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Thursday, September 22, 2022

आचरण की शुचिता ( हिन्दुस्तान)

नोएडा में अवैध रूप से बनी दो गगनचुंबी इमारतों को अदालती आदेश पर गिराए जाने का मंजर अभी जेहन से मिटा भी न था कि मुंबई हाईकोर्ट ने अब केंद्रीय मंत्री नारायण राणे के जुहू स्थित आठ मंजिला बंगले में हुए अवैध निर्माण को दो हफ्ते के भीतर तोड़ने का आदेश दिया है। अदालत ने उन पर 10 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया है। रसूखदार लोगों के खिलाफ आ रहे ऐसे फैसलों के यकीनन दूरगामी असर होंगे। ऊंची अदालतों का रुख ऐसी अराजक गतिविधियों के खिलाफ कितना सख्त हो चला है, इसका अनुमान इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि सर्वोच्च न्यायालय में अपील करने तक मोहलत की राणे की मांग भी नहीं मानी गई। इस फैसले का एक साफ संदेश है कि सत्ता के ऊंचे पदों पर बैठे लोग किसी मुगालते में न रहें कि कानून उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। ऐसे न्यायिक निर्णय कानून के राज में जनता की आस्था मजबूत करते हैं। 

दुर्योग से, जिन लोगों से समाज को दिशा देने की अपेक्षा की जाती है, वे अब अपने विवादों से कहीं अधिक ध्यान खींचने लगे हैं। पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान को जर्मनी के फैं्रकफर्ट में कथित तौर पर विमान से उतारे जाने की बात सोशल मीडिया पर चंद मिनटों में वायरल हो गई। हालांकि, आम आदमी पार्टी ने इस पूरे प्रकरण को ‘प्रॉपगैंडा’ करार दिया है और उसकी विरोधी पार्टियां चटकारे ले-लेकर इस खबर को मीडिया में पेश कर रही हैं, मगर यह एक बेहद गंभीर मसला है। इसे राजनीतिक प्रहसन के रूप में कतई नहीं देखा जाना चाहिए। देश के प्रतिष्ठित सांविधानिक पदों पर बैठा हरेक व्यक्ति विदेशी जमीन पर किसी एक पार्टी या समुदाय का प्रतिनिधि नहीं होता, बल्कि वह पूरी भारतीय तहजीब की नुमाइंदगी कर रहा होता है। इसलिए जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों को विदेशी सरजमीं पर अपने आचरण के प्रति खास सावधानी बरतने की जरूरत है। यह समूचे राजनीतिक वर्ग के लिए चिंता की बात होनी चाहिए। 

इन दोनों प्रकरणों में हमारे राजनीतिक वर्ग के लिए बेहद जरूरी सबक हैं। राजनीतिक पार्टियां अक्सर दलील देती हैं कि चूंकि जनता ने चुनकर भेजा है, इसलिए वे मंत्री या मुख्यमंत्री हैं। यह बेहद लचर बचाव है। पार्टियां भूल जाती हैं कि मतदाताओं ने उनको जनादेश दिया था और वे उनसे साफ-सुथरी सरकार की उम्मीद करते हैं। जनता ने किसी को विजयी इसलिए बनाया, क्योंकि उसके सामने उन्होंने अपने प्रतिनिधि के तौर पर उसे ही उतारा था। ऐसे में, किसी भी जन-प्रतिनिधि के आचरण को लेकर संबंधित राजनीतिक दल की जवाबदेही अधिक है। विडंबना यह है कि इस पहलू पर सोचने के लिए कोई पार्टी तैयार नहीं। नतीजतन, विधायी संस्थाओं में दागियों की बढ़ती संख्या समूचे राजनीतिक वर्ग की साख लगातार धूमिल कर रही है। पल-पल बदलती राजनीतिक निष्ठा व प्रतिबद्धता के इस दौर में देश के भीतर पार्टियों को लज्जित होने और विदेश में देश को शर्मसार होने से बचाने के लिए बहुत जरूरी है कि वे अपनी सियासत में नैतिकता की पुनस्र्थापना करें। दागी और अगंभीर उम्मीदवारों को चुनावी मैदान में उतारने से पहले वे इसके गंभीर निहितार्थों पर विचार करें। भारतीय लोकतंत्र ऐसे उदाहरणों से दुनिया में सुर्खरू कतई नहीं हो सकता। 138 करोड़ की आबादी में से चंद हजार बाशऊर लोग यदि हमारे राजनीतिक दल नहीं ढूंढ़ पा रहे, तो वे देश को महान बनाने के दावे किस आधार पर कर सकेंगे?  



सौजन्य - हिन्दुस्तान।

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