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Tuesday, May 4, 2021

कामयाब रही ममता की चुनावी रणनीति (प्रभात खबर)

By प्रभाकर मणि तिवारी 


महिला मतदाताओं का समर्थन, जंगलमहल के अलावा कांग्रेस का गढ़ रहे मालदा और मुर्शिदाबाद जिलों में बेहतर प्रदर्शन तथा अपने मजबूत गढ़ को बचाने में कामयाबी की वजह से पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस लगातार तीसरी बार सत्ता में लौटी है. भाजपा ने इस चुनाव में अपने तमाम संसाधन झोंक दिये थे, लेकिन उसे नतीजों से झटका लगा है.



हालांकि वह 2016 की तीन सीटों के मुकाबले इतनी सीटें पाकर शानदार प्रदर्शन का दावा कर सकती है और इस कामयाबी में कोई संदेह भी नहीं है, लेकिन 2019 के आंकड़ों के लिहाज से उसका प्रदर्शन खराब रहा है. पार्टी ने दो सौ सीटें जीतने की जो रणनीति बनायी थी, उसके पीछे 2019 लोकसभा चुनाव का वह आंकड़ा ही था, जिसमें उसे 121 सीटों पर बढ़त मिली थी.



भाजपा ने जिस तरह बहुत पहले से यहां सत्ता हासिल करने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंकी थी, उससे कई बार भ्रम होता था कि शायद ममता बनर्जी के हाथों से सत्ता निकल जायेगी. पूरी केंद्र सरकार के अलावा पार्टी के कई मुख्यमंत्रियों की ओर से बड़े पैमाने पर चलाये गये चुनाव अभियान के दौरान ऐसा माहौल बना था कि कई राजनीतिक विश्लेषकों को भी पार्टी सत्ता पर काबिज होते नजर आ रही थी. भाजपा ने शुरुआती दौर से ही धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण के अलावा जातिगत पहचान की राजनीति (मतुआ और अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति) और भ्रष्टाचार का अपना सबसे बड़ा मुद्दा बनाया था.


लेकिन ये मुद्दे उसे सत्ता दिलाने में नाकाम रहे हैं. एक वाक्य में कहा जाए, तो बांग्ला अस्मिता के मुकाबले भाजपा के हिंदुत्व का मुद्दा बेअसर साबित हुआ है. तृणमूल कांग्रेस ने जंगलमहल इलाके के अलावा हुगली जिले में बेहतर प्रदर्शन किया है, जिसे भाजपा अपना गढ़ समझ रही थी. भाजपा ने तूफान के दौरान राहत सामग्री में भ्रष्टाचार के जो आरोप लगाये थे, उनका दक्षिण 24-परगना जिले की सीटों, जो तृणमूल का गढ़ मानी जाती हैं, पर खास असर नहीं दिखा.


इसी तरह सिंडीकेट और तोलाबाजी यानी उगाही जैसे मुद्दे हों या फिर अपने भतीजे सांसद अभिषेक बनर्जी के संरक्षण के आरोप, आम लोगों पर कोई असर नहीं पड़ा है. तमाम योजनाओं की वजह से महिलाओं का भी समर्थन ममता को मिला है. देश की अकेली महिला मुख्यमंत्री होना भी इसकी एक वजह रहा. वे आम लोगों तक यह संदेश देने में कामयाब रहीं कि एक अकेली महिला पर प्रधानमंत्री से लेकर तमाम केंद्रीय मंत्री और नेता चौतरफा हमले कर रहे हैं तथा भारी रकम खर्च की जा रही है.


प्रधानमंत्री मोदी ‘दीदी ओ दीदी’ कह कर अपनी रैलियों में जिस तरह ममता की खिल्ली उड़ाते रहे, उसे उन्होंने अपने पक्ष में बेहतर तरीके से भुनाया. परचा दाखिल करने के दिन ही नंदीग्राम में पांव में चोट लगना और व्हीलचेयर के सहारे पूरा प्रचार चलाना भी ममता के पक्ष में गया. उन्होंने भाजपा पर बाहरी होने के जो आरोप लगातार लगाये, उसका भी वोटरों पर असर पड़ा.


ममता बनर्जी आठ चरणों में चुनाव कराने से लेकर तमाम पुलिस अधिकारियों के तबादले तक चुनाव आयोग को जिस तरह लगातार कठघरे में खड़ा करती रहीं, उसका भी उनको फायदा मिला. खासकर आखिरी तीन-चार चरणों में जब राज्य में तेजी से कोरोना संक्रमण बढ़ा, तब भी ममता ने इसके लिए आयोग को जिम्मेदार ठहराया और बाकी चरणों के चुनाव एक साथ कराने की मांग उठाती रहीं. इससे विपत्ति में आम लोगों के साथ खड़े होने की उनकी छवि मजबूत हुई.


इस चुनाव में भाजपा का सबसे बड़ा कार्ड था हिंदुत्व और धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण. लेकिन उसकी काट के लिए जिस तरह ममता चुनावी रैलियों में चंडीपाठ करती रही और खुद को हिंदू और ब्राह्मण की बेटी बताती रहीं, उसका उनको फायदा मिला. भाजपा लगातार ममता पर अल्पसंख्यक तुष्टीकरण के आरोप लगाती रही है. तृणमूल कांग्रेस को अल्पसंख्यक वोट तो एकमुश्त मिले ही, हिंदू वोटरों के बड़े तबके ने भी उसका समर्थन किया. मालदा और मुर्शिदाबाद जिलों के नतीजों से साफ है कि उन दोनो अल्पसंख्यक बहुल इलाकों में पारंपरिक रूप से कांग्रेस और लेफ्ट के वोट भी तृणमूल के खाते में गये.


ममता ने पार्टी का घोषणापत्र जारी करने के मौके पर लेफ्ट के वोटरों से तृणमूल का समर्थन करने की अपील की थी. बीते लोकसभा चुनाव में जिस जंगलमहल इलाके में उनको भाजपा ने झटका दिया था, वहां भी पूर्व माओवादी नेता छत्रधर महतो का पार्टी में शामिल करने की उनकी रणनीति कामयाब रही. इलाके में पार्टी का प्रदर्शन बेहतर रहा है. ममता की सबसे बड़ी कामयाबी रही स्थानीय भाषा में आम लोगों से जुड़ना.


भाजपा के तमाम नेता जहां हिंदी में भाषण देते रहे, वहीं ममता बांग्ला बोल कर उनको करीब खींचने में कामयाब रहीं. प्रदेश भाजपा के पास ममता की कद-काठी का नेता नहीं होने और मुख्यमंत्री पद का कोई चेहरा सामने नहीं होने का खामियाजा भी भाजपा को भुगतना पड़ा है.


राजनीतिक हलकों में यह तो पहले ही माना जा रहा था कि पश्चिम बंगाल चुनाव के नतीजों का असर दूरगामी होगा. भाजपा की जीत जहां उसके लिए उत्तर प्रदेश और पंजाब विधानसभा चुनावों के अलावा 2024 के लोकसभा चुनाव में संभावनाओं की नयी राह खोल सकती थी, वहीं ममता की जीत के बाद अब उनके विपक्ष का सबसे प्रमुख चेहरा बनने की संभावना बढ़ गयी है.


इस चुनाव में सबसे ज्यादा नुकसान लेफ्ट, कांग्रेस और इंडियन सेक्युलर फ्रंट वाले संयुक्त मोर्चा गठबंधन को हुआ है. अगर 2016 से तुलना करें, तो बंगाल की राजनीति में लेफ्ट और कांग्रेस का लगभग सफाया हो गया है. भाजपा को भी अल्पसंख्यक वोटों में सेंधमारी की उम्मीद थी. लेकिन वैसा कुछ नहीं हुआ. पर यह बात भी सही है कि भाजपा एक मजबूत विपक्ष के तौर पर उभरी है और उसने बंगाल की राजनीति का स्वरूप तो बदल ही दिया है.

सौजन्य - प्रभात खबर।

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असम में भाजपा की वापसी (प्रभात खबर)

By डॉ मुकेश कुमार 


पांच राज्यों के चुनाव के दौरान सबसे ज्यादा जिस चीज की चर्चा हुई, वह थी सांप्रदायिक ध्रुवीकरण. भाजपा ने सभी राज्यों में अपना अभियान इसी के इर्द-गिर्द चलाया. चूंकि केरल और तमिलनाडु में उसके लिए बहुत उम्मीदें नहीं थीं, इसलिए वहां यह कम दिखा, मगर असम और बंगाल में उसने इसे ही आधार बनाया. असम में यह रणनीति पूरी तरह से कामयाब होती दिख रही है.



चुनाव नतीजे बताते है कि ऊपरी असम में तो यह ध्रुवीकरण हुआ ही है, निचले और मध्य असम में जहां भी मुस्लिम मतदाताओं की संख्या निर्णायक नहीं है, भाजपा और उसकी सहयोगी असम गण परिषद तथा यूपीपीएल-लिबरल को इसका लाभ मिला है.



ऊपरी असम हिंदू बहुल क्षेत्र है और यहीं नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के खिलाफ जबर्दस्त आंदोलन चला था. यह एक बड़ा सवाल था कि क्या भाजपा यहां पिछली बार की तरह अच्छा प्रदर्शन कर पायेगी. हालांकि कोरोना महामारी की वज़ह से एक साल में आक्रोश कमजोर पड़ गया था, मगर खतरा तो फिर भी था. खास तौर पर कांग्रेस ने जिस तरह से घोषणा कर दी थी कि वह सीएए लागू नहीं होने देगी, उसके बाद अगर असमिया मतदाता उसके पास खिसक जाते, तो भाजपा को भारी नुकसान हो सकता था.


कांग्रेस ने इसीलिए अपने चुनावी अभियान का केंद्र भी ऊपरी असम को बनाया था. छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल दो-ढाई सौ लोगों के साथ वहां डेरा डालकर पार्टी की मदद करते रहे. इसके बावजूद नतीजे बताते हैं कि भाजपा हिंदुत्व के बल पर उसे संभालने में कामयाब रही. उसने बदरुद्दीन अजमल का इतना बड़ा हौवा खड़ा किया और कांग्रेस को उससे जोड़ दिया कि हिंदू असमिया मतदाता उससे छिटका नहीं.


भाजपा को इस चीज का भी लाभ मिला कि सीएए के सवाल पर बने दो नये राजनीतिक दल असम जातीय परिषद और राइजोर दल ने कांग्रेस को मिलनेवाले वोट उसे नहीं मिलने दिये. इसी तरह सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का खेल बोडो इलाकों में भी हुआ. बोडो पीपुल्स फ्रंट यहां की मजबूत पार्टी थी. पिछली बार उसने यहां की सभी 12 सीटें जीत ली थीं. माना जा रहा था कि एआइडीयूएफ के साथ आने से उसकी जीत और पक्की हो गयी है, क्योंकि बोडो इलाकों में मुस्लिम मतदाताओं की संख्या अच्छी-खासी है.


मगर हुआ उलटा. बदरुद्दीन की पार्टी से हाथ मिलाने से हिंदुओं और बोडो मतदाताओं का ध्रुवीकरण भाजपा और यूपीपीएल-लिबरल की तरफ हो गया और एक तरह से दोनों ने मिलकर झाड़ू फेर दिया. सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के साथ असमिया मतदाताओं की मदद से असम गण परिषद भी अपना वजूद बचाने में कामयाब हो गयी है. माना जा रहा था कि वह पांच-सात सीटों में ही सिमट जायेगी, मगर उसने दहाई का आंकड़ा पार कर लिया.


भाजपा की अपने दम पर बहुमत हासिल करने की हसरत पूरी नहीं हुई, बल्कि पिछली बार के मुकाबले सीटें और कम ही हुई हैं, इसलिए वह असम गण परिषद पर निर्भर रहेगी. यूपीपीएल की सीटें उसे बहुमत के करीब भर ले जा सकती हैं और उसके बल पर वह स्थिर सरकार नहीं बना सकती है. दरअसल, बदरुद्दीन अजमल की पार्टी एआइयूडीएफ के साथ कांग्रेस के गठबंधन को बीजेपी ने हिंदू-असमिया विरोधी प्रचारित किया, जिससे हिंदुत्व के नाम पर तो ध्रुवीकरण हुआ ही, असमिया-बंगाली के नाम पर भी मतदाता बंट गये.


कांग्रेस के गठबंधन को बहुत शक्तिशाली माना जा रहा था, लेकिन हिंदू-मुस्लिम की राजनीति ने उसे कमजोर कर दिया. ऊपरी असम में भाजपा के खिलाफ जो माहौल बना था, उसका फायदा भी कांग्रेस को नहीं मिल सका, क्योंकि असमिया के नाम पर दो और पार्टियां मैदान में आ गयीं.


जहां तक बंगाल का सवाल है, तो ऐसा लगता है कि वहां सांप्रदायिक से ज्यादा राजनीतिक ध्रुवीकरण हुआ है. तृणमूल कांग्रेस से नाराज मतदाता संयुक्त मोर्चा के बजाय भाजपा के साथ चले गये हैं. मुस्लिम ध्रुवीकरण के जवाब में भाजपा ने जैसे हिंदू ध्रुवीकरण की उम्मीद की थी, वैसा भी नहीं हुआ. लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि भाजपा का सांप्रदायिक चुनाव प्रचार बेकार गया होगा.


अगर उसने सीटों के मामले में लंबी छलांग लगायी है, तो जाहिर है कि बहुत सारी सीटें ऐसी भी होंगी, जहां उसे सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का लाभ मिला होगा, खास तौर पर सीमांत क्षेत्रों में. यह जरूर संभव है कि सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की धार को शायद महिलाओं के ममता प्रेम और अल्पसंख्यकों के उन पर भरोसे ने कमजोर कर दिया, वरना यह लहर थोड़ा और मजबूत होती.


एक महत्वपूर्ण बात इस चुनाव की यह रही है कि इसने साबित कर दिया कि प्रधानमंत्री की लोकप्रियता एक भ्रम है, मिथ है, जिसे मीडिया ने गढ़ा है और लोगों के दिमाग में बैठाने की कोशिश करता रहता है. पश्चिम बंगाल जीतने के लिए उन्होंने देश की प्राथमिकताओं को दरकिनार कर सारे साधन-संसाधन झोंक दिया था.


प्रधानमंत्री पद की गरिमा और मर्यादा तक को दांव पर लगा दिया था, मगर उन्हें चोटिल ममता बनर्जी ने धराशायी कर दिया. वैसे भी राज्यों के स्तर पर मोदी का जादू चल नहीं रहा, यह बात बार-बार सिद्ध हो चुकी है. असम और बंगाल के पहले ऐसे दस-ग्यारह राज्य हैं, जहां मोदी के जबर्दस्त प्रचार के बावजूद भाजपा हारी या हारते-हारते बची.

सौजन्य - प्रभात खबर।

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Friday, April 30, 2021

संकट की इस घड़ी में भी जारी नेताओं द्वारा बेतुके बयानों का सिलसिला (पंजाब केसरी)

इस समय जबकि देश कोरोना महामारी से जूझ रहा है मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, पंजाब, पश्चिम बंगाल, बिहार और हरियाणा के अनेक वरिष्ठ नेताओं के ऐसे बयान आए हैं जिनके लिए उनकी भारी आलोचना हो रही है।

इस समय जबकि देश कोरोना महामारी से जूझ रहा है मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, पंजाब, पश्चिम बंगाल, बिहार और हरियाणा के अनेक वरिष्ठ नेताओं के ऐसे बयान आए हैं जिनके लिए उनकी भारी आलोचना हो रही है। 

* 14 अप्रैल को कोरोना से हो रही मौतों को लेकर मध्यप्रदेश के पशुपालन मंत्री प्रेम सिंह ने कहा, ‘‘जिनकी उम्र हो जाती है, उन्हें मरना ही पड़ता है।’’
* 18 अप्रैल को महाराष्ट्र में बुलढाणा से विधायक संजय गायकवाड़ (शिव सेना) बोले, ‘‘यदि मुझे कोरोना वायरस मिल जाता तो मैं उसे महाराष्ट्र के पूर्व मु यमंत्री देवेंद्र फडऩवीस के मुंह में डाल देता।’’ गायकवाड़ के इस बयान के विरुद्ध रोषस्वरूप कई स्थानों पर उनके पुतले जलाए गए। 

* 20 अप्रैल को तृणमूल कांग्रेस के नेता फिरहाद हाकिम का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ जिसमें वह कह रहा है, ‘‘भाजपा सूअर का बच्चा है। उनको पीटो।’’  
* 21 अप्रैल को पंजाब के स्वास्थ्य मंत्री बलबीर सिद्धू (कांग्रेस) ने कहा, ‘‘पंजाब में यदि 30 लाख वैक्सीन डोज में से 1 लाख या 1 लाख 60 हजार खराब भी हो गईं तो कोई बड़ी बात नहीं है।’’
* 22 अप्रैल को पश्चिम बंगाल की मु यमंत्री ममता बनर्जी बोलीं, ‘‘मैं बंगाल को दिल्ली के दो गुंडों के हाथों में नहीं जाने दूंगी। मैं कोई खिलाड़ी नहीं हूं लेकिन अच्छी तरह जानती हूं कि कैसे खेलना चाहिए। मैं इससे पहले लोकसभा में सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी थी।’’ 

* 22 अप्रैल को बिहार के भाजपा नेता मिथिलेश कुमार तिवारी ने वरिष्ठ माकपा नेता सीताराम येचुरी के बड़े बेटे आशीष येचुरी के कोरोना से निधन पर अत्यंत शर्मनाक ट्वीट करते हुए लिखा, ‘‘चीन के समर्थक माकपा महासचिव सीताराम येचुरी के बेटे आशीष का चाइनीज कोरोना से निधन।’’ तिवारी के इस ट्वीट से बवाल मच गया और उन्हें आनन-फानन में इसे डिलीट करना पड़ा। इसके जवाब में राजद ने हमला बोलते हुए कहा, ‘‘ट्वीट डिलीट करने से संघी संस्कारों की दुर्र्गंध नहीं मिटती। कूड़ेदान के कूड़ेदान भरे पड़े हैं इनके बदबूदार बयानों से।’’ 

* 23 अप्रैल को मु बई के विरार में एक कोविड अस्पताल में आग लगने से हुई 14 मरीजों की मौत पर महाराष्ट्र के स्वास्थ्य मंत्री राजेश टोपे (शिवसेना) ने कहा, ‘‘यह जो घटना घटी है यह कोई नैशनल न्यूज नहीं है। बाबा जिस तरह से घटना घटी है उसी तरह से मदद करेंगे।’’
* 27 अप्रैल को हरियाणा के मु यमंत्री मनोहर लाल खट्टर (भाजपा) ने देश में कोरोना महामारी से मौतों के सरकारी आंकड़े को लेकर उठ रहे सवालों के बीच कहा, ‘‘हमारे शोर मचाने से मरे हुए आदमी जिंदा नहीं हो जाएंगे। इसलिए इस समय कोरोना से होने वाली मौतों पर बहस करने का कोई मतलब नहीं बनता।’’ कांग्रेस नेता रणदीप सुर्जेवाला ने इस पर टिप्पणी की, ‘‘ये एक बेरहम शासक के शब्द ही हो सकते हैं। हर मौत, जो सरकार के निक मेपन का नतीजा है, पर शोर मचाने की जरूरत है ताकि बहरी भाजपा सरकार को गूंज सुनाई दे।’’ 

* 28 अप्रैल को जब एक किसान ने फोन पर कर्नाटक के खाद्य और आपूॢत मंत्री उमेश कट्टी (भाजपा) से जन वितरण प्रणाली के अंतर्गत दिए जाने वाले चावल की मात्रा बढ़ाने का अनुरोध करते हुए यह कहा कि लोग जिंदा रहें या मर जाएं? तो उन्होंने जवाब दिया, ‘‘तुम मर ही जाओ तो बेहतर है और मुझे दोबारा फोन भी मत करना।’’ इस बयान पर मचे बवाल के बाद उमेश कट्टी ने अजीब सफाई देते हुए कहा, ‘‘किसी को भी इस तरह के सवाल ही नहीं पूछने चाहिएं।’’ इस बयान को लेकर प्रदेश में तेज हुई राजनीतिक हलचल के बीच मु यमंत्री येद्दियुरप्पा ने माफी मांगी तथा कहा कि कट्टी को ऐसे नहीं बोलना चाहिए था। 

कोरोना महामारी के इस दौर में जबकि लोगों को सांत्वना देने और उनके घावों पर सहानुभूति का मरहम लगाने की जरूरत है, इस प्रकार के संवेदनाहीन और बेतुके बयान देकर लोगों के घावों को कुरेदना तथा अनावश्यक विवाद पैदा करना कदापि उचित नहीं है। ऐसा करने की बजाय हमारे नेताओं को इस गंभीर संकट काल में अपने सारे राजनीतिक और वैचारिक मतभेद भुला कर लोगों की पीड़ा दूर करने का प्रयास करना चाहिए।—विजय कुमार  

सौजन्य - पंजाब केसरी।

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मधु लिमये : एक आदर्श समाजवादी (प्रभात खबर)


प्रख्यात समाजवादी नेता मधु लिमये आधुनिक भारत के विशिष्टतम व्यक्तित्वों में से एक थे, जिन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी और बाद में पुर्तगालियों से गोवा को मुक्त कराकर भारत में शामिल कराने में आगे रहे. वे प्रतिबद्ध समाजवादी, प्रतिष्ठित सांसद, नागरिक स्वतंत्रता के हिमायती, एक विपुल लेखक होने के साथ ऐसे व्यक्ति थे, जिनका सारा जीवन देश के आम आदमी की भलाई में गुजरा.



मधु लिमये देश के लोकतांत्रिक समाजवादी आंदोलन के करिश्माई नेता थे और अपनी विचारधारा के साथ उन्होंने कभी कोई समझौता नहीं किया. मधु लिमये पर महात्मा गांधी के शांति और अहिंसा के दर्शन का बहुत प्रभाव था. एक प्रबुद्ध समाजवादी नेता के रूप में उन्होंने 1948 से लेकर 1982 तक विभिन्न चरणों में और अलग अलग भूमिकाओं में समाजवादी आंदोलन का नेतृत्व और मार्गदर्शन किया.



मधु लिमये का जन्म एक मई, 1922 को महाराष्ट्र के पूना में हुआ था. अपनी स्कूली शिक्षा के बाद उन्होंने 1937 में पूना के फर्ग्युसन कॉलेज में दाखिला लिया और छात्र आंदोलनों में भाग लेना शुरू कर दिया. फिर वे एसएम जोशी, एनजी गोरे वगैरह के संपर्क में आये और राष्ट्रीय आंदोलन और समाजवादी विचारधारा के प्रति आकर्षित हुए. जब 1939 में दूसरा विश्व युद्ध छिड़ा, तो उन्होंने सोचा कि यह देश को औपनिवेशिक शासन से मुक्त करने का एक अवसर है. लिहाजा, अक्टूबर, 1940 में मधु लिमये ने विश्व युद्ध के खिलाफ अभियान शुरू कर दिया और अपने युद्ध विरोधी भाषणों के लिए गिरफ्तार कर लिये गये.


उन्हें सितंबर, 1941 में रिहा किया गया. अगस्त 1942 में जिस कांग्रेस सम्मेलन में महात्मा गांधी ने 'भारत छोड़ो' का आह्वान किया था, उसमें मधु लिमये मौजूद थे. यह पहला मौका था, जब उन्होंने गांधी को करीब से देखा. गांधी सहित कांग्रेस पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं की गिरफ्तारी के बाद मधु लिमये अपने कुछ सहयोगियों के साथ भूमिगत हो गये और अच्युत पटवर्धन, उषा मेहता और अरुणा आसफ अली के साथ भूमिगत प्रतिरोध आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी. सितंबर, 1943 में उन्हें एसएम जोशी के साथ गिरफ्तार कर लिया गया तथा जुलाई, 1945 तक वर्ली, यरवदा और विसापुर की जेलों में बिना किसी मुकदमे के रखा गया.


मधु लिमये ने 1950 के दशक में गोवा मुक्ति आंदोलन में भाग लिया, जिसे उनके नेता डॉ राम मनोहर लोहिया ने 1946 में शुरू किया था. उपनिवेशवाद के कट्टर आलोचक मधु लिमये ने 1955 में एक बड़े सत्याग्रह का नेतृत्व किया और गोवा में प्रवेश किया. उन्हें पांच महीने तक पुलिस हिरासत में रखा गया था. दिसंबर 1955 में पुर्तगाली सैन्य न्यायाधिकरण ने उन्हें 12 साल के कठोर कारावास की सजा सुनायी.


लेकिन मधु लिमये ने न तो कोई बचाव पेश किया और न ही भारी सजा के खिलाफ अपील की. जब वे गोवा की जेल में थे, तो उन्होंने लिखा था कि 'मैंने महसूस किया है कि गांधी जी ने मेरे जीवन को कितनी गहराई से बदल दिया है, उन्होंने मेरे व्यक्तित्व और इच्छा शक्ति को कितनी गहराई से आकार दिया है.’ उन्होंने पुर्तगाली कैद में 19 महीने से अधिक समय बिताया. कैद के दौरान उन्होंने जेल डायरी के रूप में एक पुस्तक 'गोवा लिबरेशन मूवमेंट और मधु लिमये’ लिखी, जो 1996 में प्रकाशित हुई.


अब उसका दोबारा प्रकाशन किया गया है. साल 1957 में पुर्तगाली हिरासत से छूटने के बाद भी मधु लिमये ने गोवा की मुक्ति के लिए जनता को जुटाना जारी रखा तथा भारत सरकार से इस दिशा में ठोस कदम उठाने के लिए आग्रह किया. जन सत्याग्रह के बाद भारत सरकार गोवा में सैन्य कार्रवाई करने के लिए मजबूर हुई और गोवा पुर्तगाली शासन से मुक्त हुआ. दिसंबर, 1961 में गोवा भारत का अभिन्न अंग बना.


भारतीय संविधान और संसदीय मामलों के ज्ञाता मधु लिमये 1964 से 1979 तक चार बार लोकसभा के लिए चुने गये. स्वस्थ लोकतांत्रिक लोकाचार से प्रतिबद्ध होने के कारण वे हमेशा अपने सिद्धांतों के साथ खड़े रहे और असामान्य राजनीतिक परिस्थितियों के दौरान भी अपने मूल्यों से समझौता नहीं किया. आपातकाल के दौरान पांचवीं लोकसभा के कार्यकाल के विस्तार के खिलाफ जेल से उनका विरोध इस बात की गवाही है.


उन्हें जुलाई, 1975 से फरवरी, 1977 तक मध्य प्रदेश की विभिन्न जेलों में रखा गया था. उस समय उन्होंने अपने युवा साथी शरद यादव के साथ आपातकाल के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा संवैधानिक प्रावधानों के दुरुपयोग के विरोध में लोकसभा से इस्तीफा दे दिया. वे जनता पार्टी के गठन और आपातकाल के बाद केंद्र में सत्ता हासिल करने वाले गठबंधन में सक्रिय थे. उन्हें मोरारजी सरकार में मंत्री पद देने का प्रस्ताव भी किया गया, लेकिन उन्होंने इसे अस्वीकार कर दिया. बाद में एक मई, 1977 को उनके 55वें जन्मदिन पर उन्हें जनता पार्टी का महासचिव चुना गया.


मधु लिमये ने 1982 में सक्रिय राजनीति से संन्यास लेने के बाद अंग्रेजी, हिंदी और मराठी में 100 से अधिक पुस्तकें लिखीं. वे अपने लेखन में भी तार्किक, निर्णायक, निर्भीक थे. उन्होंने अपने लेखों के माध्यम से राष्ट्र के सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक विकास से संबंधित मुद्दों पर अपनी चिंता जारी रखी. उन्होंने न तो स्वतंत्रता सेनानी सम्मान पेंशन ली और न ही पूर्व सांसद पेंशन को स्वीकार किया. संक्षिप्त बीमारी के बाद 72 वर्ष की आयु में आठ जनवरी, 1995 को मधु लिमये का नयी दिल्ली में निधन हो गया.

सौजन्य - प्रभात खबर।

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कोरोना पर विजय पाना संभव (प्रभात खबर)


By अवधेश कुमार 


इस महाआपदा के दौर में दो घटनाओं ने भारत समेत पूरी दुनिया का ध्यान खींचा है. पहली घटना थी, इजराइल में मास्क की अनिवार्यता खत्म करना. वहां एक 35 वर्षीय महिला ने अपना मास्क हटाते हुए जो वीडियो पोस्ट किया, उसका संदेश यही था कि देखो, हमने कोरोना जैसी आपदा पर विजय पा लिया है. कुछ तस्वीरें ब्रिटेन से आयीं. पाबंदियां काफी कम होने के बाद वहां के लोग जिस तरह पब, रेस्तरां, सांस्कृतिक केंद्र, थिएटर आदि में दिख रहे हैं, उनका संदेश भी यही है.



हालांकि ब्रिटेन ने अभी कोरोना से पूरी तरह मुक्त होने की घोषणा नहीं की है, लेकिन सरकार और स्वास्थ्य विभाग की ओर से संदेश चला गया है. इजराइल दुनिया का पहला देश बना है, जिसने स्वयं को कोरोनामुक्त घोषित किया है. ज्यादातर देश ऐसी घोषणा करने का साहस नहीं कर पा रहे हैं.



निस्संदेह, ये दृश्य हम भारतीयों को ललसानेवाले हैं. हमारे मन में भी प्रश्न उठ रहा होगा कि कब हम इन देशों की तरह फिर से खुलकर जी सकेंगे? यहीं पर इजरायल के चरित्र को समझना जरूरी हो जाता है. रेगिस्तान के बीच बसे इस छोटे से देश ने अपने परिश्रम, अनुशासन, समर्पण और दृढ़ संकल्प के साथ न सिर्फ अपनी धरती को हरियाली से लहलहाया, बल्कि अनेक मामलों में विकसित देशों के समानांतर स्वयं को खड़ा किया.


कोरोना में भी पूरे देश ने ऐसा ही अनुशासन दिखाया. एक बार मास्क लगाने की घोषणा हो गयी, तो फिर किसी ने उस पर न प्रश्न उठाया और न ही टालमटोल ही किया. लोगों ने सामाजिक दूरी का पूरी तरह पालन किया. इसके लिए वहां की पुलिस, सेना या अन्य एजेंसियों को हमारे देश की तरह कसरत नहीं करनी पड़ी क्योंकि सबका अंतर्भाव यही था कि एक देश के रूप में हमें कोरोना पर विजय पाना है.


इसी तरह उसने टीकाकरण अभियान का सार्वजनिककरण किया. टीका के पहले खुराक को 100 दिन में पूरा करने का लक्ष्य रखा गया था. आज 16 से 80 वर्ष तक के 81 प्रतिशत लोगों का टीकाकरण हो चुका है. इसके साथ धीरे-धीरे परिस्थितियों का मूल्यांकन किया गया. जब स्पष्ट हो गया कि यह आपदा अब समाप्ति के कगार पर है, तब देश के कोरोना संकट से बाहर आने की घोषणा कर दी गयी.


ब्रिटेन भी ने भी आपदा का कम संघात नहीं झेला है. यह उन देशों में शामिल था, जहां कोरोना ने अपना संपूर्ण भयावह रूप दिखाया. ब्रिटेन भी ऐतिहासिक रूप से एक अनुशासित देश रहा है, पर पिछले कुछ वर्षों में उसके राष्ट्रीय अनुशासन में कमी आयी है. कोरोना काल में भी कुछ समूहों ने मास्क, सामाजिक दूरी से लेकर लॉकडाउन तक में अनुशासनहीनता दिखाने की कोशिश की, जिससे शासन धैर्य से निपटा.


अलग-अलग समुदायों, अप्रवासियों आदि के प्रमुख लोगों को अनुशासन का पालन कराने की सक्रिय भूमिका में लाया. ब्रिटेन तीन बार में 175 दिनों का सख्त लॉकडाउन लागू करने वाला देश है. इसे झेलना कितना कठिन होगा, यह हम भारतीयों से बेहतर कौन जा सकता है! ध्यान रखें, वायरस के जिस घातक वेरिएंट की बात भारत में हो रही है, उसका उद्भव ब्रिटेन से ही पता चला था. वहां से आनेवाले उसे लेकर भारत आये और हमारे देश में कोहराम मचा है. लेकिन ब्रिटेन ने उस वेरिएंट पर लगभग काबू पा लिया है. अगर ब्रिटेन ऐसा कर सकता है, तो हम क्यों नहीं? अगर इजरायल कोरोनामुक्त हो सकता है, तो भारत क्यों नहीं?


निस्संदेह, इजरायल और ब्रिटेन भारत की तुलना में अत्यंत कम आबादी के देश हैं. इजरायल की कुल जनसंख्या 93 लाख के आसपास है. ऐसे में टीकाकरण सहित कोरोना अनुशासन का पालन कराना आसान है. ब्रिटेन की आबादी सात करोड़ से नीचे है. जनसंख्या कम या ज्यादा होना एक कारक हो सकता है. यहां मूल बात राष्ट्र का संकल्प और उसे पूरा करने के लिए दिखायी गयी एकजुटता व अनुशासन है.


ब्रिटेन ने भी जिस तरीके से टीकाकरण किया, वह मिसाल है. प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने घोषणा कर दी है कि हर शुक्रवार को दोनों टीके मुफ्त लोगों के लिए उपलब्ध रहेंगे. यह स्थिति अधिकतर आबादी को टीका लगाने के बाद उत्पन्न हुई स्वाभाविक निश्चिंतता का प्रमाण है. इजराइल ने अपने चरित्र के अनुरूप कोरोना मुक्ति अभियान में संपूर्ण देश को लगा दिया. सत्ता प्रतिष्ठान से लेकर समाज के हर समूह के लिए कोरोना पर विजय पाना राष्ट्रीय लक्ष्य बन गया. ऐसा नहीं है कि इजराइल और ब्रिटेन में कोरोना इतनी बड़ी बीमारी नहीं है, कहनेवाले लोग नहीं थे.


यह महामारी है या बीमारी, इस पर हमारे देश की तरह वहां भी बहस हुई और हो रही है. लेकिन इससे उनका लक्ष्य बाधित नहीं हुआ. ब्रिटेन में भी विपक्ष ने सरकार की आलोचना की, समय-समय पर उसे घेरा, किंतु वे अभियान में सहयोगी बने रहे. भारत के अंदर भी कोरोना पर विजय पाने की संपूर्ण क्षमता मौजूद है. इजरायल में नेतनयाहु को बहुमत तक प्राप्त नहीं है, लेकिन नागरिकों के स्वास्थ्य और सुरक्षा को लेकर वहां किसी तरह का मतभेद हो ही नहीं सकता.


हम वैसा राष्ट्रीय संकल्प और उसके प्रति दृढ़ अनुशासन नहीं अपना पाते क्योंकि उस तरह का भाव हमारे यहां स्वाभाविक रुप से विद्यमान नहीं है. निस्संदेह, केंद्र एवं राज्य सरकारों के कोरोना प्रबंधन में भारी कमियां दिखती रहीं हैं. ब्रिटेन से आये नये वेरिएंट को लेकर देश को आगाह भी किया गया था. पर हमारी तैयारी वैसी नहीं हुई, जैसी होनी चाहिए. इजराइल और काफी हद तक ब्रिटेन से हम सीख सकते हैं कि किसी आपदा के समय सरकार सहित संपूर्ण देश का आचरण कैसा होना चाहिए.


अगर समाज का संपूर्ण साथ न मिले, तो सरकारें चाह कर भी ऐसी आपदा पर अपेक्षित समय और निर्धारित तरीके से विजय नहीं पा सकतीं. सरकार को हम दोष दे सकते हैं, लेकिन क्या समाज के रूप में हमने कोरोना पर सजगता, संकल्प और अनुशासन दिखाया है, जैसा हमने कुछ दूसरे देशों में देखा है? इजरायल के लोग कह रहे हैं कि मास्क अनिवार्य न रहने से उनको खुशी है, लेकिन इससे उनको कोई समस्या नहीं थी यानी आगे भी आवश्यकता दिखने पर वे स्वतः इसे अपना लेंगे.


हमारे यहां तो लोग मास्क पहनकर ही बाहर निकलें, ठीक से पहनें, इसके लिए पुलिस को लगाना पड़ा. यकीन मानें, हम भी इन देशों की श्रेणी में शीघ्र खड़े हो सकते हैं, अगर केंद्रीय सत्ता से लेकर राज्य सरकारें, स्थानीय शासन, धार्मिक-सांस्कृतिक-सामाजिक-व्यापारिक समूह, शैक्षणिक संस्थानों सहित हर भारतीय अंतर्मन यह मान कर कि कोरोना पर विजय का राष्ट्रीय लक्ष्य हासिल करना है, उसके अनुरूप अपने को झोंक दें.

सौजन्य - प्रभात खबर।

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सुरक्षा मानकों पर ध्यान दें अस्पताल (प्रभात खबर)

By कृष्ण प्रताप सिंह 


महामारी के भयावह कहर के बीच देश के कुछ अस्पतालों में ऑक्सीजन टैंक में रिसाव, आग लगने या ऐसे अन्य कारणों से मरीजों की मौत की खबरें बेहद चिंताजनक हैं. कोई भी तर्क देकर ऐसे हादसों का बचाव नहीं किया जा सकता है. ऐसे हादसे यकीनन हृदय विदारक हैं, जैसा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है. फिर भी विडंबना देखिए कि जहां एक ओर देश के विभिन्न राज्यों में अस्पतालों में मरीज आक्सीजन की कमी से जानें गंवा रहे हैं, वहीं अस्पतालों में हुए हादसों कोई लेकर कोई शर्मिंदगी किसी भी स्तर पर महसूस नहीं की जा रही है,

बल्कि इसके उलट नाना प्रकार के बहानों से उनकी गंभीरता को कम करने की कोशिशें की जा रही हैं. कारणों की पड़ताल करें, तो भले ही स्वास्थ्य व्यवस्था से किसी की सहानुभूति हो या नहीं, निजी क्षेत्र के प्रति दल और विचारधारा का भेद किये बिना समूचा सत्ता प्रतिष्ठान कितनी सदाशयता रखता है, उसे इस संदर्भ से समझा जा सकता है कि नासिक प्रशासन ने ऑक्सीजन टैंक के रखरखाव में आपराधिक लापरवाही के लिए संबंधित निजी कंपनी पर कोई कार्रवाई नहीं की, बल्कि समय रहते टैंक के वाल्व को बंद करने के लिए उक्त कंपनी के कर्मचारियों की प्रशंसा भी की.

ऐसे में कौन कह सकता है कि इस सरकारी संवेदनहीनता का अंत कहां होगा और तब तक हम उसकी कितनी कीमत दे चुके होंगे? इसे यूं समझ सकते हैं कि पालघर का विरार स्थित अस्पताल भी, जिसमें अग्निकांड में तेरह मरीजों की जान गयी है, निजी ही है. पिछले महीने मुंबई के भांडुप में जिस कोरोना अस्पताल में आग लगने से दस मरीजों की जान चली गयी थी, वह भी निजी ही है. कुछ दिनों बाद ही उसके संचालन की अनुमति की अवधि समाप्त होनेवाली थी.


इस नाते वहां अव्यवस्था का ऐसा आलम था कि अस्पताल की इमारत में ही चल रहे मॉल में लगी आग को लेकर तब तक गंभीरता नहीं बरती गयी, जब तक कि वह अस्पताल तक नहीं आ पहुंची. तब भी अफरातफरी के बीच जानें बचाने के लिए कुछ नहीं किया जा सका क्योंकि पहले से उचित तैयारी ही नहीं थी. तब अस्पताल प्रशासन ही नहीं, दमकल और स्थानीय प्रशासन भी लापरवाह साबित हुए थे. उस हादसे से सबक लेकर सतर्कता बढ़ा दी गयी होती और उपयुक्त प्रबंध किये गये होते, तो बहुत संभव है कि दोनों ताजा हादसे होते ही नहीं.


लेकिन अब भी नासिक के जिलाधिकारी और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री मुआवजे की घोषणा करते हुए जैसे आप्तवाक्य कह रहे हैं, उनसे लगता है कि वे अपनी इतनी ही जिम्मेदारी मानते हैं कि फौरन मुआवजे वगैरह का एलान कर दें. जहां तक मुआवजे और जांच का संबंध है, हर हादसे के बाद उनकी बाबत सरकारें ऐसे ऐलान करती ही हैं. जरूरी यह था कि मुख्यमंत्री समझते कि ऐसे मामलों में बड़े से बड़ा मुआवजा भी वास्तविक क्षतिपूर्ति नहीं होता.


तब तो और भी नहीं, जब अस्पतालों की लापरवाही ऐसे मरीजों को मौत की नींद सुला दे रही हो, जो अपने प्राण संकट में पाकर उसे बचाने के लिए उसकी शरण में आये हों. बेहतर होता कि मुख्यमंत्री माफी मांगते, लेकिन वे कह रहे हैं कि इन हादसों को लेकर राजनीति नहीं होनी चाहिए, मानो राजनीति इतना गर्हित कर्म हो कि उसे लोगों के जीवन-मरण के प्रश्नों से दूर ही रखा जाना श्रेयस्कर हो.


दरअसल, इन दिनों केंद्र से लेकर प्रदेशों तक में जो भी सरकारें हैं, वे खुद तो अपने सारे फैसलों में भरपूर राजनीति करती रहती हैं, लेकिन जब भी किसी मामले में उनसे तल्ख सवाल पूछे जाने लगते हैं, वे राजनीति न किये जाने का राग अलापने लगती हैं. अगर राजनीति न करने की उद्धव ठाकरे की बात मान ली जाए, तो भी क्या राजनीति न करने के नाम पर ऐसे सवाल पूछने से बचा जाना चाहिए कि क्यों उनके राज्य के अस्पतालों में भी जानलेवा हादसे कोई नयी बात नहीं रह गये हैं?


क्या उन्हें ऐसा कहकर इस सवाल के जवाब से कन्नी काटने की इजाजत दी जा सकती है कि इस तरह के हादसे अकेले उन्हीं के राज्य में नहीं, गुजरात और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में भी हो रहे हैं? जहां भी हो रहे हैं, वहां की सरकारों को इस सवाल के सामने क्यों नहीं खड़ा किया जाना चाहिए कि उनके अस्पतालों में मरीजों की सुरक्षा के मानकों को तवज्जो न देकर इतनी लापरवाही क्यों बरती जाती है?


आक्सीजन टैंक में रिसाव का तो खैर यह अपनी तरह का पहला ही मामला है, लेकिन क्यों अस्पतालों में अग्निकांडों में मरीजों की जानें जाना आम होता जा रहा है? अगर इसलिए कि इन अस्पतालों में इलाज के लिए जाने व भर्ती होनेवालों में ज्यादातर आम जन होते हैं क्योंकि निजी क्षेत्र की कृपा से अभिजनों को भारी खर्चे पर सुपर स्पेशियलिटी अस्पतालों में इलाज कराने की सहूलियत उपलब्ध है,


तब तो यह सवाल और गंभीर हो जाता है और ऐसे हादसों के पीछे की मानवीय चूकों को भी अमानवीय माने जाने की जरूरत जताता है. इस अर्थ में और कि बड़े अस्पतालों में ऐसे हादसों से बचाव की जिम्मेदारी में उसके प्रशासन के साथ स्थानीय प्रशासन का भी साझा होता है. वे मिलकर भी अस्पतालों को हादसों के घरों में तब्दील होने से नहीं रोक पा रहे हैं, तो उन्हें उनकी शर्म को साझा ही करना चाहिए.

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Thursday, April 29, 2021

डर और घबराहट कोई रास्ता नहीं (प्रभात खबर)

By डॉ ललित कांत 


देश इस समय बेहद नाजुक दौर से गुजर रहा है. एक तरफ संक्रमण के मामले हमारे अनुमानों से कहीं अधिक दर से बढ़ रहे हैं तथा दूसरी तरफ हमारे अस्पतालों में पर्याप्त संख्या में बिस्तरों, दवाओं और ऑक्सीजन सिलेंडरों की उपलब्धता नहीं है. ऐसे में यह समझना बहुत जरूरी है कि कब हमें अस्पताल जाने की जरूरत है और कब हम घर पर ही संक्रमण से मुक्त हो सकते हैं.



किसी भी स्थिति में पैनिक नहीं करना चाहिए क्योंकि तब अच्छा-खासा दिमाग भी ठीक से काम नहीं करता. विशेषज्ञों और चिकित्सकों का कहना है कि अभी भी भारत में जितने लोग कोरोना वायरस से संक्रमित हो रहे हैं, उनमें से 94-95 फीसदी तक मामले हल्के या औसत होते हैं और कुछ दवा व कुछ ध्यान देकर ऐसे संक्रमणों का उपचार घरों में ही हो सकता है. लेकिन ऐसे लोगों की संख्या कम है, जो इन बातों को समझते हैं. बहुत सारे लोग ऐसे में पैनिक मोड में आ जाते हैं, कुछ ऑक्सीजन के लिए, तो कुछ अस्पतालों के लिए भागने लगते हैं.



अभी हमारे देश में रोजाना मामलों की संख्या तीन लाख से ऊपर है और हर दिन तीन हजार से अधिक लोगों की मौत हो रही है. इस दूसरी लहर का एक कारण तो वायरस के रूप में बदलाव है और दूसरी वज़ह लोगों का ठीक से अपना ध्यान नहीं रखना है, जैसे- मास्क नहीं पहनना, शारीरिक दूरी का पालन नहीं करना और बार-बार हाथ नहीं धोना आदि. व्यवहार में यह ढील इसलिए हुई कि जनवरी-फरवरी तक देशभर में संक्रमण में बड़ी गिरावट हो गयी थी तथा लोगों ने लगभग यह मान लिया था कि अब यह बीमारी खत्म हो रही है. लेकिन यह गलतफहमी थी.


हमारा और अन्य देशों का अनुभव है कि ऐसी बीमारी की एक से अधिक लहरें आती हैं. संक्रमण बढ़ने की एक वजह कई आयोजनों का होना भी हो सकती है, जैसे- कुछ राज्यों में चुनाव, सामाजिक व धार्मिक कार्यक्रम आदि. इन अवसरों पर बचाव के उपायों पर ठीक से अमल नहीं किया गया. अब जब महामारी फैल गयी है, तो हमें यह देखना होगा कि पहली और दूसरी लहर में अंतर क्या है. पिछले साल प्रभावित होनेवाले अधिकतर लोग 50-55 साल से अधिक आयु के थे, लेकिन इस बार 24-44 साल आयु वर्ग के लोग वायरस की चपेट में ज्यादा आ रहे हैं.


यह बात हमें गंभीरता से समझनी होगी कि संक्रमण के बहुत अधिक मामले घर पर रहकर ठीक हो सकते हैं. अगर किसी व्यक्ति को बुखार, खांसी, गले में खरास, स्वाद व गंध महसूस नहीं करना जैसे लक्षण आते हों, तो सबसे पहले हमारा जोर प्रभावित व्यक्ति को अलग रखने पर होना चाहिए ताकि दूसरे लोगों तक वायरस न फैल सके. लक्षण दिखने पर अगर आसपास जांच की सहूलियत है, तो जांच करा लेनी चाहिए. अगर यह मुश्किल है, तो यह मानकर चलना चाहिए कि यह कोविड ही होगा. आम बुखार में जो दवा हम लेते हैं, वह इसमें भी लेना चाहिए.


खरास के लिए नमक डालकर गर्म पानी से गलाला करना चाहिए, भाप लेना चाहिए. प्लस ऑक्सीमीटर और थर्मामीटर से खून में ऑक्सीजन और बुखार की माप लेते रहना चाहिए. इससे यह पता चलता रहता है कि कहीं मरीज की स्थिति बिगड़ तो नहीं रही है. इन उपायों से आम तौर पर एक सप्ताह या दस दिन में व्यक्ति ठीक हो सकता है. केवल आठ से दस प्रतिशत संक्रमितों में ही ऑक्सीजन की कमी होने की शिकायत आती है.


डॉक्टर के परामर्श से और गंभीर रूप से बीमार होने पर ही अस्पताल जाना चाहिए. सामान्य स्थिति में पैनिक करने से कोई फायदा नहीं है. प्राणायाम करने से, उल्टा लेटने से ऑक्सीजन की मात्रा बहाल रखने में मदद मिलती है. शुरुआती लक्षण आने के साथ विभिन्न प्रकार की जांच कराना, ऑक्सीजन जुटाना या अस्पताल में बिस्तर की व्यवस्था कराना जैसे व्यवहारों से बचना चाहिए. इससे दूसरे भी प्रभावित होते हैं और पैनिक बढ़ता है. ऐसा करने से जरूरतमंद लोगों को भी परेशानी हो सकती है.


इस संबंध में टीकाकरण अभियान बहुत महत्वपूर्ण है. अभी तक 45 साल से ऊपर के लोगों को टीके की खुराक दी जा रही है. एक मई से 18 साल और उससे अधिक आयु के सभी वयस्क टीका लगा सकेंगे. भारत सरकार के कार्यक्रम के तहत चल रहे सरकारी केंद्रों पर यह अभी भी मुफ्त दिया जा रहा है. निजी क्षेत्र के केंद्रों पर एक निर्धारित शुल्क देना पड़ता है. केंद्र सरकार समेत अनेक राज्य सरकारों ने आगे भी निशुल्क टीका देने की घोषणा की है. टीकों के दाम कम करने के लिए कोशिशें हो रही हैं.


चूंकि सभी वयस्कों को टीका लगाना है, तो एक साथ इतनी बड़ी संख्या में टीके उपलब्ध नहीं हो सकेंगे, इसलिए संयम के साथ इस अभियान से जुड़ा जाना चाहिए. केंद्र सरकार ने फिलहाल उपलब्ध दो वैक्सीन के अलावा दूसरे देशों में बनीं कुछ वैक्सीन के इस्तेमाल की अनुमति दी है. उम्मीद है कि जल्दी ही उन्हें उपलब्ध करा दिया जायेगा. टीकाकरण दो कारणों से बहुत महत्वपूर्ण है. पहला यह है कि यदि टीके की दोनों खुराक ली जाए, तो दूसरी खुराक के दो सप्ताह बाद शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ जाती है.


ऐसे लोगों को अगर संक्रमण होता है भी है, तो उसका असर बहुत मामूली होता है और उसका उपचार घर में ही रहकर किया जा सकता है और उन्हें अस्पताल जाने की जरूरत नहीं होगी. दूसरी अहम बात है कि इससे मौतों को रोका जा सकता है, जो आज हमारी सबसे बड़ी चिंता है.


मीडिया और सोशल मीडिया की कुछ सूचनाओं से भी पैनिक फैलता है. हमें उनकी ओर ध्यान नहीं देना चाहिए और विशेषज्ञों की राय को मानना चाहिए. जागरूकता भी आज बहुत आवश्यक है. याद रहे, बहुत अधिक मामले हल्के संक्रमण के हैं और उसके असर में आये लोग घर में देखभाल से स्वस्थ हो सकते हैं. बचाव के उपायों पर अमल पहले की तरह बिना लापरवाही के करते रहना है. यह बीमारी टीकाकरण से ही काबू में आ सकती है, इसलिए मौका मिलते ही टीका जरूर लगाएं. जिन कुछ देशों में आबादी के बहुत बड़े हिस्से को टीकों की खुराक दी जा चुकी है, वहां पाबंदियों में छूट मिलने लगी है.


इजरायल ने पिछले सप्ताह ही मास्क पहनने की अनिवार्यता समाप्त कर दी है. अमेरिकी सरकार ने भी घोषणा की है कि जो लोग टीकाकरण करा चुके हैं, वे बिना मास्क के घूम सकते हैं. सावधानी के लिए भीड़ में मास्क लगाने की सलाह दी गयी है. हम कुछ सावधानी और जिम्मेदारी से इस महामारी को पीछे छोड़ सकते हैं.

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Wednesday, April 28, 2021

महामारी : स्वदेशी ही है समाधान (प्रभात खबर)

By डॉ अश्विनी महाजन 


अमेरिका के बाइडेन प्रशासन ने पहले यह फैसला लिया था कि ‘पहले अमेरिका’ की नीति के तहत ये सामान भारत में नहीं भेजेंगे, पर अब अमेरिका ने वैक्सीन के लिए कच्चा माल भेजने का निर्णय ले लिया है. इससे सबक मिलता है कि हम आवश्यक वस्तुओं के लिए दूसरे मुल्कों पर निर्भर नहीं रह सकते. उल्लेखनीय है कि वैक्सीन के स्टॉक की अमेरिका को अभी कोई जरूरत नहीं है और न ही कच्चे माल की अमेरिका में कोई कमी है.



ऐसे में अमेरिका के इस फैसले से न केवल उसकी असंवेदनशीलता उजागर होती है, बल्कि हमें आत्मनिर्भर होने की प्रेरणा भी मिलती है. वे देश, जिन्होंने दुनिया एक गांव है तथा आपसी व्यापार व सहकार ही जन कल्याण के लिए जरूरी हैं का दंभ भरते हुए हमें भूमंडलीकरण की ओर धकेला, वही देश बिना वजह (कहा जा सकता है कि भारत को परेशान करने के लिए) आवश्यक चीजों को बेवजह रोकने की कोशिश कर रहे हैं.



चीन से आये वायरस से पिछले एक साल से भी ज्यादा समय में सभी वर्ग प्रभावित हुए हैं. लेकिन, बड़ी-बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लाभ और व्यवसाय में पहले से ज्यादा वृद्धि हुई है. दुनिया के मुट्ठी भर अरबपतियों के पास ही इन कंपनियों का स्वामित्व है. पिछले 30 वर्षों के इतिहास में, भूमंडलीकरण के इस युग में, सबसे ज्यादा लाभ इन्हीं बहुराष्ट्रीय कंपनियों को हुआ है.


चीन ने विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) में प्रवेश के बाद नियमों को धत्ता दिखाते हुए दुनियाभर में अपना माल डंप करना शुरू कर दिया. नतीजन अमेरिका, यूरोप, भारत समेत अनेक देशों के घरेलू उद्योग दम तोड़ने लगे और उनका चीन के साथ व्यापार घाटा लगातार बढ़ने लगा. भारत का चीन के साथ व्यापार घाटा 2000-01 में 0.2 अरब डॉलर से बढ़ता हुआ 2017-18 तक 63 अरब डॉलर यानी 315 गुना बढ़ गया. भारत हर जरूरी या गैर जरूरी वस्तुओं के लिए चीन पर निर्भर हो गया.


नरेंद्र मोदी द्वारा 2014 में सत्ता संभालने के बाद ‘मेक इन इंडिया’ का नारा आया, कुछ प्रयास भी हुए, लेकिन चीन से आयात बदस्तूर जारी रहा. यह सही है कि कई चीनी और अन्य विदेशी कंपनियों ने मेक इन इंडिया के तहत भारत में उत्पादन केंद्र शुरू किये, जिसके कारण व्यापार घाटा थोड़ा कम हुआ, लेकिन मार्च, 2020 में महामारी के बाद देश को चीन पर अत्यधिक निर्भरता की गलती का एहसास पूरी तरह हो गया. यह भी सही है कि चार-पांच वर्ष पहले से ही चीन की विस्तारवादी नीति और सीमाओं के अतिक्रमण के कारण देश की जनता ने चीनी वस्तुओं का बहिष्कार शुरू कर दिया था. सरकारी प्रयासों और जनता के आक्रोश के बावजूद चीन से व्यापार घाटा 2019-20 तक मात्र 48 अरब डालर तक ही घट सका.


फिर पिछले साल कोरोना ने नीति निर्माताओं की आंखें खोल दी. जरूरी मेडिकल उपकरणों की कमी ने तो देश को झकझोर दिया था. ऐसे में पूरे देश की एक आवाज थी कि देश को आत्मनिर्भर बनाने की जरूरत है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आह्वान किया कि हमारा लक्ष्य आत्मनिर्भरता का है और उसके लिए सभी को जुटना होगा. गांवों की आत्मनिर्भरता की बात होने लगी है.


इसके लिए वहां सामान्य खेती के अलावा मुर्गीपालन, पशुपालन, डेयरी, मशरूम उत्पादन, बांस उत्पादन, मछली पालन, बागवानी, खाद्य प्रसंस्करण, ग्रामीण उद्योग, हस्तकला हथकरघा समेत सभी प्रकार के उपायों व योजनाओं पर विचार होने लगा है. उसका परिणाम यह है कि आज हम चिकित्सा साजो-सामान का देश में ही उत्पादन करने लगे हैं तथा विभिन्न देशों में उनकी आपूर्ति भी कर रहे हैं.


आज वक्त है कि हम विचार करें कि क्या हुआ है कि चीनी सामान की डंपिंग के कारण हमारे औद्योगिक विकास पर विराम लग गया. क्यों जब भारत के उद्योग चीनी सामानों के आक्रमण के कारण दम तोड़ रहे थे, तो उस समय की सरकार आयात शुल्क में कटौती करती जा रही थी? क्यों हमारे अर्थशास्त्री उपभोक्ता को सस्ता सामान मिलने के नाम पर आंखें मूंदकर अपने उद्योगों के नष्ट होने का तमाशा देख रहे थे? आज महामारी ने हमारी आंखें खोल दी हैं कि कैसे महामारी के पहले चरण में चीन ने नकली टेस्टिंग किट भेजकर हमारी मुश्किलों को बढ़ाया, सामानों की कीमत बढ़ा दी, कच्चे माल की कीमतें कई गुना बढ़ाकर हमारे दवा उद्योग पर चोट की.


यही चीन नकली वैक्सीन भेजकर दुनिया का मजाक उड़ा रहा है. अमेरिकी सरकार का वैक्सीन पर रोक लगाने और पहले वैक्सीन के कच्चे माल को भी रोकने का निर्णय इसी प्रकार हमारे आत्मनिर्भरता के संकल्प को मजबूत रहा है. लगता है सरकार ने भी कमर कस ली है. वर्ष 2021-22 के बजट में अगले कुछ सालों में 1.97 लाख करोड़ रुपये का प्रोडक्शनलिंक्ड इंसेंटिव (पीएलआइ) की घोषणा इसी संकल्प की ओर इंगित करती है. देश की अर्थव्यवस्था, रोजगार और अस्मिता बचाने का शायद आत्मनिर्भरता यानी ‘स्वदेशी’ ही एक सही रास्ता है.

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Tuesday, April 27, 2021

संयम और सतर्कता से समाधान (प्रभात खबर)

By अशोक भगत 

 

रेमन धीरज क्यों न धरै/ संबत दो हजार के ऊपर ऐसो योग परै/ पूरब पश्चिम उत्तर दक्षिण, चहुं दिश काल परै/ अकाल मृत्यु जग माहीं व्यापै, प्रजा बहुत मरै/ सहस बरस लगि सतयुग व्यापै, सुख की दशा फिरै/ स्वर्ग फूल बन पृथ्वी फूलै, धर्म की बेलि बढै/ काल ब्याल से बही बचेगा, जो हंस का ध्यान धरै/ सूरदास हरि की यह लीला, टारे नाहिं टरै, इस रचना में सूरदास ने न केवल महामारी की भविष्यवाणी की है, अपितु उसका समाधान भी बताया है कि जो लोग हंस का ध्यान यानी प्रकृति के नियमों का पालन करेंगे, वे महामारी से बचेंगे.


कोविड-19 की दूसरी लहर बेहद खतरनाक और मारक रूप ग्रहण कर वापस आयी है. बीमारी की भयावहता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि लाश जलाने और दफनाने के लिए जगह कम पड़ने लगी है. ऐसी परिस्थिति में सरकार और व्यवस्था के प्रति अविश्वास का प्रदर्शन खुद व समाज को खतरे में डालने जैसा है. परिस्थितियां जब अपने हाथ में नहीं हों, तो उनसे समझौता करना पड़ता है.


ऐसे में संयम और सतर्कता ही ऐसे हथियार हैं, जिससे हम महामारी के महाजाल को काट सकते हैं. इस समय सत्ता के प्रति अविश्वास के बदले हम सभी को मिलकर इसका समाधान ढूंढना चाहिए.मानवीय इतिहास में कभी प्राकृतिक, तो कभी भौतिक आपदाओं के कारण लोग दुर्भिक्ष का शिकार होते रहे हैं. ईसा पश्चात 165 से 180 के बीच एशिया माइनर (दक्षिण-पूर्वी एशिया और वर्तमान तुर्की), मिस्र, ग्रीस और इटली में एक किस्म का बैक्टीरिया संक्रमण फैला था, जिसे एंटोनियन प्लेग कहा गया.


इस संक्रमण ने तब 50 लाख लोगों की जान ली थी और रोम की पूरी सेना को लगभग नष्ट कर दिया था. इसके बाद 541-42 में जस्टिनियन प्लेग ने यूरोप की एक बड़ी आबादी को खत्म कर दिया. काली मृत्यु यानी ब्लैक डेथ 1346 से 1353 के बीच में फैली. इसके कारण 7.50 करोड़ से 20 करोड़ लोगों की मृत्यु हुई. तीसरी महामारी 1855 में फैली, तब भारत और चीन में 1.2 करोड़ लोगों की मृत्यु हुई थी. विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक यह बैक्टीरिया 1960 तक सक्रिय था. हैजे की सात लहरें आयीं और इससे लाखों लोगों की मौत हुई.


भारत में महामारियों का इतिहास औपनिवेशिक काल में ज्यादा देखने को मिलता है. साल 1900 से लेकर अब तक जो महामारियां सामने आयी हैं, उसमें कोरोना वायरस महामारी 2019 में प्रारंभ हुई. यह बीमारी 2019 में चीन से शुरू हुई, लेकिन 2020 में यह पूरे विश्व में फैल गयी. निपाह वायरस 2018 में केरल में फैला. इसका संक्रमण चमगादड़ से प्रारंभ हुआ. एंसेफलाइटिस 2017 में मच्छरों के काटने से शुरू हुआ. साल 2014-2015 में स्वाइन फ्लू की शुरुआत गुजरात से हुई, जो बाद में कई राज्यों में फैल गया.


पीलिया 2015 में फैला. हेपेटाइटिस 2009 में गुजरात से फैला. डेंगू और चिकनगुनिया 2006 में पहले गुजरात और दिल्ली में फैला. सार्स 2002-2004 में बेहद खतरनाक रूप से फैला. सितंबर 1994 में न्यूमोनिक प्लेग ने सूरत में दस्तक दी. प्लेग का मुख्य कारण शहर में खुली नालियों, खराब सीवेज प्रणाली आदि थी. चेचक महामारी ने भी भारत को प्रभावित किया, जिस पर सोवियत संघ की सहायता से काबू पाया गया. स्पेनिश फ्लू ने 1918 में दस्तक दी, जो घातक महामारियों में एक था.


विज्ञान के विकास ने निस्संदेह हमें ताकत दी है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हम भगवान और प्रकृति को चुनौती दें. विज्ञान की प्रगति ने हमें प्रयोगधर्मी बना दिया और परंपराओं को दकियानूसी कहकर हम तिरस्कृत करने लगे, जबकि हमने देखा है कि कोरोना काल में पारंपरिक व्यवस्था ने ही महामारी की मारक क्षमताओं को कमजोर किया. कोरोना सभी महामारियों से ज्यादा खतरनाक और तेजी से फैलनेवाली बीमारी साबित हुई है.


महामारी के इतिहास में हमने देखा है कि यह बाहरी संक्रमण, गंदगी और जीवन शैली में परिवर्तन के कारण फैलती है. कोरोना के मामले में हम देख रहे हैं कि लोग घबरा जा रहे हैं. हर किसी को अस्पताल मिलना संभव नहीं है. फिर इसका इलाज घर पर रह कर भी हो सकता है. ज्यादातर लोग घर पर ही ठीक हुए हैं.


महामारी का संक्रमण अब छोटे कस्बों और सड़कों पर लगनेवाले ग्रामीण बाजारों में फैलने लगा है. इस कारण गांव में संक्रमण फैलने का खतरा बढ़ गया है. यदि ग्रामीण संक्रमण को रोकना है, तो गांव के लोगों को गांव में ही बाजार उपलब्ध कराना होगा. प्रखंड एवं पंचायत स्तर के स्वास्थ्य केंद्रों में संसाधनों का घोर अभाव है. इसे अविलंब मजबूत करने की जरूरत है.


स्वच्छता का पूरा ध्यान रखा जाए. गर्म पानी का सेवन और भाप लेना अपनी दिनचर्या में शामिल करें. संभव हो, तो अपने आसपास तुलसी, नीम, परिजात, बाकस, गिलोय आदि औषधीय पौधे लगायें और समय-समय पर उसका सेवन करें.


गांव की सीमा से बाहर ऐसे केंद्र बनें, जहां कुछ दिनों के लिए बाहरी लोगों को ठहराया जा सके. हर बात के लिए सरकार पर निर्भरता को खत्म करना होगा. बीमारी से लड़ने के लिए खुद की व्यवस्था भी खड़ी करें. सतर्कता, पारंपरिक ज्ञान, धैर्य, सकारात्मक सोच और प्रकृति के नियमों का पालन ही हमें बीमारी से निजात दिला सकता है. डर और घबराहट से स्थिति और बिगड़ सकती है.

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देर से मदद के लिए आया अमेरिका (प्रभात खबर)


By आशुतोष चतुर्वेदी 
 
इस समय देश कोरोना महामारी विकट दौर से गुजर रहा है. देश के हर हिस्से से से रोजाना दिल दहलाने वाली खबरें सामने आ रही हैं. कोरोना संक्रमण के मरीजों की संख्या रोज बढ़ रही है. ऑक्सीजन की कमी और कोरोना से होने वाली मौतें दिल को दहला दे रही हैं. संकट की इस घड़ी में सिंगापुर, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देश मदद के लिए आगे आए हैं.


लेकिन इस संकट पर अमेरिका की चुप्पी सबको हैरान कर रही थी जबकि भारत अमेरिका का रणनीतिक साझेदार है. यहां तक कि अमेरिका ने भारत में वैक्सीन निर्माण के लिए कच्चे माल की आपूर्ति करने से भी इनकार कर दिया था. रविवार को अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन ने कहा कि भारत में फैले व्यापक कोरोना संक्रमण के इस दौर में हम और मजबूती से भारत के साथ खड़े हैं. हम इस मामले में अपने साझेदार भारत सरकार के साथ मिलकर काम कर रहे हैं.


हम जल्द ही भारत के लोगों और भारतीय हेल्थकेयर हीरो के लिए अतिरिक्त सहायता मुहैया कराएंगे. अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जेक सुलिवन ने भी कहा कि भारत में कोरोना संकट को लेकर अमेरिका बहुत चिंतित है. हम अपने दोस्त और सहयोगी भारत की मदद की दिशा में काम कर रहे हैं जिससे वे इस महामारी का मुकाबला बहादुरी से कर सकेंगे.

अमेरिका के दो शीर्ष अधिकारियों के बयान के बाद उम्मीद जताई जा रही है कि बाइडेन प्रशासन कोरोना वैक्सीन कोविशील्ड के निर्माण में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल के निर्यात पर लगा प्रतिबंध हटा सकता है. इसके पहले भारत के राजनयिक हलकों से भी इस आशय का अनुरोध किया गया था. भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर ने अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन के साथ वैक्सीन के कच्चे माल को लेकर बातचीत की थी.

इससे पहले अमेरिका ने कोरोना के टीके के प्रमुख कच्चे माल के निर्यात पर प्रतिबंध लगा रखा था. इससे भारत में सीरम इंस्टीट्यूट के टीके कोविशील्ड के निर्माण की रफ्तार धीमी पड़ने की आशंका जताई जा रही थी. सीरम इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया के सीईओ अदार पूनावाला ने ट्वीट कर अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन से कच्चे माल के निर्यात के नियमों में ढील देने का अनुरोध किया था ताकि भारत की जरूरतों को पूरा किया जा सके.

लेकिन अमेरिकी ने टीका निर्माण के कच्चे माल से निर्यात प्रतिबंध हटाने से साफ इनकार कर दिया था. अमेरिकी विदेश विभाग के प्रवक्ता के प्रवक्ता नेड प्राइस ने कहा कि बाइडेन प्रशासन का पहला दायित्व अमेरिका के लोगों की जरूरतों का ध्यान रखना है. अभी अमेरिका अपने लोगों के महत्वाकांक्षी टीकाकरण के काम में लगा है. हमारी अमेरिकी लोगों के प्रति विशेष जवाबदेही है. जहां तक बाकी दुनिया की बात है, हम पहले अपना दायित्व को पूरा करने के साथ जो कुछ भी कर सकेंगे, वह करेंगे.

हालांकि अमेरिका की इस दलील में दम नहीं है कि उसे पहले अपने लोगों को वैक्सीन लगानी है. अमेरिका के पास टीके की जरूरत से ज्यादा अतिरिक्त खुराक हैं जिनका इस्तेमाल कभी नहीं किया जाना है. अमेरिका ने एस्ट्राजेनेका और जॉनसन एंड जॉनसन की वैक्सीन भी खरीद रखी हैं. इनमें से एस्ट्राजेनेका जो भारत में कोविशील्ड के नाम जानी जाती है, उसका अमेरिका ने इस्तेमाल ना करने का निर्णय किया है.

अमेरिका में टीकाकरण तेजी से चल रहा है और वहां चार जुलाई तक पूरी आबादी को टीका लगाने का काम पूरा हो जाएगा. यही स्थिति यूरोप के कई अन्य देशों की है. रिपोर्टों के अनुसार ब्रिटेन ने अपनी आबादी से लगभग चार गुना अधिक टीके की खुराक खरीद रखी हैं.

कहा जा रहा है कि ट्रंप के जाने के बाद बाइडन के नेतृत्व में असली अमेरिका की वापसी हुई है. आशय यह है कि अमेरिका अब अपने रंग में वापस आ गया है. उसको केवल अमेरिकी लोगों से मतलब है, दुनिया के जीने मरने से कोई लेना देना नहीं है. जबकि भारत में पिछले दो दशकों से भारत- अमेरिका मैत्री के तराने गाए जाते रहे हैं. भारत ने अपने पुराने मित्र रूस से हाथ खींचकर अमेरिका से हाथ मिलाकर कूटनीतिक दृष्टि से बड़ा परिवर्तन किया था.

तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के जमाने में अमेरिका के साथ परमाणु समझौता हुआ और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दौर में यह रिश्ता और परवान चढ़ा. इसमें तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की भारत यात्रा और उनका भव्य स्वागत शामिल है. और तो और जब कोरोना की पहली लहर आयी थी, तो उस दौरान हाइड्रो क्लोरोक्वीन इसके इलाज में कारगर मानी जा रही थी.

भारत ने इसके निर्यात पर प्रतिबंध लगा रखा था ताकि देश में इसकी कमी ना होने पाए. लेकिन तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका को इसकी आपूर्ति का अनुरोध किया. भारत ने निर्यात पर से रोक हटाकर अमेरिका को इसकी आपात आपूर्ति की थी. जहां तक भारत-अमेरिका के रिश्तों की बात है, तो भारत चार देशों के विशेष समूह क्वाड का सदस्य भी है जिसका पहला शिखर सम्मेलन एक महीने पहले मार्च में हुआ था.

कोरोना वायरस संक्रमण के बीच वर्चुअल तरीके से आयोजित क्वाड की इस बैठक में भारत की ओर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन, ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन और जापान के प्रधानमंत्री योशिहिदे सुगा शामिल हुए थे. द क्वाड्रीलेटरल सिक्योरिटी डायलॉग यानी क्वाड अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया और भारत के बीच कूटनीतिक बातचीत का महत्वपूर्ण फोरम है.

अमेरिका की पहल पर मार्च में इसकी बैठक हुई थी और इसका मकसद चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकना है. अमेरिका चीन को गंभीर चुनौती मानता है और भारत उसके प्रभाव को रोकने की महत्वपूर्ण कड़ी माना जाता है. हाल में अमेरिका ने जलवायु परिवर्तन को लेकर एक अहम वर्चुअल सम्मेलन किया. इसके लिये अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन के विशेष दूत जॉन केरी भारत आये थे और उन्होंने अमेरिका-भारत संबंधों के तराने गाये और कहा कि जलवायु परिवर्तन के खिलाफ लड़ाई में भारत की अहम भूमिका है.

जान कैरी ने कहा कि कोरोना महामारी के दौरान भारत ने वैक्सीन तैयार की और उसे दूसरे देशों तक भी पहुंचाया जिसकी तारीफ की जानी जानी चाहिए. पुरानी कहावत है कि सच्चे मित्र की पहचान विपत्ति के समय ही होती है. जो मित्र दुख की घड़ी में आपसे दूर हो जाता है, वह आपका सच्चा मित्र नहीं है.

गोस्वामी तुलसीदास ने मित्र की पहचान बताई है- जे न मित्र दुख होहिं दुखारी, तिन्हहि बिलोकत पातक भारी, निज दुख गिरि सम रज करि जाना, मित्रक दुख रज मेरु समाना. जो लोग मित्र के दुख से दुखी नहीं होते, उन्हें देखने से ही बड़ा पाप लगता है. अपने पर्वत के समान दुख को धूल के समान और मित्र के धूल के समान दुख को सुमेरु (पर्वत) के समान जाने, वही मित्र है.
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टीकाकरण पर जोर (प्रभात खबर)

देश कोरोना संक्रमण की भयावह स्थिति से जूझ रहा है. गंभीर रूप से बीमार लोगों की बड़ी संख्या के कारण अस्पतालों पर दबाव बहुत बढ़ गया है. इसी बीच अप्रैल के मध्य में टीकाकरण अभियान की गति भी बाधित हुई है. अब एक मई से सभी वयस्क टीका ले सकेंगे. इस संबंध में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सभी को टीका लेने की कोशिश करनी चाहिए क्योंकि महामारी से बचाव का यही एक ठोस उपाय है.



केंद्र और राज्य सरकारें टीकों की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए प्रयासरत हैं. दिशानिर्देशों के अनुसार, टीके बाजार से खरीदे जा सकेंगे और राज्य सरकारों को भी समुचित मात्रा में टीकों की खुराक खरीदनी होगी. उत्पादक कंपनियां 50 प्रतिशत खुराक राज्य सरकारों दे सकती हैं और बाजारों में मुहैया करा सकती हैं. इस बारे में कंपनियों को एक मई से पहले जानकारी देने को कहा गया है.



एक नियम यह भी है कि 18 साल से ऊपर के लोगों को टीकाकरण के लिए कोविन वेबसाइट या आरोग्य सेतु एप पर ऑनलाइन पंजीकरण कराना जरूरी होगा. इन सभी वजहों से शुरू में ही सभी के लिए टीके उपलब्ध हो पाना मुश्किल है, इसलिए हमें संयम रखना होगा. जिन्हें टीका मिले, उन्हें इसे ले लेना चाहिए ताकि संक्रमण की रोकथाम में मदद मिले.


अब तक के अनुभव बताते हैं कि जो कुछ लोग दोनों खुराक लेने के बाद भी संक्रमित हुए, उन्हें अधिक परेशानी नहीं हुई तथा अधिकतर लोग पूरी तरह सुरक्षित हैं. इस संबंध में किसी भी तरह की अफवाह या अपुष्ट सूचनाओं पर ध्यान देने की जरूरत नहीं है. उम्मीद है कि निजी केंद्रों और अस्पतालों के साथ सरकारी स्वास्थ्य तंत्र के साझे प्रयास से अधिक-से-अधिक लोगों को टीकाकरण हो सकेगा. एक चिंता टीके की कीमत को लेकर है.


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फिर स्पष्ट किया है कि केंद्र सरकार की ओर से टीके मुफ्त दिये जायेंगे. उन्होंने राज्य सरकारों से भी आग्रह किया है कि वे बिना कोई दाम लिये खुराक दें. अनेक राज्यों ने ऐसी घोषणा कर भी दी है. इससे गरीब और निम्न आय वर्ग को राहत मिलेगी. पंजीकरण तथा केंद्रों की व्यवस्था से जुड़े मसलों पर राज्य सरकारों को बहुत ध्यान देना चाहिए ताकि टीका भी ठीक से मिल सके और किसी तरह की अफरातफरी न हो.


केंद्र सरकार ने राज्यों को ठोस योजना बनाने, निगरानी रखने और जानकारियां जुटाने का निर्देश दिया है. आशा है कि मध्य जनवरी से जारी इस अभियान के अब तक के अनुभवों से सीख लेते हुए खुराकों की बर्बादी भी रूकेगी और टीकाकरण में भी तेजी आयेगी. कुछ महीनों में दो से अधिक टीके भी उपलब्ध होने की उम्मीद है. अब तक 13 करोड़ खुराक दी जा चुकी है. चाहे संक्रमण रोकना हो या टीकाकरण तेज करना हो, यह सरकारों, निजी क्षेत्र और नागरिकों के परस्पर सहयोग से ही हो सकेगा. इसलिए हमें धैर्य के साथ महामारी का मुकाबला करना है.

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Friday, April 23, 2021

जजों की कमी (प्रभात खबर)

विभिन्न उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों के रिक्त पदों पर जल्दी बहाली सुनिश्चित करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार को तीन से चार सप्ताह का समय दिया है. जजों की बहाली को लेकर सरकार और सर्वोच्च न्यायालय में तनातनी का यह पहला मौका नहीं है. जानकारों की मानें, तो नियुक्ति प्रक्रिया में देरी के लिए दोनों पक्षों को जिम्मेदारी लेनी चाहिए.



अक्सर ऐसा होता है कि सर्वोच्च न्यायालय कॉलेजियम द्वारा समुचित संख्या में नाम नहीं भेजे जाते और सरकार उन नामों को मंजूर या खारिज करने में बहुत समय लगा देती है. उच्च न्यायालयों में कुल 1080 जजों के पद निर्धारित हैं, जिनमें से 416 पद खाली हैं. कॉलेजियम ने सरकार से 196 नामों को नियुक्त करने की सिफारिश की है. नियमों के अनुसार, किसी पद के रिक्त होने के छह माह पहले नामों का प्रस्ताव भेज सकता है.



सरकार का यह कहना सही है कि 220 नाम अभी तक नहीं भेजे गये हैं, लेकिन यह बाकी नामों के बारे में निर्णय लेने में देरी का आधार नहीं हो सकता है. नियुक्तियों में देरी की वज़ह से रिक्तियों की संख्या में भी वृद्धि हो जाती है. इसमें कोई दो राय नहीं है कि उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जैसे बेहद अहम पद पर नियुक्ति से पहले प्रस्तावित नामों की नियमानुसार जांच-परख जरूरी है, परंतु 2017 में कॉलेजियम द्वारा प्रक्रिया निर्धारित होने के बावजूद ऐसी देरी का होना चिंताजनक है.


उस प्रक्रिया के अनुसार राज्यों को छह सप्ताह के भीतर अपनी राय से केंद्र सरकार को अवगत कराना होता है. यदि इस अवधि में राज्य की अनुशंसा नहीं प्राप्त होती है, तो केंद्र सरकार यह मान सकती है कि राज्य को उन नामों पर कोई आपत्ति नहीं है. हालांकि इस नियमन में केंद्र सरकार के लिए कोई सीमा नहीं है, लेकिन यह प्रावधान है कि भारत के प्रधान न्यायाधीश अपनी सिफारिश या सलाह चार सप्ताह के भीतर केंद्रीय विधि मंत्री को भेजेंगे, जिन्हें तीन सप्ताह के भीतर उस प्रस्ताव को प्रधानमंत्री के पास भेजना होता है.


उसके बाद प्रधानमंत्री उस सूची पर राष्ट्रपति की सलाह लेते हैं. बहरहाल, देश की निचली अदालत से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक लंबित मामलों की भारी संख्या को देखते हुए सभी संबद्ध पक्षों को नियुक्तियों को प्राथमिकता देना चाहिए. जैसा कि अनेक विशेषज्ञों ने कहा है, ऐसे मामलों को लेकर सरकार और सर्वोच्च न्यायालय के बीच विवाद इस हद तक नहीं बढ़ जाना चाहिए कि मामला सुनवाई तक पहुंच जाए. सभी संबद्ध पक्षों को रिक्त पदों पर यथाशीघ्र बहाली सुनिश्चित करना चाहिए.


इस संबंध में संविधान के अनुच्छेद 224-ए को लागू करने का सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय सराहनीय है. लगभग छह दशक से इस अनुच्छेद को व्यवहार में नहीं लाया गया है. अब बड़ी संख्या में लंबित मामलों के निपटारे के लिए उच्च न्यायालय दो से पांच साल के लिए सेवानिवृत्त जजों की नियुक्ति कर सकते हैं. इससे कुछ राहत मिलने की उम्मीद है.

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जीवन के लिए जरूरी है टीका (प्रभात खबर)

By प्रसांता दास 

 

टीका आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक है. टीकाकरण के कारण छोटी उम्र में होनेवाली बीमारियों एवं मृत्युदर में काफी कमी आयी है. कोरोना महामारी हमें बीमारियों से उत्पन्न उस भयावह स्थिति की याद दिलाती है, जिसे हम रोक नहीं सकते. लेकिन यह भी सच है कि कोविड टीका के कारण ही इस महामारी को समाप्त करने और जीवन के पुनर्निर्माण का एक तरीका अब हमारे पास उपलब्ध है. कोरोना महामारी आने के बाद से सरकार ने संसाधनों का उपयोग आपातस्थिति से निपटने के लिए किया है, ताकि सभी के पास मास्क, सेनेटाइजर, साबुन और टीके की सेवा उपलब्ध हो.



हालांकि, सारे संसाधनों का रुख एक तरफ होने के कारण निवारणीय रोगों से बच्चों को बचानेवाला नियमित टीकाकरण कार्यक्रम प्रभावित हुआ है. डब्ल्यूएचओ के अनुसार, एक वर्ष से कम उम्र के लगभग 80 करोड़ बच्चे ऐसी बीमारियों से जूझ रहे हैं, जिससे उनका बचाव किया जा सकता है. हमारा राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम 26 करोड़ से अधिक बच्चों एवं 29 करोड़ गर्भवती महिलाओं को कवर करता है. भारत ने 2014 में सामुदायिक जागरूकता, डोर-टू-डोर अभियानों एवं निगरानी कार्यक्रमों के माध्यम से 90 प्रतिशत बच्चों के टीकाकरण का लक्ष्य निर्धारित किया था.



टीकाकरण कार्यक्रम में बाधा बच्चों, अजन्मे बच्चों एवं गर्भवती माताओं के स्वास्थ्य को गंभीर रूप से प्रभावित करता है. राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के अनुसार केवल मार्च, 2020 में ही एक लाख बच्चों को बीसीजी का डोज नहीं मिल पाया. लगभग दो लाख बच्चों को पैंटावैलेंट (डिप्थीरिया, टेटनस, काली खांसी, हेपेटाइटिस-बी और हिमोफिलस इन्फ्लुएंजा टाइप बी) टीके की खुराक नहीं मिल पाय.


झारखंड सरकार और यूनिसेफ ने कोरोना महामारी के नियंत्रण तथा नियमित टीकाकरण बहाली हेतु कई उपाय किये हैं, जैसे कि सभी सेवा प्रदाताओं को प्रशिक्षित किया गया है कि कैसे वे कोविड-19 प्रोटोकॉल का पालन करते हुए जरूरतमंदों को सहायता एवं सहयोग दे सकते हैं. इसी प्रकार, स्वास्थ्यकर्मियों को मनोसामाजिक परामर्श प्रदान किया गया है. राज्य सरकार द्वारा देश के अलग-अलग हिस्सों से लौट रहे प्रवासी श्रमिकों के बच्चों के लिए एक विशेष टीकाकरण अभियान भी शुरू किया गया. राज्य के 11 जिलों में, जहां आंशिक या संयुक्त रूप से बड़े पैमाने पर टीकाकरण सेवा उपलब्ध नहीं थी, वहां मिशन इंद्रधनुष 3.0 के तहत अभियान शुरू किया गया.


वर्तमान में कोविड-19 महामारी के कारण माता-पिता के अंदर टीकाकरण को लेकर शंका पैदा हुई है. कुछ भ्रामक सूचनाओं के कारण बच्चों की जिंदगी को लेकर खतरा पैदा हुआ है. बच्चों के लिए नियमित टीकाकरण जरूरी है और कोविड-19 का प्रकोप याद दिलाता है कि टीके कितने मूल्यवान हैं. टीके की सुरक्षा के बिना, रोग जल्दी और भयानक परिणामों के साथ फैल सकते हैं. उदाहरण के लिए, खसरा एवं अन्य बीमारियां लगातार खतरा बनी हुई हैं.


हम भाग्यशाली हैं कि इन बीमारियों से बचाव के लिए हमारे पास टीका उपलब्ध हैं. यह महत्वपूर्ण है कि बच्चों के टीकाकरण को अपडेट रखा जाये, क्योंकि यह उन्हें कई गंभीर बीमारियों से बचाते हैं. कोरोना के दौर में नियमित टीकाकरण को लेकर किसी प्रकार के भ्रम तथा सूचना के लिए स्वास्थ्य सेवा प्राधिकारी से संपर्क करना चाहिए.


कोविड-19 की स्थिति हर दिन बदल रही है, इसीलिए उसी के अनुरूप टीकाकरण कार्यक्रम की बहाली को भी समायोजित करने का प्रयास किया जा रहा है. नियमित टीकाकरण के लिए टीकाकरण केंद्र नहीं मिलने की स्थिति में चुपचाप नहीं बैठना चाहिए, बल्कि इसके बारे में उचित प्राधिकारी को सूचित करना चाहिए, ताकि बच्चे को समय पर टीका प्राप्त हो सके.


कोविड-19 उपयुक्त व्यवहार के बारे में भी बहुत कुछ कहा और लिखा गया है, लेकिन नियमित रूप से हाथ धोने, शारीरिक दूरी तथा स्वच्छता अभ्यासों को बनाये रखने के अलावा, माता-पिता को शिशुओं को संक्रमण से बचाने के लिए अतिरिक्त देखभाल करनी चाहिए. सुरक्षा सावधानियों के साथ अपने बच्चे को स्तनपान करायें. वर्तमान में ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिला है, जो बताता हो कि स्तनपान कोरोना संक्रमण को प्रसारित कर सकता है, लेकिन बच्चे को स्तनपान कराते वक्त सामान्य स्वच्छता एवं श्वसन सुरक्षा नियमों का पालन अवश्य करना चाहिए.


बच्चों के कपड़े की साफ-सफाई एवं उनके रहने के स्थान की स्वच्छता महत्वपूर्ण है. यह सुनिश्चित करें कि छोटे बच्चों के पास एक देखभाल करने वाला व्यक्ति अवश्य रहे. देखभालकर्ताओं को नियमित रूप से अपने हाथ साबुन या सेनेटाइजर से साफ करते रहना चाहिए. बच्चों के साथ उन चीजों को साझा करने से भी बचना चाहिए जो परिवार के दूसरे सदस्यों के द्वारा उपयोग किये जाते हैं, जैसे कि कप आदि. इसके अलावा देखभालकर्ता यदि खुद बीमार महसूस करते हों, तो उन्हें बच्चे से दूर रहना चाहिए.


एक माता-पिता के रूप में, मैं उस चिंता को समझ सकता हूं, जो बच्चे के टीकाकरण के दौरान मन में उठ सकती है. लेकिन माता-पिता के लिए सबसे महत्वपूर्ण यह है कि वे शांत रहें, क्योंकि यदि माता-पिता चिंतित होते हैं तो इसका असर बच्चों पर भी पड़ता है. अंत में, याद रखें कि यह महत्वपूर्ण है कि बच्चों को उनके पहले जन्मदिन तक उम्र के हिसाब से निर्धारित सभी टीके लगवाये जायें, क्योंकि यही वह समय होता है, जब वे बीमारियों की चपेट में आते हैं. यदि आप बच्चों को शुरुआती दौर में ही टीकाकरण कराते हैं, तो उनकी प्रतिरक्षा प्रणाली मजबूत होकर बीमारियों से लड़ने और उनका सामना करने में सक्षम बनते हैं. याद रखें कि टीका जीवन की रक्षा करता है.

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मध्य वर्ग की बढ़ती चुनौतियां (प्रभात खबर)

By डॉ. जयंतीलाल भंडारी 

 

देश का मध्य वर्ग एक बार फिर जहां कोरोना की दूसरी घातक लहर के कारण अपने उद्योग, कारोबार, रोजगार और आमदनी संबंधी चिंताओं से ग्रसित है, वहीं बड़ी संख्या में कोरोना से पीड़ित मध्यवर्गीय परिवारों के बजट बिगड़ गये हैं. यद्यपि एक अप्रैल, 2021 से लागू हुए वर्ष 2021-22 के बजट में वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने स्वास्थ्य, शिक्षा, बुनियादी ढांचा और शेयर बाजार को प्रोत्साहन देने के लिए जो चमकीले प्रोत्साहन सुनिश्चित किये हैं, उनका लाभ अप्रत्यक्ष रूप से मध्य वर्ग को अवश्य मिलेगा, लेकिन इस बजट में छोटे आयकर दाताओं और मध्य वर्ग की उम्मीदें पूरी नहीं हुई हैं.



यह स्पष्ट दिखायी दे रहा है कि कोरोना महामारी के कारण पैदा हुए आर्थिक हालात का मुकाबला करने के लिए आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत मध्य वर्ग को कोई विशेष राहत नहीं मिली है. गौरतलब है कि देश का सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (एमएसएमइ) फिर हिचकोले खा रहा है. एक बार फिर से जहां देश के कई राज्यों में लॉकडाउन जैसी सख्त पाबंदियां और नाइट कर्फ्यू का परिदृश्य निर्मित होते हुए दिखायी दे रहा है, वहीं लॉकडाउन के कारण बड़े शहरों से एक बार फिर प्रवासी मजदूरों का पलायन होने लगा है.



उद्योग व कारोबार भी इसलिए चिंतित हैं क्योंकि देश में कोविड-19 संक्रमण का आंकड़ा प्रतिदिन तीन लाख को पार कर गया है. ऐसे में देश की विनिर्माण गतिविधियों और सर्विस सेक्टर की रफ्तार सुस्त पड़ गयी है. उद्योग और बाजार के ऐसे चिंताजनक परिदृश्य ने मध्य वर्ग की नींद उड़ा दी है. उल्लेखनीय है कि अमेरिका के प्यू रिसर्च सेंटर द्वारा प्रकाशित भारत के मध्य वर्ग की संख्या में कमी आने से संबंधित रिपोर्ट के मुताबिक, कोविड-19 महामारी के कारण आये आर्थिक संकट से एक साल के दौरान भारत में मध्य वर्ग के लोगों की संख्या करीब 9.9 करोड़ से घटकर करीब 6.6 करोड़ रह गयी है.


रिपोर्ट के मुताबिक, प्रतिदिन 10 डॉलर से 20 डॉलर (यानी करीब 700 रुपये से 1500 रुपये प्रतिदिन) के बीच कमानेवाले को मध्य वर्ग में शामिल किया गया है. रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि चीन में कोरोना संक्रमण के कारण पिछले एक वर्ष में मध्य आय वर्ग की संख्या करीब एक करोड़ ही घटी है.


जहां कोविड-19 के कारण देश में मध्य वर्ग के लोगों की संख्या कम हुई है, वहीं भारतीय परिवारों पर कर्ज का बोझ बढ़ा है. विभिन्न अध्ययनों में कहा गया है कि कोरोना महामारी की वजह से बड़ी संख्या में लोगों की रोजगार मुश्किलें बढ़ी हैं. जहां वर्क फ्रॉम होम (घर से काम करने) की वजह से टैक्स में छूट के कुछ माध्यम कम हो गये, वहीं बड़ी संख्या में लोगों के लिए डिजिटल तकनीक, ब्रॉडबैंड, बिजली का बिल जैसे खर्चों के भुगतान बढ़ने से आमदनी घट गयी है. मध्य वर्ग की स्तरीय शैक्षणिक सुविधाओं संबंधी कठिनाइयां बढ़ती जा रही हैं.


चाहे सामाजिक प्रतिष्ठा और जीवन स्तर के लिए मध्य वर्ग के द्वारा हाउसिंग लोन, ऑटो लोन, कंज्यूमर लोन लिये गये हैं, लेकिन इस समय मध्य वर्ग के करोड़ों लोगों के चेहरे पर महंगाई, बच्चों की शिक्षा, रोजगार, कर्ज पर बढ़ता ब्याज जैसी कई चिंताएं साफ दिखायी दे रही हैं. उल्लेखनीय है कि कोरोना की पहली लहर बड़ी संख्या में मध्य वर्ग की आमदनी घटा चुकी है और मध्य वर्ग के बैंकों के बचत खातों को बहुत कुछ खाली कर चुकी है.


देश में निजी और विभिन्न सरकारी सेवाओं में काम करनेवाले लाखों मध्यवर्गीय लोग कोरोना की दूसरी लहर के बाद निजी क्षेत्र के महंगे स्वास्थ्य संबंधी खर्च की वजह से गरीब वर्ग में शामिल होने से सिर्फ एक कदम दूर हैं. यहां यह भी महत्वपूर्ण है कि पिछले एक वर्ष में देश में मध्य वर्ग के सामने एक बड़ी चिंता उनकी बचत योजनाओं और बैंकों में स्थायी जमा (एफडी) पर ब्याज दर घटने संबंधी भी रही हैं.


यद्यपि सरकार ने एक अप्रैल, 2021 से कई बचत स्कीमों पर ब्याज दर और घटा दी थी, लेकिन फिर शीघ्र ही कुछ ही घंटों में यूटर्न लेते हुए यह निर्णय वापस ले लिया गया, सरकार के द्वारा यह कहा गया था कि बचत स्कीमों पर बैंक अब चार के ब्जाय 3.5 फीसदी सालाना ब्याज देंगे. सीनियर सिटीजन के लिए बचत स्कीमों पर देय ब्याज 7.4 फीसदी से घटाकर 6.5 फीसदी कर दिया गया है.


नेशनल सेविंग सर्टिफिकेट पर देय ब्याज 6.8 फीसदी से घटाकर 5.9 फीसदी तथा पब्लिक प्रोविडेंट फंड स्कीम पर देय ब्याज 7.1 फीसदी से घटाकर 6.4 फीसदी कर दिया गया है. वास्तव में सरकार के द्वारा इस निर्णय पर यूटर्न से बचत से भविष्य के जीवन संबंधी योजनाओं पर निर्भर देश के करोड़ों मध्यवर्गीय लोगों को राहत मिली है.


कोरोना संक्रमण को रोकने के लिए 45 वर्ष से कम उम्र के उन लोगों का टीकाकरण करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है, जो संक्रमण के उच्च जोखिम में हैं. उन लोगों की रक्षा करना भी महत्वपूर्ण है, जिन्हें काम के लिए घर से बाहर निकलना पड़ता है. ऐसे में खुदरा और ट्रेड जैसे क्षेत्रों में काम कर रहे लोगों की कोरोना वायरस से सुरक्षा जरूरी है. हम उम्मीद करें कि सरकार चालू वित्त वर्ष 2021-22 में कोरोना महामारी और विभिन्न आर्थिक मुश्किलों के कारण मध्य वर्ग की परेशानियों को कम करने हेतु, मध्य वर्ग को संतोषप्रद वित्तीय राहत और प्रोत्साहन देने की डगर पर आगे बढ़ेगी. इसके साथ-साथ उद्योग और कारोबार से जुड़े मध्य वर्ग की मुश्किलें कम करने के लिए वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) की पेचीदगियों को कम करना होगा.


एमएसएमइ को संभालने के लिए एक बार फिर से सरकार के द्वारा ब्याज राहत मुहैया कराने की राह में आगे बढ़ना होगा. एक बार फिर से रिजर्व बैंक के द्वारा छोटे कर्जधारकों के लिए मोरेटोरियम योजना (बाद में किस्तें जमा करने की छूट) पर तुरंत विचार करना होगा.


हमें उम्मीद करना चाहिए कि मध्य वर्ग भी कोरोना संक्रमण से बचाव के लिए ‘दवाई भी और कड़ाई भी’ के मंत्र का समुचित रूप से परिपालन करेगा. महामारी की रोकथाम सुनिश्चित करने के लिए यह बेहद जरूरी है. हमें उम्मीद करना चाहिए कि इस समय स्वास्थ्य क्षेत्र पर जो सार्वजनिक व्यय सकल घरेलू उत्पादन (जीडीपी) का करीब एक फीसदी है, उससे बढ़ाकर करीब ढाई फीसदी तक की जायेगी.


इससे मध्य वर्ग को स्वास्थ्य संबंधी खर्चों में बचत करने में बड़ी राहत मिलेगी. अब यह उपयुक्त होगा कि कोरोना की दूसरी लहर के रुकने तक एफडी और छोटी बचत योजनाओं पर ब्याज दरों में कटौती न की जाये. इससे मध्य वर्ग की क्रय शक्ति बढ़ेगी, नयी मांग का निर्माण होगा और विकास दर में बढ़ोतरी होगी.

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Thursday, April 22, 2021

टीका बर्बाद न हो (प्रभात खबर)

हामारी से मचे चौतरफा त्राहिमाम के बीच टीकों की बर्बादी की खबर बेहद चिंताजनक है. सूचना के अधिकार के तहत मिली जानकारी के मुताबिक, 11 अप्रैल तक देश के विभिन्न राज्यों में 44 लाख से अधिक खुराक खराब हो गयी. जनवरी के मध्य से इस तारीख तक 10 करोड़ खुराक इस्तेमाल हुई है. किसी भी टीकाकरण अभियान में कुछ खुराक बर्बाद होना सामान्य बात है, लेकिन मौजूदा कोरोना काल कोई सामान्य स्थिति नहीं है. यह पहला ऐसा अभियान है, जिसके तहत समूची वयस्क आबादी का टीकाकरण होना है. टीका ही संक्रमण से बचाव की एकमात्र उपलब्ध दवा है. इस कारण इसके उत्पादन और वितरण पर भी भारी दबाव है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बहुत पहले आग्रह किया था कि टीकों को बर्बाद न होने दिया जाए. कई विशेषज्ञ बार-बार इस ओर ध्यान दिलाते रहे हैं. इसके बावजूद तमिलनाडु में 12.10, हरियाणा में 9.74, पंजाब में 8.12, मणिपुर में 7.8 और तेलंगाना में 7.55 प्रतिशत खुराक किसी काम की न रहीं. कुछ अन्य राज्यों में भी बर्बादी का अनुपात आपत्तिजनक रहा है.



ऐसे में उन राज्यों की प्रशंसा की जानी चाहिए, जहां अधिक-से-अधिक खुराक लोगों को दी गयी. इस संदर्भ में यह उल्लेख करना जरूरी है कि मौजूदा टीके ऐसे हैं, जिनके खराब होने की आशंका शून्य है. जो राज्य टीकों की कमी को मुद्दा बनाते रहे, जिससे इस मसले पर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का दौर भी चला, उन्हें इस बर्बादी का स्पष्टीकरण देना चाहिए. सभी राज्यों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि आगे इस संबंध में जाने-अनजाने लापरवाही न हो. सवाल केवल दवा की कुछ खुराक के खराब होने का नहीं है, यह लोगों के जीने-मरने का मसला है. मान लें कि अगर 44 लाख खुराक का आधा हिस्सा भी लोगों को मिल जाता, तो कम-से-कम 10 लाख लोग संक्रमण से सुरक्षित हो जाते. केंद्र सरकार ने राज्यों को उपलब्ध टीकों की समुचित आपूर्ति राज्यों को की है. प्रधानमंत्री मोदी के निर्देश के बाद अब नये तेवर के साथ इसे बढ़ाया जा रहा है. लेकिन, जैसा दिल्ली उच्च न्यायालय ने निर्दिष्ट किया है,



केंद्र सरकार को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि टीकों की अनावश्यक और अनुचित बर्बादी न हो. न्यायालय ने यह भी रेखांकित किया है कि खुराक खराब होने के लिए केंद्र सरकार भी एक हद तक जिम्मेदार है क्योंकि ठीक से योजना का निर्धारण नहीं किया गया था. सरकार और दवा नियंत्रण निदेशक को राज्यों को स्पष्ट दिशा-निर्देश और आवश्यक मार्गदर्शन देना चाहिए. एक मई से सभी वयस्क टीका ले सकेंगे. इसके साथ टीकाकरण की गति को भी तेज करने की कोशिश की जा रही है. ऐसे में बड़ी मात्रा में खुराक की बर्बादी बेहद नुकसानदेह साबित होगी. संक्रमण के रोजाना मामलों की संख्या तीन लाख के आसपास पहुंच गयी है. अब बचाव के उपायों पर जोर देते हुए टीकाकरण अभियान को प्रभावी बनाने पर ध्यान केंद्रित होना चाहिए.

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धरती बचाने में योगदान करें (प्रभात खबर)

By पंकज चतुर्वेदी 

 

इस समय पूरा देश बिस्तर, ऑक्सीजन, दवा आदि की कमी के संकट से जूझ रहा है और इसके लिए तंत्र को दोष दे रहा है. हम किसी बीमारी के फैल जाने के बाद उसके निदान के लिए हैरान-परेशान होते हैं, जबकि हमारी सोच समस्या के आने या उसके विकराल होने से पहले उसे रोकने की होनी चाहिए. इतनी बड़ी आबादी, वह भी बेहद असमान सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि की, के सामने ऐसी विपदा में तंत्र का ढह कर बेहाल हो जाना लाजिमी है, लेकिन इससे बड़ा दुख यह है कि तंत्र हालात के गंभीर होने के कारकों पर नियंत्रण करने में असफल रहा है.



सारी दुनिया जिस कोरोना से कराह रही है, वह असल में जैव विविधता से छेड़छाड़, धरती के गर्म होते मिजाज तथा वातावरण में कार्बन की मात्रा बढ़ने के मिले-जुले प्रभाव की महज झांकी है. पर्यावरण पर खतरा धरती के अस्तित्व के लिए चुनौती बन गया है, बात महज पानी के दूषित होने या वायु में जहर फैलने तक नहीं रह गयी है, इन सबका समग्र कुप्रभाव जलवायु परिवर्तन के रूप में हमारे सामने है.



गौर करें, जिन शहरों- दिल्ली, मुंबई, प्रयागराज, लखनऊ, इंदौर, भोपाल, पुणे आदि- में महामारी इस बार सबसे घातक है, वहां की वायु गुणवत्ता बीते कई महीनों से बेहद गंभीर है. दिल्ली से सटा गाजियाबाद बीते तीन सालों से देश के सबसे प्रदूषित शहरों की सूची में पहले तीन स्थानों पर है. गत पांच सालों में दिल्ली के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल एम्स में सांस के रोगियों की संख्या 300 गुना बढ़ी है. एक अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट के मुताबिक, अगर प्रदूषण के स्तर को काबू में नहीं किया गया, तो 2025 तक दिल्ली में हर साल करीब 32,000 लोग जहरीली हवा के शिकार होकर असमय मौत के मुंह में जायेंगे.


सनद रहे, वायु प्रदूषण के कारण दिल्ली में हर घंटे एक मौत होती है. दुनिया के तीस सबसे दूषित शहरों में भारत के 21 शहर हैं. हमारे यहां 2019 में अकेले वायु प्रदूषण से 17 लाख लोग मारे गये थे. खतरे का अंदाजा इससे भी लगाया जा सकता है कि वायु प्रदूषण करीब 25 फीसदी फेफड़े के कैंसर की वजह है. यह तथ्य है कि कोरोना वायरस जब फेफड़ों या िचकित्सा तंत्र पर काबिज होता है, तो रोगी की मृत्यु की संभावना बढ़ जाती है.


अब पूरे देश से खबर आ रही है कि अमुक सरकारी अस्पताल में पिछले साल खरीदे गये वैंटिलेटर खोले तक नहीं गये या उनकी गुणवत्ता घटिया है या फिर उन उपकरणों को संचालित करने वाला स्टाफ नहीं है. यह एक बानगी है कि हमारा चिकित्सा तंत्र श्वास रोग से जूझने को कितना तैयार है. ठंड के दिनों में लोग पराली जलाने को लेकर चिल्लाते मिलेंगे, लेकिन शहरों की आबो-हवा खराब होने के मूल कारणों- बढ़ती आबादी, व्यापार-सत्ता और पूंजी का महानगरों में सिमटना, निजी वाहनों की संख्या में इजाफा, विकास के नाम पर लगातार धूल उगलनेवाली गतिविधियां, सड़कों पर जाम आदि- से निपटने के तरीकों पर कभी किसी ने काम नहीं किया.


यह एक कड़वी चेतावनी है कि यदि शहर में रहनेवालों की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ायी नहीं गयी, उन्हें पर्याप्त पौष्टिक आहार नहीं मिला, साफ हवा नहीं मिली, तो कोरोना से भी खतरनाक महामारियां स्थायी रूप से घर कर जायेंगी. वैश्विक भूख तालिका में हमारा स्थान दयनीय स्थिति में है और पिछले साल बढ़ी बेरोजगारी के बाद यह समस्या विकराल हो गयी है. भूखा रहेगा इंडिया, तो कोरोना से कैसे लड़ेगा इंडिया?


पिछले एक दशक के दौरान मानवीय जीवन पर संक्रामक रोगों की मार बहुत जल्दी-जल्दी पड़ रही है, ऐसी बीमारियों का 60 फीसदी हिस्सा जंतुजन्य है, जिसका 72 फीसदी सीधा जानवरों से इंसान में आ रहा है. कोविड-19, एचआइवी, सार्स, जीका, हेंद्रा, ईबोला, बर्ड फ्लू आदि सभी संक्रमण जंतुओं से ही आये हैं. दुखद है कि भौतिक सुखों की चाह में इंसान ने पर्यावरण के साथ जमकर छेड़छाड़ की, जिसके परिणामस्वरूप जंगल, वन्य जीव और इंसान के बीच दूरियां कम होती जा रही हैं.


यह बात जानते-समझते हुए भी भारत में गत साल संपूर्ण तालाबंदी के दौरान लगभग पचास से ज्यादा परियोजनाओं को पर्यावरण नियमों में ढील देकर मंजूरी दी गयी. नये जंगल के आंकड़े बेमानी हैं क्योंकि जैव-विविधता की रक्षा के लिए प्राकृतिक रूप से लगे, पारंपरिक और सघन वन अनिवार्य हैं, जहां इंसान का दखल लगभग न हो.


पहले कहा जाता था कि प्रदूषण का असर केवल शहरों में है, लेकिन आज सबसे ज्यादा प्रभावित गांव ही हो रहे हैं. खेती अब अनिश्चितता से गुजर रही है. उत्पाद की गुणवत्ता गिर रही है तथा मवेशियों के प्रजनन और दुग्ध क्षमता पर भी असर हो रहा है. उधर कोरोना के भय से हुए पलायन के चलते गांवों पर बोझ बढ़ा, तो साफ पानी के संकट ने गांवों के निरापद स्वरूप को छिन्न-भिन्न कर दिया है.


असल में कोविड का भयावह रूप इंसान की प्रकृति के विरुद्ध जिद का नतीजा है. बीते साल तालाबंदी में प्रकृति खिलखिला उठी थी, लेकिन इंसान जल्द से जल्द प्रकृति की इच्छा के विपरीत फिर से कोरोना-पूर्व जीवन में लौटने को आतुर था. सरकार व समाज को समझना होगा कि उत्तर-कोरोना काल अलग है, जिसमें विकास की परिभाषा बदलनी होगी. पर्यावरण को थोड़ा उसके मूल स्वरूप में आने दें. जबरदस्ती करेंगे, तो प्रकृति भयंकर प्रकोप दिखायेगी.

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अफगानिस्तान से वापसी के मायने (प्रभात खबर)

By कुमार प्रशांत 

 

अंतरराष्ट्रीय राजनीति की बिसात पर अमेरिका आज जैसा घिरा है वैसा शायद पहले कभी नहीं था. राष्ट्रपति बाइडेन जो भी चाल चलने की सोचते हैं, वहीं सीधी मात सामने दिखायी देती है. शक्ति की शतरंज पर बेबस अमेरिका! राष्ट्रपति बाइडेन का चुनावी नारा था- लौट रहा है अमेरिका! वे कहना चाहते थे कि राष्ट्रपति ट्रंप ने अमेरिका को जिस गतालखाने में डाल रखा है, वे वहां से अमेरिका को विश्व रंगमंच पर फिर से ला स्थापित करेंगे. चुनावी नारा तो यह अच्छा था लेकिन इसे करना इतना मुश्किल होगा, बाइडेन को संभवत: इसका इल्म नहीं था.



अफगानिस्तान आज उन्हें इस कठोर वास्तविकता से रू-ब-रू करवा रहा है. हाल ही में उन्होंने घोषणा की है कि 11 सितंबर, 2021 तक अमेरिकी फौजें अफगानिस्तान से पूरी तरह निकल आयेंगी. आका बनने और बने रहने की अमेरिकी विदेश-नीति का यह वह दमतोड़ बोझ है, जिसकी कहानी 1989 में लिखी गयी थी. वर्ष 1978 में अमेरिकी कठपुतली दाऊद खान की सरकार का तख्ता वामपंथी फौजी नूर मुहम्मद तराकी ने पलटा था और सत्ता हथिया ली.



इसी वामपंथी सरकार की रक्षा के नाम पर रूस अफगानिस्तान में दाखिल हुआ था. रूसी प्रवेश अमेरिका को क्यों बर्दाश्त होता. उसने स्थानीय कबीलों को भड़का कर तराकी व सोवियत संघ दोनों के लिए मुसीबत खड़ी करनी शुरू की. बाजी हाथ से निकलती देख सोवियत संघ ने 24 दिसंबर, 1979 की रात में 30 हजार फौजियों के साथ अफगानिस्तान पर हमला बोल दिया और हफिजुल्ला अमीन की सरकार को बर्खास्त कर, बबराक कर्माल को गद्दी पर बिठा दिया.


वर्ष 1989 तक रूसी कठपुतलियां नचा सके, लेकिन अमेरिकी धन, छल और हथियारों की शह पाकर खड़े हुए कट्टर, खूनी कबीलों के संगठन इस्लामी धर्मांध मुजाहिदीन लड़ाकों ने उसे असहाय करना शुरू कर दिया. अमेरिका का पिछलग्गू पाकिस्तान मुजाहिदीनों की पीठ पर था. पराजय का घूंट पी कर सोवियत संघ तब अफगानिस्तान से विदा हो गया. अब अमेरिकी वहां कठपुतलियां नचाने लगे. असंगठित कबीलों और भाड़े के हत्यारों को अलकायदा तथा तालिबान की छतरी के नीचे जमा होता देख अमेरिका ने अपनी फौजें बढ़ानी शुरू कीं.


अमेरिका ने कहा कि हमें अफगानिस्तान को एक स्थिर व लोकतांत्रिक देश बना देना है जो अलकायदा व तालिबान के दवाब में काम न करे. लेकिन, अमेरिका ने इसे अनदेखा कर दिया कि ऐसा स्वतंत्र अफगानिस्तान अमेरिकी दवाब से भी मुक्ति चाहेगा न! लेकिन अमेरिकी समाज इसकी अनदेखी कैसे कर सकता था कि उसके वर्दीधारी बच्चे रोज-रोज अफगानिस्तान में मारे जा रहे हैं! युद्ध का लगातार बढ़ता आर्थिक बोझ अमेरिकी राष्ट्रपतियों को मजबूर करता जा रहा था कि वे वहां से निकल आयें.


बाइडेन अफगानिस्तान में अमेरिकी फौजों की उपस्थिति के कटु आलोचक रहे हैं और वहां चल रहे युद्ध को ‘अंतहीन युद्ध’ कहते रहे हैं. इससे पहले ओबामा चाहते थे कि अफगानिस्तान से अमेरिका की वापसी का श्रेय उन्हें मिले, लेकिन ऐसा कोई मौका वे बना नहीं सके. सबसे नायाब मौका उन्हें मिला था, जब 2011 में पाकिस्तान के एबटाबाद शहर में घुसकर अमेरिकी सैनिकों ने ओसामा बिन लादेन को मार डाला था.


तब व्हॉइट हाउस के वाररूम में बैठ कर, इस पूरे अभियान का जीवंत नजारा ओबामा ने देखा था. यह वह क्षण था जब वे दुनिया से कह सकते थे कि अफगानिस्तान में अमेरिकी उपस्थिति का एक अध्याय पूरा हुआ और अब हम अपनी फौज वहां से हटा रहे हैं. यह विजयी अमेरिका का ऐसा निर्णय होता जिसे अमेरिकी शर्तों पर अलकायदा भी, तालिबान भी, अफगानिस्तान सरकार भी और लोमड़ी जैसी चालाकी दिखाता पाकिस्तान भी स्वीकार करता. जीत का स्वाद और जीत का तेवर अलग ही होता है. लेकिन यह नाजुक फैसला लेने से ओबामा हिचक गये. इतिहास कब दूसरा मौका देता है कि ओबामा को देता! हाथ मलते हुए वे विदा हुए.


अब बाइडेन अफगानिस्तान के ‘अंतहीन युद्ध’ का अंत करना अपनी नौतिक जिम्मेदारी मानते हों तो स्वाभाविक ही है. अब वे फैसला करनेवाली कुर्सी पर बैठे हैं, तो उन्हें वह फैसला करना ही चाहिए जिसकी वे अब तक पैरवी करते रहे हैं. लेकिन राजनीति का सच यह है कि आप जो कह सकते हैं वह कर भी सकते हैं, यह न जरूरी है, न शक्य! अफगानिस्तान से अमेरिकी फौजों की वापसी का आज एक ही मतलब होगाः भयंकर खूनी गृहयुद्ध, इस्लामी अंधता में मतवाले तालिबान का आधिपत्य और पाकिस्तानी स्वार्थ का बोलबाला.


यह अमेरिकी कूटनीति की शर्मनाक विफलता, अमेरिकी फौजी नेतृत्व के नकारापन की घोषणा और एशियाई मामलों से सदा के लिए हाथ धो लेने की विवशता को कबूल करना होगा. यह बहुत बड़ी कीमत होगी. इसलिए, 11 सितंबर से पहले अमेरिका को अपनी पूरी ताकत लगाकर अफगानिस्तान के सभी पक्षों को एक टेबल पर लाना होगा. सामरिक विफलता को कूटनीतिक सफलता में बदलने का एकमात्र यही रास्ता है.


कितना टेढ़ा लगता हो लेकिन कोई तीन हजार अमेरिकी व नाटो संधि के कोई सात हजार सैनिकों की उपस्थिति में ही अफगानिस्तान में एक मिली-जुली सरकार का गठन हो, यह जरूरी है. यह सरकार भले लूली-लंगड़ी भी हो, बार-बार टूटती-बिखरती भी हो लेकिन उसका बनना एक ऐसी राजनीतिक प्रक्रिया को जन्म देगा जिससे अफगानी समाज आज बहुत कम परिचित है. अफगानिस्तान को अफगानी लोकतंत्र का यह स्वाद चखने देना चाहिए.


तालिबान अभी जिस स्थिति में है उसमें ऐसा करना आसान नहीं है लेकिन अफगानिस्तान के दूसरे सारे कबीलों को साथ लेने की अमेरिकी कुशलता तालिबान पर भारी पड़ेगी. यहीं अमेरिका को हमारी जरूरत भी पड़ेगी. हमें आगे बढ़कर अमेरिकी कूटनीति में हिस्सेदारी करनी चाहिए, ताकि पाकिस्तान को खुला मैदान न मिल सके.


हिस्सेदारी और पिछलग्गूपन में क्या फर्क है, यह बताने की जरूरत है क्या? अफगानी लोगों को अफगानिस्तान के मामले में पहल करने का जितना मौका दिया जा सकेगा, अतिवादी ताकतें उतना ही पीछे हटेंगी. लोग भयभीत हों तथा चुप रहें, अतिवादी इसी की फसल काटते हैं. बाइडेन यह समझें कि लोकतंत्र का संरक्षण और विकास थानेदारी से नहीं, भागीदारी से ही हो सकता है. अमेरिका को अफगानिस्तान से निकलना ही चाहिए, लेकिन भागना नहीं चाहिए.

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Wednesday, April 21, 2021

कामगारों पर ध्यान (प्रभात खबर)

दिल्ली और मुंबई समेत अनेक जगहों पर लॉकडाउन की वजह से प्रवासी कामगार एक बार फिर अपने गांव वापस लौटने लगे हैं. हालांकि इस बार उनकी संख्या पिछले साल से कम है और रेल व अन्य वाहनों की उपलब्धता है, लेकिन उनकी वापसी फिर इंगित कर रही है कि उनकी स्थिति चिंताजनक है. सरकारें प्रवासी मजदूरों से घर न जाने का आग्रह कर रही हैं.



इससे कामगारों को परेशानी तो हो ही रही है, महामारी के संक्रमण के बढ़ने का अंदेशा भी है. पर, वापस जाने की बेचैनी के लिए कामगारों को दोष नहीं दिया जा सकता है. कुछ दिन पहले दिल्ली उच्च न्यायालय ने रेखांकित किया है कि पिछले साल लॉकडाउन के दौरान प्रवासी मजदूरों के मसले पर केंद्र और राज्य सरकारें बुरी तरह विफल रही हैं. अदालत ने सरकार को पहले के अनुभवों से सबक लेते हुए इस बार बेहतर तैयारी का निर्देश दिया है.



इस बार कोरोना महामारी का संक्रमण भयानक है. हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था बीमारों की बहुत बड़ी तादाद को उपचार मुहैया कराने में लाचार साबित हो रही है. गरीब आबादी का हाल और भी खराब है. हालांकि पिछले साल राहत देने और गांवों में रोजगार के मौके पैदा करने के लिए सरकार की ओर से अनेक कोशिशें हुई थीं तथा उनके नतीजे भी संतोषजनक थे, किंतु महामारी के विकराल होने और आर्थिक गतिविधियों के थमने से कामगारों के पास वापस जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं है.


महामारी के पहले चरण के बाद कुछ ही महीने कामकाज हो सका था कि आफत फिर सर पर आ गयी है. कामगारों के पास न तो बचत है और न ही सरकार या कारोबार जगत की ओर से उनकी आर्थिक सुरक्षा का कोई बंदोबस्त है. कई रिपोर्टों में वापस लौटते कामगारों के हवाले से बताया जा रहा है कि वे पिछले साल के अनुभवों के बाद किसी आश्वासन पर सहजता से भरोसा नहीं कर सकते हैं. वापस जाने की एक वजह यह भी है कि महामारी और लॉकडाउन के भविष्य को लेकर कोई भी निश्चित अनुमान नहीं लगाया जा सकता है.


यदि कुछ दिन बाद लंबी अवधि के लिए पाबंदियां लगायी जाती हैं, तो वापसी बेहद मुश्किल हो जायेगी, जैसा पिछले साल मार्च और अप्रैल में हुआ था. ऐसे में जिसे भी मौका मिल रहा है, वह अपने गांव लौटने की कोशिश कर रहा है. प्रवासी कामगार हमारी अर्थव्यवस्था के आधार हैं. स्थिति सामान्य होने के बाद उन्हें फिर शहरों में बुलाने में देरी होगी. इससे आर्थिक गतिविधियों को चालू करने में देरी होगी. उनके गांव लौटने से ग्रामीण अर्थव्यवस्था और राज्यों के इंतजाम भी प्रभावित होंगे.


इसलिए केंद्र और राज्य सरकारों को प्रवासी मजदूरों को समझाने-बुझाने और उनके खाने-रहने की व्यवस्था करने पर प्राथमिकता से ध्यान देना चाहिए. कोरोना महामारी एक गंभीर मानवीय संकट में बदल चुकी है. प्रवासी कामगारों की वापसी उसे और गहरा बना देगी. इससे संक्रमण रोकने का सबसे प्रमुख काम बाधित होगा.

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मर्यादा का उच्चतम आदर्श (प्रभात खबर)

By डॉ मयंक मुरारी 

 

राम के दर्शन से भाव विभोर अहल्या उन्हें देख रही हैं. वे अपने उदार गैरिक वसन से अहल्या के भस्माच्छादित शरीर से धूल पोंछ रहे हैं. अहल्या सोचती हैं कि ऐ स्पर्श! तेरे कितने रूप हैं- कितने आकर्षण हैं! उनके समक्ष इंद्र की वासना और गौतम की रसना के चित्र स्मृति पटल पर नाच जाते हैं. अहल्या श्रीराम के शरीर से धूल पोंछने के लिए हाथ बढ़ाती हैं, तो श्रीराम उन्हें रोकते हुए कहते हैं कि देवि, छोड़ दीजिए, यह धूल मेरे कठोर अनुशासित यात्रा पथ का पाथेय है.



जीवन में मर्यादा की उच्चतम आदर्श की स्थापना श्रीराम के जीवन का लक्ष्य रहा. सात हजार वर्ष पूर्व इस महापुरुष ने इंद्र और रावण को एक साथ चुनौती दी. जन-गण का सपना सजाया, साथ लिया, सहयात्राएं कीं और विजयी हुए.


राम का संपूर्ण जीवन दैहिक संस्कृति से मुकाबला करते बीत गया. जब समाज में देह और उसके भोग एवं शक्ति की ही केंद्रीय भूमिका थी, तब उन्होंने इस परिभाषा को बदलने के लिए सफल एवं सार्थक प्रयास किया



यज्ञ एवं अग्नि के माध्यम से मानसिक शक्ति तथा वैज्ञानिक भौतिकवादी चेतना के विस्तार के माध्यम से विचार एवं विवेक की मर्यादा को प्रतिस्थापित किया. इसका प्रकटीकरण कृषि सभ्यता के विकास एवं विस्तार से हुआ, जो पतनशील दैहिक सभ्यता के अंत का कारण बना. विचार एवं विवेक का आचरण जिसमें मर्यादा का संतुलन था, उसकी शुरुआत उनके बचपन से हो गयी थी. राम जब पंद्रह वर्ष के थे, तो उनके मन में तीर्थाटन की गहरी रुचि पैदा हुई. वे पिता से अनुमति लेकर भारत भ्रमण को निकल गये.


उन्होंने नदी, वन, आश्रम, जंगल, समुद्र एवं पहाड़ों की यात्राएं कीं. ऐसी यात्राओं के बाद श्रीराम के जीवन में कोमलता का जन्म होता है और पूर्वाग्रह खत्म होते हैं. उनमें वैराग्य आ जाता है, तब दशरथ उन्हें वशिष्ठ के पास भेजते हैं. श्रीराम और वशिष्ठ का संवाद योगवशिष्ठ में दर्ज है. इससे पता चलता है कि राम सदा ही एक विचारशील तत्वदर्शी की तरह बड़ा नपा-तुला व्यवहार करते हैं. आचरण में विवेक यानी मर्यादा के माध्यम से श्रीराम भारत की आत्मा को प्रकट करते हैं जो उन्होंने तीर्थाटन के परिणाम स्वरूप सीखा.


वैराग्य भाव की अभिव्यक्ति एवं पूर्णता योगवशिष्ठ में होती है. यहां वशिष्ठ समझाते हैं कि न मन को दुनिया के काम में लगाकर शांति मिलती है और न ही परे हटाकर. जो कोई मन की इन दो स्थितियों को अपने विचार-विवेक से एक साथ देख लेता है, वह से ऊपर उठकर ब्रह्म सत्य के दर्शन का अधिकारी हो जाता है. भक्ति में भाव की केंद्रीय भूमिका होती है. लेकिन राम का समस्त व्यवहार विचार एवं विवेक पूरित है. विनयशील एवं आदरभाव से भरे श्रीराम अपने से छोटे को भी अपने जैसा व्यवहार करने की पूरी स्वतंत्रता देते हैं.


राम जिस अंतर रूपांतरण को सहज एवं सबके लिए सुलभ बना रहे थे, उसकी परंपरा विश्वामित्र ने शुरू की थी. इस समाज एवं देश निर्माण की यात्रा को सार्थक एवं सहभागी बनाने के लिए उन्होंने वशिष्ठ का साथ लिया, जो उनके वैचारिक विरोधी थे. एक राज्याश्रित ऋषि तो दूसरा विश्वामित्र सामाजिक ऋषि. श्रीराम की विचार चेतना को कर्मभूमि पर सार्थक उपयोग के लिए वशिष्ठ ने पृष्ठभूमि तैयार की, तो उस विचार-चेतना को कर्मपथ पर सफलतापूर्वक चलने में विश्वामित्र ने सहयोग दिया. इस यात्रा के परिणामस्वरूप विश्वामित्र एक सफल सामाजिक व्यवस्था को रूपांतरित करने में सहभागी हो सके.


यह श्रीराम की वैराग्य एवं विचार की भावभूमि है कि जनक जैसे विदेह एवं दार्शनिक वनवास काल में श्रीराम के निर्णय पर मौन सहमति प्रदान करते हैं. जिस गौतम के श्राप ने अहल्या को पत्थर बनाया, उस न्यायशास्त्र के अध्येता को श्रीराम ने उल्टा खड़ा कर दिया. भोगवाद के प्रतीक इंद्र को भी राजा जनक के विवाह मंडप में समुचित जवाब दिया. इंद्र, रावण एवं ऐसे ही भौतिकवादी व्यवस्था के वाहकों ने श्रीराम-सीता विवाह के समय दिये गये मर्यादा भोज के अवसर का दुरुपयोग करते हुए गालियों, झिड़कियों एवं लांछनों के माध्यम से श्रीराम के धैर्य की परीक्षा ली.


इस मर्यादा भोज ने श्रीराम को एक बार फिर मर्यादा के संग पुरुषोत्तम की यात्रा के लिए पड़ाव का काम किया. विष्णु के धनुष को धारण करने की पात्रता की परीक्षा देकर राम परशुराम तथा सभी संहारक शक्तियों के समक्ष विवेकपूर्ण संहारक शक्ति के प्रतीक बन जाते हैं. इसी कारण वे भारत की अस्मिता के, सांस्कृतिक अखंडता और राष्ट्रीय चेतना के प्रतीक बन गये.


सांस्कृतिक रूपांतरण की विराट प्रक्रिया में इस मर्यादा के साथ गौतम का न्याय दर्शन, भारद्वाज की वैज्ञानिक खोज, अत्रि के आश्रम व्यवस्था और अगस्त्य का सांस्कृतिक संश्लेषण सहायक साधन बना. विश्व इतिहास में किसी एक महापुरुष के निर्माण के माध्यम से राष्ट्र जागरण के कार्य में इतने महान ऋषियों जैसा योगदान देखने को नहीं मिलता है.


सामाजिक सृजनात्मकता और अंतर रूपांतरण को अपने व्यवहार एवं विचार विवेक की आधारशीला से मर्यादित कर श्रीराम एक मानवीय एवं गतिशील राजनीतिक चेतना का निर्माण करते हैं, जो एक साथ ब्रह्मा, शिव एवं विष्णु के क्रियात्मकता को दर्शाता है. राम विचार की तीव्रता और सूक्ष्मता के माध्यम से अध्यात्म में प्रवेश करते हैं. वह जीवन के साथ हरदम कदम मिलाकर चलते हैं. इस कारण वे सामान्य लोगों के साथ सहज संबंध बना लेते हैं. वह हर बात को, हर कर्म एवं व्यवहार को सामाजिक संगति और न्याय तथा औचित्य की कसौटी पर परखते हैं.

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Monday, April 19, 2021

वृद्धि में बाधा (प्रभात खबर)

कोरोना महामारी की दूसरी लहर भयावह विभीषिका में बदल रही है. इसे नियंत्रित करने के लिए जरूरी पाबंदियां लगायी जा रही हैं. हालांकि पिछले साल की तरह व्यापक लॉकडाउन नहीं लगाया गया है, लेकिन रात व सप्ताहांत के कर्फ्यू, सीमित आवाजाही और कई तरह के कारोबारों पर अस्थायी रोक से आर्थिक गतिविधियों में संकुचन आ रहा है. अनेक जगहों पर कुछ दिनों के लिए लॉकडाउन भी लगाया जा रहा है.



कोरोना वायरस के तेज संक्रमण को देखते हुए यह कह पाना मुश्किल है कि स्थिति कब तक सामान्य होगी. पिछले साल के आखिरी महीनों में पाबंदियों के हटाने के साथ ही कारोबार और कामकाज बहुत हद तक पहले की तरह होने लगे थे. उस वजह से बीते वित्त वर्ष की पहली दो तिमाहियों में ऋणात्मक हो चुके वृद्धि दर को बढ़ाया जा सका था. उस बढ़त के आधार पर यह अनुमान लगाया गया था कि चालू वित्त वर्ष में विकास दर दो अंकों में रहेगी और अगले वित्त वर्ष में यह दर 2019-20 के स्तर पर आ जायेगी.



लेकिन महामारी की दूसरी लहर से उस उम्मीद पर पानी फिर सकता है. अब विश्व बैंक का आकलन है कि 2021-22 के वित्त वर्ष में भारत की आर्थिक वृद्धि दर 7.5 से लेकर 12.5 प्रतिशत के दायरे में रह सकती है. इससे स्पष्ट है कि अर्थव्यवस्था को लेकर अनिश्चितता की स्थिति पैदा हो गयी है. इस दायरे में आंकड़ा क्या होगा, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि हम कितनी जल्दी महामारी पर काबू करेंगे क्योंकि सभी अनुमानों का आधार यह भरोसा था कि देश को दूसरी लहर का सामना नहीं करना पड़ेगा.


मांग और उत्पादन घटने के कारण बेरोजगारी दर भी बढ़ने लगी है. ऐसे में एक बड़ी उम्मीद मॉनसून से है, जिसके इस साल सामान्य रहने की आशा है और सूखे की कोई आशंका दूर-दूर तक नहीं है. अच्छी बारिश से फसलों की बुवाई अधिक होगी, जिससे ग्रामीण आमदनी में बढ़ोतरी होगी. समुचित उपज से खाद्य मुद्रास्फीति को भी नियंत्रित रखने में मदद मिलेगी. उल्लेखनीय है कि पिछले साल लॉकडाउन में और बाद में बड़ी मात्रा में कृषि उत्पादों के निर्यात से अर्थव्यवस्था को बहुत सहारा मिला था.


अनाज के भरे भंडारों की वजह से करोड़ों गरीब परिवारों को मुफ्त या सस्ता राशन मुहैया कराया जा सका था. पिछले साल अनेक चरणों में केंद्र सरकार द्वारा घोषित वित्तीय राहत, छूट, कल्याण कार्यक्रमों आदि से भी आर्थिकी को मदद मिली थी. यह भी ध्यान रखना होगा कि कृषि क्षेत्र से अपेक्षाओं पर खाद्य पदार्थों के वैश्विक मूल्यों का भी असर होगा तथा सरकारी व्यय की भी इसमें बड़ी भूमिका होगी. यही कारण है कि कृषि समेत विभिन्न क्षेत्रों को सरकारी मदद उपलब्ध कराने की मांग उठने लगी है. मौजूदा स्थिति में कुछ बजट प्रावधानों को फौरी तौर पर लागू करने की जरूरत पड़ सकती है. फिलहाल हमारा पूरा जोर बचाव के उपायों और टीकाकरण बढ़ाने पर होना चाहिए.

सौजन्य - प्रभात खबर।

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