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नौकरी गंवाने का सिलसिला जारी रहने के आसार

महेश व्यास



अगस्त के साप्ताहिक आंकड़ों से ऐसा संकेत मिलता है कि इस महीने में कामगारों की हालत काफी बिगड़ी है। सभी तीनों मापदंडों- श्रम भागीदारी दर, बेरोजगारी दर और रोजगार दर में गिरावट दर्ज की गई है। अप्रैल की तीव्र गिरावट के बाद अगले तीन महीनों में लगातार रोजगार की संख्या बढ़ी थी लेकिन अगस्त का महीना रोजगार में गिरावट के संकेत दे रहा है।

श्रम भागीदारी दर (एलपीआर) 30 अगस्त को समाप्त सप्ताह में गिरकर 39.5 फीसदी पर आ गई जो मध्य जून के बाद का निम्नतम स्तर है। लॉकडाउन की शुरुआत होने के पहले मार्च में एलपीआर 42-43 फीसदी पर थी। वित्त वर्ष 2019-20 में औसत एलपीआर 42.7 फीसदी थी। लेकिन अप्रैल में आर्थिक गतिविधियां पूरी तरह ठप रहने से यह नाटकीय रूप से गिरकर 35.6 फीसदी रह गई। हालांकि उसके बाद से इसमें सुधार देखा गया। मई में यह थोड़े सुधार के साथ 38.2 फीसदी और जून में 40.3 फीसदी पर पहुंच गई। लेकिन जून के आखिर में यह सुस्त पडऩे लगी और जुलाई के महीने में इसका असर भी दिखा। जुलाई में एलपीआर मामूली सुधार के साथ 40.7 फीसदी दर्ज की गई।


अगस्त में सिर्फ एक हफ्ते की असामान्य बढ़त को छोड़कर बाकी समय एलपीआर में गिरावट ही रही है। 30 अगस्त तक 30 दिनों का गतिमान माध्य 40.7 फीसदी रहा। संभावना है कि अगस्त का एलपीआर जुलाई के स्तर से थोड़ा कम ही रहेगा या फिर उसी स्तर पर टिका रह सकता है। जुलाई स्तर की तुलना में इसमें सुधार की संभावना तो नहीं ही दिख रही है।


अगस्त में बेरोजगारी दर के भी जुलाई के 7.5 फीसदी स्तर से कम होने के आसार कम ही हैं। बेरोजगारी दर के साप्ताहिक आंकड़ों में अगस्त में कुछ हद तक उठापटक रही है। पहले दो हफ्तों में बेरोजगारी दर क्रमश: 8.7 फीसदी और 9.1 फीसदी रही। तीसरे हफ्ते में यह 7.5 फीसदी पर आ गई लेकिन अंतिम हफ्ते में फिर से 8.1 फीसदी की ऊंचाई पर जा पहुंची। इस तरह अगस्त में औसत बेरोजगारी दर 8.3 फीसदी रही है। अगस्त में बेरोजगारी दर का 30 दिनों का गतिमान माध्य भी 8.3 फीसदी ही है।


बेरोजगारी दर के ये आंकड़े जुलाई 2020 में दर्ज 7.4 फीसदी के स्तर से खासे अधिक हैं। इस तरह पूरी आशंका है कि अगस्त में निम्न श्रम भागीदारी दर के साथ-साथ बढ़ी हुई बेरोजगारी दर की दोहरी मार पड़ी है।


इसका परिणाम रोजगार दर में गिरावट के रूप में सामने आया है। रोजगार दर भारत जैसे देश के लिए श्रम बाजार का सबसे अहम संकेतक है। यह बेरोजगारी दर से भी कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण है। बेरोजगारी दर का आशय रोजगार करने के इच्छुक लेकिन रोजगार पाने में असमर्थ लोगों के अनुपात से है। यह अनुपात काम करने के इच्छुक लोगों की संख्या रूपी विभाजक पर निर्भर करता है। बेरोजगारी दर इस विभाजक में होने वाले बदलाव के बारे में कुछ भी बताने में असमर्थ होती है। भारत में समस्या यह है कि बहुत कम लोग ही वास्तव में काम करने के इच्छुक हैं।


अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) के मॉडल पर आधारित अनुमानों के मुताबिक वर्ष 2019 में वैश्विक रोजगार दर 57 फीसदी थी। उसी रिपोर्ट के मुताबिक भारत में रोजगार दर 47 फीसदी रही थी। पश्चिम एशिया के बाहर के बाहर महज तुर्की, इटली, ग्रीस एवं दक्षिण अफ्रीका की ही हालत भारत से खराब रही थी।


भारतीय अर्थव्यवस्था पर निगरानी रखने वाली संस्था सीएमआईई के सीपीएचएस के मुताबिक 2019-20 में भारत की रोजगार दर आईएलओ के अनुमानों से कहीं अधिक खराब थी। इसने 39.4 फीसदी रहने का अनुमान लगाया था। आईएलओ के आंकड़े सरकारी आंकड़ों पर निर्भर होते हैं और रोजगार को परिभाषित करने में काफी नरम होते हैं। वहीं सीएमआईई के अनुमान अधिक सख्त, कम मनमाने एवं मन को सुकून देने वाले होते हैं।


रोजगार दर हमें वास्तव में काम में लगी कामकाजी उम्र वाली जनसंख्या के अनुपात के बारे में बताती है। यह अनुपात 30 अगस्त को समाप्त सप्ताह में गिरकर 36.3 फीसदी पर आ गया। इसके पहले के दस हफ्तों में यह सबसे कम रोजगार दर है। इन दस हफ्तों में औसत रोजगार दर 37.7 फीसदी रही और इसका दायरा 36.9 फीसदी से लेकर 38.4 फीसदी रहा। अगस्त के अंतिम हफ्ते में रोजगार दर के 36.3 फीसदी पर आना चिंताजनक है। यह आर्थिक गतिविधियों के पटरी पर लौटने की प्रक्रिया में थकान आने का संकेत देता है। हमने जून में भी रोजगार दर का सुधार बंद हो जाने पर इस बारे में चिंता व्यक्त की थी। अब हमें इसकी फिक्र  है कि कहीं रोजगार दर में फिसलन तो नहीं है।


अगस्त में रोजगार दर का 30 दिवसीय गतिमान माध्य महीने की शुरुआत से ही गिरावट पर रहा। 30 अगस्त आने तक यह 37.3 फीसदी पर आ गया। अगर अगस्त के आंकड़े इसी स्तर पर बंद होते हैं तो इसका मतलब यही होगा कि जुलाई की तुलना में अगस्त में रोजगार घटे हैं।


साप्ताहिक अनुमानों के औसत आंकड़े के बजाय मासिक अनुमान कहीं अधिक ठोस होते हैं। इसकी वजह यह है कि मासिक अनुमान गैर-प्रतिक्रिया के हिसाब से समायोजित होते हैं। लेकिन अगर गैर-प्रतिक्रिया का वितरण भौगोलिक रूप से समान है तो पूरी संभावना है कि साप्ताहिक अनुमानों का औसत मासिक अनुमानों का एक वाजिब संकेतक है।


ऐसी स्थिति में हमें जुलाई 2020 की तुलना में अगस्त में 35 लाख रोजगारों की गिरावट देखने को मिल सकती है। मई के बाद से रोजगार में कमी का यह पहला मौका होगा और इससे 2019-20 में औसत रोजगार के बीच फासला बढ़कर 1.4 करोड़ हो जाएगा।

(लेखक सीएमआईई के प्रबंध निदेशक एवं मुख्य कार्याधिकारी हैं)

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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कोविड-19 ने बदला शोध का तरीका?

प्रसेनजित दत्ता 



संकट बड़े बदलावों की शुरुआत की वजह बन सकते हैं। कोविड-19 महामारी के उपचार की तलाश ने भी औषधियों और टीकों को लेकर दुनिया भर में होने वाले शोध, चिकित्सकीय परीक्षण और औषधि उत्पादन के तरीके में नाटकीय बदलाव किया है। समय की कमी के चलते पुराने प्रतिद्वंद्वियों के बीच भी साझेदारी और गठजोड़ हुए हैं, सरकारी और निजी क्षेत्र के बीच अप्रत्याशित स्तर का सहयोग देखने को मिला है और टीका बनने के पहले ही उसके उत्पादन के लिए क्षमताएं विकसित की जा चुकी हैं। इसके कारण औषधि शोध कंपनियों की प्राथमिकताओं में भी बदलाव आया है क्योंकि उन्होंने अन्य शोध परियोजनाओं को छोड़कर कोविड-19 के निदान को प्राथमिकता दी है। अपनी उत्पादन क्षमता की वजह से भारत भी इन सब बातों के केंद्र में है लेकिन चिकित्सकीय शोध और टीका बनाने में भी उसकी भूमिका कम अहमियत नहीं रखती।

सामान्य तौर पर किसी नए टीके या औषधि को बाजार में आने में 10 वर्ष या उससे अधिक समय लगता है। कोविड के मामले में शोधकर्ता, औषधि निर्माता कंपनियां तथा नियामक आदि इस समय को यथासंभव कम करने का प्रयास कर रही हैं। यह बात कई बड़े नवाचारों की वजह बन रही है। इसके चलते कुछ जल्दबाजी भी की गई है जो आज भले ही जरूरी हो लेकिन अगर लंबे समय तक कायम रखा गया तो यह खतरनाक साबित हो सकता है। जब हम वैश्विक औषधि उद्योग के महामारी का हल तलाशने के तरीकों पर नजर डालते हैं तो भी प्रश्न उठते हैं। इनमें से दो सवालों का संबंध मरीजों पर असर से है जबकि एक प्रश्न भारतीय औषधि उद्योग के भविष्य से ताल्लुक रखता है।


पहला सवाल यह है कि औषधि निर्माण को लेकर होने वाले शोध, चिकित्सकीय परीक्षण और उत्पादन को लेकर आज जो कुछ हो रहा है वह अस्थायी व्यवस्था है या यह जारी रहेगी? दूसरा, कोविड-19 के कारण फंड और शोधकर्ताओं के रूप में संसाधनों की संक्रामक बीमारी का निदान खोजने में अत्यधिक आवश्यकता पड़ी है। क्या इस बीमारी की दवा आ जाने या इससे बचाव का टीका बन जाने के बाद भी ये संसाधन इसी तरह आसानी से सुलभ रहेंगे? आखिर में तीसरा सवाल: क्या भारत भविष्य में भी इसमें अहम भूमिका निभाता रहेगा या वह केवल एक वैश्विक औषधि निर्माण केंद्र बनकर रह जाएगा?


कुछ बदलावों और उनके निहितार्थों पर नजर डालते हैं। कोविड-19 को लेकर जो वैश्विक प्रतिक्रिया हुई उसके फलस्वरूप बड़ी तादाद में साझेदारियां, गठजोड़ और वैश्विक समूहों का निर्माण देखने को मिला। ऐंटीबॉडी, टीका तथा अन्य तरह के शोध के लिए इनमें रोज इजाफा ही हो रहा है। भारत में सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया जैसी टीका निर्माता से लेकर सिप्ला और वॉकहार्ट जैसी औषधि कंपनियों तक सभी बड़ी-छोटी कंपनियों ने बीते कुछ महीनों में साझेदारियां की हैं या वे बड़े-छोटे समूहों का हिस्सा बनी हैं।


बुनियादी विचार यही है कि शोध के कुछ हिस्सों को बांटकर अलग-अलग जगहों पर समांतर ढंग से विकसित किया जाए ताकि समय की बचत हो सके। यही कारण है कि पारंपरिक दवा निर्माता, टीका शोधकर्ता, विश्वविद्यालयों के विभाग, जैव प्रौद्योगिकी फर्म, जेनोमिक उपक्रम और कृत्रिम मेधा क्षेत्र की स्टार्ट अप दूर होकर भी साथ मिलकर काम कर रहे हैं। शोध के आंकड़े जो कभी जबरदस्त निगरानी में रहते थे उन्हें अब सार्वजनिक मंच पर रखा गया है ताकि दुनिया भर के वैज्ञानिक उनका लाभ ले सकें।


एक और बड़ा बदलाव चिकित्सकीय शोध के तरीके में देखा जा रहा है। चूंकि पारंपरिक तरीके से अस्पताल में चिकित्सकीय परीक्षण किए जाने से प्रतिभागियों को वायरस से और प्रभावित होने का खतरा रहता है इसलिए आभासी चिकित्सकीय परीक्षणों पर जोर बढ़ा है। आभासी परीक्षण नए नहीं हैं लेकिन अब इनका इस्तेमाल बड़े पैमाने पर हो रहा है। प्रतिभागियों तक दवा पहुंचाई जाती है और उनकी प्रगति और उन पर होने वाले असर पर दूर से डिजिटल तरीके से निगरानी रखी जाती है।


ये बदलाव अच्छे हैं लेकिन इसमें बुरी बात यह है कि आपात स्थिति के कारण दुनिया भर के नियामक अपेक्षाकृत कम अवधि के चिकित्सकीय परीक्षण के लिए मान गए हैं और सीमित आंकड़ों पर भरोसा कर रहे हैं और इसी के आधार पर आपात इस्तेमाल के लिए औषधियों को मंजूरी दी जा रही है जबकि उनका दीर्घकालिक चिकित्सकीय परीक्षण जारी रहेगा। यह उस समय देखने को मिला जब अमेरिका के संघीय औषधि प्रशासन ने रेमडेसिविर के आपात इस्तेमाल की इजाजत दे दी जबकि अभी इसके व्यापक प्रभाव का अध्ययन चल रहा है। सोचने वाली बात यही है कि औषधि नियामक ने फिलहाल जो रास्ता खोला है क्या वे उसे बंद कर सकते हैं।


इस बीच चूंकि दुनिया के विभिन्न देशों और अस्पतालों आदि में कोविड-19 के मरीजों की भरमार है इसलिए अनेक अन्य बीमारियों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा पा रहा। इनमें डायबिटीज से लेकर कैंसर और टीबी से लेकर मलेरिया तथा डेंगू जैसी बीमारियां शामिल हैं। चूंकि बहुत बड़े पैमाने पर धन और संसाधन शोध कार्यों में लगाया जा रहा है इसलिए अन्य बीमारियों पर शोध को तवज्जो नहीं मिल पा रही। अतीत में कई पर्यवेक्षक कह चुके हैं कि संक्रामक बीमारियों से संबंधित शोध के साथ औषधि कंपनियां सौतेला व्यवहार करती रही हैं। बहरहाल अब बात एकदम उलट हो चुकी है।


कोविड-19 पर जितना ध्यान दिया जा रहा है और उसके लिए दवाएं और टीका बनाने में जो संसाधन लगाया जा रहा है वह करीब दो से चार साल तक जारी रहेगा। ऐसा इसलिए किसी को नहीं लगता कि शुरुआती टीके या दवाएं कोई चमत्कार करेंगी। ये बस फौरी उपाय होंगे। शोध तब तक जारी रहेगा जब तक कि बेहतर दवाएं और टीके नहीं बन जाते। लेकिन उसके बाद बेहतर यही होगा औषधि उद्योग और सरकारें बीमारियों पर शोध तथा ऐंटी वायरल और ऐंटीबायोटिक पर शोध में संतुलन कायम करें।


भविष्य में भारत की क्या भूमिका होगी? पश्चिमी देश व्यापक तौर पर भारत को उत्पादन केंद्र और चिकित्सकीय परीक्षण की बेहतर जगह तथा बड़ा बाजार मानते हैं। परंतु कोविड-19 शोध में भारतीय कंपनियां और सरकारी शोधकर्ता नई औषधियों और संभावित टीके पर काम कर रहे हैं। पारंपरिक तौर पर भारतीय कंपनियों की नई औषधि या टीका बनाने की कोई पहचान नहीं है। कोविड-19 एक अवसर हो सकता है इस प्रक्रिया को बढ़ावा देने का।


सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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संपादकीय : कोविड से नुकसान




देश में कोविड-19 संक्रमण के मामलों में दिन प्रतिदिन इजाफा हो रहा है और उनके स्थिर होने का कोई संकेत नहीं हैं। भारत ने गत सप्ताह 40 लाख का आंकड़ा पार कर लिया और रविवार को एक दिन में 90,000 से अधिक मामले सामने आए। अब दुनिया में कोविड संक्रमण के कुल सक्रिय मामलों के 12 फीसदी भारत में हैं और कुल मौतों में उसकी हिस्सेदारी 8 फीसदी है। संक्रमण के मामलों में भारत किसी भी समय ब्राजील को पीछे छोड़कर विश्व में दूसरा सर्वाधिक संक्रमित देश बन सकता है। हालांकि आबादी के अनुपात में मृत्यु के मामले कम हैं लेकिन पंाच महीने पहले कल्पना भी नहीं की जा सकती थी कि संक्रमण इस कदर होगा। यदि जांच बढ़ाई गई तो और बुरे हालात सामने आएंगे। केरल और कुछ हद तक दिल्ली में पहले सफलता हासिल हुई थी लेकिन वहां संक्रमण का दूसरा दौर जारी है।

अब जबकि लोगों की आजीविका बचाने के लिए लॉकडाउन लगातार खोला जा रहा है तो टीका बनाना और उसे जल्द से जल्द पूरी आबादी तक पहुंचाना ही संक्रमण को रोकने का इकलौता तरीका है। यह बहुत बड़ा काम है। जैसा कि नंदन नीलेकणी ने इस समाचार पत्र को दिए साक्षात्कार में कहा भी कि एक अरब की आबादी का आधार नामांकन करने में पांच वर्ष लगे लेकिन टीकाकरण जल्दी किया जा सकता है। टीका लगाने वालों का ऑनलाइन प्रशिक्षण और प्रमाणन किया जा सकता है। इस पूरी कवायद में तकनीक की अहम भूमिका होगी। बहरहाल, टीका बनने में अभी भी वक्त  है और यह स्पष्ट नहीं है कि देश में टीके की जल्द उपलब्धता कैसे सुनिश्चित होगी। परंतु सरकार को पूरी तैयारी रखनी होगी।


इस बीच अर्थव्यवस्था पर इसका असर पहले लगाए गए अनुमानों से कहीं अधिक होगा। क्योंकि स्थानीय स्तर पर लगने वाले लॉकडाउन उत्पादन शृंखला को प्रभावित करेंगे और सुधार की प्रक्रिया धीमी होगी। चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में भारतीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर 24 फीसदी गिरी। उत्पादन में गिरावट अनुमान से अधिक थी। अधिकांश विश्लेषक अब पूरे वर्ष के अनुमान में कमी कर रहे हैं। कार बिक्री और पर्चेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स जैसे तीव्र संकेतकों में सुधार हुआ है लेकिन अभी यह देखना है कि क्या यह सुधार बरकरार रहता है। संक्रमण में निरंतर इजाफा मांग और आपूर्ति दोनों को बाधित करेगा। आपूर्ति क्षेत्र के झटके ने मुद्रास्फीति को बढ़ाया है और यह रुख आने वाले महीनों में भी बरकरार रह सकता है। परिणामस्वरूप केंद्रीय बैंक इस स्थिति में नहीं होगा कि वह नीतिगत दरों में कमी करके आर्थिक गतिविधियों की सहायता कर सके। इतना ही नहीं दोहरी बैलेंस शीट की समस्या और बढ़ेगी। रिजर्व बैंक ने ऋण के एकबारगी पुनर्गठन की इजाजत दी है। परंतु सरकारी बैंकों के पुनर्पूंजीकरण पर स्पष्टता नहीं है।


ऐसे हालात में मौद्रिक और राजकोषीय प्राधिकार से यही आशा होगी कि वह कुछ रचनात्मक उपाय लेकर आए। वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) का मसला नई चुनौतियों का एक उदाहरण है। केंद्र सरकार ने राज्यों से अनुशंसा की है कि वे उधारी लेकर जीएसटी में हुई कमी पूरी करें। इसे उपकर बढ़ाकर चुकाया जा सकता है। परंतु कई राज्यों ने इससे इनकार कर दिया है। इसके अलावा व्यापक पैमाने पर दिवालिया होने की घटनाएं रोकने और गरीबों को खपत समर्थन मुहैया कराना जरूरी होगा। सरकार को अपने दायित्व निभाने और अर्थव्यवस्था की मदद करने के लिए ज्यादा संसाधनों की आवश्यकता होगी। ऐसे में उसे जल्दी ही व्यय का संशोधित खाका तैयार करना होगा और अतिरिक्त फंड जुटाने के तरीके तलाश करने होंगे। उधर शिक्षा के क्षेत्र में एक वर्ष का जाया होना तय है। कुल मिलाकर बुरी खबरों का चौतरफा सिलसिला चल रहा है और इनका अंत भी नजर नहीं आ रहा।


सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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What That @#$%! Nixon Can Teach Us


Much has been made of Winston Churchill’s racial contempt for Indians, whom he described as ‘a beastly people’, which would shape his policy of denying Indians emergency food supplies during the 1943 Bengal famine. But not having to bear the crooked cross of colonialism, racism in the US political leadership (beyond the systemic, historical one against African-Americans) has usually received benign desi neglect. With the latest declassified trove of White House tapes exposing his bigotry against Indians, former US President Richard Nixon posthumously hogs the Racist Leader of the Month title.


Nixon is heard describing Indians as ‘pathetic’, ‘repulsive’ and finding it a surprise ‘how they reproduce’. This is pathological racism. As with Churchill, this personal hatred would also be translated into policy. Calling Indira Gandhi a ‘bitch’ in a private conversation declassified by the US State Department in 2005 is one thing.


But was his refusal to let the US intervene in the massacre in East Pakistan in 1971 really quite another? And yet, it is more noteworthy, more ‘honest,’ for the US — the Richard Nixon Presidential Library and Museum, specifically — to (grudgingly) release more of these Nixon tapes.


It is hard to imagine the Indian establishment doing anything remotely similar that ‘exposes’ a past leader in such a light. Indians also tend to protect themselves from charges of their own racism by using the shield of racist victimhood.


Nixon’s expletives made 50 years ago won’t curdle US-India relations today. What it should do is make us aware of all that was real — and much else that is real — and make us less thin-skinned in our condemnations, whether such noxious comments come from past world leaders or present homegrown ones.

Courtesy - The Economic Times.

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Prepare To Deliver The Covid Vaccine


The Covid-19 vaccine will be available sooner or later. The time to begin rolling out the logistics for its distribution and administration to about 60-70% of the population is now. An expert panel led by NITI Aayog’s Vinod Paul is on the job. It must develop a model that has complete buy-in from the states, draws on existing capacities utilised for large immunisation schemes, such as the measles-rubella vaccine administered to 405 million children and the Mission Indradhanush campaign for 90% immunisation coverage of all children. The elimination of smallpox in the 1970s and of polio recently testify to our capacity for mass vaccination.

Identification of recipients and logistics is critical.

Frontline workers in healthcare and security, persons with comorbidities and those above the age of 65 should get priority, roughly 400 million, say experts. Setting up a reliable distribution and delivery network is more complex.

Innovation is key. Such as building on the election network in which 11 million poll workers set up polling stations for 900 million voters in just about six weeks so that no person needs to travel more than two kilometres. For vaccines, temperature-controlled storage, access to syringes and needles, proper disposal of medical waste and trained personnel to administer the vaccine must be factored in. Afoolproof distribution plan is critical to ensure that all persons have access; without it, the number of doses available in country will not matter.

The Paul committee must assess the infrastructural capacity of states for vaccine delivery. The Auxiliary Nurse Midwife-Anganwadi Worker-Accredited Social Health Activist network must be supplemented, training people in each block to serve as auxiliary health workers to administer the vaccine. In developing the plan, the committee must consult widely, invite suggestions. Maintaining the cold chain for the vaccine, if the vaccine calls for it, would mean early procurement and installation of equipment.

The Centre must have oversight and control over delivery, with states implementing the plan under central guidance.

Courtesy - The Economic Times.

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ब्याज पर ब्याज लगाने का सवाल

आलोक जोशी 



‘सवाल चक्रवृद्धि ब्याज का है। राहत के लिए किस्त भरने से छूट और जुर्माने के तौर पर ब्याज एक साथ नहीं चल सकते। रिजर्व बैंक को यह बात साफ करनी होगी।’ यह कहना है सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस आर सुभाष रेड्डी का। सुप्रीम कोर्ट ने बैंक कर्ज पर किस्त न भरने की छूट बढ़ाई तो नहीं है, लेकिन यह निर्देश जरूर दे दिया है कि जिन देनदारों का कर्ज 31 अगस्त तक एनपीए नहीं किया गया है, अब उसे इस मामले पर फैसला होने तक एनपीए नहीं किया जा सकता। 

आपको या हमको इसमें होम लोन, कार लोन या पर्सनल लोन की अपनी ईएमआई पर राहत नजर आ रही है। हालांकि, जानकार बार-बार सलाह देते रहे हैं कि अगर बहुत जरूरी न हो, तो इस मोरेटोरियम या राहत का फायदा न उठाएं, क्योंकि आगे चलकर यह बहुत महंगा पड़ सकता है। महंगा पड़ने की वजह वही चक्रवृद्धि ब्याज या कंपाउंड इंटरेस्ट है, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाया है। कारण यह है कि छूट का एलान करते समय ही आरबीआई ने साफ कह दिया था कि छूट सिर्फ किस्त भरने में दी जा रही है और इस छूट के दौरान भी बकाया रकम पर ब्याज जुड़ना जारी रहेगा। इस वक्त ब्याज का यही हिसाब झगड़े का कारण बना हुआ है। अदालत इस बात पर सवाल उठा रही है कि ब्याज पर ब्याज कैसे वसूला जा रहा है? सरकार और बैंकों के संगठन आईबीए की तरफ से यह दलील लगातार दी जा रही है कि ब्याज पर ब्याज ही तो बैंकिंग सिस्टम को चलाता है। 

भारत में होम लोन देने वाली सबसे बड़ी कंपनी एचडीएफसी के चेयरमैन तो इस पूरे मसले को ही दुर्भाग्यपूर्ण बता चुके हैं। अपने शेयरधारकों के नाम जारी सालाना चिट्ठी में उन्होंने लिखा कि मोरेटोरियम के मामले पर सुप्रीम कोर्ट आरबीआई से सवाल पूछे, यही दुर्भाग्यपूर्ण है। जिन बुनियादी सिद्धांतों पर वित्तीय प्रणाली चलती है, उन पर ही देश के केंद्रीय बैंक को अदालत के सामने जवाबदेह क्यों होना चाहिए? कोटक महिंद्रा बैंक के मुखिया उदय कोटक और स्टेट बैंक के चेयरमैन रजनीश कुमार भी मोरेटोरियम बढ़ाए जाने के पक्ष में नहीं हैं।  उनके लिए मुश्किल और बड़ी है, क्योंकि वहां बात सिर्फ घर या कार के कर्ज की नहीं है। उद्योग और व्यापार में लगे बहुत सारे लोगों, खासकर छोटे और मझोले कारोबारियों के लिए कर्ज चुकाना मुश्किल हो रहा है। सिर्फ स्टेट बैंक का करीब पांच लाख तिरसठ हजार करोड़ रुपये का कर्ज इस वक्त मोरेटोरियम के दायरे में है। 

रिजर्व बैंक की ताजा फाइनेंशियल स्टेबिलिटी रिपोर्ट से पता चलता है कि सरकारी बैंकों से खुदरा लोन लेने वाले करीब 80 फीसदी लोग मोरेटोरियम की शरण में जा चुके हैं, यानी अब किस्त नहीं भर रहे हैं। नॉन बैंकिंग फाइनेंस कंपनियों के लिए यह आंकड़ा 45.9 प्रतिशत बताया गया और छोटे बैंकों के लिए 73.2 प्रतिशत। छोटे बैंकों के लिए मुसीबत कितनी बड़ी है, इसका अंदाजा इसी से लगता है कि जहां स्टेट बैंक, आईसीआईसीआई, कोटक महिंद्रा और एक्सिस जैसे बड़े बैंकों के करीब 30 प्रतिशत से कम कर्ज मोरेटोरियम के दायरे में हैं, वहीं बंधन बैंक के लिए यह अनुपात 71 प्रतिशत है। बंधन बैंक ज्यादातर कर्ज बहुत छोटे व्यापारियों को देता है। बैंकों को डर है कि अभी न जाने और लोग किस्तें न चुकाने की छूट मांगने वाले हैं। 

जाहिर है, इस वक्त बैंक, आरबीआई और सरकार, सभी इस मुसीबत से निकलने का रास्ता ढूंढ़ रहे हैं। उन्हें तीर भी चलाना है और परिंदों को भी बचाना है, यानी बैंक और कर्जदार, दोनों को ही बचाने का रास्ता निकालना है। मुसीबत बहुत बड़ी है और इतिहास में कोई उदाहरण नहीं है, जिसे नजीर बनाकर आगे का रास्ता देखा जा सके। इसीलिए वित्त मंत्री बैंक प्रमुखों के साथ बैठकें कर रही हैं और रिजर्व बैंक भी उपाय तलाशने में जुटा है। 

वित्त मंत्री ने पिछले दिनों बैंकरों की एक बैठक बुलाई और हिसाब लिया कि कहां किसको कितनी राहत दी जा चुकी है या दी जा रही है? खासकर एमएसएमई, यानी सूक्ष्म, लघु और मझोले उद्योगों के लिए जो तीन लाख करोड़ रुपये की क्रेडिट गारंटी स्कीम लाई गई है, उसका जायजा लिया गया। बैंकों ने बताया कि अगस्त के अंत तक एक लाख साठ हजार करोड़ रुपये के आसपास के लोन पास हुए, जिनमें से एक लाख ग्यारह हजार करोड़ रुपये के लोन दिए जा चुके हैं। वित्त मंत्री का ज्यादा जोर इस बात पर था कि त्योहारी मौसम आने से पहले जितनी राहत दी जा सकती है, उसे कर्जदारों तक पहुंचाने का इंतजाम किया जाए। 

बैंकों और एनबीएफसी कंपनियों की सबसे बड़ी चिंता यह है कि कोरोना के पहले तक जिस कर्ज पर एक महीने किस्त नहीं आती थी, उसे वे एनपीए मानकर इंतजाम शुरू कर देते थे। यही सीमा अब तीन महीने कर दी गई है, और यह तीन महीने भी तब से गिने जाएंगे, जब मोरेटोरियम की मियाद खत्म हो जाए। यानी 1 सितंबर से गिनती शुरू होती, लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा करने पर भी रोक लगा दी है, जब तक वह इस बारे में अगला आदेश न सुना दे। बैंकों और रिजर्व बैंक, दोनों के लिए इसमें संकट यह है कि उन्हें इस बात का पता ही नहीं चल पाएगा कि कितना कर्ज वापस आने वाला है और कितना डूबने का खतरा है! यही बात वे सुप्रीम कोर्ट में स्पष्ट करने की कोशिश कर रहे हैं। 

जहां तक ब्याज का सवाल है, तो बैंक में रखी रकम पर आपको मूल के साथ ब्याज पर भी ब्याज मिलता है और इस बात की आशंका काफी ज्यादा है कि अगर कहीं अदालत ने वह ब्याज माफ करने का आदेश दे  दिया, तो उसका खामियाजा बैंक में पैसा रखने वाले खाताधारकों को भुगतना पड़ सकता है। उनकी बचत पर ब्याज पहले ही बहुत कम हो चुका है, और ऐसी हालत  में बैंक उसे और घटाने पर मजबूर हो सकते हैं, यानी मुसीबत के मारों में एक बिरादरी और शामिल हो जाएगी। 

ऐसी सूरत में जिम्मेदारी सरकार पर आ सकती है कि बैंकों को होने वाले नुकसान की भरपाई वह अपने खजाने से करे, लेकिन उसके खजाने का जो हाल है, उसे देखते हुए यह समझना भी मुश्किल नहीं है कि ऐसा हुआ, तब भी उसका बोझ आम भारतीय के सिर पर ही आएगा। उम्मीद करनी चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट इस पर फैसला करते समय इस पहलू को भी ध्यान में रखेगा। 

(ये लेखक के अपने विचार हैं)


सौजन्य - हिन्दुस्तान।

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चौतरफा संकट : अर्थव्यवस्था में भारी गिरावट मंदी का संकेत


ऐसे समय में जब पिछले कुछ दिनों में पूरी दुनिया के मुकाबले सबसे ज्यादा कोरोना संक्रमितों का आंकड़ा देश में सामने आ रहा है, विकास दर का ऋणात्मक हो जाना गंभीर आर्थिक संकट का पर्याय है। वित्तीय वर्ष 2020-21 की पहली तिमाही के आंकड़ों मेें देश की विकास दर -23.9 गिर जाना स्तब्धकारी है। वर्ष 2019-20 में इस तिमाही में विकास दर 5.2 फीसदी रही थी। देश में मौजूदा पीढ़ी के लोगों ने शायद ही कभी इतनी बड़ी गिरावट देखी हो। मगर, विडंबना यह है कि इस बीच कोरोना संक्रमण की दूसरी वेव हमारे अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के प्रयासों को बड़ी चोट दे रही है। कहा जा रहा था कि जुलाई में अर्थव्यवस्था पटरी पर लौट रही है, लेकिन कोरोना के कहर के बीच फिलहाल तुरंत समाधान की कोई गुंजाइश नजर भी नहीं आती। निस्संदेह यह स्थिति मोदी सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती है। कहा जा रहा है कि कोरोना संकट के चलते अचानक घोषित सख्त लॉकडाउन ने अर्थव्यवस्था को बुरी तरह झकझोरा है। भारत जैसे देश में जहां जीडीपी में सर्विस सेक्टर का योगदान साठ फीसदी है, वहां करोड़ों लोगों ने रोजगार खोये हैं। अकेले टूरिज्म इंडस्ट्री में तीन से चार करोड़ नौकरियां गई हैं। जानकारों का मानना है कि सामाजिक जीवन को नियंत्रित करने के लिए तो लॉकडाउन की जरूरत थी लेकिन देश की आर्थिक गतिविधियों को पूरी तरह से बंद नहीं किया जाना चाहिए था। जीडीपी का ऋणात्मक हो जाने का आंकड़ा ऐसे समय पर आया है जब देश में अनलॉक चार की प्रक्रिया शुरू हो रही है और कुछ क्षेत्रों को फिर से खोला जा रहा है। हालांकि, लॉकडाउन के परिणामों से केंद्र सरकार पहले से ही वाकिफ थी। यही वजह है कि राज्यों से लॉकडाउन लगाने का अधिकार वापस ले लिया गया था और केवल कंटेनमेंट जोन में ही लॉकडाउन लगाने की इजाजत दी गई ताकि आर्थिक गतिविधियों में और व्यवधान न आने पाये।


अधिकांश रेटिंग एजेंसियां व आर्थिक विशेषज्ञ देश की जीडीपी में गिरावट का अनुमान लगा रहे थे, लेकिन इतनी बड़ी गिरावट का अंदेशा नहीं था। निस्संदेह जीडीपी के आंकड़े मोदी सरकार के लिए बड़ा झटका है और विपक्ष को धारदार हमले का मौका देते हैं। जीडीपी के आंकड़े आने से पहले ही कांग्रेस की तरफ से वीडियो जारी करके मोदी सरकार पर बड़ा हमला बोला गया था। उधर, जीडीपी आंकड़े आने से पहले सोमवार को शेयर बाजार में भारी गिरावट दर्ज की गई। शायद बाजार को अनुमान था कि अर्थव्यवस्था में बड़ी गिरावट दर्ज होने वाली है। दरअसल, जीएसटी के कलेक्शन में आई भारी गिरावट पहले ही संकेत दे रही थी कि जीडीपी के आंकड़ों में बड़ी गिरावट आ सकती है, लेकिन इतनी बड़ी गिरावट का आकलन नहीं था। कभी देश में दो अंकों में विकास दर पहुंचने की बात कही जाती थी, अब यह ऋणात्मक रूप से दो अंकों तक जा पहुंची है, जिसके भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए दूरगामी नकारात्मक परिणाम होंगे, जिससे उबरने में देश को लंबा वक्त लग सकता है। वह भी ऐसे दौर में जब कोरोना संकट और गहरा होता जा रहा है। हालांकि, सरकार को भी इस बात का अहसास था कि देश की जीडीपी में बड़ी गिरावट दर्ज हो सकती है। उसने कुछ कदम इस दिशा में उठाये भी, मगर स्थितियां इतनी विकट हो चुकी थीं कि धरातल पर उनका प्रभाव नजर नहीं आया। निस्संदेह इस बड़े संकट से उबरने के लिये केंद्र सरकार को युद्ध स्तर पर प्रयास करने की जरूरत है। यह अच्छी बात है कि इस दौरान कृषि क्षेत्र ने बेहतर प्रदर्शन किया है, जिससे यह विश्वास बना है कि देश को खाद्यान्न संकट से नहीं जूझना पड़ेगा। बहरहाल, जीडीपी के पहले तिमाही के निराशाजनक आंकड़े आर्थिक मंदी का भी संकेत है, जिससे आम आदमी के जीवन पर खासा प्रतिकूल असर पड़ सकता है। उम्मीद की जानी चाहिए कि तीसरी तिमाही तक जीडीपी में धनात्मक वृद्धि देखने को मिलेगी।


सौजन्य - दैनिक ट्रिब्यून।

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संसद का कोरोनाकालीन सत्रः जरूरी है प्रश्नकाल



कोरोना महामारी के बीच 14 सितंबर से शुरू हो रहे संसद के मानसून सत्र की अधिसूचना जारी होने के साथ ही एक विवाद शुरू हो गया। यह संक्षिप्त सत्र संकटकालीन परिस्थितियों में बुलाया जा रहा है और सभी सांसदों और कर्मचारियों की सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए अत्यावश्यक कार्य निपटाकर जल्द से जल्द इसे संपन्न करने की भावना ही फिलहाल सर्वोपरि है। इसलिए इस बार संसद के टाइमटेबल में कुछ बदलाव किए गए हैं, जिसमें प्रश्नकाल को समाप्त करने का प्रस्ताव भी शामिल है। इसके खिलाफ कई विपक्षी नेताओं की तीखी प्रतिक्रिया आना स्वाभाविक है।


सरकार की तरफ से कहा गया कि लोकसभा और राज्यसभा सचिवालयों द्वारा बुधवार को अधिसूचना जारी किए जाने से पहले सभी छोटे-बड़े दलों के नेताओं से राय-मशविरा कर लिया था और तृणमूल कांग्रेस के नेता डेरेक ओ ब्रायन को छोड़कर सबने इस पर सहमति जताई थी। बहरहाल, जब अधिसूचना जारी हुई तो विपक्षी सांसदों ने इस पर तीव्र आपत्ति की। यों भी संसद का प्रश्नकाल हरेक सांसद को सरकार के क्रिया-कलापों पर सवाल करने का ऐसा अधिकार देता है, जिसे कोई छोड़ना नहीं चाहेगा। प्रश्नकाल को संसदीय व्यवस्था की आत्मा कहा जा सकता है। संसद में ज्यादातर समय पार्टी लाइन पर बहस चलती है, लेकिन प्रश्नकाल में दृश्य अलग होता है। इस दौरान सांसद अपने तारांकित प्रश्नों में सरकारी तंत्र के कामकाज से जुड़े सवाल पूछते हैं, और सरकारी जवाब से संतुष्ट न होने पर दो पूरक प्रश्नों के जरिये सरकार को स्पष्ट जवाब देने के लिए मजबूर करते हैं।


इस दौरान अक्सर पार्टी लाइन भी धुंधली होती नजर आती है। जब-तब अपने पक्ष के ही सांसदों के सवालों से घिर जाने पर सरकार की बड़ी किरकिरी होती है। सरकार से सवाल करने और उसकी जिम्मेदारी तय करने की यह परंपरा संसदीय लोकतंत्र के उस दौर की नुमाइंदगी करती है, जब सांसद किसी पार्टी के टिकट पर नहीं बल्कि अपने दम पर चुनकर आते थे और संसद में पहुंच जाने के बाद अपना पक्ष तय करते थे। लोकतंत्र की लंबी यात्रा के दौरान राजनीतिक पार्टियां उभरीं और मजबूत होती गईं। उन्होंने लोकतांत्रिक चेतना और प्रक्रियाओं को कितना फायदा पहुंचाया है और किन-किन पहलुओं पर उसे कमजोर किया है, इस पर शोध होते रहते हैं, लेकिन आज की तारीख में हमारे लिए निर्दलीय लोकतंत्र की कल्पना करना भी कठिन है।


बहरहाल, प्रश्नकाल के रूप में पार्टी से ऊपर उठकर सरकार के कार्यों की पड़ताल करने के जो मौके अभी उपलब्ध हैं, उन्हें कम करने में कोई बुद्धिमानी नहीं है। यह अच्छी बात है कि विपक्ष का रुख देखकर सरकार ने लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति को मानसून सत्र में रोज आधे घंटे का प्रश्नकाल रखने और इसमें गैर-तारांकित यानी लिखित जवाबों वाले सवाल लेने का सुझाव दिया है। यह पर्याप्त नहीं, फिर भी इससे मानसून सत्र एक गहरा दाग झेलने से बच जाएगा।


सौजन्य - नवभारत टाइम्स।

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The worst affected economy

Written by P Chidambaram 



Finally, the fake narrative that was peddled by the government through 2019-20, and even thereafter, has been exploded by the Central Statistics Office (CSO). Those are indeed harsh words in a column but the realities are harsher, the disdain of an uncaring government is so provocative, and the suffering of the people is so enormous that one is compelled to use harsh words. The intention is not to cause offence but to sound a loud wake-up call to those who are in power and those who support those in power.


The provisional estimates of GDP for the quarter April-June 2020 (Q1 of 2020-21), released by the CSO, tell us a grim tale. GDP in the first quarter has declined by a whopping 23.9 per cent. That means, about one quarter of the gross domestic output as on June 30, 2019, has been wiped out in the last 12 months. Note that when output is lost, the jobs that produce that output are lost, the income that those jobs provide are lost, and the families that depend on those incomes suffer. According to estimates made by the CMIE, between the economic slowdown and the pandemic, at its peak, 121 million jobs were lost. These included regular salaried jobs, casual jobs, and self-employment. If you wish to do a reality check, just look around or ask questions of other households in your street or neighbourhood.


At 23.9 per cent, India is the worst affected major economy (among the G-20) in the period April-June, 2020 (source: IMF).


Don’t Blame God



The only sector that has grown is Agriculture, Forestry and Fishing at 3.4 per cent. The Finance Minister who blamed an ‘Act of God’ for the decline should actually be grateful to the farmers and the gods who blessed the farmers. Every other sector of the economy has declined sharply, some precipitously. Manufacturing is down 39.3 per cent; Construction by 50.3 per cent; and Trade, Hotels, Transport and Communications by 47.0 per cent.


The estimates did not come as a surprise to any one who has closely observed the Indian economy. What we have is an economic tragedy. It was foretold by many economists, most recently by the RBI in its Annual Report released last week. Look at the salient conclusions of the RBI:


– High frequency indicators that have arrived so far point to retrenchment in activity that is unprecedented in history;


– the total stimulus package (liquidity and fiscal measures) for G20 countries averaged 12.1 per cent of GDP (5.1 per cent of GDP for EMEs and 19.8 per cent of GDP for AEs). India’s fiscal stimulus was about 1.7 per cent;


– the shock to consumption is severe, and it will take quite some time to mend and regain the pre-Covid-19 momentum; and


– a majority of respondents (in an RBI survey) reported pessimism relating to the general economic situation, employment, inflation and income.


Slide Predates Pandemic


The Indian situation is different from other countries’ because our economic slide started long before the first case of Covid-19 was identified. Our slide started with demonetisation. For eight successive quarters in 2018-19 and 2019-20, GDP growth declined every quarter, from a high of 8.2 per cent to a low of 3.1 per cent. This point was made a zillion times, but the government pretended that India was the ‘fastest growing economy in the world’! And in a barren desert without any sign of water, the Finance Minister and the Chief Economic Adviser saw green shoots!


We are still in a dark tunnel. Many economists believe that we can find our way out of it, even at this stage, if the government took the fiscal measures necessary to arrest the slide, boost demand/consumption, and, consequently, revive production and jobs. The key is expenditure — government and private consumption expenditure. It does not matter how much is spent under which head as long the money is found and spent. The government can find the money from many sources — disinvestment, more borrowing by relaxing the limits under the FRBM Act; using the generous funds to fight the pandemic promised by the IMF, World Bank Group, ADB and others (USD 6.5 billion); and, as a last resort, monetising part of the deficit.


Three Bold Moves


Part of the money must be transferred in cash to the poor; part should be used for government capital expenditure in infrastructure; part used to bridge the GST compensation gap; and part used for re-capitalising banks and enabling them to lend. Once there is an indication of revival of demand, private corporates, that are cash-rich and have de-leveraged, will invest and produce.

The next bold move should be to use the mountain of food grain to put food in the homes of poor families and to pay wages-in-kind to start massive public works. The godowns will be full again soon thanks to the record-breaking harvest expected this year.


The third big move will be to decentralise powers to the states and empower them financially. The Centre should abandon its ill-timed attempt to interfere with agricultural produce marketing, regulate supply of essential commodities, and control district central and urban cooperative banks. One Nation, One Everything is a very bad idea.


My proposals do not factor two unknowns — the course of the pandemic and the intentions of China —because, as I write, they remain unknowns.

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झुग्गी बस्तियों को हटाने का जो निर्देश सुप्रीम कोर्ट ने दिया, वह पूरे देश में प्रभावी हो सके तो बेहतर



सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली और उसके आस-पास रेल पटरियों के किनारे स्थापित झुग्गी बस्तियों को हटाने का जो निर्देश दिया, वह पूरे देश में प्रभावी हो सके तो बेहतर। दिल्ली-एनसीआर में रेल पटरियों के दोनों ओर बड़ी संख्या में बसी झुग्गी बस्तियों का मामला सुप्रीम कोर्ट के समक्ष इसलिए पहुंचा, क्योंकि ये बस्तियां गंदगी का गढ़ बनने के साथ प्रदूषण फैलाने का भी जरिया बनी हुई थीं। हालांकि राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण यानी एनजीटी ने 2018 में ही इन झुग्गी बस्तियों को हटाने का आदेश दिया था, लेकिन किन्हीं कारणों से उस पर अमल नहीं हो सका और वह भी तब जब ये झुग्गियां दिल्ली-एनसीआर को प्रदूषित करने के साथ रेलवे की सुरक्षा के लिए खतरा भी बनी हुई थीं।


जिन कारणों से एनजीटी के आदेश के बाद भी ये झुग्गी बस्तियां नहीं हट सकीं उनका संकेत सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी से मिलता है कि उसके फैसले के क्रियान्वयन में न तो कोई अदालती आदेश आड़े आना चाहिए और न ही किसी तरह का राजनीतिक हस्तक्षेप सहन किया जाना चाहिए। यह एक तथ्य है कि दिल्ली ही नहीं, देश भर में रेल पटरियों के किनारे झुग्गी बस्तियां इसलिए बस जाती हैं, क्योंकि नेता उन्हें संरक्षण देते हैं। नेताओं के स्वार्थ के आगे नौकरशाह भी समस्या से मुंह फेरने में ही अपनी भलाई समझते हैं।



नि:संदेह भारत एक गरीब देश है और यहां करोड़ों लोग झुग्गी बस्तियों में रहने को विवश हैं, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि रेल पटरियों के किनारे अतिक्रमण करने की छूट दे दी जाए। दुर्भाग्य से ऐसा ही हो रहा है। देश भर में रेल पटरियों के साथ-साथ राजमार्गो के किनारे और अन्य सार्वजनिक स्थलों पर भी झुग्गी बस्तियां देखी जा सकती हैं। कई बार तो वे इतनी बड़ी हो जाती हैं कि उन्हें हटाने के बजाय उनका नियमितीकरण करने पर विचार होने लगता है, क्योंकि वहां रहने वाले राजनीतिक दलों के लिए वोट बैंक बन जाते हैं।



सुप्रीम कोर्ट ने यह पाया कि दिल्ली-एनसीआर में करीब 140 किमी रेल पटरियों के किनारे झुग्गियां बसी हुई हैं। इनमें 48 हजार के लगभग 70 किमी रेल पटरियों के इर्द-गिर्द हैं। यह स्थिति देश के अन्य हिस्सों में भी है। कहीं-कहीं तो रेल पटरियों के बिल्कुल निकट पक्के घर बन गए हैं या फिर वहां सामाजिक अथवा व्यावसायिक गतिविधयां संचालित होती हैं।


दो साल पहले अमृतसर में रेल पटरियों किनारे रावण दहन का आयोजन एक भीषण दुर्घटना का कारण इसीलिए बना था, क्योंकि किसी ने इसकी परवाह नहीं की कि यह स्थिति सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बन सकती है। उचित यह होगा कि रेलवे सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश को पूरे देश में प्रभावी करने पर विचार करे।


सौजन्य- जागरण।

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