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-Rajeev Kumar (Editor-in-chief)

Wednesday, April 7, 2021

नयी प्रौद्योगिकी से रोजगार सृजन (प्रभात खबर)

By डॉ अश्विनी महाजन 


पिछले 30 वर्षों में भूमंडलीकरण की अंधी दौड़ ने रोजगार सृजन को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया है. चीन को छोड़ दुनिया के लगभग हर देश में बेरोजगारी बढ़ी है. अमेरिका में बेरोजगारी की दर 6.2 प्रतिशत है, इंग्लैंड में 5.1 प्रतिशत, जर्मनी और फ्रांस में यह क्रमशः 5.9 और आठ से नौ प्रतिशत है. कुछ समय पूर्व ओइसीडी की एक रपट के अनुसार भारत में 15-29 वर्ष की आयुवर्ग में 2017 में 30 प्रतिशत ऐसे युवा थे, जो न तो शिक्षण संस्थानों में थे, न रोजगार में और न ही प्रशिक्षण में, यानी बेरोजगार थे.



यूरोप के कई देशों में युवा बेरोजगारी 50 प्रतिशत से ज्यादा हो चुकी है. विकसित देश हों अथवा विकासशील पिछले 30 वर्षों में सभी रोजगार की कमी से जूझ रहे हैं.भारत की जनसंख्या में लगभग दो करोड़ लोग हर साल जुड़ जाते हैं. आज जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा युवा है. देश की दो तिहाई जनसंख्या 35 वर्ष से नीचे की है. इसमें 36 प्रतिशत से ज्यादा 15 से 35 वर्ष की आयुवर्ग में हैं. इस दृष्टि से दुनियाभर में सबसे ज्यादा युवा भारत में हैं.



इसे जनसांख्यिकी लाभ भी कहा जाता है, क्योंकि युवा आबादी की ऊर्जा का इस्तेमाल कर देश तेजी से तरक्की कर सकता है. नीति-निर्माताओं को चिंता रहती है कि कैसे इस जनसांख्यिकी लाभ का इस्तेमाल किया जाये. पिछले 20 वर्षों से चीनी साजो-सामान के भारी आयात के चलते देश विनिर्माण के क्षेत्र में पिछड़ता जा रहा है. इसका असर रोजगार सृजन पर भी पड़ा है.


बेरोजगारी में आज नयी प्रौद्योगिकी आग में घी डालने जैसा काम कर रही है. मशीनीकरण से रोजगार पर प्रभाव पड़ा था. इस समस्या का निवारण धीरे-धीरे रोजगार के वैकल्पिक अवसर जुटा कर किया गया. जहां मैन्युफैक्चरिंग में रोजगार घटा, वहां कुछ भरपाई सेवा क्षेत्र से होने लगी. आज आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस, रोबोटिक्स, ब्लॉक चेन आदि नयी प्रौद्योगिकी रोजगार के अवसरों के लिए खतरा बनी हुई हैं.


पहले कॉल सेंटरों के जरिये रोजगार का सृजन हो रहा था, अब आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के चलते कॉल सेंटर में युवाओं के बदले इंटरनेट बॉट्स मशीनें (रोबोट) सवाल-जवाब कर लेती हैं. इससे रोजगार घटने लगा है और आनेवाले समय में और घट सकता है. आजकल फैक्ट्रियों, दफ्तर, घरों में कई मानव कार्यों को रोबोट करने लगे हैं.


जहां पहली औद्योगिक क्रांति ने मशीनीकरण के कारण रोजगार घटाया था और यह क्रम दूसरी और तीसरी औद्योगिक क्रांति में भी चलता रहा. लेकिन मशीनीकरण ने परंपरागत उद्योगों में रोजगार कम किया, लेकिन साथ ही साथ दुनिया में इसके कारण वैकल्पिक रोजगार भी पैदा हुए.


हालांकि, तीसरी औद्योगिक क्रांति में ही सूचना प्रौद्योगिकी का आगाज हो गया था, लेकिन भारत इस औद्योगिक क्रांति से लगभग अछूता ही रह गया, क्योंकि कंप्यूटर, इलेक्ट्रॉनिक्स और अक्षय ऊर्जा के क्षेत्र में भारत शेष दुनिया से पिछड़ गया था. इसलिए, इन क्षेत्रों में भारत सीमित मात्रा में ही रोजगार सृजन कर पाया.


आज भारत के सामने यह चुनौती है कि वह न केवल दूसरी और तीसरी औद्योगिक क्रांति में अपने असंतोषजनक प्रदर्शन की भरपाई करे, बल्कि चौथी औद्योगिक क्रांति में भी बढ़-चढ़कर हिस्सा ले. यह सही है कि रोबोटिक्स, आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस, ड्रोन इत्यादि के कारण रोजगार के सृजन में कमी आयेगी, लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि नयी प्रौद्योगिकी के कारण लागत में भी कमी आती है.


उदाहरण के लिए जो कंपनियां आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस, रोबोट, ड्रोन इत्यादि का उपयोग करती हैं, उनकी लागत घटती है. लागत घटने पर वह उद्योग बाजार में अधिक प्रतिस्पर्धी हो जाती हैं. लेकिन नयी प्रौद्योगिकी के नाम पर रोजगार के अंधाधुंध ह्रास को भी औचित्यपूर्ण नहीं ठहराया जा सकता. ऐसे में नीति-निर्माताओं को प्रौद्योगिकी के चयन के संदर्भ में अत्यंत संवेदनशीलता और गंभीरता से विचार करना होगा.


उचित प्रौद्योगिकी के चयन का विषय अत्यंत महत्वपूर्ण है. आज के युग में यह चयन बाजार द्वारा प्रभावित हो रहा है. जहां-जहां रोबोटिक्स और आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के कारण लागत घटती है, वहां इसके उपयोग को औचित्यपूर्ण ठहराया जाता है. लेकिन नहीं भूलना चाहिए कि रोजगार घटने की भी अपनी एक सामाजिक लागत (सोशल कॉस्ट) होती है.


जब रोजगार से लोग बाहर होते हैं, तो उनकी ऊर्जा और कौशल का उपयोग नहीं हो पाता. उनकी आय की भरपाई हेतु सरकार को किसी न किसी रूप में खर्च करना पड़ता है, यानी एक ओर कंपनियों की लागत घटती है, लेकिन उसकी चोट शेष समाज और सरकार पर पड़ती है. इसलिए उचित प्रौद्योगिकी को अपनाना जरूरी है, ताकि लोगों को अनावश्यक रूप से कष्ट न हो और संसाधनों का सही इस्तेमाल भी हो.


आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस हो, रोबोट हो, ब्लॉक चेन हो अथवा ड्रोन, ये आज के युग में विकास के प्रतीक भी बन रहे हैं. नयी खोजें इसी क्षेत्र में हो रही हैं. दुनिया भर में इनकी मांग भी बढ़ रही हैं. पिछले 30 वर्षों में देश में सॉफ्टवेयर विकास और विज्ञान प्रौद्योगिकी में हमारे युवाओं के बढ़ते कौशल के कारण आज बड़ी संख्या में हमारे युवा इस क्षेत्र में नयी खोजें भी कर रहे हैं और इस क्रांति में उनकी बड़ी हिस्सेदारी भी है. ड्रोन उत्पादन के क्षेत्र में भारत के स्टार्टअप आगे बढ़ रहे हैं. कई क्षेत्रों में रोबोट का भी विकास तेजी से हुआ है.


किसी भी हालत में इस विकास को रोका जाना देश के लिए हितकारी नहीं होगा. आज देश में इस बहस को शुरू करने की जरूरत है कि इन नयी प्रौद्योगिकियों को किस प्रकार से बढ़ावा देना है, ताकि एक ओर देश दुनिया में इस क्षेत्र में अग्रणी बन सके, तो दूसरी ओर उपयुक्त प्रौद्योगिकी के चयन के द्वारा देश के सभी प्रकार के युवाओं, चाहे वे कुशल हैं अथवा अकुशल, सभी को रोजगार भी मिले.


देश रोबोट उत्पादन, ड्रोन उत्पादन और आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस में नयी ऊंचाइयां छू रहा है. इस प्रवृत्ति को बढ़ावा देते हुए दुनिया में अपना परचम लहराने की जरूरत है. लेकिन, अपने देश की जरूरत के मुताबिक ही इन तकनीकों को भारत में अपनाने की जरूरत है.

सौजन्य - प्रभात खबर।

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Portion control (The Indian Express)

Written by Thomas Zacharias

The problem of food waste is a relatively modern one. India is an ancient civilisation and we have been prudent about food for millennia.

Recently, on a food research trip to the Garhwal region of Uttarakhand, I watched a rather extraordinary traditional ritual. The entire mountain village of Satta in Tons Valley came together to slaughter, cook and honour a goat they had raised as a community for close to a year. Every part of the animal from head to tail was turned into something useful or delicious. Nothing was wasted. The community’s frugality is in stark contrast to how meat is consumed in most parts of urban India today, where the prime cuts are usually prized.


The problem of food waste is a relatively modern one. India is an ancient civilisation and we have been prudent about food for millennia. Our parents and grandparents, too, once approached food and cooking with the same prudence. Yet, somewhere along the way, we lost sight of this “waste not, want not” mentality.


Nearly 40 per cent of the food produced in India is wasted every year due to fragmented food systems and inefficient supply chains — a figure estimated by the Food and Agricultural Organisation (FAO). This is the loss that occurs even before the food reaches the consumer.



There is also a significant amount of food waste generated in our homes. As per the Food Waste Index Report 2021, a staggering 50 kg of food is thrown away per person every year in Indian homes. This excess food waste usually ends up in landfills, creating potent greenhouse gases which have dire environmental implications. Meanwhile, we continue to be greenwashed into amassing more “organic” and “sustainable” products than we really need.


This has been a problem for decades, and is worsening with time. It was only when the COVID-19 pandemic came along in 2020 that many of us began taking note. Affluent Indians were suddenly inconvenienced by things otherwise taken for granted, like procuring groceries or worrying about how long their supplies would last. We came to realise that the food we eat goes far beyond the few bites it takes for us to finish it. We started becoming more conscious of our food choices.


The pandemic not only exposed the problems on food waste but also compounded them. In the wake of the lockdown imposed last year, surplus stocks of grain — pegged at 65 lakh tonnes in the first four months of 2020 — continued to rot in godowns across India. Access to food became extremely scarce for the poor, especially daily-wage labourers. Although essential commodities were exempt from movement restrictions, farmers across the country struggled to access markets, resulting in tonnes of food waste. Meanwhile, instinctive hoarding by the middle class disrupted the value chain, further aggravating the situation.


So how can we, as individuals, bring about change? The astonishing statistics of food waste attributed to households and their irresponsible consumption patterns means that change needs to begin in our own homes. Calculated purchasing when buying groceries, minimising single-use packaging wherever possible, ordering consciously from restaurants, and reconsidering extravagant buffet spreads at weddings can go a long way. At the community level, one can identify and get involved with organisations such as Coimbatore-based No Food Waste which aim to redistribute excess food to feed the needy and hungry.


A strong sense of judiciousness in how we consume our food is the next logical step. We must attempt to change our “food abundance” mindset to a “food scarcity” one, working our way towards a zero-waste end goal. And for the food that is left behind? Feed someone else or, at the very least, compost it so it doesn’t end up in landfills. Be open to incorporating nose-to-tail cooking when it comes to meat and seafood (fish head makes a fantastic curry!). The roots, shoots, leaves and stalks of most vegetables are perfectly edible. Regional Indian recipes like surnoli, a Mangalorean dosa made with watermelon rind, or gobhi danthal sabzi made with cauliflower stalks and leaves in Punjab, are born out of the ideas of frugality and respect for our food. Bengalis adopt a root-to-shoot philosophy throughout their cuisine — thor ghonto is a curry comprising tender banana stems, while ucche pata bora are fritters made with bitter gourd leaves.


You can start with influencing simple decisions about your own food consumption, and then get people in your immediate community to join. Acquaint yourself with and support initiatives proactively working towards reducing food waste, such as Adrish, India’s first chain of zero-waste concept stores, which is focused on getting people to shift from harmful, artificial consumption to an eco-friendly, zero-waste lifestyle. Incidentally, adrish translates to “mirror”. And a long, hard look at ourselves and the way we consume is, perhaps, what we need right now to begin making even a small difference.


 The writer was, until recently, chef partner, The Bombay Canteen, Mumbai

Courtesy - The Indian Express.

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Why Haryana’s wall hurts: Talent mobility is pivotal to higher competitiveness of the Indian tech sector (TOI)

Debjani Ghosh

The writer is President of Nasscom


The Indian tech sector has been super competitive because it has always put a premium on innovation, the foundation of which has been laid on new-age skills, particularly digital. Even in the pandemic year, we were amongst the few industries to grow and our secret sauce was the unwavering focus on our most important asset – our people. Through the crisis, the companies never stopped investing heavily in upskilling their people. In fact, they did even more than before.


That’s why, deep concerns were raised when the new Haryana State Employment of Local Candidates Act, 2020, came to light. Ours is an industry that puts talent above everything else, and it wasn’t surprising that 80% of IT-ITeS companies surveyed by Nasscom are worried about the negative impact on future business operations and the overall investment climate – due to a reservation-based approach. A majority have expressed that shifting operations to other states/ countries is an option. Since the Act applies to new hires, the impact will be felt in 1-2 years, so we don’t have much time.


The state of Haryana houses 500-odd IT-ITeS companies employing 4 lakh people directly, of which 37% or roughly 1.5 lakh current jobs will be impacted by this Act. The survey also revealed that 81% of current employees earning up to Rs 50,000 per month are from outside the state – a reflection of what the overall salary pie chart looks like. Under this Act future recruitment will be under immense pressure because the compliance burden will increase disproportionately, and talent diversity will come a cropper.


But the onerous challenge is the skills gap, both soft and technical, seen in the state where salaries are less than Rs 50,000 a month with huge inadequacy particularly in AI, ML, R&D skills, data science and the like. In the borderless world, even a faint whiff of protectionism to safeguard local jobs is going to be counterproductive. Instead, it should be seen as an opportunity, with industry and industry bodies playing an enabling role, to bridge skills gaps and empower young talent in Haryana to be amongst the most sought after.


This isn’t unique to the state. Across the spectrum, individuals, companies, and governments have to focus on upskilling/ reskilling to stay relevant. Ultimately, it’s the individual’s responsibility but our socio-economic structures (companies we work for or the state we reside in) have a key role in enabling an ecosystem that supports skilling, reskilling and encourages innovation. The focus must shift from guaranteed employment to employability.


When MNCs invest in India (as we have seen with our GCC or global capability centre clients) and set up massive operations in a particular state (often these centres are amongst the client’s largest facilities outside of their country of origin), they do so by looking at “Indian talent”. The canvas is always much larger and never of restrictive state boundaries.


It is also worthwhile to note that more than 21% of the IT industry segment in the state of Haryana are GCCs (extrapolating survey findings). The government is seen as a great enabler in these transformational journeys, and it is for good reason that the ease of doing business index continues to be improved upon greatly, every year.


The hybrid model that we have adopted to emerge stronger from the crisis is largely contact-less and to date, a vast majority of the IT companies continue to operate efficiently through remote-working. The fresh telecom guidelines issued for other service providers or OSPs last year have hugely facilitated remote working, and in the process, the industry expanded the available talent base. Besides, and while continuing to work extensively with both the Centre and state governments, it is so encouraging to see their immense enthusiasm in driving a trillion-dollar digital economy and positioning India as a global hub for digital talent.


Hence, this Act is utterly surprising. FY21 notched 1.7 million people as digitally skilled and in less than 4 years, this number should double. Today, there’s a massive unmet digital demand – almost 8x the size of the available fresh digital talent pool – and talent mobility restriction is the last thing we want.


A major shift is also about having a flexible workforce and the rise of the gig economy. 60% of tech companies (much higher than the overall average, which is 49% of Indian companies) engage with gig workers who aren’t constrained by borders. Software product companies, in particular, are emerging as gig employers – nearly 30% have more than 40% of the overall headcount as gig talent. Again, extrapolating the Nasscom survey results, in Haryana, roughly 14% of the IT industry segment are software product companies.


Startups, in particular, are symbolic of flexibility. Putting constraints on who they can hire will only impinge on their speed and their ability to outmanoeuvre larger competitors. I am not implying that they can get away without investing in talent upskilling, but is there a need to put an extra compliance burden while they continue to scout for best-in-class talent?


The extreme confidence and brand equity that this industry has earned from its global and domestic clients is laid on a robust foundation of best-in-class talent which is also celebrated for diversity and inclusivity. The goal that we have set for ourselves – great economic prosperity through tech adoption – will be met, when there’s a premium on fresh ideas leading to innovation, and that’s why putting restrictions on talent mobility is not going to cut it.

Courtesy - TOI

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Size enemy right: Movement curbs only stop healthcare access and economic activity, not this Covid wave (TOI)

Times of India’s Edit Page team comprises senior journalists with wide-ranging interests who debate and opine on the news and issues of the day.


In a week marked by sharp contrasts, India demonstrated its awesome vaccination capacity notching 4.3 million inoculations in a day, while also recording the highest daily infection count globally. The fatality rate is also uncomfortably high. Clearly 5, 6 or 10 million daily vaccinations are within our reach. Yet we are stumbling badly. Despite beating down the first peak without lockdowns, panicky reactions to the second wave have set in. Markets, consumption trends and service sector pillars like retail chains, hotels and malls have begun to feel the pressure of a new round of lockdowns, movement restrictions and night curfews acutely. A repeat of last year’s dehumanising migrant worker exodus mustn’t happen.


The emergent situation calls for rational responses, with a keen understanding of what each stakeholder can promise and deliver. Indian Medical Association has urged that vaccination be opened to all adults. In response Centre must reveal the constraints, including doses in stock or other limitations of supply, that justify continuing with highly restrictive age-wise inoculation. Citizens will accept government’s explanation and patiently await their turns if production capacity needs ramping up. As of now, however, information asymmetry and over-centralisation make long-term vaccination planning a near impossibility for other stakeholders, even giving states excuses for irrational lockdowns.


Bharat Biotech has reportedly sought Rs 150 crore to expand Covaxin manufacturing capacity. Funds must be sanctioned quickly for all such reasonable demands. Centre must also encourage administrations down the line to innovate local vaccination strategies. Maharashtra wishes to inoculate the 25+ age group, Delhi is looking at all adults. These plans are on hold pending central concurrence, even as several instances of local governments quietly improvising to widen vaccine access are known.


But to be clear, states’ projecting tough love by announcing quasi lockdowns is a cure truly worse than the disease. Take, for instance, preventing Mumbai food delivery executives from working after 8pm. Such whacky moves will not stop the coronavirus but will certainly wound the economy and livelihoods. Instead, states should do themselves a favour by promoting masking and freely distributing masks, pressuring Centre to decentralise vaccination, and improving access to medical facilities, which  the mobility curbs retard. Delhi simultaneously allowing 24×7 vaccination and announcing night curfews exemplifies governance on steroids, as if “full of sound and fury, signifying nothing”. We can beat this wave too – but with common sense and civic responsibility, masks and vaccinations at full tilt.

Courtesy - TOI

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संबंध और संतुलन (जनसत्ता)

पिछले कुछ सालों से विश्व भर में जिस तरह परिस्थितियां बदल रही हैं, कूटनीतिक स्तर पर अलग-अलग देशों के बीच नई समझदारी विकसित हो रही है, उसमें भारत के लिए यह जरूरी है कि बदलते अंतरराष्ट्रीय समीकरणों के बीच अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करे। हालांकि समकक्ष या फिर विपरीत ध्रुवों में बंटी दुनिया में भारत की हैसियत अब तक निश्चित रूप से ऐसी रही है जिसकी अनदेखी करना किसी के लिए संभव नहीं हो सका।

मगर जिस तेज रफ्तार से नए वैश्विक घटनाक्रम सामने आ रहे हैं, उसमें उसी के मुताबिक देशों के बीच संबंध भी नए सिरे से परिभाषित हो रहे हैं। इस लिहाज से देखें तो रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव की ताजा भारत यात्रा से कुछ अहम संकेत उभरते हैं। गौरतलब है कि इस दौरान भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने अपने रूसी समकक्ष के साथ परमाणु, अंतरिक्ष और रक्षा क्षेत्र में लंबे समय से चली आ रही भागीदारी और दोनों देशों के बीच संबंधों के विविध आयामों सहित भारत-रूस वार्षिक शिखर सम्मेलन की तैयारियों पर विस्तार से बात की।

इसमें कोई संदेह नहीं कि भारत और रूस के बीच लंबे समय से मजबूत संबंध रहे हैं और इसे विश्व पटल पर बराबरी और गरिमा पर आधारित ठोस सहभागिता के तौर पर देखा जाता रहा है। लेकिन यह भी सच है कि बीते कुछ सालों में इस मोर्चे पर एक अघोषित शिथिलता आई है। इसकी मुख्य वजह शायद यह है कि अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य में जैसे नए कूटनीतिक समीकरण बन रहे हैं, उससे भारत पूरी तरह निरपेक्ष नहीं रह सकता है। खासतौर पर तब जब किसी सामान्य उथल-पुथल से भी भारत के हित प्रभावित हो सकते हों।

शीतयुद्ध के बाद के दौर में वैश्विक परिप्रेक्ष्य में बेशक शांति और सहयोग का नारा मजबूत हुआ है, मगर अब भी अमेरिका और रूस के बीच प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से जैसी खींचतान चलती रहती है, उसमें अलग-अलग ध्रुवों के संतुलन कभी भी नया आकार ले सकते हैं।

भारत इन संकेतों के मद्देनजर हमेशा सजग रहा है। यही वजह है कि एक ओर इसने जहां अमेरिका के साथ कई मोर्चों पर अपने संबंधों को नया आयाम दिया है तो दूसरी ओर रूस के साथ अपने पुराने और मजबूत रिश्तों पर भी आंच नहीं आने दी।


दरअसल, इस साल के आखिर में भारत और रूस के बीच सालाना शिखर सम्मेलन होने जा रहा है। इस स्तर के आयोजन के लिए पूर्व तैयारी की जरूरत होती है, इसलिए दोनों विदेश मंत्रियों के बीच इस पहलू पर विशेष चर्चा हुई। लेकिन परमाणु, अंतरिक्ष और रक्षा के क्षेत्र में भारत और रूस के बीच जैसी भागीदारी का लंबा इतिहास रहा है, नई परिस्थितियों में इस मसले पर भी विचार स्वाभाविक ही है। इसके अलावा, ऊर्जा के क्षेत्र में भारत और रूस के बीच बढ़ते सहयोग के साथ-साथ क्षेत्रीय और वैश्विक मामलों पर भी ठोस बातचीत हुई। खासतौर पर दुनिया अभी जिस तरह महामारी की चुनौती से जूझ रही है, उसमें कोविड-19 रोधी टीके के बारे में चर्चा वक्त की जरूरत है।


इसके समांतर लावरोव की यात्रा से पहले रूसी दूतावास के इस संदेश को ध्यान में रखने की जरूरत है कि शुभेच्छा, आम सहमति और समानता के सिद्धांतों पर आधारित सामूहिक कार्यों को रूस काफी महत्त्व देता है और टकराव एवं गुट बनाने जैसे काम को खारिज करता है। लेकिन पिछले कुछ समय से कूटनीतिक स्तर पर नए घटनाक्रम के बीच जिस तरह ‘क्वाड’ का गठन हुआ और प्रकारांतर से इसके जवाब में रूस और चीन की पहल पर क्षेत्रीय सुरक्षा संवाद मंच का प्रस्ताव आया है, उसे कैसे देखा जाएगा! ऐसे में भारत को संतुलन अपने पक्ष में साधने के लिए अतिरिक्त प्रयास करने होंगे।

सौजन्य - जनसत्ता।
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धधकते जंगल (जनसत्ता)

हफ्ते भर से उत्तराखंड के ज्यादातर जिलों में जिस तरह से जंगल धधक रहे हैं, उससे गंभीर खतरा खड़ा हो गया है। राज्य का बड़ा क्षेत्रफल आग की लपटों में घिरा हुआ है। हालात की गंभीरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि आग बुझाने के लिए केंद्र सरकार ने राज्य में हेलिकॉफ्टर भेजे हैं और सेना को भी इस काम में लगाया है।

आग से वन संपदा तो नष्ट हो ही रही है, जनजीवन भी खतरे में है। कई ग्रामीण इलाकों में कच्चे घर और मवेशी भी इसमें स्वाहा हो गए। पहाड़ के जंगलों में आग की ऐसी घटनाएं कोई नई बात नहीं हैं, लेकिन पिछले कुछ सालों में जंगलों में आग की घटनाओं में जिस तरह से तेजी आई है, वह नए संकट की ओर इशारा कर रही है और यह संकट बिगड़ते पर्यावरण का भी सूचक है। आमतौर पर आग अगर बड़े पैमाने पर नहीं फैलती है तो यह अपने आप बुझ भी जाती है। लेकिन जब तेज हवा चल रही होती है तो आग को फैलने से रोक पाना संभव नहीं होता। उत्तराखंड के जंगलों में लगी आग बेकाबू हो जाने के पीछे कारण यही है कि इसने बहुत बड़े हिस्से को अपनी चपेट में ले लिया है।

भारत में हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, मध्यप्रदेश, ओड़िशा और पूर्वोत्तर के इलाकों में वनाग्नि की घटनाओं के पीछे प्राकृतिक कारण तो हैं ही, मानवीय गतिविधियां भी कम जिम्मेदार नहीं हैं। इसलिए पर्वतीय वनों में आग पर काबू पाने की चुनौती दोहरी हो जाती है। वनों में सूखी लकड़ियां, पत्तियां और घास के ढेर जैसे ही किसी भी वजह से उत्पन्न चिंगारी के संपर्क में आते हैं तो इन्हें धधकते देर नहीं लगती और फिर पेड़ों के जरिए थोड़े ही वक्त में आग बड़े इलाके को घेर लेती है। मुश्किल यह भी है कि पहाड़ी क्षेत्रों का भूगोल और बनावट बेहद जटिल होती है, इसलिए आसानी से आग लगने का पता भी नहीं चल पाता।


उत्तराखंड में स्थिति फिलहाल गंभीर इसलिए भी हो गई है कि प्रदेश के तेरह में से ग्यारह जिलों में जंगल लपटों में घिरे हैं। ऐसे में सब जगह एक साथ आग बुझाना मुश्किल काम है। घने जंगलों में पहुंच पाना यों भी आसान नहीं होता। ऐसे में नागरिक अपने प्रयासों से आग बुझाने के जो तरीके काम में लाते हैं, उनकी भी सीमाएं होती हैं। जिन घने जंगलों में लोगों और गाड़ियों का पहुंच पाना संभव नहीं होता है और जहां बड़ा क्षेत्रफल आग में घिरा हो, वहां हेलिकॉप्टर जैसे साधन इस्तेमाल किए जाते हैं। लेकिन जब आग तेजी से फैलती जाए तो ये सारे उपाय भी नाकाम होने लगते हैं।


उत्तराखंड देश के उन चुनिंदा राज्यों में है जो अपने प्राकृतिक संसाधन और जैव विविधता की समृद्धि के लिए जाने जाते हैं। वनस्पतियों और वन्यजीवों की कई दुर्लभ प्रजातियां यहां हैं। ऐसे में वन्यजीवों और वनोपज की तस्करी करने वाले और भूमाफिया भी जंगलों में आग लगाने से बाज नहीं आते। कई बार पहाड़ी इलाकों में आग के इस्तेमाल में लापरवाही भी वनाग्नि का कारण बन जाती है। पिछले पांच साल में जंगल में आग की घटनाओं में पचास फीसद से ज्यादा वृद्धि हुई है और हजारों करोड़ का नुकसान अलग। वनाग्नि की समस्या जिस तरह से गहराती जा रही है, उसे देखते हुए राज्य सरकार और वन विभाग को अपना निगरानी तंत्र और आपदा प्रबंधन दुरुस्त करने की भी जरूरत है। उत्तराखंड के गठन को लगभग दो दशक हो चुके हैं, लेकिन इतने साल बाद भी आज तक कोई ठोस वन नीति नहीं बनी, न ही ऐसी घटनाओं से कोई सबक लिया गया। इसलिए ये लपटें हमें झुलसा रही हैं।

सौजन्य - जनसत्ता।
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Mayhem in Myanmar: On the violence during Myanmar's Armed Forces' Day (The Hindu)

The violence of March 27, Myanmar’s Armed Forces’ Day, in which over 100 protesters were killed, has sent shockwaves. India, which initially expressed its “deep concern” and called for the “rule of law” and “the democratic process” to be upheld, had stopped short of directly condemning the junta’s violence. It had also sent a representative to attend Saturday’s celebrations. But on the day India’s defence attaché, along with the representatives of seven other countries, including China, Pakistan and Russia, was attending a massive military parade in Naypyidaw, the junta was gunning down its people. The violence and the prolonged crisis seem to have triggered a stronger response from several capitals, including New Delhi. On April 2, India, which has cultivated deep ties with Myanmar’s civilian and military leaderships, condemned “any use of violence” and called for “restoration of democracy”. There is growing international appeal for ending the bloodshed, but the junta seems unperturbed. Even after the March 27 killings, protests and regime violence continue. According to independent agencies, the junta has killed over 570 civilians, including 46 children, since the February 1 coup.


When the regime resorted to violence, it may have calculated that swift repression would extinguish the fire for freedoms, like in 1988 and 2007. But there is a fundamental difference this time. If in the past the protests erupted against the continuing military rule, in February, the military usurped power from an elected government after a decade of partial democracy. Those who enjoyed at least limited freedoms, first under the transition government and then under Aung San Suu Kyi, have built a stronger resistance to the junta this time. Street protests are not the only challenge the Generals are facing. The banking system is on the brink of collapse with most staff on strike. Cash is scarce and prices of essential goods are rocketing. Industrial workers are also on strike, bringing the pandemic-battered economy to its knees. The Generals’ efforts to bring bank and government employees and port and industrial workers back to work have been unsuccessful so far. Worse still, armed insurgent groups have thrown their weight behind the protesters, triggering fears of a wider civil conflict. The Generals are unlikely to give up power on their own. They should be nudged to end the violence and make concessions. Initially, India and China, both vying for influence in Myanmar, were ambivalent in condemning the junta’s violence because they did not want to antagonise the Generals. But an unstable Myanmar is not in the interest of any country. India, China and other countries in ASEAN should heap pressure on the junta and work towards restoring democracy in Myanmar, which is the only way forward.

Courtesy - The Hindu.

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Fits and starts: On India-Pakistan dialogue process (The Hindu)

After a month of moves and messages that indicated a détente, events last week appear to have slammed the brakes on the India-Pakistan dialogue process. The moves began with a ceasefire announcement at the LoC in February, followed by Indus water talks, sporting visas and other measures, including official speeches by Pakistan’s top leadership pushing for regional rapprochement, and salutary messages exchanged between Prime Ministers Narendra Modi and Imran Khan. Despite the growing bonhomie, however, External Affairs Minister S. Jaishankar and Pakistan’s Foreign Minister Shah Mahmood Qureshi decided not to meet or even exchange greetings at a conference in Dushanbe last week. And then days later, Mr. Qureshi led a charge of Cabinet Ministers who opposed a move by Pakistan’s Economic Coordination Committee to reopen imports of Indian cotton and sugar, arguing that it would violate Pakistan’s commitments on Kashmir. Subsequently, Mr. Khan announced he was dropping the import proposal he had made in his capacity as Commerce Minister, and that ties with India would not be normalised unless the Modi government revoked its steps of August 2019, on Jammu and Kashmir and Article 370. New Delhi, which has chosen not to comment on the events of the past month, and has not denied reports that claimed India-Pakistan moves were part of a back-channel dialogue facilitated by other countries, has also made no comment on Mr. Khan’s U-turn.


While such swings have been common in the India-Pakistan engagement, the present scenario poses questions. If talks are indeed under way behind the scenes, it is unclear why Pakistan’s import decision was not better coordinated before being publicly announced. The move followed a speech by Pakistan’s Gen. Bajwa where he stressed the need for geo-economics, trade and connectivity to be prioritised for regional prosperity. So, if it is not the all-powerful Army Chief or the ‘Pakistani establishment’ that is playing the “spoiler”, the Khan government must identify who it is. It is significant that New Delhi has chosen not to press its advantage over the embarrassing confusion in Pakistan’s stand, or react to its unworkable demand on Article 370, which has drawn India’s sharp comments in the past. This might indicate that the dialogue that has reportedly been on for months has been paused and much will depend on whether any other outlooked steps, including the restoration of High Commissioners in each other’s capitals and LoC trade that was suspended for security reasons in 2019, or commitments from Pakistan on cross-border terrorism, are announced next. If the nascent re-engagement is to have any chance, there must be also more clarity on what the two governments have decided to embark upon and hope to achieve from it.

Courtesy - The Hindu.

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फिर लगी आग, धधकते जंगल से आखिर कैसे निपटें (अमर उजाला)

रोहित कौशिक 

उत्तराखंड के जंगल एक बार फिर धधक रहे हैं। इस राज्य में एक अक्तूबर, 2020 से लेकर चार अप्रैल 2021 की सुबह तक जंगलों में आग लगने की 989 घटनाएं हो चुकी हैं। इन घटनाओं में 1297.43 हेक्टेयर जंगल जल चुके हैं। हाल ही में मध्यप्रदेश के उमरिया जिले में स्थित बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में भी भीषण आग लग गई थी। यह दुर्भाग्यपूर्ण ही है कि कभी प्राकृतिक कारणों से जंगलों में आग लगती है, तो कभी अपने निहित स्वार्थों के कारण जानबूझकर जंगलों में आग लगा दी जाती है। इस वर्ष फरवरी और मार्च का महीना औसत से ज्यादा गर्म रहा। इसलिए उत्तराखंड के जंगलों में भी आग लगने की आशंकाएं पहले ही बढ़ गई थी। कुछ समय पहले भी जंगलों में लगी आग से उत्तराखंड की जैवविविधता एवं पर्यावरण को काफी हानि हुई थी।



दरअसल जंगलों की आग से न केवल प्रकृति झुलसती है, बल्कि प्रकृति के प्रति हमारे व्यवहार पर भी सवाल खड़ा होता है। गर्मियों के मौसम में उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर के जंगलों में आग लगने की घटनाएं अक्सर प्रकाश में आती रहती हैं। जंगलों में लगी आग से जान-माल के साथ-साथ पर्यावरण को भारी नुकसान होता है। पेड़-पौधों के साथ-साथ  जीव-जन्तुओं की विभिन्न प्रजातियां जलकर राख हो जाती हैं। जंगलों में विभिन्न पेड़-पौधे और जीव-जन्तु मिलकर समृद्ध जैवविविधता की रचना करते हैं। पहाड़ों की यह समृद्ध जैवविविधता ही मैदानों के मौसम पर अपना प्रभाव डालती हैं। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि ऐसी घटनाओं के इतिहास को देखते हुए भी कोई ठोस योजना नहीं बनाई जाती है। एक अध्ययन के अनुसार, पूर्व एशिया, दक्षिण एशिया, दक्षिण पूर्व एशिया और समुद्र तटीय क्षेत्रों में जंगलों में आग लगने की समस्या बढ़ती जा रही हैं।



इस आग से लोगों का स्वास्थ्य, पर्यटन, अर्थव्यवस्था और परिवहन उद्योग गंभीर रूप से प्रभावित हो रहा है। पूर्व एशिया में तो आग की बारंबारता, उसका पैमाना, उससे होने वाली क्षति और आग बुझाने में होने वाला खर्च सभी कुछ बढ़ा है। जंगल में आग लगने की घटनाओं में वृद्धि के पीछे ज्यादा समय तक सूखा पड़ने, मौसम में बदलाव, बढ़ते प्रदूषण जैसे बहुत से कारक हैं। गौरतलब है कि दक्षिण एशिया में आग से नष्ट होने वाले 90 फीसदी जंगल भारत के हैं। पहाड़ों पर चीड़ के वृक्ष आग जल्दी पकड़ते हैं। कई बार वनमाफिया अपने स्वार्थ के लिए वनविभाग के कर्मचारियों के साथ मिलकर जंगलों में आग लगा देते हैं। यह विडंबना ही है कि पहाड़ों के जंगल हमारे लोभ की भेंट चढ़ रहे हैं। 

 

जंगलों में यदि आग विकराल रूप धारण कर लेती है, तो उसे बुझाना आसान नहीं होता है। कई बार जंगल की आग के प्रति स्थानीय लोग भी उदासीन रहते हैं। दरअसल हमारे देश में ऐसी आग बुझाने की न तो कोई उन्नत तकनीक है और न ही कोई स्पष्ट कार्ययोजना। विदेशों में जंगल की आग बुझाने के लिए युद्ध स्तर पर कार्य होता है। पिछले दिनों नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने जंगलों की आग पर तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा था कि पर्यावरण मंत्रालय और अन्य प्राधिकरण वन क्षेत्र में आग लगने की घटना को हल्के में लेते हैं। जब भी ऐसी घटनाएं घटती हैं, तो किसी ठोस नीति की आवश्यकता महसूस की जाती है। लेकिन बाद में सब कुछ भुला दिया जाता है। 


जंगलों में आग लगने से पर्यावरण में कार्बन की मात्रा बढ़ जाती है, जिससे तापमान में वृद्धि होने की आशंका रहती है। पिछले दिनों विश्व बैंक ने चेतावनी दी थी कि यदि तापमान वृद्धि पर समय रहते काबू नहीं पाया गया, तो दुनिया से गरीबी कभी खत्म नहीं होगी। समुद्र का जलस्तर बढ़ने से बांग्लादेश, मिस्र, वियतनाम और अफ्रीका के तटवर्ती क्षेत्रों में खाद्यान्न उत्पादन को तगड़ा झटका लगेगा, जबकि दुनिया के अन्य हिस्सों में सूखा कृषि उपज के लिए भारी तबाही मचाएगा। इससे दुनिया में कुपोषण के मामलों में वृद्धि होगी। इसके साथ ही उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में तूफान और चक्रवातों का प्रकोप बढ़ेगा। इसलिए अब समय आ गया है कि हम जंगलों की आग से निपटने के लिए ठोस योजनाएं बनाएं।

सौजन्य - अमर उजाला।

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बीजापुर में 22 जवानों की शहादत दुखद, इस हमले का सबक (अमर उजाला)

अजय साहनी  

छत्तीसगढ़ के बीजापुर में नक्सलियों के साथ हुई मुठभेड़ में सुरक्षा बलों के 22 जवानों की शहादत दुखद है और इसकी जितनी निंदा की जाए, वह कम है। ऐसे हमले बार-बार होते रहते हैं। हालांकि इस हमले के ज्यादा ब्योरे अभी सामने नहीं आए हैं, पर इससे पहले जो ऐसे हमले हुए हैं, उनमें अक्सर यह देखा गया है कि आमतौर पर सुरक्षा बलों की कोई न कोई भारी चूक रहती है। अभी जो इस हमले की तस्वीरें दिखी हैं, उसमें नजर आता है कि बहुत से शहीद हुए जवानों के शव एक ही जगह पड़े थे। इसका मतलब है कि वे बहुत पास-पास चल रहे थे। यह भी रिपोर्ट आ रही है कि ये दो पहाड़ी के बीच से गुजर रहे थे और ऊपर से इन पर मशीनगन, ग्रेनेड लांचर, आदि, से हमला किया गया। इससे लगता है कि इन्हें जाल में फंसाकर मारा गया है। 



ऑपरेशन से संबंधित सुरक्षा बलों की मानक प्रक्रिया के जो दिशा-निर्देश होते हैं, अगर उनका पालन किया जाता, तो इतने ज्यादा जवान नहीं मारे जाते। ऑपरेशन से संबंधित सुरक्षा बलों की जो मानक प्रक्रिया होती है, उसमें अग्रिम दस्ता भेजकर इलाके का सर्वेक्षण किया जाता है, उसके बाद ऑपरेशन को भी बिखर कर अंजाम दिया जाता है। सुरक्षा बल इकट्ठा होकर नहीं चलते हैं, ऐसे में अगर कहीं हमला भी होता है, तो कम नुकसान होता है और उतनी देर में शेष सुरक्षा बल जवाबी कार्रवाई कर हावी हो जाते हैं। माओवादी तो हर वक्त इस ताक में रहते हैं कि सुरक्षा बल चूक करें और जब सुरक्षा बल कोई बड़ी चूक करते हैं, तो नुकसान भी बड़ा होता है। 



इसमें यह भी मालूम हो रहा है कि सुरक्षा बलों को खुफिया जानकारी मिली थी कि नक्सल कमांडर माडवी हिड़मा भी उस इलाके में मौजूद था, जिसके खिलाफ सुरक्षा बल सर्च ऑपरेशन करने निकले थे। यह भी हो सकता है कि यह खुफिया जानकारी नक्सलियों ने ही इनके पास भिजवाई हो, अपने जाल में फंसाने के लिए, क्योंकि नक्सली बहुत तैयारी में थे और जहां यह हमला हुआ है, वह जगह सीआरपीएफ के कैंप से बहुत ज्यादा दूर नहीं है। बिना जांच के अभी यह कह देना कि खुफिया विभाग की चूक नहीं थी, यह एक बयानबाजी भर है, जिसका कोई महत्व नहीं है। जांच के बाद ही असलियत का पता चलेगा कि इंटेलिजेंस की क्वालिटी क्या थी, और फोर्स से कहां चूक हुई। 


जहां यह हमला हुआ है, उस क्षेत्र में सुरक्षा बल रोज पेट्रोलिंग पर निकलते हैं। इसलिए यह भी नहीं कह सकते कि वहां की भौगोलिक स्थिति से अनजान होने के कारण सुरक्षा बल इसका शिकार हुए। मुझे लगता है कि सुरक्षा बलों की रणनीति में गड़बड़ी हुई है और मानक प्रक्रियाओं पर ठीक से अमल नहीं किया गया होगा। अगर आप दो पहाड़ी के बीच से निकल रहे हैं, तो बुनियादी सावधानी तो बरतनी चाहिए थी। अगर उस इलाके का सर्वे किया जाता और पहाड़ी के ऊपर एक-दो जवान जाते, तो उनके साथ मुठभेड़ होती या वे लौटकर खबर देते। ऐसे में एकाध जवान ही मारा जाता। इसके अलावा मार्चिंग का पैटर्न होता है, जिसमें जवान एक-दूसरे से दूरी बनाकर चलते हैं। फासले पर चलने से भी कम से कम जवान मारे जाते, बाकी लोग सतर्क होकर जवाबी कार्रवाई करते। 


जहां तक माओवादियों की ताकत या कमजोरी देखने की बात है, तो उसके लिए ट्रेंड देखने की आवश्यकता है। साउथ एशिया टेररिज्म पोर्टल के मुताबिक, ट्रेंड दिखा रहा है कि 2010 में नक्सली हमलों में 1179 लोग मारे गए थे, लेकिन 2020 में 239 आदमी मारे गए। जाहिर है, हिंसा की घटनाएं कम हो गईं। एक जमाने में 20 प्रदेशों  के 223 जिलों में माओवादी फैले थे, उसमें से 66 ऐसे जिले थे, जिन्हें सर्वाधिक प्रभावित जिला बताया जा रहा था। आज हमारे आंकड़ों के मुताबिक, कुल 9 प्रदेशों में 41 जिले हैं, जहां माओवादी फैले हुए हैं और उसमें से दो या तीन जिले ही सर्वाधिक प्रभावित रह गए हैं। पूरे के पूरे इलाके खाली हो गए हैं। पश्चिम बंगाल में पिछले चार साल से एक भी आदमी नहीं मारा गया। बिहार, आंध्र प्रदेश का आप नाम नहीं सुनते हैं, इस वक्त सिर्फ छत्तीसगढ़, ओडिशा का थोड़ा-सा हिस्सा और थोड़ा-सा हिस्सा झारखंड में बाकी रह गया है। 


और छत्तीसगढ़ के भी मात्र तीन जिले हैं, जो माओवाद से ज्यादा प्रभावित हैं। माओवादी कमजोर जरूर हुए हैं, पर यह नहीं कहा जा सकता कि माओवादी खत्म हो गए हैं। यह सभी मानते हैं कि जिस इलाके में यह हादसा हुआ है और जहां सुरक्षा बल ऑपरेशन चला रहे हैं, वह माओवादियों का आखिरी किला है। अगर आप आंकड़े देखेंगे, तो पता चलेगा कि ज्यादातर तो नक्सली ही मारे जा रहे हैं, कुछेक सुरक्षा बल भी मारे जाते हैं और कुछ नागरिकों को नक्सली पुलिस का मुखबिर बताकर मार देते हैं।


नक्सली ऐसे हमले अपनी ताकत और अपना वर्चस्व दिखाने के लिए करते हैं। इससे नक्सलियों के बचे-खुचे कैडरों का मनोबल बढ़ता है और वे नए रंगरूटों की भर्ती करते हैं। पहले नक्सली बारूदी सुरंग बिछाकर हमले करते थे, लेकिन इस हादसे में आमने-सामने की लड़ाई हुई दिखती है। इसकी वजह है कि सुरक्षा बलों की गतिविधियां उस क्षेत्र में बढ़ी हैं, जिस कारण माओवादियों को बारूदी सुरंग बिछाने का मौका नहीं मिल पाता और वे आमने-सामने की लड़ाई के लिए विवश होते हैं। इस मामले में उन्होंने योजनाबद्ध तरीके से सुरक्षा बलों को फंसाकर आमने सामने की लड़ाई की, वरना वे आमने-सामने की लड़ाई से भी बचते फिरते हैं। कभी पूर्व प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह ने कहा था कि माओवाद देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा है, लेकिन आज ऐसा नहीं कहा जा सकता। फिर भी यह सवाल तो है कि माओवाद की समस्या से कैसे निपटा जाए। 


किसी भी हिंसक आंदोलन को रोकने और प्रभावित इलाकों पर वर्चस्व पाने के लिए बलों का प्रयोग करना जरूरी होता है। पर इस तरह नहीं, जैसे इस मामले में जंगल में 2,000 जवानों को लड़ने के लिए भेज दिया गया और वे माओवादियों के जाल में फंस गए। कई तरीके अपनाए जा सकते हैं। ड्रोन के इस्तेमाल से इलाके का सर्वेक्षण हो सकता है। विद्रोही गुट के नेतृत्व को धीरे-धीरे खत्म किया गया है, और आज कुछ ही कमांडर बच रहे हैं। इस तरह, जो-जो इलाके कब्जे में आते जाएं, वहां सरकार एवं सरकारी योजनाओं को प्रभावी तरीके से लागू करना चाहिए। सबसे अंत में विद्रोही गुटों के साथ बातचीत का रास्ता निकालना चाहिए – लेकिन यह तब हो, जब वे सुलह करने के लिए तैयार हो जाएं। तभी इस समस्या का निदान संभव है। 

सौजन्य - अमर उजाला।

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