संपादकीय: न्याय की उम्मीद

बलात्कार की घटनाओं से जुड़े मुकदमों की तत्काल सुनवाई के लिए देश के चौबीस राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में त्वरित अदालतें गठित करने के फैसले से यह उम्मीद बंधी है कि महिलाओं और बच्चों के साथ ऐसे जघन्य और घिनौने अपराध करने वालों को जल्द सजा मिल सकेगी। देशभर में बलात्कार की घटनाएं जिस तेजी से बढ़ रही हैं, उससे यह साफ है कि ऐसा करने वालों में कानून का कोई भय नहीं रह गया है। इसकी सबसे बड़ी वजह यही है कि बलात्कार से संबंधित मामले वर्षों तक अदालतों में चलते रहते हैं और ऐसे में कई बार पीड़ित महिला का टूट जाना स्वाभाविक होता है। इससे अपराधियों के हौसले बुलंद होते जाते हैं। देश में इस वक्त बलात्कार और पोक्सो के करीब पौने दो लाख मामले लंबित पड़े हैं। इसकी वजह यही है कि अदालतों में काम का बोझ है, जजों की कमी है, इसलिए निचली अदालतों से लेकर हाईकोर्टों और सुप्रीम कोर्ट तक मुकदमों का अंबार लगा है। ऐसे में खासतौर से बलात्कार से संबंधित मामलों की सुनवाई में लंबा समय लगना स्वाभाविक है। देश के तीन सौ नवासी जिले ऐसे हैं जहां की अदालतों में पॉक्सो के तहत लंबित मामलों की संख्या सौ से ज्यादा है।
महिलाओं और बच्चों के खिलाफ ऐसे अपराधों पर लगाम लगाने के लिए लंबे समय से कवायद तो चलती रही है, लेकिन अभी तक भी ऐसे मामलों में त्वरित न्याय संभव हो नहीं पाया है। इसका बड़ा कारण यह है कि त्वरित अदालतें बनाने का फैसला राज्य सरकारों को करना होता है। लेकिन राज्य अपने संसाधनों का रोना रोकर इससे बचे रहते हैं। त्वरित अदालतें बनाने की दिशा में काम विधि और न्याय मंत्रालय ने शुरू किया था। लेकिन अभी भी देश के कुछ राज्य और केंद्र शासित प्रदेश मंत्रालय की इस योजना में शामिल नहीं हुए हैं। ऐसे में यह सवाल उठता है कि केंद्र की पहल के बावजूद राज्य त्वरित अदालतें गठित करने की दिशा में तेजी दिखाएंगे। अभी यह माना जा रहा है कि अगर तय योजना के मुताबिक त्वरित अदालतों का गठन हो जाता है और ये समय से काम शुरू कर भी देती हैं तो हर अदालत हर साल एक सौ पैंसठ मामलों का निपटारा करेगी।
त्वरित अदालतों के गठन को लेकर सरकार ने सक्रियता सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद दिखाई है। इसी तरह बच्चों से जुड़े अपराधों, खासतौर से यौन अपराधों के तत्काल निपटारे के लिए शीर्ष अदालत ने पिछले साल देश के हर जिले में पॉक्सो अदालत बनाने का निर्देश दिया था। लेकिन मामला सिर्फ त्वरित अदालतों के गठन तक सीमित नहीं रहना चाहिए। मुकदमों की सुनवाई भी निर्बाध रूप से होनी जरूरी है। बलात्कार जैसे मामलों के मुकदमे में सबसे बड़ी समस्या यही आती है कि ऐसे ज्यादातर मामलों में पुलिस की भूमिका संदिग्ध बनी रहती है, पुलिस जांच में लापरवाही बरतती है, कई बार सबूतों से छेड़छाड़ करने और मामले को कमजोर बनाने जैसे उदाहरण भी देखने को मिलते हैं।
ये सब पीड़ित को न्याय दिलाने में बाधा साबित होते हैं। इसलिए भारत में बलात्कार के मामलों में दोषसिद्धि बत्तीस फीसद ही है। निर्भया कांड के बाद जिस तरह से अदालतों ने सक्रियता दिखाई थी, केंद्र और राज्य सरकारों की नींद टूटी, सख्त कानून भी बने, उनसे लगा था कि अब ऐसे मामलों में त्वरित न्याय मिलना संभव हो सकेगा। लेकिन अभी तक इन अदालतों का गठन नहीं हो पाना बता रहा है कि हम कैसे पीड़ितों को न्याय मुहैया कराएंगे!
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