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-Rajeev Kumar (Editor-in-chief)

Wednesday, January 13, 2021

चौकसी की सीमा (जनसत्ता)

पिछले कई दशकों का इतिहास यह बताने के लिए काफी है कि सीमा पर बेवजह तनाव की स्थिति बनाए रखना शायद पाकिस्तान की फितरत में शामिल हो चुका है। हालांकि हर ऐसे मौके पर जब भारत की ओर से उसे मुंहतोड़ जवाब मिलता है तब वह अगले कुछ समय के लिए शांत हो जाता है और विश्व समुदाय के सामने खुद को निर्दोष बताने की कोशिश करता है।

लेकिन पिछले कुछ महीनों से चीन की ओर से भी सीमा पर जिस तरह की बाधाएं खड़ी की जा रही हैं, वह भारत के लिए ज्यादा गंभीर चुनौती है। सही है कि भारत इस तरह के किसी बड़े संकट का भी आसानी से सामना करने के लिए तैयार है और अमूमन हर मौके पर इसने साबित भी किया है, मगर ऐसी परिस्थितियों में अनावश्यक होने वाली उथल-पुथल और परेशानी में ऊर्जा बर्बाद होती है।

दरअसल, पिछले कुछ समय से सीमा पर पाकिस्तान के साथ-साथ चीन ने भी जिस तरह के हालात पैदा कर रखे हैं, उसका कोई वाजिब कारण नहीं है। बल्कि प्रथम दृष्ट्या ही इसके पीछे भारत के प्रति उनका कपट से भरा हुआ बर्ताव दिखता है, जिसके जरिए वे अपनी विस्तारवाद की नीतियों को आगे बढ़ाना चाहते हैं।

यों अपने कपट और दुराग्रहपूर्ण रवैये के बावजूद उन्हें अब तक इस बात का अंदाजा हो गया होगा कि भारत की ताकत के बारे में उनका अंदाजा किस खोखली बुनियाद पर आधारित है और ठीक समय पर मोर्चे पर उन्हें कैसी चुनौती देखने को मिलती है। इसलिए सेना प्रमुख जनरल एमएम नरवणे ने यह ठीक ही कहा है कि पाकिस्तान और चीन मिल कर देश की सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बन चुके हैं।

उनके कपटपूर्ण सोच से होने वाले खतरे को अनदेखा नहीं किया जा सकता, मगर भारतीय सैनिक भी किसी स्थिति से प्रभावी तरीके से निपटने के लिए बहुत उच्च स्तर की लड़ाकू तैयारी के साथ मोर्चे पर हैं। इसके समांतर यह उम्मीद भी कूटनीति के लिहाज से समय के अनुकूल है कि भारत और चीन परस्पर और समान सुरक्षा के आधार पर सैनिकों की वापसी और तनाव कम करने के लिए एक समझौते पर पहुंच पाएंगे।

गौरतलब है कि पैंगोंग झील के दक्षिणी किनारे पर स्थित कुछ रणनीतिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों पर कब्जे को लेकर उठे विवाद के बीच सेना ने यह साफ कर दिया है कि वह देश के हितों और लक्ष्यों के अनुरूप पूर्वी लद्दाख में स्थिति कायम रखेगी। दूसरी ओर, पाकिस्तान के साथ लगी सीमा पर अक्सर कैसे हालात पैदा होते रहते हैं, यह जगजाहिर रहा है। खासतौर पर पाकिस्तान स्थित ठिकानों से संचालित आतंकवाद को अघोषित तौर पर राजकीय नीति के एक औजार की तरह इस्तेमाल किया जाता रहा है।

इसके अलावा, यह भी ध्यान रखने की जरूरत होगी कि चीन और पाकिस्तान के बीच सैन्य और असैन्य क्षेत्रों में सहयोग बढ़ रहा है। पिछले कई दशकों का इतिहास बताता है कि पड़ोस के ये दोनों देश आमतौर पर विश्वास का माहौल बनाने के बजाय किसी नाजुक मौके पर धोखे और कपट का सहारा लेते हैं। यानी भारत को ‘दो मोर्चों’ पर लगातार बने खतरे से निपटने के लिए तैयार रहना होगा।

सौजन्य - जनसत्ता।
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संकट का हल! (जनसत्ता)

किसान आंदोलन को लेकर सरकार का अब तक जो रवैया देखने को मिला, उस पर अदालत ने सोमवार को गहरी नाराजगी व्यक्त की थी और साफ कर दिया था कि वह इन कानूनों के अमल पर रोक लगा सकती है। मंगलवार को प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति एसए बोबडे की अध्यक्षता वाले तीन सदस्यीय पीठ ने आदेश जारी कर इन विवादित कानूनों पर अमल रोक दिया।

पीठ ने एक कमेटी भी बना दी है जो किसानों की समस्याओं और कानूनों को लेकर उत्पन्न आशंकाओं को सुनेगी और फिर अदालत को अपनी रिपोर्ट सौंपेगी। अदालत का यह कदम स्वागतयोग्य है। इसे न तो किसानों की जीत और न सरकार को झुकाने के प्रयास के रूप में देखे जाने की जरूरत है। अदालत ने किसान संगठनों से साफ-साफ कहा है कि गतिरोध दूर करने के लिए उन्हें भी कमेटी के समक्ष आना ही होगा। बिना उनके सहयोग के किसी भी तरह के हल की कोई गुंजाइश नहीं बनेगी। किसान संगठनों को यह बात गंभीरता से समझने की जरूरत है।

केंद्र सरकार और किसान संगठन अगर पहले ही अड़ियल रुख छोड़ कर कोई उचित और तार्किक समाधान निकलने का प्रयास करते तो गतिरोध इतना नहीं खिंचता। लेकिन किसान कानूनों की वापसी और न्यूनतम समर्थन मूल्य को कानूनी जामा पहनाने की मांग पर अड़े रहे और सरकार किसी भी सूरत में इन्हें वापस नहीं लेने की बात दोहराती रही।

ऐसी हठधर्मिता को कहीं से भी विवेकशीलता का परिचायक नहीं कहा जा सकता। वार्ता के नाम पर केंद्र सरकार जिस तरह मामले को खींचने में अपनी होशियारी समझती रही और नई-नई तारीखें देकर किसानों के धैर्य की परीक्षा लेती रही, किसी भी संवेदनशील सरकार से ऐसी अपेक्षा नहीं की जा सकती। आखिरकार सर्वोच्च अदालत को कड़ा रुख अख्तियार करते हुए यह कहने को मजबूर होना ही पड़ा कि किसानों की समस्या का हल निकालने में सरकार नाकाम रही है।

कोई भी समाधान तभी निकल पाता है जब दोनों पक्ष एक दूसरे की मजबूरी को समझते हुए लचीला रुख अपनाएं। किसान संगठनों ने अभी भी यही संकेत दिया है कि कानून वापसी से कम पर वे मानने वाले नहीं हैं। अगर ऐसा होता है तो कैसे समाधान निकलेगा! बल्कि बेहतर यह होगा कि अदालत पर भरोसा करते हुए किसान संगठन अब आंदोलन खत्म करने के बारे में सोचें। अब तो मामला अदालत के पास है और कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर अदालत जो फैसला दे, संबंधित पक्षों को उसका सम्मान करना चाहिए।

अदालत की यह चिंता वाजिब है कि कड़ाके की ठंड और बारिश जैसे प्रतिकूल हालात में भी दिल्ली की सीमाओं पर लाखों किसान मोर्चे पर डटे हैं। साठ से ज्यादा किसान ठंड से दम तोड़ चुके हैं। नए कृषि कानूनों के विरोध में खुदकुशी की घटनाएं भी सामने आई हैं। केंद्र सरकार के रुख से खफा किसानों ने गणतंत्र दिवस पर ट्रैक्टर मार्च निकालने का एलान कर दिया है।

पंजाब और हरियाणा में किसानों के हिंसा पर उतरने की घटनाओं ने भी चिंता पैदा कर दी। राजस्थान में भी किसानों ने दिल्ली-जयपुर राष्ट्रीय राजमार्ग को कई दिनों से बंद कर रखा है। कई राज्य सरकारें भी इन कानूनों के खिलाफ हैं, इसलिए अदालत को दखल देना पड़ा है। उचित और सर्वमान्य समाधान निकले, इसके लिए अदालत के प्रयासों को सफल बनाने की जिम्मेदारी सरकार और किसान संगठनों की है।

सौजन्य - जनसत्ता।
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Strained ties: On Puducherry standoff (The Hindu)

The Supreme Court’s interim order in the ongoing contestation between large sections of the farmers and the Centre over the new farm laws may be motivated by a laudable intention to break the deadlock in negotiations. However, it is difficult to shake off the impression that the Court is seeking to impose a compromise on the farmers’ unions. One portion of the order stays the three laws, seeks to maintain the Minimum Support Price as before and prevents possible dispossession of farmers of their land under the new laws. The stated reason is that the stay would “assuage the hurt feelings of the farmers” and encourage them to go to the negotiating table. However, it is somewhat disconcerting that the stay of legislation is effected solely as an instrument to facilitate the Court’s arrangement rather than on the basis of any identified legal or constitutional infirmities in the laws. The order forming a four-member committee may indeed help relieve the current tension and allay the government’s fears that the Republic Day celebrations may be disrupted, but it is not clear if it would help the reaching of an amicable settlement as the Samyukt Kisan Morcha, the umbrella body spearheading the protests, has  refused to appear before the panel. The Court’s approach raises the question whether it should traverse beyond its adjudicative role and pass judicial orders of significant import on the basis of sanguine hope and mediational zeal.

The Court did make its position amply clear during the hearing, with the Chief Justice of India, S.A. Bobde, faulting the Centre for its failure to break the deadlock arising out of the weeks-long protest by thousands of farmers in the vicinity of Delhi, demanding nothing short of an outright repeal of the laws. It is only in the wake of the government’s perceived failure that the Court has chosen to intervene, but it is unfortunate that it is not in the form of adjudicating key questions such as the constitutionality of the laws, but by handing over the role of thrashing out the issues involved to a four-member panel. It is not clear how the four members on the committee were chosen, and there is already some well-founded criticism that some of them have already voiced their support for the farm laws in question. The Court wants the panel to give its recommendations on hearing the views of all stakeholders. Here, the exercise could turn tricky. How will the Court deal with a possible recommendation that the laws be amended? It would be strange and even questionable if the Court directed Parliament to bring the laws in line with the committee’s views. While a negotiated settlement is always preferable, it is equally important that judicial power is not seen as being used to dilute the import of the protest or de-legitimise farmer unions that stay away from the proceedings of the panel or interfere with the powers of Parliament to legislate.

Courtesy - The Hindu.

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Strained ties: On Puducherry standoff (The Hindu)

The Puducherry Lt Gov. should heed the legitimate demands of the elected govt.

The recent three-day-long protest, led by Puducherry Chief Minister V. Narayanasamy, under the banner of the Secular Democratic Progressive Alliance, against Lieutenant Governor Kiran Bedi came as no surprise, given the strained ties between the two constitutional functionaries. They have been at loggerheads over many matters, most recently on the appointment of the State Election Commissioner, an office critical to holding elections to local bodies in the Union Territory. But the principal issue of contention is the implementation of direct benefit transfer in the public distribution system using cash, instead of free rice, being given to beneficiaries. The agitation was meant to highlight the demand of the Congress and its allies for the recall of the Lt Governor. As a prelude to the stir, the Chief Minister presented memoranda to President Ram Nath Kovind and Union Minister of State for Home Affairs G. Kishan Reddy, accusing Ms. Bedi of “functioning in an autocratic manner” and adopting an “obstructionist attitude” in ensuring the progress and welfare of people. On her part, Ms. Bedi has advised him to refrain from misleading the public about the Centre and her office. She has even attributed his “anguish and disappointment” possibly to the “diligent and sustained care” exercised by the Lt Governor’s secretariat “in ensuring just, fair and accessible administration following the laws and rules of business scrupulously”.


With the Assembly election likely in April or May, the Chief Minister leading the protest against the Lt Governor was clearly an act of political mobilisation, even though the Congress’s major ally, the Dravida Munnetra Kazhagam, chose to stay away from it. The agitation should be seen as a reflection of the political reality in the Union Territory as Mr. Narayanasamy does not have any effective Opposition. This allows him to turn all his energy and time against the Lt Governor instead of on his political adversaries at a time when the election is near. And this seems to be his strategy to ward off any criticism against his government’s “non-functioning” by laying the blame at the doorstep of the Lt Governor. On her part, Ms. Bedi should take into account the legitimate requirements of an elected government and try to accommodate Mr. Narayanasamy’s views on important matters such as the free rice scheme. After all, the Centre itself did not see any great virtue in the DBT mode when it decided to give additional food grains (rice or wheat) free of cost at five kg per person a month to ration cardholders during April-November last year — a relief measure during the COVID-19 pandemic. With the near breakdown of communication between the Lt Governor and the Chief Minister, the Centre should step in, in the interest of smooth administration.

Courtesy - The Hindu.

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फूलों की घाटी में बांस के अंगारे, एक चिंगारी इस सुंदर स्थान के लिए बन जाती है काल (अमर उजाला)

पंकज चतुर्वेदी 

पूर्वोत्तर ही नहीं, पूरे देश के सबसे खूबसूरत ट्रेकिंग इलाके और जैव विविधता की दृष्टि से समृद्ध और संवेदनशील दजुकू घाटी में 29 दिसंबर, 2020 से जो शोले भड़कने शुरू हुए, अभी भी शांत नहीं हो पा रहे हैं। 11 जनवरी, 2021 को जब आपदा प्रबंधन टीम ने यह सूचित किया कि अब कोई नई आग नहीं लग रही है, तब तक इस जंगल का 10 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र जलकर राख हो चुका था। यह स्थान नगालैंड व मणिपुर की सीमा के करीब है। दस दिन बाद भी आग पूरी तरह शांत नहीं हुई है। यह सुरम्य घाटी दुनिया भर में केवल एकमात्र स्थान पर पाई जाने वाली दजुकू-लिली के फल के साथ अपने प्राकृतिक वातावरण, मौसमी फूलों और वनस्पतियों व जीवों के लिए जानी जाती है। गत दो दशकों के दौरान यहां यह दसवीं बड़ी आग है।


अप्रैल से सितंबर तक के मौसम में इस घाटी को ‘फूलों की घाटी’ कहा जाता है। वहीं पूरे साल यहां की घाटी व पहाड़ पर बौने बांस का साम्राज्य होता है। विदित हो बांस की यह प्रजाति पूर्वी हिमालय और उत्तर-पूर्वी भारत की दजुकू घाटी और आसपास की पहाड़ियों पर पाई जाती है। यह जंगल पूरी तरह से बौने बांस से ढके हैं, जो दूर से खुली घास के मैदान की तरह दिखाई देते हैं। प्रकृति  की यह अनमोल छटा ही यहां की बर्बादी का बड़ा कारण है। बांस का जंगल इतना घना है कि कई जगह एक मीटर में सौ से पांच सौ पौधे। इस मौसम में हवा चलने से ये आपस में टकराते हैं, जिससे उपजी एक चिंगारी इस सुंदर स्थान के लिए काल बन जाती है। दजुकू घाटी और आसपास की पहाड़ियों के प्राचीन जंगलों को जंगल की आग से बड़े पैमाने पर खतरा है। यहां की अनूठी जैव विविधता जड़मूल से नष्ट हो रही है और घने जंगल के जानवर आग के ताप व धुएं से परेशान होकर जब बाहर आते हैं, तो उनका टकराव या तो इंसान से होता है या फिर हैवान रूपी शिकारी से। 


इस जंगल में जब सबसे भयानक आग वर्ष 2006 में लगी थी, तो कोई 70 वर्ग किलोमीटर के इलाके में राख ही राख थी। यहां तक की जाज्फू पहाड़ी का खूबसूरत जंगल भी चपेट में आ गया था। उसके बाद जनवरी-2011, फरवरी-2012,  मार्च-2017 में भी जंगल में आग लगी। नवंबर -2018 में भी जंगल सुलगे थे। इस बार की आग मणिपुर के सेनापति जिले में भी फैल गई है और राज्य की सबसे ऊंची पर्वतीय चोटी ‘माउंड इसो’ का बहुत कुछ भस्म हो गया है। बीते दस दिनों से नगालैंड पुलिस, वन विभाग, एनडीआरएफ और एसडीआरएफ के साथ-साथ दक्षिणी अंगामी यूथ एसोसिएशन के सदस्य आग बुझाने में लगे है। भारतीय वायु सेना के एमआइ-15वी हेलीकाप्टर एक बार में 3,500 लीटर पानी लेकर छिड़काव कर रहे है। वहीं लगातार तेज हवा चलने से आग बेकाबू तो हो ही रही है, राहत कार्य भी प्रभावित हो रहा है। इस समय विभिन्न संस्थाओं के दो हजार लोग आग को फैलने से रोकने में लगे है। हालांकि नगा समाज इस आग को साजिश मान रहा है। कोरोना के चलते दक्षिणी अंगामी यूथ एसोसिएशन के सदस्यों ने इस घाटी में आम लोगों के आवागमन को गत वर्ष मार्च से ही बंद किया हुआ है। नवंबर, 2018 में मणिपुर और नगालैंड सरकार के बीच हुए एक समझौते के मुताबिक, इस घाटी में प्रवेश के दो ही रास्ते खुले हैं- एक मणिपुर से, दूसरा उनके अपने राज्य से। कोरोना के समय यहां किसी का भी प्रवेश पूरी तरह रोक दिया गया था, जो अब भी जारी है।


नगा लोगों को शक है कि आग जानबूझ कर लगाई गई है व उसके पीछे दूसरे राज्य की प्रतिद्वंद्वी जनजातियां हैं। फिलहाल तो राज्य सरकार की चिंता आग के विस्तार को रोकना है। लेकिन साल दर साल जिस तरह यहां आग लग रही है, वह अकेले उत्तर-पूर्व ही नहीं, भारत देश व हिमालय क्षेत्र के अन्य देशों के लिए बड़ा खतरा है। हालांकि भारत में तमिलनाडु से लेकर थाईलैंड तक तेजी से बढ़ते बांस और उसमें आग की घटनाओं पर नियंत्रण के लिए कई शोध हुए हैं व तकनीक भी उपलब्ध है। विडंबना है कि हमारे ये शोध पत्रिकाओं से आगे नहीं आ पाते। जंगलों की जैव विविधता पर मंडराते खतरे से उपजे कोरोना और उसके बाद पक्षियों की रहस्यमय मौत से हम सबक नहीं ले रहे और प्रकृति की अनमोल भेंट इतने प्यारे जंगलों को सहेजने के स्थायी उपाय नहीं कर पा रहे हैं।

सौजन्य - अमर उजाला।

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क्या अमेरिकी प्रशासन ने ट्रंप की विनाशकारी लहर को कमतर करके नहीं आंका था? (अमर उजाला)

सुरेंद्र कुमार 

अमेरिकी सीनेट में बहुमत के नेता चक शूमर के शब्दों में, 'लोकतंत्र के मंदिर को अपवित्र कर दिया गया...छह जनवरी हाल के अमेरिकी इतिहास में एक काले दिन के रूप में जाना जाएगा।' उनकी भावनाएं लाखों अमेरिकी नागरिकों और दुनिया भर के अमेरिकी लोकतंत्र के प्रशंसकों की भावनाओं से मेल खाती हैं। कैपिटल भवन में चल रहे अमेरिकी संसद के संयुक्त सत्र में जिस तरह से ट्रंप के समर्थकों ने उत्पात मचाया, स्पीकर नैंसी पेलोसी के दफ्तर में तोड़फोड़ की, खिड़कियों को तोड़ा, अभूतपूर्व हिंसा की, जिसके कारण सांसदों एवं सीनेटरों को बाहर निकालना पड़ा, उसने लोकतांत्रिक दुनिया को भारी झटका दिया है। यह इतना विचित्र था कि कुछ देर के लिए लोकतंत्र और तानाशाही के बीच की पतली रेखा गायब हो गई। इस तरह की बर्बरता, हिंसा और अराजकता के दृश्य अक्सर अधिनायकवादी शासन में देखे जाते हैं, जहां हारने वाले नेता सत्ता में बने रहने के लिए सेना और टैंकों को बुलाते हैं। 1812 में युद्ध के दौरान ब्रिटिश द्वारा अमेरिकी कैपिटल को आखिरी बार नुकसान पहुंचाया गया था! पूर्व रिपब्लिकन राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने इसे 'काफी घिनौना' बताया। अन्य तीन जीवित पूर्व राष्ट्रपतियों-कार्टर, क्लिंटन और ओबामा ने भी कैपिटल पर हमले की कड़े शब्दों में निंदा की। निर्वाचित राष्ट्रपति जो बाइडन ने कहा कि यह कोई 'विरोध' नहीं था, बल्कि 'विप्लव' था, जो 'देशद्रोह' पर आधारित था। 


लेकिन क्या यह वाकई अप्रत्याशित था? क्या अमेरिकी प्रशासन ने ट्रंप की विनाशकारी लहर को कमतर करके नहीं आंका था? क्या ट्रंप ने अपने इरादे को छिपाया था? नहीं। यहां तक कि प्रेसिडेंट डिबेट से पहले ही उन्होंने मीडिया से कहा था कि चुनाव में हार उन्हें स्वीकार्य नहीं होगी, क्योंकि वह मानते हैं कि जब तक चुनाव में धांधली नहीं होगी, वह हार नहीं सकते हैं। यह अटल आत्मविश्वास लोकतांत्रिक मूल्यों और लोकतांत्रिक संस्थानों में उनकी गहरी आस्था को प्रतिबिंबित नहीं करता है। वास्तव में यह एक संकीर्णतावादी राष्ट्रपति की जुनूनी आत्म-सच्चाई थी। 


इस बात के पर्याप्त सबूत हैं कि राष्ट्रपति ट्रंप ने एक हफ्ते से अपने समर्थकों को उकसाया- 'हम लड़ने जा रहे हैं, हम कभी हार नहीं मानेंगे', इसलिए जो भी हुआ, उन्हें हर चीज के लिए जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए। यहां तक कि जब निर्वाचित राष्ट्रपति जो बाइडन द्वारा 'घेराबंदी' खत्म करने की अपील के बाद उन्होंने अपने समर्थकों को 'घर जाने' के लिए कहा था, तब भी उनके बयान में हमलावरों की निंदा या चार लोगों की जान जाने को लेकर पश्चाताप का भाव नहीं था। 


ट्रंप ने अपने जुड़वां लोकलुभावन नारों : 'अमेरिका पहले' और 'अमेरिका को फिर से महान बनाएं' के साथ अपने राष्ट्रपति कार्यकाल की शुरुआत की थी, जिस पर किसी को आपत्ति नहीं है। लेकिन उनके इस दावे कि उनके पूर्ववर्तियों ने देश के लिए कुछ नहीं किया, उन्होंने इसे बर्बाद कर दिया, को बहुत कम लोगों ने माना। उन्होंने अहंकार, आत्म-सच्चाई और विरोधाभासी विचारों के प्रति असहिष्णुता दिखाई और हमेशा खुद के सही होने का दावा किया। मीडिया की किसी भी आलोचना को वह फेक न्यूज कहकर खारिज कर देते थे। 


जिन लोगों ने ह्वाइट हाउस या मंत्रिमंडल में उनके साथ असंतोष जताने का साहस किया, उन्हें या तो निकाल दिया गया या इस्तीफा देने पर मजबूर किया गया। ऐसे 45 से ज्यादा लोगों की लंबी सूची है, जिसमें विदेश मंत्री, रक्षा मंत्री, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार, अटार्नी जनरल, चीफ ऑफ स्टाफ एवं अन्य लोग शामिल हैं। उन्होंने बिना कोई बेहतर विकल्प पेश किए अपने पूर्ववर्ती बराक ओबामा के घरेलू एवं विदेशी मामलों से संबंधित फैसले को पलट दिया, जिनमें स्वास्थ्य देखभाल, आव्रजन, नस्लीय न्याय, ट्रांस पैसिफिक पार्टनरशिप, ईरान के साथ परमाणु समझौता, क्यूबा के साथ संबंधों का सामान्यीकरण, पेरिस जलवायु परिवर्तन समझौता शामिल हैं।


उन्होंने अपने लोकलुभावन दृष्टिकोण को आगे बढ़ाया कि पूरी दुनिया अमेरिका का लाभ उठा रही है और पिछले राष्ट्रपतियों ने इसके बारे में कुछ नहीं किया, इसलिए वह इसे सही कर रहे हैं। उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि अपने टैरिफ युद्ध के साथ चीन की अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाना थी। लेकिन इसने अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर भी प्रतिकूल प्रभाव डाला और वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए मंदी से उबरने में बाधा खड़ी की। हिंद-प्रशांत क्षेत्र को प्रमुखता देते हुए इसे नौवहन एवं उड़ानों के लिए खुला व मुक्त रखना, क्वाड को फिर से खोलना और अपने पड़ोसियों के खिलाफ चीन की आक्रामकता का विरोध करना ट्रंप की सकारात्मक नीतियां थीं, लेकिन आसियान देश चीन विरोधी मोर्चे के लिए तैयार नहीं थे। 


उन्होंने अमेरिका के नाटो सहयोगियों से अपनी रक्षा के लिए और अधिक योगदान देने की मांग की। इस पर भी कोई अमेरिकी आपत्ति नहीं कर सकता। वह अपने नजरिये से लेन-देन कर रहे थे और उम्मीद करते थे कि दूसरे लोग मिल्टन फ्रीडमैन की बात को याद रखें कि 'मुफ्त में कोई चीज नहीं मिलती!' लेकिन अपने उद्देश्यों को हासिल करने के उनके तरीके ने कई लोगों को असहज कर दिया। मैक्सिको के राष्ट्रपति और ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री के साथ बातचीत करते हुए अचानक फोन काट देना और नाटो नेताओं तथा कनाडाई प्रधानमंत्री के साथ खुलेआम झगड़ा करना कूटनीति नहीं थी, बल्कि यह धमकाना था। 


कहने का तात्पर्य यह है कि ट्रंप कोई स्टेट्समैन नहीं हैं; वह एक बेईमान, व्यापारी से राजनेता बने हैं, जिन्होंने राजनीतिक शक्ति का स्वाद चखा है और वह इसे जाने नहीं देना चाहते हैं। उन्होंने ध्रुवीकरण और विभाजन को बढ़ा दिया! लगता है, बेईमानी या निष्पक्ष ढंग से चुनाव जीतना ही उनका आदर्श था। उनके पास देश का नेतृत्व करने के लिए नैतिक मूल्यों की कमी थी। पूर्व रक्षा मंत्री विलियम कोहेन ने स्पष्ट रूप से स्वीकार किया कि ये धुर दक्षिणपंथी लंबे समय तक हमारे समाज का हिस्सा रहे हैं। हमें इनकी पहचान करनी चाहिए और मुकदमा चलाकर जेल भेजना चाहिए। उपराष्ट्रपति माइक पेंस लोकतंत्र एवं सांविधानिक दायित्व के पक्ष में खड़े हो गए हैं। फिलहाल लोकतंत्र जीत गया है, लेकिन यह चेतावनी की घंटी है! 

सौजन्य - अमर उजाला।

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The patriots (The Telegraph)

Prabhat Patnaik  

We are witnessing a bizarre situation. One comes across instances where consumers want growing of food crops for supplying to the public distribution system, while producers, lured by the apparent gains of shifting to cash crops, are reluctant to do so. The government has to mediate between these conflicting interests. But in India at present, the farmers have no desire to shift from food crops, even as consumers want food crops to be supplied through the public distribution system. There is no conflict of interest among them that the government has to mediate between. And, yet, it is imposing a shift on farmers from food to cash crops that would destroy the public distribution system.


Such a shift is precisely what the agricultural legislations aim to bring about. Government economists defending the laws have been emphasizing the benefits of such a shift. The government here is not mediating in a conflict of interests among the people; it has, apparently, its own interest, which it is imposing on the people, on farmers and consumers alike, against which the farmers are agitating in the bitter cold of Delhi. It is a bizarre case of government versus the people at large, not people versus people.


Likewise, the farmers are unanimous in rejecting contract farming; and, yet, the government is pushing contract farming through these bills, ostensibly in the farmers’ interest. Again, it is a case not of the government responding to the demand from any section of the people; it has apparently its own interest which it is imposing on the people.


But what could be its own interest? While it is obvious that its own interest coincides with the interest of corporates and international agribusiness, the government’s answer would be that it is upholding the ‘national interest’. Corporate interest is thus identified with ‘national interest’. This has been the hallmark of the Narendra Modi regime, and it is symptomatic of the Corporate-Hindutva alliance of which Modi is the architect and which keeps him in power.


The bizarreness of the situation is this: even right-wing governments justify their pro-corporate policies by claiming to defend the interest of some section of the people. Margaret Thatcher’s attack on trade unions was defended by her as a means of controlling inflation that trade unions allegedly caused and that hurt large masses of the people. But in India we are seeing the unilateral and gratuitous imposition of a set of measures that no segment of the people has ever demanded, measures that portend the dismantling of the public distribution system, which is opposed by people at large, and against which vast numbers are vehemently protesting; all this just to promote corporate interest. This is unprecedented in a democracy.


The government will claim that since it won the 2019 parliamentary elections, it has the mandate to bring in the ‘reforms’ it wants. But this is erroneous for several reasons. First, it is wrong in principle: winning an election does not give the government the mandate to do whatever it likes. Second, this is especially so because the 2019 elections were not fought on the issue of ‘agricultural reforms’. In fact, these reforms never figured in the ruling party’s electioneering, which focused on the Pulwama attack and the Balakot air-strikes. Third, there has been a commoditization of politics where even having a majority in the legislature has lost much significance. 


Fighting elections itself has become extraordinarily expensive. Causing defections from the opponents before elections has become common and is also expensive. And no matter who wins the election, defections are engineered from other parties for a price to get the required majority to form the government. For all these reasons, the party with the largest amount of money has a clear edge over the others; and since the corporates are the main source of such money, forging an alliance with them becomes essential for coming to power for which they have to be offered a quid pro quo. Hindutva forces, with their communal-polarizing agenda and corporate financial backing, can exercise hegemony in such a world of commoditized politics. The quid pro quo offered to them includes, inter alia, control over peasant agriculture.


While corporates as a whole gain from such ascendancy, one segment among them, an upstart segment, usually gains more than the other, more established, segments. Daniel Guérin (Fascism and Big Business) had shown that in Germany in the 1930s, a segment of monopoly capital, engaged in producing armaments and producer goods, had become special beneficiaries of the corporate alliance with the Nazis compared to the older segment engaged in textiles and consumer goods. In Japan, new houses, the shinko zaibatsu, benefited more than older houses like Mitsui from the fascistic regime that came to power in 1931, with which the corporates had close relations. While contemporary India is different from 1930s Germany or Japan, a similar privileging of a segment of new corporate houses can be detected here too. This is attracting the special ire of the farmers.


Modi prepared the ground for identifying corporate interest, especially the interest of this nouveau segment, with the national interest by calling the corporates “wealth creators”. He meant the ‘nation’s’ wealth. By this description alone, he raised amassing private wealth into a national service, and those who amassed such wealth into privileged members of the ‘nation’ whose interest deserved the highest priority. It followed that all segments of the population must be made to accede to the demands of these upstart corporates; it is in the interest of the population itself, as wealth-amassing by these corporates supposedly benefits all. 


The Modi government has thus inverted the concept of the ‘nation’, from an entity identified with the people to one identified with the corporates, especially the nouveau corporates. The agriculture bills give expression to this inversion.


This, however, constitutes a betrayal of our anti-colonial struggle. The concept of the ‘nation’ that had developed in Europe in the wake of the Westphalian Peace Treaties in the seventeenth century had been imperialist, non-inclusive (it had located an “internal enemy”), and, supposedly, deserving of apotheosis by the people who were only supposed to make sacrifices for it. By contrast, anti-colonial nationalism in countries like India was a very different sui generis, phenomenon. It saw the nation as being inclusive, of which secularism was an integral part; and it saw the raison d’être of the nation in improving the lives of the people. The concept of the nation implicit in the Modi government’s understanding is the very opposite of this and is closer to the aggrandizing concept of Europe whose logical culmination was fascism.


The peasants gathered around Delhi are opposing the Modi government’s world-view in every respect. They are upholding secularism, as is evident from the fact that Hindu, Sikh and Muslim peasants are standing shoulder to shoulder. They are, in their opposition to corporate encroachment on agriculture, denying the identification of the ‘nation’ with a bunch of corporate houses. By standing up for the public distribution system, they are seeing the raison d’être of the nation as consisting in serving the people. The peasant movement is reclaiming the concept of the nation from the Modi government that had hijacked it.


The author is Professor Emeritus, Centre for Economic Studies, Jawaharlal Nehru University, New Delhi

Courtesy - The Telegraph.

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नए दशक में बैंकिंग उद्योग का बदलाव से होगा साक्षात्कार (बिजनेस स्टैंडर्ड)

तमाल बंद्योपाध्याय 

भारत में वित्तीय प्रणाली में नकदी डालने की प्रक्रिया नए वर्ष में जारी रहेगी। बॉन्ड पर प्रतिफल, सरकार की उधारी पर ब्याज कम करने और बैंकों को ट्रेजरी कारोबार में लाभ पहुंचाने की प्रक्रिया भी साथ-साथ चलती रहेगी। आरबीआई ने दिसंबर 2019 में 'ऑपरेशन ट्विस्ट' की शुरुआत की थी। वर्ष 2020 के अंतिम दिन ताजा घोषणाओं से ठीक पहले आरबीआई के एक कार्य पत्र में महंगाई लक्ष्य 4 प्रतिशत पर अपरिवर्तित रखने पर जोर दिया गया था। हाल में महंगाई दर ऊंचे स्तर पर बरकरार रहने के बाद महंगाई लक्ष्य 4 प्रतिशत (2 प्रतिशत कम या ज्यादा) से अधिक रखे जाने की संभावनाओं पर चर्चा तेज हो गई थी।


खुदरा महंगाई दिसंबर 2019 से ही लगातार 6 प्रतिशत से ऊपर रही है। केवल मार्च में ही यह 5.84 प्रतिशत रही थी। बढ़ती महंगाई और अर्थव्यवस्था में सुधार के संकेतों के बीच अत्यधिक ढीली मौद्रिक नीति माथे पर बल देने वाली है। नए वर्ष में ढीली मौद्रिक नीति को विराम देना और सामान्य मौद्रिक नीति की तरफ बढऩा आरबीआई के लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी।


वर्ष 2008 में अमेरिकी निवेश बैंक लीमन ब्रदर्स के  धराशायी होने के बाद पूरी दुनिया एक भूतपूर्व आर्थिक संकट की चपेट में आ गई थी। उस समय आरबीआई भारत पर इसके असर को रोकने में सफल रहा था। केंद्रीय बैंक ने इस वैश्विक आर्थिक संकट का दुष्प्रभाव दूर करने के लिए वित्तीय प्रणाली को नकदी से लबरेज कर दिया और नीतिगत दरें एकदम निचले स्तर पर कर दीं। आरबीआई ने मौद्रिक नीति ढीली करने में तेजी दिखाई और इससे धीरे-धीरे वापस लिया, जिससे महंगाई दरों में इजाफा हो गया।


ऋण परिसंपत्तियों की गुणवत्ता पर भी सभी विश्लेषकों की नजरें होंगी। 2020 के शुरू में कई लोगों को लगा था कि भारतीय बैंकिंग क्षेत्र के लिए बुरा दौर पीछे छूट गया है। उस समय फंसे ऋण पर तस्वीर साफ हो जाने के बाद बैंक हालात सुधारने में जुट गए थे। लोगों को लग रहा था कि ज्यादातर बैंकों ने फंसे ऋण के लिए मोटे प्रावधान किए हैं, इसलिए सुधार के साथ ही उनके मुनाफे में भी इजाफा होता रहेगा और उनका बहीखाता मजबूत बनेगा। ऐसी उम्मीद की जाने लगी कि बैंक अधिक उधारी देने में भी दिलचस्पी दिखाएंगे। हालांकि इन तमाम उम्मीदों पर उस समय पानी फिर गया जब कोविड-19 ने भारत सहित पूरी दुनिया को अपनी चपेट में ले लिया। हालत बिगडऩे का अंदेशा लगते ही आरबीआई ने छह महीने के लिए अस्थायी तौर पर ऋण भुगतान टालने की अनुमति दे दी। अब ज्यादातर बैंकों का कहना है कि ऋण भुगतान में नाटकीय तेजी आई है और कुछ ही ऋण का पुनर्गठन हुआ है।


बैंकिंग प्रणाली में सकल गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों का अनुपात लगातार कम हो रहा है। मार्च 2019 के 9.1 प्रतिशत से कम होकर मार्च 2020 में यह 8.2 प्रतिशत रह गया और सितंबर 2020 में कम होकर 7.5 प्रतिशत पर आ गया। आने वाले समय में फंसे ऋण का आकार बढऩा तय है। ऋण आवंटन बढ़ाने की बैंकों की चाह भी सकल एनपीए में कमी आने पर निर्भर है। अप्रैल 2020 से 18 दिसंबर, 2020 तक ऋण आवंटन में महज 1.7 प्रतिशत इजाफा हुआ है, जबकि एक साल पहले इसी अवधि में इसमें 1.8 प्रतिशत तेजी रही थी।


नए दशक में भारतीय बैंकिंग में उथलपुथल अधिक देखने को मिलेगी। 2009 में अमेरिकी अर्थशास्त्री और अमेरिकी फेडरल रिजर्व के पूर्व चेयरमैन पॉल वोल्कर ने कहा था कि बैंकिंग प्रणाली में नवाचार के लिहाज से पिछले दो दशकों के दौरान केवल एटीएम ही एक मतलब की चीज साबित हुई है। हालांकि तब से काफी बदलाव हुए हैं। भारत में 2016 में नोटबंदी के बाद डिजिटलीकरण पर काफी जोर दिया गया, लेकिन कुछ समय बाद इसकी चाल सुस्त पड़ गई। हालांकि इसके बाद कोविड-19 महामारी के बाद डिजिटल माध्यम से काम-काज तेजी से होने लगा और इससे इन्फोसिस लिमिटेड के चेयरमैन नंदन नीलेकणी को कहना पड़ा कि कोविड-19 से उत्पन्न परिस्थितियों ने वर्षों के बजाय महज कुछ हफ्तों ही भारतीय अर्थव्यवस्था का डिजिटलीकरण कर दिया।


नए दशक में परिदृश्य बदलेगा क्योंकि हाल तक बैंकों को वित्त-तकनीक (फिनटेक) से कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ा था, लेकिन अब टेकफिन भी मैदान में उतर चुके हैं। फिनटेक से अलग टेकफिन के अपने खास ग्राहक होते हैं, जिनके लिए उन्हें बैंकों के तंत्र पर निर्भर नहीं रहना पड़ता है। जो बैंक अपनी स्थिति को लेकर लापरवाह हैं और अपने ग्राहक आधार पर इतराते रहते हैं वे इस दशक में अपना अस्तित्व गंवा सकते हैं।


आरबीआई और वाणिज्यिक बैंकों को भी इस बात पर मंथन करना चाहिए कि कहीं भारत में बैंकिंग प्रणाली की साख को नुकसान तो नहीं पहुंचा है? बैंकिंग नियामक ने बैंकिंग खंड में प्रतिस्पद्र्धा को बढ़ावा नहीं दिया है, इसलिए वित्तीय स्तर पर असंतुलन जारी है।


अंत में, बैंकों के राष्ट्रीकरण होने के पांच दशक बाद सरकार को सार्वजनिक बैंकों में बहुलांश शेयरधारक होने के नाते यह अवश्य तय करना चाहिए कि बैंकों को सामजिक हित के लिए एक एजेंसी के तौर चलाना चाहिए या एक वाणिज्यिक इकाई के तौर पर। यहां विकल्प मौजूद हैं। मिसाल के तौर पर सरकार योग्य एवं उपयुक्त भारतीय निजी इकाइयों एवं प्राइवेट इक्विटी सहित विदेशी संस्थानों को बैंकों में निवेश एवं 26 प्रतिशत हिस्सेदारी रखने की अनुमति दे सकती है। वैसे भी गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों में ऐसी इकाइयों की पहले से ही अधिक हिस्सेदारी है। सरकार नैशनल इन्वेस्टमेंट ऐंड इन्फ्रास्ट्रक्चर फंड की तर्ज पर ही बैंकों में निवेश के लिए एक बैंकिंग इन्वेस्टमेंट फंड बना सकती है।


बैंकों के समेकन से इनकी संख्या में कमी आती है, न कि बैंकिंग उद्योग में सरकार की हिस्सेदारी कम होती है। बैंकों के मामले में अलग रणनीति अपनाए जाने की जरूरत है।


(लेखक बिज़नेस स्टैंडर्ड के सलाहकार संपादक, लेखक एवं जन स्मॉल फानइैंस बैंक लिमिटेड में वरिष्ठ सलाहकार हैं। )

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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हिंद-प्रशांत क्षेत्र की ताकत बनने में लंबा सफर (बिजनेस स्टैंडर्ड)

प्रेमवीर दास 

पिछले कुछ दिनों में विदेश मंत्री एस जयशंकर ने हिंद-प्रशांत क्षेत्र पर लगातार कुछ न कुछ कहा है। देश की विदेश नीति के प्रभारी एवं रणनीतिक मामलों के जानकार दोनों की हैसियत से उनकी कही गई बातें महत्त्वपूर्ण हैं। इस समय देश में जयशंकर की तरह इन मामलों में विशेष जानकारी रखने वाले कुछ गिने-चुने लोग ही हैं। ऐसे में उन्होंने जो कहा है उनसे चार महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं। पहली बात तो यह कि हिंद-प्र्रशांत बीते हुए कल की वास्तविकता थी, न कि आने वाले कल की जरूरत है। दूसरी अहम बात यह है कि अब देश की रक्षा एवं रणनीतिक पहलुओं से जुड़े मामलों में समुद्री क्षेत्र की अहमियत अधिक है। एक और महत्त्वपूर्ण बात उन्होंने यह कही है कि हिंद महासागर क्षेत्र में भारत को एक अहम किरदार निभाना चाहिए था और चौथी बात यह है कि भारत को हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अपने हितों का तालमेल समान सोच रखने वाले दूसरे देशों के हितों के साथ बैठाना है।

एक अन्य ध्यान आकृष्ट करने वाला बयान चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) ने दिया है। उन्होंने मैरीटाइम थियेटर बनाने की हिमायत की है। ऐसा लगता है कि इसमें मौजूदा पूर्वी एवं पश्चिमी नौसेना कमान के  साथ तीनों सेना की अंडमान एवं निकोबार कमान भी शामिल होंगी। इस थियेटर का आकार कितना होगा फिलहाल यह मालूम नहीं है, लेकिन समुद्र में तमाम बातों की स्वतंत्रता बनाए रखने, व्यापार के लिए सुरक्षित मार्ग सुनिश्चित करने और मानवीय सहायता एवं आपदा राहत (एचएडीआर) पर मोटे तौर पर चर्चा चल रही है। इस लिहाज से किसी शत्रु का नाम या उसकी पहचान नहीं की गई है, लेकिन ऐसा समझा जा रहा है कि चीन और पाकिस्तान पर ही नजरें हैं।


जयशंकर और विपिन रावत इन दोनों में किसी के भी वक्तव्य पर सवाल नहीं उठाया जा सकता है। बस चर्चा का एक ही विषय है कि भारत कितना सक्षम है। सामुद्रिक शक्ति का महत्त्व केवल नौसेना तक ही सीमित नहीं है बल्कि विदेश व्यापार, एचएडीआर और दूसरे देशों से संपर्क आदि सभी लिहाज से भी यह उतना ही अहम हैं। अब यह बात भी स्पष्ट है कि जब तक हिंद महासागर क्षेत्र में भारत अपनी क्षमताएं नहीं बढ़ाता है और एक विश्वसनीय एवं उपयोगी साझेदार के तौर पर अपनी छवि विकसित नहीं करता है तब तक इन उत्तरदायित्वों का पालन नहीं किया जा सकता है। यह कुछ कारकों पर निर्भर करता है। इसमें कुछ कारक परिवर्तनशील हैं और कुछ नहीं बदले जा सकते हैं। इन नहीं बदलने वाले कारकों में पहला भूगोल है। आम तौर पर चारों तरफ से जमीनी सीमा से घिरे देश सागर में अपनी ताकत स्थापित करने की पहल नहीं करते हैं। जिन देशों की कुछ तटीय सीमाएं हैं उनकी पहुंच भी खुले जल तक होनी चाहिए। जर्मनी, फ्रांस, रूस सभी के पास बड़ी नौसेनाएं हैं लेकिन वे अब तक समुद्र में अपनी विश्वसनीय ताकत स्थापित नहीं कर पाए हैं। दो शताब्दी पहले ब्रिटेन ने ट्राफ ल्गर और नील की लड़ाई में फ्रांस को शिकस्त दी थी, जबकि उस समय जहाजों के मामले में फ्रांस ब्रिटेन पर भारी पड़ रहा था। रूस का बेड़ा 1917 में बाल्टिक सागर से लेकर सी ऑफ जापान तक जा सकता था, बावजूद इसके उसे जापान के हाथों करारी हार झेलनी पड़ी। जर्मनी ने टिरपिट्ज और बिस्मार्क जैसे शक्तिशाली लड़ाकू  जहाज बनाए थे लेकिन इनसे वह अटलांटिक सागर में अपना प्रभुत्व स्थापित नहीं कर पाया। दूसरी तरफ ब्रिटेन की नौसेना ने तीन शताब्दियों तक समुद्री क्षेत्र में अपनी ताकत का पंचम लहराया और जापान ने अमरिका जैसे शक्तिशाली देश के नौसैनिक अड्डे पर्ल हार्बर पर हमला करने में सफल रहा। यहां तक कि ऑस्ट्रेलिया ने भी कोरिया और वियतनाम की लड़ाई में अपना योगदान दिया। ये तीनों देश टापू राष्ट्र कहलाते हैं। अमेरिका की उत्तरी सीमा कनाडा से लगती है और दक्षिण में मैक्सिको से इसकी जमीनी सीमा लगती है लेकिन इसके पूर्व और पश्चिम दोनों दिशाओं में अथाह समुद्र है, जिससे यह दुनिया में सबसे बड़ी ताकतवर नौसेना रखता है।


इन बातों के अलावा अपनी पहचान बनाने की सरकार की इच्छाशक्ति भी समुद्री क्षेत्र में ताकत बढ़ाने में मददगार होती है। केवल इच्छा शक्ति की बदौलत ही विदेश में कोई देश अपनी नौसेना तैनात कर सकता है। इसी जज्बे के दम पर मागे्र्रट थैचर ने ब्रिटेन से 8,000 मील दूर विमान वाहक पोत एचएमएस हर्मिस (जो बाद में आईएनएस विराट बन गया)सहित अपनी नौसेना तैनात कर दी और वहां छोटे-छोटे द्वीपों को 'आजाद' कराया। ये द्वीप ब्रिटेन का झंडा रखते थे, लेकिन उन पर अर्जेंटीना का नियंत्रण था। इसके बाद फॉकलैंड्स के युद्ध में अर्जेंटीना ने ब्रिटेश के कुछ जहाज डुबो दिए औैर इसमें उसे भी अपने एक जहाज से हाथ धोना पड़ा। हालांकि बाद में ब्रिटेन की ताकतवर नौसेना के आगे इसे आत्मसमर्पण करना पड़ा। फॉकलैंड्स अर्जेंटीना के तट से महज 200 मील दूर था। इस तरह, अपनी ताकत बढ़ाने और इसे साबित करने की इच्छा शक्ति किसी देश की नौसेना की ताकत का निर्धारण करते है। अब अहम सवाल खड़ा होता है कि भारत इस पैमाने पर कहां है? हमारे देश की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि यह तीन दिशाओं से समुद्र से घिरा है और दूर सागर में कई द्वीप भी हैं जो हमारी शक्ति में इजाफा करते हैं। जहां तक क्षमताओं की बात है तो उत्तरी भाग और हिंद महासागर क्षेत्र में एचएडीआर के मामले में हमें पहला कदम उठाने वाले देश के रूप में काम करना होगा। समुद्र में माल की आवाजाही सुचारु रूप से जारी रखने के लिए हमें दूसरे देशों के साथ संपर्क करना होगा, जैसा कि सोमालिया में समुद्री डाकुओं के बढ़ते उत्पात के बाद हुआ था। जिन बिंदुओं पर हम कमजोर हैं वहां अपनी ताकत बढ़ाने की हमारे पास पर्याप्त क्षमता है। समुद्र में एकीकृत वायु शक्ति एक ऐसा ही बिंदु है। किसी भी समय हमारे आस-पास गहरे समुद्री क्षेत्र में दो विमानवाहन युद्ध पोत किसी तरह की कार्रवाई के लिए हमेशा तैनात करने की जरूरत है। वैसे आवश्यकता तीन विमान वाहक युद्धपोतों की है।


उम्मीद की जा रही है कि विमानवाहक युद्ध पोतों की संख्या 2023 तक दो हो जाएगी, जो इस समय केवल एक है। विक्रांत का कोच्चि में इस समय निर्माण हो रहा है और तब तक यह समुद्र में उतार दिया जाएगा। हालांकि तीन युद्धपोतों का सपना फिलहाल पूरा होता नहीं दिख रहा है। एचएडीआर कार्यों में अक्सर उपयोग साबित होने वाले तटरक्षक बलों की क्षमता भी बढ़ाने की जरूरत है। रक्षा बजट में नौसेना का हिस्सा 1987 में 13 प्रतिशत था, जो बाद में बढ़कर 18 प्रतिशत हो गया, लेकिन अब यह फिर कम होकर 14 प्रतिशत तक रह गया है। बात केवल रक्षा बजट की करें तो यह पिछले छह वर्षों में देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 2 प्रतिशत से अधिक नहीं पहुंच पाया है और कम से कम अगले दो वर्षों में इसमें किसी बड़ी बढ़ोतरी की उम्मीद नहीं की जा सकती है। वास्तविकता यह है कि भारत की नौसेना की क्षमता उतनी नहीं हो पाएगी जितनी जरूरत है। जहां तक सरकार की इच्छा शक्ति की बात है तो केवल 1987 में ही सरकार ने श्रीलंका में शांति रक्षक सेना भेजी थी। इसका उद्देश्य तमिलों की मदद करना था, लेकिन आखिरकार उन्हीं से लड़ाई करनी पड़ी। अंत में अपनी साख गंवाने के बाद भारत ने शांति रक्षक बल बुला लिया। अगर हम जयशंकर और सीडीएस द्वारा कही गई बातों को वास्तविकता के धरातल पर उतारना चाहते हैं और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में एक विश्वसनीय भूमिका निभाने के इच्छुक हैं तो हमें अपनी मौजूदा क्षमता में और इजाफा करना होगा। चीन की तरह भारत भी समुद्र में अपनी सामरिक शक्ति बढ़ाने में अधिक आगे नहीं रहा है, लेकिन चीन ने अपनी गलती सुधारनी शुरू कर दी है। भारत ने अभी इस दिशा में पूरी तरह सोचना भी शुरू नहीं किया है।


(लेखक राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बोर्ड के सदस्य रह चुके हैं। )

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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निजता का मसला (बिजनेस स्टैंडर्ड)

शीर्ष इंस्टैंट मैसेंजर व्हाट्सऐप द्वारा जारी नई सेवा शर्तों ने इसका इस्तेमाल करने वाले तमाम लोगों के बीच डेटा की निजता पर बहस दोबारा शुरू कर दी है। व्हाट्सऐप दुनिया की सबसे लोकप्रिय इंस्टैंट मैसेज (आईएम) सेवा है और दो अरब से अधिक लोग इसका इस्तेमाल करते हैं। यह आंकड़ा दुनिया के दूसरे स्वतंत्र आईएम नेटवर्क (फेसबुक मैसेंजर) से चार गुना अधिक है। फेसबुक की इस अनुषंगी कंपनी ने गत वर्ष कारोबारी उपभोक्ताओं के लिए एक एपीआई जारी किया था और वह इस समय फिनटेक भुगतान के काम को गति प्रदान कर रही है। नई शर्तें भारत के 40 करोड़ उपभोक्ताओं के लिए खासी प्रासंगिक हैं क्योंकि देश में डेटा की निजता को लेकर कोई कानून नहीं है। ऐसे में यहां नई सेवा शर्तों को लागू करना आसान है। बहरहाल कारोबारी संगठन कन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स ने इस पर स्थगन के लिए इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के समक्ष प्रस्तुति दी है।

नई सेवा शर्तें यूरोपीय संघ में लागू नहीं की जा सकती हैं क्योंकि ये वहां के जनरल डेटा प्रोटेक्शन रेग्युलेशन (जीडीपीआर) का उल्लंघन करती हैं। अमेरिका में भी इसे लागू करने में दिक्कत हो सकती है क्योंकि फेडरल ट्रेड कमीशन तथा कई राज्यों ने फेसबुक के खिलाफ ऐंटी ट्रस्ट केस दायर करने के साथ कहा है कि व्हाट्सऐप, इंस्टाग्राम और फेसबुक की अन्य अनुषंगी कंपनियों को सोशल नेटवर्क से अलग किया जाए। नई सेवा शर्तें आगामी 8 फरवरी से लागू होनी हैं। इसमें इस्तेमाल करने वालों के पास यह विकल्प भी नहीं होगा कि वे डेटा साझा करने से इनकार कर सकें। सन 2016 में व्हाट्सऐप ने उन उपयोगकर्ताओं को बाहर रहने का विकल्प दिया था जो डेटा साझा करने से इनकार कर सकते थे।


अपने बचाव में व्हाट्सऐप ने कहा है कि एंड-टु-एंड एन्क्रिप्शन बरकरार रहेगा। यह विभिन्न व्यक्तियों और समूहों के बीच बातचीत की निजता सुनिश्चित करता है। परंतु करीब 8,000 शब्दों की नई सेवा शर्तों के मुताबिक कारोबारी खातों को डेटा और मेटाडेटा सेवा प्रदाताओं के साथ साझा करना होगा। ये सेवा प्रदाता फेसबुक भी हो सकती है और कोई तीसरा पक्ष भी। यानी कारोबारी खाताधारकों द्वारा बातचीत में उल्लिखित संवेदनशील सामग्री बाहर जा सकती है। व्हाट्सऐप डेटा और मेटाडेटा का बड़ा हिस्सा जिसमें लोकेशन, हैंडसेट की जानकारी, कनेक्शन, सभी संपर्क आदि पहले ही फेसबुक के साथ साझा किए जाते हैं। जब ये तमाम डेटा फेसबुक के मेटाडेटा से उसके अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के माध्यम से जुड़ते हैं तो यह उपयोगकर्ता की पूरी तस्वीर उसके सामने साफ कर देता है। भारत में व्हाट्सऐप का इस्तेमाल कई विद्यालयीन गतिविधियों के लिए किया जाता है। ऐसे में बच्चों की जानकारी भी इसके पास होगी।


सोशल नेटवर्क की 99 फीसदी आय विज्ञापनों से होती है। व्हाट्सऐप की आय का स्रोत बिजनेस एपीआई और विज्ञापन हैं। दोनों प्लेटफॉर्म डेटा और मेटाडेटा की साझेदारी से लाभान्वित हो सकते हैं और भारत में उसके साझेदारों समेत तीसरे पक्ष के सेवा प्रदाता भी। यह निजी डेटा की सुरक्षा को भी प्रभावित कर सकता है क्योंकि सेवा शर्तें जीडीपीआर के प्रतिकूल हैं। जीडीपीआर को दुनिया का सबसे व्यापक निजता संरक्षण कानून माना जाता है। दुनिया के सबसे अमीर व्यक्ति ऐलन मस्क और ट्विटर के सीईओ जैक डोरसी समेत कई प्रमुख लोगों ने व्हाट्सऐप से दूरी बनाने की सलाह दी है। हालांकि इसमें दिक्कतें हैं। यह एक सहज, इस्तेमाल में आसान ऐप है। दूसरी बात यह कि अन्य आईएम नेटवर्क में इतने लोग नहीं हैं यानी संपर्क सीमित होता है। तीसरा मसला कॉर्पोरेट के दबाव के रूप में सामने आ सकता है। यदि सेवा प्रदाता व्हाट्सऐप बिजनेस अकाउंट का इस्तेमाल कर रहे हैं तो वे अपने क्लाइंट पर दबाव बना सकते हैं कि वे भी यहां रहें। ऐसे में कुछ लोग जहां निजता की सुरक्षा चुनेंगे, वहीं कुछ अन्य इसके आसान होने को प्राथमिकता देंगे।

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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