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Tuesday, May 25, 2021

जैव विविधता के विनाश की कीमत, वैश्विक अर्थतंत्र के साथ-साथ सरकारों की आर्थिक रणनीतियों को भी चौपट कर दिया (अमर उजाला)

अफ्रीका के गाबोन देश में इविंडो नदी के किनारे बसा 150 लोगों का मेबॉट-2 गांव 1996 में दुनिया भर में अचानक चर्चा में आया। इस गांव में अन्य अफ्रीकी बस्तियों की तरह मलेरिया, डेंगू, पीला बुखार और नींद के रोगों का प्रकोप होता था, परंतु गांववासी इन रोगों का अच्छा प्रबंध कर लेते थे। जनवरी के महीने में एक दिन गांव के कुछ लड़के कुत्तों के साथ जंगल में गए। कुत्तों ने एक चिम्पैंजी को मार दिया। गांव वालों ने चिम्पैंजी की खाल उतारी और उसे खा गए। चिम्पैंजी की खाल उतारने, मांस पकाने और उसे खाने वाले 31 लोगों को कुछ ही घंटे बाद तेज बुखार आ गया और उनमें से 21 की मौत हो गई।

बुखार और मौत का कारण था इबोला वायरस, जो मारे गए चिम्पैंजी के साथ गांव में आ गया था। जंगल का एक निरापद विषाणु मानव का काल बनकर बस्ती में आया। यह विषाणु, जो 90 प्रतिशत संक्रमितों को मारता है, अब मानव समाज का हिस्सा बन गया था। मेबॉट-2 गांव की यह घटना एक ट्रेलर थी उस महामारी की, जो नवंबर-दिसंबर, 2019 में चीन के वुहान से प्रारंभ हुई और कुछ ही माह में दुनिया भर के करोड़ों लोगों के फेफड़ों को खा गई। इसने लोगों को उन्हीं के घरों में बंद कर दिया। इसने वैश्विक अर्थतंत्र के साथ-साथ सरकारों की आर्थिक रणनीतियों को भी चौपट कर दिया। प्रारब्ध यहां भी वही था-एक वन्यजीव से मांस बाजार के रास्ते अब मानव प्रजाति पर पलने वाला एक और नवीन विषाणु-कोरोना वायरस।

यह केवल एक-दो दशक पहले ही हमारी सोच में आया था कि उष्णकटिबंधीय वनों और प्राकृतिक परिवेशों में रहने वाले वन्यजीवों के संपर्क में आने से मनुष्यों में वायरस और अन्य कई तरह के रोगाणु फैल जाते हैं। इबोला, एचआईवी, सार्स, बर्ड फ्लू और डेंगू के बाद कोविड-19 के विषाणु का मनुष्य तक पहुंचने का यही मार्ग है। अब यह सर्वविदित है कि ये सब रोग पशु-जनित हैं। पशु-जनित इन संक्रामक रोगों का प्रकोप तेजी से बढ़ रहा है। रैबीज और प्लेग जैसे कुछ रोग सदियों पहले जानवरों से पार होकर मनुष्यों तक पहुंच गए थे। चमगादड़ द्वारा प्रेषित मारबर्ग हालांकि अब भी दुर्लभ है।

कोविड-19 और मिडिल ईस्ट रेस्पिरेटरी सिंड्रोम कोरोना वायरस (मर्स), जो पश्चिम एशिया में ऊंटों से फैला, मनुष्यों के लिए नए रोग हैं, जो विश्व स्तर पर फैल रहे हैं। जानवरों से पार हो मनुष्य तक पहुंचने वाले अन्य रोगों में हैं लासा बुखार, जिसे पहली बार 1969 में नाइजीरिया में पहचाना गया था, मलयेशिया में निपाह और 2002-03 में चीन से 30 देशों में फैलने वाला और सैकड़ों लोगों को मार देने वाला सार्स। जीका और वेस्ट नाइल वायरस जैसी बीमारियां अफ्रीका में उभरीं और उत्परिवर्तित होकर अन्य महाद्वीपों में स्थापित हो गईं। अमेरिकी शोधकर्ताओं के एक दल ने 2008 में 335 रोगों की पहचान की, जो 1960 और 2004 के बीच मानव समाज में उभर कर आए, और जिनमें से कम से कम 60 प्रतिशत जानवरों से आए।

शोधकर्ताओं का कहना है कि ये पशु-जनित (जूनोटिक) रोग पर्यावरण परिवर्तन और मानव व्यवहार से जुड़े हैं। दुर्गम और जैव विविधता से परिपूर्ण क्षेत्रों में सड़कों का जाल, भवन निर्माण, द्रुत गति से बढ़ता शहरीकरण और जनसंख्या विस्फोट के कारण प्राकृतिक वनों का विनाश किया जा रहा है, फलस्वरूप मनुष्य जंगली जानवरों के परिवेश में उनके निकट पहुंच गए हैं। वन्यजीवों से मनुष्यों तक रोगों का संचरण मानव आर्थिक विकास के आधुनिक मॉडल की एक अदृश्य कीमत है। यह कीमत उन समाजों और व्यक्तियों को सर्वाधिक चुकानी पड़ती है, जिनके पास रोगों से बचाव और उनके उपचार के लिए साधन तक नहीं। प्राकृतिक आवास के जंतुओं के रोगाणु से मनुष्य में उत्पन्न रोग के जोखिमों

का परस्पर क्या संबंध है, इसका गहन अध्ययन एमोरी विश्वविद्यालय के पर्यावरण विज्ञान विभाग में सुप्रसिद्ध रोग पारिस्थितिकीविद प्रोफेसर थॉमस गिलेस्पी ने किया है। गिलेस्पी कहते हैं, 'मैं कोरोना वायरस प्रकोप के बारे में बिल्कुल आश्चर्यचकित नहीं हूं।

अधिकांश रोगजनक जीवों की खोज अभी की जानी है। यह (कोरोना वायरस) तो केवल छोटा-सा नमूना है।' बाजार प्राकृतिक जैव विविधता का एक वाणिज्यिक संग्रहालय है, जहां से अनेक प्राणी-जनित (जूनोटिक) रोगों का व्यापार चलता है। दुनिया में द्रुत गति से बढ़ती शहरी आबादी को ताजा मांस चाहिए, जिस कारण ये बाजार फल-फूल रहे हैं। इन बाजारों में चीन सबसे आगे है। जिन बाजारों में जिंदा जानवर, उनके मांस तथा उनके अनेक उत्पाद बेचे जाते हैं, उन्हें गीला बाजार (वेट मार्केट) कहते हैं। चीन के वुहान में ‘गीला बाजार'(वेट मार्केट) में विभिन्न प्रकार के वन्य-जीवों को जिंदा और उनका ताजा मांस बेचा जाता है। वहां भेड़ियों के बच्चे, सैलामैंडर, मगरमच्छ, लोमड़ी, चूहे, गिलहरी, चील, कछुए, बिच्छू और सभी तरह के कीट-पतंगों से लेकर अनेक तरह के समुद्री जीव तक बेचे जाते हैं।

इसी तरह, पश्चिम और मध्य अफ्रीका के शहरी बाजारों में बंदर, चमगादड़, चूहे, और स्तनपाइयों की दर्जनों प्रजातियों की मांस के लिए हत्या की जाती है। जब यह बात सामने आई थी कि कोरोना वायरस वहां के गीले बाजार से फैला है, तो चीन के अधिकारियों ने फरवरी, 2020 में वुहान बाजार में जिंदा जानवरों को बेचने और मछली और समुद्री जीवों को छोड़कर अन्य वन्यजीवों के मांस पर प्रतिबंध लगा दिया था। लेकिन बाद में गीले बाजार में सब पहले जैसा ही होने लगा। अफ्रीका में लेगोस का गीला बाजार बहुत ही कुख्यात है, जहां महामारी का एक और बम कभी भी फट सकता है।

जैव विविधता से शनैः शनैः रीत रही जिस दुनिया को हम अपनी अगली पीढ़ियों के लिए छोड़ेंगे, वह नई-नई घातक बीमारियों की मार झेलने के लिए अभिशप्त होगी। अगर अपनी 'अगली दुनिया' को पूर्णरूपेण स्वस्थ और सकारात्मकता, नई कल्पनाओं एवं प्रफुल्लता से भरी देखना चाहते हैं, तो वह इस पर निर्भर करेगा कि हम अपने ग्रह पर जैव विविधता और प्राकृतिक संतुलन को बनाए रखने में कितना सार्थक प्रयास करते हैं। यदि कोविड-19 महामारी हमारी समकालीन दुनिया को जागरूकता का यह पाठ पढ़ा पाई, तो कोविड के बाद की दुनिया नई उमंगों और संभावनाओं से सराबोर होगी।

-पूर्व प्रोफेसर, जी बी पंत कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय।

सौजन्य - अमर उजाला।

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कोविड से लड़ाई को कमजोर करती अज्ञानता (अमर उजाला)

रामचंद्र गुहा  

इसी महीने आयुष ने विस्तृत सुझाव जारी किया था कि कोविड-19 के संकट के समय प्रतिरोधक क्षमता कैसे बढ़ाई जाए। मंत्रालय ने सुझावों की जो सूची जारी की थी, उसमें सुबह शाम नाक में तिल/नारियल का तेल या घी डालने का सुझाव भी शामिल था। यदि किसी को नाक में तिल या नारियल का तेल डालना पसंद नहीं, तो मंत्रालय ने विकल्प भी सुझाया :  तिल या नारियल का एक चम्मच तेल मुंह में डालें, उसे गटकें नहीं, बल्कि दो-तीन मिनट तक मुंह में डालकर हिलाएं और थूक दें और फिर गरम पानी से कुल्ला करें। खुद को कोविड से बचाने के मंत्रालय द्वारा सुझाए गए अन्य उपायों में च्यवनप्राश खाना, हर्बल चाय पीना, भाप लेना आदि शामिल हैं।



आयुष मंत्रालय की प्रचार सामग्री में बस यह लिखना बाकी रह गया कि उसकी सिफारिशों पर अमल करने वाले किसी भी देशभक्त को कोरोना नहीं होगा। लेकिन इसका आशय स्पष्ट था-यदि आप इन पारंपरिक तरीकों को अपनाते हैं, तो आप में वायरस के संक्रमण की आशंका कम हो जाएगी। सत्तारूढ़ दल के नेता और प्रचारक 21 वीं सदी की इस सबसे घातक बीमारी के पूरी तरह से अप्रमाणित इलाज की सिफारिश करने में संकोच नहीं करते। मेरे अपने राज्य में भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व सांसद विजय संकेश्वर ने ऑक्सीजन के विकल्प के रूप में नींबू का रस सूंघने की सिफारिश की। द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक, 'संकेश्वर ने हाल ही में प्रेस मीट में कहा कि नींबू का रस नाक में डालने से ऑक्सीजन का स्तर 80 फीसदी बढ़ जाता है। उन्होंने कहा कि उन्होंने देखा है कि इस घरेलू इलाज से दो सौ लोग ठीक हो गए, जिनमें उनके रिश्तेदार और मित्र शामिल हैं। इसी रिपोर्ट में बताया गया कि राजनेता की सलाह पर अमल करने के बाद उनके कई समर्थकों की मौत हो गई।



इस बीच, भाजपा शासित एक अन्य राज्य मध्य प्रदेश में संस्कृति मंत्री उषा ठाकुर ने कहा कि हवन से महामारी को प्रभावी तरीके से खत्म किया जा सकता है। द टेलीग्राफ ने मंत्री को यह कहते हुए दर्ज किया, 'हम सभी से यज्ञ करने और आहुति देने और पर्यावरण को शुद्ध करने की अपील करते हैं, क्योंकि महामारी को खत्म करने की यह सदियों पुरानी परंपरा है।'


ऐसा लगता है कि मंत्री के 'परिवार' के सदस्यों ने उनकी सलाह को गंभीरता से लिया। व्यापक रूप से प्रसारित एक वीडियो में देखा गया कि काली टोपी और खाकी शार्ट पहने लोग किस तरह से हर घर में नीम की पत्तियां और लकड़ी जलाकर हवन कर रहे थे। एक और बेतुका दावा, महात्मा गांधी के हत्यारे को सच्चा देशभक्त मानने वाली भोपाल की विवादास्पद सांसद ने किया। उन्होंने कहा कि वह कोविड से इसलिए बची हुई हैं, क्योंकि वह रोज गोमूत्र पीती हैं। और भाजपा द्वारा सबसे लंबे समय से शासित गुजरात से खबर आई कि वहां साधुओं का एक समूह नियमित रूप से गोबर का लेप लगाता है, क्योंकि उसे लगता है कि इससे वे वायरस से बचे रहेंगे। सत्तारूढ़ दल के नेताओं द्वारा सुझाए गए संदिग्ध इलाज में एक दवा कोरोनिल भी शामिल है, जिसे पिछले साल सरकारी संत रामदेव ने दो वरिष्ठ केंद्रीय मंत्रियों की मौजूदगी में जारी किया था, जिनमें से एक मंत्री अभी स्वास्थ्य एवं विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी मंत्री हैं।


आगे बढ़ने से पहले स्पष्ट कर दूं कि मैं चिकित्सा के बहुलतावाद में यकीन करता हूं। मैं यह नहीं मानता कि आधुनिक पश्चिमी चिकित्सा के पास मानव जाति की सभी ज्ञात बीमारियों का इलाज है। मैं अपने व्यक्तिगत अनुभव से जानता हूं कि आयुर्वेद, योग और होम्योपैथी जैसी गैर आधुनिक पद्धतियां अस्थमा, पीठ दर्ज और मौसमी एलर्जी जैसी व्याधियों को कम करने में भूमिका निभा सकती हैं, जिनसे मैं अपने जीवन के विभिन्न कालखंडों में पीड़ित रहा हूं।


कोविड-19 स्पष्ट रूप से 21वीं सदी का वायरस है और इससे वे लोग अनभिज्ञ थे, जिन्होंने आयुर्वेद, योग, यूनानी, सिद्ध और होम्योपैथी जैसी पद्धतियां विकसित की थीं। यह सिर्फ एक साल से थोड़े समय पहले की बीमारी है। इस बात के कोई प्रमाण नहीं हैं कि नीम की पत्तियां जलाने से या गोमूत्र पीने से या पौधों से तैयार गोलियां निगलने से या शरीर में गोबर का लेप करने से या नारियल तेल या घी नाक में डालने से बीमारी को दूर करने में कितनी मदद मिलती है या फिर कोविड-19 के संक्रमण का इलाज करने में ये कितने कारगर होते हैं।


दूसरी ओर, हमारे पास यह दिखाने के लिए पर्याप्त सबूत हैं कि दो निवारक उपाय कोविड-19 को दूर करने में बहुत मदद करते हैं। ये हैं सोशल डिस्टेंसिंग और टीकाकरण। और इन दो मामलों में हमारी गर्वित हिंदू सरकार वृहत राजनीतिक और धार्मिक जमावड़ों की मंजूरी देकर, बल्कि प्रोत्साहित कर बुरी तरह नाकाम हुई है। और न ही उसने वैक्सीन का घरेलू उत्पादन बढ़ाने या भारत में इस्तेमाल के लिए नई वैक्सीन के लाइसेंस देने में उत्सुकता दिखाई है, बावजूद इसके कि पिछले कई महीने से इस पर जोर दिया जा रहा है।


मैं वैज्ञानिकों के परिवार से आता हूं। मैंने अपने वैज्ञानिक पिता और वैज्ञानिक दादा से गालियों के रूप में जो शब्द सुने थे, वे थे, मम्बो-जम्बो (बेकार) और सुपर्स्टिशन (अंधविश्वास)। मेरे पिता और दादा अब नहीं हैं; लेकिन मैं यह सोचकर हैरत में पड़ जाता हूं कि मैं जिन विशिष्ट भारतीय वैज्ञानिकों को जानता हूं, वे सत्तारूढ़ दल के राजनेताओं द्वारा कोविड-19 का मुकाबला करने के लिए नीम-हकीमों को बढ़ावा देने के बारे में क्या सोचते होंगे। इन्हें सिर्फ कुछ केंद्रीय मंत्री या कुछ राज्य स्तर के नेता ही प्रोत्साहित नहीं कर रहे हैं। बल्कि संघ परिवार के सदस्य, जिनमें खुद प्रधानमंत्री शामिल हैं, वे भी साझा कर रहे हैं। गौर कीजिए, पिछले साल मार्च के आखिर में उन्होंने क्या किया था, जब महामारी ने पहली बार अपना असर दिखाना शुरू किया था; उन्होंने हमसे ठीक शाम को पांच बजे पांच मिनट तक बर्तन बजाने के लिए कहा; उन्होंने हमसे रात को नौ बजे ठीक नौ मिनट तक मोमबत्ती या टॉर्च से रोशनी करने के लिए कहा। जिस समय पूरे उत्तर अमेरिका और यूरोप में वायरस फैल रहा था, तब उसे दूर करने में इससे कैसे मदद मिलती, यह संभवतः सिर्फ प्रधानमंत्रियों के ज्योतिषियों और/ या अंकशास्त्रियों को पता रहो।


संघ परिवार के लिए तर्क और विज्ञान की जगह आस्था और कट्टरता ने ले ली है। पहली बार प्रधानमंत्री पद पर दावा करते हुए अपने अभियान में उन्होंने रामदेव के भीतर की आग और उनके संकल्प को लेकर उनकी खुलकर तारीफ की। उन्होंने कहा, मैं खुद को उनके एजेंडा के करीब पाता हूं। लिहाजा राज्य के सबसे पसंदीदा संत के रूप में रामदेव का उभार कोई इत्तफाक नहीं है।


अब जब वायरस उत्तर भारतीय ग्रामीण इलाकों में अंदर तक फैल गया है, कोई भी यह देख सकता है कि मेले को मिले केंद्र सरकार तथा भाजपा की राज्य सरकार के भारी समर्थन और नदियों में उतराते या फिर रेत में दबा दिए गए शवों के बीच कैसा सीधा संबंध है। करीब दो साल पहले अप्रैल, 2019 में मैंने अपने कॉलम में मोदी सरकार की विज्ञान के प्रति तिरस्कार की भावना के बारे में लिखा था कि कैसे उसने हमारे श्रेष्ठ वैज्ञानिक शोध संस्थानों का राजनीतिकरण कर दिया। मैंने लिखा, 'ज्ञान और नवाचार पैदा करने वाले हमारे बेहतरीन संस्थानों को व्यवस्थित रूप से कमजोर करके मोदी सरकार ने देश के सामाजिक और आर्थिक भविष्य को बुरी तरह कमतर किया है। मौजूदा भारतीयों के साथ-साथ अजन्मे भारतीय भी बुद्धि पर इस अनथक और बर्बर युद्ध की कीमत चुकाएंगे।'


यह कोविड-19 के आने से कई महीने पहले की बात है। अब वह हमारे बीच है, मोदी सरकार का बुद्धि पर अनथक युद्ध जारी है, मैंने भविष्य की जो पीड़ादायक तस्वीर देखी थी, वह और अधिक पीड़ादायक हो चुकी है। इस महामारी से लड़ते हुए भारत और भारतीयों को कठिन समय का सामना करना ही होता। केंद्र सरकार और सत्तारूढ़ दल द्वारा तर्क और विज्ञान के प्रति प्रदर्शित की गई अवमानना ने इसे और मुश्किल बना दिया।

सौजन्य - अमर उजाला।

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महामारी के दौर में मीडिया (अमर उजाला)

मरिआना बाबर  

हर सुबह हॉकर स्थानीय दैनिक समाचार पत्रों के साथ द न्यूयॉर्क टाइम्स गेट पर फेंक जाता है। हालांकि मैं इस अमेरिकी अखबार को सबसे अंत में पढ़ती हूं, क्योंकि इसमें कोई ब्रेकिंग न्यूज या हॉट न्यूज नहीं होती है। इस अखबार की शैली ऐसी है कि यह उच्च गुणवत्ता वाले लेखों पर अधिक ध्यान केंद्रित करता है और यह इसकी विशेषता है। ये लेख अच्छी तरह से विश्लेषित एवं शोधपरक होते हैं। हाल में हर दिन इसके पहले पन्ने पर महामारी की मौजूदा घातक लहर से जूझ रहे भारत की कठिन स्थिति के बारे में व्यापक कवरेज रहता था। लेकिन पिछले कुछ दिनों में न केवल न्यूयॉर्क टाइम्स, बल्कि बीबीसी, सीएनएन और जर्मन डायचे वेले भी अब भारत से दूर हो गए हैं। खबरों में अब सबसे ऊपर गाजा पट्टी की स्थिति है और सभी फलस्तीन और इस्राइल पर ध्यान केंद्रित करते हैं।

दक्षिण एशिया के कई देशों में संस्थान सिर्फ महामारी के चलते नहीं, बल्कि दशकों से कई चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। हमारे कई देशों में एक चीज समान है और वह है एक संस्था के रूप में मीडिया। लंबे अरसे से देखा गया है कि शासकों को वे खबरें पसंद नहीं आतीं, जो जनता की नजरों में उनकी छवि अच्छी नहीं बनातीं और इसलिए वे कई विभाग एवं मंत्रालय बनाते हैं, जिनका काम सरकार की सकारात्मक छवि गढ़ने वाली खबरें तैयार करना है। पत्रकारों को धमकाना, जेल में डालना, गायब कर देना और मार डालने की घटना अब आम बात हो गई है। मगर सोशल मीडिया ने कई सरकारों की समस्याओं को बढ़ा दिया है,  क्योंकि यह एक ऐसी जगह है, जिस पर नियंत्रण करना उनके लिए मुश्किल है। कई बार सरकारों द्वारा ट्विटर, फेसबुक और इंस्टाग्राम को पोस्ट और टिप्पणियों को हटाने के लिए कहा गया है।



वर्तमान महामारी के दौरान यह भी देखा जाता है कि भारत सरकार देश के कोने-कोने से हो रही रिपोर्टिंग के प्रति बहुत संवेदनशील है। मैं भारतीय मीडिया को करीब से देख रही हूं और मेरा मानना है कि ऐसा बहादुर मीडिया अक्सर नहीं देखा जाता है, जो अपने स्वास्थ्य और जीवन की परवाह किए बिना देश भर से ताजा खबरें लाने के लिए हर जगह पहुंचता है। स्वाभाविक रूप से, स्थिति अच्छी नहीं है और सरकार एक बहुत ही कठिन चुनौती को नियंत्रित करने में विफल रही है। लेकिन मीडिया द्वारा उठाए गए मुद्दे को सकारात्मक रूप से लिया जाना चाहिए और पीड़ितों को राहत पहुंचाने के लिए जानकारी का उपयोग करना चाहिए। भारतीय सोशल मीडिया के सकारात्मक काम को भी इतिहास में दर्ज किया जाएगा, क्योंकि इसने लोगों को अस्पतालों में बिस्तर और बहुत बीमार लोगों के लिए ऑक्सीजन तक पहुंचाने में मदद के लिए एक त्वरित और सुरक्षित मंच प्रदान किया। पूरी तरह से अनजान लोगों ने एक-दूसरे की मदद की।


हाल ही में मैंने एक खबर पढ़ी, जिसमें इसका जिक्र था कि अमेरिका कोवेक्स कार्यक्रम में योगदान देगा, लेकिन यह प्रतिबद्धता नहीं जताई गई थी कि वह भारत को कितना दान देगा। जब ग्लोबल कोविड रिस्पॉन्स के अमेरिकी संयोजक से इस बारे में पूछा गया, तो उन्होंने कहा कि अमेरिका कोवेक्स कार्यक्रम के माध्यम से टीकों की आठ करोड़ खुराक देगा, लेकिन अंतिम आवंटन अभी तक नहीं किया गया है। हालांकि दुनिया भर के देशों ने भारत को बहुत सारे चिकित्सा उपकरण दिए हैं, पर वर्तमान और भविष्य की सहायता के लिए टीका महत्वपूर्ण है। अमेरिका को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि भारत ने पहले दुनिया भर में उपहार के रूप में टीके भेजे थे। अब जब देश में पर्याप्त टीके नहीं हैं, यह बहस का विषय है कि क्या टीके विदेश भेजने का फैसला सही था। लेकिन निश्चित रूप से भारत की उदारता को नजर अंदाज नहीं किया जाना चाहिए और अमेरिका को भारत के लिए एक बड़ी संख्या निर्धारित करनी चाहिए। 


यह देखना दिलचस्प है कि अस्तित्व की खातिर सिर्फ टीके आयात करने के लिए नए राजनयिक संबंध बनाए जा रहे हैं। चीन उस स्थिति का फायदा उठा रहा है, जहां यूरोपीय संघ के कई देश, जो भारत से या कोवेक्स कार्यक्रम के माध्यम से टीके

प्राप्त करने में विफल रहे, अब बीजिंग का रुख कर रहे हैं।

सौजन्य - अमर उजाला।

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क्रिप्टो करेंसी का बुलबुला? 30 फीसदी की आई गिरावट (अमर उजाला)

अजय बग्गा 

आभासी या क्रिप्टो मुद्रा बिटक्वाइन इन दिनों निवेश की दुनिया में चर्चा में है। पिछले कुछ समय से बिटक्वाइन की कीमत आसमान छू रही थी। लेकिन बुधवार को इसमें करीब 30 फीसदी की गिरावट आई। ऐसे में, यह पूछा जा रहा है कि बिटक्वाइन समेत दूसरी क्रिप्टो करेंसी का बुलबुला क्या फूट गया है? क्रिप्टो करेंसीज को ऑनलाइन खरीदा-बेचा जाता है। चूंकि नोट सरकार छापती है और मुद्रा का मूल्य उठता-गिरता रहता है, इसी को देखते हुए इस डिजिटल मुद्रा की शुरुआत 2009 में की गई, जो किसी सरकार के अधीन नहीं है। बिटक्वाइन की खरीद-फरोख्त की कोई आधिकारिक व्यवस्था भी नहीं है। भारत में लाखों लोग इसमें निवेशक हैं, जिनमें मध्यम आयवर्ग के युवा भी शामिल हैं। देश में कई एक्सचेंज हैं, जिन्हें पैसे देने पर वे बिटक्वाइन का स्वामित्व या इसमें व्यापार की अनुमति देते हैं।

बिटक्वाइन की जब शुरुआत हुई, तो लोगों को इसके बारे में ज्यादा समझ नहीं थी और इसका मूल्य भी कम था। पर पिछले साल जब लॉकडाउन हुआ और सरकारों ने कई तरह के प्रोत्साहन दिए, तब यूरोप, अमेरिका, कोरिया, जापान और चीन में अनेक नए ऑनलाइन निवेशक बाजार में उतरे। चूंकि इन्हें सरकार से आर्थिक मदद मिल रही थी, ऐसे में, लोग इसे उन पैसों से खरीदने लग गए। क्रिप्टो मुद्रा पारदर्शी नहीं है। पता नहीं कि इसके पीछे किसका स्वामित्व है। कई बार ज्यादातर मुद्रा कुछ लोगों द्वारा इकट्ठा कर ली जाती हैं। भारतीय स्टॉक एक्सचेंज में निवेशकों के लिए निवेशक सुरक्षा निधि होती है। यदि निवेशक का पैसा डूब जाता है, तो एक्सचेंज उसकी क्षतिपूर्ति करवाता है, सेबी इसका विनियमन करता है। पर डिजिटल मुद्रा का किसी एक्सचेंज के साथ कोई विनियमन नहीं है। ऐसे में यदि आपका पैसा डूब जाए, तो कोई जवाबदेही नहीं है। 



इसी कारण रिजर्व बैंक ने करीब दो साल पहले एक सर्कुलर जारी कर क्रिप्टो करेंसी कारोबार को प्रतिबंधित कर दिया था। केंद्रीय बैंक ने कहा था कि कोई भी बैंक या गैर-बैंक वित्तीय संस्थान (एनबीएफसी) बिटक्वाइन या क्रिप्टो करेंसी को सहूलियत प्रदान नहीं करेगा। पर तब एक्सचेंज्स ने सर्वोच्च न्यायालय में जाकर स्टे ले लिया। केंद्र सरकार ने इस बार बजट में कहा कि रिजर्व बैंक अपनी डिजिटल मुद्रा निकालेगा, जबकि अन्य तरह की क्रिप्टो करेंसी भारत में प्रतिबंधित रहेंगी। हालांकि वित्तमंत्री ने कहा कि निवेशकों को कुछ समय दिया जाएगा, ताकि वे अपनी क्रिप्टो मुद्राएं निकाल सकें। हाल ही में सरकार ने यह भी कहा कि क्रिप्टो करेंसी पर एक कमेटी संगठित की जाएगी, जो सभी पहलुओं पर विचार करेगी। 


क्रिप्टो करेंसी की चुनौतियां भी कम नहीं हैं। हाल ही में साइबर अपराध से जुड़े गैंग डार्कसाइड ने अमेरिकी ईंधन कंपनी कॉलोनियल पाइपलाइन का सिस्टम हैक कर उसे बंद कर दिया था, जिससे उसकी सेवाएं बाधित हो गईं। अनेक रिपोर्टों में बताया गया कि हैकर्स ने 50 लाख डॉलर की फिरौती वसूल की। इस तरह कई कंपनियों के कंप्यूटर हैक कर उन्होंने करीब नब्बे लाख डॉलर इकट्ठा किए। एफबीआई हैकर्स के पीछे लगा है और उनके वॉलेट से 50 लाख डॉलर पकड़े हैं। हैकर्स, आतंकवादी, ड्रग पैडलर, अंडरवर्ल्ड और मनी लॉन्ड्रिंग करने वालों के  लिए डिजिटल मुद्रा में वसूली करना आसान है। अपने स्मार्टफोन से वे पूरी दुनिया में कहीं भी पैसे ल-दे सकते हैं। कोई भी सरकार इसकी शिनाख्त नहीं कर सकती।


क्रिप्टो करेंसी के साथ एक समस्या है कि इसकी कीमत कैसे तय हो? जैसे सोना है, तो उसके गहने और सिक्के हैं। जबकि क्रिप्टो मुद्रा तो कंप्यूटर में लिखा एक कोड है। यदि उसे आप तोड़ते (बिटक्वाइन माइनिंग) हैं, तो अत्याधिक बिजली की खपत होती है। इसी कारण कुछ वर्ष पहले चीन ने बिटक्वाइन माइनिंग को प्रतिबंधित कर दिया। वर्तमान समस्या बिटक्वाइन ट्रेडिंग की है। लोगों ने इसे जल्दी अमीर बनने की योजना जैसा समझ लिया है, जहां बेहद कम समय में अत्यधिक लाभ मिल जाता है। 


ऐसे में, पहले जिसको लाभ मिल गया, उसका ठीक है, बाद में कोई इसे होल्ड करके बैठ गया, तो लाभ शून्य होगा। कई देशों की सरकारों और राष्ट्रीय बैंक जनता को चेता चुके हैं कि आभासी मुद्रा किसी सरकार के अधिनियम के तहत नहीं है। फिर भी लालचवश लोग इसमें जा रहे हैं और काफी लोग इसका अनुचित लाभ उठा रहे हैं। अभी पिछले सप्ताह सोमवार को इंटरनेट कंप्यूटर के नाम से एक नया क्वाइन ईजाद हुआ। एक दिन दिन वह 45 अरब डॉलर का हो गया। अब किसी को नहीं पता है कि किसने वह क्वाइन ईजाद किया, उसके पीछे क्या है। बस एक फॉर्मूला लिखा कंप्यूटर पर और ट्रेडिंग होने लगी। जिसने ईजाद किया, उसके पैसे बन गए, वह निकालकर भाग जाएगा। और लोग अपनी कमाई डाल रहे हैं, एक सपने के पीछे, वह सपना कब ओझल हो जाए पता नहीं।


बीते फरवरी में बिटक्वाइन लगभग 10 खरब डॉलर के मार्केट कैप का हो गया था। इनके पास कोई कैश फ्लो नहीं है, रिजर्व नहीं है, केवल लालचवश यह चल रहा है। जब भय आ जाएगा, दुकान बंद हो जाएगी, जो अंत में बचेगा, वह सब कुछ गंवाएगा।

पिछले चार महीने में देखें, तो फरवरी में 65 हजार डॉलर के साथ यह शिखर पर पहुंचा, जबकि अब यह करीब 40 हजार डॉलर पर आ गया। इसमें लाखों लोग लालचवश घुसे होंगे, इससे उन्हें चालीस-पचास फीसदी की हानि हुई होगी। अगर बहुत सारे

लोग एक साथ इसे बेचने आ जाते हैं, तो इसका मूल्य खत्म होने लगता है। बुधवार को अमेरिका और भारत में क्रिप्टो एक्सचेंज बंद पड़ गए। एक्सचेंज बोले, बहुत सारे लोग इकट्ठे आ गए। लोगों में भय आ गया कि वे अपने पैसे और क्रिप्टो क्वाइन दोनों एक्सेस नहीं कर पाएंगे।


अनेक प्रतिबंधों और नियमन के बावजूद लोग ये मुद्राएं खरीद बेच-रहे हैं। कुछ बड़ी कंपनियां भी इसमें निवेश कर रही हैं। विगत फरवरी में टेस्ला ने करीब डेढ़ अरब डॉलर की डिजिटल मुद्रा खरीद की। एलन मस्क ने इसके बारे में बहुत बढ़ा-चढ़ा कर बोला। क्रिप्टो करेंसी का कोई विनियमन नहीं है। आपको नहीं पता कि किसके साथ आप डील कर रहे हैं। भारत में आधिकारिक रूप से इसके ट्रेडिंग की अनुमति नहीं है। इस पर टैक्स कैसे लगाया जाए, वह किसी को पता नहीं है। इस बार टैक्स रिटर्न में सरकार पूछ रही है कि यदि आपके पास क्रिप्टो करेंसी है, तो आप इस बारे में बताइए। चीन ने डिजिटल युवान के नाम से आधिकारिक करेंसी निकाली है। यदि भारत से ऐसी ही कोई डिजिटल करेंसी निकलती है, तो यह अच्छा होगा। अभी कोविड की वजह से सरकार क्रिप्टो मुद्रा के लिए अधिनियम नहीं ला पाई है, पर देर-सवेर यह आएगा जरूर।

सौजन्य - अमर उजाला।

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Thursday, May 20, 2021

Corona virus : दूसरी लहर ने बढ़ाई शिक्षा की चुनौती (अमर उजाला)

बद्री नारायण  

बात शुरू करता हूं दुनिया के महानतम कवि ब्रेख्त की एक कविता के संदर्भ से। ब्रेख्त अपनी एक कविता में मशीन की शक्ति पर व्यंग्य करते हुए कहते हैं कि तोप, मशीन शक्तिवान तो है, पर उसे चलाने के लिए आदमी चाहिए। यह बात आज कोरोना की दूसरी लहर के इस विनाशकारी प्रसार में और ज्यादा प्रासांगिक होकर सामने आ रही है। जब कोरोना की पहली लहर आई थी, तब उस चुनौती का सामना करने के लिए भारतीय शिक्षा जगत ने ‘ऑनलाइन’ शिक्षा का विकल्प ढूंढ़ा था। कोरोना की दूसरी लहर में उस विकल्प को भी विकसित करना मुश्किल हो रहा है, क्योंकि ऑनलाइन बैठने, बोलने, उसे संयोजित करने, तकनीकी सहयोग प्रदान करने वाले ही कोरोना से ग्रसित हो महीनों कष्टकर जीवन बिताने को मजबूर हो रहे हैं।



कोरोना की इस महान विपदा में भी शिक्षा मंत्रालय, शिक्षा की संस्थाएं यथा शोध संस्थाएं, विश्वविद्यालय जीवन रेखा बनाए रखने के लिए कार्यरत हैं। ऐसे में शिक्षा मंत्रालय, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी), अनेक विश्वविद्यालय एवं शोध संस्थाएं एवं अनेक ऐसी संस्थाएं नियंत्रित ढंग से ही सही अपनी भूमिका के निर्वाह में लगी हैं। उनके अधिकारी, कर्मचारी कोरोना से संक्रमित हो गिर रहे हैं, फिर उठ रहे हैं, कई काल कवलित भी हो रहे हैं। मंत्री से लेकर निचले कर्मचारी कोरोना से लगातार ग्रसित हो रहे हैं। संस्थाओं को बचाए रखने के लिए प्रतिबद्ध कर्मचारियों को भी नए ‘वैरियर’ के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए। ऐसे में हमें उन्हें सलाम तो करना ही चाहिए।



कोरोना के इस महासंहार ने भारतीय शिक्षा जगत में कई नई चुनौतियां पैदा की है। इसमें पहली चुनौती है- संक्रमण से परिसरों को बचाने के उपाय कैसे किए जाए। विश्वविद्यालयों, आईआईटी, आईआईएम एवं अनेक शोध संस्थान जिनके परिसर हैं, वहां स्वास्थ्य सुविधा, हेल्थ सेंटर, कोविड वार्ड जैसी सुविधाओं को विकसित करना होगा। ये हेल्थ सेंटर भले ही छोटे हों, पर आपातकाल में इनमें अपने कर्मचारियों की जान बचा पाने की क्षमता हो। कई विश्वविद्यालय एवं शिक्षा संस्थान लगातार इस दिशा में सोचने एवं कार्य करने में लगे भी हैं।


यह सुखद है कि भारत के शिक्षा मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक एवं यूजीसी के वर्तमान अध्यक्ष प्रोफेसर डी.पी. सिंह कोरोना काल की इस नई आवश्यकता के बारे में संवेदनशील हैं। संभव है, शिक्षा के अगले बजट में शिक्षण संस्थाओं में संक्रमण प्रतिरोधी क्षमता वाले छोटे ही सही, किंतु प्रभावी स्वास्थ्य केंद्र एवं हॉस्पिटल के लिए प्रावधान हो पाएगा। साथ ही शिक्षा संस्थानों के कर्मचारियों, शिक्षकों एवं छात्रों में संक्रमण से बचाव के उपायों के बारे में जनजागरण अभियान चलाना होगा। हमें शिक्षा संस्थाओं में टीकाकरण की अलग से मुहिम चलानी होगी। इनके लिए टीके की उपलब्धता भी केंद्र एवं राज्य सरकारों को सुनिश्चित करनी ही होगी।


कोरोना की इस दूसरी लहर ने हमें चेताया है कि शिक्षा संस्थाओं के परिसरों में सतत सैनिटाइजेशन, स्वच्छता एवं सफाई बहुत जरूरी है। प्रायः शिक्षा संस्थाओं के परिसरों में सफाई एवं स्वच्छता के प्रति प्रतिबद्धता दिखाई नहीं पड़ती। संक्रमण लक्षणों की जांच की व्यवस्था भी आज शिक्षा संस्थाओं के सामने बड़ी चुनौती की तरह खड़ी है। अभी तो परिसर बंद हैं, छात्रावास खाली

हैं, जब धीरे-धीरे परिसर खुलने शुरू होंगे, तो वहां संक्रमण के प्रसार को रोकना हमारी बड़ी चुनौती होगा। कोरोना की पहली लहर के बाद उच्च शिक्षा संस्थाओं ने क्रमशः अपने को खोलना शुरू ही किया था कि दूसरा लहर बनकर कोरोना फिर से हमारे शैक्षिक जीवन में आ बैठा है।


यह जानना रोचक है कि पिछले ही दिनों यूजीसी ने स्वच्छ एवं हरे-भरे परिसर की संपूर्ण कार्ययोजना ‘सतत’ के नाम से देश के सारे विश्वविद्यालयों के लिए प्रस्तावित की थी। पता नहीं, उस दिशा में किस संस्था ने कितना काम किया है। किंतु अब ऐसी योजनाओं को हम हल्के में न लें। हमें पूरी प्रतिबद्धता के साथ शिक्षा संस्थाओं को शुद्ध हवा, शुद्ध पानी एवं संक्रमण मुक्त परिवेश बनाने पर जोर देना होगा। कहते हैं कि विपदाएं विकल्पों को सीमित एवं संकुचित कर देती हैं। किंतु आदमी की जिजीविषा नई चुनौतियों के संदर्भ में अपने लिए नए विकल्प तलाश ही लेती है।


सौजन्य - अमर उजाला।

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कोरोना संक्रमण: गांव कैसे निपटेंगे महामारी से (अमर उजाला)

पत्रलेखा चटर्जी  

आखिरकार ग्रामीण इलाकों के दूर-दराज के गांवों में, जहां अधिकांश भारतीय रहते हैं, कोरोना वायरस की दूसरी लहर कहर मचा रही है। पिछले सप्ताहांत केंद्र ने देश के ग्रामीण, कस्बाई और आदिवासी क्षेत्रों में कोविड-19 को नियंत्रित करने की रणनीतियों पर चर्चा की। हालांकि गांवों में वायरस के प्रसार की तीव्रता के बारे में हमारे पास सभी राज्यों के अलग-अलग आंकड़े नहीं हैं। पर इसमें कोई शक नहीं है कि अंदरूनी इलाकों में बड़ी संख्या में कोविड के मामले दर्ज हो रहे हैं। सामान्य समय में भी ग्रामीण भारत की अनेक मौतें दर्ज नहीं की जातीं, ऐसे में, यह सुनना आश्चर्यजनक नहीं है कि गांवों में कोविड-19 से होने वाली मौतों का पता लगाने या उन्हें सार्वजनिक करने का काम नहीं किया जा रहा। 

यह सर्वज्ञात है कि ग्रामीण भारत के बड़े क्षेत्रों में स्वास्थ्य संबंधी बुनियादी ढांचा कमजोर है। विश्व बैंक के अनुमान के मुताबिक, 65 फीसदी से ज्यादा आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है, जबकि सार्वजनिक अस्पतालों के कुल बेड का लगभग 65 फीसदी शहरी भारत में है। गांवों में जांच का स्तर भी कम है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने हालांकि ग्रामीण इलाकों में कोविड के प्रबंधन के लिए मानक संचालन प्रक्रियाओं (एसओपी) को अपनी वेबसाइट पर अपलोड किया है, पर यह देखा जाना बाकी है कि ग्रामीण भारत कितनी जल्दी वायरस से निपटने के लिए खुद को तैयार कर सकता है।

केंद्र ने जमीनी कार्यकर्ताओं, विशेष रूप से चिकित्सा अधिकारियों और ब्लॉक स्तर के नोडल अधिकारियों को निगरानी, रोकथाम और त्वरित जांच के लिए रैपिड एंटीजन टेस्ट (आरएटी) के इस्तेमाल के प्रति संवेदनशील होने का आग्रह किया है। राज्यों के वरिष्ठ स्वास्थ्य अधिकारियों को इन जमीनी कार्यकर्ताओं के साथ नियमित समीक्षा बैठकें करने का निर्देश दिया गया है, ताकि बुनियादी स्तर तक मानक संचालन प्रक्रिया का पालन सुनिश्चित हो सके। देर से ही सही, लेकिन ये सब अच्छी खबरें हैं। पर अब भी भरोसा पैदा करना एक प्रमुख मुद्दा है, जिस पर हमें बात करने की जरूरत है। सार्वजनिक संस्थानों के प्रति भरोसा तब पैदा होता है, जब वंचित लोगों को समय पर मदद मिलती है।


हाल के हफ्तों में हमने देखा कि कैसे शहरी लोगों ने ऑक्सीजन सिलेंडर या आईसीयू बेड की सख्त जरूरत के समय ट्विटर जैसे सोशल मीडिया का सहारा लिया। संकट के समय लोगों ने ट्विटर पर एक-दूसरे की मदद कर जो एकजुटता दिखाई, वह दिल को छू लेने वाली है, यह सरकार में विश्वास के क्षरण और महामारी के बीच आपातकालीन सेवाएं देने की इसकी क्षमता को भी दर्शाता है। लोगों को लगता है कि उन्हें पूरी तरह से उनके अपने भरोसे छोड़ दिया गया है और कुछ भी निश्चित नहीं है। ग्रामीण भारत में बहुत कम लोगों के पास स्मार्टफोन है। इसलिए जो लोग दूर-दराज के गांवों में रहते हैं, तत्काल चिकित्सा की जरूरत के समय उनके ट्विटर पर मदद मांगने की संभावना नहीं है। ऐसे में, शहरी लोगों के लिए उनका संकट अदृश्य रह सकता है, पर इसका मतलब यह नहीं है कि यह कम दर्दनाक है। ग्रामीणों को यह विश्वास दिलाने की जरूरत है कि जांच करवाना उनके  अपने भले के लिए है; उन्हें यह विश्वास करने की आवश्यकता है कि टीके काम करते हैं और उनके लिए भी उपलब्ध होंगे। 


विश्वास बहाली के लिए यह सुनना जरूरी है कि स्वास्थ्य कार्यकर्ता खुद क्या कह रहे हैं और उन्हें किस चीज की जरूरत है। आशा कार्यकर्ता गांवों में क्वारंटीन सेंटरों में रह रहे कोविड-19 मरीजों का मार्गदर्शन करती हैं और होम आइसोलेशन में रहने वालों के लिए दवा लाती हैं। पर हमने देखा है कि उनकी मांगों पर हमेशा ध्यान नहीं दिया जाता। हाल के हफ्तों में कई राज्यों में आशा कार्यकर्ताओं ने विरोध जताया है। वे न केवल थोड़े पैसे के लिए काम करती हैं, बल्कि कई बार उनके पास बुनियादी चीजों की भी कमी होती है, जबकि उन्हें रोग के लक्षणों वाले व्यक्तियों की पहचान का काम सौंपा गया है। उत्तर प्रदेश आंगनबाड़ी कर्मचारी एसोसिएशन की राज्य प्रमुख गीतांजलि मौर्य ने हाल ही में मीडिया को बताया कि 'हमारे पास न पल्स ऑक्सीमीटर है, न सैनिटाइजर, न ही थर्मल स्कैनर। हमें इसकी जरूरत उन लोगों के लिए है, जिनके घर हम जा रहे हैं। अगर हम उनका तापमान भी नहीं जांच सकते, तो उनके घर क्यों जाएं?' यही समस्या कई अन्य राज्यों में फ्रंटलाइन वर्कर्स को भी परेशान करती है।


ग्रामीण इलाकों में वायरस का प्रसार रोकना है, तो इन कमियों को दूर करने की जरूरत है। जैसा कि सोसाइटी फॉर एजुकेशन, ऐक्शन ऐंड रिसर्च इन कम्युनिटी हेल्थ के संस्थापक निदेशक अभय बंग ने हाल ही में बताया, 'हालांकि मीडिया मुख्य रूप से बड़े अस्पतालों पर ध्यान केंद्रित करता है, लेकिन असली कहानी गांवों में लिखी जा रही है। पहली लहर को गांवों तक पहुंचने में चार महीने लगे थे, जबकि दूसरी लहर एक महीने में ही गांवों में पहुंच चुकी है। भारत की लगभग 10 प्रतिशत ग्रामीण आबादी लक्षणों से पीड़ित है। हम मौतों की संख्या कम बता रहे हैं। असली समस्या इससे बड़ी है।'


महामारी के एक वर्ष से अधिक समय के दौरान भारत के छह लाख से ज्यादा गांवों में स्वास्थ्य संबंधी बुनियादी ढांचे को किस हद तक उन्नत बनाया गया है, ताकि वायरस के क्रूर हमले से निपटा जा सके? चिकित्सीय ऑक्सीजन, दवाओं, वेंटिलेटर आदि की आवश्यकता का आकलन करने में ग्रामीण समुदाय किस हद तक शामिल हो रहे हैं? और आने वाले हफ्तों में गांवों में जांच और टीकाकरण की गति कैसे बढ़ाई जाएगी? हमारे पास इस संबंध में निर्देश हैं, लेकिन हमें नहीं पता कि यह कहानी जमीन पर कैसे उतरेगी। हमें यह भी समझना होगा कि यह सब ग्रामीण इलाकों में बढ़ती भूख की पृष्ठभूमि में हो रहा है। शहरों से आने 

वाला धन बंद हो गया है। हमें इस पर भी ध्यान देने की जरूरत है कि कई संकट एक साथ आएंगे। 


सरकारी तंत्र में विश्वास बहाली के लिए क्या करना होगा? एक महत्वपूर्ण कदम पिछली गलतियों और देरी के बारे में ज्यादा खुलापन हो सकता है। यह विश्वास बहाली की दिशा में मददगार हो सकता है। गलती दुरुस्त करने और सॉरी बोलने में कभी देर नहीं होती। 


सौजन्य - अमर उजाला।

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फिर एक समुद्री तूफान, कोरोना महामारी के प्रकोप के बीच अब 'ताउते' का कहर (अमर उजाला)

पंकज चतुर्वेदी

 

कोरोना महामारी के प्रकोप के बीच अब ताउते चक्रवाती तूफान ने कहर मचा रखा है। केरल के तटीय इलाके तिरुअनंतपुरम के कई गांवों में कई मकान नष्ट हो गए। कर्नाटक राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के मुताबिक, ‘ताउते’ चक्रवात के कारण पिछले 24 घंटों में राज्य के छह जिलों में भारी वर्षा हुई और कुछ लोगों की जान भी जा चुकी है। इस चक्रवात से राज्य के 73 गांव बुरी तरह प्रभावित हुए हैं।



देश के मौसम विज्ञान विभाग ने कहा कि अगले 12 घंटों के दौरान इसके और तेज होने की आशंका है। चक्रवाती तूफान के उत्तर-उत्तर-पश्चिम की ओर बढ़ने और 17 मई की शाम को गुजरात तट पर पहुंचने और 18 मई की सुबह के आसपास पोरबंदर और महुवा (भावनगर जिला) के बीच गुजरात तट को पार करने की संभावना है। एनडीआरएफ ने राहत एवं बचाव कार्य के लिए अपनी टीमों की संख्या 53 से बढ़ाकर 100 कर दी है। इस चक्रवाती तूफान से केरल, कर्नाटक, गोवा, दमन एवं दीव, गुजरात और महाराष्ट्र के तटीय इलाकों के प्रभावित होने की आशंका है।



संबंधित राज्य सरकारों ने अलर्ट जारी किया है। प्रधानमंत्री ने भी तूफान के मद्देनजर उच्चस्तरीय बैठक की है। ‘ताउते’ बर्मी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ होता है ‘गेको’ प्रजाति की दुर्लभ छिपकली। ध्यान रहे कि यह महज प्राकृतिक आपदा नहीं है, असल में दुनिया के बदलते प्राकृतिक मिजाज ने ऐसे तूफानों की संख्या में इजाफ किया है। इंसान ने प्रकृति के साथ छेड़छाड़ को नियंत्रित नहीं किया, तो चक्रवात के चलते भारत के सागर किनारे वाले शहरों में लोगों का जीना दूभर हो जाएगा। ऐसे बवंडर संपत्ति और इंसान को तात्कालिक नुकसान तो पहुंचाते ही हैं, इनका दीर्घकालिक प्रभाव पर्यावरण पर भी पड़ता है। ऐसे तूफान समूची प्रकृति के संतुलन को बिगाड़ देते हैं। जिन वनों या पेड़ों को संपूर्ण स्वरूप पाने में दशकों लगे, वे पलक झपकते ही नेस्तनाबूद हो जाते हैं।


तेज हवा के कारण तटीय क्षेत्रों में मीठे पानी में खारे पानी और खेती वाली जमीन पर मिट्टी व दलदल बनने से हुई क्षति को पूरा करना मुश्किल होता है। जलवायु परिवर्तन पर 2019 में जारी इंटर गवर्मेंट समूह की विशेष रिपोर्ट ‘ओशन ऐंड क्रायोस्फीयर इन ए चेंजिंग क्लाइमेट’ के अनुसार, सारी दुनिया के महासागर 1970 से ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन से उत्पन्न 90 फीसदी अतिरिक्त गर्मी को अवशोषित कर चुके हैं। इसके कारण महासागर गर्म हो रहे हैं और इसी से चक्रवात का खतरनाक चेहरा बार-बार सामने आ रहा है। जान लें कि समुद्र का 0.1 डिग्री तापमान बढ़ने का अर्थ है चक्रवात को अतिरिक्त ऊर्जा मिलना। धरती के अपने अक्ष पर घूमने से सीधा जुड़ा है चक्रवाती तूफानों का उठना। भूमध्य

रेखा के नजदीकी जिन समुद्रों में पानी का तापमान 26 डिग्री सेल्सियस या अधिक होता है, वहां ऐसे चक्रवातों की आशंका होती है।


भारतीय उपमहाद्वीप में बार-बार और हर बार पहले से घातक तूफान आने का असली कारण इंसान द्वारा किए जा रहे प्रकृति के अंधाधुंध शोषण से उपजी पर्यावरणीय त्रासदी ‘जलवायु परिवर्तन’ भी है। इस साल शुरू में ही अमेरिकी अंतरिक्ष शोध संस्था नासा ने चेता दिया था कि जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रकोप से चक्रवाती तूफान और भयानक होते जाएंगे। अमेरिका में नासा के ‘जेट प्रोपल्शन लेबोरेटरी’ के नेतृत्व में यह अध्ययन किया गया। इसमें औसत समुद्री सतह के तापमान और गंभीर तूफानों के बीच संबंधों को निर्धारित करने के लिए उष्णकटिबंधीय महासागरों के ऊपर वायुमंडलीय इन्फ्रारेड साउंडर उपकरणों द्वारा 15 वर्षों तक एकत्र आकंड़ों के आकलन से यह बात सामने आई।


‘जियोफिजिकल रिसर्च लेटर्स’ (फरवरी 2019) में प्रकाशित अध्ययन में बताया गया है कि समुद्र की सतह के तापमान में वृद्धि के कारण हर एक डिग्री सेल्सियस पर 21 प्रतिशत अधिक तूफान आते हैं। ‘जेपीएल’ के हार्टमुट औमन के मुताबिक, गर्म वातावरण में गंभीर तूफान बढ़ जाते हैं। भारी बारिश के साथ तूफान आमतौर पर साल के सबसे गर्म मौसम में ही आते हैं। लेकिन जिस तरह पिछले साल ठंड के दिनों में भारत में ऐसे तूफान के मामले बढ़े और कुल 124 चक्रवात में से अधिकांश ठंड में ही आए, यह हमारे लिए गंभीर चेतावनी है।


सौजन्य - अमर उजाला।

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बिछड़े सभी बारी-बारी: हमने दुनिया की फार्मेसी होने का दावा किया, लेकिन अपनी जरूरतों का आकलन नहीं कर पाए (अमर उजाला)

सुरेंद्र कुमार

 

करीब एक महीने से सुबह के समय द टाइम्स ऑफ इंडिया का चौथा पृष्ठ पलटते हुए मैं ठिठकता हूं। इस पृष्ठ पर उन लोगों की सूचनाएं होती हैं, जो कोरोना महामारी के कारण असमय ही दुनिया छोड़कर चले गए। कुछ महीने पहले तक ऐसी सूचनाएं चौथाई पेज तक ही सीमित होती थीं। दुर्भाग्य से आज ऐसे लोगों की सूचनाओं और तस्वीरों से पूरा पृष्ठ भरा रहता है, और कई बार ऐसे कुछ लोगों की तस्वीरें अगले पेज पर भी रहती हैं।



लगभग रोज ही इन पृष्ठों में मैं दशकों पुराने अपने दोस्तों या रिश्तेदारों की तस्वीरें देखता हूं, जिससे मेरा हृदय दुख और संताप से भर जाता है तथा अतीत की सुनहरी स्मृतियां मेरे मानस पटल पर तैरती रहती हैं। मैं उनकी हंसी, फुसफुसाहटें, उनका कहा-अनकहा सब कुछ सुन सकता हूं; मैं उनकी मोहक मुस्कान और आंखों में न पूरे हो सके सपनों की अपूर्णता का एहसास कर सकता हूं। उनकी पत्नियों का विलाप और बच्चों की सुबकियां मुझे इस कदर हिला देती हैं कि मुंह से एक शब्द तक नहीं निकलता। रोज जब मैं इन तस्वीरों को देखता हूं, तब मेरे भीतर भी कुछ दरकता है। मेरे अंदर का भी एक हिस्सा उनके साथ चला जाता है। जब मैं अखबार मोड़ता हूं, तब क्षण भर के लिए यह विचार आता है कि मेरे दोस्त और रिश्तेदार भी शायद कल अखबार में मेरी तस्वीर देखें। जीवन के इस चक्र में कब और कहां किसका सफर थम जाता है, यह किसको पता है! हमारे पास न तो रुकने की लाल झंडी है, न चलने की हरी झंडी। रात को सोते हुए गुजरती रेलगाड़ी की आवाज मुझे पाकीजा फिल्म के दृश्य की तरह जगा देती है।



किसी देश के इतिहास में एक महीने का समय बहुत ज्यादा नहीं होता। एक मनुष्य के जीवन में एक महीने की अवधि बहुत मामूली होती है। लेकिन कोरोना की सुनामी द्वारा पूरे देश को बाधित और तहस-नहस कर देने, लाखों जीवन खत्म कर देने, दसियों लाख सपने तोड़ देने और किसी देश की छवि को ध्वस्त कर उसे घुटनों के बल खड़ा कर देने के लिए एक महीने का समय बहुत अधिक होता है। आप कोई भी टीवी चैनल खोलें, अस्पतालों के कॉरिडोर में ऑक्सीजन के लिए तरसते मरीजों, वैक्सीन के लिए लोगों का कतार में खड़े होकर लंबा इंतजार करने और फिर टीके के अभाव में उन्हें मना कर दिए जाने, भीड़ भरे श्मशान में शव के अंतिम संस्कार के लिए परिजनों द्वारा इंतजार करने, गंभीर हालत में लोगों को अस्पताल ले जाने और बेड न होने के कारण उनके दम तोड़ देने के कारुणिक ब्योरे आते हैं।


उच्च न्यायालयों द्वारा सरकारों को पर्याप्त ऑक्सीजन मुहैया करने और लोगों की जान बचाने के निर्देश दिए गए हैं। पवित्र गंगा नदी में और उसके तटों पर अनेक शव पाए गए हैं! एक बार फिर से लॉकडाउन और कर्फ्यू का दौर शुरू हो चुका है। नतीजतन असंख्य प्रवासी मजदूर भूखे-प्यासे, पत्नी-बच्चों के साथ, पीठ पर सामान लादे, सूनी आंखों से अपने गांव लौटने के लिए मजबूर हैं। पूरी तरह असहाय और निराश ये लोग अपने हाथ उठाकर टूटती आवाजों में गाते हैं, दुनिया बनाने वाले, क्या तेरे मन में समाई, काहे को दुनिया बनाई! दूसरी तरफ ऐसे भी लोग हैं, जो अपने ऑफिस की मर्सीडिज/बीएमडब्ल्यू/जगुआर कारों पर चलते हैं, जिनके हुड पर छोटा-सा तिरंगा होता है, जबकि इंडिया हाउस की, जो राजदूतों/उच्चायुक्तों का आधिकारिक आवास होता है, छतों पर विशाल राष्ट्रध्वज फहराता है।


वे भारत की 1.4 अरब आबादी का प्रतिनिधित्व करते हैं और भारत सरकार की तरफ से करोड़ों रुपयों के समझौतों पर दस्तखत करते हैं। ज्यादातर अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डों पर वे कूटनीतिज्ञों के लिए रिजर्व रास्तों से निकलते हैं और अपना सामान ले जाने के लिए भी उन्हें कस्टम्स अधिकारियों की पूछताछ का सामना नहीं करना पड़ता। लेकिन कोरोना महामारी कूटनीतिज्ञों के विशेषाधिकारों को नहीं पहचानती। बेड, ऑक्सीजन और वैक्सीनों की कमी से जूझते दिल्ली के निजी अस्पताल बीमार मरीजों और उनके चिंतित परिजनों से भरे हैं, ऐसे माहौल में न तो किसी के पास सुविधाएं हासिल करने के लिए कूटनीतिक हल्कों में अपनी ऊंची पहुंच के बारे में बताने का अवसर है, न ही समय। हर मरीज संख्या में तब्दील हो चुका है।


कोरोना की सुनामी के बीच ऐसे अनेक बीमार कूटनीतिज्ञों ने बेड का इंतजार करते हुए अस्पतालों की लॉबी में जान दे दी है। ऐसी स्थिति क्यों बनी? क्या हम बुरे दिनों का आना नहीं देख पाए? हमने अपने सुरक्षा प्रबंध कम क्यों कर दिए? जब हमारी विजय हुई ही नहीं थी, तो महामारी पर जीत की घोषणा हमने क्यों कर दी? हमने खुद के विश्वगुरु होने का दावा किया! हमने दावा किया कि हम दुनिया की फार्मेसी हैं! यह दावा किया कि अपना ख्याल रखने के साथ-साथ हमने अनेक देशों की मदद की। क्या हम इसकी गणना नहीं कर सके कि देश भर में हमें कुल कितने बेड की जरूरत है? इसका आकलन करने के लिए क्या रॉकेट साइंस का ज्ञान जरूरी है कि पूरे देश का टीकाकरण करने के लिए कितने टीकों की जरूरत पड़ेगी?


क्या हम नहीं जानते थे कि देश में प्रति 1,000 लोगों पर महज 1.5 डॉक्टर हैं, और यह अनुपात पाकिस्तान और बांग्लादेश से भी कम है? हवा में दाएं-बाएं सवाल तैर रहे हैं, लेकिन उनके ईमानदार जवाब नहीं हैं। हैं तो सिर्फ आरोप-प्रत्यारोप और दूसरों पर ठीकरा फोड़ने की कोशिश। पैंतालीस की उम्र में कोरोना से जान गंवाने पर बूढ़े-अनुभवी लोग उपदेश देते हैं कि ईश्वर का प्रिय होने के कारण ही वह चले गए। तो जो उम्रदराज लोग जिंदा हैं, क्या वे ईश्वर के प्रिय नहीं हैं?


चाहे कुछ भी कहा जाए, लेकिन इस सच्चाई की अनदेखी नहीं की जा सकती कि अगर हम लोगों को जीवित रहने का मौका देते, तो उन्हें असमय ही दुनिया छोड़कर नहीं जाना पड़ता। पर कौन जानता है! मनुष्य सोचता कुछ और है, जबकि होता कुछ और है। लेकिन यह दुख तो है ही कि बिछड़कर जाने वालों में से ज्यादातर को हमें अलविदा कहने का मौका भी नहीं मिला। प्रतीक्षालय से निकलने की कतार में अब अगला कौन है? कागज के फूल फिल्म का गाना मार्मिक है, पर बेहद प्रासंगिक है : देखी जमाने की यारी, बिछड़े सभी बारी-बारी।


सौजन्य - अमर उजाला।

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शंकर अय्यर  

 

मृत्यु, संकट, निराशा और अवसाद से घिरे वातावरण में चारों ओर दुख व्याप्त है। एक बदहवास राज्य ने अपने लोगों को असहाय छोड़ दिया है। सोशल मीडिया और व्यक्तिगत संपर्कों की जगहें आसन्न मौत से बचाने की गुहारों से अटी पड़ी हैं। मनोव्यथा अनजान लोगों को भी दुख की एक असाधारण अंतरंगता में बांध रही है। निराशा मर्मांतक छवियों में लिपटी नजर आ रही है- आगरा में एक ऑटो रिक्शा में पति को जिलाने की पुरजोर कोशिश करती पत्नी, अपनी मृत दादी का शव लेकर कार से श्मशान खोजने की जद्दोजहद करता पोता, नदियों में बहती लाशें, अपनी मां के लिए एक आईसीयू बेड का बंदोबस्त न कर पाने में अक्षम एक बेटी की इच्छा मृत्यु को वैध ठहराने की अपील।




मित्रों और परिवारों को स्मृतियां झकझोर रही हैं, वे आखिरी बातचीत को याद करते हैं और फोन की संपर्क सूची में उन नंबरों पर नजर डालते हैं, जो अब स्क्रीन पर फिर कभी नहीं चमकेंगे। जैसा कि लेखक जॉन डिडिओन ने लिखा, 'जब हम किसी को खोने का शोक मनाते हैं, तब हम खुद के बेहतर या बदतर होने का भी शोक मनाते हैं। जैसे कि हम थे, पर अब नहीं हैं, जैसे कि हम एक दिन बिल्कुल भी नहीं होंगे। निराशा ने उम्मीद को ढक लिया है- वस्तुतः यह दुख का गणराज्य है। चिताओं से उठते सर्पिल धुएं ने देश को घिनौनी असमर्थता में जकड़ लिया है। जितनी जिंदगियां खोई हैं, वे बहुत भारी पड़ेंगी। लोगों को जो बात सबसे ज्यादा परेशान करती है और करेगी, वह है क्रूर और अमानवीय तरीके से हुई क्षति, जिसमें बेईमान राजनीति और व्यवस्था की उदासीनता ने उन्हें बेदम करके छोड़ दिया।



लोगों का गुस्सा राजनीतिक बयानबाजी से बढ़ा है। एक केंद्रीय मंत्री ने कहा, 'लोकतंत्र में हम चुनाव को नहीं रोक सकते।' क्या चुनावी प्रक्रिया मतदाताओं को खतरे में डाल सकती है? निश्चित रूप से, चुनावों को बीच में रोका गया है। 1991 के संसदीय चुनावों को रोक दिया गया था। दरअसल, जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 153 स्पष्ट रूप से कहती है, चुनाव आयोग इस बात के लिए सक्षम होगा कि वह उन कारणों के लिए किसी भी चुनाव को पूरा करने की अवधि को बढ़ा सकता है, जिन्हें वह पर्याप्त समझता है। दुख को देखते हुए सवालों के जवाब मिलने चाहिए- क्यों और किसके चलते बेबसी के ये हालात पैदा हुए।


दुर्भाग्य से ये सवाल तू-तू मैं-मैं की दलील में खो गए हैं और जवाब, दावों और आरोपों के बीच फंस गया है। दावों को सत्यापित नहीं किया जा सकता और आरोपों को खारिज नहीं किया जा सकता। भारत और दुनिया को बताया गया है कि किसी ने भी लहर को आते हुए नहीं देखा है, कि कोई भी महामारी विशेषज्ञ या अध्ययन ने कोरोना की दूसरी लहर की भयावहता का अंदाजा नहीं लगाया। यकीनन, किसी ने भी इसकी गंभीरता व तीव्रता- हर मिनट 250 से अधिक मामले और लगभग तीन मौतों की भविष्यवाणी नहीं की थी।


महत्वपूर्ण सवाल यह है कि किसने और किस अध्ययन ने महामारी पर हमारी जीत की। सूचना दी, खासतौर से स्वास्थ्य मंत्री के इस दावे की कि,'कोरोना का खेल खत्म।' तथ्य यह है कि मामले मध्य फरवरी से ही बढ़ने लगे थे और वास्तव में प्रमुख वैज्ञानिक सलाहकार ने कहा था कि हमने दूसरी लहर का संकेत देखा है, लेकिन इसका पैमाना और इसकी तीव्रता स्पष्ट नहीं है। ऐसी अटकलें और रिपोर्टें भी सामने आई हैं कि कोविड टास्क फोर्स की महीनों से बैठक नहीं हुई और इन्हें किसी ने भी विश्वसनीयता के साथ मना नहीं किया था।


प्रवक्ताओं ने हांफते हुए बताया कि अन्य देशों (अमेरिका और ब्रिटेन) ने प्रति दस लाख मामले और मृत्यु के अनुपात के मामले में बदतर प्रदर्शन किया। यह सच है, लेकिन पैमाना यह होना चाहिए कि एक राष्ट्र ने बुरा प्रदर्शन करने वाले दूसरे राष्ट्र से कितना बेहतर प्रदर्शन किया। क्या दूसरों की शर्मनाक विफलताओं पर हम गर्व कर सकते हैं? कुछ अन्य लोगों ने कहा कि चुनाव महामारी से अलग थे। उम्मीद है कि लहर का उभार उन्हें 'भ्रम' से जगा देगा। तू-तू मैं-मैं के दूसरे छोर पर विपक्ष की ट्रोल ब्रिगेड है-खासकर कांग्रेस, जो मुद्दों को भटकाने की आदत से अपनी अप्रासंगिकता बढ़ा रही है। निश्चित रूप से नीति और वित्तपोषण का केंद्रीकरण हुआ है। क्या यह बहाना बताता है कि जब दिसंबर और जनवरी में मामले घट गए थे, तो क्या करने की जरूरत थी?


वित्त वर्ष 2020–21 के अंत में, राज्य तीन लाख करोड़ रुपये से अधिक की राशि पर कुंडली जमाए बैठे थे। क्या राज्यों ने संसाधनों का उपयोग अपनी क्षमता बढ़ाने के लिए किया था? दूसरी लहर ग्रामीण भारत को प्रभावित कर रही है। सार्वजनिक स्वास्थ्य केंद्रों की स्थिति को ही देखिए। वर्ष 2019 में भारत को 1.89 लाख उप केंद्रों की जरूरत थी, जिसमें से 1.57 लाख उपकेंद्र ही थे। सामान्य रूप से सबसे बड़ा अंतराल उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल और झारखंड जैसे गरीब राज्यों में है। प्रति व्यक्ति सेहत पर खर्च की स्थिति बहुत बुरी है। बिहार में 1,250 रुपये या उत्तर प्रदेश में 1,602 रुपये से मुश्किल से वैक्सीन के दो डोज और शायद आरटी-पीसीआर जांच हो पाए!


केंद्र की उपेक्षा को कोई नजरअंदाज नहीं कर सकता। वैक्सीन खरीद की गड़बड़ी को ही लीजिए। पहली किस्त की मात्रा का क्या आधार था और फिर 28 अप्रैल तक ठहराव की सलाह किसने दी थी? अध्ययनों से साबित है कि कम टीकाकरण वेरिएंट और संक्रमणों के लिए मैदान खुला छोड़ देता है, जिससे स्वास्थ्य के बुनियादी ढांचे पर बोझ पड़ता है। हां, सात दशकों से स्वास्थ्य सेवाओं की उपेक्षा हुई है। लेकिन इससे 2014 के बाद से आवंटन या निष्पादन की कमी ढक नहीं जाती। वित्त वर्ष 2016-17 के बजट में सतत विकास के लिए पंचायतों को धन देने का वादा किया गया था। 2017-18 के बजट में 1.5 लाख उप केंद्रों के रूपांतरण का वादा किया गया था। स्वास्थ्य परिणामों में सुधार के उद्देश्य से 'आकांक्षी जिले कार्यक्रम' शुरू किया गया था। फिर भी अप्रैल 2021 में नंदुरबार में राजेंद्र भरुद का काम सफलता की अकेली कहानी है।


आमतौर पर भारत में जवाबदेही की खोज बयानबाजी में खो जाती है। निजी सफलता या समाधान को व्यक्तिगत बनाने के लिए अवतार संस्कृति का मोहक आकर्षण अक्सर संस्थागत विफलता के रूप में सामने आता है। भारत इस तरह के बुरे यथास्थितिवाद को बर्दाश्त नहीं कर सकता है। वह बेहतर कर सकता है और उसे करना चाहिए!


सौजन्य - अमर उजाला।

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कोरोना: अब तीसरी लहर का खतरा, इससे लड़ने के लिए करने होंगे ये काम (अमर उजाला)

चन्द्रकांत लहारिया 

भारत में कोविड-19 महामारी की दूसरी लहर की अवश्यंभाविता को पहचानने में नाकाम रहने के कारण एक राष्ट्र के रूप में हमने अपनी उंगलियां जला लीं और महामारी के खिलाफ जीत की घोषणा करने में बहुत जल्दी कर दी। ऐसा मानने का कोई कारण नहीं था। इतिहास सबूतों से भरा है कि महामारी इतनी आसानी से खत्म नहीं होती है। 1918-20 में, इन्फ्लूएंजा महामारी की चार लहरें आई थीं, जिनमें से दूसरी लहर का दुनिया भर के लोगों पर सबसे बुरा प्रभाव पड़ा। कोविड-19 महामारी में, फरवरी- मार्च 2021 तक दुनिया भर के लगभग सभी प्रमुख देशों (चीन अपवाद है, जिसे केवल एक लहर का सामना करना पड़ा) को दो या तीन लहरों का सामना करना पड़ा, जहां पहली लहर की तुलना में दूसरी लहर में ज्यादा मामले सामने आए। 



दूसरी लहर के बीच कुछ दिनों पहले भारत सरकार के प्रमुख वैज्ञानिक सलाहकार ने कहा कि भारत में कोविड-19 की तीसरी लहर अवश्यंभावी है। उन्होंने कहा कि यह अनुमान लगाना संभव नहीं है कि तीसरी लहर कब आएगी और कितनी गंभीर होगी। महामारी विज्ञान के सिद्धांतों पर आधारित यह घोषणा सही है। जब तक अतिसंवेदनशील आबादी रहती है, तब तक लहरों का खतरा बना रहता है। 



फरवरी 2021 की शुरुआत में जारी भारत के तीसरे देशव्यापी सीरो-सर्वेक्षण रिपोर्ट में पाया गया था कि केवल 21 फीसदी लोगों में पिछले संक्रमण के प्रमाण मिले, जैसा कि उनके रक्त नमूनों में एंटीबॉडी के माध्यम से पहचाना गया था। अनिवार्य रूप से इसका मतलब था कि 79 फीसदी भारतीय अब भी वायरस के लिए अतिसंवेदनशील हैं, जो अब भी आसपास है। महामारी को रोकने का एकमात्र तरीका है कि हर क्षेत्र में आबादी का एक बड़ा हिस्सा वायरस के खिलाफ प्रतिरक्षा विकसित करे। यह प्रतिरक्षा स्वाभाविक संक्रमण के बाद या टीकाकरण के जरिये प्राप्त की जा सकती है। स्वाभाविक संक्रमण में व्यक्ति के बीमार

होने और मृत्यु का खतरा रहता है। इसलिए टीकाकरण बेहतर तरीका है, क्योंकि यह रोग या मृत्यु के जोखिम के बिना प्रतिरक्षा प्रदान करता है।


ऐसी भी चर्चाएं हैं कि तीसरी लहर में बच्चों के प्रभावित होने की अधिक आशंका है। इस धारणा की पुष्टि करने के लिए कोई वैज्ञानिक अध्ययन नहीं है। यह संभव है कि कुल संख्या के संदर्भ में, बच्चों में संक्रमण की दर में कोई वृद्धि नहीं हो, पर तीसरी लहर में कुल नए संक्रमण के अनुपात में बच्चों की हिस्सेदारी अधिक हो सकती है। अब तक अधिकांश संक्रमण वयस्क और बुजुर्ग आबादी में हुए हैं। यह वही आयु वर्ग है, जिसका टीकाकरण हो रहा है। इसलिए वयस्कों में अतिसंवेदनशील आबादी में गिरावट की संभावना है, जबकि, 18 से कम आयु वर्ग की आबादी बिना प्रतिरक्षा के रहेगी और इस तरह अतिसंवेदनशील होगी।


किसी भी मामले में तीसरी लहर के प्रभाव को कम करना ही एकमात्र तरीका है। इसके लिए कुछ कदम उठाना जरूरी है। सबसे पहले, केंद्र और राज्य सरकारों को तीसरी लहर की प्रतिक्रिया पर विशेष ध्यान देने के साथ महामारी संबंधी विस्तृत तैयारी और प्रतिक्रिया योजना तैयार करनी चाहिए और एक वर्ष या महामारी समाप्त होने तक बाद की सभी लहरें को ध्यान में रखते हुए मध्यम अवधि की योजना तैयार करनी चाहिए। ऐसी योजना को वित्तीय आवंटन और समय-समय पर निगरानी संकेतकों द्वारा समर्थित होना चाहिए। दूसरा, भारत के हर राज्य और जिले में स्वास्थ्य प्रणालियों और सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने और बढ़ावा देने के लिए एक अलग रोडमैप बनाना चाहिए। महामारी की शुरुआत के बाद से स्वास्थ्य प्रणाली को मजबूत करने के सभी वादों पर फिर से कार्रवाई शुरू करने की आवश्यकता है। तीसरा, ऑक्सीजन बेड तैयार करने के लिए देश भर में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (पीएचसी) को सक्रिय करना चाहिए। 


प्रत्येक पीएचसी में छह बेड हैं और भारत भर में 30,000 पीएचसी हैं और इन्हें सक्रिय करने का मतलब होगा 1,80,000 ऑक्सीजन बेड। चौथा, सुनिश्चित आपूर्ति के जरिये टीकाकरण का तेजी से विस्तार किया जाना चाहिए, ताकि जहां तक संभव हो, योग्य व्यक्ति तक पहुंच सकें। भारत में बच्चों के लिए कोविड टीकों का क्लिनिकल ट्राइल हो रहा है। एक बार निष्कर्ष उपलब्ध होने के बाद बच्चों के लिए टीकाकरण खोला जाना चाहिए। विदेशों में कुछ टीके हैं, जो बच्चों को लगाए जाने के लिए मंजूरी की उन्नत अवस्था में हैं, जब वे टीके भारत में उपलब्ध होते हैं, तो उन्हें बच्चों के टीकाकरण के लिए प्राथमिकता दी जा सकती है।


पांचवां, भारत को कोविड-19 डेटा रिकॉर्डिंग और रिपोर्टिंग में सुधार करने की आवश्यकता है और बीमारी के पैटर्न को समझने तथा किसी उभरते स्ट्रेन को पहचानने के लिए जीनोमिक सिक्वेंसिंग को तेजी से बढ़ाना चाहिए। संक्रमण को नियंत्रित करने के लिए समय पर उचित रणनीति तैयार करने की दृष्टि से ये दोनों जरूरी हैं। छठा, महामारी की प्रतिक्रिया वैज्ञानिक प्रमाण और विशेषज्ञों की तकनीकी सलाह द्वारा निर्देशित होना चाहिए। राजनेताओं और नीति निर्माताओं को तकनीकी विशेषज्ञों पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है। उसमें जन स्वास्थ्य, डिजीज मॉडलिंग, अर्थशास्त्री, समाज विज्ञानी जैसे कई स्वतंत्र विशेषज्ञों को जोड़ना सार्थक होगा। आखिरकार, महामारी का केवल स्वास्थ्य पर ही नहीं, बल्कि सामाजिक एवं आर्थिक प्रभाव भी होता है। 


अंत में हर स्तर (केंद्र, राज्य, जिला) पर महामारी में पिछले 15 महीनों की गलतियों और अच्छाइयों से सबक सीखने की जरूरत है। आगे संक्रमण को नियंत्रित करने के लिए उन सबका उपयोग किया जाना चाहिए। एक बात स्पष्ट है कि हम वायरस के खिलाफ लड़ेंगे और इस महामारी से बाहर निकलेंगे। मौजूदा और किसी भी भावी महामारी से लड़ने के लिए सबसे बेहतर और दीर्घकालीन समाधान एक मजबूत स्वास्थ्य प्रणाली है, जो प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा एवं  सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करते हैं और सरकार द्वारा वित्त पोषित हैं। यह सबसे महत्वपूर्ण सबक है, जिसे भारत के नीति निर्माताओं को याद रखना चाहिए।


बुद्धिमान लोगों का कहना है कि समय पर समस्या को पहचान लेना उसका आधा हल निकाल लेना है। महामारी के खिलाफ तैयारी रातोंरात नहीं हो सकती। इसलिए, तीसरी लहर की अवश्यंभाविता की इस मान्यता का उपयोग सभी स्तरों पर सरकारों  द्वारा किया जाना चाहिए, ताकि वे प्रभाव को कम करने की तैयारी शुरू कर सकें। 


सौजन्य - अमर उजाला।

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चुनाव आयोग : गर्व और शर्म, जानिए क्यों ऐसा कह रहे हैं रामचंद्र गुहा (अमर उजाला)

रामचंद्र गुहा  

चुनाव के दिन टेलीविजन देखना बुजुर्ग नागरिकों के लिए घबराहट बढ़ाने वाला होता हैं, क्योंकि चारों ओर तीखी आवाजों का शोर सुनाई देता है और स्क्रीन पर तेजी से आंकड़े और तस्वीरें बदलती रहती हैं। पिछले कुछ सालों से मैं मतगणना के दिन खुद को अद्यतन रखने के लिए ट्विटर का सहारा लेता हूं।



रविवार की सुबह जिस पहले ट्वीट पर मेरी नजर पड़ी, वह मतों की गिनती या बढ़त या उम्मीदवारों या पार्टी के बारे में नहीं, बल्कि उस संस्था के बारे में था, जिससे उम्मीद की जाती है कि वह निष्पक्ष और सांविधानिक तरीके से चुनावों की निगरानी करेगी। लेखक सिदिन वदुक्त ने यह ट्वीट किया था, जो अपने चुटीले, लेकिन द्वेषरहित ट्वीट के लिए जाने जाते हैं। वदुक्त ने एक खबर पोस्ट की थी : ब्रेकिंग न्यूज : मद्रास हाई कोर्ट की 'हत्या का मामला दर्ज करें' वाली टिप्पणी के खिलाफ चुनाव आयोग सुप्रीम कोर्ट गया।' साथ ही उन्होंने अपनी तरफ से यह भी जोड़ दिया : 'सुप्रीम कोर्ट को इस मामले में 15 सालों में पैंतीस चरणों में सुनवाई करनी चाहिए।'



निस्संदेह इशारा पश्चिम बंगाल में आठ चरणों में चुनाव कराने के चुनाव आयोग के फैसले की ओर था। गूगल से मुझे पता चला कि क्षेत्रफल के लिहाज से 79,000 वर्ग किमी में फैला पश्चिम बंगाल 1,30,000 वर्ग किमी में फैले तमिलनाडु से छोटा है। हालांकि पश्चिम बंगाल की 10 करोड़ की आबादी की तुलना में तमिलनाडु की आबादी 7.9 करोड़ है। और तमिलनाडु की तुलना में उसका कहीं अधिक अशांत राजनीतिक इतिहास है, जिसमें प्रतिद्वंद्वी दलों के बीच कहीं अधिक हिंसा हुई है। इस आखिरी कारण से वहां दो से तीन चरणों में चुनाव हो सकते थे, लेकिन वहां आठ चरणों में चुनाव कराए गए।


चुनाव आयोग ने पश्चिम बंगाल में हद से लंबी कवायद करने का क्यों फैसला किया? पक्के तौर पर हम कभी नहीं जान पाएंगे। मोदी सरकार ने सूचना का अधिकार कानून को प्रभावी तरीके से नष्ट कर दिया है और संभव है कि यह फैसला मौखिक बातचीत के आधार पर लिया गया हो। यह भी सर्वविदित है कि भाजपा पश्चिम बंगाल में सत्ता में आने को लेकर बेताब थी। 2014 के बाद से अमित शाह ने राज्य की अनगिनत यात्राएं की हैं। अपनी इस पहुंच में उन्होंने 'भद्रलोक' के साथ ही 'छोटोलोक', दोनों की ही चिंता बढ़ाई। उन्होंने टैगोर की सराहना की (हालांकि उन्होंने कवि का जन्मस्थान गलत बताया था), और उन्होंने विद्यासागर की सराहना की (जबकि कथित तौर पर उनकी पार्टी के लोगों ने इस सुधारक की मूर्ति तोड़ दी थी)। उन्होंने एक दलित के घर पर भोजन कर तस्वीर खिंचवाई और आदिवासी नायक बिरसा मुंडा की प्रतिमा के सामने सिर झुकाया  (पता चला कि यह किसी और की प्रतिमा है)।


2019 में गृह मंत्री बनने के बाद शाह ने केंद्र सरकार की नीतियों को पश्चिम बंगाल में अपनी पार्टी की जीत की ओर मोड़ दिया, जिसमें सबसे कुख्यात था नागरिकता संशोधन विधेयक, जिसे स्पष्ट तौर पर कभी पूर्वी पाकिस्तान रहे बांग्लादेश से आने वाले हिंदू शरणार्थियों को संदेश देने के लिए लक्षित किया गया। शाह की तरह ही मोदी भी इस विधानसभा चुनाव में अपनी पार्टी की जीत को लेकर बेताब थे। यहां तक कि उन्होंने बांग्लादेश की आधिकारिक यात्रा के दौरान परंपरा और प्रोटोकॉल का उल्लंघन कर प्रचार किया। और हम साफ तौर पर अनुमान लगा सकते हैं कि उनकी बढ़ती हुई दाढ़ी द्रविड़ सुधारक पेरियार या मलयाली सुधारक श्री नारायण गुरु का अनुकरण नहीं थी, जिन्हें गुरुदेव की तरह शेविंग करना पसंद नहीं था।


टीएमसी के चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने चुनाव आयोग को भाजपा का 'विस्तारित अंग' बताकर कहा, 'धर्म के इस्तेमाल से लेकर चुनाव कार्यक्रम निर्धारित करने और नियमों को मोड़ने तक चुनाव आयोग ने भाजपा को मदद पहुंचाने के लिए हर संभव कदम उठाया।' किशोर की आलोचना पर चुनाव आयोग की प्रतिक्रिया अभी नहीं आई है। पश्चिम बंगाल में संक्रमण के मामले और मौतों की संख्या बढ़ रही है, तब वायरस के मुख्य सहयोगी के रूप में चुनाव आयोग की भूमिका स्पष्ट रूप से सामने है।


पश्चिम बंगाल में टीएमसी को मिली जीत ने क्या ममता बनर्जी में प्रधानमंत्री पद की महत्वाकांक्षा जगा दी है? क्या केरल में लेफ्ट फ्रंट की जीत सुशासन का पारितोषिक है? भारी प्रयास और धन खर्च करने के बावजूद पश्चिम बंगाल में चुनाव जीतने में नाकाम भाजपा को असम में सत्ता बरकरार रहने पर संतोष होगा? क्या असम और केरल में कांग्रेस के नाकाम रहने और पश्चिम बंगाल में उसका पूरी तरह से सफाया होने के बाद गांधी परिवार किसी कहीं अधिक प्रभावी नेता के लिए रास्ता बनाएगा? इन सवालों पर चर्चा करने के साथ ही यह आलेख एक तार्किक रूप से अधिक महत्वपूर्ण सवाल उठा रहा है, क्या चुनाव आयोग की विश्वसनीयता कभी आज जैसे न्यूनतम स्तर पर थी?


जैसा कि मैंने अपनी किताब इंडिया आफ्टर गांधी में चर्चा की है कि हमारे देश का सौभाग्य है कि हमें पहले चुनाव आयुक्त के रूप में एक असाधारण शख्स मिला था। वह थे, सुकुमार सेन, जिन्होंने व्यापक रूप से स्वतंत्र और निष्पक्ष मतदान सुनिश्चित करते हुए और मैदान में उतरे उम्मीदवारों और पार्टियों के प्रति निष्पक्षता रखते हुए पहले और दूसरे आम चुनाव का सफल आयोजन किया था। सुकुमार सेन और पश्चिम बंगाल में हाल ही में चुनाव संपन्न करवाने वाले सुनील अरोड़ा के बीच अब तक 21 मुख्य चुनाव आयुक्त हुए हैं। इनमें से कुछ सक्षम, कुछ साधारण और कुछ असाधारण थे। अंतिम श्रेणी में शामिल थे, टी स्वामीनाथन, जिन्होंने 1977 में चुनाव कराया था, जब आपातकाल हटा नहीं था; टी एन शेषन जिन्होंने, भ्रष्टाचार और बूथ लूटने जैसी घटनाओं से घिरी चुनाव व्यवस्था की सफाई की थी; और हाल की स्मृति में शामिल एन गोपालकृष्णन, जे एम लिंगदोह और एस वाई कुरैशी।


संविधान चुनाव आयोग को राजनीतिक हस्तक्षेप करने से रोकता है। हालांकि चुनाव आयोग किस हद तक अपनी स्वायत्तता बचाए रखता है और राजनीतिक व्यवस्था के दबाव का प्रतिरोध करता है, यह बहुत कुछ व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदारी संभाल रहे व्यक्ति पर निर्भर करता है। सेन, स्वामीनाथन, शेषन, गोपालकृष्णन, लिंगदोह और कुरैशी ने आयोग को पूरी तरह से स्वतंत्र बनाए रखा। उल्लेखनीय है कि उनमें से किसी ने सेवानिवृत्ति के बाद सरकार से कोई आकर्षक पद स्वीकार नहीं किया। उनका यह खरापन एम एस गिल के आचरण के एकदम उलट था, जो सेवानिवृत्ति के बाद कांग्रेस की अगुआई वाली सरकार में मंत्री तक बने।


अतीत में कुछ मुख्य चुनाव आयुक्त कभी-कभी मंत्री या प्रधानमंत्री के दबाव के आगे झुक गए। लेकिन 2014 के बाद जैसा हुआ वैसा कभी नहीं। पश्चिम बंगाल के चुनावों से पहले ऐसी मिलीभगत पिछले आम चुनाव में भी दिखाई दी, जब चुनाव आयोग ने पूरे भारत में सत्तारूढ़ दल के उम्मीदवारों द्वारा फैलाए झूठ और सांप्रदायिक जहर को नहीं रोका। यहां तक कि उसने वोट की चाहत में 'तीर्थयात्री' के भेष में प्रधानमंत्री की केदारनाथ यात्रा तक को नहीं रोका। और संदिग्ध चुनावी बांड योजना पर भी चुप्पी साधे रखी।


अगले आम चुनाव को अब तीन साल रह गए हैं। जैसा कि हम चर्चा कर रहे हैं, ममता बनर्जी के मन में क्या है, क्या कांग्रेस कभी खुद को पुनर्जीवित करेगी और क्या नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री के तीसरे कार्यकाल के लिए विजयी होंगे, हमें सांस्थानिक सवालों को नहीं भूलना चाहिए जो कि पार्टियों और राजनेताओं से परे हैं। भारतीय लोकतंत्र का भविष्य अब संभवतः इस पर निर्भर है कि चुनाव आयोग स्वतंत्रता और सक्षमता से जुड़ी प्रतिष्ठा को कैसे हासिल करता है, जैसा कि कभी थी।

सौजन्य - अमर उजाला।

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Monday, May 17, 2021

गांवों में तेजी से फैल रहा कोरोना, लक्षण आधारित हो इलाज (अमर उजाला)

उमेश चतुर्वेदी  

अब स्वास्थ्य मंत्रालय ने भी मान लिया है कि गांवों में तेजी से कोरोना फैल रहा है। मंत्रालय के नौ मई तक के आंकड़ों के मुताबिक, उत्तर प्रदेश में रोजाना गांवों से 27,161, उत्तराखंड में 4,445, हिमाचल में 3,847 और जम्मू-कश्मीर में 4,778 कोरोना के मरीज आ रहे हैं। कुछ ऐसी ही स्थिति राजस्थान, बिहार, तमिलनाडु, ओडिशा, छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक आदि की भी है। भारतीय गांवों की स्वास्थ्य व्यवस्था का जो हाल है, वह किसी से छिपा नहीं है। ऐसे में सरकारों और समाज के सामने चुनौती बढ़ गई है कि देश की साठ फीसद आबादी को किस तरह स्वस्थ रखा जा सके और वहां मौतों की दरें नियंत्रित की जा सकें।



हाल ही में उत्तर प्रदेश के गाजीपुर और बलिया के साथ ही बिहार के बक्सर से गंगा में भारी पैमाने पर बहती लाशों के हृदयद्रावक समाचार आए थे। साफ है कि इनमें से ज्यादातर शव उन लोगों के थे, जिन्हें महामारी ने निगल लिया। बुखार और सर्दी-खांसी को वे सामान्य मानते रहे और उनकी दुनिया ही खत्म हो गई। आजादी के सत्तर सालों में अब तक गांवों की स्वास्थ्य सेवा स्थानीय स्तर पर प्रैक्टिस करने वाले रजिस्टर्ड मेडिकल प्रैक्टिशनर, अधपढ़े बंगाली डॉक्टर या किसी डॉक्टर के यहां दो-चार साल कंपाउंडरी करने के बाद खुद की दुकान लगाकर बैठे डॉक्टरों के जिम्मे है। गांव वालों की जान बचाने वाले इन डॉक्टरों को मीडिया ने 'झोला-छाप' नाम दे रखा है। इनके खिलाफ आए दिन कार्रवाई भी की जाती है। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन भी इनके खिलाफ अभियान चलाता है। जिसे वे मीडिया कर्मी भी लपक लेते हैं, जो खुद गांवों से आए हैं और उन्हें पता है कि अगर ये कथित डॉक्टर न रहें, तो गांव वालों को सामान्य इलाज तक नहीं मिल सकता। 



सवाल यह है कि अब तक इंडियन मेडिकल एसोसिएशन ने गांव वालों के इलाज के लिए क्या डॉक्टरों के लिए ऐसी कोई आचार संहिता बनाई है? हकीकत तो यह है कि ब्लॉक या क्षेत्रीय स्तर पर जो अस्पताल सरकारों ने बनवाए भी हैं, उनमें तैनात डॉक्टर अक्सर गायब रहते हैं। वे जिला मुख्यालयों पर ही रहना पसंद करते हैं। ऐसे में अंदाज ही लगाया जा सकता है कि गांवों की स्थिति कैसी होने जा रही है? गांवों से आ रहे समाचारों के मुताबिक, अब भी वहां जांच का मुकम्मल तो छोड़िये, सामान्य इंतजाम नहीं है। लोगों को बुनियादी इलाज के लिए स्थानीय दवा दुकानों पर निर्भर रहना पड़ रहा है। लेकिन दवा कारोबार में जिस तरह की धांधली है, उसकी वजह से ज्यादातर दुकानों पर सही दवाएं उपलब्ध नहीं हैं या अगर हैं भी तो मनमानी कीमतों पर हैं।


ऐसे में सवाल यह है कि उत्तर प्रदेश, बिहार, उत्तराखंड जैसे पिछड़े राज्यों के गांव वाले कहां जाएं। अव्वल तो होना यह चाहिए कि लक्षण आधारित इलाज के लिए जेनरिक दवाओं की किट सरकारें घर-घर बंटवाएं। सरकारों को स्थानीय स्तर पर लाउड स्पीकर आदि के जरिये लक्षणों की जानकारी देने का भी इंतजाम करना चाहिए, ताकि लोग जान सकें कि जिस सर्दी-खांसी और बुखार को वे सामान्य समझ रहे हैं, वे कितने खतरनाक हैं। नीति आयोग के स्वास्थ्य मामलों की समिति कह भी रही है कि जांच रिपोर्ट का इंतजार करने के बजाय लोगों के इलाज पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। कोरोना के दौर में ऑक्सीजन की कमी आदि को लेकर देश के तमाम हाई कोर्ट में रोजाना सुनवाई हो रही है। सुप्रीम कोर्ट भी ऐसे मामलों को देख रहा है। लेकिन यह हैरत की बात है कि पूरी सुनवाई करीब 30 करोड़ उन नागरिकों की सुविधाओं को लेकर हो रही है, जो शहरों में रहते हैं। इस पूरी प्रक्रिया में गांव कहीं लापता है।


सवाल यह उठ सकता है कि आखिर इन कामों को अंजाम कौन देगा? निश्चित तौर पर सरकारी मशीनरी की यह जिम्मेदारी है। इस कार्य में स्थानीय स्वयंसेवी संस्थाओं के साथ ही ग्राम पंचायतों के जिम्मेदार लोगों को भी जवाबदेही तय की जा सकती है। इसमें विपक्षी राजनीतिक तंत्र की भी सहायता ली जा सकती है। जो सरकारी मशीनरी वक्त पर सही तरीके से चुनाव करा सकती है, वह घर-घर तक दवा भी बंटवा सकती है। सरकारों को इन तरीकों को फौरी और युद्ध स्तर पर अमल में लाना होगा, अन्यथा गांवों की हालत खराब होने से कोई नहीं रोक सकता।


सौजन्य - अमर उजाला।

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Saturday, May 15, 2021

वायरस से लड़ाई में गांव महत्वपूर्ण (अमर उजाला)

डॉ. विश्वजीत

 

आपदा अचानक ही आती है और संभलने का वक्त नहीं देती। कोरोना की महामारी ऐसी ही आपदा है। इसने पूरे विश्व को झकझोर कर रख दिया है। इसकी दूसरी लहर का प्रभाव भारत में भी काफी दिख रहा है। यह वायरस किसी कुटिल शत्रु की तरह अपना पैंतरा बदल रहा है। इसीलिए कोरोना की दूसरी लहर पहली लहर से अलग है। जो तैयारियां पहली लहर के हिसाब से की गई थीं, वह कम पड़ गईं। उत्तर प्रदेश का ही उदाहरण लें, तो यहां आक्सीजन की खपत औसतन 300 मीट्रिक टन थी, आज 1,000 मीट्रिक टन की आपूर्ति हो रही है। किसी को इसका अंदाजा नहीं था।दूसरी लहर में यह वायरस फेफड़े पर बहुत तेजी से हमला कर रहा है और शुरू में ही सावधानी न बरती, तो जोखिम बढ़ सकता है। जब तक मेडिकल साइंटिस्ट इस बदलाव को समझते, तब तक काफी नुकसान हो चुका था। दुनिया भर में इस पर शोध हो रहे हैं। पहली लहर के दौरान खड़ा किया गया बुनियादी ढांचा और तैयारियां ही दूसरी लहर से लड़ने में काम आ रही हैं। दूसरी लहर में मेरे जैसे बहुत से चिकित्सक संक्रमित हुए, उससे भी अनुभव मिला।



हालांकि बहुत से चिकित्साकर्मियों को जान भी गंवानी पड़ी। लेकिन शुरूआती झटके के बाद ही इलाज के कई तरीके सामने आने लगे। फेफड़े में संक्रमण के बाद भी बहुत सारे लोगों को बचाना संभव हुआ। प्रोटोकाल के इलाज के साथ पारंपरिक विधियों का मिश्रण 90 फीसदी मरीजों को राहत देने में सफल हुआ। महामारी को तुरंत रोकना किसी के हाथ में नहीं होता। अन्यथा सर्वाधिक संसाधन वाले देश अमेरिका में मौत का आंकड़ा सबसे अधिक नहीं होता। इसलिए यह सवाल उठाना ठीक नहीं है कि पहले से तैयारी नहीं थी या रोकने के लिए किसी ने कुछ नहीं किया। टेस्ट, ट्रैक और ट्रीट की नीति पर चलना ही इस आपदा से निकलने का मंत्र है। आज उत्तर प्रदेश में करीब सवा चार करोड़, महाराष्ट्र, कर्नाटक में करीब तीन करोड़ और दिल्ली में करीब दो करोड़ टेस्ट हो चुके हैं। उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में एक दिन में लगभग तीन लाख तक टेस्ट हुए। बिना सरकारी प्रयास और नेतृत्व की सोच के यह संभव नहीं था।




पच्चीस करोड़ की आबादी वाले उत्तर प्रदेश में टेस्ट, ट्रैक की नीति अपनाना आसान नहीं। किसी डॉक्टर की ओपीडी में 200 की जगह 300 मरीज आ जाते हैं, तो उन्हें संभालने में हालत खराब हो जाती है। यहां सुदूर गांवों में फैली इतनी बड़ी आबादी की स्क्रीनिंग करनी थी। लेकिन 60 हजार से अधिक निगरानी समितियों के चार लाख सदस्य जब गांव-गांव घूमकर संदिग्ध संक्रमितों की पहचानकर उन्हें रैपिड रिस्पांस टीम से टेस्ट कराने और दवाओं की किट पहुंचाने में जुटे, तो इसका प्रभाव भी दिखा। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने उत्तर प्रदेश की इस रणनीति की प्रशंसा भी की है। उत्तर प्रदेश के इस मॉडल को अन्य राज्यों में लागू किया जा सकता है।


आज उत्तर प्रदेश में 10 दिन में 95,000 मामले कम हुए हैं। रिकवरी की दर भी लगातार बढ़ रही है। उत्तर प्रदेश में आबादी 25 करोड़,मृत्यु लगभग 16,000, दिल्ली में आबादी पौने दो करोड़ मृत्यु 20,000, महाराष्ट्र में आबादी 12 करोड़ मृत्यु लगभग 58,000 हुई है। समस्या यह है कि संक्रमण गांवों तक पहुंच गया है। वहां जन व्यवहार में अज्ञानता का भी हाथ है। उच्च स्तरीय चिकत्सा सुविधा के लिए लोग शहरी मुख्यालयों पर निर्भर हैं। इसलिए दबाव बढ़ने से पहले सामुदायिक प्रयत्न तेज किए जाने चाहिए।  टेस्ट, ट्रैक और ट्रीट के मंत्र के साथ दूसरी और तीसरी लहर से निपटने के लिए वहां भी मेडिकेशन, आक्सीजन और वैक्सीनेशन पर ताकत लगानी होगी। अच्छी बात है कि स्वास्थ्य ढांचे के विस्तार पर बात होने लगी है। शुरुआती दौर में ना-नुकर करनेवाले लोग भी वैक्सीन लगवा रहे हैं। 18 वर्ष से ज्यादा की नई उम्र सीमा के लोगों में दिख रहा उत्साह कोरोना के आगे जिंदगी को सकारात्मक आयाम देगा। यह लड़ाई सिर्फ स्वास्थ्यकर्मियों या सरकार की नहीं है, इसमें समाज की भी जिम्मेदारी है कि वह इस वायरस के प्रसार कोरोकने वाली जीवनचर्या को अपनाए, स्वास्थ्य गाइडलाइन का पालन करे। (लेखक किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर हैं।)


सौजन्य - अमर उजाला।

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Tuesday, May 11, 2021

कोरोना महामारी: लड़ाई वैकल्पिक नहीं, अनिवार्य है(अमर उजाला)

हेमंत शर्मा  

हमारी क्षुद्रताएं सामने आ गई हैं। आस-पड़ोस में कोई बुजुर्ग मरता है, तो पड़ोसी अपने खिड़की-दरवाजे बंद कर लेते हैं। घर वाले किसी तरह शव को एंबुलेंस तक पहुंचाते हैं। कोरोना इंसान को ही नहीं, रिश्तों को भी संक्रमित कर रहा है। आदमी के साथ रिश्तों की भी मौत हो रही है। संक्रमित होते ही अपने पराये हो जा रहे हैं। रिश्तों की परिभाषा ही बदल गई है। भयानक संकट के इस दौर में समाज की सारी विद्रूपताएं पूरी नंगई से चौतरफा उग आई हैं। जीवन के मायने बदल गए हैं। मौत सिर्फ अंकगणित हो गई है। हमारी संवेदनाएं मर गई हैं। लोगों का असमय जाना भी अब पथराये मन को परेशान नहीं करता। लगता है, कोरोना के बाद की दुनिया और भयावह होगी।



इस शताब्दी की शुरुआत से हम पानी के लिए लड़ रहे थे। अब हवा के लिए जंग हो रही है। हवा की भी कालाबाजारी हो रही है। कफन के चोर तो दिल्ली में पकड़े ही गए। दवाएं ब्लैक में मिल रही हैं। बूढ़े मां-बाप अगर इस महामारी से बच भी गए, तो बच्चे उन्हें घर ले जाने को तैयार नहीं हैं। मरने वालों के परिजन उनका शव लेने नहीं आ रहे। भरा-पूरा परिवार होने के वावजूद व्यक्ति का अंतिम संस्कार लावारिस की तरह हो रहा है। अस्पताल की जगह श्मशान का विस्तार हो रहा है। एक आत्मीय के जाने के आंसू रुकते नहीं, तब तक दूसरे की खबर आती है। 



लग रहा है, हम एक बड़े श्मशान में बैठे हैं, जो इसके बाद हवा-पानी के लिए युद्धभूमि में तब्दील होगा। सोचकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। तस्वीर भयावह है। हैदराबाद के एक अस्पताल के कोरोना वार्ड में पैंतीस मरीज ठीक हो गए। पर उनके परिजन-रिश्तेदार उन्हें लेने नहीं आए, क्योंकि घर में छोटे बच्चे हैं, परिवार जोखिम नहीं लेना चाहता। मथुरा के गोवर्धन में एक बेटी बुखार से मृत अपने पिता की अर्थी को कंधा देने के लिए गुहार लगाती रही, बिलखती रही, पर पड़ोसियों ने दरवाजे बंद कर लिए। अंतत: पुलिस ने अंतिम संस्कार कराया। देश के नामचीन पत्रकार रहे एसपी सिंह के भतीजे चंदन प्रताप सिंह की लखनऊ में कोरोना से मौत हुई। 


गोमतीनगर के उनके घर में उनकी कोरोना से मृत देह बैकुंठ धाम में विलीन होने के लिए चार कंधों का इंतजार करती रही, पर कोई नहीं आया। आखिरकार पुलिस ने अंतिम संस्कार किया। समूची दुनिया को एक कुटुंब मानने वाले इस देश में रिश्तों पर कोरोना भारी पड़ रहा है। आज नहीं, तो कल कोरोना चला जाएगा। पर जो छोड़ जाएगा, उसमें हमारी प्रकृति बदल जाएगी। समाज बदल जाएगा। हमारी संवेदनाएं बदल जाएंगी। रिश्ते बदल जाएंगे। एक विचार है कि कोरोना के आगे सरकारें फेल हो गई हैं। सरकार और सिस्टम पर सवाल उठाना आपका हक है। पर यह भी सोचिए कि सरकार क्या कर लेगी, मंत्री क्या

कर लेंगे, मशीनरी क्या कर लेगी, जब समाज की संवेदनाएं ही मर गई हैं? इस कोविड काल में समाज नंगा हो गया है। कोई कोशिश नहीं होती कि सुरक्षित रहते हुए दुखी, लाचार, बेसहारा के साथ खड़े हुआ जाए। आखिर डॉक्टर और पुलिस वाले तो अपने काम को अंजाम दे ही रहे हैं। मत भूलिए, सरकार भी इसी समाज का हिस्सा है। 


जितेंद्र सिंह शंटी कोरोना काल में दिल्ली में लावारिस लाशों का अंतिम संस्कार कराने के अभियान में जुटे हैं। शंटी ने जो बताया, वह दंग करने वाला था। उनके मुताबिक, उन्होंने पिछले एक महीने में अब तक जिन 1,352 शवों का अंतिम संस्कार किया है, उनमें 153 ऐसे थे, जिन्हें लोग श्मशान घाट के दरवाजे पर छोड़ आए थे। यह है समाज के भीतर ध्वस्त हो चुकी संवेदनाओं की विचलित करने वाली तस्वीर। कोई कोविड होने पर अपने किरायेदार को घर से बाहर निकाल रहा है। कोई दवाएं और सिलिंडर ब्लैक कर रहा है। कोई बेटा अपने बाप के अंतिम संस्कार में शामिल नहीं हो रहा। कितने ही बड़े लोग अपने परिजनों के बिना अंतिम गति को प्राप्त कर रहे हैं। क्या समाज की आत्मा मर गई है? 


हम अपने इर्द-गिर्द ऐसे ही संवेदनहीन लोगों से घिरे हैं। जब समाज ऐसा अमानवीय व्यवहार कर रहा हो, तो उसे नियंत्रित करने वाला तंत्र कैसे मानवीय हो सकता है? कैसे तय होगी तंत्र की जवाबदेही? उस महान संस्कृति को याद रखिए, जिसके हम ध्वजवाहक हैं। मृत्यु के भय से निकलना होगा। वह तो आनी ही है। पर तब तक हम यह तो समझें कि इस दुनिया में हम क्यों आए थे? यह महामारी किसी एक के बस की नहीं। विषाणु रक्तबीज की तरह खुद को फैला रहा है। उससे लड़ने वाले तंत्र को भी उतना ही विशाल बनाना होगा। वह बनेगा हमारे आपके साथ खड़े होने से। एक दूसरे की मदद करने से। यह सही है कि सरकारें जिम्मेदार होती हैं। उनसे उस वक्त बात करिएगा, जब वोट देने का समय आए। अभी इसी सरकार और इसी तंत्र की मदद से लड़ाई लड़नी होगी। पहले हम खुद को बदलें, तभी व्यवस्था बदलेगी।


कोरोना महामारी ने हमें सोचने को मजबूर कर दिया है कि हमारी जरूरत अस्पताल है या मंदिर-मस्जिद। समूची दुनिया में मंदिर, मस्जिद, चर्च बंद हो गए। केवल अस्पताल ही खुले रहे। इस पर भी अगर हम समझने को तैयार नहीं हैं, तो शवों की अंतहीन यात्रा चलती रहेगी। हम सभ्यता का मरना देखेंगे। पहाड़-सी विपत्ति के बाद भी आपसी कटुता महामारी की तरह बढ़ रही है। फेसबुक, ट्विटर देखिए, तो असहिष्णुता इस विपदा में भी कम नहीं हुई है। कोई विचारधारा को गाली दे रहा है, तो कोई सिस्टम को। समझ में नहीं आ रहा कि इस सिस्टम का माई-बाप कौन है! 


मित्रों, हम बचेंगे, तो विचार बचेगा, तभी विचारधारा बचेगी। पहले खुद को तो बचा लीजिए, फिर जनतंत्र की सोचिएगा। वाम-दक्षिण-मध्य का निपटारा भी तब हो जाएगा। यह वक्त आपसी तनाव का नहीं, एकजुट होकर लड़ने का है। हमने प्रलय झेला है। उसके बाद फिर मनुष्यता उठी और खड़ी हुई। हम इस विपत्ति से भीनिकलेंगे। मनुष्य की जिजीविषा का कोई तोड़ नहीं है। कुंवर नारायण लिख गए हैं, कोई भी दुख मनुष्य के साहस से बड़ा नहीं, वही हारा जो लड़ा नहीं। इस बार भी लड़ाई वैकल्पिक नहीं, अनिवार्य है। मनुष्यता ने इससे भी बड़े संकट देखे हैं। मनुष्यता की जीत नियति की जीत है और वह होकर रहेगी, मगर संवेदनाओं को जिंदा रखने की जिम्मेदारी हमारी है।


सौजन्य - अमर उजाला।

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Monday, May 10, 2021

दूसरी लहर : असली तस्वीर और गलत धारणाएं...प्रकाश जावड़ेकर का नजरिया (अमर उजाला)

प्रकाश जावडेकर  

जनवरी की शुरुआत में देश भर में कोविड के हालात में काफी सुधार हुआ था। हालांकि, केरल में संक्रमण में वृद्धि होने लगी थी और रोजाना लगभग एक तिहाई नए मामले इसी राज्य से आने लगे थे। विगत छह जनवरी को केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव ने राज्य सरकार को पत्र लिखकर तत्काल कदम उठाने का आग्रह किया। अगले ही दिन राज्य के कोविड प्रबंधन प्रयासों में सहयोग के लिए एक केंद्रीय टीम भेजी गई। मैं इसका जिक्र इसलिए कर रहा हूं, क्योंकि यह धारणा बना दी गई है कि केंद्र सरकार ने पहली लहर के बाद कोविड प्रबंधन बंद कर दिया और पिछले कुछ महीनों से इसे पूरी तरह राज्यों पर छोड़ दिया। 

यह बात सच्चाई से कोसों दूर है। सार्वजनिक स्वास्थ्य राज्य का विषय होने के बावजूद कोविड प्रबंधन में सरकार काफी सक्रिय रही है, क्योंकि महामारी में राष्ट्रीय स्तर पर समन्वय और संसाधनों की जरूरत होती है। केंद्र लगातार मोर्चे पर अगुआई कर राज्यों को सहयोग व मार्गदर्शन प्रदान कर रहा है। फरवरी, 2020 के बाद से, केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय रुझानों की निगरानी, राज्यों की तैयारियों का मूल्यांकन, तकनीकी विशेषज्ञता प्रदान करने और राज्य व जिला स्तर की रणनीतियां तैयार करने में मदद कर रहा है।

केंद्र सरकार का कोविड प्रबंधन केवल नई दिल्ली से सुझाव और दिशा-निर्देश जारी करने तक सीमित नहीं है। कई मौके पर केंद्र ने उच्च स्तरीय निगरानी दल तैनात किए हैं, जो राज्यों की तैयारियों का आकलन करते हैं और नियंत्रण व कंटेनमेंट उपायों में सहयोग करते हैं। सितंबर, 2020 से केंद्रीय अधिकारियों व स्वास्थ्य विशेषज्ञों वाली 75 से अधिक उच्च स्तरीय टीम विभिन्न राज्यों में तैनात की जा चुकी है। इनसे मिले फीडबैक ने केंद्र व राज्यों के बीच संवादहीनता कम कर राज्यों की तैयारियों व रणनीतियों में प्रमुख कमियों की पहचान करने में मदद की। 


नए मामलों में जब वृद्धि शुरू हुई, तब क्या केंद्र ने मौजूदा लहर को नजर अंदाज किया? केंद्र के शुरुआती हस्तक्षेपों की समयावधि से सच्चाई का पता चलता है। 21 फरवरी को जब दैनिक मामले 13,000 से कम थे, तब स्वास्थ्य मंत्रालय ने पाया कि संक्रमण के रुझानों में राज्यों के बीच काफी ज्यादा विविधता है। छत्तीसगढ़, केरल व महाराष्ट्र को तुरंत पत्र भेजे गए, जहां मामलों में वृद्धि देखी जा रही थी। निगरानी व राज्यों की सहायता के लिए 24 फरवरी को सात राज्यों के लिए उच्च स्तरीय केंद्रीय टीम की घोषणा की गई, जिनमें महाराष्ट्र, केरल, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, गुजरात, पंजाब, कर्नाटक, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर शामिल थे।


मार्च में केंद्र इन राज्यों में संक्रमण के प्रसार की निगरानी के साथ राज्यों के साथ मिलकर काम कर रहा था और उनके प्रतिक्रिया उपायों की समीक्षा के साथ केंद्रीय टीम द्वारा तैयार रिपोर्ट का अनुपालन सुनिश्चित कर रहा था। इन राज्यों ने केंद्र की आरंभिक चेतावनियों को गंभीरता से लिया होता, तो मौजूदा उछाल इतना भयंकर नहीं होता। जब केंद्र कोविड को नियंत्रित करने के ठोस प्रयास कर रहा था, तब विपक्षी नेता राजनीति जारी रखे हुए थे। उद्धव ठाकरे का पूरा ध्यान वसूली रैकेट से निपटने पर था, जो उनकी नाक के नीचे चल रहा था। कांग्रेस नेतृत्व, राहुल गांधी और प्रियंका वाड्रा के व्यवहार के बारे में विस्तार से बताने की जरूरत नहीं है। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री का टीकाकरण को लेकर रवैया और राज्य से लंबे समय तक अनुपस्थिति को सब जानते हैं। 


सरकार द्वारा समय से पहले विजय के उल्लास को लेकर कुछ लोगों द्वारा गुमराह करने वाली आलोचना की जा रही है। इस सिलसिले में प्रधानमंत्री ने 17 मार्च को आयोजित एक बैठक में मुख्यमंत्रियों से जो कहा था, उसे दोहराने की जरूरत है : ‘दुनिया के अधिकांश कोरोना प्रभावित देशों ने कोरोना की कई लहरों को झेला है। हमारे देश में भी गिरावट के बाद कुछ राज्यों में मामलों में अचानक वृद्धि हुई है।...हमने यह भी देखा है कि महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में पॉजिटिविटी रेट काफी ज्यादा है।...इस समय कई क्षेत्रों और जिलों में मामले बढ़ रहे हैं, जो अब तक अप्रभावित थे। पिछले कुछ हफ्तों में यह वृद्धि देश के 70 जिलों में 150 प्रतिशत से अधिक है। अगर हम महामारी को अभी नहीं रोक पाए, तो यह देशव्यापी प्रकोप की ओर बढ़ सकता है। हमें कोरोना की इस उभरती 'दूसरी पीक' को तुरंत रोकना होगा।...कोरोना के खिलाफ लड़ाई में हमारा आत्मविश्वास अति आत्मविश्वास नहीं बनना चाहिए और हमारी सफलता को लापरवाही में नहीं बदलना चाहिए।' क्या ये शब्द उस व्यक्ति के लगते हैं, जिसने विजय की घोषणा की है और उसे खतरे का आभास नहीं है! 


मौजूदा लहर की आशंका के कारण केंद्र ने सबसे अधिक प्रभावित राज्यों व जिलों में विशेष दल भेजे। विगत अप्रैल में देश भर में सबसे ज्यादा प्रभावित जिलों में 50 से अधिक टीमें तैनात की गईं। इन टीमों ने रोकथाम और निगरानी उपायों में राज्यों की मदद की। मार्च के अंत में जैसे-जैसे मामले बढ़ने लगे, राज्यों को जिला स्तरीय रणनीतियां तैयार करनी पड़ीं। केंद्र सरकार के अधिकारियों ने 27 मार्च से 15 अप्रैल के बीच करीब 200 हाई फोकस जिलों की कार्य योजनाओं की समीक्षा की।


केंद्र ने नागरिकों के जीवन की सुरक्षा के लिए बहुआयामी दृष्टिकोण अपनाया। टीकाकरण अभियान के पहले चरण में स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं, अग्रिम मोर्चे के कर्मचारियों और बुजुर्गों को कवर किया गया। जैसे-जैसे मामले बढ़ रहे थे, कई राज्यों को स्वास्थ्य सेवाओं के बुनियाद ढांचे में कमी का एहसास हुआ और केंद्र को दवा, ऑक्सीजन सिलिंडर, वेंटिलेटर आदि की आपूर्ति के लिए एसओएस अनुरोध भेजे गए। झूठी खबर के उलट, केंद्र सरकार महामारी प्रबंधन के इन सभी पहलुओं से एक साथ निपट रही थी। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि संकट के बीच भी कुछ लोग दुष्प्रचार करने और राजनीतिक नैरेटिव तैयार करने में व्यस्त हैं। हमारे लिए महामारी पर काबू पाना और नागरिकों की जरूरतें पूरी करना प्राथमिकता में सबसे आगे रहा है। यह एक युद्ध है, जिसे एक राष्ट्र, एक जनसमूह और एक मिशन के रूप में लड़ने की जरूरत है। 


-लेखक केंद्रीय मंत्री हैं


सौजन्य - अमर उजाला।

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Wednesday, May 5, 2021

बंगाल में हिंसा:‘खेला होबे’ का मतलब (अमर उजाला)

सुधीश पचौरी  

बंगाल के चुनावों ने कई तरह की ‘फाल्टलाइनों’ को सुलाने की जगह और भी जगा दिया है, जिसका एक उदाहरण इन चुनावों के परिणाम आने के तुरंत बाद शुरू हुई हिंसा है, जिसके उदाहरण भाजपा के दफ्तरों को आग लगाने और कई भाजपा कार्यकर्ताओं के मारे जाने की खबरें हैं। जिसे न तो विश्व मीडिया तवज्जो दे रहा है, न देसी मीडिया ही। एकाध टीवी चैनल जो वीडियोज दिखा रहे हैं, उनको ‘पुराने वीडियो’ कहकर टीएमसी द्वारा खारिज किया जा रहा है! जब कथित ‘पुराने वीडियो’ इतने लोमहर्षक हैं, तो नए कैसे होंगे? यह सहज ही सोचा जा सकता है।

पूछना जरूरी है कि बंगाल में जो खूनखराबा हो रहा है, वह जीत का जश्न है या ‘खेला होबे’ मुहावरे का चरम बिंदु है, जिसमें जीत की ‘विनम्रता’ की जगह, जीतने वाली टीम हारने वाली टीम से हिसाब तय कर रही है, जैसे कि फुटबाल के मैदान में हारी हुई टीम को जीतने वाले दौड़ा-दौड़ाकर मारे! ऐसा तो ‘हिटलर’ के जमाने में हुए ‘फुटबाल मैचों’ तक में नहीं दिखा! बहरहाल, अच्छी बात यह है कि उस ‘खेला होबे’ नारे के असली मानी अब प्रकट हो रहे हैं और इस बार अकेली भाजपा इस हिंसक ‘खेला’ की शिकायत नहीं कर रही, बल्कि मार्क्सवादी पार्टी की नेता सुभाषिनी अली तक को ट्वीट कर कहना पड़ा है कि निर्णायक जीत के बाद टीमएसी की आक्रामकता बढ़ी है। उनके ‘अखिल भारतीय जनवादी महिला संगठन’ की बर्दवान इकाई की एक महत्वपूर्ण कार्यकर्ता काकोली क्षेत्रापाल की नृशंस हत्या कर दी गई है। मोदी और भाजपा से घृणा करने वालों के लिए भाजपा की ऐसी शिकायत ‘एक ड्रामा भर’ होती, पर सुभाषिनी के उक्त ट्वीट के बारे में वे क्या कहेंगे? जीत अपनी जगह होती है, पर जीत का नशा मारक होता है। जीत के बाद भी ‘खेला’ रुका नहीं है, बल्कि सफाई अभियान की तरह जारी है।

कहने की जरूरत नहीं कि बंगाल के चुनावों के कुछ व्याख्याताओं ने भी टीमएसी की इस आक्रामकता को भी हवा दी हैः किसी के लिए यह जीत ‘केंद्र की भाजपा की तानाशाही’ के खिलाफ जीत है, किसी के लिए यह ‘मोदी के फासिज्म’ के खिलाफ जीत है और किसी के लिए यह ‘हिंदुत्व’ पर ‘सेकुलर शक्तियों’ की जीत है। किसी के लिए यह ‘महिषासुर मर्दिनी’ की जीत है। ऐसे व्याख्याता मोदी के अंध-विरोध के चलते यह नहीं देख पाते कि इस जीत में बहुत से ऐसे ‘तत्वों’ की भी भूमिका रही है, जो बंगाल में चार-चार पाकिस्तान बनाने की बात कहते थे। टीमएसी की जीत ने ऐसी ‘फाल्टलाइनों’ को खुलकर खेलने का अवसर दे दिया लगता है।

अगर कोई दल अपनी बड़ी जीत के बाद अपने विरोधियों का सफाया करने का एजेंडा चलाता है, तो यह भी एक प्रकार का ‘फासिज्म’ ही है, जो विरोधियों को छांट-छांटकर निपटाना चाहता है। अगर केंद्र का ‘फासिज्म’ खतरनाक है, तो स्थानीय ‘फासिज्म’ वरदान कैसे हो सकता है? फासिज्म फासिज्म होता है और वह किसी राज्य स्तर के नेता का भी हो सकता है! बंगाल में ऐसी निरंकुशता की परंपरा रही है, जिसकी शुरुआत कभी सिद्धार्थ शंकर रे के शासन में हुई थी। तब सीपीएम उसका टारगेट रही। बदले की इसी परंपरा को प्रकारांतर से सीपीएम ने भी चलाया। फिर टीमएसी ने सीपीएम के खिलाफ चलाया और अब वह भाजपा के खिलाफ चला रही है! लेकिन टीमएसी के अंहकार का एक नया कारण और भी है, वह है ‘दोहरा अस्मितावाद’! 

बंगाल के इस चुनाव अभियान का पुनर्पाठ करें, तो साफ हो जाएगा कि टीएमसी और ममता बनर्जी की जीत उसी क्षण तय हो गई थी, जब ममता ने अपने को ‘बंगाल की बेटी’ कहा था और ‘बंगाली स्वाभिमान’ को जगाने के लिए ‘स्थानीय’ बरक्स ‘बहिरागत’ का नारा दिया था। टीएमसी के चुनाव अभियान में दो तरह के अस्मितावादी सुर एक साथ बजते थेः एक था ‘बंगाली अस्मिता’ के अभिमान का सुर और दूसरा था बंगाल की एक बेटी का यानी एक अकेली बांग्ला स्त्री का अनकहा ‘स्त्री अस्मिता’ सुर! यह ‘दुहत्थड़’ की तरह था!

इस दोहरे अस्मितावाद की दोहरी मार को काटने के लिए भाजपा के पास न कोई वैकल्पिक भाषा थी, न कोई नया केंद्रीय नारा था, जबकि ममता के पास था बंगालियों में लोकप्रिय ‘फुटबाल’ के खेल जैसी आक्रामकता को जगाने वाला ‘खेला होबे’ नारा! मोदी और भाजपा के नेता, अपनी मोदीवादी-विकासवादी संस्कृति के मुकाबले इस ‘खेला होबे’ की ‘काउंटर कल्चर’ की सांस्कृतिक दीवार को भेदने में असमर्थ रहे। भाजपा दोहरी अस्मितावादी दीवारों को न समझ पाई, न उनमें सेंध लगा पाई! जबकि एक वक्त में गुजरात चुनावों में मोदी ने स्वयं ‘गुजराती अस्मिता’ का नारा बुलंद किया था कि मैं गुजरात की पांच करोड़ जनता का अपमान नहीं होने दूंगा और कांग्रेस उसे कभी भेद नहीं पाई। ममता का ‘बंगाल बंगालियों का’ जैसा नारा बंगालियों के बीच हिट होना ही था, क्योंकि वह तो यों भी अपनी संस्कृति पर अतिरिक्त गर्व करने वाले होते हैं। इस नारे  ने ममता के प्रति चुनाव-पूर्व के जनता के गुस्से को भी बिसरवा दिया। 


अस्मितावादी विमर्श ऐसे ही ‘निरंकुशतावादी विमर्श’ होते हैं। वे अपने से ‘अन्य’ या ‘अपने से भिन्न’ को जरा भी जगह नहीं देते। ममता की जीत में असली ‘खेला’ उक्त प्रकार के दोहरे अस्मितावादी विमर्श ने ही खेला है। यों भी यह दौर राष्ट्रवाद बरक्स स्थानीयतावादी अस्मितावादी विमर्शों का दौर है, जो केंद्रवादी राजनीति को अपना ‘अन्य’ यानी ‘शत्रु’ मानते हैं। और बंगाल का दिल्ली से पंगा तो पुराना है और गुजरात से भी पुराना है। यह ‘नेताजी बरक्स गांधी’ के जमाने से चला आता है। भाजपा सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की राजनीति के चलते स्थानीय अस्मितावादी सांस्कृतिक विमर्शों की दीवारों की दुर्भेद्यता को न समझ सकी, न उचित भाषा और मुहावरे से उनको भेदने में समर्थ रही, इसीलिए हारी। 


फिर भी भाजपा ने बंगाल में जितना वोट लिया है और जिस तरह से वामपंथी तथा कांग्रेस ने अपना वोट टीमएसी को शिफ्ट कर ‘राजनीतिक हाराकीरी’ की है, उससे साफ है कि टीएमसी के लिए अब भी असली चुनौती भाजपा ही है। भाजपा कार्यकर्ताओं पर होते हमले यही बताते हैं कि आगे के चुनावों में उसे अगर किसी से खतरा है तो भाजपा से है। इसलिए न भाजपा के अंध विरोधियों को बहुत खुश होने की जरूरत है और न भाजपा वालों को रोने की जरूरत है। हां, अपने राष्ट्रवादी विमर्श पर आत्ममुग्ध होने की जगह भाजपा को नए-नए  अस्मितावादी विमर्शों को समझने की जरूरत है।

सौजन्य - अमर उजाला।

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महामारी से लड़तीं आईटी कंपनियां, कर्मचारियों का ऐसे रख रही ख्याल (अमर उजाला)

महेश परिमल 

इस कोरोना काल में देश-विदेश की तमाम आईटी कंपनियां पूरी तरह से बिखर गई हैं। उनके कर्मचारी अब घर पर ही रहकर काम कर रहे हैं। एक साथ काम करने पर ये लोग एक-दूसरे का हालचाल पूछ लेते थे, पर अब हालात बदल गए हैं। ऐसे में आईटी कंपनियां अपने कर्मचारियों के स्वास्थ्य को लेकर चिंतित हो गई हैं। गूगल और इंफोसिस जैसी अनेक कंपनियों अपने कर्मचारियों को मेल किया है, जिसमें यह हिदायत दी है कि वे इस कोरोना काल में सोशल डिस्टेसिंग का विशेष ख्याल रखें। इन आईटी कंपनियों ने अपने कर्मचारियों को लिखा है-आप हमारे ब्रेन हैं, अभी तक हमें जो भी कामयाबी मिली है, वह आपके कारण ही मिली है। इसलिए स्वयं को संभाल कर रखें। आपकी जो भी समस्याएं हों, हमें बताएं, हम उन्हें दूर करने का प्रयास करेंगे। 

अपने कर्मचारियों को ब्रेन मानकर इन आईटी कंपनियों ने एक मिसाल पेश की है। इस कोरोना काल में जहां कई कंपनियों में ताले लग गए, कई कंपनियां टूटने के कगार पर हैं, ऐसे में ये बड़ी कंपनियां अपने कर्मचारियों को रोके रखने के लिए कई तरह से जद्दोजहद कर रही हैं। इसमें से एक है, अपने कर्मचारियों के स्वास्थ्य के प्रति चिंता करना, जो स्वाभाविक है। यह इसलिए कि कई कंपनियों ने पिछले एक साल में अपने कई प्रतिभावान कर्मचारियों को खो दिया। यदि तब उनके स्वास्थ्य का खयाल रखा जाता, तो कई कर्मचारियों को बचाया जा सकता था। इसलिए अब ये कंपनियां कर्मचारियों के प्रति उदार हुई हैं। कंपनियों की यह सदाशयता उन्हें दूसरी कंपनियों में जाने से रोक रही हैं। यह एक अच्छी पहल है।

एक आईटी कंपनी ने अपने स्टॉफ का हेल्थ चार्ट बनाकर उसके लिए जरूरी सभी लेबोरेटरी टेस्ट कंपनी के खर्चे से कराए। इस हेल्थ चार्ट के अनुसार यह तय किया गया है किस कर्मचारी को उनकी डायट के अनुसार कितना काम करना चाहिए और कितना आराम। मुंबई की एक कंपनी ने अपने स्टॉफ से कहा है कि यदि उन्हें कोरोना का जरा भी असर दिखाई देता है, तो हमें बताएं, हम आपके पास डॉक्टर्स भेजेंगे। आवश्यकता पड़ी, तो अस्पताल में भर्ती भी करेंगे। एक अन्य कंपनी ने वीडियो मैसेज कर स्टॉफ से कहा है कि इस समय आप घर से बाहर न निकलें। 

आवश्यकता पड़ने पर हमसे अवश्य संपर्क करें। एक कंपनी की यह दलील थी कि इस समय आईटी कंपनियों में खींचतान का माहौल है, इसलिए वर्क फ्रॉम होम के दौरान सभी कंपनियां चाहती हैं कि उनका स्टॉफ किसी दूसरी कंपनी की ओर आकर्षित न हो। इसलिए ये कंपनियां अपने स्टॉफ से लगातार संपर्क बनाकर रख रही हैं। अपने कर्मचारियों को केवल कर्मचारी न मानकर उन्हें अपना मस्तिष्क मानना, यह बड़ी बात है। बंगलूरु की आईटी कंपनियां वर्क फ्रॉम होम करने वाले अपने कर्मचारियों से रोज एक बार जूम पर मीटिंग करती हैं।

कोरोना काल के इस भीषण संकट में आईटी कंपनियों ने घर से काम करने वालों के स्वास्थ्य की चिंता करने लगी है, इससे कर्मचारी उत्साहित हैं। उन्हें लगने लगा है कि ऑफिस से दूर रहकर काम करने से उन्हें यह लग रहा था कि कंपनी उनका खयाल नहीं रखती, पर कंपनी ने उनके स्वास्थ्य पर चिंता व्यक्त की। यही नहीं, जब कंपनी ने अपने स्टॉफ को अपना ब्रेन बताया, तो सभी को उस पर गर्व हुआ। वास्तव में यह विचार सबसे पहले अमेरिका में आया। अमेजॉन और वॉलमार्ट, दोनों कंपनियों ने इस कोरोना काल में इसी तरह अपने स्टॉफ से संपर्क किया। साथ ही उनकी हर तरह से सहायता के लिए तत्पर रही। 

दूसरी ओर ऐसी भी कंपनियां हैं, जिन्होंने इस भीषण दौर में अपने कर्मचारियों को काम से निकाल दिया। इन हालात में कोई दूसरी कंपनी काम देने से रही। ऐसे में कर्मचारी पर मुसीबतों का पहाड़ ही टूट पड़ता है। इसमें से कुछ ने खुदकुशी कर ली, कुछ को कोरोना ने निगल लिया। यही लोग हैं, जिन्होंने अपने जीवन के कई महत्वपूर्ण वर्ष  कंपनी को दिए, पर कंपनी ने उन्हें काम से निकालने में जरा भी देर नहीं की। ऐसे में उस कंपनी को ईमानदार स्टॉफ कैसे मिलेगा, यह सोचा है कंपनी के कर्णाधारों ने।

सौजन्य - अमर उजाला।

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Tuesday, May 4, 2021

कोरोना वायरस की दूसरी लहर से जूझते आंध्र-तेलंगाना (अमर उजाला)

भरत कुमार चिल्लाकरी एवं सीता वांका  

कोविड-19 की पहली लहर ने दक्षिण के राज्यों को भी बुरी तरह प्रभावित किया था। आंध्र प्रदेश में तब दैनिक संक्रमण 10,000 और पड़ोसी राज्य तेलंगाना में पांच-छह हजार के बीच था। आंध्र में ज्यादा जांच होने के कारण संक्रमितों की संख्या अधिक थी, जबकि तेलंगाना में जांच कम हो रहे थे। लेकिन स्वयंसेवी प्रणाली जैसी पहल और आवश्यक बुनियादी ढांचे की मजबूती से विगत फरवरी तक दोनों राज्यों में दैनिक संक्रमण घटकर सौ से भी कम रह गया था। राज्यों ने धीरे-धीरे लॉकडाउन हटा दिया, जिससे जीवन पटरी पर लौट आया। लोग बाहर निकलने लगे और कोविड प्रोटोकॉल की उपेक्षा करने लगे, नतीजतन मामले फिर तेजी से बढ़ने लगे।


कोरोना की दूसरी लहर के लिए लोगों की लापरवाही को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है, जो राज्यों के राजनीतिक एजेंडे के साथ मिलकर बढ़ी, जिसके कारण संक्रमण की दर में वृद्धि हुई। टीकाकरण की शुरुआत तो हुई, मगर धीमी गति से, जबकि अनेक टीकाकरण केंद्र टीके की कमी के चलते बंद कर दिए गए। राज्य केंद्र से पर्याप्त वैक्सीन खरीदने में विफल रहे। आंध्र प्रदेश में नगरपालिका चुनाव और तेलंगाना में उप-चुनाव के दौरान बड़ा जमावड़ा हुआ, जिसमें कोविड के बुनियादी प्रोटोकॉल का उल्लंघन हुआ।



कोरोना की दूसरी लहर में संक्रमण का पता जल्दी नहीं चलता और यह बहुत तेजी से फैल रहा है। हैदराबाद में काफी कॉरपोरेट अस्पताल हैं, जहां दोनों राज्यों के लोग इलाज के लिए आते हैं। पर ऑक्सीजन की आपूर्ति में कमी और पर्याप्त चिकित्सीय सुविधाओं के अभाव से लोग परेशान हैं। ऑक्सीजन सिलेंडर और चिकित्सा सुविधाओं की लागत आसमान छू चुकी है। चिकित्सा देखभाल की कमी और सरकारी मशीनरी के अभाव में अनेक लोगों की जान चली गई। आंध्र प्रदेश में औसतन नौ से ग्यारह हजार संक्रमण के दैनिक मामले सामने आते हैं। अधिकारीगण कोविड नियमों की उपेक्षा कर मार्च तक चुनाव में व्यस्त रहे।


पहली लहर के दौरान जो कोविड सेंटर बनाए गए थे, वे बंद कर दिए गए। दैनिक मामलों में वृद्धि होते ही अस्पतालों में मरीजों की भीड़ बढ़ गई, जबकि कोविड देखभाल केंद्रों में आईसीयू बिस्तर, वेंटिलेटर, ऑक्सीजन आपूर्ति जैसी जरूरी सुविधाओं का अभाव है। संबंधित सरकारी अधिकारी हालांकि अस्पतालों और बुनियादी ढांचों को बढ़ाने की बात करते हैं, पर जमीनी हकीकत कुछ और है। संक्रमण के मामलों में अचानक वृद्धि ने निजी अस्पतालों के लिए अवसर पैदा किया है, जो सरकार द्वारा कोविड के इलाज का खर्च तय किए जाने के बावजूद लोगों से लाखों रुपये वसूलते हैं। अलबत्ता जरूरी सुविधाओं के अभाव में जब निजी अस्पतालों में भी लोग जान गंवा रहे हैं, तब सरकारी अस्पतालों में गरीबों की स्थिति की कल्पना ही की जा सकती है। कोविड प्रोटोकॉल के बाद जांच और आइसोलेशन महत्वपूर्ण है। लेकिन जांच के मामले में आंध्र और तेलंगाना राज्य सरकारें सुस्त हैं। 


केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु, गुजरात, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में जहां दैनिक एक लाख जांच होती है, वहीं आंध्र और तेलंगाना में दैनिक जांच 70 हजार के आसपास है। दोनों राज्य राज्य सच्चाई छिपाने के लिए जान-बूझकर ऐसा करते हैं। लॉकडाउन स्थायी समाधान तो नहीं है, पर यह जोखिम को कम कर सकता है और लोगों में जागरूकता ला सकता है। जहां तक संभव हो, कर्मचारियों को घर से काम करने की अनुमति देनी चाहिए और सिर्फ आपात सेवा को ही अनुमति मिलनी चाहिए। कोविड नियमों का उल्लंघन करने वालों पर भारी जुर्माना लगाया जाना चाहिए। हालांकि आंध्र प्रदेश में ऑक्सीजन की कमी नहीं हुई, पर तेलंगाना में हुई है। ऐसे में राज्यों को संसाधनों को साझा कर लोगों की जान बचाना चाहिए। अगर एक-दो हफ्ते में स्थिति नहीं सुधरती है, तो एक-दो सप्ताह के लिए संपूर्ण लॉकडाउन लगाना बेहतर होगा। 


-भरत कुमार चिल्लाकरी आईआईएफटी, कोलकाता कैंपस में असिस्टेंट प्रोफेसर, और सीता वांका हैदराबाद विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हैं।

सौजन्य - अमर उजाला।

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शाकाहार: कोरोना से लड़ाई का एक आयाम यह भी (अमर उजाला)

वीर सिंह 

दुनिया भर में फैला मांस उद्योग जलवायु परिवर्तन के लिए कुख्यात और जैवमंडल पर एक बड़ा बोझ माना जाता है। मांस उद्योग के कारण जलवायु परिवर्तन और अनेक प्रजातियों के विलुप्त होने के अतिरिक्त दुनिया भर में लाखों लोगों के जीवन को खतरा है। क्लाइमेट नेक्सस संस्था की एक रिपोर्ट के अनुसार: 'यदि लोग वर्तमान दरों पर मांस खाना जारी रखते हैं, तो तीन दशकों में कार्बन बजट का आधा हिस्सा खो जाएगा। कंप्यूटर मॉडलिंग के अनुसार, वर्ष 2050 तक सीमित मांस की खपत वाले आहार पर निर्भर रहने से कार्बन उत्सर्जन में एक-तिहाई की कमी लाई जा सकती है और 50 लाख लोगों की जान बचाई जा सकती है। वहीं शाकाहारी आहार से दुनिया के लोग 70 प्रतिशत तक कार्बन उत्सर्जन को कम कर सकते हैं और 80 लाख लोगों की जान बचाई जा सकती है।'


इकोवाच नामक सुप्रसिद्ध संस्था की एक रिपोर्ट के अनुसार, विश्व स्तर पर मांस उत्पादन पर्यावरण के लिए विनाशकारी है और 2050 तक मांस उत्पादन विश्व पर्यावरण को विनाश की जिस स्थिति में पहुंचा देगा, उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। मांस उद्योग में भी जलवायु के लिए सबसे विनाशकारी गोमांस उद्योग है। भारत ने गोहत्या पर प्रतिबंध लगाकर जलवायु नियमन को बड़ी राहत दी है, जिसकी दुनिया भर के पर्यावरणविद और जलवायु वैज्ञानिक सराहना करते हैं। इकोवाच का मानना है कि शाकाहार केवल अहिंसक ही नहीं, हमारी धरती को बचाने के लिए भी आवश्यक है।



आज जो हमारे समकालीन विश्व की स्थिति है, उसे निर्मित करने में सर्वाधिक योगदान हमारे भोजन का है। आने वाले भविष्य का भाग्य भी अधिकांशतः हमारे खान-पान के हाथों लिखा जाना है। मानव धरती पर सर्वव्यापी है। जहां कभी कोई जीव-जंतु, पेड़-पौधा और यहां तक कि जीवाणु-विषाणु तक नहीं पनप पाए, वहां तक मानव ने अपने पैर पसार लिए हैं। अगर सृष्टि का कोई कटुतम सत्य है, तो वह यह कि मानव प्रजाति अन्य सभी लाखों प्रजातियों से भी बड़ी उपभोक्ता है। धरती पर जो भी कुछ खाने योग्य है, उसके भक्षण का सबसे पहला अधिकार आदमी ने अपने नाम कर लिया है।


हम सर्वभक्षी हैं। आदमी कंद-मूल-फल, अनाज, सब्जियों, मेवों से लेकर पक्षियों, सरीसर्पों, उभयचरों, मछलियों, केकड़ों, कीट-पतंगों तक का भक्षण कर जाता है। यह सर्वभक्षिता मानव के नैसर्गिक विकास की परिधि तो तोड़ ही रही है, दुनिया को भी सर्वनाश की ओर ले जा रही है। पृथ्वी पर जीव-जंतुओं की आबादी सीधे प्रकाश संश्लेषण द्वारा निर्धारित होती है। ऊर्जा का पिरामिड सदैव सीधा होता है। 


जैवमंडल में सर्वाधिक जैव ऊर्जा प्रकाश संश्लेषण करने वाले पेड़-पौधों में होती है। सभी जंतु और संपूर्ण मानव समाज इसी ऊर्जा के सहारे जीवन यापन करते हैं। ऊर्जा के पारिस्थितिक पिरामिड का आधार वनस्पति से सृजित होता है। दूसरे शब्दों में, वनस्पतियों की ऊर्जा अंततोगत्वा सूर्य की ऊर्जा का ही जैव-रासायनिक रूप है, जो हरे पौधों में प्रकाश संश्लेषण द्वारा रूपांतरित होती है। पारिस्थितिक विश्लेषण से यह निष्कर्ष निकलता है कि प्रथम खाद्य स्तर (अर्थात उत्पादकों) पर निर्भर जंतु सबसे स्थिर और सबसे स्वस्थ हैं और उन पर अस्तित्व का संकट तभी आ सकता है, जब प्रकाश संश्लेषण, अर्थात पौधों द्वारा स्वयं अपना भोजन बनाने की प्रक्रिया का ही अंत हो जाए। 


इसके विपरीत उच्च मांसाहारी जानवरों पर अस्तित्व का संकट इतना गहरा गया है कि उनकी अनेक प्रजातियां लुप्त हो चुकी हैं तथा शेर, बाघ, चील जैसे उच्च मांसाहारी जीव लुप्तप्राय होने के कगार पर हैं। यह कहना और भी सार्थक और वैज्ञानिक आधार पर अधिक सटीक होगा कि प्रकाश संश्लेषकों (उत्पादकों) के बाद सबसे स्थिर और स्वस्थ आबादी उन जंतुओं की होगी, जो प्रकाश संश्लेषण प्रक्रिया के निकटस्थ हैं, जैसे सभी शाकाहारी, और जैसे ही जानवर प्रकाश संश्लेषण से दूर होते जाते हैं, उनके अस्तित्व का संकट उतना ही गहराता जाता है।


सभी जानवर अपनी प्राकृतिक प्रवृत्ति के अनुसार खाते हैं। उनके पास कोई विकल्प नहीं है। एक बाघ मर जाएगा, लेकिन घास नहीं खा सकता। एक गाय खाने की अपनी स्वाभाविक प्रकृति के साथ समझौता करने के बजाय मौत पसंद करेगी। शाकाहारी होने का अर्थ है प्रकृति की जैव विविधता से अपना पोषण करना। लगभग 5,000 साल पहले हम अपने खाद्य पदार्थों को 5,000 प्रकार के पौधों से प्राप्त करते थे। भोजन प्रदान करने वाले पौधों की विविधता आज सिकुड़ गई है, लेकिन अब भी हमारे पास अनेकानेक शाकाहारी विकल्प हैं।


चीन से कोरोना दुनिया भर में कैसे फैला, इसके पीछे तीन कारण बताए जा रहे हैं : या तो चमगादड़ से, या पैंगोलिन से या मीट मार्केट से। जो भी हो, किसी तरह यह वायरस आया जानवरों के माध्यम से ही है। हम यह भी जानते हैं कि पौधों के बैक्टीरिया, वायरस अथवा अन्य कोई बीमारी मानव में नहीं आती, लेकिन जानवरों के रोग मनुष्य में सीधे चले आते हैं। कोरोना काल में मानव आहार को लेकर बहुत चर्चाएं हुई हैं, और स्वास्थ्य रक्षण को लेकर सभी चर्चाओं के केंद्र में वनस्पति रही है। 


कोरोना की विश्वव्यापी महामारी में सबसे बड़ा मंत्र है, हमारी प्रतिरोध क्षमता। अच्छी तरह से पोषित शाकाहारियों की प्रतिरोध क्षमता निश्चित रूप से मांसाहारियों की अपेक्षा बहुत अधिक होती है। सतरंगी प्रकाश से संश्लेषित भोजन के रसमयी स्वाद, पोषक तत्व और उसकी मनभावन सुगंध हमारे मनुष्यता के भावों को जागृत करते हैं और हमारी, शारीरिक एवं बौद्धिक क्षमताओं, हमारे मनोविज्ञान, सौंदर्य बोध और भावनात्मक तंत्रिकाओं को पुष्ट करते हैं, हमारी आत्मा को चरम तृप्ति प्रदान करते हैं।


सुप्रसिद्ध अंग्रेजी लेखक जॉर्ज बर्नार्ड शॉ ने एक बार कहा था: 'मेरा पेट मरे हुए जानवरों का कब्रिस्तान नहीं है।' मांस प्राप्त करने के लिए पशुओं पर की गई हिंसा और उनके वीभत्स कत्लेआम के लिए मांसाहारी लोग ही दोषी हैं। उपभोग की मानव विधा हमारी पृथ्वी और हमारे ब्रह्मांड को प्रभावित करने वाली है। शाकाहार का अर्थ है, प्रकाश की प्रचुरता के साथ जीना। शाकाहार प्रकाश का मानवीय कृत्य है और मानव समाज की सर्वोत्तम फिलोसॉफी। 

सौजन्य - अमर उजाला।

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Monday, May 3, 2021

विधानसभा चुनाव नतीजे: क्षेत्रीय क्षत्रपों का दबदबा (अमर उजाला)

मनीषा प्रियम  

Published by: मनीषा प्रियम 

कोरोना महामारी जैसी भयानक मानवीय त्रासदी की पृष्ठभमि में चार राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश में हुए विधानसभा चुनाव के नतीजे बहुत कुछ कहते हैं। चुनावी नतीजों में एक बात स्पष्ट है कि सभी राज्यों में क्षेत्रीय क्षत्रप नेता अनुभवी हैं और पार्टी की अगुआई करते हैं, तो विधानसभा चुनाव में जनता स्थानीय नेतृत्व का ही चयन करती है। जैसे कि केरल में चार दशक से भी पुरानी राजनीतिक परंपरा उलट-पुलट गई है और पिनरई विजयन के नेतृत्व में वामपंथी गठबंधन एलडीएफ दोबारा सत्ता में आया है। जबकि वहां की राजनीतिक परंपरा यह रही है कि हर पांच साल पर वहां सत्ता एलडीएफ और यूडीएफ के बीच पलटती रहती है। हालांकि कोरोना से निपटने में मीडिया द्वारा केरल की चर्चा न के बराबर होती है, पर वहां की स्वास्थ्य मंत्री टीचर शैलजा ने कोरोना की पहली लहर के दौरान भी जबर्दस्त काम किया था और इस बार भी केरल सरकार ने जी-तोड़ मेहनत कर न केवल स्वास्थ्य व्यवस्था को बेहतर बनाया है, बल्कि जरूरतमंदों को खाद्यान्न सामग्री का किट भी भेजा। राज्य मशीनरी पूरी तरह से आपदा प्रबंधन में जुटी हुई है। इन सबका फायदा एलडीएफ को चुनाव में मिला है। 



यूडीएफ एलडीएफ के मुकाबले लगभग आधे के आंकड़े पर सिमट गया है। उधर भाजपा ने मेट्रोमैन श्रीधरन को मैदान में उतारा, सबरीमला जैसे मुद्दे को उछाला, पर तमाम कोशिशों के बावजूद वह वहां कुछ खास नहीं कर पाई। तमिलनाडु में एम के स्टालिन के नेतृत्व में द्रमुक ने भी सत्ता में शानदार वापसी की है। स्टालिन ने पारिवारिक झगड़े को किनारे रख अपनी बढ़त बनाई, जबकि अन्नाद्रमुक में मुख्यमंत्री पलानीस्वामी और पार्टी के दूसरे प्रमुख नेता पन्नीरसेलवम के बीच आपसी मतभेद भी खुलकर सामने आ गए थे। जयललिता की करीबी शशिकला को दरकिनार करने का पूरा षड्यंत्र भी रचा गया। स्पष्ट है कि दक्षिण के दोनों राज्य-केरल और तमिलनाडु में अब भाजपा को जबर्दस्त जवाब देने वाले मुख्यमंत्री होंगे।



जहां तक असम की बात है, तो भाजपा ने सर्वानंद सोनोवाल एवं हेमंत विस्व सरमा के नेतृत्व में फिर से राज्य की सत्ता में वापसी की है। हालांकि ऐसी चर्चा थी कि असम में वोट का बंटवारा अपर असम और लोअर असम के तौर पर होगा। जहां ब्रह्मपुत्र की घाटी में अहमिया अस्मिता का वर्चस्व रहेगा, वहीं लोअर असम में कांग्रेस और बदरुद्दीन अजमल की पार्टी का गठबंधन अच्छी बढ़त बनाएगा। कुछ लोग तो यह भी कहते थे कि असम में कहीं इस बार गठबंधन सरकार बनाने की नौबत न आ जाए। कांग्रेस के प्रचार अभियान की बागडोर छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश सिंह बघेल के हाथों में थी। पर भाजपा सत्ता बचाने में कामयाब रही। जबकि कांग्रेस सभी राज्यों में पूरी तरह विफल रही है।


पश्चिम बंगाल में भाजपा ने ममता बनर्जी को घेरने की तमाम कोशिशें कीं, यहां तक कि उनके खिलाफ व्यक्तिगत टिप्पणी भी की गई, जिसे बंगाल के साथ-साथ संस्कृति और महिला अस्मिता पर भी आघात माना गया। पर कड़े संघर्ष के बाद तृणमूल कांग्रेस ने लगातार तीसरी बार विजय हासिल की है। भाजपा ने चुनावी माहौल कुछ ऐसा बना दिया था कि लगता था कि यह प्रधानमंत्री और गृहमंत्री की 'आसोल परिवर्तन' की निजी लड़ाई है। भाजपा ने 'सोनार बांग्ला' बनाने के नारे के साथ अपने कई केंद्रीय मंत्रियों और कुछ फिल्म अभिनेत्रियों को भी चुनावी मैदान में उतारा। इसके अलावा तृणमूल के कई कद्दावर नेताओं को तोड़कर अपनी

पार्टी में लाया, पर यह सब कारगर नहीं हुआ। चुनाव में ममता की व्यक्तिगत छवि और उनकी कल्याणकारी योजनाओं का पलड़ा ही भारी रहा। वामपंथी दल और कांग्रेस गठबंधन का तो राज्य में सूपड़ा ही साफ हो गया।


मतदाताओं ने अपने बुनियादी मुद्दों पर, सरकारी की खूबियों और खामियों पर और स्थानीय राजनीतिक प्रतिस्पर्धा की नुक्ताचीनी को देखते हुए सोच-समझ कर अपना मत डाला है। आने वाले दिनों में राजनीतिक उथल-पुथल होना अवश्यंभावी है और ममता बनर्जी के नेतृत्व में तीसरे घटक के रूप में मुख्यमंत्रियों का एक महत्वपूर्ण समूह उभरेगा।

सौजन्य - अमर उजाला।

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