महामना, उन्हें माफ करें (हिन्दुस्तान)

महामना, उन्हें माफ करें
भारत सिर्फ हिंदुओं का देश नहीं है। यह मुसलमानों, ईसाइयों और पारसियों का भी देश है। यह तभी मजबूत होगा और उन्नति कर सकेगा, जब सभी धर्मों तथा समुदायों के लोग परस्पर भाईचारे के साथ इसमें रहेंगे। मेरी पूर्ण आशा और प्रार्थना है कि ज्ञान का यह जो केंद्र अस्तित्व में आ रहा है, वह ऐसे विद्यार्थी तैयार करेगा, जो न सिर्फ बौद्धिक श्रेष्ठता में दुनिया के अपने समकक्ष विद्यार्थियों की बराबरी करेंगे, बल्कि एक उत्कृष्ट जीवन भी बिताएंगे, अपने देश से प्रेम करेंगे और ईश्वर के प्रति समर्पित होंगे।


हम काशी हिंदू विश्वविद्यालय के लोग क्या ‘मालवीय जी महाराज’ की ये पंक्तियां भूल गए? ऐसा न होता, तो विश्वविद्यालय के संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय में डॉक्टर फिरोज खान को अपनी नियुक्ति के शुरुआती दो हफ्ते विवादों की अनचाही आंच में झुलसते हुए न गुजारने पड़ते।


उनके खिलाफ रोष के पटाखे फोड़ने की कोशिश उसी समय शुरू हो गई थी, जब वह सात नवंबर को विश्वविद्यालय में योगदान के लिए दाखिल हुए थे। उनके विरोध में छात्रों की एक टोली विभाग के द्वार पर बैठी थी। उस दिन से संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय की कक्षाओं को चलने नहीं दिया जा रहा था और दो-तीन दर्जन छात्रों का जत्था कुलपति आवास के बाहर ढोल-मंजीरे बजा रहा था। हमारे ये नौजवान अपने कुलपति की नींद क्यों हराम कर रहे थे? कारण स्पष्ट करते हुए एक नौजवान ने एक फटाफट चैनल से कहा कि कोई ‘अनार्य’ हमें धर्म कैसे पढ़ा सकता है? उसे पता नहीं कि डॉक्टर खान की नियुक्ति साहित्य विभाग में हुई है। वह साहित्य पढ़ाएंगे, धर्म नहीं। इस संकाय में आठ विभाग हैं, जिनमें से सात में धर्म के अलावा काफी कुछ पढ़ाया जाता है। यहां जैन और बौद्ध दर्शन भी पढ़ाया जाता है। इन धर्मों का उदय क्यों और कैसे हुआ था, क्या यह भी बताने की जरूरत है?


साफ है, उन्हें संकाय के नाम पर बरगलाया गया था। मैं नहीं जानता कि नाराजगी प्रकट कर रहे उन नौजवानों ने जर्मन विद्वान गेटे, मोनियर विलियम्स अथवा मैक्समूलर का नाम सुना है या नहीं? यकीनन, वे जनरल कनिंघम के बारे में भी नहीं जानते होंगे, इन ‘अनार्यों’ का हम संस्कृत और संस्कृति प्रेमियों पर बड़ा एहसान है। गेटे और मैक्समूलर ने संस्कृत के ‘क्लासिक’ ग्रंथों को मदमाते यूरोपीय समाज में स्थापित किया था। जनरल कनिंघम पेशे से फौज में इंजीनियर थे, पर उन्होंने भारतीय पुरातत्व पर गजब का काम किया। हमारी संस्कृति और संस्कृत जिन परदेशियों की ऋणी है, उनकी सूची लंबी है। उससे पहले ये लोग हमारे बारे में क्या सोचते थे, जानना हो, तो मैकाले की वह रपट पढ़ लीजिए, जो भारत आने के बाद उसने लंदन में विराज रहे अपने आकाओं को भेजी थी।


जो लोग डॉक्टर खान का विरोध कर रहे थे, वे शायद यह भी नहीं जानते होंगे कि मुगल राजकुमार दारा शिकोह काशी में वेद पढ़ने आया था। उसे यह अलौकिक ज्ञान सौंपते हुए तब के पंडितों ने कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की थी, क्यों? क्या इसलिए कि वह राजकुमार था अथवा हम तब अपेक्षाकृत उदार थे? ऐसा नहीं है कि भाषा, संस्कृतियों और धर्मों पर परस्पर प्रभाव का यह रिश्ता एकतरफा है।

इसी काशी हिंदू विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग में प्रोफेसर महेश प्रसाद सहित तमाम हिंदुओं ने योगदान किया। खुद मुझे प्रोफेसर निसार अहमद ने इसी विश्वविद्यालय में मुद्राशास्त्र पढ़ाया था। गुप्त युग के सिक्कों पर धार्मिक प्रतीकों के बारे में उन्होंने जो ‘लेक्चर’ दिया था, वह मुझे आज तक जस का तस याद है। वह चीफ प्रॉक्टर जैसे महत्वपूर्ण पद पर भी रहे। उनका ज्ञान और काम उनके प्रति श्रद्धा पैदा करता था।


इंसानियत अगर एक-दूसरे की उन्नति का रास्ता प्रशस्त न करे, तो हम इंसान कैसे? काशी हिंदू विश्वविद्यालय में कुछ छात्रों का भटकाव इस भावना पर चोट पहुंचा रहा था। यहां डॉक्टर फिरोज खान के बारे में जानना जरूरी है। फिरोज जयपुर से कुछ दूर गांव बगरू के रहने वाले हैं। उन्होंने जयपुर के राष्ट्रीय संस्कृत शिक्षा संस्थान से एमए करने के बाद डॉक्टरेट की उपाधि ली। उनके पिता रमजान खान भी संस्कृत में शास्त्री हैं। रमजान साहब गौशाला जाते हैं और मंदिरों में कृष्ण भक्ति के भजन गाते हैं। माथे पर टीका लगाए शुद्ध संस्कृत और ब्रजभाषा का उच्चारण करते रमजान खान अपने आचरण और भाव-भंगिमा से क्या एहसास देते हैं?

यह बताने कि जरूरत नहीं कि उन्हें यह सब कुछ अपने पिता गफूर खान से मिला, जो खुद भी संगीत विशारद् थे और गौ-प्रेमी थे। ये लोग अरबी-फारसी नहीं, संस्कृत के पुजारी हैं। पुराने दिन होते, तो शायद उन्हें ‘पंडित’ की उपाधि दे दी गई होती। रमजान खान दुख से कहते हैं, यह विवाद उपजने के बाद मालूम पड़ा कि हम मुसलमान हैं। जिस व्यक्ति की वंश परंपरा ऐसी हो, क्या उसे धर्म के आधार पर उसके कर्तव्य से वंचित किया जा सकता है? न भारत का संविधान, न काशी हिंदू विश्वविद्यालय का यूजीसी द्वारा निर्देशित विधान और न ही हमारी परंपरा ऐसा कहती है।


मैं यहां आपको डॉक्टर असहाब अली से परिचित कराना चाहूंगा। 1977 में उन्होंने गोरखपुर विश्वविद्यालय में बहैसियत सहायक प्रवक्ता आमद दर्ज कराई थी। दो बरस बाद जब विश्वविद्यालय के सहायक प्रवक्ताओं को स्थाई किया जा रहा था, तब यह खबर उड़ी कि डॉक्टर असहाब के मुकाबले हिंदू प्रत्याशियों को तरजीह दी जा रही है। इससे छात्र भड़क उठे। डॉक्टर अली 2010 तक इस विश्वविद्यालय की सेवा में रहे और छात्रों की दो पीढ़ियों ने उनकी योग्यता के चलते उन्हें सिर-आंखों पर बिठाया। हालांकि, इस बीच वह हज पर गए और तब से उन्होंने धोती-कुरता छोड़ मुस्लिम परिधान पहनने शुरू कर दिए, पर इससे उनकी लोकप्रियता में कोई फर्क नहीं आया। बीएचयू के आंदोलनकारी छात्रों को यह भी बताया जाना चाहिए था कि संसार के तमाम उच्च शिक्षण संस्थानों में इस्लाम धर्म की शिक्षा मुस्लिमों के अलावा ईसाई और यहूदी भी देते हैं। शिक्षक अपनी शिक्षा से जाना जाता है, चेहरे, धर्म अथवा वेश-भूषा से नहीं। हमारे चारों ओर ऐसे शिक्षकों के उदाहरण बिखरे पडे़ हैं।


काशी हिंदू विश्वविद्यालय में इसका उलट हुआ। इससे विश्वविद्यालय की छवि को आघात लगा है और ‘महामना’ की भावना भी चोटिल हुई है। अगर संयम से काम लिया जाता, तो ‘सर्वविद्या की राजधानी’ (बीएचयू के कुलगीत का मुखड़ा) दुनिया के लिए नजीर पेश करती नजर आती। अफसोस, ऐसा न हो सका। महामना उन्हें माफ करें, वे नहीं जानते थे कि वे क्या कर रहे हैं।

सौजन्य- हिन्दुस्तान।
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