अदालतों में लंबित मामले नियंत्रण से बाहर हो गए हैं।’’

हाईकोर्टों में न्यायाधीशों की नियुक्ति बारे केंद्र सरकार के रुख पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा : ‘‘6 महीने पहले कोलेजियम ने जो सिफारिशें की थीं उन पर अभी तक केंद्र सरकार द्वारा कोई निर्णय न लेना चिंताजनक है जबकि कुछ नामों की सिफारिश किए हुए तो एक वर्ष हो गया है।’’ जजों की कमी पर चल रही चर्चा के बीच आंध्र प्रदेश में स्थित ‘दामोदरम संजीवैया नैशनल लॉ यूनिवॢसटी’ के दीक्षांत समारोह में वीडियो कांफ्रैंसिंग द्वारा दीक्षांत भाषण देते हुए सुप्रीमकोर्ट के अगले मुख्य न्यायाधीश के रूप में 24 अप्रैल को शपथ ग्रहण करने जा रहे न्यायमूर्ति एन.वी. रमना ने जजों की कमी का दूसरा पहलू उजागर किया है।

श्री रमना ने अपने भाषण में कहा, ‘‘देश में बड़ी संख्या में एडवोकेट मौजूद होने के बावजूद छोटी-बड़ी सभी अदालतों में 3.8 करोड़ केस लंबित पड़े हैं जिसके लिए अन्य बातों के अलावा देश में कानून की पढ़ाई का घटिया स्तर भी जिम्मेदार है।’’‘‘हालांकि लॉ कालेजों से प्रतिवर्ष डेढ़ लाख छात्र ग्रैजुएट बन कर निकलते हैं परंतु उनमें से मुश्किल से 25 प्रतिशत ही वकालत का पेशा अपनाने के योग्य होते हैं।’’ ‘‘इसमें छात्रों का कोई दोष नहीं बल्कि इसके लिए बड़ी संख्या में चल रही कानून की पढ़ाई करवाने वाली घटिया संस्थाएं जिम्मेदार हैं। ये सिर्फ नाम के ही लॉ कालेज हैं जहां छात्रों को गलत तरीके से पढ़ाया जाता है।’’

‘‘कानून के छात्रों को उनकी पढ़ाई की शुरूआत के समय से ही लोगों से जुड़ाव की वास्तविक जिम्मेदारी की शिक्षा दी जानी चाहिए। इसके साथ ही लॉ कालेजों से ग्रैजुएट बन कर निकलने वाले छात्रों को चाहिए कि वे अपनी पढ़ाई के दौरान लोक अदालतों, कानूनी सहायता केंद्रों और मध्यस्थता केंद्रों से जुड़ कर व्यावसायिक अनुभव प्राप्त करें।’’‘‘वकील अपने मुवक्किलों को सही कानूनी प्रक्रिया अपनाने की सलाह देकर और मुकद्दमे के शुरूआती चरण में ही परस्पर सहमति से विवाद सुलझा लेने के लिए प्रेरित करके अदालतों पर मुकद्दमों का बोझ घटाने में बड़ा योगदान दे सकते हैं। वकीलों की जिम्मेदारी केवल अपने मुवक्किल के  प्रति ही नहीं बल्कि समाज, कानून और न्यायपालिका के प्रति भी है।’’

‘‘वर्तमान शिक्षा प्रणाली छात्रों में चरित्र निर्माण करने और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी और जागरूकता की भावना पैदा करने में भी सक्षम नहीं है। अक्सर छात्र एक ‘चूहा दौड़’ का शिकार हो जाते हैं। लिहाजा हम सबको देश की शिक्षा प्रणाली में सुधार लाने की जरूरत है ताकि छात्र बाहर की दुनिया और अपने करियर के प्रति सही नजरिया अपना सकें।’’

इस पृष्ठभूमि में कहा जा सकता है कि जहां देश में लगे मुकद्दमों का अम्बार समाप्त करने के लिए न्यायपालिका में जजों की रिक्तियां बिना देरी किए भरने की आवश्यकता है वहीं अच्छे वकील और जज बनाने के लिए कानून की पढ़ाई का स्तर ऊंचा उठाने की भी उतनी ही आवश्यकता है। ऐसा न होने पर अदालतों पर लम्बित मुकद्दमों का बोझ बढ़ता रहेगा और लोग न्याय मिलने के इंतजार में ही निराश होकर संसार से कूच करते रहेंगे क्योंकि देश में एक लाख से अधिक मामले ऐसे हैं जो 30 वर्ष से अधिक समय से लटके हुए हैं। यही नहीं, समय पर न्याय न मिलने के कारण लोग स्वयं  कानून हाथ में लेने लगे हैं, जिससे हिंसा भी बढ़ रही है।—विजय कुमार

सौजन्य - पंजाब केसरी।

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