Please Help Sampadkiya Team in maintaining this website

इस वेबसाइट को जारी रखने में यथायोग्य मदद करें -

-Rajeev Kumar (Editor-in-chief)

Thursday, July 9, 2020

बेहतर भविष्य की आश्वस्ति : Rashtriya Sahara Editorial


अनेक गंभीर वैश्विक और स्थानीय चुनौतियों के बीच हमारे देश को एक बेहतर भविष्य की ओर कैसे बढÃना है‚ इसकी एक समग्र सोच बनाने के साथ यह भी जरूरी है कि हम अपने इतिहास और विरासत से इसके लिए प्रेरणा और जरूरी सबक प्राप्त करें। इतिहास को कई oष्टिकोणों से देखा जा सकता है और यदि एक बेहतर दुनिया बनाने के लिए जरूरी सरोकारों की oष्टि से देखा जाए तो कुछ सवाल अधिक महkवपूर्ण होंगे। इतिहास के किस दौर में आपसी भाईचारे‚ सुलह–समझौते और परस्पर सहयोग का माहौल अधिक मजबूत हुआ और किन कारणों से हुआॽ किस दौर में मनुष्य ने केवल समृद्धि नहीं अपितु संतोष को भी समुचित महkव दियाॽ किस दौर में समता और न्याय के जीवन–मूल्य को अधिक महkव मिलाॽ किस दौर में >ंचे आदशाç से प्रेरित होकर लोग व्यापक जन–हित के मुद्दों के लिए अधिक आगे आएॽ किस दौर में लोग पेडÖपौधों‚ जीव–जंतुओं की रक्षा के प्रति अधिक संवेदनशील हुएॽ किस दौर में मनुष्य ने भावी पीढिÃयों का‚ भविष्य का अधिक ध्यान रखाॽ॥ ये बहुत महkवपूर्ण विषय हैं क्योंकि सबसे बडÃा सरोकार तो धरती पर दुख–दर्द कम करना ही है। जब समाज में करुणा‚ भाईचारे‚ सहयोग और न्याय के जीवन–मूल्य मजबूत होंगे तभी दुख–दर्द भी कम होगा। यदि हम इतिहास के अध्ययन से यह समझ सके कि समाज में किस दौर में ये जीवन–मूल्य बहुत मजबूत हुए और इस तरह का माहौल बनाने में किन कारणों‚ प्रेरकों और उत्प्रेरकों की मुख्य भूमिका रही तो यह इतिहास का सर्वाधिक मूल्यवान योगदान होगा। हम अपने इतिहास में झांक कर देखना चाहिए कि कब–कब इन मूल्यों के अनुरूप सशक्त आवाज हमारे देश में उठी‚ वे कौन–सी विशेष स्थितियां थीं जिनमें यह आवाज इतनी गहरी हो सकी कि उसने बहुत बडÃी संख्या में लोगों को प्रभावित किया॥। हमारे इतिहास में ऐसे चार समय तो निश्चित तौर पर नजर आते हैं। ऐसा पहला समय ईसा पूर्व छठी शताब्दी का था अथवा आज से लगभग २६०० वर्ष पहले का समय था। इस समय गंगा के मैदानों में या इसके आसपास अनेक सुधारवादी धार्मिक संप्रदायों का जन्म हुआ जिन्होंने प्रचलित कुरीतियों का विरोध करते हुए सादगी‚ अहिंसा‚ सहयोग और समता का संदेश दिया। इनमें से दो संप्रदायों का इतिहास पर स्थायी प्रभाव बौद्ध और जैन धर्म के रूप में हुआ। महावीर जैन ने अहिंसा के बहुत व्यापक रूप का प्रचार किया। अपरिग्रह के उनके सिद्धांत ने सादगी के जीवन को प्रतिपादित किया और आधिपत्य पर आधारित संबंधों का विरोध किया। महात्मा बुद्ध ने समता और अहिंसा पर जोर देने के साथ–साथ धर्म के रास्ते को कर्मकांडों से मुक्त करा उसे व्यावहारिक बनाया। मध्यम मार्ग का संदेश देते हुए उन्होंने कहा–जीवन रूपी वीणा को इतना मत कसो कि वह टूट जाए। उसे इतना ढीला भी मत छोडÃो कि उसमें से स्वर ही न निकले॥। दूसरा समय आज से लगभग २२५० वर्ष पहले का है जब कलिंग–युद्ध के बाद सम्राट अशोक ने एक बहुत शक्तिशाली सेना होने के बावजूद आक्रमण और विजय की नीति को पूरी तरह छोडà दिया और इसके स्थान पर धर्म विजय को अपनाया। कुछ हद तक मिस्र के अखनातोन को छोडÃकर प्राचीन विश्व के इतिहास मेंे ऐसा कोई अन्य उदाहरण नहीं मिलता है। उनने अपने जीवन को जन कल्याण और पशु पक्षियों के कल्याण में लगा दिया। उनने बौद्ध धर्म का प्रचार दूर–दूर तक किया पर साथ ही अन्य धमाç के प्रति पूरी सहनशीलता दिखाई। अहिंसा के रास्ते पर चलते हुए ही अशोक ने देश में अद्भुत राजनीतिक एकता स्थापित की॥। भारतीय इतिहास में ऐसा तीसरा ऐतिहासिक दौर तेरहवीं से सोलहवीं शताब्दी के भक्ति और सूफी आंदोलन का है‚ जिसे हम आध्यात्मिकता की गहराइयों में उतर कर जीवन की एक सार्थक समझ बनाने की oष्टि से देख सकते हैं। दक्षिण भारत में यह भक्ति लहर इस समय से पहले ही देखी गई। प्रचलित सामाजिक कुरीतियों और इनके पोषक निहित स्वाथाç के विरुद्ध बहादुरी और दिलेरी से किए गए विद्रोह की oष्टि से देखें या दो समुदायों द्वारा एक दूसरे को समझने और भाईचारे से रहने की oष्टि से देखें‚ हर oष्टि से यह बहुत प्रेरणादायक समय था॥। हमारे इतिहास का ऐसा चौथा प्रेरणादायक दौर निश्चय ही ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध आजादी की लडÃाई का दौर था जिसके साथ समाज–सुधार के अनेक आंदोलन भी अनिवार्य तौर पर जुडÃे हुए थे। एक पवित्र और बेहद जरूरी उद्देश्य की प्राप्ति के लिए कितनी कुर्बानी दी जा सकती हैं‚ कितना कष्ट सहा जा सकता है‚ कितनी असंभव लगने वाली चुनौती भी स्वीकार की जा सकती हैं‚ कितना अथक प्रयास किया जा सकता है–इसकी बहुत ही हिम्मत बंधाने वाली अनेक मिसालें इस दौर में कायम हुइÈ। साथ ही‚ यह सामाजिक बदलाव के अनेक महkवपूर्ण प्रयोगों का समय था जिन्हें वांछित सफलता मिली हो या न मिली हो‚ लेकिन उनसे हम बहुत कुछ सीख सकते हैं। ॥ इन सभी महkवपूर्ण दौरों से पहले समस्याएं बहुत बढà गई थीं। समस्याएं बहुत बढà जाने पर ये विभिन्न दौर उम्मीद लेकर आए। बौद्ध धर्म और जैन धर्म के उदय से पहले हिंसा‚ विषमता और कर्मकांड़ों से समाज बुरी तरह ग्रस्त था। अशोक द्वारा शांति का मार्ग अपनाने से पहले भीषण हिंसा के कलिंग युद्ध में बहुत बडÃी संख्या में लोग मारे गए थे और बर्बाद हुए थे। भक्ति और सूफी आंदोलन की जरूरत को जिस समाज ने पहचाना वह तरह–तरह के भेदभाव‚ निरर्थक हिंसा और अंधविश्वास से उत्पन्न कष्ट भुगत रहा था। आजादी की लडÃाई में कुछ सबसे साहसी और नई समझ बनाने वाले कार्य तब हुए जब शोषण और जुल्म से समाज बुरी तरह त्रस्त हो चुका था। अतः स्पष्ट है कि मौजूदा समाज की अधिक समस्याओं से विचलित नहीं होना है। वर्तमान कमजोरियों के बावजूद ऐसी प्रेरणादायक शुरुûआत हो सकती है‚ जो हमारी समस्याओं के वास्तविक और स्थायी हल खोजने या समाधान निकालने के साथ–साथ भटकी हुई दुनिया में एक वैकल्पिक रास्ते की उम्मीद भी जगाए॥।

 सौजन्य - राष्ट्रीय सहारा।
Share:

Please Help Sampadkiya Team in maintaining this website

इस वेबसाइट को जारी रखने में यथायोग्य मदद करें -

-Rajeev Kumar (Editor-in-chief)

0 comments:

Post a Comment

Copyright © संपादकीय : Editorials- For IAS, PCS, Banking, Railway, SSC and Other Exams | Powered by Blogger Design by ronangelo | Blogger Theme by NewBloggerThemes.com