युवाओं को कुशल बनाने के मोर्चे पर पिछड़ता भारत (हिन्दुस्तान)

जयंतीलाल भंडारी, अर्थशास्त्री
भारत सहित पूरी दुनिया में आईएमडी बिजनेस स्कूल स्विट्जरलैंड द्वारा प्रकाशित ग्लोबल टैलेंट रैंकिंग 2019 को गंभीरतापूर्वक पढ़ा जा रहा है। भारत 63 देशों की इस सूची में पिछले वर्ष के 53वें स्थान से छह पायदान फिसलकर 59वें स्थान पर आ गया है। रैंकिंग में स्विट्जरलैंड लगातार छठे साल शीर्ष पर है। डेनमार्क दूसरे व स्वीडन तीसरे स्थान पर है। चीन इसमें 42वें स्थान पर है। रूस 48वें और दक्षिण अफ्रीका 50वें स्थान पर है। 


प्रतिभाओं के विकास, उन्हें आकर्षित करने, उन्हें देश से ही जोड़े रखने तथा उनकी शैक्षणिक गुणवत्ता के लिए किए जा रहे निवेश के आधार पर रैंकिंग तय की गई है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि टैलेंट पूल की गुणवत्ता के मामले में भारत का प्रदर्शन औसत से बेहतर है, लेकिन कुछ मोर्चे हैं, जिन पर यह देश पिछड़ रहा है।

भारत में शैक्षणिक प्रणाली की गुणवत्ता कमतर है। सरकारी शिक्षा क्षेत्र में निवेश की कमी है। ज्यादातर युवा गुणवत्तापूर्ण प्रशिक्षण और जीवन से वंचित हैं। प्रतिभाओं को आकर्षित करने और उन्हें बनाए रखने की क्षमता भी कम है। स्वास्थ्य सेवाओं का स्तर बहुत अच्छा नहीं है। श्रमबल में महिलाओं की पर्याप्त भागीदारी नहीं है। इसके अलावा, निवेश और विकास के मामले में भारत सूची में शामिल देशों में बहुत पीछे है। ग्लोबल टैलेंट रैंकिंग में बहुत पीछे रहने पर चिंतित होना और सबक लेना इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि देश की नई पीढ़ी को योग्य या कुशल बनाकर ही रोजगार की संभावनाओं को साकार किया जा सकता है। 


हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि भारत में करीब पचास प्रतिशत आबादी ऐसी है, जिसकी उम्र पच्चीस साल से कम है। भारत की 65 प्रतिशत आबादी 35 साल से कम आयु की है। चूंकि भारत के पास विकसित देशों की तरह रोजगार बढ़ाने के विभिन्न संसाधन और आर्थिक शक्तियां उपलब्ध नहीं हैं, इसलिए यह देश अपनी युवा आबादी और उसकी योग्यता को ही अपनी ताकत बनाकर आगे बढ़ सकता है। 


हाल ही में केंद्रीय सांख्यिकीय कार्यालय ने श्रमबल के नवीनतम आंकड़े जारी करते हुए कहा है कि वर्ष 2017-18 के दौरान देश में बेरोजगारी की दर 6.1 फीसदी रही है। देश में बेरोजगारी की यह दर 45 साल में सर्वाधिक है। इसमें कोई दो मत नहीं कि भारतीय अर्थव्यवस्था में श्रम का आधिक्य है, लेकिन कौशल की काफी कमी है। उच्च शिक्षा और कौशल प्रशिक्षण से लैस भारतीय युवाओं के लिए देश-विदेश में नौकरियों की कमी नहीं है। इन युवाओं के अलावा भी ऐसी आबादी है, जिसके पास खूब डिग्रियां हैं, लेकिन योग्यता के अभाव में नौकरी नहीं मिल रही है। 


वास्तव में इस समय दुनिया के साथ-साथ देश का भी रोजगार परिदृश्य तेजी से बदल रहा है। ऐसे बदलते परिदृश्य में रोजगार की जरूरतें भी बदल रही हैं। तकनीक की प्रधानता बढ़ रही है। दुनिया के अनेक देश योग्य-कुशल भारतीय युवाओं की राह देख रहे हैं। खासतौर से देश में मेक इन इंडिया की सफलता के लिए भी प्रशिक्षित युवाओं की जरूरत है। ख्याति प्राप्त स्टाफिंग फर्म मैनपावर ग्रुप की एक स्टडी रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में उद्योग-कारोबार के लिए पर्याप्त संख्या में टैलेंटेड प्रोफेशनल्स नहीं मिल रहे हैं।



भारत में अभी भी उतने योग्य युवा आगे नहीं आ रहे हैं, जितनों की जरूरत है। ऐसे में, जरूरी है कि सरकार प्रतिभाओं के विकास पर पूरी ईमानदारी से ध्यान दे। दक्ष प्रतिभाओं का निर्माण करे। योग्य युवा ही आसानी से रोजगार पैदा कर सकते हैं और रोजगार पा सकते हैं।


गौर करने की बात है कि सरकार द्वारा देश में कौशल विकास एवं उद्यमिता मंत्रालय गठित करके कौशल विकास को गतिशील बनाने की पहल के भी आशाजनक परिणाम नहीं आए हैं। इस विभाग ने वर्ष 2016 से 2020 तक एक करोड़ लोगों को प्रशिक्षण देने के लिए प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना आरंभ की थी, लेकिन अक्तूबर 2016 से जून 2019 तक कोई 52 लाख लोगों को ही ट्रेनिंग दी जा सकी है। इनमें भी सबको नौकरी नहीं मिल सकी है। यदि हम चाहते हैं कि भारतीय प्रतिभाएं देश की मिट्टी को सोना बना दें, तो हमें ग्लोबल टैलेंट  रैंकिंग 2019 को ध्यान में रखते हुए बहुत सारे प्रभावी कदम उठाने होंगे। 
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
सौजन्य- हिन्दुस्तान।
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