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-Rajeev Kumar (Editor-in-chief)

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Monday, August 9, 2021

चीन-तालिबान की खतरनाक यारी (हिन्दुस्तान)

राजीव डोगरा, पूर्व राजदूत

 

मुल्ला अब्दुल गनी बरादर के नेतृत्व में तालिबानी प्रतिनिधिमंडल से चीन के विदेश मंत्री वांग यी की मुलाकात चिंतित करने वाली है। तालिबानी नेताओं को दिए गए इस सम्मान के कई निहितार्थ हैं। इससे यह तो साफ हो गया है कि अमेरिका की वापसी के बाद चीन अफगानिस्तान में अपनी दखल बढ़ाने को लेकर गंभीर है। इससे उसके कई स्वार्थ पूरे होंगे। जैसे, अफगानिस्तान में मौजूद तांबा, कोयला, गैस, तेल आदि के अप्रयुक्त भंडारों तक वह अपनी पहुंच बना सकेगा। कुछ तेल क्षेत्रों के अलावा तांबे की एक बड़ी खदान वह पहले ही हासिल कर चुका है। फिर, जिन उइगर अलगाववादियों को वह अपना दुश्मन मानता है, उनके संगठन ‘पूर्वी तुर्किस्तान इस्लामिक मूवमेंट’ (ईटीआईएम) पर भी वह नकेल कस सकेगा। ईटीआईएम का चीन के शिनजियांग प्रांत में खासा असर है। दिक्कत यह है कि चीन का यह स्वार्थ बाकी दुनिया पर भारी पड़ सकता है। इस गठजोड़ का असर कई रूपों में विश्व व्यवस्था पर दिख सकता है।

चीन-तालिबान दोस्ती क्यों खतरनाक है, इसे जानने से पहले हमें चीन की फितरत समझनी होगी। चीन एको अहं, द्वितीयो नास्ति  यानी सिर्फ मैं ही मैं सर्वत्र, दूसरा कोई नहीं की नीति पर चलता है। अपने मकसद को पूरा करना उसकी प्राथमिकता है। अगर कहीं भी उसे अपना हित सधता हुआ दिखे, तो वह न कोई कायदा-कानून मानता है, और ही न कोई व्यवस्था। 1980 के दशक से ऐसा ही होता आया है। मिसाल के तौर पर, पाकिस्तान आज बेशक अपने परमाणु एवं मिसाइल कार्यक्रम या सैटेलाइट तकनीक पर इतराए, लेकिन यह जगजाहिर है कि ये सारी सुविधाएं उसे चीन ने ही मुहैया कराई हैं, जबकि ऐसा करना अंतरराष्ट्रीय कानूनों के खिलाफ है और विश्व बिरादरी इसे गंभीर अपराध मानती है। फिर भी, चीन की सेहत पर इसका कोई फर्क नहीं पड़ा। उसने खुद तकनीक एवं प्रौद्योगिकी पश्चिमी देशों से चुराईं और आज उन्हीं को आंखें दिखा रहा है। 

दक्षिण चीन सागर पर तो वह पूरी दुनिया से लड़ने-भिड़ने को तैयार है, जबकि श्रीलंका, बांग्लादेश जैसे कई देशों को अपने कर्ज के जाल में फंसाकर उन पर परोक्ष रूप से दबाव बना चुका है। इन्हीं उदाहरणों की अगली कड़ी है, प्रतिबंधित गुट तालिबान के साथ उसकी नजदीकी। चीन इसको अपने लिए फायदे का सौदा मान रहा होगा, मगर इसकी कीमत पूरी दुनिया को चुकानी पड़ सकती है।

तालिबान का चरित्र किसी से छिपा नहीं है। संयुक्त राष्ट्र इसे एक प्रतिबंधित समूह मानता है। तालिबानी प्रवक्ता ने भले ही अफगानिस्तान के विकास-कार्यों के लिए वैश्विक समर्थन जुटाने की बात कही है, लेकिन अभी जिन इलाकों पर इसका कब्जा है, वहां विकास का पहिया फिर से रोक दिया गया है। स्कूलों को बंद कर दिया गया है और मानवाधिकारों का जमकर हनन हो रहा है। वहां विरोध करने वाली आवाजें खामोश की जा रही हैं। हकीकत बयान करने वाले पत्रकारों तक तो नहीं बख्शा जा रहा। खबर यह भी है कि पिछले दिनों जिस भारतीय पत्रकार दानिश सिद्दीकी की हिंसक संघर्ष में फंसने की वजह से मौत की बात कही जा रही थी, तालिबान ने उनकी पहचान करने के बाद बड़ी ‘क्रूरता से हत्या’ कर दी थी। ऐसे बर्बर गुट को चीन यूं ही शह नहीं दे रहा।

साल 2013 में शी जिनपिंग के राष्ट्रपति बनने के बाद से चीन का रवैया खासा आक्रामक हो गया है। घरेलू स्तर पर ‘एक देश, दो व्यवस्था’ नीति को खारिज करते हुए उसने ‘वन चाइना पॉलिसी’ अपनाई और हांगकांग की स्वायत्तता खत्म कर दी, तो ताइवान को वह लगातार आंखें दिखा रहा है। ‘बेल्ट ऐंड रोड इनीशिएटिव’ से वह करीब 70 देशों और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में निवेश की राह पर है। उसकी मंशा पूरे एशिया क्षेत्र पर प्रभुत्व जमाने और अमेरिका की बराबरी करते हुए वैश्विक नेता बनने की है। चूंकि सैन्य ताकत और औद्योगिक उत्पादन के मामले में वह खासा असरदार है, इसलिए वह पूरी विश्व व्यवस्था को आंखें दिखाता रहता है। लेकिन इसी गुमान में वह कई देशों से विवाद भी मोल ले चुका है। चीन जानता है कि अफगानिस्तान में यदि वह प्रभाव जमा सका, तो उसे आर्थिक फायदा हो सकता है, जिससे ‘सुपर पावर’ बनने की उसकी राह आसान होगी, इसीलिए वह तालिबान को शह दे रहा है।

चीन और तालिबान के बीच बढ़ती नजदीकी किस करवट बैठेगी, यह तो आने वाला वक्त बताएगा, लेकिन यह हमारे लिए खतरा पैदा कर सकती है। चूंकि पाकिस्तान पहले से तालिबानी लड़ाकों का मददगार है, ऐसे में यदि चीन का साथ भी उनको मिल गया, तो ये लड़ाके और बर्बर हो सकते हैं। अभी तक तो अफगानिस्तान के महत्वपूर्ण इलाकों पर अफगान सुरक्षा बलों का नियंत्रण है, लेकिन चीन की शह तालिबानी लड़ाकों को उन इलाकों पर भी कब्जा करने के लिए उत्साहित करेगी। इससे अफगानिस्तान में किए गए भारतीय निवेश प्रभावित हो सकते हैं। फिर, अल-कायदा और इस्लामिक स्टेट के आतंकी तालिबान की मदद करने के लिए अफगानिस्तान आ रहे हैं। दहशतगर्द समूहों का यह गठजोड़ अफगानिस्तान के पड़ोस के लिए ही नहीं, दुनिया के सभी अमनपसंद देशों के लिए चिंता की बात होनी चाहिए। ऐसे लड़ाकों को पाकिस्तान और चीन की दुरभिसंधि भारत के खिलाफ हमले के लिए उकसाएगी। यह गठजोड़ हमारी आंतरिक सुरक्षा के लिए काफी खतरनाक साबित होगा। इसे किस तरह रोका जाए? इसका फिलहाल कोई रास्ता नहीं दिख रहा। एक अंधेरी सुरंग है, जिसका दूसरा छोर सामने नहीं है। यदि कोई शक्तिशाली देश अंतरराष्ट्रीय नियमों की अवहेलना करे, तो उस पर बंदिश शायद ही कारगर होती है। कोई डर या खौफ उस देश को सही रास्ते पर नहीं ला सकता। चीन अब इतना मजबूत बन गया है कि उसे डराकर या धमकाकर कोई काम नहीं करवाया जा सकता। ऐसे में, बातचीत ही एकमात्र रास्ता है। मगर कोरोना वायरस की उत्पत्ति की जांच में बीजिंग ने जो बेशर्मी दिखाई है, उससे नहीं लगता कि वह फिलहाल समझने को तैयार है। लिहाजा, जब तक उसे खुद चोट नहीं लगेगी, वह नहीं संभलेगा। वैश्विक ताकत बनने का नशा उस पर इतना हावी हो चुका है कि उसे सही और गलत का बोध नहीं। इसलिए हमें अपनी सुरक्षा के लिए लीक से हटकर सोचना होगा। 

(ये लेखक के अपने विचार हैं) 

सौजन्य - हिन्दुस्तान।

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खुदरा बाजार पर कब्जे की जंग (हिन्दुस्तान)

आलोक जोशी, वरिष्ठ पत्रकार 

खुदरा बाजार पर कब्जे की जंग

सुप्रीम कोर्ट ने एमेजॉन के पक्ष में फैसला सुनाया। अडानी, अंबानी को सुप्रीम कोर्ट से तगड़ा झटका। सुप्रीम कोर्ट ने एमेजॉन की याचिका पर जो फैसला सुनाया, उसके शीर्षक कुछ ऐसे ही बन सकते हैं। बहरहाल, फ्यूचर ग्रुप के प्रोमोटर किशोर बियानी ने अपना पूरा रिटेल और कुछ होलसेल कारोबार रिलायंस रिटेल को बेचने का जो सौदा किया था, सुप्रीम कोर्ट ने उस पर रोक लगा दी है। 

यह मामला जितना दिख रहा है, उससे कहीं ज्यादा पेचीदा है। अदालत में लड़ाई जेफ बेजोस के एमेजॉन और फ्यूचर ग्रुप के प्रोमोटर किशोर बियानी के बीच ही चल रही थी और आज भी चल रही है। लेकिन दरअसल यह मुकाबला दुनिया के सबसे अमीर आदमी जेफ बेजोस और भारत के सबसे अमीर आदमी मुकेश अंबानी या उनकी कंपनियों के बीच है। और दांव पर है भारत का रिटेल या खुदरा बाजार। 

फॉरेस्टर रिसर्च की एक रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2020 में भारत का रिटेल कारोबार करीब 883 अरब डॉलर यानी करीब 65 लाख करोड़ रुपये का था। इसमें से भी सिर्फ किराना या ग्रोसरी का हिस्सा 608 अरब डॉलर या 45 लाख करोड़ रुपये के करीब था। इसी एजेंसी का अनुमान था कि 2024 तक यह कारोबार बढ़कर एक लाख तीस हजार करोड़ डॉलर या 97 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच चुका होगा। यही वह बाजार है, जिस पर कब्जा जमाने की लड़ाई एमेजॉन व रिलायंस रिटेल के बीच चल रही है। वह वक्त गया, जब किशोर बियानी रिटेल किंग कहलाते थे। आज तो वह दो पाटों के बीच फंसे हुए हैं। जीते कोई भी, फ्यूचर ग्रुप की तो जान ही जानी है। किशोर बियानी के कारोबार की कहानी बहुत से लोगों के लिए सबक का काम भी कर सकती है कि कैसे एक जरा सी गलती आपको बहुत बड़ी मुसीबत में फंसा सकती है। उन्होंने एक सौदा किया था, तब शायद यह सोचा था कि भविष्य में यह मास्टरस्ट्रोक साबित होगा, लेकिन अब वही गले की फांस बन चुका है। 



किस्सा थोड़ा लंबा है, लेकिन जरूरी है। किशोर बियानी रिटेल किंग कहलाते थे। ज्यादातर लोग उन्हें पैंटलून स्टोर्स और बिग बाजार के नाम से ही पहचानते हैं। जब से रिटेल में विदेशी निवेश की चर्चा शुरू हुई, तभी से यह सवाल पूछा जा रहा था कि दुनिया के बड़े दिग्गज रिटेलर जब भारत आएंगे, तब उनमें से कौन किशोर बियानी को अपना भागीदार बनाने में कामयाब होगा। रिटेल कारोबार पर भारत की बड़ी कंपनियों की निगाहें भी टिकी थीं। रिलायंस रिटेल धीरे-धीरे चला, लेकिन अब वह देश का सबसे बड़ा रिटेलर बन चुका था। 

इस बीच फ्यूचर ग्रुप कुछ ऐसी जुगत में लगा रहा कि किसी तरह कंपनी में इतना पैसा लाने का इंतजाम हो जाए कि वह बाजार में कमजोर न पड़े। रिटेल सेक्टर में विदेशी निवेश के नियम उसके रास्ते में बाधा खड़ी कर रहे थे। एमेजॉन जैसी कंपनी भी भारत में पैर फैलाना चाहती थी, लेकिन ऑनलाइन कारोबार में लगी कंपनी के लिए इसमें घुसना और मुश्किल था। फिर 2019 में फ्यूचर ग्रुप से एक बयान आया कि उनकी एक कंपनी फ्यूचर कूपन्स लिमिटेड ने एमेजॉन के साथ करार किया है और एमेजॉन ने इस कंपनी में 49 प्रतिशत हिस्सेदारी खरीदी है। दोनों कंपनियों ने यही कहा था कि यह तो लॉयल्टी पॉइंट और गिफ्ट वाउचर जैसा काम करने वाली कंपनी है और इसमें निवेश का ग्रुप के रिटेल कारोबार से कोई रिश्ता नहीं है। 

यह अंदाजा नहीं था कि यह छोटा सा सौदा ही आगे चलकर बहुत बड़ा बवाल खड़ा करने वाला है। शायद किशोर बियानी को या फ्यूचर ग्रुप के लोगों को अंदाजा रहा हो, मगर तब भी वह शायद यह नहीं सोच रहे थे कि एक दिन उन्हें अपना कारोबार रिलायंस को बेचना पड़ेगा। लॉकडाउन शुरू होने के पहले ही कंपनी भारी परेशानी में थी, लेकिन लॉकडाउन बहुत महंगा पड़ा। पिछले साल अगस्त में फ्यूचर ग्रुप ने अपना रिटेल कारोबार रिलायंस को बेचने का समझौता किया। 

यह समझौता होते ही एमेजॉन के साथ उसके पुराने करार का भूत जाग उठा। एमेजॉन ने अब सामने आकर बताया कि जिस फ्यूचर कूपन्स में उसने 49 प्रतिशत हिस्सा खरीदा था, वह फ्यूचर रिटेल में करीब 10 प्रतिशत हिस्सेदारी की मालिक है, इस नाते एमेजॉन भी उस कंपनी में करीब पांच प्रतिशत का हिस्सेदार है। एमेजॉन ने यह भी कहा कि 2019 के करार में एक रिस्ट्रिक्टेड पर्सन्स यानी ऐसे लोगों और कंपनियों की लिस्ट थी, जिनके साथ फ्यूचर ग्रुप को सौदा नहीं करना था। रिलायंस रिटेल इस लिस्ट में शामिल था। 

यह झगड़ा सिंगापुर की अंतरराष्ट्रीय पंचाट में पहुंचा और उसने सौदे पर एक तरह से स्टे दे दिया। एमेजॉन जब यह फैसला लागू करवाने की मांग के साथ दिल्ली हाईकोर्ट गया, तो वहां से पहला आदेश उसके ही पक्ष में आया। लेकिन इसके बाद हाइकोर्ट की ही बड़ी बेंच ने इस फैसले को पलटकर सौदे पर रोक लगाने का आदेश खारिज कर दिया। तब मामला सुप्रीम कोर्ट गया, जहां से पिछले गुरुवार को फैसला आया है। अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले की यह बात समझनी जरूरी है कि कोर्ट ने सिर्फ यह कहा है कि सिंगापुर की पंचाट अगर कोई फैसला सुनाती है, तो वह भारत में भी लागू होगा, इसीलिए फ्यूचर व रिलायंस का सौदा फिलहाल आगे नहीं बढ़ सकता। 

इस बीच भारतीय प्रतिस्पद्र्धा आयोग, यानी सीसीआई ने एमेजॉन को नोटिस दिया है कि वर्ष 2019 में फ्यूचर ग्रुप के साथ समझौता करते वक्त उसने कुछ जरूरी चीजों को परदे में रखा था। तर्क यह है कि तब दोनों कंपनियों ने कहा था कि इस समझौते का फ्यूचर ग्रुप के रिटेल कारोबार से कोई रिश्ता नहीं है, पर अब एमेजॉन इसी समझौते के सहारे रिटेल कारोबार का सौदा रुकवाना चाहता है। सीसीआई के पास यह अख्तियार है कि अगर वह चाहे, तो पुरानी तारीख में भी वह फ्यूचर और एमेजॉन के सौदे को रद्द कर सकता है। 

यह पूरा मामला देश के दूसरे व्यापारियों के लिए सबक है। चादर से बाहर पैर फैलाना तो कारोबार में जरूरी है, लेकिन यह ध्यान रखना भी जरूरी है कि इस चक्कर में कहीं चादर न फट जाए। कर्ज लेने में भी सावधान रहें और बड़ी कंपनियों से रिश्ते जोड़ने में तो और भी सावधान रहें।  

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

सौजन्य - हिन्दुस्तान।

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Tuesday, May 25, 2021

आपदा को अवसर नहीं बना पाए हम (हिन्दुस्तान)

हरजिंदर, वरिष्ठ पत्रकार

जब कोविड नहीं था, तब बहुत कुछ बहुत अच्छा था। ऐसा हम बहुत सी चीजों के बारे में या शायद सभी चीजों के बारे में कह सकते हैं। लेकिन निश्चित और निर्विवाद तौर पर वैक्सीन बाजार के बारे में तो यह कहा ही जा सकता है। तब तक इस बाजार में हम सबसे आगे थे। विश्व स्वास्थ्य संगठन के 2019 के आंकड़ों को देखें, तो दुनिया के वैक्सीन बाजार में 28 फीसदी हिस्सेदारी अकेले भारत की कंपनी सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया की थी। पता नहीं, बात कितनी सच है, लेकिन यह अक्सर सुनाई देती थी कि पूरी दुनिया का 12 साल का कोई भी बच्चा जिसका पूर्ण टीकाकरण हुआ हो, उसे अपने पूरे जीवन में कभी न कभी सीरम इंस्टीट्यूट का एक टीका तो लगा ही होगा। यानी, वैक्सीन के मामले में इस तरह के नैरेटिव हमारे गौरव-बोध को थपथपाने के लिए मौजूद थे। वैसे सीरम इंस्टीट्यूट के अलावा देश की कई और कंपनियां भी वैक्सीन बनाने और निर्यात करने का काम करती हैं। अगर इन सभी को जोड़ दिया जाए, तो दुनिया के वैक्सीन बाजार में भारत की हिस्सेदारी एक तिहाई से कहीं ज्यादा थी।

 

बात सिर्फ 2019 के आंकड़ों की नहीं है। 2020 के अंत तक यही माना जा रहा था कि कोरोना वायरस से लड़ाई में भारत बड़ी भूमिका निभाने जा रहा है। दिसंबर में संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरस ने यहां तक कहा था कि वैक्सीन की जो उत्पादन-क्षमता भारत के पास है, वह दुनिया की एक महत्वपूर्ण संपदा साबित होने वाली है। इन्हीं सबसे उत्साहित होकर भारत ने अपने जनसंपर्क को बढ़ाने का फैसला किया और दिसंबर की शुरुआत में सभी देशों के राजदूतों को एक साथ बुलाकर वैक्सीन की प्रयोगशालाओं व उत्पादन इकाइयों का दौरा करवाया। इस दौरे के बाद ऑस्ट्रेलिया समेत कई देशों के राजदूतों ने भारत की वैक्सीन उत्पादन-क्षमता के लिए कई कसीदे भी गढ़े थे। हम इस बात को लेकर खुश थे कि भारत में स्वास्थ्य सुविधाएं लचर हो सकती हैं, अस्पताल, मरीजों के लिए बिस्तर व स्वास्थ्यकर्मी कम पड़ सकते हैं, वेंटिलेटर का अकाल हो सकता है, ऑक्सीजन जरूरत से काफी कम पड़ सकती है, बहुत सी दवाओं की कमी से उनकी कालाबाजारी हो सकती है, पर वैक्सीन के मामले में हम आत्मनिर्भर हैं। और कुछ न हो, मगर कोविड को मात देने वाला असली ब्रह्मास्त्र तो हमारे पास है ही। साल 2021 के शुरुआती हफ्तों तक यही लग रहा था कि भारत नए झंडे गाड़ने जा रहा है। पहले चरण में सिर्फ स्वास्थ्यकर्मियों को टीके लगने थे। जितने टीके लग रहे थे, उससे ज्यादा वैक्सीन उत्पादन की खबरें आ रही थीं। कुछ विश्लेषक तो यह भी कह रहे थे कि भारत के स्वास्थ्य तंत्र के पास टीकाकरण की जो क्षमता है, भारत की वैक्सीन उत्पादन क्षमता से वह कहीं कम है, इसलिए भारत के पास हमेशा वैक्सीन का सरप्लस स्टॉक रहेगा। शायद इसी तर्क के चलते भारत ने टीकों का निर्यात भी किया, जो इन दिनों काफी बड़ा राजनीतिक मुद्दा बना हुआ है। विदेश नीति के बहुत से टीकाकारों ने इस निर्यात को ‘वैक्सीन डिप्लोमेसी’ बताते हुए इसकी तारीफों के पुल भी बांधे थे।

लेकिन अप्रैल आते-आते ऐसा क्या हुआ कि सारा शीराजा बिखर गया? एक तो उम्र के हिसाब से टीकाकरण की योग्यता को लगातार विस्तार दिया जाने लगा। फिर इसी बीच कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर आई, जो पहले से कहीं ज्यादा भयावह और संक्रामक थी। लोगों को लगा कि टीकाकरण जल्दी होना चाहिए और वैक्सीनेशन सेंटरों के बाहर भीड़ बढ़ने लगी। सरकारी व निजी अस्पतालों ने टीकाकरण की अपनी क्षमता को बढ़ा दिया, कुछ जगह तो चौबीस घंटे टीकाकरण की सुविधा दे दी गई। जब यह स्थिति आई, तब पता चला कि टीके कम पड़ रहे हैं। सभी राज्यों से टीकों का स्टॉक खत्म होने की खबरें आने लगीं। लेकिन बात क्या सिर्फ इतनी थी? शायद नहीं। तमाम आंकडे़ बता रहे हैं कि वैक्सीन उत्पादन का दुनिया का सबसे अग्रणी देश भारत कोविड वैक्सीन के मामले में मात खा गया। पता चला कि दुनिया की सबसे बड़ी वैक्सीन उत्पादक कंपनी बिल गेट्स फाउंडेशन से 30 करोड़ डॉलर की मदद लेने के बावजूद अभी तक कोविड वैक्सीन की सिर्फ छह करोड़ खुराक बना पाई है। सीरम इंस्टीट्यूट का कहना है कि भारत सरकार ने इतने का ही ऑर्डर दिया था। यह सच है कि इसके पहले सीरम कभी भारत सरकार के ऑर्डर की मोहताज नहीं रही, वह अपनी वैक्सीन पूरी दुनिया को बेचती रही, पर इस बार तमाम बैंड, बाजा, बारात के बावजूद उसने सेहरा अपने माथे पर सजाने का मौका गंवा दिया। इसकी तुलना अगर हम दुनिया की दूसरी कंपनियों से करें, तो तस्वीर कुछ और दिखाई देती है। फाइजर दुनिया की एक महत्वपूर्ण और बहुत बड़ी दवा निर्माता कंपनी है, लेकिन वैक्सीन के बाजार में उसकी कोई बहुत बड़ी हिस्सेदारी हाल-फिलहाल में नहीं रही। उसने अब दुनिया भर के देशों से 52 करोड़ वैक्सीन डोज निर्यात करने का समझौता कर लिया है, जिसे वह जल्द ही अमली जामा पहनाने की बात भी कर रही है। कंपनी का दावा है कि इस साल के आखिर तक वह 1.3 अरब वैक्सीन डोज का उत्पादन कर लेगी। स्पूतनिक-वी नाम की वैक्सीन बनाने वाली रूस की कंपनी के दावे भी ऐसे ही हैं। चीन तो कई बार इससे भी बड़े दावे कर चुका है। अमेरिकी कंपनी मॉडर्ना का दवा व वैक्सीन उद्योग में इसके पहले तक कोई अनुभव नहीं था, पर अब वह अमेरिका की सबसे अग्रणी वैक्सीन उत्पादक कंपनी बन चुकी है, जबकि यहां भारत में सबसे अनुभवी कंपनी बेबस दिखाई दे रही है। जिस समय भारत की कामयाबी के हर तरफ चर्चे होने चाहिए थे, उस समय पूरी दुनिया भारत पर तरस खा रही है। और भारत की राज्य सरकारें झोला उठाकर वैक्सीन की खरीदारी के लिए भटकने को मजबूर हैं। इस संकट ने यह भी बता दिया कि भारत की जिन कंपनियों को हम अभी तक दुनिया में सबसे आगे मानते थे, वे दरअसल ऑर्डर मिलने पर उत्पादन करने वाली फैक्टरियां भर हैं। ऐसे उद्योगों से भला यह उम्मीद कैसे की जाए कि वे आपदा को अवसर में बदल सकेंगी?

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

सौजन्य - हिन्दुस्तान।

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Thursday, May 20, 2021

कोरोना ने जो हसीन सपने छीन लिए (हिन्दुस्तान)

अनंत मिश्र, चीफ कॉपी एडिटर, हिन्दुस्तान, लखनऊP 

कोविड-19 ने देश-दुनिया का कितना नुकसान किया, इसके सटीक आकलन में तो न जाने कितने साल लगेंगे, क्योंकि अभी तो इस पर जीत पाने के लिए ही जद्दोजहद हो रही है। लेकिन इसने हमारे आस-पास के समाज, उसके सपनों को कितनी बुरी तरह जख्मी किया है, इसकी मुनादी खबरों के ब्योरे कर रहे हैं। खासकर खेल-क्षेत्र को हुआ नुकसान इसलिए अधिक कचोटता है, क्योंकि इस दौर ने कई संभावनाओं को हमेशा-हमेशा के लिए खत्म कर दिया, तो कई प्रतिभाएं अब इससे मुंह मोड़ने लगी हैं। कालीकट के धावक जिन्सन जॉनसन 1,500 मीटर दौड़ के राष्ट्रीय रिकॉर्डधारी हैं। पिछले रियो ओलंपिक और विश्व चैंपियनशिप में हिस्सा ले चुके हैं। साल 2019 के दोहा विश्व चैंपियनशिप के पहले उन्होंने जर्मनी में हुई ऑल स्टार मीट में जब विश्व चैंपियनशिप के लिए क्वालीफाई किया, तभी से उम्मीद बांधी जाने लगी थी कि जॉनसन टोक्यो ओलंपिक में जरूर शानदार प्रदर्शन करेंगे। लेकिन कोरोना-काल में न सिर्फ उनका अभ्यास बाधित हुआ, बल्कि वह खुद कोरोना पॉजिटिव हो गए। अब टोक्यो ओलंपिक खेलने का उनका सपना टूटता हुआ नजर आ रहा है। ऐसे कई खिलाड़ी हैं, जो पहली दफा खेलों के महाकुंभ में भारतीय तिरंगे के नीचे उतरना चाहते थे। कई ऐसे भी थे, जो इस बार का ओलंपिक खेलकर खेल जीवन को अलविदा कहना चाहते थे। इन सबकी उम्मीदों पर महामारी ने पानी फेर दिया है। बुधवार को प्रकाशित विशेष रिपोर्ट में इस अखबार ने कई खिलाड़ियों की दर्द भरी कहानियां प्रकाशित की थीं, जो अपना जौहर दिखाए बिना ही कुम्हलाने लगे हैं। कोरोना-काल ने उनके अभाव को विकराल बना दिया है। 

भारतीय खेल प्राधिकरण और भारतीय ओलंपिक संघ से जुडे़ संगठनों की मानें, तो देश भर में ऐसे खिलाड़ियों की संख्या पांच करोड़ से भी ज्यादा है, जो विभिन्न खेलों में अपना भविष्य बनाने के लिए जान लगाए हुए थे। भारतीय खेल प्राधिकरण के छोटे-बडे़ 250 केंद्रों में लगभग 10 हजार युवा खिलाड़ी प्रशिक्षण प्राप्त करते हैं। सिर्फ उत्तर प्रदेश की बात करें, तो करीब 2,200 चुनिंदा खिलाड़ी इस समय अलग-अलग स्पोट्र्स कॉलेज और हॉस्टल में ट्रेनिंग ले रहे थे। इनके अलावा, राज्य भर के स्टेडियमों में पांच लाख से ज्यादा खिलाड़ी विभिन्न खेलों में प्रशिक्षण ले रहे थे। पिछले एक साल से भी अधिक समय से इन सबका प्रशिक्षण बुरी तरह प्रभावित हुआ है। एथलेटिक्स, वॉलीबॉल, फुटबॉल, हॉकी जैसे खेलों के ज्यादातर खिलाड़ी गरीब परिवारों से ताल्लुक रखते हैं। चूंकि ग्रामीण इलाकों, कस्बों और छोटे जिलों के युवा महंगी शिक्षा नहीं ग्रहण कर सकते। ऐसे में, पिछले कुछ दशक से खेल इन्हें एक ऐसे क्षेत्र के रूप में दिखता रहा है, जहां अपनी शारीरिक क्षमता, प्रतिभा और हौसले के दम पर वे कुछ कर सकते हैं। ऐसे कई एथलीटों की संघर्ष-गाथा आज हजारों नौजवानों के लिए प्रेरणा-स्रोत हैं। मगर उम्मीदों की यह पौध कोरोना के कारण मुरझाने लगी है। किसी ने अभ्यास छोड़ दिया, तो किसी को कोरोना खा गया। कमजोर आर्थिक पृष्ठभूमि के ज्यादातर खिलाड़ी इसलिए अपने सपनों से मुंह मोड़ने लगे हैं, क्योंकि उनके घरवाले अभ्यास के लिए जरूरी खुराक का भार नहीं उठा सकते। अंतरराष्ट्रीय एथलेटिक्स कोच जसविंदर सिंह भाटिया के मुताबिक, खिलाड़ी अगर एक दिन अभ्यास न करे, तो उसके प्रदर्शन पर बुरा असर पड़ता है। ऐसे में, पिछले 14 महीने से देश के लाखों खिलाड़ियों का अभ्यास प्रभावित हो रहा है। कुछ प्रशिक्षक ऑनलाइन ट्रेनिंग देने का प्रयास कर रहे हैं, पर खेल ऐसी विधा है, जिसमें कोच जब तक सीटी लेकर मैदान में खड़ा नहीं होता, तब तक ट्रेनिंग ठीक से नहीं हो पाती। अभ्यास बंद होने से ये खिलाड़ी बहुत पीछे चले गए हैं। किसी को नहीं पता कि ये स्थितियां कब तक कायम रहेंगी? जिन खिलाड़ियों ने 2024 ओलंपिक खेलों में हिस्सा लेने का सपना संजोया था, उनका भी बहुत नुकसान हुआ है। उन खिलाड़ियों की ट्रेनिंग भी प्रभावित हो रही है, जिन्होंने ओलंपिक का टिकट हासिल कर लिया था। कई खेल संघों ने अपने खिलाड़ियों को ट्रेनिंग के लिए विदेश भेज दिया है। वहां विशेष स्थिति में उन्हें प्रशिक्षण मिल भी रहा है। मगर जो देश में हैं, उनके लिए प्रशिक्षण एक बड़ी चुनौती बन गया है। उन्हें अकेले ट्रेनिंग करनी पड़ रही है, जबकि ओलंपिक के लिए क्वालीफाई कर चुका हरेक खिलाड़ी चाहता है कि उसे बड़ी प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने का मौका मिले, ताकि वह अपने को आंक सके। पर कोरोना ने खेल गतिविधियों को ठप कर दिया है। ऐसे में, खिलाड़ियों को नहीं पता कि टोक्यो में वे किस पायदान पर खड़े होंगे। बडे़ खिलाड़ियों के लिए विशेषज्ञों-मनोविज्ञानियों के सत्र आयोजित किए जा रहे हैं, ताकि वे अवसाद के शिकार न बनने पाएं। पहली बार ओलंपिक में हिस्सा लेने का सपना पाले ताइक्वांडो खिलाड़ियों पर कोरोना की बिजली गिरी है। संक्रमण का दूसरा दौर न होता, तो उनका शिविर अप्रैल में शुरू हो जाता। दूसरी लहर के चलते उनका कैंप स्थगित करना पड़़ा। अधिकांश क्वालीफायर प्रतियोगिताएं  रद्द कर दी गई हैं। ऐसे में, लंदन ओलंपिक की कांस्य पदक विजेता शटलर साइना नेहवाल, कदांबी श्रीकांत, एथलीट सुधा सिंह, स्टीपलचेजर पारुल चौधरी, पहलवान दिव्या काकरान, रियो ओलंपिक की कांस्य पदक विजेता पहलवान साक्षी मलिक जैसी खिलाड़ियों की ओलंपिक में हिस्सा लेने की उम्मीदें टूट चुकी हैं। जाहिर है, खेल संघों के साथ-साथ केंद्र और राज्य सरकारों को भी कोरोना से उपजी नई परिस्थितियों से अपने खिलाड़ियों को उबारने और टूट चुकी खेल प्रतिभाओं के साथ खड़े होने के लिए आगे होना होगा। जो खिलाड़ी खुराक के अभाव में खेल छोड़ने को मजबूर हुए, उनकी तुरंत मदद की जानी चाहिए। उनकी खुराक का बंदोबस्त किया जाए, ताकि हालात के सामान्य होने तक अपने-अपने घर पर रहते हुए वे अपनी ट्रेनिंग जारी रख सकें। तमाम क्षेत्रों को इस संकट काल में सरकार से आर्थिक मदद मिली है, इन खिलाड़ियों की भी सहायता की जाए। इस काम में देश के संपन्न उद्यमियों और निजी क्षेत्र को भी आगे आना चाहिए। इन खेल प्रतिभाओं को यह भरोसा दिलाना होगा कि उनका भविष्य दांव पर नहीं लगने दिया जाएगा। आने वाले अंतरराष्ट्रीय आयोजनों में वे इस देश के लिए गौरवशाली पल अर्जित कर सकें, इसके लिए  जरूरी है कि उनके खेल पर विराम न लगे।

सौजन्य - हिन्दुस्तान।

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Tuesday, May 18, 2021

काश! अपने पांव पर खड़े होते गांव (हिन्दुस्तान)

बद्री नारायण, निदेशक, जीबी पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान 

कोरोना का घातक प्रसार देश के गांवों में भी पहुंच चुका है। शहर, शहर से लगे कस्बों, बाजारों से होता हुआ यह वायरस अब दूरस्थ गांवों में भी अपने पांव फैलाने लगा है। कोरोना की पहली लहर में उत्तर भारत के गांव बहुत प्रभावित नहीं हुए थे। तब लगा था कि ‘इंडिया’ के प्रभावी उपायों से ग्राम-अंचलों में फैला ‘भारत’ बच जाएगा। पर ऐसा न हो सका। आज गांवों की गलियों में मृत्यु को घूमते-टहलते आप आसानी से देख सकते हैं। भारतीय गांवों की सबसे बड़ी मजबूरी है- शहरों पर उनकी निर्भरता। गांव के लोग प्रवासी मजदूर, कामगार बनकर शहरों, महानगरों में जाने और वहां से लौटने को विवश हैं। शहरों में अन्न, सब्जी, दूध बेचने जाना और वहां से दैनंदिन जीवन की अनेक जरूरी वस्तुओं का गांवों में आना ग्रामीण जीवन की मजबूरी है। इन्हीं लोगों और उत्पादों के साथ संक्रामक बीमारियां गांवों में पहुंचती, पांव पसारती रही हैं। हैजा, चेचक जैसी अनेक संक्रामक बीमारियां और उनके जानलेवा विषाणु औपनिवेशिक काल में भी सैनिकों के साथ परेड करते जिला केंद्रों के सिविल लाइन्स (ब्रिटिश सैनिकों के रहने के लिए विकसित क्षेत्र) से उड़कर शहरी आबादी में पहुंचते थे। फिर शहरी आबादी से गांवों में।

 

महात्मा गांधी पश्चिम-उत्पे्ररित शहरीकरण के इस दुश्चक्र को अच्छी तरह समझ चुके थे। वह कहते थे, भारत का भविष्य भारतीय गांवों से जुड़़ा है। गांव बचेंगे, तो भारत बचेगा। पश्चिम से प्रभावित आधुनिकीकरण और उसके सर्वग्रासी संकट को समझते हुए उन्होंने अपने उपनिवेशवाद विरोधी आजादी के संघर्ष के साथ भारतीय गांवों के पुनर्निर्माण के अभियान को मजबूती से जोड़ा था। वह शहरों पर निर्भरता के दुश्चक्र से मुक्त ‘आत्मनिर्भर गांव’ विकसित करना चाहते थे। सन 1945 में जवाहरलाल नेहरू को लिखे एक पत्र में उन्होंने कहा था, ‘मेरा आदर्श गांव अब भी मेरी कल्पनाओं में ही अवस्थित है। मैं भारत में एक ऐसी ग्राम-व्यवस्था और संस्कृति का विकास चाहता हूं, जो एक जागरूक गांव विकसित कर सके। ये शिथिल चेतना वाले गांव न हों; ये अंधेरे से भरे गांव न हों, ये ऐसे गांव न हों, जहां जानवरों के गोबर चारों तरफ फैले रहते हों। ये ऐसे गांव हों, जहां स्त्री-पुरुष आजादी के साथ रह सकें।’ इसी पत्र में उन्होंने आगे लिखा है कि मैं ऐसे गांव विकसित करना चाहता हूं, जो हैजा, प्लेग जैसी महामारियों से मुक्त रहें। जहां कोई आरामतलब एवं बेकार न हो। जहां सभी श्रमशील रहें और सबके पास काम रहें। ऐसे गांवों के पास से रेल लाइनें भी गुजरें, और इनमें पोस्ट ऑफिस भी हों। गांधी भारतीय गांवों को साफ-सुथरा, महामारियों से मुक्त रिहाइश के रूप में विकसित करना चाहते थे। इसके लिए अपने पड़ोसी शहर पर गांवों की निर्भरता बढ़ाने के चक्र को वह तोड़ देना चाहते थे। वह गांवों से हो रहे पलायन की प्रक्रिया को रोकना चाहते थे। इसके लिए वह कृषि के साथ ही स्थानीय उत्पादों पर आधारित ग्रामीण उद्योगों को विकसित करना चाहते थे। वह चाहते थे कि गांव में आत्मतोष का भाव विकसित हो, और जहां जिसकी जितनी जरूरत हो, उतना वह उपभोग करे और अपने उत्पाद दूसरों से आदान-प्रदान करे। महात्मा गांधी उस बड़ी बचत की चाह को गांवों से खत्म करना चाहते थे, जो पूंजीवाद की खुराक बनकर उसे पोषित करता है। गांधी के गांव में शहरों से ज्यादा कुछ खरीदने की अपेक्षा नहीं थी। वह तो ग्रामीण उद्योगों के लिए कच्चा माल भी दूर से मंगाने के बजाय स्थानीय स्तर पर उगाए जाने की वकालत करते थे। 


भारतीय गांवों की आत्मनिर्भरता और शहरों में जाने-आने की बढ़ती जरूरतों को नियंत्रित करने के लिए गांधी का मानना था कि गांव में प्राथमिक से लेकर विद्यापीठ तक स्थापित करने होंगे। उनका मानना था कि प्रारंभिक शिक्षा के बाद ग्रामीण विद्यार्थियों को शहरों में आकर माध्यमिक व उच्च शिक्षा लेने के लिए मजबूर होना पड़ता है। वह इस मजबूर गतिशीलता पर रोक लगाना चाहते थे। गांधी की परिकल्पना का ‘आत्मनिर्भर गांव’ वस्तुत: उनका मिशन था, जिसे वही नहीं, बल्कि पूरी गांधीवादी सामाजिक राजनीति सच बनाने में लगी थी। विनोबा भावे, जयप्रकाश नारायण, जे सी कुमारप्पा जैसे लोग आजादी के बाद बापू के ‘ग्राम-स्वराज’ और आत्मनिर्भर गांव के सपने को सच करने में जीवन-पर्यंत लगे रहे। 

महात्मा गांधी की यह परिकल्पना विकास की संपूर्ण दृष्टि और कार्ययोजना थी। इसमें आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक दृष्टियों का समन्वय भी था। गांधी के कई अनुयायियों ने देश के विभिन्न भागों के गांवों में गांधीवादी संकल्पना से काम भी किया। एपीजे अब्दुल कलाम ने इसी सोच को अपने ढंग से विकसित करके एक रूपरेखा रखी थी, जिसमें गांवों को आत्मनिर्भर बनाने की कोशिश थी। प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता नानाजी देशमुख, अन्ना हजारे भी अपने-अपने ढंग से महात्मा गांधी के इसी सपने को आगे बढ़ाते रहे। अटल बिहारी वाजपेयी ने तो अपने प्रधानमंत्रित्व काल में गांवों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए कई महत्वपूर्ण योजनाएं प्रारंभ की थीं। किंतु महात्मा गांधी का सपना साकार न हो सका, क्योंकि भारतीय राज्य आजादी के बाद से संगठित ढंग से जिस आर्थिक नीति पर चलता रहा, वह भारी उद्योगों, पश्चिमी आधुनिकता और शहरीकरण की प्रक्रिया को बल दे रहा था। शायद इसीलिए गांधी के सपने के बिल्कुल उलट विकास की प्रक्रिया चली। परिणाम यह हुआ है कि भारत में शहरीकरण तेज होता जा रहा है और अब तो ग्रामीण अंचलों में भी शहरीकरण का प्रसार होता जा रहा है। अगर आजादी के तुरंत बाद से भारतीय राज्य गांधी के ‘ग्राम-स्वराज’ और ‘आत्मनिर्भर ग्राम’ की अवधारणा पर काम करता, तो भारतीय समाज का विकास उस दिशा में हुआ होता, जहां घातक संक्रमणों से मुक्त भारतीय गांव बन पाता। आज अपनों को खोने का जो रुदन गांवों में सुनाई पड़ रहा है, उसमें कहीं न कहीं महात्मा गांधी की भी पीड़ा शामिल है। उसमें एक आह छिपी है कि काश! भारत में ऐसा ग्राम-स्वराज बन पाता, जो जातिवादी हिंसा, छुआछूत और आधुनिकता की अनेक बुराइयों व संक्रमण से मुक्त आधार क्षेत्र की तरह विकसित हो पाता। आज जब कोरोना गांव-गांव तक फैल रहा है, तब हमें अपने विकास संबंधी आत्ममंथन में महात्मा गांधी के इस महत्वपूर्ण दृष्टिकोण को याद करना ही चाहिए।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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Monday, May 17, 2021

खुलेंगी खिड़कियां एक दिन (हिन्दुस्तान)

विभूति नारायण राय, पूर्व आईपीएस अधिकारी 

सन 1947 में भारत का विभाजन एक ऐसा क्षेत्र है, जिसमें सहमतियों से अधिक असहमतियों की गुंजाइश हमेशा बची रहती है। बहुत सारे मिथक हैं, जो हमने अपने नायकों, घटनाओं व नतीजों के इर्द-गिर्द बुन रखे हैं, और जैसे ही कोई बौद्धिक इन्हें ‘डीकंस्ट्रक्ट’ करने का प्रयास करता है, उसे बहुत से पूर्वाग्रहों और सरलीकृत स्थापनाओं से जूझना पड़ता है। भारत और पाकिस्तान, दोनों जगहों पर विभाजन को लेकर एक ऐसा विमर्श मौजूद है, जिसके केंद्र में हिंदुओं और मुसलमानों के 1,300 वर्षों से अधिक के संग-साथ की तल्खियां और मिठास दिख ही जाती है। दोनों देशों में पढ़ाए जाने वाले इतिहास की पाठ्य पुस्तकें खुद ही एक गंभीर समाजशास्त्रीय अध्ययन का विषय हो सकती हैं। किसी एक ही शख्सियत या घटना के बारे में दोनों के विवरणों और स्थापनाओं में इतना अंतर दिखता है कि विश्वास नहीं होता, वे एक ही विषय-वस्तु के इर्द-गिर्द अपना ताना-बाना बुन रहे हैं।


इस तरह की विभक्त बौद्धिक दुनिया में पिछले कुछ वर्षों से प्रोफेसर इश्तियाक अहमद एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप कर रहे हैं। लाहौर में जन्मे, पले-बढ़े और शुरुआती शिक्षा प्राप्त पाकिस्तानी मूल के स्वीडिश नागरिक प्रो अहमद वहीं इतिहास और राजनीति शास्त्र पढ़ाते रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों में अंग्रेजी में छपी उनकी दो पुस्तकें पंजाब : लहूलुहान, विभाजित और नस्ली सफाई  तथा जिन्ना : सफलताएं, असफलताएं और इतिहास में उनकी भूमिका भारतीय उपमहाद्वीप की सांप्रदायिक राजनीति को समझने का प्रयास करने वाले किसी भी गंभीर अध्येता के लिए अनिवार्य पाठ्य सामग्री बन गई हैं। भारतीय उपमहाद्वीप के विभाजन की गुत्थियों को सुलझाने के लिए 1,300 वर्षों के उस पड़ोस को समझना जरूरी है, जो आठवीं शताब्दी में मोहम्मद बिन कासिम के सिंध विजय के साथ शुरू हुआ था। यह पड़ोस दुनिया की दो बड़ी जीवन पद्धतियों का था। एक तरफ, धर्म की शास्त्रीय समझ से परे हिंदू थे और दूसरी तरफ, आसमानी किताब और आखिरी पैगंबर में यकीन रखने वाले मुसलमान और स्वाभाविक ही इनकी विश्व दृष्टि एक-दूसरे से बहुत भिन्न थी। इस संग-साथ ने रचनात्मकता की दुनिया में बहुत कुछ श्रेष्ठ निर्मित किया। साहित्य, संगीत, स्थापत्य, मूर्तिकला, पाक शास्त्र- हर क्षेत्र में इन्होंने मिल-जुलकर अद्भुत योगदान किया। पर यह कहना सरलीकरण होगा कि दुनिया के दो बडे़ धर्मों के अनुयायी सिर्फ रचनात्मक लेन-देन कर रहे थे, सही बात यह है कि वे हजार साल से अधिक एक-दूसरे से लड़ते भी रहे थे। इसी तरह के दूसरे सरलीकरण हैं कि लड़ते तो सिर्फ शासक थे, प्रजा प्रेम से रहती थी या हिंदुओं और मुसलमानों को ब्रिटिश शासकों ने लड़ाया, अन्यथा वे तो शांति से रहना चाहते थे। विभाजन को लेकर भी सरलीकृत धारणाएं हैं, जो भारतीय समाज के सांप्रदायिक रिश्तों को समझने की कोशिश करने वाले मुझ जैसे जिज्ञासु को उलझन में डालती रही हैं। इन्हीं कुछ गुत्थियों को सुलझाने का मुझे मौका मिला, जब पिछले दिनों मैंने प्रो इश्तियाक से एक लंबी बातचीत की। सभी जानते हैं, विभाजन ने एक करोड़ से भी अधिक परिवारों को प्रभावित किया था। बड़ी संख्या में लोग विस्थापित हुए या मारे गए। विभाजन में तो मुख्य रूप से पंजाब और बंगाल का बंटवारा हुआ था और प्रो इश्तियाक ने पंजाब पर बहुत महत्वपूर्ण काम किया है। दोनों तरफ के दर्जनों विस्थापितों से इंटरव्यू लेकर उन्होंने मौखिक इतिहास का दुर्लभ व मूल्यवान दस्तावेजीकरण किया है। 

भारत में बहुत से लोग, जिनमें फैजान मुस्तफा जैसे आधुनिक और असदुद्दीन ओवैसी जैसे कट्टरपंथी शरीक हैं, तर्क देते हैं कि हिन्दुस्तान के मुसलमान अपनी मर्जी से भारतीय हैं। उन्हें 1947 में मौका मिला था कि वे पाकिस्तान जा सकते थे, पर वे अपनी धरती से प्यार करते थे, इसलिए उन्होंने भारत नहीं छोड़ा। मुझे इस स्थापना से हमेशा दिक्कत होती है कि क्या पाकिस्तान से आने वाले सिख और हिंदू अपनी धरती से प्यार नहीं करते थे। इस स्थापना से आजाद भारत के गांधी-नेहरू जैसे रोशन ख्याल नेतृत्व के प्रयासों का अपमान होता है, जिनके कारण भारत से उस तरह से मुसलमानों की नस्ली सफाई नहीं हो सकी, जैसे पाकिस्तान से सिखों और हिंदुओं की हुई। उन्होंने अपनी पंजाब वाली किताब का जिक्र किया, जिसमें उन्होंने विस्तार से मार्च 1947 में रावलपिंडी में सिखों पर मुसलमानों के हमलों का जिक्र किया है। इसमें कई हजार सिख मारे गए थे और हजारों परिवार उजड़कर पटियाला पहुंचे थे। यह आजादी के पहले की शुरुआती नस्ली सफाई थी। बाद में शेष पाकिस्तान में इसी पैटर्न की दूसरी कार्रवाइयां हुईं और नतीजतन आज एक प्रतिशत से कम हिंदू, सिख वहां हैं। इसके बरक्स भारत में क्या हुआ? मार्च में जब सिख भागकर आए, तब जरूर नस्ली सफाई का एक दौर आया, जिसमें सिखों ने मुसलमानों को मलेरकोटला छोड़कर पूरे पंजाब से खदेड़ दिया। याद रहे कि तब का पंजाब दिल्ली की सीमा तक था। पर जब तक नस्ली सफाई का सिलसिला दिल्ली तक पहुंचा, देश आजाद हो चुका था और बलवाइयों के लिए गांधी और नेहरू एक बड़ी चुनौती के रूप में सामने आए। गांधी तो सांप्रदायिक हिंसा के विरुद्ध अनशन पर बैठ गए और इसे तोड़ने के लिए उनकी एक शर्त यह भी थी कि हिंदू और सिख बलात कब्जा की गई अन्य संपत्तियों के साथ मस्जिदों को भी मुसलमानों को वापस सौंप दें। इस तरह का कोई प्रयास जिन्ना या लियाकत अली खां द्वारा पाकिस्तान में नहीं किया गया। भारत में आजादी के बाद के रोशन ख्याल नेतृत्व को इस बात का श्रेय दिया जाना चाहिए कि उसने नस्ली सफाई नहीं होने दी और अधिसंख्य मुसलमान देश में रुक सके। इसी तरह, कैबिनेट मिशन को लेकर एक मिथ यह है कि यदि कांग्रेस ने उसे मान लिया होता, तो विभाजन टल सकता था। पर प्रो इश्तियाक से बात करके यह मिथ टूटता है। वह मानते हैं कि कैबिनेट मिशन की असफलता का मुख्य कारण जिन्ना की हठधर्मिता ही अधिक थी। प्रो इश्तियाक भारत-पाकिस्तान के उन बुद्धिजीवियों में हैं, जो विश्वास करते हैं कि यद्यपि सन 1947 के पहले की स्थितियां लौटाई नहीं जा सकतीं, पर यूरोपीय यूनियन जैसी व्यवस्था तो हो ही सकती है, जिसमें वीजा खत्म हो सकता है, व्यापार निर्बाध हो जाए या साहित्य और संस्कृति की खिड़कियां खोलकर ताजी हवा के झोंके आने दिए जाएं। हम दोनों ने इसी उम्मीद के साथ बातचीत खत्म की कि हमारे जीवन में ही यह दिन आएगा जरूर।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

सौजन्य - हिन्दुस्तान।

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Thursday, May 13, 2021

राष्ट्रीय कार्यबल को मिले अधिकार (हिन्दुस्तान)

यशोवर्द्धन आजाद, पूर्व आईपीएस अधिकारी 

सर्वोच्च अदालत ने पिछले हफ्ते एक राष्ट्रीय कार्यबल (नेशनल टास्क फोर्स- एनटीएफ) का गठन किया, जो एक सप्ताह के भीतर राज्यों और केंद्रशासित क्षेत्रों को चिकित्सकीय-ऑक्सीजन के आवंटन की नीति बताएगा, और अगले छह महीनों में एक राष्ट्रीय योजना की व्यापक रूपरेखा पेश करेगा, ताकि अभी और भविष्य में हम कोविड-19 से कारगर जंग लड़ सकें। विशेषज्ञों से भरा यह 12 सदस्यीय कार्यबल भरोसा जगाता है। हालांकि, इसका काम सिर्फ सिफारिश करना है, लिहाजा उसकी अनुशंसाओं पर फैसले लेने का अधिकार केंद्रीय नौकरशाही के पास ही होगा, जिसकी तस्वीर बहुत धवल नहीं है। लोग फैसले लेने वाली कोई पेशेवर और निष्पक्ष इकाई चाहते हैं, जिसके लिए कार्यबल ही उपयुक्त है, फिर चाहे वह मौजूदा स्वरूप में हो या फिर जरूरत के मुताबिक इसमें अन्य विशेषज्ञ भी शामिल किए जाएं। सुप्रीम कोर्ट के लिए आवश्यक है कि वह इस  राष्ट्रीय कार्यबल को इतना मजबूत करे कि वह कोविड-19 से जुड़े फैसले खुद ले सके। इस समय सबसे बड़ी जरूरत यही है कि राष्ट्रीय कार्यबल जैसी किसी इकाई द्वारा त्वरित निर्णय लिए जाएं। यह अभी सबसे बड़ी जरूरत है। एक उदाहरण से इसे समझिए। पिछले साल कोविड-19 के मामलों में उछाल आने के बाद मार्च में भारत सरकार के सचिवों के नेतृत्व में 11 अधिकार प्राप्त समितियों का गठन किया गया। फिर भी, प्रस्तावित 133 नए ऑक्सीजन-प्लांट में से सिर्फ 33 प्लांट स्थापित हो सके, और ये समितियां कुछ नहीं कर सकीं। नवंबर में, संसद की स्थाई समिति ने ऑक्सीजन-आपूर्ति, आईसीयू बेड और अन्य सुविधाओं की कमी को लेकर चिंता जताई थी। मगर जब बीते मार्च में दूसरी लहर ने भारत पर हमला किया, तब हम बिना तैयारी के थे। ऑक्सीजन-कोटे को लेकर दिल्ली और केंद्र के बीच की लड़ाई को ही लीजिए। आखिरकार अदालत ने दिल्ली को प्रतिदिन 700 मीट्रिक टन ऑक्सीजन आवंटित करने का फैसला दिया। क्षमता स्थापित करना और वितरण का निर्धारण करना भी मुद्दे हो सकते हैं। मगर, पिछले साल के अति-संतोष और इस बार की मौजूदा जरूरत में तुलना करें, तो यह साफ हो जाता है कि त्वरित अदालती फैसले और समितियों के आदेश क्या कर सकते हैं?

दूसरी बात, विशेषकर ऑक्सीजन की आपूर्ति को लेकर निजी और स्थानीय स्तर पर सफलताएं देखी गई हैं। केरल, ओडिशा और छत्तीसगढ़ जैसे कुछ राज्य न सिर्फ अपने यहां ऑक्सीजन-रिजर्व को बनाए रखने में सफल हुए, बल्कि उन्होंने अन्य सूबों की भी मदद की। नंदुरबार (महाराष्ट्र) के युवा जिलाधिकारी ने अपने जिले में तीन ऑक्सीजन-प्लांट लगाए, तो बृह्नमुंबई महानगर पालिका आयुक्त को भी अपने कामों के लिए भरपूर सराहना मिली। मगर इस तरह के निजी प्रयास पर्याप्त नहीं होते हैं, और एक केंद्रीय इकाई की जरूरत होती ही है, जो रोजाना के आधार पर चुनौतियों को देखते हुए फैसले ले। जैसे, ऑक्सीजन की आपूर्ति और उसके आवंटन को लेकर अगला पखवाड़ा काफी अहम है, इसलिए राष्ट्रीय कार्यबल के लिए यह महत्वपूर्ण है कि बैठकें करने और नीतियों पर विचार-विमर्श के बजाय रोजाना के आधार पर काम करे। भारत सरकार के सचिव के नेतृत्व में एक समिति पहले से ही ऑक्सीजन-आवंटन पर काम कर रही है। सचिव चाहें, तो प्रतिदिन की अपनी रिपोर्ट राष्ट्रीय कार्यबल को दे सकते हैं और वहां से आदेश ले सकते हैं। इससे राज्य भी संतुष्ट होंगे और केंद्र पर उंगली उठाने के बजाय वे अपने कामकाज पर ध्यान देंगे। तीसरी बात, विशेषज्ञ पैनल भारत की वैक्सीन-नीति को तैयार करने में (याद रखें, यह मामला भी इस समय अदालत के अधीन है) भी अधिक सक्रिय भूमिका निभा सकता है। टीके को लेकर संघीय संबंधों में तनातनी को देखते हुए टीकों के वितरण का फैसला राष्ट्रीय कार्यबल को सौंपा जाना चाहिए। व्यवस्थित टीकाकरण के लिए, रोग की मौजूदा व कथित गंभीरता को देखते हुए विभिन्न जनसांख्यिकी खंडों के लिए विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों में रणनीति के आधार पर काम करने की दरकार है। चौथी बात, कोविड-19 प्रोटोकॉल पर काफी ज्यादा भ्रम होने की वजह से राष्ट्रीय कार्यबल को चिकित्सा संबंधी निर्देश जारी करने का अधिकार मिलना चाहिए। एक तरफ डॉक्टरों व विशेषज्ञों के बयान हैं कि नागरिकों को रेमडेसीवर, टोसिलीजुमाब और प्लाज्मा थेरेपी के इस्तेमाल को लेकर सावधान रहना चाहिए और खास परिस्थितियों में ही इनका इस्तेमाल करना चाहिए, जबकि दूसरी तरफ, होम आइसोलेशन में डॉक्टर धड़ाधड़ इसका इस्तेमाल कर रहे हैं। राष्ट्रीय कार्यबल को इस पर तत्काल गौर करना चाहिए और एक ‘नेशनल एडवाइजरी’ जारी करनी चाहिए। नियमित प्रेस कॉन्फ्रेंस में, कार्यबल जनता से जीनोम-सीक्वेंसिंग की स्थिति और नए वेरिएंट को लेकर सूचनाएं भी साझा कर सकता है। पांचवीं बात, मदद के रूप में विदेश से चिकित्सा सामान की आपूर्ति लगातार हो रही है और भारत सरकार की समिति मानदंडों के अनुसार इनके वितरण का काम देख रही है। ऐसा न हो कि आवंटन में देरी और पूर्वाग्रह के कारण कोई नया विवाद खड़ा हो जाए। दैनिक आधार पर समिति को सुनने के बाद राष्ट्रीय कार्यबल को वितरण का काम अपने हाथ में ले लेना चाहिए। अगले छह महीनों के लिए कोविड-19 से संबंधित फैसले राष्ट्रीय कार्यबल द्वारा ही लिए जाने चाहिए। महत्वपूर्ण लंबित मामलों में त्वरित निर्णय लेने की क्षमता इसके पास है और इसकी छवि भी निष्पक्ष है। कई समितियां पहले से ही राष्ट्रीय कार्यबल की मदद करने के लिए मौजूद हैं। मौजूदा आभासी दौर में एक दिन में दो छोटी-छोटी बैठकों में ही सभी जरूरी मसलों पर फैसला हो सकता है। आलोचक राष्ट्रीय कार्यबल को न्यायिक अतिरेक की मिसाल के रूप में पेश कर सकते हैं और कह सकते हैं कि इससे चुनी गई सरकार के सांविधानिक अधिकारों का हनन होगा। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी सशक्त निकायों की स्थापना की है, जैसे, दिल्ली में अतिक्रमण को हटाने के लिए ऐसा किया गया था। लिहाजा, विपत्ति के समय असाधारण उपाय अपनाना और सुप्रीम कोर्ट का फैसला न सिर्फ केंद्र और राज्यों के बीच जारी संघर्ष को खत्म करेगा, बल्कि उनके प्रयासों की सराहना भी करेगा, क्योंकि राष्ट्रीय कार्यबल निष्पक्ष और पेशेवर फैसले लेने के लिए सरकारी आंकड़ों और संसाधनों पर ही काफी हद तक निर्भर रहेगा।

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Wednesday, May 12, 2021

संकट के समय में सामाजिक संगठन (हिन्दुस्तान)

हरजिंदर, वरिष्ठ पत्रकार

कहते हैं, इतिहास खुद को दोहराता है। अगर हम एक सदी पहले फैली महामारी स्पेनिश फ्लू की तुलना कोविड-19 से करें, तो कई मामलों में सचमुच ऐसा ही लगता है। बावजूद इसके कि इस बीच विज्ञान और शासन-विज्ञान ने काफी तरक्की कर ली है। निस्संदेह, सन 1918 की स्पेनिश फ्लू की त्रासदी ज्यादा बड़ी थी। वह कितनी भयावह थी, इसका अंदाज इसी से लगाया जा सकता है कि उसके बाद जब 1921 में देश में जनगणना हुई, तो 1911 की जनगणना के मुकाबले आबादी कम हो गई थी। पूरे भारतीय इतिहास में इसके पहले या बाद में ऐसा कभी नहीं हुआ। इसे छोड़ दें, तो उस त्रासदी के कई सबक बहुत महत्वपूर्ण हैं। एक तो सरकार उस त्रासदी की भयावहता का सामना करने में पूरी तरह से अक्षम साबित हुई थी। लेकिन दूसरी चीज ज्यादा महत्वपूर्ण है कि उस दौरान बहुत से सामाजिक संगठन सामने आए थे और उन्होंने तकरीबन पूरे देश में लोगों की वास्तविक मदद की थी। 


इनमें से ज्यादातर के नाम और काम हम नहीं जानते, क्योंकि वे कहीं भी किताबों में दर्ज नहीं हैं। लेकिन कुछ नाम जो सामने आते हैं, वे हमारी सामाजिक चेतना और सेवा-भावना की सही तस्वीर हमारे सामने रखते हैं। फिलहाल हम ऐसे तीन नामों का जिक्र करेंगे, जिनकी कहानी बताती है कि बड़ी त्रासदी के वक्त हमारा समाज उसका मुकाबला कैसे करता है। इनमें से पहले दो नाम दो भाइयों के हैं- कल्याणजी मेहता और कुंवरजी मेहता। और तीसरा नाम है दयालजी देसाई का। ये तीनों नाम गुजरात के हैं, लेकिन जो चीज इन्हें आपस में जोड़ती है, वह है गांधी के सत्याग्रह और अहिंसा के प्रति समर्पण। इसी वजह से ये तीनों 1918 के खेड़ा सत्याग्रह में भी शामिल हुए थे। तीनों कांग्रेस के सूरत अधिवेशन में भी शामिल हुए थे। मेहता बंधु सरकारी अधिकारी थे और दोनों ने एक साथ नौकरी छोड़कर अपना आश्रम स्थापित किया, जो आज भी मौजूद है। उन्होंने पटीदार युवा मंडल की स्थापना करके युवाओं को संगठित करने की कोशिश की और अपने आश्रम में युवाओं को राष्ट्रवाद की शिक्षा दी। दूसरी तरफ, दयालजी देसाई ने भी इन्हीं कामों को अपने ढंग से शुरू किया और उनके आश्रम में भी युवाओं को राष्ट्रवादी बनाने का काम किया गया। स्पेनिश फ्लू महामारी के फैलते ही ये तीनों अपने-अपने ढंग से सक्रिय हो गए। इन तीनों के पास अच्छी संख्या में समर्पित युवा थे और दरअसल, वही उनकी ताकत बने। दो काम सबसे जरूरी थे, लोगों को महामारी के प्रति जागरूक बनाना और उन तक दवा पहुंचाना। इसके लिए वे घर-घर गए। दयालजी देसाई के बारे में कहा जाता है कि वह साइकिल पर बैठकर खुद गांव-गांव जाते थे। हालांकि, यह स्पष्ट नहीं है कि वह लोगों को कौन सी दवा देते थे? स्पेनिश फ्लू की तब तक कोई दवा नहीं थी। ज्यादा संभावना यही है कि उन्होंने कोई आयुर्वेदिक दवा ही लोगों को दी होगी। वह दवा कितनी कारगर थी हम नहीं जानते, लेकिन एक मुश्किल दौर में उन्होंने जिस तरह से समाज को जोड़कर रखने का काम किया, वह ज्यादा महत्वपूर्ण है। इन तीनों ने जो सबसे महत्वपूर्ण काम किया, वह था महामारी में मारे गए लोगों के अंतिम संस्कार की व्यवस्था करना। तमाम अफवाहों और अज्ञात भय के बीच लोग उस समय अपने परिजनों के पार्थिव शरीर को वैसे ही छोड़कर चले जाते थे। इनकी पहल ने धीरे-धीरे लोगों के भ्रम दूर किए और फिर लोग अपने परिजनों के अंतिम संस्कार के लिए खुद आगे आने लगे। एक सदी बाद आज फिर से इन चीजों को याद करना इसलिए जरूरी है कि इस बार भी देश भर में जिस तरह से विभिन्न सामाजिक संगठन लोगों की मदद के लिए सामने आए, वह बताता है कि कठिन दौर में समाज को जोड़े रखने का हमारा जज्बा अब भी पहले की तरह बरकरार है। जब पूरा देश मरीजों के लिए ऑक्सीजन के संकट से जूझ रहा था, तब जिस तरह से ऑक्सीजन का लंगर चलाया गया, वह बताता है कि सेवा-भावना ही नहीं, बल्कि लोगों तक सेवा पहुंचाने की हमारी रचनात्मकता भी किसी से कम नहीं है।


कोविड-19 के संकट ने यह भी बताया है कि हमारी सरकारें भले त्वरित कार्यबल, त्वरित कार्यवाही जैसी बातें करती हों, लेकिन वे सब आखिर में नौकरशाही के जाल में फंसकर रह जाती हैं। लोगों को त्वरित राहत देने का काम, सीमित संसाधनों के बावजूद जिस तेजी और जिस सटीकता से हमारे सामाजिक संगठन कर सकते हैं, सरकारें उसके बारे में सोच भी नहीं सकतीं। इसलिए इन प्रयासों की जितनी तारीफ की जाए, कम है। लेकिन एक दूसरा सच यह है कि इस तरह के प्रयास चाहे जितने भी हों, वे सरकार की भूमिका के विकल्प नहीं बन सकते। हम 21वीं सदी के जिस दौर में हैं, उसमें उम्मीद की जाती है कि राज्य कल्याणकारी होगा और संकट या किसी भी आम समय में लोगों तक किसी भी तरह की राहत पहुंचाने का काम अंत में सरकारों को ही करना होगा। दुर्भाग्य से, जिस समय हम अपने सामाजिक संगठनों को लेकर गर्व महसूस कर रहे हैं, सरकारों के बारे में हमारी धारणा ऐसी नहीं बन पा रही। यह दुर्भाग्य इसलिए भी बड़ा है कि एक सदी पहले इस देश में जो सरकार थी या जो राज्य था, महामारी आने पर उसके हाथ-पांव फूल गए थे। बेशक, हालात अब उतने बुरे नहीं हैं। तमाम अदालती कोशिशों और लोगों के दबाव के कारण सरकारों को सक्रिय होना पड़ा है, और राहत भी कुछ लोगों तक पहुंचनी शुरू हुई है। लेकिन सच यही है कि समस्या जितनी बड़ी है, उसके मुकाबले सरकार की तैयारियां और उसके संसाधन काफी कम साबित हुए हैं। कम या ज्यादा, कमोबेश यही स्थिति एक सदी पहले भी थी। या हो सकता है कि उस समय तैयारियां व संसाधन और भी भीषण रूप से कम रहे हों। हो सकता है कि एक सदी में यह अनुपात काफी हद तक बदल गया हो; लेकिन जरूरत इस अनुपात को ही नहीं, इसकी गुणवत्ता को बदलने की थी। स्वास्थ्य-सेवा के मामले में एक यही चीज नहीं बदली। अब पहली प्राथमिकता इसे बदलने की ही होनी चाहिए।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

सौजन्य - हिन्दुस्तान।

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टीके पर एक राय तो बनाइए (हिन्दुस्तान)

पार्थ मुखोपाध्याय, सीनियर फेलो, सीपीआर 

एक भीड़-भाड़ वाले चिड़ियाघर में एक मजबूत कद-काठी का इंसान शेरों को देखने की कोशिश में था। तभी एक अन्य शख्स की कोहनी उसे जा लगी, जो खुद शेरों को अच्छी तरह से देखना चाहता था। नाराज होकर पहले व्यक्ति ने दूसरे शख्स को शेर के बाड़े में फेंक दिया, और कहने लगा- अब तुम बहुत करीब से शेर देख सकोगे। 45 साल से कम उम्र के लोगों के लिए टीकाकरण शुरू करके टीके की तरफ रुझान बढ़ाने की नीति भी कुछ इसी तरह की तनातनी बढ़ाती दिख रही है; वह भी उस समय, जब टीके की आपूर्ति कम हो रही है। इससे राज्यों में प्रतिस्पद्र्धा बढे़गी और कंपनियां दाम बढ़ाएंगी। सभी के लिए टीकाकरण को लेकर राज्य उत्सुक नहीं हैं, क्योंकि रोजाना 30 लाख खुराक की आपूर्ति भी नहीं हो रही है। केंद्र उनकी मांग मानने को लेकर लापरवाह है और पिछली नीति को बदलकर एक नई ‘उदारीकृत’ योजना बनाने को लेकर संवेदनहीन। किसी भी वैक्सीन-पॉलिसी में जल्द से जल्द और हरसंभव आपूर्ति बढ़ाने की दरकार होती है। कम कीमत पर टीके की खरीदारी, मध्यम अवधि की योजना और प्रभावी ढंग से टीके का बंटवारा अभी व भविष्य में भी जीवन बचाने में सक्षम है। मगर मौजूदा नीति ऐसा करने में कारगर नहीं है।


हम टीके को उसी तरह से खरीद रहे हैं, जैसे महीने के राशन का सामान। वित्त मंत्री ने कहा था कि सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया और भारत बायोटेक को क्रमश: 3,000 करोड़ और 1,567 करोड़ रुपये एडवांस दिए जाएंगे। इसके बजाय, उन्हें लगभग आधा भुगतान किया जा रहा है, जिसके तहत 16 करोड़ खुराक की आपूर्ति 157 रुपये प्रति टीके की दर पर हुई। यदि लक्ष्य 50 लाख खुराक प्रतिदिन है, तो यह सिर्फ एक महीने की आपूर्ति है। इसका अर्थ है कि केंद्र सिर्फ 45 से अधिक उम्र की आबादी के टीकाकरण में मदद करेगा, बाकी की आपूर्ति संभवत: अन्य कंपनियों से पूरी की जाएगी और बाकी का टीकाकरण राज्यों का काम है। ऐसे में, भविष्य की किसी उम्मीद के बिना टीका बनाने वाली कंपनियां क्या आपूर्ति बढ़ाने को लेकर निवेश करेंगी? फिलहाल, स्पूतनिक-वी को मंजूरी मिल गई है और उससे कुछ लाख खुराक का आयात किया जाएगा। कहा जा रहा है कि छह कंपनियां टीके देने को तैयार हैं, लेकिन अभी इस बाबत आदेश का इंतजार है। जॉनसन और नोवावैक्स को अभी तक मंजूरी नहीं मिली है। दोनों ने भारतीय साझीदार खोज लिए हैं और उम्मीद है कि वे मौजूदा जरूरत के मुताबिक केंद्र सरकार के बजाय सूबे की सरकारों से बातचीत करें। कोवैक्सीन की आपूर्ति भी अन्य कंपनियों से आउटसोर्सिंग करके बढ़ाई जा सकती है, खासकर तब, जब बौद्धिक संपदा अधिकार को भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद के साथ साझा किया जाएगा। हमें नकली धींगामुश्ती को रोकना होगा। किसी भी अन्य देश में ऐसी प्रांतीय सरकारें नहीं हैं, जो टीका खरीदने के लिए प्रतिस्पद्र्धा कर रही हों। केंद्र सरकार को प्रत्येक टीके के दाम पर बातचीत करनी चाहिए, साथ-साथ उसके आयात की तारीख, अनुमोदन आदि पर भी उसे कदम बढ़ाना चाहिए। अगर राष्ट्रीय स्तर पर आदेश मिलता है, तो टीका निर्माताओं को न सिर्फ आवश्यक आश्वासन मिलेगा, बल्कि डेढ़ अरब टीके की खुराक की मांग की आपूर्ति को लेकर उनमें भरोसा भी पैदा होगा। ऐसा करने से कंपनियां हमारी अन्य अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं को पूरा करने को लेकर प्रेरित होंगी, विशेष रूप से कोवैक्स को लेकर, जहां आपूर्ति में हमारी गड़बड़ी के कारण अधिकांश विकासशील राष्ट्र अधर में लटक गए हैं। ऐसे में, चीनी कंपनी को पैठ बनाने का मौका मिल रहा है।

दूसरा मसला कीमत का है। नई वैक्सीन नीति राज्यों को दंडित करने के लिए बनाई गई प्रतीत होती है। अपेक्षाकृत विवेकशील ‘पूर्व-उदारीकरण’ नीति में, वैक्सीन की लागत केंद्र उठा रहा था। इसके लिए उसने 35,000 करोड़ रुपये का बजट रखा। और टीकाकरण की लागत राज्यों द्वारा वहन की जानी थी। राज्यों को नि:शुल्क टीके मुहैया कराने की दैनिक प्रेस विज्ञप्ति मानो खैरात बांटने की जानकारी हो। यह संघीय लागत-साझाकरण की भावना के खिलाफ है। नई वैक्सीन नीति के तहत, केंद्र आपूर्ति का आधा हिस्सा खरीदेगा। एक चौथाई टीके राज्यों के लिए हैं, जो केंद्रीय कोटे के अनुसार साझे किए जाएंगे, और एक चौथाई वैक्सीन निजी क्षेत्र को मिलेगी, जो कोवैक्सीन के मामले में दोगुना से तीगुना कीमत चुका रहा है। अगर सीरम इंस्टीट्यूट और भारत बायोटेक सामान्य निजी कंपनियों की तरह व्यवहार करती हैं, तो वे पहले ऊंची कीमत देने वाले निजी क्षेत्र की मांग पूरी करेंगी, और फिर यदि बचेगा, तब राज्यों को आपूर्ति की जाएगी। यानी, नौजवानों को लगाने के लिए राज्यों को अब कम टीके उपलब्ध होंगे और उन्हें कीमत भी ज्यादा चुकानी होगी।


तीसरा, यदि केंद्र टीका बनाने वालों के साथ मूल्य और खुराक को लेकर बातचीत करता है, तो आपूर्ति की मौजूदा नीति के तहत पारदर्शी व्यवस्था बनाई जा सकती है। जो राज्य अधिक टीकाकरण करते हैं, उन्हें अतिरिक्त टीके दिए जा सकते हैं, जबकि जिन राज्यों की जरूरत कम है, उन्हें उसी अनुपात में आपूर्ति की जा सकती है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन में भी इसी तरह का लचीला रुख अपनाया गया है। यदि राज्य कर-बंटवारे पर सहमत हो सकते हैं, तो फिर टीके साझा करने पर भी वे एक राय बना ही सकते हैं। बेहतर पूर्वानुमानित आपूर्ति राज्यों को इंतजार करने के बजाय बेहतर योजना बनाने और टीकों की तरफ लोगों की रुझान बढ़ाने और तेज टीकाकरण की तरफ आगे बढ़ने को प्रेरित करेगी। इस तरह की संशोधित नीति से ही साल के अंत तक टीका लेने योग्य पूरी आबादी का टीकाकरण संभव हो सकता है, और यदि कंपनियां जल्द ही उत्पादन के लिए निवेश करती हैं, तो हम निर्यात भी कर सकते हैं। तो क्या केंद्र और राज्य सरकारें अपना-अपना रुख बनाए रखेंगी या एक समझदारी भरी वैक्सीन नीति बनाने के लिए मिलकर फैसले करेंगी? अतीत में इस तरह के मनमुटाव ने अमूमन आजीविका को नुकसान पहुंचाया है। मगर इस बार भारतीयों और दुनिया भर के लोगों का जीवन प्रभावित हो रहा है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

सौजन्य - हिन्दुस्तान।

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Saturday, May 8, 2021

इबोला से सबक सीखे भारत (हिन्दुस्तान)

निखिल पांधी, शोधकर्ता, चिकित्सा व सांस्कृतिक नृविज्ञान, प्रिंस्टन यूनिवर्सिटी 

पश्चिमी अफ्रीका में इबोला महामारी ने 28,616 लोगों को संक्रमित किया था और 2014 से 2016 के बीच सिएरा लियोन, लाइबेरिया और गिनी में 11,310 लोगों की मौत हुई थी। इबोला से हुई वह त्रासदी भले ही एक क्षेत्र विशेष की थी, लेकिन कोविड-19 महामारी के समय वह गौरतलब है। आज जब दूसरी लहर भारत को कुचल रही है, तब सूक्ष्म और स्थूल, दोनों स्तरों पर इबोला संकट से हम सबक ले सकते हैं। सबसे पहले, इबोला की तरह ही कोविड-19 को भी देखभालकर्ता को भी होने वाली बीमारी के रूप में माना जाना चाहिए। पश्चिमी अफ्रीका में इबोला के इलाज से जमीनी स्तर पर जुड़े रहे विश्व प्रसिद्ध संक्रामक रोग चिकित्सक और मानव विज्ञानी पॉल फार्मर ने अपनी पुस्तक फेवर्स, फ्यूड्स ऐंड डायमंड्स : इबोला ऐंड द रैवेजेज ऑफ हिस्ट्री  में लिखा है - महत्वपूर्ण बात यह है कि हजारों लोगों को इबोला इसलिए हुआ, क्योंकि वे बीमार लोगों की सेवा व मृतकों के अंतिम संस्कार में लगे थे। कोविड-19 के मामले में भी पहचानना जरूरी है कि यह देखभाल करने वालों, जैसे डॉक्टरों, नर्सों व पैरा-मेडिकल स्टाफ से लेकर घर, अस्पताल, क्लिनिक और श्मशान में काम करने वालों को प्रभावित कर रहा है। आज सेवा में लगे लोगों को अपने छोटे-छोटे प्रयास के स्तर पर कमियों को पहचानने व सुधार करने की जरूरत है।

 

टीकाकरण से परे भारत सरकार को कोरोना के खिलाफ मोर्चा ले रहे अग्रिम पंक्ति के योद्धाओं को जोखिम से बचाने के लिए ठोस योजना विकसित करनी चाहिए। अग्रिम पंक्ति के योद्धाओं की कमी का जोखिम बहुत वास्तविक है। श्मशान, कब्रिस्तान और मोर्चरी में कार्यरत लोग आम तौर पर दलित-दमित वर्ग से आते हैं, क्या उन्हें राज्य मान्यता देता है? क्या ऐसे उपेक्षित श्रमिकों (और उनके परिवारों) के लिए सरकार ने किसी बीमा की व्यवस्था की है? साफ है, इबोला या कोरोना से पीड़ित लोगों के साथ-साथ उनकी तिमारदारी करने वालों को भी उतनी ही गंभीरता से लिया जाए। दूसरा, संक्रमितों की देखभाल-क्षमता का विकास पहले करने के बाद ही कंटेनमेंट बनाकर वायरस से मुकाबले के निर्देश जारी किए जाने चाहिए। लॉकडाउन की घोषणा और सिर्फ जबरदस्ती से रोकथाम के उपाय लागू करना अपने आप में कोई समाधान नहीं है। इबोला के मामले में पॉल फार्मर चर्चा करते हैं, सार्वजनिक स्वास्थ्य और बायो-मेडिसिन राज्य के सामाजिक अनुबंध का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। सुरक्षित और प्रभावी देखभाल सुनिश्चित किए बिना रोकथाम की नीति की अपनी सीमाएं हैं। इबोला के समय भली-भांति देखा गया था कि ऐसा करना न सिर्फ पीड़ितों के जीवन को खतरे में डालता है, बल्कि राज्य के खिलाफ आक्रोश भी पैदा करता है, जो अविश्वास का रूप ले सकता है। अपने हाल पर छोड़ दिए गए लोग कंटेनमेंट, संपर्क-ट्रेसिंग और टीकाकरण का विरोध भी कर सकते हैं।

तीसरा, भारत में मौजूदा संकट इसलिए भी ज्यादा है, क्योंकि अस्पताल जरूरत से ज्यादा दबाव में आ गए हैं, और राज्य बुनियादी जरूरतों को पूरा करने में नाकाम है, ऑक्सीजन, बिस्तर, उपकरण, दवाएं और टीके का अभाव है। इबोला संकट भी यही दर्शाता है कि बुनियादी कर्मचारियों, सामग्री और देखभाल की व्यवस्था का अभाव था। पश्चिमी अफ्रीका में स्वतंत्र इबोला उपचार इकाइयां सामुदायिक सक्रियता के माध्यम से स्थापित की गई थीं और दूसरे व तीसरे स्तर की चिकित्सा की अनुपस्थिति में दो साल तक कायम थीं। भारत में उन इलाकों में चिकित्सा इकाइयों को तेजी से विकसित करना चाहिए, जिनके आसपास लोग इलाज के अभाव में मर रहे हैं, जहां अस्पताल में जगह नहीं मिल रही। लोग कोरोना से नहीं, बल्कि स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी से जान गंवा रहे हैं। अभी बुनियादी चिकित्सा ढांचे की अनुपस्थिति भारी पड़ रही है। आज जांच और इलाज के लिए तत्काल चिकित्सा इकाइयों और ऑक्सीजन हब बनाने की जरूरत है। चौथा, हम वायरल महामारी में स्वास्थ्य के सामाजिक निर्धारकों की उपेक्षा नहीं कर सकते। भारत में चल रही दूसरी लहर में संक्रमण और चिकित्सा व्यवस्थाओं की विफलता मध्य व उच्च-मध्य वर्गों को प्रभावित कर रही है। यह 2020 की पहली लहर से अलग है, जिसमें सबसे पहले दुर्बल श्रमिक, प्रवासी श्रमिक, गरीब व सामाजिक-आर्थिक रूप से वंचित ज्यादा निशाने पर थे। हमें खुद से पूछना चाहिए, राज्य, मीडिया, नागरिक (नेटिजन सहित) और चिकित्सा व्यवस्थाएं पहली और दूसरी लहर के बीच के समय में पर्याप्त कदम उठाने में नाकाम क्यों रहीं? वर्तमान दौर दर्शाता है कि वर्ग और जाति के आधार पर संकट व देखभाल की हमारी धारणा कैसे तय की जाती है? हम सार्वजनिक स्वास्थ्य के प्रति तभी गंभीर होते हैं, जब उच्च वर्ग के लोग शिकार होने लगे।

पांचवां, वायरस हमेशा समाज में कमजोरियों का पीछा करते हैं, और समाज की दरारों व कमियों पर हमला बोलते हैं। जैसा कि पॉल फार्मर ने एक साक्षात्कार में कहा था, महामारी की शुरुआत में एक भ्रम होता है कि यह नया वायरस समाज में सभी वर्गों, लोगों को समान रूप से प्रभावित करेगा, लेकिन ऐसा कभी होता नहीं है। आज वायरस की गति को समझने और उसे काबू करने के लिए हमें अपनी सामाजिक व्यवस्था को अधिक संवेदनशील ढंंग से समझना चाहिए। इबोला के मामले में पॉल फार्मर इतिहास में समस्या की जड़ें तलाशते हैं। उपनिवेशवाद व उत्तर-औपनिवेशिक गृह युद्धों, जातीय संघर्ष और शोषणकारी संरचनात्मक ढांचा इबोला से मची तबाही के लिए जिम्मेदार हैं। भारतीय संदर्भ में देखें, तो स्वास्थ्य के प्रति सरकारों के रवैये का आधार नस्ल, वर्ग, लिंग या जातीयता नहीं रही है। इसी वजह ने सार्वजनिक स्वास्थ्य को सामाजिक या सरकारी प्राथमिकता के रूप में आकार लेने से रोका। ऐसे में, बीमार स्वास्थ्य व्यवस्था की जिम्मेदारी पीड़ितों पर ही डाल देना आम बात है। वैज्ञानिकों और वायरोलॉजिस्टों के साथ, जिनके प्रयास महत्वपूर्ण हैं, भारत सरकार को अपनी आपदा तैयारियों में समाज विज्ञानियों, सामुदायिक स्वयंसेवकों और नियमित रूप से समाज पर नजर रखने वाले लोगों को शामिल करना चाहिए। सिर्फ इबोला ही नहीं, एड्स जैसी वैश्विक महामारियों के रिकॉर्ड से भी इलाज की खास जरूरतों की पूर्ति, कमजोर समूहों की पहचान और मौजूदा देखभाल उपायों का सही पता चलता है। इबोला से सीखते हुए हमें खुद को याद दिलाना चाहिए कि एक अच्छी स्वास्थ्य व्यवस्था ही वायरस जनित खतरों को जवाब दे सकती है। कोई आपातकालीन व्यवस्था नहीं, बल्कि ऐसी रोजमर्रा की व्यवस्था ही आपदा से मुकाबले के लिए खड़ी होती है। 

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

सौजन्य - हिन्दुस्तान।

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Friday, May 7, 2021

ताकि दुनिया में सबको मिले टीका (हिन्दुस्तान)

अरविंद गुप्ता, डायरेक्टर, विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन 

कोरोना महामारी के बढ़ते प्रकोप को देखते हुए अमेरिका ने भारत और दक्षिण अफ्रीका के उस प्रस्ताव का समर्थन करने का फैसला किया है, जिसमें इन दोनों देशों ने ‘ट्रिप्स’ समझौते के कुछ प्रावधानों में छूट देने की बात कही थी। ट्रिप्स विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) द्वारा तय एक बहु-राष्ट्रीय समझौता है, जिस पर 1 जनवरी, 1995 को हस्ताक्षर किया गया था। इसमें बौद्धिक संपदा के अधिकारों की रक्षा के न्यूनतम मानक तय किए गए हैं। भारत और दक्षिण अफ्रीका पिछले साल अक्तूबर से ही बढ़-चढ़कर मांग कर रहे हैं कि कोरोना टीके या इसकी दवाइयों को लेकर बौद्धिक संपदा के अधिकारों को कुछ वक्त के लिए टाल दिया जाए, ताकि क्षमतावान देश कोरोना के टीके और दवाइयां बना सकें। इससे न सिर्फ दुनिया के हरेक जरूरतमंद देश तक दवाइयां व टीके पहुंच सकेंगे, बल्कि कोरोना महामारी से बड़े पैमाने पर लोगों की जान भी बचाई जा सकेगी। विश्व स्वास्थ्य संगठन भारत और दक्षिण अफ्रीका के इस प्रस्ताव पर क्या रुख अपनाता है, यह तो अगले महीने होने वाली इसकी बैठक में ही पता चल सकेगा, मगर इसमें अमेरिका का समर्थन काफी मायने रखता है। उल्लेखनीय है कि दवा-निर्माण के क्षेत्र से जुड़ी ऐसी कई अमेरिकी कंपनियां हैं, जो कच्चा माल, तकनीक आदि उपलब्ध कराती हैं। अमेरिकी सरकार के फैसले का भले ही वहां की कुछ दवा कंपनियों ने विरोध किया है, लेकिन डब्ल्यूटीओ की बैठक में सदस्य देशों की सरकारें फैसला लेती हैं, कंपनियां नहीं। हालांकि, अभी यह नहीं कहा जा सकता कि अमेरिका के राजी होने मात्र से पेटेंट में छूट संबंधी भारत व दक्षिण अफ्रीका के प्रस्ताव डब्ल्यूटीओ से पारित हो जाएंगे। इसकी बैठक में सर्वसम्मति से फैसला होता है और यूरोपीय देशों की कई कंपनियां इस प्रस्ताव के विरोध में हैं। इसलिए यह देखने वाली बात होगी कि वे अपनी-अपनी सरकारों पर कितना दबाव बना पाती हैं, या फिर वहां की सरकारें अपनी-अपनी दवा कंपनियों के दबाव को कितना नजरंदाज कर पाती हैं? वैसे, इस प्रस्ताव का पारित होना मानवता का तकाजा है। अभी पूरी दुनिया कोविड-19 की जंग लड़ रही है। 32 लाख से अधिक लोगों की जान जा चुकी है। बेशक, कई देशों में टीकाकरण अभियान की शुरुआत हो चुकी है, लेकिन करीब 120 राष्ट्र अब भी ऐसे हैं, जहां कोरोना टीके की एक भी खुराक नहीं पहुंच सकी है। ऐसा इसलिए हो रहा है, क्योंकि गिनी-चुनी कंपनियों के पास ही पेटेंट अधिकार हैं और वही टीके का उत्पादन कर रही हैं। चूंकि इन कंपनियों की क्षमता भी सीमित है और इनसे उत्पाद लेने की प्रक्रिया लंबी व जटिल, इसलिए खरीदार देशों तक टीके पहुंचने में भी वक्त लग रहा है। फिर कई देश महंगी कीमत होने के वजह से इन कंपनियों की मांग पूरी नहीं कर पाते हैं। लिहाजा, विश्व व्यापार संगठन यदि भारत और दक्षिण अफ्रीका के सुझाव को मान लेता है, तो भारत जैसे कई देशों में वैक्सीन निर्माण-क्षमता का विस्तार होगा और जरूरतमंदों तक टीके पहुंचाए जा सकेंगे। टीकाकरण अभियान को खासा गति मिल सकेगी। इस छूट के आलोचक तर्क दे रहे हैं कि यदि इस प्रस्ताव को मान लिया गया, तो दवा अथवा टीके के शोध और अनुसंधान पर असर पडे़गा। आपूर्ति शृंखला के कमजोर होने और नकली वैक्सीन या दवा को मान्यता मिलने की आशंका भी वे जता रहे हैं। मगर इसमें पूंजी का खेल भी निहित है। चूंकि ट्रिप्स समझौते के तहत कंपनियां सूचना व तकनीक साझा करने से बचती हैं, इसलिए उनका लाभ बना रहता है। पेटेंट में छूट मिल जाने के बाद उन्हें अपना लाभ भी साझा करना पड़ेगा, जिस कारण भारत और दक्षिण अफ्रीका के प्रस्ताव का विरोध किया जा रहा है। मगर विरोधियों को वह दौर याद करना चाहिए, जब विशेषकर अफ्रीका में एड्स का प्रसार अप्रत्याशित रूप से दिखा था। उस समय एड्स की ‘ट्रिपल कॉम्बिनेशन थेरेपी’ 10,000 डॉलर सालाना प्रति मरीज की दर से विकसित देशों में संभव थी, मगर अब एक भारतीय जेनेरिक कंपनी इसे महज 200 डॉलर में बना रही है। स्थानीय स्तर पर कुछ ऐसा ही प्रयोग ब्राजील, थाइलैंड जैसे देशों में भी हुआ है। यह इसलिए संभव हो पाया, क्योंकि दवा-निर्माण में पेटेंट संबंधी छूट मिली। नतीजतन, व्यापक पैमाने पर एड्स की दवाइयां बननी शुरू हुईं और यह महामारी नियंत्रण में आ गई। आज भी यही किए जाने की जरूरत है। ऐसे वक्त में, जब कोरोना जैसी वैश्विक महामारी से पूरी दुनिया लड़ रही है, विश्व व्यापार संगठन, विश्व स्वास्थ्य संगठन अथवा संयुक्त राष्ट्र जैसी वैश्विक संस्थाओं और बड़े देशों को यह सोचना होगा कि ऐसी कोई व्यवस्था बने, जिसमें सभी राष्ट्रों को दवाइयां मिलें, टीके मिलें और कोविड-19 की जंग वे सफलतापूर्वक लड़ सकें। अगर किसी भी एक देश में कोरोना का संक्रमण बना रहता है, तो खतरा पूरे विश्व पर कायम रहेगा। इसलिए इस काम में अमीरी और गरीबी का भेद नहीं होना चाहिए। ऐसा नहीं हो सकता कि विकसित राष्ट्र अपने नागरिको को कोरोना से बचा ले जाने का सपना देखें, और गरीब देश वायरस की कीमत चुकाते रहें।

यहां एक व्यवस्था यह हो सकती है कि जब तक विश्व स्वास्थ्य संगठन इस बाबत कोई ठोस फैसला नहीं ले लेता, तब तक कंपनियां आपस में करार करके कोरोना टीका अथवा दवा-निर्माण के कार्य को तेज गति दें। इसमें यह संभावना बनी रहती है कि कंपनियां सूचना, शोध, अनुसंधान अथवा तकनीक आपस में साझा करती हैं। मगर यह आपसी विश्वास का मामला है। अगर कंपनियों को आपस में भरोसा है और लाभ कमाने की अपनी मानसिकता को वे कुछ वक्त के लिए टालना चाहती हैं, तो वे आपस में हाथ मिला सकती हैं। यह विशुद्ध रूप से कंपनियों के बीच का करार होता है और इसमें सरकारों की कोई दखलंदाजी नहीं होती। मगर आमतौर पर कंपनियां ऐसा शायद ही करना चाहेंगी। बिना फायदे के आखिर वे क्यों काम करेंगी?

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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ताकि दुनिया में सबको मिले टीका (हिन्दुस्तान)

अरविंद गुप्ता, डायरेक्टर, विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन  

कोरोना महामारी के बढ़ते प्रकोप को देखते हुए अमेरिका ने भारत और दक्षिण अफ्रीका के उस प्रस्ताव का समर्थन करने का फैसला किया है, जिसमें इन दोनों देशों ने ‘ट्रिप्स’ समझौते के कुछ प्रावधानों में छूट देने की बात कही थी। ट्रिप्स विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) द्वारा तय एक बहु-राष्ट्रीय समझौता है, जिस पर 1 जनवरी, 1995 को हस्ताक्षर किया गया था। इसमें बौद्धिक संपदा के अधिकारों की रक्षा के न्यूनतम मानक तय किए गए हैं। भारत और दक्षिण अफ्रीका पिछले साल अक्तूबर से ही बढ़-चढ़कर मांग कर रहे हैं कि कोरोना टीके या इसकी दवाइयों को लेकर बौद्धिक संपदा के अधिकारों को कुछ वक्त के लिए टाल दिया जाए, ताकि क्षमतावान देश कोरोना के टीके और दवाइयां बना सकें। इससे न सिर्फ दुनिया के हरेक जरूरतमंद देश तक दवाइयां व टीके पहुंच सकेंगे, बल्कि कोरोना महामारी से बड़े पैमाने पर लोगों की जान भी बचाई जा सकेगी। विश्व स्वास्थ्य संगठन भारत और दक्षिण अफ्रीका के इस प्रस्ताव पर क्या रुख अपनाता है, यह तो अगले महीने होने वाली इसकी बैठक में ही पता चल सकेगा, मगर इसमें अमेरिका का समर्थन काफी मायने रखता है। उल्लेखनीय है कि दवा-निर्माण के क्षेत्र से जुड़ी ऐसी कई अमेरिकी कंपनियां हैं, जो कच्चा माल, तकनीक आदि उपलब्ध कराती हैं। अमेरिकी सरकार के फैसले का भले ही वहां की कुछ दवा कंपनियों ने विरोध किया है, लेकिन डब्ल्यूटीओ की बैठक में सदस्य देशों की सरकारें फैसला लेती हैं, कंपनियां नहीं। हालांकि, अभी यह नहीं कहा जा सकता कि अमेरिका के राजी होने मात्र से पेटेंट में छूट संबंधी भारत व दक्षिण अफ्रीका के प्रस्ताव डब्ल्यूटीओ से पारित हो जाएंगे। इसकी बैठक में सर्वसम्मति से फैसला होता है और यूरोपीय देशों की कई कंपनियां इस प्रस्ताव के विरोध में हैं। इसलिए यह देखने वाली बात होगी कि वे अपनी-अपनी सरकारों पर कितना दबाव बना पाती हैं, या फिर वहां की सरकारें अपनी-अपनी दवा कंपनियों के दबाव को कितना नजरंदाज कर पाती हैं? वैसे, इस प्रस्ताव का पारित होना मानवता का तकाजा है। अभी पूरी दुनिया कोविड-19 की जंग लड़ रही है। 32 लाख से अधिक लोगों की जान जा चुकी है। बेशक, कई देशों में टीकाकरण अभियान की शुरुआत हो चुकी है, लेकिन करीब 120 राष्ट्र अब भी ऐसे हैं, जहां कोरोना टीके की एक भी खुराक नहीं पहुंच सकी है। ऐसा इसलिए हो रहा है, क्योंकि गिनी-चुनी कंपनियों के पास ही पेटेंट अधिकार हैं और वही टीके का उत्पादन कर रही हैं। चूंकि इन कंपनियों की क्षमता भी सीमित है और इनसे उत्पाद लेने की प्रक्रिया लंबी व जटिल, इसलिए खरीदार देशों तक टीके पहुंचने में भी वक्त लग रहा है। फिर कई देश महंगी कीमत होने के वजह से इन कंपनियों की मांग पूरी नहीं कर पाते हैं। लिहाजा, विश्व व्यापार संगठन यदि भारत और दक्षिण अफ्रीका के सुझाव को मान लेता है, तो भारत जैसे कई देशों में वैक्सीन निर्माण-क्षमता का विस्तार होगा और जरूरतमंदों तक टीके पहुंचाए जा सकेंगे। टीकाकरण अभियान को खासा गति मिल सकेगी। इस छूट के आलोचक तर्क दे रहे हैं कि यदि इस प्रस्ताव को मान लिया गया, तो दवा अथवा टीके के शोध और अनुसंधान पर असर पडे़गा। आपूर्ति शृंखला के कमजोर होने और नकली वैक्सीन या दवा को मान्यता मिलने की आशंका भी वे जता रहे हैं। मगर इसमें पूंजी का खेल भी निहित है। चूंकि ट्रिप्स समझौते के तहत कंपनियां सूचना व तकनीक साझा करने से बचती हैं, इसलिए उनका लाभ बना रहता है। पेटेंट में छूट मिल जाने के बाद उन्हें अपना लाभ भी साझा करना पड़ेगा, जिस कारण भारत और दक्षिण अफ्रीका के प्रस्ताव का विरोध किया जा रहा है। मगर विरोधियों को वह दौर याद करना चाहिए, जब विशेषकर अफ्रीका में एड्स का प्रसार अप्रत्याशित रूप से दिखा था। उस समय एड्स की ‘ट्रिपल कॉम्बिनेशन थेरेपी’ 10,000 डॉलर सालाना प्रति मरीज की दर से विकसित देशों में संभव थी, मगर अब एक भारतीय जेनेरिक कंपनी इसे महज 200 डॉलर में बना रही है। स्थानीय स्तर पर कुछ ऐसा ही प्रयोग ब्राजील, थाइलैंड जैसे देशों में भी हुआ है। यह इसलिए संभव हो पाया, क्योंकि दवा-निर्माण में पेटेंट संबंधी छूट मिली। नतीजतन, व्यापक पैमाने पर एड्स की दवाइयां बननी शुरू हुईं और यह महामारी नियंत्रण में आ गई। आज भी यही किए जाने की जरूरत है। ऐसे वक्त में, जब कोरोना जैसी वैश्विक महामारी से पूरी दुनिया लड़ रही है, विश्व व्यापार संगठन, विश्व स्वास्थ्य संगठन अथवा संयुक्त राष्ट्र जैसी वैश्विक संस्थाओं और बड़े देशों को यह सोचना होगा कि ऐसी कोई व्यवस्था बने, जिसमें सभी राष्ट्रों को दवाइयां मिलें, टीके मिलें और कोविड-19 की जंग वे सफलतापूर्वक लड़ सकें। अगर किसी भी एक देश में कोरोना का संक्रमण बना रहता है, तो खतरा पूरे विश्व पर कायम रहेगा। इसलिए इस काम में अमीरी और गरीबी का भेद नहीं होना चाहिए। ऐसा नहीं हो सकता कि विकसित राष्ट्र अपने नागरिको को कोरोना से बचा ले जाने का सपना देखें, और गरीब देश वायरस की कीमत चुकाते रहें।

यहां एक व्यवस्था यह हो सकती है कि जब तक विश्व स्वास्थ्य संगठन इस बाबत कोई ठोस फैसला नहीं ले लेता, तब तक कंपनियां आपस में करार करके कोरोना टीका अथवा दवा-निर्माण के कार्य को तेज गति दें। इसमें यह संभावना बनी रहती है कि कंपनियां सूचना, शोध, अनुसंधान अथवा तकनीक आपस में साझा करती हैं। मगर यह आपसी विश्वास का मामला है। अगर कंपनियों को आपस में भरोसा है और लाभ कमाने की अपनी मानसिकता को वे कुछ वक्त के लिए टालना चाहती हैं, तो वे आपस में हाथ मिला सकती हैं। यह विशुद्ध रूप से कंपनियों के बीच का करार होता है और इसमें सरकारों की कोई दखलंदाजी नहीं होती। मगर आमतौर पर कंपनियां ऐसा शायद ही करना चाहेंगी। बिना फायदे के आखिर वे क्यों काम करेंगी?

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

सौजन्य - हिन्दुस्तान।

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Thursday, May 6, 2021

संक्रमण थमेगा, तभी कारोबार जमेगा (हिन्दुस्तान)

अरुण कुमार, अर्थशास्त्री


अब सरकार को भी लग गया है कि कोरोना वायरस की जो दूसरी लहर आई है, वह बहुत घातक साबित हो रही है और इसका अर्थव्यवस्था पर बड़ा असर पड़ रहा है। पूरी तरह से लॉकडाउन नहीं लगा है, लेकिन असंगठित क्षेत्र की कंपनियों पर कुछ ज्यादा ही असर पड़ा है। ऑटोमोबाइल व अन्य कुछ क्षेत्रों में अनेक छोटी कंपनियों ने अपने काम बंद कर दिए हैं। असर सभी पर है, लेकिन असंगठित क्षेत्र पर ज्यादा है और इसीलिए पलायन भी दिख रहा है। सबसे पहले तो जो पैकेज भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने दिया है, इसको हमें सरकार का पैकेज नहीं मानना चाहिए। सरकार अलग है और आरबीआई अलग है। भारतीय रिजर्व बैंक ऋण के मोर्चे पर कोशिश कर रहा है कि असंगठित क्षेत्र को कारोबार जारी रखने के लिए पैसा मिले, जिससे असंगठित क्षेत्र की इकाइयों की स्थिति और न बिगडे़। जो छोटे कारोबारी होते हैं, उनके पास पूंजी बहुत कम होती है और वह जल्दी खत्म हो जाती है। जब ऐसी इकाइयों में काम बंद होता है, तब इनके लिए खर्च निकालना भी मुश्किल हो जाता है। ऐसी कंपनियों को फिर शुरू करना भी कठिन होता है। इसीलिए छोटे कारोबारियों को पैकेज दिया गया है कि वे बैंक से ऋण ले सकें, लेकिन इससे स्थिति नहीं सुधरेगी। अभी तो और भी इकाइयां बंद हो रही हैं। जब तक संक्रमण की स्थिति नहीं संभलेगी, तब तक ये इकाइयां खुल भी नहीं पाएंगी। यह पैकेज बंद हो रही इकाइयों को थामने की कोशिश है, लेकिन इससे अभी अर्थव्यवस्था में सुधार नहीं आएगा। हमलोग लॉकडाउन की ओर बढ़ रहे हैं, अभी अर्थव्यवस्था के दूसरे क्षेत्रों पर असर पड़ेगा, मैन्युफेक्चरिंग क्षेत्र पर असर पड़ेगा। इस समय में आपूर्ति शृंखला फिर से टूट रही है, जबकि हमने अभी तक पूरा लॉकडाउन नहीं लगाया है। चयनित लॉकडाउन हो रहा है, इससे आपूर्ति में भी समस्या आने लगी है। जगह-जगह उत्पादों की आपूर्ति नहीं हो पा रही है, तो उत्पादकों को उत्पादन भी बंद करना पड़ रहा है। रिजर्व बैंक की भूमिका अभी सीमित है, उसकी कोशिश है कि व्यवसाय अभी लॉकडाउन की वजह से नाकाम न हों। यहां राहत दो तरह से मिल सकती है, या तो अभी काम जारी रखने के लिए ऋण मिल जाए या बैंक अभी ऋण की वसूली न करें। लेकिन इससे अर्थव्यवस्था में मांग तत्काल नहीं बनेगी और आपूर्ति में कोई विशेष सुधार नहीं आएगा। 


तो हमारी क्या रणनीति होनी चाहिए? हम देखते हैं, जहां भी विदेशी सरकारों ने कड़ाई से लॉकडाउन लगाया, वहां स्थितियां तेजी से ठीक होने लगीं। जैसे चीन है, उसने शुरू में ही संभाल लिया और ब्रिटेन ने एक सप्ताह की देरी कर दी, तो लेने के देने पड़ गए। लॉकडाउन लगाने में जहां भी देरी होगी, वहां दूसरी लहर देर तक चल रही है और जहां भी जल्दी लॉकडाउन लगता है, दूसरी लहर भी जल्दी काबू में आ जाती है। संक्रमण को आपने थाम लिया, तो आप अर्थव्यवस्था को जल्दी उबार सकते हैं। इसलिए मार्च से मैं कह रहा हूं, लॉकडाउन कर देना चाहिए। जिससे संक्रमण के मामले बढ़े नहीं। मामले बढ़ते ही इसलिए हैं कि लोग आपस में मिलते-जुलते हैं। जब लॉकडाउन लगा दिया जाता है, तब दो सप्ताह बाद मामले घटने लगते हैं। हमारे यहां फरवरी में दूसरी लहर शुरू हो गई थी, तीन महीने होने जा रहे हैं। लॉकडाउन न लगाने का खामियाजा यह है कि हमारे यहां रिकॉर्ड संख्या में मामले निकल रहे हैं और लोगों की जान भी जा रही है। चूंकि हमने अभी तक लॉकडाउन नहीं लगाया है, इसलिए मामले अभी भी बढ़ने की आशंका है। एक दिक्कत यह भी है कि आंकड़े पूरे आते नहीं हैं या उपलब्ध नहीं कराए जाते। आज चिकित्सा व्यवस्था को बहुत तेजी से सुधारने की जरूरत है। इसके लिए भी रिजर्व बैंक ने एक पैकेज दिया है। मेडिकल ढांचा विकसित करने के लिए विशेष ऋण की जरूरत पड़ेगी, उसे इस विशेष पैकेज के जरिए मुहैया कराया जाएगा। मेरा मानना है, ऐसा चिकित्सा ढांचा विकसित करने में समय लगता है, इसलिए सेना को बुला लेना चाहिए। सेना के पास अस्पताल भी होते हैं और परिवहन के साधन भी। सेना अगर आ जाए, तो राहत मिल सकती है। हमें तत्काल मदद की जरूरत है। अभी विदेश से काफी सहायता आ रही है, जैसे कोई दवा दे रहा है, तो कोई ऑक्सीजन टैंक दे रहा है। आ रही मदद को हमें बढ़ा देना चाहिए। चिकित्सा क्षेत्र में आयात बढ़ाने के लिए हमें अपनी कोशिशों का विस्तार करना चाहिए। रिजर्व बैंक ने जो पैकेज घोषित किया है, वह अच्छा है, लेकिन तत्काल उससे फायदा नहीं होगा। सेना और आयात, दोनों से मदद लेनी पड़ेगी। 


अभी संपूर्ण लॉकडाउन नहीं है। संक्रमण गांव-गांव पहुंच गया है, जहां चिकित्सा ढांचा मजबूत नहीं है। जहां जांच भी आसानी से नहीं हो पा रही है। गांव-गांव तक चिकित्सा ढांचा विकसित करना भी अभी किसी आफत से कम नहीं है। अभी संक्रमण को तत्काल रोकने की जरूरत है। ऐसे में, टीकाकरण भी काम नहीं आएगा। अभी तक नौ प्रतिशत लोगों को ही एक खुराक नसीब हुई है। हम वैक्सीन भी कम उत्पादित कर रहे हैं, क्योंकि हमारे पास उसके लिए पूरी सामग्री भी नहीं है। हम अभी हर महीने पंद्रह करोड़ लोगों को वैक्सीन देने की स्थिति में नहीं हैं। यह साल खतरे से खाली नहीं है। अब सरकार को आगे आकर इसमें जहां-जहां काम रुक गया, बेरोजगारी बढ़ी है, वहां-वहां मदद करनी चाहिए। गरीब लोगों को इस वक्त मदद की बहुत जरूरत है। मुफ्त अनाज, इलाज जरूरी है। गरीब लोग पिछले साल बड़ी मुसीबत में चले गए थे। उस तरह का संकट अगर फिर आया, तो बहुत ज्यादा परेशानी हो जाएगी। अभी लोग संक्रमण से ही परेशान हैं और जब खाने-पीने का अभाव होगा, तो लोगों की परेशानी बहुत बढ़ सकती है। विशेषज्ञ बता रहे हैं, करीब 70-80 लाख लोगों ने रोजगार गंवाया है, पर मेरा मानना है कि इससे दस गुना ज्यादा लोगों ने काम गंवाया है। गांवों से जो खबरें आ रही हैं, वे भयावह हैं। इसका असर कृषि पर भी पडे़गा। सरकार को गांवों तक मदद पहुंचाने के लिए काम करना चाहिए। लोगों की हताशा-निराशा को दूर करने के लिए सरकार को ही कदम उठाने पड़ेंगे। आरबीआई के कदम कुछ दूर तक कारगर होंगे, लेकिन बाकी सब सरकार को ही करना पडे़गा।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

सौजन्य - हिन्दुस्तान।

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Wednesday, May 5, 2021

शिक्षित, लेकिन कमजोर होता समाज (हिन्दुस्तान)

विजय कुमार चौधरी, शिक्षा एवं संसदीय कार्य मंत्री, बिहार

शिक्षा का इतिहास मानव समाज एवं सभ्यता के विकास के इतिहास का सहचर रहा है। उसी तरह शुरू से ही शिक्षा एवं समाज का नाता धर्म से भी रहा है। सभी धर्मों में शिक्षा को सर्वोत्कृष्ट स्थान दिया गया है। गीता  में कहा गया है  न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते अर्थात इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र अन्य कुछ भी नहीं है। ज्ञान का अभिप्राय विद्या से है और विद्या सीधे रूप से शिक्षा से जुड़ी है। इस्लाम के संस्थापक हजरत मुहम्मद ने कहा था, ‘मां की गोद से लहद तक ( यानी जन्म से मृत्यु तक) इल्म हासिल करो।’ ईसाई मिशनरियों द्वारा पूरी दुनिया में शिक्षण संस्थान स्थापित कर शिक्षा के साथ धर्म-प्रचार का कार्य जगजाहिर है। शिक्षा को मानव समाज के विकास की धुरी माना गया है। विकास के सभी प्रयासों का लक्ष्य मनुष्य के जीवन स्तर में सुधार होता है और समाज के किसी भी क्षेत्र में विकास की रीढ़ शिक्षा ही होती है। इसके अलावा, शिक्षा के प्रत्यय पर प्राचीन काल से ही चिंतकों व विचारकों ने अलग-अलग विचार रखे हैं तथा अपने ढंग से इसे परिभाषित करने के प्रयास किए हैं। भारतीय परिप्रेक्ष्य में महात्मा गांधी ने शिक्षा की सबसे उपयुक्त परिभाषा देते हुए कहा था, शिक्षा से मेरा अभिप्राय बालक और मनुष्य के मन, शरीर और आत्मा के उच्चतम विकास से है। गांधी धर्म-मर्मज्ञ के साथ-साथ समाज सुधारक भी थे। उनके अनुसार, बच्चे के शारीरिक विकास के लिए जैसे मां का दूध जरूरी है, उसी तरह मनुष्य की भौतिक एवं आध्यात्मिक उन्नति के लिए शिक्षा आवश्यक है। वे साक्षरता और शिक्षा को बिल्कुल अलग मानते थे। उनके अनुसार, साक्षरता न तो शिक्षा का अंत है और न प्रारंभ। यह केवल मनुष्य को शिक्षित बनाने का एक साधन है। उन्होंने शिक्षा से मनुष्य के व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास एवं चरित्र निर्माण का तात्पर्य दिया।


आज की हाईटेक दुनिया में किसी भी शक्तिशाली अर्थव्यवस्था के लिए शिक्षा को पूर्वापेक्षित माना गया है। राष्ट्रीय एवं वैश्विक विमर्श में शिक्षा को सामाजिक एवं आर्थिक प्रगति की बुनियाद माना गया है। यूनेस्को, विश्व बैंक, एशियन डेवलपमेंट बैंक आदि द्वारा मिलकर गठित वल्र्ड एजुकेशन फोरम पूरी दुनिया में शिक्षा के प्रचार-प्रसार के लिए अध्ययन एवं योजना बनाने का काम करता है। इसके द्वारा शिक्षा सभी के लिए (एजुकेशन फॉर ऑल) का नारा दिया गया एवं इस हेतु संगठित रूप से अभियान चलाया गया। इन सबके साथ भारत में शिक्षा के अधिकार को मौलिक अधिकार बनाने वाला कानून बना एवं केंद्र तथा बिहार सहित अन्य राज्य सरकारों ने शिक्षा के सार्वजनीकरण पर जोर दिया। अभियान चलाकर यह सुनिश्चत करने की कोशिश की गई कि कोई भी स्कूल जाने की उम्र वाला बच्चा स्कूल से बाहर न छूटे। इसमें कोई शक नहीं कि ये सारे प्रयास बहुत हद तक सफल रहे हैं, जिसके कारण ग्रामीण इलाकों में भी साक्षरता दर बढ़ी है। हालांकि, कोरोना के बढ़ते संक्रमण के दौर में शिक्षा-व्यवस्था ही सबसे अधिक प्रभावित हो रही है। इस मुकाम पर पहुंचकर हम यह सोचने को विवश हैं कि जो कुछ भी हो रहा है, वह सिर्फ साक्षरता है या लोग वास्तविक अर्थों में शिक्षित हो रहे हैं। उनके अनुसार शिक्षा का मकसद तो चरित्र-निर्माण व गुणवत्तापूर्ण जीवन है और मनुष्य के गुणवत्तापूर्ण जीवन की कल्पना सामाजिक परिवेश से अलग नहीं की जा सकती है। हमारी मान्यता रही है कि व्यक्ति और समाज में अन्योन्याश्रय संबंध है। फिर शिक्षा तो इन दोनों के रिश्ते को मजबूत करने वाली होनी चाहिए, परंतु इसके विपरीत कभी-कभी शिक्षित व्यक्ति समाज से अपने को अलग-थलग महसूस कराने लगता है। ऐसी शिक्षा अपूर्ण ही मानी जाएगी, क्योंकि यह समाज के ताने-बाने को जर्जर बनाती है। लोक प्रचलन में आज यह मान्यता जड़ पकड़ रही है कि समाज में जिसके पास अधिक साधन होंगे, वही अधिक प्रतिष्ठा का हकदार होगा। दूसरी तरफ, सफलता व उपलब्धियों की खुशी में अधिक सूझबूझ से सामाजिकता निभाने की भावना व परंपरा कमजोर पड़ती जा रही है। सामाजिकता और नैतिकता के बिना गुणवत्तापूर्ण जीवन की कल्पना ही नहीं की जा सकती है।


वर्तमान व सामाजिक मान्यता में शिक्षा प्रणाली चरित्र निर्माण एवं राष्ट्र निर्माण की जगह शिक्षित व्यक्ति की सफलता का पैमाना उसके धनोपार्जन की क्षमता से जोड़ दी गई है। जितनी मोटी आमदनी होती है, वह व्यक्ति सफलता की सीढ़ी पर उतना ही ऊंचा दिखता है। ऐसी प्रथा चल पड़ी है कि शिक्षा को अंधाधुंध धनोपार्जन का जरिया मान लिया गया है। धनोपार्जन के एक सूत्री कार्यक्रम के तहत व्यक्ति समाज की बात तो दूर, परिवार की चिंता भूल जाता है। तेज गति से अधिक से अधिक कमाने की होड़ में सामाजिकता पिछड़ती चली जा रही है। समाज एवं इंसान आगे बढ़ता दिख रहा है, लेकिन सामाजिकता और इंसानियत पिछड़ती जा रही है। सोच और मकसद दूषित हो जाने से शिक्षा के मूल अभिप्राय का क्षरण हो रहा है व सामाजिकता भौतिकता के आगे घुटने टेक रही है। यहां चौंकाने वाली बात समाज द्वारा इस प्रवृत्ति की सहज स्वीकार्यता है। जिस सोच के तहत समाज के बुनियाद पर आघात हो रहा है व इसके स्वरूप को विकृत किया जा रहा है, उसके प्रति समाज गाफिल दिखता है। समय आ गया है, समाज की संरचना को क्षत-विक्षत करने वाली इस मानसिकता से हमें बाहर निकलना पड़ेगा। अनुचित धनोपार्जन तभी तक बुरा लगता है, जब तक हमें मौका नहीं मिलता। स्वयं इससे लाभान्वित होने की स्थिति में सारे आदर्श धरे रह जाते हैं। शिक्षा के उद्देश्य को पवित्र रखने के लिए इस दोहरी मानसिकता से समाज को बाहर निकलना होगा। शिक्षा को प्रभावी एवं उपयोगी बनाने के लिए पहल करना सरकार का दायित्व तो है ही, साथ-साथ समाज की भी अहम भूमिका है। सामाजिकता, नैतिकता एवं राष्ट्रीयता के मूल्यों का विद्यालयी पाठ्यक्रम के साथ पारिवारिक एवं सामाजिक मान्यताओं में समाहृत करना होगा। समाज को अपने मूल्य-प्रणाली (वैल्यू सिस्टम) में अपेक्षित परिवर्तन लाना होगा। अधिकतम धनोपार्जन करने वाले को सफलतम मानने की मानसिकता छोड़नी होगी। यह समझना होगा कि हमारी सफलताओं और उपलब्धियों में समाज तथा सरकार की भी अपनी भूमिका रहती है। शिक्षित मनुष्य को देखना होगा कि वह समाज के लिए क्या कर रहा है? शिक्षित व्यक्ति को अपनी अलग पहचान बनाने की प्रवृत्ति छोड़कर समाज में अपनी उपयोगिता व प्रासंगिकता बनानी होगी। अपने सार्वजनिक योगदान व चारित्रिक धवलता को सामाजिक प्रतिष्ठा की कसौटी बनानी होगी। तभी हम एक मजबूत समाज और दीर्घकालिक सभ्यता का निर्माण कर सकते हैं।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

सौजन्य - हिन्दुस्तान।

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Tuesday, May 4, 2021

विशेषज्ञों की सलाह (बिजनेस स्टैंडर्ड)

हम एक महामारी से गुजर रहे हैं और ऐसे में यह बेहद जरूरी है कि देश की निर्वाचित सरकार श्रेष्ठ वैज्ञानिक सलाहों को बेहद ध्यानपूर्वक सुने। यह साफ है कि केंद्र सरकार हाल के महीनों में ऐसा करने में नाकाम रही है और उसे आगे चलकर अपनी गलती सुधार लेनी चाहिए। समाचार एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक महामारी पर निगरानी रख रही सरकार के वैज्ञानिकों की समिति, इंडियन सार्स-सीओवी-2 जेनेटिक्स कन्सॉर्शियम अथवा इन्साकॉग ने मार्च के आरंभ में ही सरकार को वायरस के नए स्वरूप बी.1617 के बारे में जानकारी दे दी थी। वायरस के इस स्वरूप को अधिक संक्रामक माना जा रहा है और यह प्रतिरोधक क्षमता को धता बता सकता है। यानी दोबारा संक्रमण की आशंका अधिक है। इन्साकॉग में 10 राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं के वैज्ञानिक शामिल हैं। उन्होंने मार्च के आरंभ में स्वास्थ्य मंत्रालय से कहा था कि वायरस के नए स्वरूप के कारण देश में संक्रमण तेजी से फैल सकता है।

यह पता नहीं है कि सरकार ने इस सूचना के बाद क्या किया। दुख की बात है कि यह सूचना सही साबित हुई। देश में जांच नमूनों की जीनोम सीक्वेंसिंग अपूर्ण है लेकिन आंकड़े बताते हैं कि मुंबई और दिल्ली में बी.1617 ब्रिटेन के संक्रामक बी.117 स्वरूप के साथ पाया गया जो मूल वायरस से 40 से अधिक प्रतिशत अधिक संक्रामक है। शारीरिक दूरी के कड़े मानकों के अभाव में वायरस खूब फैला और देश के बड़े हिस्से में स्वास्थ्य ढांचा चरमरा गया। सरकार द्वारा अपने ही वैज्ञानिकों की बात नहीं सुनने का यह नतीजा निकला।


देश में दूसरी लहर के लिए बंद जगहों पर भीड़भाड़ एक बड़ी वजह है। काफी संभव है कि खुली जगहों पर भी अधिक लोगों का एकत्रित होना वायरस के तेज प्रसार की वजह बन सकता है। वैज्ञानिकों द्वारा मार्च के आरंभ में चेतावनी जारी करने के बावजूद देश के अधिकांश हिस्सों में धार्मिक त्योहार, राजनीतिक रैलियां, विवाह आदि तब तक चलते रहे जब तक मामले बहुत अधिक बढ़ नहीं गए और मौत के मामलों की अनदेखी संभव नहीं रह गई। उदाहरण के लिए मध्य प्रदेश सरकार ने विदिशा जिला अस्पताल में कुंभ से वापस आने वालों की जांच में बड़े पैमाने पर संक्रमण मिलने के बाद सभी जिलाधिकारियों से कहा कि वे कुंभ से लौटने वालों को तलाश कर क्वारंटीन करें। सरकार को पुरानी गलतियों से सबक लेना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि भविष्य में नियमों और प्रतिबंधों को लागू करने में विशेषज्ञों की राय तथा वैज्ञानिक प्रमाणों को तवज्जो दी जाए।


यकीनन अब सरकार की भविष्य की नीतियों को लेकर वैज्ञानिकों की राय के बारे में सवाल किए जाएंगे। जानकारी के मुताबिक प्रधानमंत्री को सलाह देने वाले कोविड-19 कार्य बल समेत कई विशेषज्ञ सामुदायिक प्रसार और ग्रामीण क्षेत्रों में वायरस का प्रसार रोकने के लिए देशव्यापी लॉकडाउन पर जोर दे रहे हैं। देश के बाहर के विशेषज्ञ मसलन अमेरिका के एंटनी फाउची आदि भी यही सलाह दे रहे हैं।


कन्फेडरेशन ऑफ इंडियन इंडस्ट्रीज (सीआईआई) ने भी वायरस का प्रसार रोकने के लिए उच्चतम और देशव्यापी स्तर पर अधिकतम जरूरी कदम उठाने की मांग की है, भले ही इसके लिए आर्थिक गतिविधियों को सीमित करना पड़े। सीआईआई ने सरकार से कहा है कि वह इस विषय पर देसी-विदेशी विशेषज्ञों की राय सुने। कई अन्य लोगों की दलील है कि ये निर्णय राज्य या जिला प्रशासन पर छोड़ दिए जाने चाहिए। यकीनन गत वर्ष जैसा देशव्यापी लॉकडाउन गरीब भारतीयों पर गंभीर असर डालेगा। बहरहाल जरूरी यह है कि ऐसे नीतिगत निर्णय ठोस वैज्ञानिक और विशेषज्ञ समूहों की राय लेकर लिए जाएं।

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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नतीजों से शक्तिशाली हुए क्षत्रप (हिन्दुस्तान)

आरती आर जेरथ, वरिष्ठ पत्रकार 

विधानसभा चुनावों के नतीजों को अगर देखें, तो खासतौर पर ममता बनर्जी की जीत स्तब्धकारी है। उन्हें क्या खूब जनादेश मिला है, जब विपक्ष के कद्दावर नेता लगभग रोज ही ममता बनर्जी को निशाना बनाने में लगे थे। तमाम कोशिशों के बावजूद ममता बनर्जी की सीटों की संख्या घटने के बजाय पिछली बार की तुलना में बढ़ गई है। तमाम विपक्षी नेताओं में अगर आप देखते हैं कि ममता बनर्जी सबसे बड़ी भाजपा विरोधी और प्रधानमंत्री की सबसे मुखर आलोचक रही हैं। ममता बनर्जी ने पूरा चुनाव अभियान नरेंद्र मोदी के खिलाफ चलाया है। अभियान के दौरान ही उन्होंने सभी विपक्षी नेताओं को चिट्ठी लिखी थी कि हमें लोकतंत्र को बचाने के लिए एक नेशनल फ्रंट बनाना चाहिए। आने वाले समय में ममता बनर्जी का यह एक बड़ा एजेंडा होगा कि केंद्र सरकार के विरोध के लिए क्षेत्रीय दलों का एक फ्रंट बनाएं। यह फ्रंट चुनाव के लिए तो नहीं होगा, लेकिन जिस तरह से केंद्र सरकार सारी शक्तियों का केंद्रीकरण कर रही है, राज्यों को उपेक्षा महसूस हो रही है, इन विषयों पर ममता बनर्जी बाकी पार्टियों को लेकर नरेंद्र मोदी के खिलाफ खूब लड़ेंगी और इसमें उन्हें तमिलनाडु के द्रमुक नेता एम के स्टालिन और केरल के नेता पी विजयन का साथ मिलेगा। ये दोनों नेता भी अपने-अपने राज्य में बहुत तगड़े जनादेश से जीतकर आए हैं। ये भी संघवाद पर बहुत मजबूती से विश्वास करने वाले नेता हैं। 


कुल मिलाकर, कोरोना ने जिस तरह से नरेंद्र मोदी की छवि को धक्का पहुंचाया है और जिस तरह से उनकी देश और विदेश की प्रेस में आलोचना हो रही है। ज्यादातर लोग कह रहे हैं कि यह सब पूरा केंद्र सरकार का कुप्रबंधन था, जिसके कारण लोग जान गंवा रहे हैं। अगर सरकार थोड़ा सतर्क रहती और विशेषज्ञों की बात सुन लेती, तो इतना बुरा हाल न होता। अब लड़ाई यहीं से शुरू होगी। आगे आने वाले महीनों में यह बढ़ेगी। विपक्ष का आरोप है कि कोरोना के समय केंद्र सरकार ने वैक्सीन, ऑक्सीजन, लॉकडाउन जैसे फैसलों को पूरी तरह से केंद्रीकृत कर दिया था। पूरा कोरोना प्रबंधन दिल्ली से चल रहा था। आज ज्यादातर विपक्षी दलों द्वारा शासित राज्य यही तो बोल रहे हैं कि हमें वैक्सीन नहीं मिल रही, दवाओं का अभाव है, ऑक्सीजन की कमी है। महाराष्ट्र तो एक ऐसा राज्य है, जो पहले से ही केंद्र सरकार से लड़ रहा है। अगर आप देखें, तो मुझे लगता है, क्षेत्रीय नेताओं का एक समूह बनेगा, जो चुनौती देगा। मुद्दों के आधार पर चुनौती दी जाएगी और आज सबसे बड़ा मुद्दा कोरोना महामारी है। 


दूसरी ओर, कांग्रेस का तो सफाया हो गया है, कोई भी कांग्रेस की तरफ देख नहीं रहा है। कांग्रेस की अपनी राजनीति है, अपनी सोच है, जो क्षेत्रीय पार्टियों से अलग है। क्षेत्रीय दलों के लिए रास्ता अब आसान हो गया है, कांग्रेस उनकी राह में कोई अड़चन नहीं डाल सकती। अन्य मुख्यमंत्री जैसे ओडिशा में नवीन पटनायक, आंध्र प्रदेश में जगन रेड्डी और तेलंगाना में चंद्रशेखर राव अब तक लगभग चुप थे, लेकिन अब कोरोना की वजह से कुछ-कुछ उनकी आवाज भी निकल रही है। ये लोग भी ममता के साथ जुड़ने की कोशिश करेंगे। अब देखना है, उत्तर प्रदेश में क्या होता है। छह महीने में उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव की तैयारी शुरू हो जाएगी। यहां विपक्षी दलों के पास कानून-व्यवस्था एक बड़ा मुद्दा है। दूसरा कोरोना जिस तरह फैल रहा है, लोग जिस तरह जान गंवा रहे हैं, यह बड़ा मुद्दा है। तीसरा मुद्दा है, कृषि कानूनों के खिलाफ चल रहा आंदोलन। उत्तर प्रदेश में केंद्र सरकार के खिलाफ विपक्ष अगर एकजुट हो गया, तो उसकी आवाज बहुत बढ़ जाएगी। मुख्य बात यही होगी कि क्षेत्रीय पार्टियां केंद्रीकरण का विरोध करेंगी। किसी भी तरह की मनमानी के खिलाफ आवाज उठाएंगी। मांग उठेगी कि केंद्र सरकार को संघवाद पर आना ही पड़ेगा। हमारा संविधान संघीय ढांचे की गारंटी देता है। चुनावी नतीजों से वन इंडिया, वन पीपुल, वन लंग्वेज के नारे को चोट लगी है। दक्षिण के राज्यों में भाजपा की कोशिशें लगभग नाकाम रही हैं। इन राज्यों में क्षेत्रीय पहचान, भाषा और संस्कृति का महत्व ज्यादा है। यह समझना पड़ेगा कि वन इंडिया का जो सपना है, एक भाषा, एक रहन-सहन रखना, यह नहीं चलेगा। यही आवाज केरल, तमिलनाडु और बंगाल से मुखरता से उठी है। खासकर बंगाल जहां भाजपा ने बहुत जोर लगा दिया, फिर भी लोगों ने ज्यादा ध्यान नहीं दिया। 


दूसरी बात, ममता बनर्जी के खिलाफ हर जगह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का चेहरा तो काम नहीं कर सकता, वह तो प्रधानमंत्री हैं। तमिलनाडु में भाजपा के पास क्या चेहरा है? केरल में क्या चेहरा है, श्रीधरन, जो 85 साल के हो चुके हैं? चुनावों ने साफ कर दिया है कि विविधता में एकता का सबक भाजपा को सीखना ही पड़ेगा। हमारे यहां अलग-अलग संस्कृति है, सबको एक धारा में डालना बहुत ही मुश्किल है, ऐसा हो नहीं सकता। जहां केरल में वामपंथियों की जीत की बात है, तो यह चुनाव वाम ने नहीं जीता है। जीत का पूरा श्रेय विजयन के प्रशासन को जाता है। वहां जीत विचारधारा की नहीं, कामकाज की हुई है। बाढ़ आई थी, कोरोना फैला है, इसे जिस तरह से विजयन ने संभाला है, उसे लोगों ने सराहा है। केरल में एक और महत्वपूर्ण बात हुई है कि ईसाई वोट वामपंथियों को गया है। यह वोट हमेशा कांग्रेस की ओर जाता था। इस समुदाय ने भी बेहतर प्रशासन देखकर ही विजयन के पक्ष में वोट किया है। उधर, तमिलनाडु में कमल हासन जैसे अभिनेता चुनाव हार गए हैं। लगता है, तमिलनाडु में फिल्म स्टार की राजनीति का जमाना खत्म हो गया, अब नई राजनीति चलेगी। देखने वाली बात होगी कि स्टालिन के समय किस तरह की राजनीति शुरू होती है। स्टालिन पुरानी द्रविड़ मुद्रा में नहीं हैं। तमिलनाडु में जो हुआ है, वह अपेक्षित ही था, दस साल से अन्नाद्रमुक शासन में थी। जयललिता भी मैदान में नहीं थीं, स्टालिन को फायदा हुआ। बहरहाल, लोगों का ज्यादा ध्यान बंगाल पर लगा रहेगा। जहां ममता बनर्जी के सामने हिंसा का मामला होगा और ‘कट मनी’ का भी। दोनों कमियों को किसी तरह से संभालना पड़ेगा। भाजपा अब बड़ी विपक्षी है, तीन से 75 सीट पर आ गई है, लेफ्ट और कांग्रेस साफ है। ममता बनर्जी के सामने चुनौती अब पहले से बड़ी है। उन्हें केंद्र सरकार के खिलाफ मोर्चा बनाने के साथ ही शासन अच्छे से चलाकर दिखाना होगा। 

    (ये लेखिका के अपने विचार हैं)

सौजन्य - हिन्दुस्तान।

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Monday, May 3, 2021

सियासी बिसात पर कोई बड़ा बदलाव नहीं (हिन्दुस्तान)

 प्रभाकर मणि तिवारी, वरिष्ठ पत्रकार 

हाल में जिन पांच राज्यों और केंद्रशासित प्रदेश में चुनाव हुए, उनमें भाजपा की प्राथमिकता सूची में दो राज्य - पश्चिम बंगाल और असम क्रमश: पहले और दूसरे नंबर पर थे। असम में उसके सामने जहां अपनी सरकार बचाने की चुनौती थी, वहीं पड़ोसी पश्चिम बंगाल में वह दस साल से सरकार चला रही तृणमूल कांग्रेस को पराजित कर सत्ता हासिल करने के लक्ष्य और दावे के साथ मैदान में उतरी थी। असम में विपक्षी गठबंधन की ओर से मिलने वाली चुनौतियों की वजह से उसकी सरकार दांव पर थी, तो बंगाल में वह ममता बनर्जी सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती और सत्ता की प्रमुख दावेदार के तौर पर उभरी थी। असम की चुनौती तो पार्टी ने पार कर ली है और बहुमत के साथ अपनी सरकार बचा ली है। ऐसा करते हुए उसने लगातार दूसरी बार सत्ता में आने वाली पहली गैर-कांग्रेसी सरकार होने का रिकॉर्ड भी अपने नाम कर लिया है, लेकिन इस जीत की खुशी भी बंगाल चुनाव में उसकी पराजय का गम कम नहीं कर सकती। यह भी तय है कि बंगाल के चुनावी नतीजों का असर दूरगामी होगा। अब इस जीत के बाद वर्ष 2024 में ममता विपक्ष का चेहरा बन सकती हैं।

भाजपा के पास न जमीनी नेता थे और न ही बहुमत के लिए जरूरी मजबूत संगठन। यही वजह है कि उसे करीब आधी सीटों पर दूसरे दलों से आने वाले नेताओं को मैदान में उतारना पड़ा। नतीजों से साफ है कि वोटरों ने ऐसे ज्यादातर दलबदलुओं को नकार दिया है। टिकट न मिलने से निराश कार्यकर्ताओं ने भी चुनाव अभियान में बेमन से काम किया। अब नतीजा सामने है। ममता की कद-काठी का कोई नेता नहीं होने का नुकसान भी पार्टी को हुआ। भाजपा ने जिस बड़े पैमाने पर धार्मिक ध्रुवीकरण शुरू किया था, उसका खामियाजा भी उसे भुगतना पड़ा है। ममता बनर्जी की हैट्रिक में भाजपा की ऐसी रणनीतिक गलतियों की अहम भूमिका रही। इसके साथ ही, रैलियों में दीदी-ओ-दीदी कहते हुए ममता का मजाक उड़ाने का वोटरों पर प्रतिकूल असर पड़ा लगता है। केंद्र की ओर से चुनाव के मौके पर सीबीआई, ईडी और आयकर जैसी केंद्रीय एजेंसियों के कथित राजनीतिक इस्तेमाल को भी ममता बनर्जी ने असरदार मुद्दा बनाया। अपनी हार के लिए भाजपा अब चुनावी धांधली का बहाना नहीं कर सकती। हालांकि, वर्ष 2016 की तीन सीटों से यहां तक पहुंचना और राज्य की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरने की उपलब्धि भी कम नहीं है। लेकिन जब मंजिल दो सौ के पार हो और लक्ष्य सत्ता का सिंहासन हो, तो यह उपलब्धि कोई मायने नहीं रखती। अब नतीजों के बाद पार्टी में स्थानीय स्तर पर केंद्रीय नेताओं के खिलाफ असंतोष खदबदाने लगा है।

पड़ोसी असम में विपक्षी गठबंधन की ओर से सत्तारूढ़ भाजपा गठबंधन को कड़ी चुनौती मिल रही थी। वहां खासकर पूर्वोत्तर के चाणक्य कहे जाने वाले भाजपा नेता और असम सरकार के वित्त मंत्री हिमंत बिस्वा सरमा की वजह से पार्टी की राह आसान हो गई। यह उनकी रणनीति का ही नतीजा था कि जिस नेशनल रजिस्टर फॉर सिटीजंस (एनआरसी) और नागरिकता कानून (सीएए) का असम में सबसे ज्यादा विरोध हुआ था, वहीं यह दोनों मुद्दे हाशिए पर चले गए।आखिर असम में भाजपा की राह आसान कैसे हुई? दरअसल, राज्य की करीब 45 सीटों पर चाय बागान मजदूरों के वोट निर्णायक हैं। नतीजों से पता चलता है कि चाय मजदूरों का समर्थन भगवा खेमे को ही मिला है। इसके अलावा कांग्रेस के बदरुद्दीन अजमल की पार्टी के साथ हाथ मिलाने की वजह से राज्य में वोटरों का जबरदस्त ध्रुवीकरण देखने को मिला। भाजपा ने जिस तरह पड़ोसी देश से होने वाली घुसपैठ को अपना सबसे प्रमुख मुद्दा बनाया था और सत्ता में आने पर लव जिहाद केखिलाफ कानून बनाने की बात कही थी, उससे हिंदी वोटरों को एकजुट करने में सहायता मिली है। खासकर हिंदू बहुल इलाकों में उसकी जीत से यह बात शीशे की तरह साफ है। दूसरी ओर, कांग्रेस को इस बार चाय बागान मजदूरों का समर्थन मिलने की उम्मीद थी, इसी वजह से राहुल गांधी और प्रियंका गांधी जैसे नेता अक्सर चाय बागानों का दौरा करते देखे गए, लेकिन पर्याप्त सफलता नहीं मिली। अजमल का साथ होने की वजह से विपक्षी गठबंधन को अल्पसंख्यक बहुल इलाकों में कामयाबी जरूर मिली, लेकिन वह पर्याप्त नहीं थी। यही वजह है कि सत्ता में वापसी का कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन का सपना पूरा नहीं हो सका। इस चुनाव में पार्टी को तरुण गोगोई जैसे नेता की कमी भी काफी खली।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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Saturday, May 1, 2021

फिर काम-धंधे पर न लगें ताले (हिन्दुस्तान)

आलोक जोशी, वरिष्ठ पत्रकार

लाख कोशिशों के बावजूद देश के हालात फिर वहीं पहुंच गए हैं, जहां नहीं पहुंचने थे। केंद्र और राज्य सरकारों ने हरचंद कोशिश कर ली। हाईकोर्ट की फटकार की भी परवाह नहीं की। सुप्रीम कोर्ट जाकर अपने लिए खास मंजूरी ले आए कि लॉकडाउन न लगाना पडे़। लेकिन आखिरकार उन्हें भी लॉकडाउन ही आखिरी रास्ता दिख रहा है। महाराष्ट्र ने कड़ाई बरती, तो फायदा भी दिख रहा है। अप्रैल के आखिरी दस दिनों में सिर्फ मुंबई में कोरोना पॉजिटिव मामलों में 40 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। जहां 20 अप्रैल को शहर में 7,192 मामले सामने आए, वहीं 29 अप्रैल तक यह गिनती गिरकर 4,174 पहुंच चुकी थी। 21 अप्रैल से सरकार ने राज्य में लगभग लॉकडाउन जैसे नियम लागू कर दिए थे, उसी का यह नतीजा है और अब ये सारी पाबंदियां 15 मई तक बढ़ाई जा रही हैं। 

21 अप्रैल को महाराष्ट्र सरकार ने यह फैसला किया, इसकी भी वजह थी। 21 मार्च से पहले 39 दिनों में राज्य में कोरोना के रोजाना नए मामलों की गिनती 2,415 से बढ़कर 23,610 तक पहुंच चुकी थी। यही वह वक्त था, जब भारत में एक दिन में तीन लाख से ऊपर नए कोरोना मरीज सामने आने लगे थे। कोरोना के पहले और दूसरे दौर को भी मिला लें, तब भी किसी एक दिन में यह दुनिया के किसी भी देश का सबसे बड़ा आंकड़ा था। ऐसे में, सरकारों का घबराना स्वाभाविक था और लॉकडाउन की याद आना भी। सीएमआईई की ताजा रिपोर्ट बताती है कि पिछले साल भर में 98 लाख लोगों की नौकरी गई है। 2020-21 के दौरान देश में कुल 8.59 करोड़ लोग किसी न किसी तरह की नौकरी में लगे थे। और इस साल मार्च तक यह गिनती घटकर सिर्फ 7.62 करोड़ रह गई है। और अब कोरोना का दूसरा झटका और उसके साथ जगह-जगह लॉकडाउन या लॉकडाउन से मिलते-जुलते नियम-कायदे रोजगार के लिए दोबारा नया खतरा खड़ा कर रहे हैं। 

मुंबई और दिल्ली में लॉकडाउन की चर्चा होने के साथ ही रेलवे और बस स्टेशनों पर फिर भीड़ उमड़ पड़ी और बहुत बड़ी संख्या में फिर गुजरात, महाराष्ट्र, दिल्ली और पंजाब से लोग उत्तर प्रदेश और बिहार के अपने गांवों या कस्बों के लिए निकल आए हैं। शहरों में बीमारी के असर और फैलने पर तो इन पाबंदियों से रोक लगेगी, लेकिन इस चक्कर में लाखों की रोजी-रोटी एक बार फिर दांव पर लग गई है। और साथ में दूसरे खतरे भी खड़े हो रहे हैं। सबसे बड़ा डर फिर वही है, जो पिछले साल बेबुनियाद साबित हुआ। शहरों से जाने वाले लोग अपने साथ बीमारी भी गांवों में पहुंचा देंगे। यह डर इस बार ज्यादा गहरा है, क्योंकि इस बार गांवों में पहले जैसी चौकसी नहीं दिख रही है। बाहर से आने वाले बहुत से लोग बिना क्वारंटीन या आइसोलेशन की कवायद से गुजरे सीधे अपने-अपने घर तक पहुंच गए हैं और काम में भी जुट गए हैं। दूसरी तरफ, चुनाव प्रचार और धार्मिक आयोजनों के फेर में बहुत से गांवों तक कोरोना का प्रकोप पहुंच चुका है। शहरों के मुकाबले गांवों में जांच भी बहुत कम है और इलाज के साधन भी। इसलिए यह पता लगना भी आसान नहीं कि किस गांव में कब कौन कोरोना पॉजिटिव निकलता है, और पता चल भी जाए, तो इलाज मिलना और मुश्किल। संकट इस बात से और गहरा जाता है कि हमारी अर्थव्यवस्था अभी तक पिछले साल के लॉकडाउन के असर से पूरी तरह निकल नहीं पाई है। अब अगर दोबारा वैसे ही हालात बन गए, तो फिर झटका गंभीर होगा। हालांकि, अभी तक तमाम अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं, क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों और ब्रोकरेजेज ने भारत की जीडीपी में बढ़त के अनुमान या तो बरकरार रखे हैं या उनमें सुधार किया है। लेकिन साथ ही उनमें से ज्यादातर चेता चुके थे कि कोरोना की दूसरी लहर का असर इसमें शामिल नहीं है और अगर दोबारा लॉकडाउन की नौबत आई, तो हालात बिगड़ सकते हैं। रेटिंग एजेंसी स्टैंडर्ड ऐंड पूअर्स ने चेतावनी दी है कि कोरोना की दूसरी लहर से फिर कारोबार में अड़चन का खतरा है और इसकी वजह से भारत की आर्थिक तरक्की को गंभीर नुकसान हो सकता है और इसकी वजह से एजेंसी भारत की तरक्की का अपना अनुमान घटाने पर मजबूर हो सकती है। एसऐंडपी ने इस साल भारत की जीडीपी में 11 प्रतिशत बढ़त का अनुमान दिया हुआ है, लेकिन उसका कहना है कि रोजाना तीन लाख से ज्यादा मामले आने से देश की स्वास्थ्य सुविधाओं पर भारी दबाव पड़ रहा है, ऐसा ही चला, तो आर्थिक सुधार मुश्किल में पड़ सकते हैं। यूं ही देश में औद्योगिक उत्पादन की हालत ठीक नहीं है और लंबे दौर के हिसाब से यहां जीडीपी के 10 प्रतिशत तक का नुकसान हो सकता है।  

उधर दिग्गज ब्रोकरेज फर्म यूबीएस  ने जो कहा है, वह शेयर बाजार के लिए खतरे की घंटी हो सकता है। उसका कहना है कि अगर कोरोना का संकट जल्दी नहीं टला, तो विदेशी निवेशक भारत के बाजार से बड़े पैमाने पर पैसा निकाल सकते हैं। पिछले कुछ दिनों में ही एफपीआई यानी विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने करीब दो अरब डॉलर का माल बेचा है। यूबीएस का कहना है कि ऐसे ही हालात रहे, तो जल्दी ही तीन-चार अरब डॉलर की बिकवाली और देखने को मिल सकती है। पिछले साल इन विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार में 39 अरब डॉलर लगाए हैं, जो एक रिकॉर्ड था। बाजार में पिछले साल आई धुआंधार तेजी की एक वजह यह पैसा भी था। अगर यह पैसा निकलता है, तो फिर तेजी का टिके रहना भी मुश्किल होगा। यूबीएस  के एक रिसर्च नोट में कहा गया है कि भारत में कोरोना के मामलों की बढ़ती गिनती से विदेशी निवेशक व्याकुल हो रहे हैं और घबराहट में पैसा निकाल सकते हैं। लेकिन शेयर बाजार से ज्यादा बड़ी फिक्र है कि हमारे शहरों के बाजार खुले रहेंगे या नहीं। अगर वहां ताले लग गए, तो फिर काफी कुछ बिगड़ सकता है और इस वक्त खतरा यही है कि कोरोना को रोकने के दूसरे सारे रास्ते नाकाम होने पर सरकारें फिर एक बार लॉकडाउन का ही सहारा लेती नजर आ रही हैं। अभी तक सभी जानकार इसके खिलाफ राय देते रहे हैं और सरकारें भी पूरी कोशिश में रहीं कि लॉकडाउन न लगाना पड़े। अर्थशास्त्री भी मान रहे हैं कि कोरोना की दूसरी लहर ज्यादा खतरनाक होने के बावजूद अर्थव्यवस्था पर उसका असर शायद काफी कम रह सकता है, क्योंकि लॉकडाउन नहीं लगा है। मगर अब जो नए हालात दिख रहे हैं, उसमें भारतीय अर्थव्यवस्था कब तक और कितनी बची रहेगी, कहना मुश्किल है। 

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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Friday, April 30, 2021

जांच से टीके तक चुनौतियां (हिन्दुस्तान)

जुगल किशोर, वरिष्ठ जन-स्वास्थ्य विशेषज्ञ

जब संक्रमण तेजी से फैल जाए और उसके भी आंतरिक कारण हों, तब जिस भी व्यक्ति को खांसी, जुकाम और बुखार हो, तो बहुत आशंका है कि उसे कोरोना संक्रमण होगा। ऐसे लक्षण वाले सभी लोगों को आरटीपीसीआर जांच कराने की जरूरत नहीं है। इससे हम जांच पर पड़ रहे अनावश्यक भार को कम कर सकते हैं। कम से कम लोग जांच कराएंगे, तो जरूरी व गंभीर लोगों की जांच में तेजी आएगी। अब यह संख्या दिखाना कदापि आवश्यक नहीं है कि हमारे कितने लोग संक्रमित हो गए, अभी इलाज करने की ज्यादा जरूरत है। 

मिसाल के लिए, जब स्वाइन फ्लू आया था, तो उसके खत्म होने का कारण ही यही था कि हमने जांच को बंद कर दिया था, जांच हम उन्हीं की करते थे, जहां जरूरी हो जाता था, तो इससे बीमारी अपने आप कम हुई। स्वाभाविक है, जैसे-जैसे संक्रमण के मामले बढ़ते हैं, वैसे-वैसे लोगों के बीच तनाव भी बढ़ता है। अब यह मानकर चलना चाहिए कि काफी लोग संक्रमित हो गए हैं और अब जो लोग ऐसे लक्षणों के साथ आएंगे, वो कोरोना पीड़ित ही होंगे। लक्षण आते ही घर में ही क्वारंटीन रहते हुए अपना इलाज शुरू कर देना चाहिए। जांच कराने की भागदौड़ी से बचना चाहिए। इस मोर्चे पर भी आईसीएमआर काम कर रहा है कि कोई ऐसी व्यवस्था बनाई जाए, ताकि जहां आवश्यक हो, वहीं अस्पताल का सहारा लिया जाए। इसके मापदंड तय किए जा रहे हैं, एक अल्गोरिदम बनाने की कोशिश हो रही है, जिसे सिंड्रोमिक अप्रोच भी कहते हैं। यह इसलिए जरूरी है, ताकि केवल लक्षण के आधार पर इलाज हो सके। साथ ही, यह जरूरी नहीं कि हम मरीज को भर्ती करने के लिए आरटीपीसीआर का इंतजार करें। रेपिड टेस्ट की रिपोर्ट आधे घंटे से भी कम समय में मिल जाती है। तत्काल मरीज का इलाज शुरू करें और उसी दौरान आरटीपीसीआर भी कर लें। इधर, आईसीएमआर ने आरटीपीसीआर सहित छह जांचों को मंजूरी दी है। अभी रिपोर्ट आने में देरी हो रही है, लेकिन आरटीपीसीआर जांच की जो साइकिल है, वह चलती है, तो तीन से चार घंटे लगते हैं। आप कितनी भी जल्दी करें, लैब पास में हो, तो भी चार-पांच घंटे तो रिपोर्ट आने में लग ही जाते हैं। हमारे देश में बहुत सारे ऐसे जिले हैं, जहां आरटीपीसीआर सुविधा उपलब्ध नहीं है। सैंपल को दूसरे जिलों में भेजा जाता है, तो उसमें और समय लगता है। इस वजह से देर होती है। हर जगह लैब खोलना भी आसान नहीं होता। लैब की गुणवत्ता जरूरी है, उसे स्थापित करने की एक पूरी प्रक्रिया है। लैब सुविधा अगर बिना गुणवत्ता वाली जगह पर होगी, तो गलत रिपोर्ट आएगी। लैब में अनेक तरह के रसायन होते हैं, उनका रखरखाव भी महत्वपूर्ण होता है। कितने तापमान पर रखना है, कहां रखना है, लैब को पूरे मापदंड पर खरा उतरना चाहिए। ऐसा नहीं हो सकता कि लैब आप कहीं भी खोल दें और जांच शुरू हो जाए। अच्छी लैब वही है, जो तय मापदंडों को खरी उतरती हो। 

पिछले वर्ष जांच की जो स्थिति थी, उसमें काफी सुधार आया है, लेकिन अभी की जरूरत के हिसाब से देखें, तो पर्याप्त नहीं है। जांच की सुविधा को रातों-रात खड़ा नहीं किया जा सकता। इसलिए अभी पूरा जोर ज्यादा से ज्यादा लोगों के इलाज पर होना चाहिए। आपदा प्रबंधन का यही श्रेष्ठ तरीका है। जो जांच व इलाज के संसाधन हैं, उन्हें बहुत ढंग से उपयोग में लाने की जरूरत है, ताकि कम से कम संसाधन में ज्यादा से ज्यादा लोगों को राहत मिले। जांच और इलाज के साथ ही, टीकाकरण भी तेज करने की जरूरत है। एक मई से 18 साल से ज्यादा उम्र के लोगों को भी टीका लगने की शुरुआत हो जाएगी। कुछ राज्यों ने टीके की किल्लत पहले ही बता दी है। केंद्र सरकार ने टीका संग्रहण में जो कामयाबी हासिल की थी, उससे थोड़ी मदद मिल पाएगी, लेकिन केंद्र सरकार ने राज्य सरकारों से कहा है कि वे अपने स्तर पर ही मान्यताप्राप्त वैक्सीन जुटाने के प्रयास करें। यह तरीका ठीक है, लेकिन दिक्कत क्रियान्वयन में है। वैक्सीन को लगाने में है। अव्वल, तो जब हम किसी भीड़ भरी जगह पर जाते हैं, तो वहां संक्रमण का खतरा ज्यादा होता है। यह बात हो रही है कि लोग जब टीका लेने अस्पताल जाते हैं और वहां भीड़ रहती है, तो वे खुद को खतरे में डालते हैं। ऐसे में, बहुत जरूरी है कि टीका केंद्रों का हम विकेंद्रीकरण करें। अब टीका केंद्रों को अस्पतालों से अलग करने की भी मांग हो रही है। अभी तक टीकाकरण का कोई ऐसा खतरा सामने नहीं आया है कि टीका लेने के बाद अस्पताल की जरूरत पड़े। टीका केंद्रों को अस्पताल से कुछ दूर रखा जा सकता है। एक बात यह भी ध्यान रखने की है कि अस्पताल में काम करने वाले जो स्वास्थ्यकर्मी हैं, उन्हें टीकाकरण केंद्रों पर बड़े पैमाने पर नहीं भेजा जा सकता। स्वास्थ्यकर्मियों की वैसे ही कमी है, अगर उन्हें अस्पतालों से बाहर तैनात कर दिया जाए, तो अस्पतालों में मरीजों का इलाज मुश्किल हो जाएगा। ऐसे मेडिकल स्टाफ को टीकाकरण में लगाना होगा, जो छोटे या ऐसे केंद्रों पर पदस्थ हैं, जहां मरीजों को भर्ती नहीं किया गया है। अस्पतालों पर दबाव बढ़ाना ठीक नहीं है, उनके दबाव को साझा करने की जरूरत है। बेशक, एक मई से टीका लेने वालों की भीड़ उमड़ सकती है, तो टीका केंद्रों के विकेंद्रीकरण से भीड़ को रोका जा सकता है। 

टीके के अभाव को दूर करने के लिए भी सरकार ने प्रयास तेज किए हैं। विदेश से वैक्सीन का आयात होना है, साथ ही, देश में उत्पादन बढ़ाने की कोशिशें जारी हैं। कच्चा माल मिलते ही स्वदेशी कंपनियां ज्यादा से ज्यादा टीके बनाने की क्षमता रखती हैं। हमें यह देखना होगा कि एक तरह की आबादी में अलग-अलग तरह के टीके का उपयोग उतना अच्छा नहीं होगा। एक तरह का टीका हम ज्यादा से ज्यादा लोगों को लगाएं, तो बेहतर है। राज्यों को टीकों की संख्या को लेकर विचलित नहीं होना चाहिए। टीकों की उपलब्धता के हिसाब से ही अभियान चलाने की जरूरत है। राज्यों को अपने उपलब्ध संसाधनों और स्वास्थ्यकर्मियों की सीमित संख्या को देखते हुए अपनी योजना बनानी पड़ेगी। एक और बात आज महत्व की है। अगर किसी को शक है कि उसे संक्रमण हो चुका है, तो वह तत्काल टीका न ले। डॉक्टर भी यही सलाह दे रहे हैं कि कोरोना संक्रमित हुए लोगों को कम से कम तीन महीने तक टीका नहीं लेना चाहिए और पूरी सावधानी से रहना चाहिए।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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इलाज के मोर्चे पर हम कैसे जीतेंगे (हिन्दुस्तान)

गगनदीप कंग, प्रोफेसर, क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज, वेल्लोर  

भारत में ट्विटर एक हताशा भरी जगह है। बेड, ऑक्सीजन के स्रोत, रेमडेसिविर और प्लाज्मा के लिए अनुरोध से ट्विटर भरा पड़ा है। यहां तक कि वॉलंटियर भी संदेशों का प्रसार कर रहे हैं और मदद के लिए संघर्ष कर रहे हैं। टोसिलिजुमैब और इटोलिजूमैब जैसे कठिन उच्चारण वाले शब्द लोगों की बातचीत और मैसेज में सुनने को मिल रहे हैं और परिवार या दोस्त की देखभाल के लिए आवश्यक चीजें जुटाने में असमर्थ होने की वजह से लोग निराशा और अपराधबोध से ग्रस्त हो रहे हैं। हम एक ऐसी स्वास्थ्य सेवा प्रणाली के साथ संघर्ष कर रहे हैं, जो बेहतर हालात में भी पहुंच और गुणवत्ता के लिहाज से असमानता से भरी है। मौसमी बीमारियों में वृद्धि होती है, तो उसके लिए भी अस्पतालों में सीमित क्षमता है। प्रशिक्षित और योग्य स्टाफ कम हैं, खासकर संक्रामक रोगों और गंभीर रोगियों की देखभाल के संदर्भ में, और स्वास्थ्य सेवा व्यवस्था अस्त-व्यस्त है। किसी भी समय, और खासकर अभी की स्थिति में साक्ष्य-आधारित चिकित्सा, या ‘सही समय पर सही मरीज की सही देखभाल’ जरूरी है।

भारतीय चिकित्सा समुदाय और स्वास्थ्य निति निर्माताओं के रूप में हमने इस महामारी के समय अच्छा काम नहीं किया है। चिकित्सा की भारतीय प्रणालियों में सदियों से अर्जित ज्ञान का भी हमने अनादर किया है। हमने हाइड्रोक्सीक्लोरोक्विन जैसी दवाओं के मामले में विशेषज्ञों की राय को ताक पर रख दिया, जबकि आंकड़ों से यह बात सामने आ रही थी कि इसने काम नहीं किया है। पिछले हफ्ते राष्ट्रीय कोविड-19 टास्क फोर्स के दिशा-निर्देशों में हाइड्रोक्सीक्लोरोक्विन और बुडेसोनाइड के इस्तेमाल को समतुल्य माना गया है और अनुशंसा की गई है कि ये दवाएं ‘काम कर सकती हैं’। बुडेसोनाइड का कम से कम ओपन लेवल स्टोइक परीक्षण ने समर्थन किया है और दिखाया है कि इससे अस्पताल में दाखिल होने की जरूरत कम पड़ती है और ठीक होने में कम समय लगता है। साक्ष्य आधारित चिकित्सा के लिए आजीवन सीखने व चिकित्सा बिरादरी तथा मरीजों की निरंतर शिक्षा की जरूरत होती है। एक नई संक्रामक बीमारी के लिए, जहां हमें इस बात की कम जानकारी है कि उसमें नुकसान कैसे होता है और इसे कैसे संभालना है, वैसी हालत में पुरानी और नई दवाओं तथा चिकित्सा प्रबंधन उपायों का परीक्षण करके साक्ष्य पैदा करने पर ध्यान देना महत्वपूर्ण है।

महामारी के दौरान शुरू में हम चीन से आने वाली जानकारी पर बहुत अधिक निर्भर थे, जहां यह दिखाई दिया कि हमें तुरंत और गहन वेंटिलेटर की आवश्यकता है, और तब एंटी-वायरल तथा अन्य दवाओं के लिए कई परीक्षणों का समर्थन किया गया था। गहन देखभाल विशेषज्ञों के अनुभवों के माध्यम से अब हम जानते हैं कि कई मरीजों को ऑक्सीजन मास्क, हाई-फ्लो नेजल कैन्यल या नॉन-इनवेसिव वेंटिलेशन की मदद से जहां तक संभव हो सके, वेंटिलेटर से दूर रखा जा सकता है।  हालांकि, जब विशिष्ट दवाओं की बात आती है, तो सही मरीज के लिए सही समय पर सही दवा काम करती है और वह दवा साक्ष्यों पर निर्भर होनी चाहिए। और यह भी कि साक्ष्य क्लिनिकल परीक्षणों के माध्यम से निर्मित किए जाएं, न कि  लोगों की राय पर निर्भर हों। यह जानने के लिए कि दवाओं की आवश्यकता कब होती है, यह समझना महत्वपूर्ण है कि रोग कैसे पैदा और विकसित होता है। प्रारंभिक चरण में, बीमारी मुख्य रूप से सार्स-कोव-2 की प्रतिकृति द्वारा संचालित होती है। बाद में, खासकर जब संक्रमण नियंत्रित नहीं हो पाता है और लक्षण गंभीर होने लगते हैं, तब यह बीमारी सार्स-कोव-2 के प्रति अनियंत्रित प्रतिरक्षा और उत्तेजक प्रतिक्रिया से संचालित होती प्रतीत होती है, जिसकी परिणति उत्तकों की क्षति के रूप में होती है। सामान्य रूप से इस समझ के आधार पर, बीमारी के दौरान शुरुआती अवस्था में किसी भी एंटीवायरल उपचार का सबसे जल्दी असर होता, जबकि इम्यूनोसप्रेसिव/एंटी-इंफ्लेमेटरी उपचार की जरूरत कोविड-19 के बाद की अवस्थाओं में पड़ती है।

बीमारी के प्रारंभिक चरण में बुडेसोनाइड (अस्थमा के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला एक स्टेरॉयड) और गंभीर बीमारी वाले अस्पताल में भर्ती मरीजों में डेक्सामेथासोन के इस्तेमाल के परीक्षणों के सकारात्मक आंकड़ों से यह प्रतीत होता है कि रोग को बढ़ने से रोकने में स्टेरॉयड महत्वपूर्ण हैं। जहां तक रेमडेसिविर की बात है, तो गंभीर बीमारी पर कोई प्रभाव नहीं दिखा, लेकिन कुछ परीक्षणों में दिखा कि जो मरीज ऑक्सीजन की जरूरत वाली अवस्था में थे और जिन्हें हाई-फ्लो ऑक्सीजन या नॉन-इनवेसिव वेंटिलेशन की जरूरत नहीं थी, रेमडेसिविर ने अवधि कम करने और मृत्यु को रोकने में कुछ फायदा पहुंचाया। इससे यह रेखांकित होता है कि यह दवा सभी मरीजों के लिए नहीं है, बल्कि उपचार के एक विशेष चरण में एक छोटे से वर्ग के लिए है।

इसी तरह टोसिलिजुमैब के लिए भी (स्टेरॉयड सहित अन्य चिकित्साओं के संयोजन के साथ) साक्ष्य-आधारित अनुशंसाएं मरीजों के एक छोटे-से वर्ग तक सीमित हैं, जिनमें बीमारी तेजी से बढ़ रही हो और जिन्हें या तो हाई-फ्लो ऑक्सीजन की आवश्यकता है या नॉन-इनवेसिव वेंटिलेशन की। प्लाज्मा थेरेपी के लिए, जैसा कि इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च समर्थित प्लासीड ट्रायल में दिखाया गया है, इसका कोई सबूत नहीं है कि दाताओं के किसी भी समूह से लिया गया प्लाज्मा मददगार साबित हो रहा है। और वर्तमान में इसकी अनुशंसा भी नहीं की जा रही है। स्पष्ट जवाब बड़े क्लिनिकल परीक्षणों से मिलते हैं। भारत की क्लिनिकल ट्रायल रजिस्ट्री में हमारे पास 400 से अधिक पंजीकृत अध्ययन हैं, जिनमें से ज्यादातर छोटे अध्ययन हैं, जो भविष्य की प्रैक्टिस के बारे में जानकारी नहीं प्रदान करेंगे। लोग शिद्दत से उन दवाओं को ढूंढ़ रहे हैं, जिनकी जरूरत नहीं है! यह सुनिश्चित करना हमारी नैतिक जिम्मेदारी है कि सभी स्वास्थ्य सेवा प्रदाता उपचार के बारे में बताने के लिए साक्ष्यों का उपयोग करें। पेशेवर संगठन, अनुसंधान समूह, नियामक और नीति निर्माताओं को यह सुनिश्चित करने में बड़ी भूमिका निभानी चाहिए कि उपचार का उपयोग जरूरत के मुताबिक किया जाए, न कि झूठी उम्मीद पैदा करने के लिए।

(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

सौजन्य - हिन्दुस्तान।

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