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-Rajeev Kumar (Editor-in-chief)

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Saturday, January 9, 2021

पानी रोकने की रणनीति (राष्ट्रीय सहारा)

रविशंकर

भारत ने पंजाब से रावी नदी का बहाव पाकिस्तान की ओर कम करने की कवायद एक बार फिर से शुरू कर दी है। रावी नदी के बहाव को नियंत्रित करने के लिए भारत ने शाहपुरकंडी डैम का निर्माण कार्य शुरू कर दिया है‚ ताकि पाक की ओर जाने वाले रावी के पानी को नियंत्रित किया जा सकेगा। मालूम हो‚ केंद्र सरकार ने २०१८ में पाकिस्तान के साथ तनाव के बीच भारत की नदियों के वहां की ओर बहाव को कम करने की बात कही थी। यह डैम पंजाब सरकार द्वारा २७९५ करोड़ रु पये की अनुमानित लागत से बनाया जा रहा है। ॥ इस प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए केंद्र सरकार ४८५.३८ करोड़ रु पये की मदद भी कर रही है। इस डैम के मुकम्मल होने से पड़ोसी देश पाकिस्तान को पानी के लिए तरसना होगा। साथ ही पंजाब और उत्तर भारत के अन्य राज्यों में जल संकट का काफी हद तक निवारण होगा। पंजाब एवं केंद्र सरकार की इस साझा परियोजना को पूरा करने का लIय मई २०२२ निर्धारित किया गया है। 


बहरहाल‚ शाहपुरकंडी में रणजीत सागर बांध परियोजना पहले से ही कार्यान्वित है‚ लेकिन जल संधि के तहत जिन पूर्वी नदियों के पानी के इस्तेमाल का अधिकार भारत को मिला था उसका उपयोग करते हुए भारत ने सतलुज पर भांखड़ा बांध‚ ब्यास नदी पर पोंग और पंदु बांध और रावी नदी पर रंजित सागर बांध का निर्माण किया। इसके अलावा भारत ने इन नदियों के पानी के बेहतर इस्तेमाल के लिए ब्यास–सतलुज लिंक‚ इंदिरा गांधी नहर और माधोपुर–ब्यास लिंक जैसी अन्य परियोजनाएं भी बनाई। इससे भारत को पूर्वी नदियों का करीब ९५ प्रतिशत पानी का इस्तेमाल करने में मदद मिली। 


हालांकि इसके बावजूद रावी नदी का करीब २ मिलियन एकड़ फीट (एमएएफ) पानी हर साल बिना इस्तेमाल के पाकिस्तान की ओर चला जाता है। इस पानी को रोकने के लिए भारत डैम का निर्माण कर रहा है। बांध के बनने से पंजाब के साथ ही जम्मू–कश्मीर को भी लाभ होगा। बांध से २०६ मेगावाट बिजली तैयार होगी‚ जबकि पंजाब की ५००० हेक्टेयर एवं जेएंडके की ३२१७२ हेक्टेयर भूमि भी सिंचित होगी। एक अनुमान के मुताबिक इससे सालाना ८५२.७३ करोड़ रु पये का सिंचाई और बिजली का लाभ भी होगा। जम्मू–कश्मीर सरकार को इस प्रोजेक्ट पर एक पैसा भी खर्च नहीं करना है। यही नहीं नये समझौते के मुताबिक जम्मू–कश्मीर को जितने पानी की भी जरूरत होगी वह बांध से ले सकेगा। बता दे‚ रावी नदी भारत के पश्चिम और उत्तरी हिस्से के बीच से बहने वाली वो नदी जो भारत के साथ–साथ पाकिस्तान की जमीं को भी सींचती है।


 मालूम हो‚ भारत और पाकिस्तान के बीच १९६० में हुई सिंधु नदी जल संधि के तहत सिंधु नदी की सहायक नदियों को पूर्वी और पश्चिमी नदियों में विभाजित किया गया। सतलज‚ ब्यास और रावी नदियों को पूर्वी नदी बताया गया जबकि झेलम‚ चेनाब और सिंधु को पश्चिमी नदी बताया गया। रावी‚ सतलुज और ब्यास जैसी पूर्वी नदियों का पूरी तरह इस्तेमाल के लिए भारत को दे दिया गया। इसके साथ ही पश्चिम नदियों सिंधु‚ झेलम और चेनाव नदियों का पानी पाकिस्तान को दिया गया‚ जबकि इसका एक बहुत छोटा हिस्सा चीन और अफगानिस्तान को भी मिला हुआ है। 


आंकड़ों के अनुसार लगभग ३५ करोड़ की आबादी सिंधु नदी के थाले में रहती है। खैर‚ समझौते के मुताबिक पश्चिमी नदियों का पानी‚ कुछ अपवादों को छोड़े दें तो भारत बिना रोकटोक के इस्तेमाल कर सकता है‚ जैसे बिजली बनाना‚ कृषि के लिए सीमित पानी इत्यादि। भारत को इसके अंतर्गत इन नदियों के २० फीसद जल के उपयोग की अनुमति है‚ जबकि वर्तमान में वह मात्र ७ फीसद जल का ही उपयोग इन कार्यों के लिए कर रहा है। पाकिस्तान ने कई बार आरोप लगाया है कि भारत सिंधु की नदियों पर बांध बनाकर पानी का दोहन करता है और उसके इलाके में पानी कम आने के कारण सूखे के हालात रहते हैं। इन मसलों पर पाकिस्तान ने भारत को कई बार अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में घसीटा है किंतु अधिकांशतः मामलों में उसे सफलता नहीं मिली है।


 सिंधु समझौता विश्व बैंक की मध्यस्थता में हुआ एक अंतरराष्ट्रीय समझौता है। न्यायालय का मानना है कि अगर दो राष्ट्रों के बीच मूलभूत स्थितियों में परिवर्तन हो तो किसी भी संधि को रद्द किया जा सकता है। यदि भारत ऐसा कोई कदम उठाता है तो पाकिस्तान एक मरुûस्थल में बदल सकता है। अतः इससे समझा जा सकता है कि पाकिस्तान के लिए सिंधु और उसकी सहायक नदियों का पानी क्या मायने रखता है। खैर‚ भारत के इस चक्रव्यूह में फंसे पाकिस्तान का आर्तनाद कुछ समय तक अवश्य ही अंतरराष्ट्रीय मंच पर सुनाई पड़ेगा‚ लेकिन वर्तमान में पानी की कमी सीमाओं के दोनों तरफ लोगों की भावनाओं को हवा दे रही है। 

सौजन्य - राष्ट्रीय सहारा।

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स्वतंत्रता और लोकतंत्र के देश में ( राष्ट्रीय सहारा)

पिछले बुधवार को संयुक्त राज्य अमेरिका में वर्तमान‚ लेकिन अगले राष्ट्रपति पद के चुनाव में पराजित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के सैकड़ों हथियारबंद समर्थकों ने अमेरिकी संसद में घुस कर ऐसी अफरा–तफरी पैदा कर दी‚ कि पूरी दुनिया हैरान रह गई। ये हथियारबंद ट्रम्प समर्थक संसद की उस कार्यवाही पर दबाव बना रहे थे‚ जहां चुनाव नतीजों पर संसद की मुहर लगनी थी। यह अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव की एक प्रक्रिया है। अर्थात हिंसक भीड़ ताकत से जनमत को प्रभावित करना चाह रही थी। 

 ७४ वर्षीय डोनाल्ड ट्रम्प फिलहाल राष्ट्रपति हैं। अगले राष्ट्रपति पद के लिए जो चुनाव हुए‚ उसमें वह अपनी रिपब्लिकन पार्टी के दुबारा उम्मीदवार थे‚ लेकिन पिछले दिनों जो चुनाव हुए उसमें वह डेमोक्रेट उम्मीदवार जो बाइडेन से पिछड़ गए। उन्होंने अदालत की शरण ली‚ लेकिन वहां भी उनका समर्थन नहीं मिला। अमेरिकी कायदों के मुताबिक इसी माह की बीस तारीख को नवनिर्वाचित राष्ट्रपति को पदभार ग्रहण करना है। इसके पहले संसद की मुहर लगती है। इसी वास्ते जो प्रक्रिया चल रही थी उसे बलात प्रभावित करने के इरादे से ट्रम्प ने अपने समर्थकों से संसद की तरफ कुच करने की अपील की और तैयार बैठे समर्थक संसद भवन में दोपहर लगभग दो बजे घुस भी गए। उन लोगों के घुसते ही अफरा–तफरी स्वाभाविक थी। यह लगभग वैसा था जैसा भारत में १३ दिसम्बर २००१ को संसद की चल रही कार्यवाही के बीच लश्कर–ए–तैयबा और जैश–ए–मोहम्मद के आतंकवादियों का हमला था। 

 इस बीच संसद ने जो बाइडेन और भारतीय मूल की कमला हैरिस के क्रमशः राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति चुने जाने की पुष्टि कर दी है। ५३८ सदस्यों वाली कांग्रेस (यूएसए संसद) में जो बाइडेन को ३०६ और डोनाल्ड ट्रम्प को २३२ सीटें मिली हैं। बुधवार की घटना कोई नवोदित लोकतांत्रिक देश में नहीं उस अमेरिका में हुई है‚ जहां स्वतंत्रता और लोकतंत्र की लम्बी लड़ाई लड़ी गई है। ४ जुलाई १९७६ को जॉर्ज वाशिंगटन के नेतृत्व में एक लम्बे संघर्ष के बाद आजादी हासिल की थी और लोकतंत्र का संकल्प लिया था। हर वर्ष ४ जुलाई को अमेरिका अपनी आजादी का जश्न मनाता है। वह यूरोपीय देशों से कुछ अर्थों में भिन्न है कि वहां रेनसां या प्रबोधनकाल नहीं आया और समाजवादी बुखार भी उस तरह नहीं आया जैसा यूरोप के देशों में आया‚ लेकिन लोकतंत्र के उसके वायदे हमेशा चिह्नित किए जाते रहे हैं। आधुनिक जमाने के अनेक सामाजिक दार्शनिकों ने वहां के लोकतांत्रिक आंदोलन से प्रेरणा ली है। इसमें कार्ल मार्क्स भी हैं औरजवाहरलाल नेहरू व भीमराव आम्बेडकर भी। उन्नीसवीं सदी में भारत के किसान नेता और महाराष्ट्रीय नवजागरण के प्रतीक पुरुûष महात्मा ज्योतिबा फुले ने अपनी प्रसिद्ध किताब ‘गुलामगिरी' उन अमेरिकी योद्धाओं को समÌपत की है‚ जिन्होंने अमानवीय दास अथवा गुलाम प्रथा के खिलाफ आंदोलन किया था और सफलता हासिल की थी। मानवता की मुक्ति के लिए अमेरिका को हमेशा याद किया जाता है। 

 वह जॉर्ज वाशिंगटन का देश है तो एंड्रू जैक्सन और अब्राहम लिंकन का भी। १८२९ में जब वहां एंड्रू जैक्सन राष्ट्रपति चुने गए‚ तो उन्होंने एकबारगी कई तरह के तामझाम को उतार फेंका। वह सामान्य कार्यकर्ताओं के साथ व्हाइट हाउस में घुसा और उसके पूरे अभिजात ढकोसलों को तहस–नहस कर दिया। कहा जाता है कि उसने अमेरिका में वास्तविक लोकतंत्र लाया। यह भी कहा जाता है कि अमेरिका में वास्तविक (रियल) लोकतंत्र है‚ जबकि ब्रिटिश लोकतंत्र में आज भी अभिजात (रॉयल) तत्व हावी हैं‚ लेकिन यह भी है कि हर देश की तरह वहां भी वर्चस्ववादी ताकतें बनी हुई हैं और कभी –कभार सिर भी उठाती हैं। इस सदी के आरम्भ में यह सुना गया कि गोरों के एक नस्लवादी संघटन कु–क्लक्स–क्लान अथवा ३ के की सदस्यता में एक बार फिर इजाफा हो रहा है‚ लेकिन तभी खबर आई कि एक ब्लैक बराक ओबामा अमेरिकी राष्ट्रपति चुने गए हैं। एक बार फिर अमेरिकी लोकतंत्र ने दुनिया को आश्वस्त किया कि हम वही अमेरिका हैं‚ जिसकी नींव वाशिंगटन‚ जैक्सन और लिंकन जैसे लोगों ने रखी है। जिसने एक समय नस्लवादी दास प्रथा का कानून द्वारा अंत किया है। जहां सोजॉर्नर ट्रुथ ने कभी गुलामी प्रथा के खिलाफ आंदोलन किया है‚ लेकिन अफसोस दुनिया भर में लोकतंत्र के बुझते चिरागों को बल देने वाला अमेरिका आज खुद कहां आ गया हैॽ

 अमेरिका आज इस स्तर तक कैसे पहुंचाॽ इसके लिए अमेरिकी समाज में आई गिरावट और उसके बीच उभरते नये जीवन मूल्यों को देखा जाना चाहिए। ट्रम्प के व्यक्तित्व और सरोकारों को भी देखा जाना चाहिए। ट्रम्प की राजनीतिक पृष्ठभूमि अत्यंत क्षीण रही है। वह राजनेता नहीं बल्कि बिजनसमैन रहे हैं। उनका राष्ट्रपति पद का चुनाव जीतना अधिकांश लोगों को अचंभित कर गया था‚ लेकिन वह जीते यह एक सच्चाई थी‚ जैसे आज हारे यह एक सच्चाई है। क्या हमने उनकी जीत के कारणों का कभी विश्लेषण किया हैॽ शायद नहीं। उनकी जीत क्या ओबामा के दो दफा राष्ट्रपति बन जाने की एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया नहीं थीॽ मेरा मानना है यही सच था। ओबामा का राष्ट्रपति होना अमेरिका के सामाजिक–राजनीतिक जीवन में यदि एक क्रांति थी तो ट्रम्प का जीतना एक प्रतिक्रांति। यह एक नस्ली विस्फोट था‚ जो चुपचाप हुआ था। मैं नहीं समझता कि इस एक घटना से अमेरिका में लोकतंत्र की जड़ें कमजोर होंगी। मेरा मानना है कि इसके विपरीत वह मजबूत होगी। ॥ यदि अमेरिका के स्वातंjय आंदोलन का पूरी दुनिया में असर पड़ा था‚ तो इस घटना का पड़ना भी लाजिमी है। हमारे यहां इसकी क्या प्रतिक्रिया होगी अभी देखना है। यह वही अमेरिका है‚ जो आपातकाल के दौरान (१९७५) हमें सीख दे रहा था। भारत में जैसे ही इंदिरा गांधी पराजित हुइÈ‚ उन्होंने सत्ता छोड़ दी। कोई सोच भी नहीं सकता था कि इंदिरा नतीजों को मानने से इनकार कर दें। हालांकि प्रधानमंत्री मोदी ने अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव प्रचार में हिस्सा ले कर ट्रम्प के लिए वोट मांगे थे। किसी दूसरे देश के शासनाध्यक्ष का दूसरे देश की राजनीति में इस तरह का हस्तक्षेप निंदनीय है। हालांकि मोदी ने अपने मित्र की हरकतों पर नाराजगी और औपचारिक क्षोभ दर्ज किया है। 


सौजन्य - राष्ट्रीय सहारा।

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आधिकारिक गिरावट के आगे ( राष्ट्रीय सहारा)

अधिकारिक तौर पर केंद्र सरकार ने मान लिया है कि २०२०–२१ में अर्थव्यवस्था में ७.७ फीसद की गिरावट दर्ज की जाएगी। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय यानी रासांका द्वारा जारी आंकड़ों में यह आकलन सामने आया है। २०१९–२० में अर्थव्यवस्था में ४.२ फीसद की विकास दर दर्ज की गई थी। २०२०–२१ में कोरोना के चलते अर्थव्यवस्था सिकुड़ेगी‚ ऐसे अनुमान लगाए जा रहे थे‚ पर अर्थव्यवस्था में संकुचन की दर क्या होगी‚ इसे लेकर अलग–अलग संस्थाओं के अलग आकलन थे। भारतीय रिजर्व बैंक का आकलन था कि अर्थव्यवस्था ७.५ फीसद सिकुड़ेगी जबकि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष का आकलन था कि सिकुड़ाव की रफ्तार दस फीसद से ऊपर रहेगी। स्टेट बैंक आफ इंडिया का आकलन था कि सिकुड़ाव ७.४ फीसद रहेगा। पर अब खुद केंद्र सरकार का ही आकलन सामने आ गया है कि सिकुड़ाव ७.७ फीसद रह सकता है। 


स्टेट बैंक आफ इंडिया और रिजर्व बैंक का भी आकलन भी इसी दर के आसपास है। तो माना जा सकता है कि अर्थव्यवस्था ७ से ८ फीसद की दर से गिरावट दर्ज करेगी। इसे आधिकारिक आकलन माना जा सकता है। पर सवाल यह है इसके आगे चुनौतियां क्या हैं। बजट ठीक सामने है‚ बजट इन चुनौतियों को कैसे हल करेगा‚ यह सवाल अपनी जगह बना हुआ है। सबसे पहले तो यह देखना होगा कि अर्थव्यवस्था में नकद प्रवाह बना रहे। आकलन के अनुसार खेती क्षेत्र को छोड़कर अर्थव्यवस्था के हर क्षेत्र में गिरावट दर्ज की जाएगी। कृषि में २०२०–२१ में ३.४ प्रतिशत विकास दर का अनुमान है। सेवा क्षेत्र की हालत को विकट खस्ता है‚ जाहिर है होटल‚ पर्यटन सबका हाल खराब है।


 विनिर्माण यानी मैन्यूफैक्चरिंग में भी तेजी लाए जाने की जरूरत है। और सबसे जरूरी बात है कि अर्थव्यवस्था में खरीद क्षमता का संवर्धन भी हो और संरक्षण भी हो। ग्रामीण क्षेत्र में रोजगार गारंटी योजना की एक खास भूमिका रही है उसे कैसे मजबूत किया जाए‚ यह देखना चाहिए। शहरी क्षेत्रों में रोजगार दोबारा धीमे–धीमे पटरी पर लौट रहा है। इसे हर हाल में बनाए और बचाए रखने की जरूरत है। इसलिए लॉकडाउन लगने की जो अफवाह आती हैं‚ उनका सख्ती से खंडन करना होगा। हां‚ कोरोना के मोर्चं पर ढिलाई घातक साबित होगी। क्योंकि कोरोना सिर्फ स्वास्थ्य संकट के तौर पर ही सामने नहीं आया‚ बल्कि आÌथक महामारी का जनक भी साबित हुआ है।

सौजन्य - राष्ट्रीय सहारा।

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हल वार्ता से ही ( राष्ट्रीय सहारा)

केंद्र  सरकार से आठवें दौर की वार्ता से ठीक एक दिन पहले किसानों द्वारा दिल्ली के चारों तरफ ट्रैक्टर रैली निकालना काफी हद तक उनकी ताकत का इजहार कराने में सफल रही है। रैली की खास बात है कि यह बेहद अनुशासित रही। हालांकि सर्वोच्च अदालत ने इस तरह किसानों के इकट्ठा होने पर चिंता जताते हुए यह जरूर कहा कि राजधानी की सीमाओं पर आंदोलन कर रहे किसान कोविड़–१९ से सुरक्षित हैं क्याॽ अदालत ने किसानों के कोविड़ काल में इस तरह जुटने को तब्लीगी जमात की घटना से भी जोड़़ा। अदालत की यह टिप्पणी कहीं–न–कहीं यह दर्शाती है कि शीर्ष अदालत किसानों के बड़े़ पैमाने पर जमावड़े़ को लेकर नाखुश है। यह इसलिए भी सही है क्योंकि पहले भी हमने देखा है कि एक ही जगह बिना किसी तैयारी और ऐहतियात के लोगों के जुटने से हालात गंभीर हुए हैं। ऐसे में अगर गणतंत्र दिवस के कुछ दिनों पहले दिल्ली के भीतर और उसकी सीमा पर कोरोना से बचाव के दिशा–निर्देशों का पालन नहीं करने से हालात बेहद ड़रावने होे सकते हैं। वैसे राहत की बात है कि अभी तक किसी तरह की कोई अप्रिय खबर आंदोलन स्थलों से नहीं आई है। जहां तक बात सरकार की है तो उन्हें भी अब वार्ता को दिखावटी नहीं बनाना होगा। अगर वह किसानों की सभी मांगों से इत्तेफाक रखती है तो उसे सहर्ष स्वीकार करे वरना बार–बार वार्ता के लिए समय मुकर्रर करना न्यायोचित नहीं कहा जा सकता है।


 हालांकि अब सरकार और किसान दोनों की नजर ११ जनवरी को सर्वोच्च अदालत में होने वाली सुनवाई पर टिकी है। वैसे अदालत ने अपनी पिछली टिप्पणी में यह जरूर बता दिया था कि अगर वार्ता से कोई सकारात्मक परिणाम नहीं निकलेंगे तो वह अपने तरीके से मामले की सुनवाई करेगी। 

समय टकराव का नहीं है। इसलिए सरकार और किसानों को लचीला रुûख अपनाना ही होगा। अगर २६ जनवरी को अपने तय कार्यक्रम पर किसानों ने फिर से ट्रैक्टर रैली निकालने की हुंकार भरी है तो यह अच्छी बात नहीं है। स्वाभाविक रूप से इस कदम से टकराव बढ़ेøगा। ठीक है कि किसानों ने बेहद अनुशासित और इंतजाम के साथ ट्रैक्टर रैली को अंजाम दिया‚ लेकिन यह हर किसी को समझना होगा कि हल तो बातचीत से ही संभव है। लिहाजा कोई भी पक्ष न तो कर्कश हो और न विषयांतर‚ तभी बात बनेगी॥।

सौजन्य - राष्ट्रीय सहारा।

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Wednesday, January 6, 2021

क्रूरता और आधी आबादी (राष्ट्रीय सहारा)

कोई भी समाज तब तक अपने आपको सभ्य नहीं कह सकता है जब तक कि क्रूरता मौजूद है। भारत अपवाद नहीं है। यह कहना सत्य के अधिक करीब रहना होगा कि भारत उन देशों में सबसे आगे है‚ जहां आधी आबादी के साथ अधिक क्रूरतापूर्ण व्यवहार किया जाता है। यह इसके बावजूद कि हम इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में प्रवेश कर चुके हैं और हमारे अपने देश भारत को आजाद हुए सात दशक से अधिक समय बीत चुका है। यह इसके बावजूद कि वर्ष १९९० के दशक में वैश्वीकरण के बाद भारतीय समाज में तमाम तरह के बदलाव सामने आए हैं। मध्यम वर्ग और अधिक सुविधा संपन्न हुआ है‚ उच्च आय वर्ग भी पूर्व की अपेक्षा अधिक सशक्त हुआ है। एक हदतक निम्न आय वर्ग भी पहले की तुलना में अधिक जागरूक हो गया है।

 सबसे पहले तो यह समझने की आवश्यकता है कि क्रूरता के अलग–अलग स्तर होते हैं। मतलब यह कि आधी आबादी यानी महिलाओं के खिलाफ क्रूरता एक धब्बा है‚ जिसके लिए किसी भी सभ्य समाज में कोई जगह नहीं होनी चाहिए। वजह यह कि महिलाएं कमजोर होती हैं और इसकी वजह होती उनका गर्भधारण करना। हालांकि गर्भधारण करना प्रकृति आधारित है‚ लेकिन यही महिलाओं को कमजोर कर देता है। महिलाओं के खिलाफ क्रूरता की भयावह स्थिति को समझने के लिए कुछेक आंकड़ों पर गौर करना जरूरी है। सबसे पहले तो अद्यतन आंकड़े पर नजर डालते हैं‚ जिन्हें राष्ट्रीय महिला आयोग ने जारी किया है। इसके मुताबिक‚ बीते वर्ष २०२० में आयोग को २३ हजार ७२२ शिकायतें मिलीं। यह आंकड़ा बीते छह वषाç में सबसे अधिक है। इनमें अधिकांश मामले घरेलू हिंसा से संबंधित हैं। इनमें करीब साढ़े सात हजार शिकायतें सम्मान के साथ जीने के अधिकार से जुड़ी हैं। वहीं शेष मारपीट के। 

 यह इस बात का प्रमाण भी है कि कोरोना काल में महिलाएं दोहरे खौफ में रहीं। एक खौफ कोरोना का तो दूसरा खौफ अपनों के द्वारा बरती जानेवाली क्रूरता। बड़ा सवाल यह है कि भारतीय समाज इन आंकड़ों को किस संवेदनशीलता के साथ ग्रहण करेगाॽ हैरानी की बात यह है कि ये मामले तब समाने आए‚ जब देश में कोरोना की वजह से लोग अपने घरों में रहे। जब लॉकडाउन को हुए दो महीने हुए थे तब एक रपट आई थी कि कंडोम व पिल्स की बिक्री ने नया रिकार्ड बनाया है। मतलब साफ है कि घरों में रहने वालों के बीच प्यार बढ़ा‚ लेकिन अब राष्ट्रीय आयोग की ताजा रपट बिल्कुल दूसरी तस्वीर प्रस्तुत करता है। जाहिर तौर पर यह तस्वीर बेहद बदरंग है। इस आंकड़े को एक नजीर मानते हैं और यह समझने के लिए कुछ आंकड़ों पर गौर करते हैं‚ जिनसे यह पुख्ता हो सकेगा कि हम एक ऐसे देश में रहते हैं जहां आधी आबादी के लिए रहम की कोई गुंजाइश नहीं है। मसलन‚ राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो द्वारा प्रकाशित क्राइम इन इंडिया–२०१९ रिपोर्ट के हिसाब से वर्ष २०१९ पूरे देश में १ लाख २५ हजार २९८ महिलाओं ने अपने परिजनों (अधिसंख्य पति) के खिलाफ मामला दर्ज कराया। अधिकांश मामले यह कि उनके परिजनों ने उनके साथ क्रूरता बरती। 

 इस संदर्भ में सबसे अधिक १८ हजार ४३२ मामले राजस्थान में दर्ज हुए। वहीं दूसरे स्थान पर उत्तर प्रदेश रहा जहां १८ हजार ३०४ मामले दर्ज किए गए। देश की राजधानी और केंद्रशासित प्रदेश दिल्ली में ३७९२ महिलाओं ने परिजनों की क्रूरता के संंबंध में मामले दर्ज कराए। इन आंकड़ों पर गहन विचार की आवश्यकता है। आवश्यकता इसलिए कि ये मामले वे मामले हैं‚ जिनमें अधिकांश पीडि़त या तो मध्यम वर्ग की रहीं या फिर उच्च वर्ग की। वजह यह कि इन वर्गों की महिलाओं के पास ही यह समझने की क्षमता है कि परिजनों की क्रूरता होती क्या हैॽ उनके किस तरह के व्यवहार को क्रूर कहा जा सकता है। निम्न आय वर्ग की महिलाएं तो पतियों व अन्य परिजनों की क्रूरता को अपनी नियति मान आजीवन घुट–घुटकर जीती रहती हैं। अब सवाल उठता है कि आखिर महिलाएं घरेलू हिंसा की शिकार क्यों होती हैंॽ क्यों वे विरोध तक नहीं करतींॽ ये सवाल इसलिए कि संविधान में इसके लिए कानून बनाए गए हैं। घरेलू हिंसा एक दंडनीय अपराध है‚ लेकिन इसके बावजूद घरेलू हिंसा रुûकी नहीं है। एनसीआरबी के आंकड़े बताते हैं कि करीब ४५ फीसद बलात्कार के मामलों में आरोपित परिजन होते हैं। यह आंकड़ा भी कुछ इशारा करता है॥। कारणों की बात करें तो यह कहा जा सकता है कि कानून को लागू कराने वाला तंत्र घरेलू हिंसा को लेकर संवेदनशील नहीं है। पति अपनी पत्नी के साथ बलात्कार करता है। पत्नी मना करे तो उसके साथ मारपीट की घटनाएं सामान्य बात हैं। यदि कोई महिला थाना जाकर अपने पति के खिलाफ मुकदमा भी दर्ज कराना चाहे तो कोई मामला दर्ज नहीं करता। दूसरी तरफ खाने में नमक कम रह जाय अथवा नमक तेज हो जाए तो कई अपनी पत्नी के साथ मारपीट करते हैं। इस पूरे विमर्श में उन महिलाओं का उल्लेख नहीं है जो घरों में दाई का काम करती हैं। चूंकि घरों में काम करने वाली महिलाएं असंगठित क्षेत्र की मजदूर वर्ग में शामिल हैं तो सरकारों के पास इसका कोई आंकड़ा ही नहीं है कि उनकी संख्या कितनी है। फिर भी यदि सरकार के हवाले से कुछ बात की जाए तो भयावह परिस्थिति का अनुमान लगाया जा सकता है। एनसीआरबी द्वारा वर्ष २०१९ में जारी आंकड़ा यह बताता है कि घरेलू नौकरानियों/दाइयों के साथ क्रूरतापूर्ण व्यवहार के कुल ५५३ मामले दर्ज कराए गए हैं। अब सवाल इस कम संख्या पर ही करते हैं। हमें यह समझना होगा कि दाई अथवा नौकरानियों के रूप में काम करने वाली महिलाएं अधिकांश दलित‚ आदिवासी व पिछड़े वर्गों की होती हैं। ये आÌथक रूप से इतनी विपन्न होती हैं कि इनकी दाई का काम इनकी आजीविका का मुख्य साधन होता है। इनमें बाल मजदूरों की संख्या भी अधिक है। 

 ये अधिकांश सुदूर इलाकों से लाई गई बच्चियां होती हैं‚ जो गुलाम के समान होती हैं। ऐसे में यदि उनके साथ किसी तरह की क्रूरता होती है तो उनके पास मामला दर्ज करवाने का कोई सवाल ही नहीं उठता। सनद रहे कि देश में कई सारे कानून हैं‚ जो महिलाओं के साथ क्रूरता का निषेध करते हैं‚ फिर भी यदि स्थितियों में सकारात्मक बदलाव नहीं आया है तो हमें समाज के सभी हिस्सेदारों के साथ विचार करना चाहिए। आवश्यक है कि क्रूरता को समाप्त करने के लिए न केवल कानून और सरकारी तंत्र को संवेदनशील होना होगा बल्कि समाज को भी खुले दिमाग से यह स्वीकार करना होगा कि महिलाएं भी इस देश की उतनी ही नागरिक हैं जितने कि पुरुûष। महिलाओं के वोटों का भी उतना ही महkव है जितना कि पुरुûषों का।

सौजन्य - राष्ट्रीय सहारा।

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Tuesday, January 5, 2021

सरकार के तेवर (राष्ट्रीय सहारा)

  प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जब कई राज्यों के किसानों के साथ बातचीत में जो कुछ बोल रहे थे‚ उसका सीधा संदेश यही था कि कृषि कानूनों पर सरकार पीछे नहीं हटेगी। उनके साथ मंत्री भी कहीं न कहीं किसानों के बीच कानूनों को सही ठहरा रहे थे। आंदोलनरत लोगों के लिए यह स्पष्ट संकेत था। कम लोगों का ध्यान गया है कि आंदोलनरत वास्तविक किसानों एवं किसान संगठनों के प्रति नरम रवैया एवं बातचीत की नीति अख्तियार करते हुए भी भाजपा ने इसके समानांतर कृषि कानूनों पर समर्थन जुटाने के लिए जनता के बीच जाने का देशव्यापी अभियान चलाया है।

 भाजपा के प्रवक्ताओं ने दिल्ली की सीमाओं पर धरना आरंभ होने के साथ ही आंदोलन के पीछे–आगे खड़े उन चेहरों पर हमला करना शुरू कर दिया था‚ जो उनके वैचारिक और राजनीतिक विरोधी हैं। प्रधानमंत्री का कहना‚ कि कुछ लोग किसानों में गलतफहमी पैदा कर उनको भड़का रहे हैं‚ स्पष्ट करता है कि सरकार इसे केवल किसानों का आंदोलन नहीं मानती‚ भाजपा विरोधी शक्तियों‚ राजनीतिक एवं गैर–राजनीतिक भाजपा विरोधी शक्तियों का अभियान मानकर उसके अनुसार निपटने की दिशा में आगे बढ़ चुकी है। ध्यान रखिए‚ भाजपा ने देश भर में कृषि कानूनों को लेकर जनसभाएं एवं पत्रकार वार्ताओं की घोषणा कर दी है। सूचना है कि ऐसे करीब ७०० कार्यक्रम देशभर में भाजपा आयोजित कर रही है। तो आंदोलन के समानांतर सरकार एवं भाजपा का जनता के बीच जाने‚ हर मंच से अपना पक्ष रखने‚ आंदोलन में शामिल या बाहर से समर्थन करने वाले संगठनों–व्यक्तियों के खिलाफ आक्रामक कार्यक्रमों की विविध तस्वीरें और शब्दावलियां देखने–सुनने को मिलेंगी। प्रधानमंत्री के तेवर के बाद किसी को संदेह नहीं होना चाहिए कि इसे ज्यादा तीव्र और तीIण किया जाएगा। प्रश्न स्वाभाविक हैं कि आखिर‚ मोदी सरकार और भाजपा इसे कहां तक ले जाएंगे एवं आंदोलन से कैसे निपटेंगेॽ 

 सरकार बार–बार कह रही है कि तीन कृषि कानूनों को वापस नहीं लेगी। कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर कह रहे हैं कि किसानों की जो भी शंकाएं हैं‚ सरकार उनको दूर करने‚ किसानों को समझाने तथा सफाई देने के लिए हर समय तैयार है। सरकार एवं भाजपा की रणनीति और लIय स्पष्ट हैं। एक‚ किसानों और आम जनता के अंदर भाव पैदा करना कि आंदोलन किसानों का नहीं है‚ इसके पीछे वो सारी विरोधी शक्तियां खड़ी हैं‚ जिनका उद्देश्य मोदी और उनकी सरकार को बदनाम और अस्थिर करना है। दो‚ यद्यपि इसमें किसान संगठन हैं‚ लेकिन उनमें निष्पक्ष राजनीतिक विचारों से परे कम ही हैं। तीन‚ इनमें किसान भी हैं‚ लेकिन गलतफहमी के शिकार। अपना राजनीतिक हित साधने के लिए भाजपा विरोधी संगठनों‚ दलों‚ एक्टिविस्टों ने कृषि कानून के विरोध में इनको भड़काया है‚ और इनके अंदर कई तरह का डर पैदा किया है। मसलन‚ तुम्हारी जमीनें पूंजीपतियों के हाथों चली जाएंगी‚ सरकारी मंडियां बंद हो जाएंगी‚ एमएसपी बंद हो जाएगा‚ एमएसपी खत्म हो जाएगा आदि आदि। इस रणनीति का चौथा अंग है उन किसान संगठनों और नेताओं को विश्वास में लेना जिनका सीधा कोई राजनीतिक उद्देश्य नहीं इनमें आंदोलन में सम्मिलित संगठन और नेता भी हैं। कृषि कानूनों को किसानों की वास्तविक आजादी का कदम साबित करना तो है ही। ॥ इसमें दो राय नहीं कि कोई भी कानून दोषरहित नहीं होता। कानूनों की अनेक खामियां क्रियान्वयन के साथ धीरे–धीरे सामने आती हैं। सरकार का रवैया होना चाहिए कि कुछ दोष सामने आएं तो इन्हें दूर करने के लिए कानून में संशोधन करे। इस कानून के साथ भी ऐसा है। ईमानदारी से विचार करें तो मोदी सरकार का रवैया पहले दिन से कानून को लेकर लचीला रहा है। आंदोलनकारियों के साथ बातचीत करने से लेकर आश्वासन तक देश के सामने हैं। निष्पक्षता से विचार करने पर स्वीकार करना होगा कि सरकार ने ९ दिसम्बर को आंदोलनकारियों को जो प्रस्ताव दिए उनके आधार पर आंदोलन समाप्त करने की घोषणा की जा सकती थी। अगर इसके पीछे मोदी विरोधी‚ भाजपा विरोधी और सारी शक्तियां खड़ी नहीं होतीं तो किसानों और सरकार के बीच सहमति हो गई होती। मोदी सरकार और भाजपा के रणनीतिकारों का पहले दिन से मानना रहा है कि जो लोग आंदोलन के साथ या पीछे हैं‚ वे कभी भी किसी समझौते को सफल नहीं होने देंगे। बावजूद व्यवहारिक रास्ता और लोकतांत्रिक आचरण यही था और है कि बातचीत के दरवाजे खुले रखे जाएं‚ स्वीकार करने योग्य मांग मान ली जाएं‚ जरूरतानुसार संशोधन करने और स्पष्टीकरण देने को तैयार रहें ताकि विरोधियों के पास सरकार को कठघरे में खड़ा करने का विश्वसनीय आधार न रहे। सरकार ने अपने व्यवहार से पूरे देश को संदेश दिया है कि वह तो वास्तविक किसानों की वाजिब मांगों को स्वीकार करने को तैयार है‚ लेकिन जो दूसरे तत्व आंदोलन को गिरफ्त में ले चुके हैं‚ वे समझौता नहीं होने दे रहे। ॥ प्रधानमंत्री अपने व्यवहार से स्पष्ट कर चुके हैं कि आंदोलन के पीछे खड़ी विरोधी शक्तियों के विरुûद्ध मोर्चाबंदी आक्रमण जारी रखेंगे। मोदी सरकार एवं भाजपा ने सोच समझकर आंदोलन में लगी शक्तियों के विरुûद्ध स्वभाव के अनुरूप वैचारिक एवं राजनीतिक युद्ध छेड़ दिया है। अभी तक मोदी और अमित शाह ने जो चरित्र दिखाया है‚ उसके आलोक में बेहिचक कहा जा सकता है कि कृषि कानूनों के पक्ष में तथा विरोधियों के विरुûद्ध माहौल बनाने का अभियान प्रचंड रूप लेगा। विरोधियों के सामने मोदी और शाह ने ऐसी चुनौती पेश की है‚ जिसकी उम्मीद उन्हें नहीं थी। लेकिन मोदी और शाह के नेतृत्व वाली भाजपा से जमीनी स्तर पर मुकाबला करना संभव नहीं। वह भी इस कानून के बारे में गलत प्रचार करके। कई राज्यों में सघन राजनीतिक टकराव की स्थिति पैदा होगी।

 प. बंगाल‚ केरल‚ महाराष्ट्र और पंजाब इनमें प्रमुख हैं। कहने का तात्पर्य यह कि कृषि कानूनों के विरोध में शुरू आंदोलन को भाजपा ने अपनी रणनीति से व्यापक राजनीतिक संघर्ष में परिणत करने की रणनीति अपनाई है। मोदी और शाह की भाजपा नये चरित्र और तेवर वाली भाजपा है‚ जिसे रक्षात्मक बनाने या दबाव में लाने के लिए नये राजनीतिक तौरतरीकों की आवश्यकता है। यह पहली सरकार है जो विरोधों और विरोधी आंदोलनों का सड़क पर उतर कर‚ जनता के बीच जाकर मुकाबला करती है। मोदी और भाजपा विरोधियों ने अभी तक अपने विचार–आचार में पुराने राजनीतिक तौर–तरीकों से अलग कुछ भी नया नहीं दिखाया है। इसलिए मान कर कर चलिए कि विरोधियों को सफलता नहीं मिलने वाली। इसमें आंदोलन का हश्र क्या होगाॽ आकलन आप आसानी से कर सकते हैं।

सौजन्य - राष्ट्रीय सहारा।

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Thursday, December 24, 2020

मुनाफे का मन बनाना होगा (राष्ट्रीय सहारा)

शिप्रा माथुर

न्नदाता धान–धन से भरापूरा रखते हैं तो अन्नपूर्णा हमारे घरों की खान–पान की जरूरतों को पूरा करते हुए परिवारों को खुशहाल रखती हैं। इसीलिए दुनिया भर में खेतों‚ किसानों और औरतों को शामिल करते हुए कई प्रथाएं–कथाएं कायम रही हैं। रोम में अन्न की देवी ‘सेरेस' और ग्रीक कथाओं में ‘दिमितर' नाम की देवी के हाथ खेती–उपज–धरती की सलामती का जिम्मा रहा। दुनिया की हर सभ्यता ने अन्न को पूजा‚ अपनी भूख को समझा तो आगे बढ़ती दुनिया ने भी फसल और खेतों से अपने रिश्ते को सींचते हुए मान्यताओं को पीछे नहीं धकेला कभी। 


 सोच को आगे ले जाने के लिए दुनिया भर में हो रहे बेहतर प्रयोगों को अपनाया भी तो मिट्टी–पानी की परख करते हुए कमाई में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने की भरपूर कोशिश भी की। केवल गमछा‚ पगड़ी‚ धोती ही नहीं बल्कि चूनर‚ घाघरा और पल्लू वाली पहचान भी किसान की रही है। किसानी के काम में दोनों की मेहनत उतनी ही रही है भले ही मेहनताना कभी बराबर नहीं रहा। जिन–जिन देशों में खेती और उपज पर खासा काम हुआ है वहां उनकी काम और फैसलों में हिस्सेदारी हर मायने में रही है‚ लेकिन उसे नजरअंदाज करने का असर बाजार पर भी रहा है‚ न उसके पहनावे के मुताबिक औजार हैं ना मशीनें और सबसे बड़ी बात ये कि खेत की जमीन में उसका नाम ही शामिल नहीं। भारत की राष्ट्रीय कृषि नीति के लIयों में सभी किसानों से जुड़ी किसी भी नीति में औरतों को दरकिनार नहीं करने की हिदायत भी शामिल है । 


वर्ल्ड बैंक के आकलन में २०५० तक दुनिया की आबादी में २२० करोड़ तक का इजाफा हो जाएगा और दुनिया का पेट भरने के लिए ७० फीसद खाना और उपजाने की जरूरत होगी। मजदूर और किसान के फर्क को खत्म करते बाजार के बीच तकनीक अब सबसे खड़ी ताकत की तरह खड़ी है। इजरायल में साम्यवाद के मॉडल पर बने 'किबूत्स' अमीर और तसल्ली वाली जिंदगी का नमूना है‚ जहां सैकड़ों परिवार साझा जीवन बिताते हैं। इस पूरी बस्ती में किसी रिसार्ट जैसी आधुनिक सुविधाएं मुहैया हैं‚ लेकिन कमाई काम के मुताबिक कम ज्यादा या कम नहीं बल्कि सबकी बराबर है। फिर चाहे आप किसान हों या डॉक्टर या कुछ और। पानी की बूंद–बंूद बचत की मिसाल बन चुके ये किसान दुनिया भर से अपनी जानकारी और तकनीक बांटने लगे हैं। दक्षिण कोरिया ने पारम्परिक खेती ‘जिनसेंग' और नई तकनीक का ऐसा मेल बिठाया है कि वो इस पर नाज करते हुए सबको अपने यहां की लहलहाती फसलें आकर देखने की दावत देते हैं। धरती को हर मायने में संभाल कर रखने वाली खेती से वो अपने मुश्किल–से–मुश्किल इलाकों को उपज लायक बनाने और नमी‚ जैव–विविधता‚ देशी फसलों को कायम रखते हुए किसानों को उनके ही संगठन के जरिए दुकान और दाम तक की पूरी सहूलियत देने में कामयाब नजर आते हैं। 


 जहां अ£ीकी देशों में दूसरे काम धंधों के मुकाबले आज भी खेती पर जोर है‚ लेकिन तकनीक में ज्यादा आगे नहीं जा पाने का खमियाजा ये है कि दुनिया के बाजार में उसकी दखल अभी कम ही है और मौसम और जलवायु कहर में ये देश खाने के संकट से घिरे हैं। दुनिया भर की कमाई में खेती का हिस्सा चार फीसद ही है‚ लेकिन कई देशों ने इसे २५–५० फीसद कमाई तक पहुंचाकर देश और दुनिया में अपनी मिट्टी को कीमती बनाए रखा है। बाकी के मुकाबले किसानी के भरोसे आगे बढ़ने वाले देशों की अर्थव्यवस्था २०० फीसद टिकाऊ मानी जाती है। कई देशों ने कुछ खास फसल पर महारत हासिल कर उसे अपनी पहचान का हिस्सा बना लिया है। आलू की चार हजार किस्मों के साथ ही पेरू का अपना कद है भले ही चीन आलू की उपज सहित बड़े पैमाने पर खेती को तकनीक से जोड़ने में बाजी मार रहा है। सिर्फ अनाज‚ फल और फूलों की खेती ही नहीं बल्कि डेयरी‚ कीट पालन‚ मुर्गी‚ मछली और पशुपालन वाले कारोबार भी हैं‚ जिन्होंने किसानों को पनपने में मदद की है। न्यूजीलैंड की खेती सहित भेड़ पालन और डेयरी पर अच्छी पकड़ है तो रूस ने ४० फीसद जमीन खेती के लिए बचा रखी है। वहां खेती पर किसान–कारोबारी ही हावी हैं और कमाई में भी वही आगे हैं। ॥ उजबेकिस्तान जैसे देश ने जैविक खेती में कई नवाचार कर उसे अपनी खासियत बनाया है तो जापान ने खेती की जमीन भरी–पूरी नहीं होने के बावजूद धान‚ सोयाबीन और फलों के बूते अपने को खड़ा रखा है। दक्षिण अ£ीका भी अनाज की उपज में दुनिया भर में आगे की कतार में खड़ा है। कनाडा जैसा देशों ने दो दशक पहले ही खेती को कम्प्यूटर से जोड़कर एक–एक पेड़ को निवेश के तौर पर संभालना शुरू किया और खान–पान के लेन–देन पर अच्छी पकड़ बना ली। यूं दुनिया भर के कई अव्वल देशों में वहां के आदिवासियों की हकीकत को छिपा कर रखा जाता है‚ जबकि जल–जंगल–जमीन सहित अब जमीर के रखवाले भी सिर्फ वही बचे रह गए हैं। हमारे अपने देश के सकल घरेलू उत्पाद में १५–१६ फीसद की भागीदारी वाली खेती में करीब ५५ फीसद आबादी लगी है‚ लेकिन खेती फायदे का सौदा अब भी नहीं। देश में ऐसे किसानों की कमी नहीं‚ जो जोखिम लेने की अपनी सहज काबिलियत का इस्तेमाल कर दुनिया भर की अच्छी सीख लेकर मसालों‚ दालों और जैविक उपज के बाजारों का हिस्सा बन रहे हैं। ॥ राजस्थान के ही गांवों में मिनी–इजरायल कहे जाने वाले गांव भी हैं तो उत्तर प्रदेश‚ मध्य प्रदेश‚ बिहार और दक्षिण के राज्यों में स्मार्ट–फामिÈग अपनाकर छोटे खेतों में कई फसल एक साथ लेकर कुदरत से तालमेल बिठाने वाले किसान भी। फलों के बगीचों को जैविक खाद से सींचकर अच्छी कमाई करने वाली महिला किसान भी हैं तो पानी को सहेज कर पूरे इलाके की नमी लौटाने और मजदूर से किसान बनने वाली कई कहानियां भी हैं‚ जो खेती में मुनाफा भी पा रहे हैं और अपनी हैसियत भी बढ़ा रहे हैं। एक–एक जोत को तिजोरी की तरह नहीं बच्चे की तरह पालने वाले किसान को मुनाफे वाला मन बनाना होगा ताकि कुबेरी ताकतों से मुकाबला कर पाएं। उसके पास कुदरत और तकनीक के तालमेल वाला दिमाग और मेहनतकश हाथ तो हैं ही‚ दरकार नीतियों के जमीन तक पहुंचने की भी है जो उसे कुदरत के रखवाले के साथ ही कारोबारी की तरह देखे। तब देश की कमाई तो बढ़ेगी ही दुनिया भी भूख भी काबू में आ जाएगी। ॥ एक–एक जोत को तिजोरी की तरह नहीं बच्चे की तरह पालने वाले किसान को मुनाफे वाला मन बनाना होगा ताकि कुबेरी ताकतों से मुकाबला कर पाएं। उसके पास कुदरत और तकनीक के तालमेल वाला दिमाग और मेहनतकश हाथ तो हैं ही‚ दरकार नीतियों के जमीन तक पहुंचने की भी है जो उसे कुदरत के रखवाले के साथ ही कारोबारी की तरह देखे। तब देश की कमाई तो बढ़ेगी ही दुनिया भी भूख भी काबू में आ जाएगी॥


सौजन्य- राष्ट्रीय सहारा।

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Tuesday, December 22, 2020

रूस का इस्लामी चक्रव्यूह (राष्ट्रीय सहारा)

 रूस की सामरिक नीतियों में अब इस्लामिक देशों के नेतृत्व की अग्रगामी नीति प्रभावशील है और पुतिन की वैश्विक रणनीति में यह प्रतिबिम्बित भी हो रहा है। यूरोप और एशिया के कई देशों को छूने वाले दुर्गम कॉकेशस में अजरबेजान और आर्मेनिया के बीच नागोर्नो–काराबाख पर आधिपत्य को लेकर कड़े संघर्ष के बाद रूस के हस्तक्षेप से शांति वार्ता आर्मेनिया के लिए अप्रत्याशित रही‚ लेकिन उसे जमीन खोकर भी शांति संधि मानने को मजबूर होना पड़ा। 


रूस के अजरबैजान और आर्मेनिया‚ दोनों ही देशों से बेहतर संबंध हैं‚ लेकिन आर्मेनिया में उसका सैन्य अड्डा है तथा दोनों देशों के बीच सुरक्षा और सहयोग संधि भी है। इसके बाद भी रूस ने अजरबैजान के हित में कदम उठाए। अजरबैजान के पक्ष में तुर्की‚ पाकिस्तान और सीरिया के लड़ाके युद्ध मैदान में थे‚ जबकि रूस ने आर्मेनिया के पक्ष में युद्ध में भाग नहीं लिया। दरअसल‚ नागोर्नो–काराबाख का परिणाम पुतिन की इस्लामिक देशों से संबंध मजबूत करने की वह रणनीति है‚ जिससे उन्होंने अमेरिका समेत सभी देशों को चकित कर दिया। अजरबैजान मुस्लिम बाहुल्य होकर ईरान और तुर्की का मित्र देश है‚ इन दोनों देशों से अमेरिका के संबंध खराब हैं जबकि रूस इन मुस्लिम देशों का सामरिक साझेदार बन गया है। अजरबैजान युद्धमें तुर्की की भूमिका किसी से छुपी नहीं है। सोवियत संघ के विभाजन के बाद अस्तित्व में आए अजरबैजान को तुर्की ने १९९१ में स्वतंत्र देश के रूप में स्वीकार करते हुए उसे अपना भाई बताया था जबकि आर्मेनिया के साथ तुर्की के कोई आधिकारिक संबंध नहीं हैं। १९९३ में जब आर्मेनिया और अजरबैजान के बीच सीमा विवाद बढ़ा तो अजरबैजान का समर्थन करते हुए तुर्की ने आर्मेनिया के साथ सटी अपनी सीमा बंद कर दी थी। आर्मेनिया और अजरबैजान के बीच भीषण युद्ध में तुर्की ने अजरबैजान का खुलकर समर्थन किया। 


 ये तथ्य भी सामने आए हैं कि तुर्की के सहयोग से सीरिया में लड़ने वाले कई लड़ाके भी अजरबैजान की ओर से युद्धके मैदान में झोंक दिए गए थे। नागार्नो काराबाख के इलाके में इस साल २७ सितम्बर को लड़ाई भड़की थी और पुतिन की मध्यस्थता के बाद नवम्बर में यह जंग उस वक्त खत्म हुई जब दोनों देश संघर्ष विराम के लिए तैयार हो गए थे। समझौते के तहत आर्मेनिया के नियंत्रण वाले सात इलाके अजरबैजान की दखल में आ गए। इन क्षेत्रों पर पहले आर्मेनिया का कब्जा हो गया था। अजरबैजान में इस लड़ाई को बड़ी जीत के तौर पर देखा जा रहा है जबकि आर्मेनिया में इसे कई लोग आत्मसमर्पण कह रहे हैं। 


मध्य–पूर्व में ईरान और इजराइल के संबंध नाजुक हैं‚ ईरान के परमाणु कार्यक्रम के प्रमुख वैज्ञानिक मोहसिन फखरीजादेह की एक हमले में मौत को लेकर ईरान में बहुत गुस्सा है और उसने इजराइल को सबक सिखाने की धमकी भी दी है। फखरीजादेह की ईरान की राजधानी तेहरान के पास अज्ञात बंदूकधारियों ने हत्या कर दी थी। उनकी हत्या बेहद गोपनीय मिशन के तहत सुनियोजित रणनीति से की गई और ऐसे सनसनीखेज काम करने के लिए मोसाद कुख्यात रही है। इसके पहले इस साल की शुरु आत में बगदाद में एक अमेरिकी ड्रोन हमले में ईरान के टॉप मिलिटरी कमांडर जनरल कासिम सुलेमानी मारे गए थे। सुलेमानी ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स की कुद्स फोर्स के प्रमुख थे जो दुनिया भर में ईरान विरोधी ताकतों को निशाना बनाती रही है। सुलेमानी को पश्चिम एशिया में ईरानी गतिविधियों को चलाने का प्रमुख रणनीतिकार माना जाता था। ईरान इन हत्याओं को लेकर इजराइल और अमेरिका को जिम्मेदार ठहराता रहा है। अब ईरान के पक्ष में रूस खुलकर सामने आ गया है। रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लैवरोव ने कहा है कि रूस ईरानी परमाणु वैज्ञानिक मोहसिन फखरीजादेह की हत्या के मामले में ईरान के साथ खड़ा है। उन्होंने साफ कहा कि ये हत्याएं क्षेत्र में अशांति पैदा करने के मकसद से की गई हैं‚ और यह किसी भी देश के लिए अस्वीकार्य है। रूस के ईरान के साथ आने से स्पष्ट है कि मध्य–पूर्व में तनाव और ज्यादा बढ़ सकता है॥। ईरान और तुर्की से मजबूत संबंधों के बूते रूस ने मध्य–पूर्व और यूरोप में अमेरिकी प्रभुत्व को कमजोर करने में बड़ी भूमिका निभाई है। रूस सीरिया की असद सरकार का बड़ा मददगार है और उसके सीरियाई संकट में असद के पक्ष में खड़ा होने के बाद सीरिया की सरकारी सेना मजबूत हुई है जबकि अमेरिका तथा नाटो के प्रभाव में कमी आई है। सीरिया की सरकारी सेना ने रूस के समर्थन से सैन्य अभियान चला रखा है। सीरिया में सुन्नी मुस्लिम कुल जनसंख्या का ७४ प्रतिशत हैं जबकि शिया करीब १३ प्रतिशत रहते हैं। अल्पसंख्यक शिया समुदाय से संबंधित असद का सुन्नी बहुल देश सीरिया में सत्ता में बने रहना सऊदी अरब जैसी इस्लामिक ताकतों को स्वीकार नहीं है‚ वहीं रूस के समर्थन से ईरान असद को सत्ता में बनाए रखने के लिए हथियारों की अबाधित आपूÌत समेत सामरिक मदद करता रहा है। अमेरिका का पारंपरिक मित्र सऊदी अरब सीरिया के विद्रोही संगठनों को सहायता देकर असद की सरकार को सत्ता को उखाड़ फेंकना चाहता है लेकिन रूस और ईरान के समर्थन से असद मजबूत बने हुए हैं। ॥ रूस ने तुर्की से संबंध मजबूत करके मध्य–पूर्व के संघर्ष पर नियंत्रण और संतुलन का दांव खेला है‚ और यह सफल भी रहा है। अमेरिका ने तुर्की के खिलाफ रूस से खरीदे गए एस–४०० मिसाइल डिफेंस सिस्टम को लेकर प्रतिबंध लगाए तो साफ हो गया कि पुतिन ने नाटो और यूरोप में भी सेंध लगाकर यूरोप के मुस्लिम देश तुर्की को अमेरिका के सामने खड़ा कर दिया है। नाटो के प्रभाव को लेकर रूस चौकन्ना रहा है जबकि तुर्की नाटो का सदस्य देश है। एस–४०० एयर डिफेंस सिस्टम को दुनिया की उन्नत श्रेणी का सिस्टम माना जाता है। यह जमीन से हवा में मार करता है‚ और किसी भी हवाई हमले का पता लगाकर उसे हवा में ही नष्ट करने में सक्षम है। अमेरिका ने तुर्की के इस समझौते को नाटों देशों की सुरक्षा के लिए खतरनाक बताया है‚ लेकिन तुर्की ने अमेरिका की किसी भी मांग को मानने से इंकार कर दिया है। 


बहरहाल‚ रूस ईरान और तुर्की के साथ पाकिस्तान से भी मजबूत संबंध बनाने की ओर अग्रसर है। ये सभी मुस्लिम देश अमेरिका के पारंपरिक और सामरिक मित्र सऊदी अरब की इस्लामिक देशों के नेतृत्व की क्षमता को चुनौती दे रहे हैं। जाहिर है कि अमेरिका और रूस की आपसी प्रतिद्वंद्विता का असर इस्लामिक देशों को भी प्रभावित करेगा‚ इस रणनीति में पुतिन ज्यादा ताकतवर बनकर इस्लामिक देशों पर अपना प्रभुत्व कायम करते दिखाई पड़ रहे हैं।


सौजन्य - राष्ट्रीय सहारा।

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Sunday, December 20, 2020

 'एक देश‚ एक चुनाव‘ का बेसुरा राग ( राष्ट्रीय सहारा)

 

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने एक बार फिर ‘एक देश–एक चुनाव' यानी सारे चुनाव एक साथ कराने का अपना इरादा जाहिर किया है। यह मुद्दा सबसे पहले उन्होंने २०१४ में प्रधानमंत्री बनने के साथ ही छेड़ा था। फिर पूरे पांच साल तक इस मुद्दे का कोई जिक्र नहीं हुआ। २०१९ के लोक सभा चुनाव के तत्काल बाद उन्होंने इस मुद्दे को फिर छेड़ा। तब उन्होंने इस पर चर्चा के लिए सर्वदलीय बैठक भी आयोजित की थी। यही नहीं‚ संसद में राष्ट्रपति से उनके अभिभाषण में भी इसका जिक्र करा कर जताने की कोशिश की थी कि उनकी सरकार वाकई इस मुद्दे पर संजीदगी से आगे बढ़ा रही है। अब इसी बात को उन्होंने २६ नवम्बर को संविधान दिवस के मौके पर फिर दोहराया है। उन्होंने पूरे देश के लिए एक मतदाता सूची बनाने की बात करते हुए कहा कि सारे चुनाव एक साथ होने चाहिए।


 मगर सवाल यही है कि प्रधानमंत्री मोदी और भारतीय जनता पार्टी क्या वाकई इस मुद्दे पर गंभीर हैॽ क्या इस पर सभी राजनीतिक दल सहमत हो सकते हैंॽ एक अहम सवाल यह भी है कि भारत जैसे विशाल देश में क्या लोक सभा‚ विधानसभा और स्थानीय निकायों के चुनाव एक साथ कराना व्यावहारिक रूप से संभव हैॽ अगर इन सवालों को दरकिनार करते हुए भी प्रधानमंत्री मोदी सभी चुनाव एक साथ कराने की बात को लेकर गंभीर हैं‚ तो सवाल है कि ऐसा करने में क्या बाधा आ रही हैॽ उनके पास लोक सभा में भी बहुमत है‚ और राज्य सभा में बहुमत न होते हुए भी उनकी सरकार ने कई विधेयक पारित कराए ही हैं। उनका तो यह भी दावा है कि उन्होंने ऐसे कई काम कर दिए हैं‚ जो पिछले ७० सालों में नहीं हो पाए थे। तो फिर यह काम क्यों नहीं हो पा रहा हैॽ


 प्रधानमंत्री मोदी ने जब इस मसले पर चर्चा के लिए सर्वदलीय बैठक बुलाई थी तो कांग्रेस के अलावा समाजवादी पार्टी‚ बहुजन समाज पार्टी‚ द्रमुक‚ तृणमूल कांग्रेस‚ राष्ट्रीय जनता दल‚ तेलुगू देशम‚ तेलंगाना राष्ट्र समिति सहित कई क्षेत्रीय दलों ने दूरी बनाए रखी थी। जिन दलों ने बैठक में शिरकत की थी‚ उनमें से ज्यादातर ने ‘एक देश–एक चुनाव' की संकल्पना को अव्यावहारिक बताते हुए खारिज कर दिया था। ‘एक देश–एक चुनाव' की संकल्पना प्रस्तुत करते हुए प्रधानमंत्री मोदी का कहना रहा है कि देश में हर समय कहीं–न–कहीं चुनाव होते रहने से प्रशासनिक मशीनरी के नियमित कामकाज पर असर पड़ता है‚ और विकास संबंधी गतिविधियां भी प्रभावित होती हैं। देश का समय और पैसा भी अतिरिक्त खर्च होता है‚ जिसका खमियाजा अंततः आम लोगों को ही भुगतना पडता है। अगर सारे चुनाव एक साथ होंगे तो समय और पैसे की बचत तो होगी ही‚ प्रशासनिक तंत्र को भी राहत मिलेगी और वह अपना नियमित दायित्व ज्यादा सुचारू रूप से निभा पाएगा। एक साथ चुनाव कराने के पक्ष में यह दलील भी दी जा रही है कि जब देश की आजादी के बाद शुरु आती दशकों में भी लोक सभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ ही होते थे तो अब क्यों नहीं हो सकतेॽ यह सही है कि देश आजाद होने के बाद करीब दो दशक तक यानी १९६७ तक लोक सभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ ही होते रहे। तब तक केंद्र और लगभग सभी राज्यों में कांग्रेस की ही सरकारें भारी बहुमत से बनती रहीं‚ लेकिन १९६७ से हालात बदलने लगे। राज्यों में सत्ता पर कांग्रेस की इजारेदारी टूटी और कई राज्यों में मिली–जुली सरकारें बनीं। इस सिलसिले में कई राज्यों में सरकारें गिरती और बदलती भी रहीं और कई राज्यों में मध्यावधि चुनाव की नौबत भी आई। 


 इस प्रकार लोक सभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने का सिलसिला टूट गया। एक साथ चुनाव कराने का सिलसिला शुरू होना अब इसलिए भी आसान नहीं है कि उस समय की आज की स्थिति में जमीन–आसमान का फर्क आ गया है। १९६७ के आम चुनाव में देश में कुल मतदाताओं की संख्या लगभग २५ करोड़ थी‚ जबकि २०१९ के आम चुनाव में यह संख्या ९० करोड़ के आसपास पहुंच गई। आगे भी इसमें इजाफा ही होना है। फिर हमारे यहां तमाम राज्यों में आबादी के लिहाज से पुलिस बल वैसे ही बहुत कम है। अभी भी चुनावों के वक्त पुलिस के अलावा रिजर्व पुलिस बल और अर्धसैनिक बलों की तैनाती करना पड़ती है। फिर यदि सभी निकायों के चुनाव एक साथ होंगे तो राष्ट्रीय मुद्दों के शोर में स्थानीय और प्रादेशिक महkव के मुद्दे गुम हो जाएंगे। ऐसे में विधानसभा और स्थानीय निकायों के चुनाव का कोई मतलब नहीं रहेगा। चुनाव आयोग की बात करें तो कुछ समय पहले उसने भी सरकार के सुर–में–सुर मिलाते हुए सभी चुनाव एक साथ कराने की पैरवी की थी‚ लेकिन उसके दावे में दम नहीं है‚ क्योंकि उसकी क्षमताओं की सीमा पिछले कुछ समय में बार–बार दयनीय और हास्यास्पद रूप में उजागर हुई है। 


 मसलन‚ २०१७ में गुजरात और हिमाचल प्रदेश विधानसभा का कार्यकाल लगभग एक साथ खत्म हुआ था‚ लेकिन उसने दोनों राज्यों के चुनाव की अधिसूचना अलग–अलग समय पर जारी की थी। दोनों जगह चुनाव भी अलग–अलग कराए थे‚ जबकि आबादी और विधानसभा की सीटों के लिहाज दोनों ही राज्य अन्य कई राज्यों की तुलना में बहुत छोटे हैं। सवाल है कि जब चुनाव आयोग दो राज्यों में एक साथ चुनाव नहीं करा सकता है‚ तो वह पूरे देश में एक साथ कैसे चुनाव कराएगाॽ २०१९ के लोक सभा चुनाव भी उसने दो महीने में सात चरणों में कराए थे। सवाल यह भी है कि एक साथ चुनाव हो जाने की स्थिति में भी अगर निर्धारित कार्यकाल से पहले ही लोक सभा के भंग होने की नौबत आ गई तो ऐसी स्थिति में क्या सभी विधानसभाओं और स्थानीय निकायों को भी भंग कर एक साथ मध्यावधि चुनाव कराए जाएंगेॽ यही सवाल विधानसभाओं के संदर्भ में भी उठता है। ऐसे और भी कई सवाल हैं जो एक देश एक चुनाव की संकल्पना को अव्यावहारिक ठहराते हैं‚ लेकिन इसका यह मतलब कतई नहीं कि चुनाव सुधार के बुनियादी सवालों से मुंह मोड़ लिया जाए।


 गंभीर रूप से बीमार हो चुकी हमारी चुनाव प्रणाली का उपचार तो हर हाल में होना ही चाहिए। इस सिलसिले में टीएन शेषन और जेएम लिंग्दोह जैसे मुख्य चुनाव आयुक्तों को याद किया जा सकता है। उनके नेतृत्व में चुनाव आयोग ने कई चुनाव सुधार लागू किए थे‚ जिनके चलते चुनाव में होने वाली तमाम गड़बडि़यों पर काफी हद तक अंकुश लग गया था। इसलिए लोकतंत्र की मजबूती के लिए आवश्यकता एक साथ चुनाव कराने की नहीं‚ बल्कि चुनाव प्रक्रिया को साफ–सुथरा और पारदर्शी बनाने की है। 


सौजन्य - राष्ट्रीय सहारा।

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Wednesday, December 9, 2020

बंद के निहितार्थ (राष्ट्रीय सहारा)

केंद्र सरकार के तीन कृषि कानूनों के खिलाफ विभिन्न किसान संगठनों द्वारा आहूत भारत बंद का मिली–जुला असर देखने को मिला– कहीं पर असर ज्यादा था‚ तो कहीं पर आंशिक। पंजाब‚ हरियाणा जैसे कुछ राज्यों में बंद का ज्यादा असर दिखा। दूसरी बात गौर करने लायक यह थी कि इसमें किसानों की जितनी भागीदारी थी‚ करीब–करीब उसी पैमाने पर राजनीतिक कार्यकर्ताओं की भी रही। वैसे यह खबर पहले से ही आ रही थी कि कुछ राजनीतिक दलों की किसान शाखाओं के सदस्य इस आंदोलन में भागीदारी कर रहे हैं। 


अगर यह सच है‚ तो कहा जा सकता है कि किसान आंदोलन का राजनीतिकरण पहले से ही जारी था। लेकिन बंद का वास्तविक मूल्यांकन उसके भौगोलिक विस्तार या उसमें भागीदारी करने वाले लोगों की संख्या अथवा प्रकृति के आधार पर नहीं किया जा सकता। चूंकि देश की संपूर्ण आबादी कृषि पर आश्रित नहीं है‚ इसलिए बंद में उनकी दिलचस्पी का अभाव होना स्वाभाविक है। दूसरी ओर बंद मूलतः शहर केंद्रित है‚ जबकि किसान शहर में नहीं गांव में रहते हैं‚ जहां बंद का कोई खास औचित्य नहीं है। संभव है कि विभिन्न सरकार की नीतियों से उनमें इस कदर निराशा भर गई हो कि उन्होंने बंद के प्रति उदासीन रुûख अख्तियार कर लिया हो। इससे अनिवार्यतः यह अर्थ नहीं लगाया जा सकता कि बंद में भाग न लेने वाले किसानों का इसे मौन समर्थन प्राप्त नहीं होगा। 


यह देखना होगा कि केंद्र सरकार इसे किस रूप में ग्रहण करती है और इसका किसानों से चल रही वार्ता पर कैसा असर पड़़ता है‚ लेकिन नीति निर्माताओं को यह ध्यान में रखना होगा कि देश की एक बड़़ी आबादी अब भी कृषि पर निर्भर है। इन सबसे परे यह बंद किसान राजनीति में दूरगामी प्रभाव ड़ालने वाला होगा‚ जो एक दबाव समूह के रूप में किसान आंदोलन की दशा–दिशा को निर्धारित करेगा। स्मरण नहीं कि कभी किसान संगठनों ने इस पैमाने पर राष्ट्रव्यापी बंद का आयोजन किया हो। अभी तक किसानों का आंदोलन सच्चे अर्थों में अखिल भारतीय स्वरूप ग्रहण नहीं कर पाया था‚ लेकिन इस बंद ने उन्हें एक ढीले–ढाले भावनात्मक एकता के सूत्र में जरूर जोड़़ दिया है। निजीकरण के इस दौर में ये किसान आने वाले समय में अपनी इस राजनीति से एक प्रभावशाली समूह के रूप में उभर सकते हैं और अपनी बात सरकार से मनवा सकते हैं। कोई राजनीतिक पार्टी आसानी से इनकी अनदेखी नहीं कर सकती। 

सौजन्य - राष्ट्रीय सहारा।

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परंपराओं की चुनरी ओढ़े पर्यावरण (राष्ट्रीय सहारा)

जहां बारहों मास ग्रह–उपग्रह और जल–वायु की धुरी के साथ चलते हैं‚ तो वहीं कहीं हमारी लोक परंपराएं भी भरी–पूरी दिखती हैं। इन्हीं की वजह से कुदरत की कलाई से जीवन का रिश्ता भी पक्का बंधा रहता है। हमारा विज्ञान केवल पंचांग में ही समाया रहता तो कितनी ही बातें हवाई रह जातीं‚ लेकिन उसकी कोख से पांचवीं सदी में ही शून्य ने जन्म लेकर दुनिया की अगुवाई की और २१वीं सदी में भी यही टटोलने–परखने की चेतना आंगन–आंगन की रंगोली बनी रही। मनमानस में बसे रहकर हमारी परंपराओं ने अपनी खास बुनावट को झोपड़े में‚ चूल्हे के बगल में‚ खलिहानों में बहते पसीने की तर–बतर में और ताल–बावडि़यों की छपछपाहट के साथ तपते‚ भीगते‚ नाचते‚ गाते भरपूर जिया भी है और चुभते वक्त पर पार भी पाई है। रीत–रिवाज की थाप और लोक धुनों ने इंसानी समाज को जिस तरह चलना सिखाया है‚ उसमें सबसे पुरजोर हिस्सा कुदरत के संग जुड़े अहसासात का ही रहा है।


 संस्कृति और मानव विज्ञानी माग्रेट मीड जैसे शोधकर्ता सभ्यताओं को पढ़ते–पढ़ाते इस बात को अहमियत देेते रहे कि हमारे जीवन के हर तौर–तरीके में कुदरत से गहरा बंधे रहना ही हमारी सभ्यता की खुदाई में हाथ आएगा। आने वाला वक्त हमें इन्हीं निशानियों से तोलेगा–मोलेगा। आज जो हमारे हाथ है‚ वो ये कि हम सोच पाएं कि बदलते मौसम और वक्त के मिजाज के साथ परंपराओं ने कितना निभाया। हमारे यहां साल का पहला महीना यानी चैत में जीवन की कोपलें फूटती हैं‚ जौ‚ चना‚ गेहूं‚ सरसों पकने लगती हैं और नवरात्रि के नौ दिन हम उसी जीवन के साथ अपनी लय में रहते हुए छोटी बच्चियों को भी पूजते हैं। जब कोविड के धक्के ने हमारी दखल की हदें तय कर दीं‚ तो कलकल और चहचहाहट को सुनकर‚ उन्हें अपने अक्स की तरह सामने देखकर हम नींद से जाग उठे। हमें मालूम है कि हम अब लौट नहीं सकते‚ लौटना भी नहीं चाहिए वहां जहां हम खुद की ही बात सुनने और जी भर कर देखने के काबिल नहीं रहे थे। पूनम से अमावस की घटत–बढ़त के बीच तारीखें खुद कुछ नहीं कह पातीं। जब हवा‚ बादल‚ बारिश‚ पंछी‚ जीव और जंगल तारीख की पोटली में भरे पल भी हिसाब रखना भूल जाते हैं‚ तो इंसान बस उन्हें अपने जेहन में दर्ज करता चलता है। यहीं से उसके खयालों में इन सबकी फिक्र आती है‚ क्योंकि उसका अपना वजूद भी इन्हीं से खुशरंग है।


 भरे–पूरे इलाके हों या उजाड़‚ कैनवास पर हल्के या चटख रंग तो कुदरत के ही बिखरते हैं‚ तभी दुनियावी तस्वीर पूरी हो पाती है। चैत्र की करवट से बैसाख की शोखी के बीच जब राजस्थान के सूखे इलाकों में आखा तीज का त्योहार मनता है तो खेजड़ी का पूजन होता है। दुनिया के और इलाकों में अपने सब्र के लिए मशहूर है खेजड़ी। इसकी उजाड़ पर आमादा एक राजा के फरमान के खिलाफ खड़े होकर जब चार सदी पहले खेजड़ली गांव में अमृता देवी ने मोर्चा संभाला था‚ तो फिर यकीन गहरा हुआ कि औरतों ने दुनिया को किस कदर संभाले रखा है। ‘सर सांटे‚ रूख रहे‚ तो भी सस्तो जाण' कहकर अमृता तो कुर्बान हुई‚ मगर पीछे–पीछे उनकी तीन बेटियों और ३६३ आदिवासियों के बलिदान के साथ खेजड़ी बचाने के लिए सिर कटाना ऐसी मिसाल बना कि उसके बराबर दुनिया में कोई कहानी नहीं आज भी। औरतों के हाथों कुदरत की संभाल की तहजीब को जब ‘ईको–फेमिनिज्म' की तरह बांचा गया‚ तब मां‚ दादी‚ बहन‚ भाभी‚ ननद के आगे–पीछे घूमती घर की दुनिया में सूर्य नमन और पीपल–कुंआ पूजन की परंपरा नजर भर कर देखने में आई। छठ पूजन में सूरज और उसकी बहन छठ मैया के बीच इतना लाड़–प्यार बरसता है कि पूरा साल भरा पूरा सा लगता है। साझी हिस्सेदारी वाली गोचर जमीनों पर लोक देवी–देवताओं के नाम पर ‘वणी' और ‘ओरण' बनाकर जमीन और मिट्टी में पल रहे पौधों और जीवों के बंध और नमी का खयाल रखा जाता है। ॥ देहाती जन–जीवन में मिट्टी से थपे चौके में चूने और गेरू से रंगे मांडणों में कुदरत से हमारे रिश्ते की छाप हो या फिर सफेद दीवारों पर हल्दी की थपकी के छापे‚ गांवों ने ही भारत की संभाल की है। यहां बसी रीतियों की बदौलत ही जल–हवा–मिट्टी‚ पंछी और जीवों का सांझ और सवेरा साथ–साथ होता है और मौसम के मुताबिक खान–पान‚ आन और दान की रीत होती है। संक्रांति में तिल–गुड़‚ सावन में शिव का बेलपत्र–जल‚ देवों के सोने के चार महीनों के दौरान पुरखों का मान‚ बसंत पंचमी में पीली सरसों की बिछावन और गाय–बछड़ों के लाड़ के लिए गोपाष्टमी जैसे अनगिनत मौके हैं हमारी परम्परा में जो हमारे और नीली–हरी धरती के बीच चुंबक सरीखे हैं। बेटियों की पैदाइश पर पौधे लगाने जैसी नई परंपराओं ने जन्म लेकर दकियानूसी सोच की सफाई भी की है। ऐसी अनिगनत जड़ी–बूटियां जो हमारे लिए मरहम हैं‚ पहाड़ों और जंगलों की बेपरवाही से घरों की बंदिशों में समा रही हैं। सरकारों ने इसे ‘पोषण वाटिका' की शक्ल देकर इंसान और पेड़ों के रिश्तों की सजावट ही की है‚ जिसमें खासकर मां–बच्चे की फिक्र शामिल है। रिश्तों को अहमियत देने की हमारी फितरत परंपराओं की ही वजह से है। यही दूरियों को भरने का काम करती हैं। दूरियों का जिक्र छिड़ते ही लोक परंपराओं को चूनर की तरह लपेट कर रखने वाली देहाती औरतें हमें ये कहकर झिड़क देती हैं कि क्या त्योहार भी देस–विदेस का होता है। जिस रंग को ओढ़ लो वही तो अपना है और वहीं अपनापन है। ॥ पानी का मोल जानने वाले इलाकों में सावन के लहरिये की सज–धज के साथ मिट्टी की दाबू छपाई वाले कपड़े नए दौर के चलन में दूरदराज पहुंच रहे हैं‚ तो वहां भी अब कुदरत के तौर–तरीकों को सहेजने वाली रंगाई–छपाई की पूछ है। खेती किसानी में रमी आशा जी को सरकार के नरेगा के काम में तालाबों से मिट्टी खुदवाने का काम उसी तरह लगता है‚ जिस तरह कुंओं–तालाबों की मिट्टी साफ करके गांव का हर घर अपनी मेहनत का दान किया करता था। साथ उठना‚ खाना‚ कहना‚ सुनना‚ गाना–बजाना सब इसी बहाने से होता रहा है‚ जिसकी कसक अब गांव–शहरों को नजदीक ले आई है। जो गांव शहर होने की फिराक में थे‚ अब उनकी वकत बढ़ी है‚ तो सिर्फ इसलिए कि वहां बसी सादगी‚ साफगोई और आबोहवा की ही दुनिया को दरकार है। यह आत्मनिर्भरता की आस के बीच सरकारों के सरोकारों का भरा पूरा हिस्सा होना चाहिए। पूरब की कोसी से मध्य की नर्मदा–शिप्रा‚ पश्चिम के मीठे–खारे तालाब बावड़यिों से लेकर दक्खिन की कृष्ण–गोदावरी और उत्तर की गंगा–यमुना‚ सबके सब धरती में दबे बीजों को मिट्टी चीरने का हौसला देकर जीवन की बालू मिट्टी के पोर–पोर को भिगाए रखती हैं तो हमें भी अपनी परम्पराओं के पांव फिर छूकर पर्यावरण से हमारे इश्क–मोहब्बत का खुलकर इजहार करने की सलाहियत बरतनी ही चाहिए।

सौजन्य - राष्ट्रीय सहारा।

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Monday, December 7, 2020

किसान आंदोलन की कसौटी (राष्ट्रीय सहारा)

आज देश भर में किसान आंदोलन को लेकर बहुत चर्चा हो रही है। लेकिन आज हम सरकार और किसानों के बीच हो रहे इस आंदोलन के हल निकालने के लिए अपनाए जा रहे तरीकों पर चर्चा करेंगे। इसी से अंदाजा लगेगा कि यह आंदोलन किस ओर जा रहा है। दरअसल‚ यह विलेषण हमारे मित्र‚ चिंतक और समाज वैज्ञानिक सुधीर जैन ने किया है। जैन का कहना है कि पारंपरिक ज्ञान है कि किसी भी समस्या या परेशानी से निपटने के लिए कौटिल्य द्वारा बताए गए साम‚ दाम‚ दंड व भेद का रास्ता ही सबसे उचित है। अगर हम इनको एक–एक करके देखें तो हो सकता है कि हमें कुछ अंदाजा लगे कि इस आंदोलन में आगे क्या हो सकता है। साम‚ दाम‚ दंड व भेद में एक महत्वपूर्ण बात यह होती है कि ये सब एक क्रम में हैं।

 सबसे पहले साम यानी समझौते या संवाद को अपनाया जाता है। लेकिन इस समस्या में साम की बात करें तो ये देखा जाएगा कि साम के बजाए बाकी तीनों विकल्पों को पहले अपनाया जा रहा है। इस बात से आप सभी भी सहमत होंगे कि जो भी स्थितियां पिछले दिनों में बनीं‚ उनमें दंड और भेद ज्यादा दिखाई दिए। लेकिन इस बात का विरोध करने वाले यह कहेंगे कि साम यानी संवाद वाले औजार का प्रयोग हो तो रहा है। लेकिन पिछले दिनों की गतिविधियों को देखें तो साम का इस्तेमाल कोई ज्यादा दिखाई नहीं दे रहा। न तो किसानों की ओर से और न ही सरकार की ओर से। अलबत्ता बाकी तीन चीजों का इस्तेमाल ज्यादा दिखाई देता है।


 दाम की स्थिति यह है कि वर्षों से स्थापित किसान नेताओं को इस आंदोलन में कोई ज्यादा छूट नहीं दी गई है। जिस तरह से देश भर के किसानों के प्रतिनिधियों को इस आंदोलन में देखा जा रहा है‚ ३५ संगठन कम नहीं होते। इन ३५ संगठनों को घटा कर एक संगठन या मंडल में सीमित करना कोई आसान काम नहीं है। किसान इस बात पर राजी नहीं हैं। इसका मतलब यह है कि यह आंदोलन राजनीतिक आंदोलन कम और सामूहिक या सामाजिक आंदोलन ज्यादा नजर आता है। सरकार को इसमें दाम के औजार को इस्तेमाल करने में काफी कठिनाई आ सकती है। अगर सारे आंदोलन का एकमुश्त नेतृत्व चंद लोगों के हाथ में होता‚ तो सरकार उनसे डील कर सकती थी‚ जैसा अक्सर होता है। पर यहां सभी बराबर के दमदार समूह हैं। इसलिए उसकी संभावना कम नजर आती है। ॥ दंड की बात करें‚ तो इसमें थोडÃी कोशिश जरूर की गई है। इस आंदोलन में जिस तरह अडÃचन डाली गई या किसानों को भयभीत किया गया कि किसी तरह इस आंदोलन को शुरू न होने दिया जाए। लेकिन दंड का औजार इस आंदोलन में ज्यादा असरदार नहीं दिखा। आज देश की स्थितियां काफी संवेदनशील हैं और इन स्थितियों में ऐसी दबिश या जबरदस्ती करना सम्भव नहीं दिखता। लेकिन इस आंदोलन में अगर दंड के रूप में थोडÃा आगे देखें‚ तो अदालत एक ऐसा रास्ता दिखाई देता है‚ जिसे सरकार आने वाले समय में अपना सकती है। ऐसा पहले हुआ भी है‚ जब किसी आंदोलन में कोई समझौता‚ दबिश या दंड का रास्ता नहीं काम आया तो अदालत का दरवाजा खटखटाया जाता है। कोविड के नाम पर अदालत से किसानों को हटाने के आदेश मांगे जा सकते हैं। पर तब सवाल खडÃा होगा कि बिहार और हैदराबाद सहित जिस तरह लाखों लोगों की भीडÃ कंधे से कंधा सटाकर जनसभाओं में हफ्तों जमा होती रही‚ उन पर कोविड का महामारी के रूप में क्या कोई असर हुआॽ अगर नहीं‚ तो अदालत में किसानों के वकील ये सवाल खडÃा कर सकते हैं।

 साम‚ दाम‚ दंड के बाद अब अगर भेद की बात करें‚ तो उसमें दो–तीन बातें आती हैं जैसे कि भेद लेना‚ तो किसानों से भेद लेना कोई आसान सी बात नहीं दिखती। सब कुछ टिकैत के आंदोलन की तरह एकदम स्पष्ट है। इतने सारे किसान नेता हैं‚ प्रवक्ता हैं‚ इनमें भेद करना या फूट डालना मुश्किल होगा। फिर भी वो कोशिश जरूर होगी। इस दिशा में जितनी भी कोशिशें हो रही हैं‚ अगर उनको आप ध्यान से देखेंगे या उससे संबंधित खबरों को देखेंगे‚ तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि भेद डालने के क्या–क्या उपक्रम हुए हैं। ये काम भी हर सरकार हर जनांदोलन के दौरान करती आई है। इसलिए इस हथकंडे को मौजूदा सरकार भी अपनाने की कोशिश करेगी। ॥ इन सब से हट कर एक गुंजाइश और बचती है और वो है वक्त। ऐसे आंदोलनों से निपटने के लिए जो भी सरकार या नौकरशाही या कारपोरेट घराने हों‚ वो इस इंतजार में रहते हैं कि किसी तरह आंदोलन को लंबा खिंचवाया जाए तो वो धीरे–धीरे ठंडा पडÃ जाता है। ये विकल्प अभी बाकी है कि किस तरह से इस आंदोलन को अपनी जगह पर ही रहने दें और इंतजार किया जाए। यानी मुद्’े को वक्त के साथ मरने दिया जाए। अलबत्ता किसानों ने आते ही इस बात का ऐलान भी कर दिया था कि वो तैयारी के साथ आए हैं। वो ४–५ महीनों का राशन भी साथ लेकर आए हैं। इनके उत्साह को देखते हुए यह पता लग रहा है कि किसान एक लंबी लडÃाई लडÃने के लिए तैयार हैं। इसलिए इस औजार का इस्तेमाल करने में भी मुश्किल आएगी। अगर आर्थिक मंदी की मार झेल रहे देश के करोडÃों बेरोजगार नौजवान भी इस आंदोलन से जुडÃ गए‚ तो ये विकराल रूप धारण कर सकता है। ये तो वक्त ही बताएगा की >ंट किस करवट बैठेगा। 


जहां तक आंदोलन के खालिस्तान समर्थक होने का आरोप है‚ तो यह चिंता की बात है। ऐसे कोई भी प्रमाण अगर सरकार के पास हैं तो उन्हें अविलंब सार्वजनिक किया जाना चाहिए। सुशांत सिंह राजपूत की तथाकथित ‘हत्या' की तर्ज पर कुछ टीवी चैनलों का ये आरोप लगाना बचकाना और गैर जिम्मेदाराना लगता है‚ जब तक वे इसके ठोस प्रमाण सामने प्रस्तुत न करें। यूे तो हर जन आंदोलन में कुछ विघटनकारी तत्व हमेशा घुसने की कोशिश करते हैं। अब ये किसान आंदोलन के नेतृत्व पर निर्भर करता है कि वो ऐसे तत्वों को हावी न होने दें और अपना ध्यान मुख्य मुद्’ों पर ही केंद्रित रखें। सरकार भी खुले मन से किसानों की बात सुने और वही करे‚ जो उनके और देश के हित में हो।

सौजन्य - राष्ट्रीय सहारा।

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Friday, December 4, 2020

सच और बोझ की लड़़ाई (राष्टीय सहारा)

 आचार्य पवन त्रिपाठी

हते हैं कि इतिहास का सबसे बड़ा सबक है कि हम इतिहास से कोई सबक नहीं लेते। हालांकि सयानों का कहना है कि पूर्ववÌतयों से सीखने में कोई बुराई नहीं लेकिन महाराष्ट्र की महा विकास आघाड़ी सरकार इसे मानने को तैयार नहीं। यह उसका सिर्फ एक राजनीतिक पूर्वाग्रह है कि पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की सकारात्मक बातें सामने नहीं आनी चाहिए। मेट्रो कार शेड की जगह के बारे में तो यही तथ्य दिखाई दे रहा है जबकि इसी सरकार द्वारा गठित एसीएस मनोज सौनिक समिति का साफ–साफ मानना है कि लाइन ३ के लिए वर्तमान का कारशेड यानी आरे ही सर्वोत्तम है। समिति ने यह भी माना है कि आरे कारशेड में ग्रीन फेसिलिटी का प्रावधान है अर्थात इसमें कार्बन उत्सर्जन न्यूनतम रहेगा मसलन कारशेड की छत पर सोलर पैनेल‚ प्रदूषित पानी को परिष्कृत कर पुनः व्यवहार में लाना‚ एलईडी बल्ब के प्रयोग से बिजली की बचत इत्यादि।


 पता नहीं क्यों उद्धव ठाकरे सरकार कांजुरमार्ग के पीछे पड़ी हुई है‚ जबकि इस राह में बहुत कांटे हैं। इसके उलट आरे का रास्ता साफ सुथरा और समतल है पर चूंकि आरे फडणवीस की परियोजना है‚ इसलिए ठाकरे सरकार ने कांजुरमार्ग का खेल खेल दिया। मनोज सौनिक समिति का यह भी कहना है कि कारशेड को कहीं और स्थानांतरित किया जाता है‚ तो मेट्रो लाइन ६ परियोजना को तुरंत रोकना पड़ेगा एवं इसमें सिर्फ भारी फेरबदल ही नहीं करना पड़ेगा‚ बल्कि इसमें नये सिरे से काम करना पड़ेगा। यह तकनीकी oष्टि से समय सापेक्ष और खर्चीला होगा। यह भी तय नहीं है कि यह काम तकनीकी oष्टि से संभव हो पाएगा या नहींॽ समिति के मुताबिक कारशेड के कांजुरमार्ग स्थानांतरण से यह परियोजना दिसम्बर‚ २०२१‚ जो उसकी पूर्व निर्धारित तय सीमा है‚ तक पूरा नहीं हो पाएगी क्योंकि सिर्फ कारशेड बनाने में ही कम से कम ४.५ साल लगेंगे। जो लोग कांजुरमार्ग को जानते हैं‚ उन्हें पता है कि यहां की जमीन की भराई और उसे समतल करने में ही दो साल लगेंगे यानी मुंबईकरों को और अनेक सालों तक मेट्रो से वंचित रहते हुए दुखः झेलने पड़ेंगे। 


समिति ने यह भी स्वीकार किया है कि कांजुरमार्ग स्थानांतरण करने से मेट्रो ३ एवं मेट्रो ६ दोनों के करारों में भारी फेरबदल करना पड़ेगा। इस से न सिर्फ समय का दुरु पयोग होगा‚ बल्कि परियोजना में भी बदलाव करना पड़ेगा और खर्चों में भारी बढ़ोतरी होगी। समिति की रिपोर्ट के अनुसार एक ही कारशेड होने से यह दोनों लाइनों की जरूरतें समय से पूरा नहीं कर पाएगी जिससे दोनों लाइन का परिचालन बाधित होगा और क्षमता के अनुरूप कार्य नहीं हो पाएगा। अन्ततः जनता को समयानुसार सेवा भी नहीं मिल पाएगी।


 अपनी रिपोर्ट में समिति ने उल्लेख किया है कि लाइन ३ में ८ डिब्बे का प्रावधान है जबकि लाइन ६ में सिर्फ ६ डिब्बे के रैक होंगे। तकनीकी oष्टि से यह बड़ी बात है। दोनों के लिए एक कारशेड में खर्च में कमी नहीं आएगी। यह प्रस्ताव परिचालन में खर्चीला होगा जिसका बोझ सीधे तौर पर जनता पर होगा। यहां पर मुंबई मेट्रो के त्रिपक्षीय करार पर ध्यान देना भी आवश्यक है। इस करार में प्रावधान है कि परियोजना में अनावश्यक देरी का कारण खर्च में वृद्धि होती है‚ तो महाराष्ट्र सरकार जिम्मेदार होगी और अतिरिक्त वित्तीय भार वहन करेगी। कारशेड स्थानांतरण से परियोजना में अतिरिक्त वित्तीय बोझ की बात की जाए तो समिति का कहना है कि सिर्फ जमीन की कीमत (न्यायालय इसे व्यक्तिगत संपत्ति माने तो) के मद में सरकार को ७८६२ करोड़ रुûपये चुकाने होंगे। ध्यान रहे कि मेट्रो लाइन ३ में एक दिन की देरी से परियोजना पर ५.८७ करोड़ का बोझ पड़ता है। चार साल की देरी भी मानें तो ८५७० करोड़ रु पये का अतिरिक्त भार महाराष्ट्र सरकार को वहन करना पड़ेगा। मेट्रो लाइन ६ का अतिरिक्त भार अलग से होगा। ॥ महkवपूर्ण तथ्य यह भी है कि परियोजना पूरी होने में देरी के कारण राज्य की अर्थव्यवस्था में होने वाली क्षति का सटीक आकलन अभी से कर पाना मुमकिन नहीं है‚ पर मोटे तौर पर कहा जा सकता है कि दोनों मेट्रो लाइन के लिए यह ५३५६ से ४३‚८२६ करोड़ रुûपये तक हो सकता है‚ यह बात समिति ने भी मानी है। सवाल है कि इतना भारी वित्तीय बोझ अपने छोटे से राजनैतिक लाभ के लिए जनता पर डालना कहां तक उचित हैॽ समिति का निष्कर्ष है कि जब कांजुरमार्ग जमीन के मालिकाना हक का फैसला तक नहीं हुआ है‚ और यह मामला न्यायालय में लंबित है‚ तो वहां कारशेड स्थानांतरण का विचार प्रासंगिक नहीं है। यह सच्चाई है कि सॉल्टपेन जमीन के अधिकार का विषय राज्य और केंद्र के बीच ४० साल से फंसा हुआ है।


 दरअसल‚ १९३० के समझौते का यह प्रावधान था कि जिस जमीन पर नमक की खेती होती है उस जमीन का मालिकाना हक नमक आयोग के पास रहेगा। फिर इस पर विवाद तब शुरू हुआ जब १९८१में तत्कालीन उपजिलाधिकारी ने २९७८ एकड़ नमक खेती को राज्य सरकार की मलकियत घोषित कर दिया। तब आयोग ने कोर्ट में इसे चुनौती दी जो पिछले चार दशक से लंबित है॥। बात आरे की करें तो वहां पर २१४१ पेड़ काटे जा चुके हैं। कांजुरमार्ग जमीन में कोई भी परियोजना वहां जैव विविधता को क्षति पहंुचाएगी। यह भी जान लीजिए कि कांजुरमार्ग की जमीन सॉल्टपेन है‚ जहां सदाबहार यानी मैंग्रोव्स हैं‚ और मैंग्रोव्स प्रतिबंधित वृक्ष हैं। यातायात विभाग के आंकड़े बताते हैं कि २००९ से २०१९ के बीच वाहनों की संख्या में २०८‡ की बढ़ोतरी हुई है। बृहन मुंबई में रास्ते की लंबाई करीब २००० किमी. है‚ जिसमें इन वषाç में कोई खास बढ़ोतरी भी नहीं हुई है। शहर के पर्यावरण पर इसका जो प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है‚ वह विचारणीय है और इसके समाधान में अब और देरी होने की संभावना है। मुंबई जिलाधिकारी के पत्र दिनांक १ अक्टूबर‚ २०२० में साफ लिखा है कि उच्च न्यायालय ने प्रस्तावित कांजुरमार्ग जमीन पर किसी भी प्रकार का कार्य के लिए अगले आदेश तक रोक लगा दी है। इसका मतलब है कि वहां पर कारशेड के लिए उच्च न्यायालय की अनुमति लेनी होगी। इसके लिए खर्च एमएमआरडीए को वहन करना पड़ेगा यानी एक और वित्तीय बोझ। मजे की बात है कि मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे कांजुरमार्ग को किफायती मानते हैं पर हकीकत इससे कोसों दूर है। फडणवीस का कहना है कि यह मेट्रोविहीन प्रस्ताव है। कहने का तात्पर्य है कि जब मेट्रो परियोजना की ७६ फीसदी सुरंग के काम हो चुके हैं‚ तो अगले ४ से ५ साल तक कारशेड का ना होना परियोजना की वित्तीय साध्यता को विफल करता है। देखना है कि आरे बनाम कांजुरमार्ग की लड़ाई में जीत सच की होती है‚ या बोझ‚ देरी और फिजूलखर्ची बाजी मार ले जाते हैं। 


 पता नहीं क्यों उद्धव सरकार कांजुरमार्ग के पीछे पड़ी हुई है‚ जबकि इस राह में बहुत कांटे हैं जबकि आरे का रास्ता साफ सुथरा और समतल है पर चूंकि आरे फडणवीस की परियोजना है‚ इसलिए उद्धव सरकार ने कांजुरमार्ग का खेल खेल दिया। मनोज सौनिक समिति का कहना है कि कारशेड को कहीं और स्थानांतरित किया जाता है‚ तो नये सिरे से काम करना पड़ेगा ॥

सौजन्य - राष्टीय सहारा।

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Friday, November 27, 2020

लव जिहाद पर नकेल (राष्ट्रीय सहारा)

लव जिहाद इस शब्द की उत्पत्ति सबसे पहले केरल से हुई। केरल के मुख्यमंत्री रहे अच्युतानन्दन‚ जो वामपंथी पार्टी के थे‚ ने लव जिहाद शब्द के बारे में सबसे पहले स्वीकारोक्ति दी थी। इस स्वीकारोक्ति के साथ ही केरल हाई कोर्ट में एक मामला सामने आया। इस मुकदमे में जस्टिस केटी शंकरन‚ जो केरल हाई कोर्ट के विद्वान न्यायाधीश थे‚ ने अपने आदेश में बाकायदा इस बात का जिक्र किया कि दिसंबर २००९ तक केरल में लगभग तीन–चार हजार ऐसे मामले थे‚ जिनका ट्रेंड एक ही था। इनमें ईसाई‚ हिन्दू एवं अन्य धर्मीय महिलाओं को मुस्लिम कट्टरपंथियों ने एक सुनियोजित षड्यंत्र के तहत अपने प्रेमजाल में फंसाकर बाद में उनसे विवाह कर उनका धमाÈतरण किया था। केरल हाई कोर्ट ने इस मामले में केरल पुलिस को जांच का भी जिम्मा सौंपा था। चूंकि केरल की पुलिस वहां के राजनीतिक दबाव के चलते उसका जो अन्वेषण होना चाहिए था‚ उसमें कोताही बरती‚ इसलिए इस बात को भी रेखांकित करते हुए जस्टिस शंकरन ने लव जिहाद की घटनाओं पर मुहर लगाने का काम किया। वहां की चर्च भी लगातार ईसाई लड़कियों को बहला–पुसला कर प्रेम जाल में फंसाकर बाद में उनका धमाÈतरण कर विवाह करने के मामले में लगातार आवाज उठाता रहा। आज भी वहां के सायरो–मालाबार चर्च में मास के दौरान कई बार यह मुद्’ा वहां के धर्मगुरु ओं ने उठाया कि किस तरह से केरल में लगातार लव जिहाद के मामले हो रहे हैं। केरल की सरकार को इस पर पहल करके कार्रवाई करनी चाहिए थी‚ लेकिन कार्रवाई नहीं की गई। इसी तरह केरल के हदिया मामले में सुप्रीम कोर्ट ने नेशनल जांच एजेंसी को भी लव जिहाद के पैटर्न की जांच करने के निर्देश दिए थे। एनआईए ने भी अपनी रिपोर्ट में कहा कि वहां पर एक ऐसा पैटर्न दिखाई देता है‚ जिसमें हजारों युवतियों को प्रेम जाल में फांसकर धमाÈतरण करके बाद में मुस्लिम बनाया गया है। एनआईए की जांच भी अभी तक खुली हुई है।


 केरल के अतिरिक्त अन्य राज्यों‚ जैसे महाराष्ट्र‚ राजस्थान‚ मध्य प्रदेश‚ उत्तर प्रदेश में भी लव जिहाद की घटनाएं आई हैं। झारखंड में तो बाकायदा एक राष्ट्रीय स्तर के शूटर तारा सहदेव ने इस मामले में बताया कि किस तरह से उसे एक मुस्लिम लड़के ने हिन्दू बनकर पहले प्रेम जाल में फंसाया‚ बाद में उससे विवाह कर लिया और विवाह करने के बाद उस पर मुस्लिम बनने के लिए दबाव डालने लगा। जब उसने मना किया‚ तो उसने उस पर उत्पीड़न का काम शुरू कर दिया। सेलिब्रेटी शूटर होने के कारण इस मामले को खुलने के बाद पूरे देश की निगाहें इस पर गइÈ। इसलिए पूरे देश में इस पर चर्चा हुई‚ लेकिन झारखंड में भी लव जिहाद के खिलाफ किसी प्रकार के कानून बनाने की बात नहीं हुई। हरियाणा के वल्लभगढ़ में निकिता तोमर के मामले में एक कांग्रेसी विधायक के परिजनों ने निकिता तोमर पर विवाह करने और धमाÈतरण करने का दबाव बनाया। जब निकिता तोमर ने धमाÈतरण और विवाह करने से इंकार कर दिया‚ तो नृशंसता से उसको गोली मारकर उसकी हत्या कर दी गई। इसके बाद वहां मनोहरलाल खट्टर सरकार ने लव जिहाद के खिलाफ सख्त कानून बनाने की पहल शुरू कर दी है। उत्तर प्रदेश‚ विशेषकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में ऐसे सैकड़ों मामले सामने आए हैं‚ जिनमें गुड्डू‚ बबलू‚ दीपू बनकर मुस्लिम लड़कों ने हाथ में कलावा पहनकर बाकायदा हिन्दू लड़कियों को अपने प्रेम जाल में फंसाया‚ बाद में धमाÈतरण कर विवाह करने पर मजबूर किया।


 मुस्लिम धर्म में लड़कियों को अपने धर्म से बाहर विवाह करने की इजाजत नहीं है। ऐसे में दिल्ली में राहुल राज का मामला ध्यान देने योग्य है‚ जहां पर राहुल ने एक मुस्लिम लड़की से प्यार किया तो मुस्लिमों ने उसे अपने मोहल्ले में बुलाकर उसकी नृशंसतापूर्वक हत्या कर दी। यदि मुस्लिम लड़की हिन्दू लड़के से प्यार करती है तो मुस्लिम समाज उसे स्वीकृति प्रदान नहीं करता है‚ तो दूसरी तरफ लव जिहाद के मामले में जब हिन्दू लड़की को मुस्लिम लड़के ले जाते हैं तब तमाम मौलवी इसे प्यार का मामला बताते हैं‚ इसमें तो लव जिहाद जैसी कोई चीज ही नहीं है या काल्पनिक है या भाजपा‚ वि·ा हिन्दू परिषद या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा फैलाया गया भ्रम है‚ ऐसे दावे करते हैं। वि·ा हिन्दू परिषद ने १६४ मामले सामने लाए हैं‚ जिनमें हिन्दू लड़कियों को बहला–फुसलाकर धमाÈतरित कर उनसे विवाह किया गया और कालान्तर में उन लड़कियों को छोड़ दिया गया। वि·ा हिन्दू परिषद ने ऐसे १६४ परिवारों की बाकायदा सूची बनाकर उन घटनाओं का अभियुक्तों का वर्णन दिया है। फिर भी इन घटनाओं को लगातार मुस्लिम संगठन काल्पनिक करार देते हैं।


 मुसलमानों में विवाह के सन्दर्भ में जब लड़की अन्य धर्म की है‚ तब उसके विवाह की मान्यता ही नहीं दी जाती है। जो ग्रंथ आधारित धर्म (इस्लाम‚ ईसाईयत और यहूदी) हैं‚ इनकी लड़कियों का मुसलमानों से विवाह करने के लिए धमाÈतरण करना आवश्यक नहीं है। लेकिन जो इनके बाहर की लड़कियां हैं‚ उनको विवाह करने से पहले काजी के सामने धमाÈतरण करना आवश्यक है। ऐसे में अधिकांश लड़कियों को पहले धमाÈतरण करने के लिए मजबूर किया जाता है। ऐसे में अब योगी आदित्यनाथ की सरकार ने उत्तर प्रदेश में लव जिहाद को रोकने के लिए जिस तरह से संविधान सम्मत कानून बनाने का कार्य किया है‚ उससे इस षडयंत्र से समाज को राहत मिलेगी‚ धमाÈतरण रु केगा तथा दोषियों को सजा मिलेगी। योगी सरकार की तर्ज पर मनोहरलाल खट्टर की सरकार हरियाणा में और शिवराज सिंह की सरकार मध्य प्रदेश में लव जिहाद के खिलाफ सख्त कानून बना रही है। इसमें जो लव जिहाद को समर्थन देगा यानी जो इस तरह के मामले में उकसावा देंगे‚ उनके खिलाफ भी दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी। चूंकि भारत में स्पेशल मैरिज एक्ट यानी विशेष विवाह अधिनियम का प्रावधान है‚ इसके तहत किसी अंतरधाÌमक विवाह के लिए वर और वधू को कलेक्टर कार्यालय में पंजीनियन कराकर एक माह की अवधि की नोटिस दी जाती है। यदि एक माह अवधि की नोटिस मिलेगी‚ तो ऐसे मामलों में जो दिग्भ्रमित करने की संभावनाएं हैं‚ वह समाप्त हो जाएंगी। इस स्पेशल मैरिज एक्ट का यानि विशेष विवाह अधिनियम का सदुपयोग करके विवाह करने के बजाय जो लड़कियों के धर्म को धमाÈतरित करके विवाह किया जा रहा है‚ वह पूरी तरह प्रतिबंधित हो जाएगा। इस तरह धमाÈतरण कर विवाह करने वाले दंड के पात्र होंगे। इस कानून को सुनते ही लव जिहाद के समर्थक अपनी छाती पिट रहे हैं। लेकिन यह स्त्री अधिकारों के लिए यह एक आवश्यक कदम है और इस कदम को उठाकर निश्चित तौर पर जो छल‚ बल के आधार पर धमाÈतरण करा रहे हैं‚ उनको रोकने का एक संविधान सम्मत कार्य जो योगी सरकार ने किया है ‚ उसका हर किसी को स्वागत करना चाहिए।


सौजन्य - राष्ट्रीय सहारा।

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Thursday, November 26, 2020

Editorial : पाठ और पुनर्पाठ बेहद जरूरी (राष्ट्रीय सहारा)

भारत ने २६ जनवरी‚ १९५० को पहला गणतंत्र दिवस मनाया। भारतीय संविधान सभा की आखिरी बैठक (२६ नवम्बर‚ १९४९) में ड़ॉ. आम्बेडकर के प्रस्ताव पर मतदान हुआ और संविधान पारित हो गया। भारत के प्रत्येक जन को वाक्स्वातंjय और विधि के समक्ष समता सहित सभी मौलिक अधिकार मिले। १९४७ तक भारत में ब्रिटिश सत्ता थी। भारत परतंत्र था। २६ नवम्बर के दिन से अपना संविधान प्रवर्तन हुआ था। २६ नवम्बर का दिन सभी संवैधानिक संस्थाओं‚ राजनैतिक दलों और देशभक्तों के लिए गहन आत्म विश्लेषण का उत्सव है। 


 संविधान राष्ट्र जीवन की गति का मुख्य दिक्सूचक है। भूमि‚ जन और शासन से ही राष्ट्र नहीं बनते। जाति‚ मजहब‚ राजनीति और क्षेत्रीय आग्रह समाज तोड़ते हैं‚ संस्कृति ही इन्हें जोड़ती है। भारतीय संविधान निर्माता सनातन सांस्कृतिक क्षमता से परिचित थे। उन्होंने संविधान की हस्तलिखित प्रति में सांस्कृतिक राष्ट्रभाव वाले २३ चित्र सम्मिलित किए। मुखपृष्ठ पर राम और कृष्ण तथा भाग १ में सिंधु सभ्यता की स्मृति वाले मोहनजोदड़ो काल की मोहरों के चित्र हैं। भाग २ नागरिकता वाले अंश में वैदिक काल के गुरुûकुल आश्रम का दिव्य चित्र है। भाग ३–मौलिक अधिकार वाले पृष्ठ पर श्री राम की लंका विजय व भाग ४–राज्य के नीति निर्देशक तत्वों वाले पन्ने पर कृष्ण–अर्जुन उपदेश वाले चित्र हैं। भाग ५ में महात्मा बुद्ध‚ भाग ६ में स्वामी महावीर और भाग ७ में सम्राट अशोक के चित्र हैं। भाग ८ में गुप्त काल‚ भाग ९ में विक्रमादित्य‚ भाग १० में नालंदा विश्वविद्यालय‚ भाग ११ में उड़ीसा का स्थापत्य‚ भाग १२ में नटराज‚ भाग १३ में भगीरथ द्वारा गंगावतरण‚ भाग १४ में मुगलकालीन स्थापत्य‚ भाग १५ में शिवाजी और गुरुû गोविन्द सिंह‚ भाग १६ में महारानी लIमीबाई‚ भाग १७ और १८ में क्रमशः गांधी जी की दांडी यात्रा और नोआखाली दंगों में शांति मार्च‚ भाग १९ में नेताजी सुभाष‚ भाग २० में हिमालय‚ भाग २१ में रेगिस्तानी क्षेत्र व भाग २३ में लहराते हिंद महासागर की चित्रावलि है। 


संविधान पारण के बाद अध्यक्ष राजेन्द्र प्रसाद ने कहा‚ ‘अब सदस्यों को संविधान की प्रतियों पर हस्ताक्षर करने हैं‚ एक हस्तलिखित अंग्रेजी की प्रति है‚ इस पर कलाकारों ने चित्र अंकित किए हैं‚ दूसरी छपी हुई अंग्रेजी व तीसरी हस्तलिखित हिंदी की।' (संविधान सभा कार्यवाही खंड १२ पृष्ठ ४२६१) भारतीय सभ्यता‚ संस्कृति और इतिहास के छात्रों के लिए संविधान की चित्रमय प्रति प्रेरक है। संविधान मार्गदर्शी है‚ लेकिन राष्ट्र की समृद्धि संवैधानिक संस्थाओं पर आसीन महानुभावों पर निर्भर है। 


॥ ड़ॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने संविधान सभा के आखिरी भाषण (२६.११.१९४९) में कहा‚ ‘संविधान किसी बात के लिए उपबंध करे या न करे‚ देश का कल्याण उन व्यक्तियों पर निर्भर करेगा‚ जो देश पर शासन करेंगे।' अपने आखिरी भाषण में ड़ॉ. आम्बेडकर ने भी प्राचीन भारतीय परंपरा की याद दिलाते हुए कहा था‚ ‘एक समय था जब भारत गणराज्यों से सुसज्जित था। यह बात नहीं है कि भारत पहले संसदीय प्रक्रिया से अपरिचित था।' यहां वैदिक काल से ही एक परिपूर्ण गण व्यवस्था थी। गणेश गणपति थे। प्राचीनतम ज्ञान अभिलेख ऋग्वेद में ‘गणांना त्वां गणपतिं' आया है। मार्क्सवादी चिंतक ड़ॉ. रामविलास शर्मा ने लिखा है‚ ‘गण पुराना शब्द है‚ यह पुरानी समाज व्यवस्था का द्योतक है। गण और जन ऋग्वेद में पारिभाषिक हो गए हैं।' महाभारत युद्ध के बाद युधिष्ठिर ने भीष्म से आदर्श गणतंत्र का सूत्र पूछा। भीष्म ने (शांति पर्वः १०७.१४) बताया कि भेदभाव से ही गण नष्ट होते हैं। उन्हें संघबद्ध रहना चाहिए। गणतंत्र के लिए बाहरी की तुलना में आंतरिक संकट बड़ा होता है –‘आभ्यन्तरं रIयमसा बाह्यतो भयम्'–बाह्य उतना बड़ा नहीं। संविधान राष्ट्र का कारक है। संविधान निर्माताओं ने संसदीय जनतंत्र अपनाया है। अनेक संवैधानिक संस्थाओं का प्रावधान किया है। विधायिका‚ कार्यपालिका और न्यायपालिका के मध्य शक्ति के पृथक्करण का सिद्धांत लागू है। निर्वाचन आयोग जैसी संवैधानिक संस्थाएं सारी दुनिया में प्रतिष्ठित हैं। संसद विधायी और संविधायी अधिकारों से लैस है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लोक सभा में प्रवेश के पहले दिन संसद भवन की सीढ़ियों पर साष्टांग प्रणाम किया था। यह प्रेरक और ऐतिहासिक है। संविधान निर्माताओं ने संसद को सविधान संशोधन का भी अधिकार दिया है। मोदी सरकार ने संविधान के अनुच्छेद–३७० को हटाने की कार्यवाही पूरी कर ली है। इसे हटाना संविधान निर्माताओं का ही स्वप्न था। उन्होंने इसके शीर्षक में ‘अस्थायी उपबंध' शब्द छोड़े थे। जम्मू कश्मीर की जनता इससे प्रसन्न है‚ लेकिन अलगाववादी शक्तियां अभी भी सक्रिय हैं। यही स्थिति सीएए (नागरिकता संशोधन कानून) की है। कुछ ताकतें खुल्ल्मखुल्ला इसका विरोध कर रही हैं। संसद में किसानों के हित में पारित कानूनों को लेकर भी कुछ सरकारें चुनौती दे रही हैं। 


 भारतीय गणतंत्र लगातार विकसित हो रहा है। न्यायपालिका संविधान की जिम्मेदार संरक्षक है। हिंदुत्व की व्याख्या व नवीं अनुसूची के दुरुûपयोग को रोकने सहित अनेक मसलों पर न्यायपीठ ने प्रशंसनीय फैसले किए हैं। मौलिक अधिकार सुरक्षित हैं। कृषि‚ विकास‚ गोवंश संवर्द्धन राज्य के नीति निर्देशक संवैधानिक तत्व हैं। महाभारतकार ने गणतंत्र की सभा समिति (संसदीय व्यवस्था) के सदस्य की अनिवार्य योग्यता बताई थी‚ ‘न नः स समितिं गच्छेत यश्च नो निर्वपेत्कृषिम'–‘जो खेती नहीं करता वह सभा में प्रवेश न करे।' ऋग्वैदिक काल में ऋषि भी कृषि करते थे। कॉमन सिविल कोड नीति निर्देशक तत्व है। हिंदुत्व देश का प्राण तत्व है‚ लेकिन सांप्रदायिक कहा जाता है। अलगाववाद देशतोड़क हैं तो भी सेक्युलर। अल्पसंख्यकवाद की आंधी है‚ लेकिन संविधान और कानून में ‘अल्पसंख्यक' शब्द की परिभाषा नहीं है। गहन आत्मचिंतन एकमेव विकल्प है। संविधान में देश के प्रत्येक नागरिक को मौलिक अधिकारों की प्रतिभूति है। लेकिन इसी के साथ संविधान के अनुच्छेद–५१क में मूल कर्तव्यों की भी सूची है। मूल कर्तव्यों की सूची भारत के लोक जीवन को आनन्दित करने का दस्तावेज है। संविधान दिवस के अवसर पर इसका पाठ और पुनर्पाठ बहुत जरूरी है। संविधान की उद्देशिका स्मरणीय है। इसमें ‘हम भारत के लोग' शब्द का प्रयोग ध्यान देने योग्य है। भारत की जनता के लिए किसी जाति‚ संप्रदाय या वर्ग शब्द का प्रयोग नहीं है। हम सबकी पहचान भारत है। ‘हम सब भारत के लोग' हैं। संविधान भारत का राजधर्म है। 

 (लेखक उत्तर प्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष हैं)


सौजन्य - राष्ट्रीय सहारा।

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Tuesday, November 17, 2020

Editorial : महिला नेतृत्व की बढी साख

कोविड काल के पहले अमेरिकी चुनाव में जनतंत्र और महिला नेतृत्व की साख बढ़ी है। पहली बार महिला उप राष्ट्रपति बनी कमला हैरिस की जीत सदियों से खुद को हाशिए पर महसूस करने वाली अमेरिकी आधी आबादी के लिए तो अच्छा शगुन तो है ही भारत–अमेरिकी रिश्तों के लिए भी अहम है। पिछली बार हिलेरी क्लिंटन के राष्ट्रपति बनने की उम्मीदें बंधी थी तब भी लगा था कि अमेरिका को पहली नेत्री नसीब होगी। मगर अमेरिकी आवाम उनकी काबिलियत और नीयत पर पूरा भरोसा नहीं कर पाई। कमला की दावेदारी भी राष्ट्रपति के लिए हुई‚ लेकिन फिर सियासती करवटों ने पासा पलटा। उनकी हैसियत ने दूसरे दमदार ओहदे के लिए उन्हें चुन लिया। ॥ देश के सामने किए जीत के पहले इजहार में उन्होंने बतौर महिला इस घटना को इतिहास की सबसे बड़ी अड़चन दूर होने की तरह पेश किया। कमाल करती हैं जब वो अपने देश की हर छोटी बच्ची को ये भरोसा दिलाती हैं कि ये मौका जो उन्हें मिला ये आखिरी बार नहीं होगा बल्कि अब सब बच्चियों के लिए उम्मीदों के दरवाजे खुलेंगे। उनकी ये बात आधुनिक समाज की आंखों में चमक पैदा करती है तो सिर्फ इसलिए कि जो पांव और खयाल खुद को कमज़ोर मानते रहने की बन्दिश में थमे रहे अब दोगुने हौसले से आगे बढ़ेंगे। ॥ अमेरिका में सौ साल पहले हुए १९वें संविधान संशोधन और ५५ साल पहले हासिल औरतों को वोट देने के अधिकार की याद दिलाते हुए औरतों की अपने हक और सुनवाई की परवाह करने के जिक्र से जाहिर है कि उनका इस पद पर होना अमेरिका को दुनिया के हर मंच पर कई मामलों में मुखर होने की वजह देगा। भारत और अपनी मां को याद करने के साथ ही उन जुदा जड़ों वाली अश्वेत‚ एशियाई‚ श्वेत‚ लातिवी और आदिवासियों महिलाओं के संघर्ष कोे सराहते हुए वो नहीं भूलतीं कि इसी साझेदारी ने उन्हें इस पायदान तक पहुंचाया है। ॥ फिलहाल दो बातें गौर करने की हैं। औरतों की राजनीतिक नुमाइंदगी की अहमियत और महिला वोट बैंक के बतौर खुद को किनारे से खींच कर केंद्र में ले आने की शिद्दत। बतौर वोटर उसकी बढ़ती दखल का सिलसिला अमेरिका में १९८० के आस पास नजर आया जब औरतों ने आदमियों के मुकाबले ज्यादा वोट किया। पिछले चार दशकों में अमेरिकी औरतों ने अपनी मर्जी के मुताबिक ही वोट तय किया है। जाहिर है अपनी चाहतों से समझौता किए बगैर अब सियासी फैसलों को वो खुद की जिंदगी पर असर से परखती हैं। इस बार ओबामा ने बाइडेन के लिए महिला वोटर्स से फोन पर वोट की अपील कर ये दोहराया कि इस आबादी की अनदेखी करना सियासी समझदारी भी नहीं‚ ईमानदारी भी नहीं। चुनावी दंगल में भी दोनों दावेदारों ने महिलाओं को अपनी अपनी तरीके से लुभाने में कसर नहीं छोड़ी। साल २०१६ के चुनाव में श्वेत महिलाओं के वोट बैंक ने ट्रंप के मुकाबले हिलेरी को ज्यादा पसंद किया था‚ लेकिन चुनावी नतीजों में दोनों पलड़ों के झुकाव पर असर ये है कि अमेरिकी चुनाव में महिलाओं का वोट प्रतिशत पुरुûषों को लगातार पछाड़ ही रहा है। करीब चार फीसद की लगातार बढ़त ने नागरिक के तौर पर उनका कद ऊंचा ही किया है। पिछले ३० सालों में वहां की अ£ीकी महिलाओं ने अ£ीकी मर्दों के मुकाबले हमेशा ही ज्यादा वोटिंग की है। हर जिम्मेदारी का बोझ लादे हुए वो राजनीति की फिजा की बेहतरी के जिम्मे से भी पीछे नहीं हटी। ॥ चाहे अमेरिका हो या भारत‚ ये मिथक भी आधी आबादी ने तोड़ना चाहा है कि उनके मसलों को बाकी देश–दुनिया के मसलों से जुदा करके खांचों में देखा जाना जायज नहीं। उसकी फिक्र के मामले सियासत और समाज की देश की आÌथक‚ सामाजिक‚ सेहत में ही गुंथे नहीं हैं बल्कि नई पीढ़ी को सौंपी जाने वाली चेतना से भी उनका गहरा रिश्ता है। किसी एक नेत्री की जीत हार से आधी आबादी और देश की किस्मत बदलना भले ही तय न होता हो‚ लेकिन सियासी मैदान में उसकी मौजूदगी भर से ये आस तो जागती ही है कि वो अपने संवाद–संवेदना की ताकत को जाया नहीं जाने देगी। बाकी बड़ी तब्दीली के लिए तो हर किरदार को ही असरदार होना होगा। न्यूजीलैंड की प्रधानमंत्री जेसिण्डा आरडर्न जब चुनकर आई तो पहली ही मर्तबा ‘वेलबीइंग बजट' पेश कर सबको चौंका दिया था। कारगर नीतियों की बदौलत ही दूसरी बार सर माथे बैठाया है उन्हें देश ने। भारतीय संदर्भ में राजनीति की मुख्यधारा में अभी महिलाओं की मौजूदगी उसकी काबिलियत के मुकाबले बेहद कम है इसलिए उनकी झिझक को झाड़ना बेहद जरूरी है। आजाद भारत में सुचेता कृपलानी‚ नंदिनी सत्पथी‚ राजकुमारी अमृत कौर जैसी नेत्रियों ने अपने बूते अपनी शनाख्त पाई तो हाल के दौर में स्मृति ईरानी ने भी तमाम इल्जाम अपने सर लेते हुए तंत्र में जमी काई को हटाने की भरपूर कोशिश की। ॥ राजस्थान की गायत्री देवी ने अपने पहले संसदीय चुनाव में रिकॉर्ड मत हासिल कर साबित किया कि एक राजमाता भी लोकशाही के आगे नतमस्तक रहेंगी। इंदिरा गांधी से उनकी खींचतान का खामियाजा उन्होंने इमरजेंसी में जेल में रहकर भी भुगता। पिछले आम बजट के दौरान असम से संसद पहुंची नेत्री सुष्मिता देव ने सेनेटरी पैड पर जीएसटी की छूट की मांग वित्त मंत्री के सामने पुरजोर रखी। सरकार ने इसके हक में अपना फैसला रखकर उन ७० फीसद महिलाओं का ध्यान रखा जिन्हें ये सहूलियत आसानी से मुहैया नहीं। बिहार की तर्ज पर वसुंधरा राजे ने बच्चियों को स्कूल जाने के लिए साइकिल देेने के फैसले से लाखों बच्चियों के हौसलों के पहिए जिस तरह दौड़े उसकी बात आज भी खुलकर नहीं होती। ॥ कामयाब होना न होना दीगर बात है‚ वक्त की नजाकत समझना‚ धारा के खिलाफ बढ़ने का हौसला रखना और काम की बदौलत इज्जत हासिल करना ही असल जीत है। ये बात सुकून की है कि भारत में पिछले १५ चुनाव में महिलाओं के वोट में लगातार इजाफा हुआ है और इस बार सबसे ज्यादा १४ फीसद महिला सांसद हैं‚ लेकिन बहस और फैसलों में उनकी संजीदगी लगातार नजर आती रहे ये जरूरी है। कमला हैरिस के अल्फाजों को दुनिया भर की औरतों को याद रखना होगा कि खुद को दूसरों के चश्मे से ना देखें। उतना ही जरूरी ये कि दो देशों के बीच गर्मजोशी बनी रहे। लोकनीति की लौ जलाने और जेंडर भेद मिटाने में कोई पीछे न रहे॥।

सौजन्य - राष्ट्रीय सहारा।

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Monday, November 16, 2020

Editorial : अनूठी पहल की जरूरत

नवम्बर आया नहीं कि दिल्ली का दम घुटना शुरू। दिल्ली में चलने वाले कारखानों और गाडिÃयों का धुंआ पहले ही कम न था‚ कि अब पडÃोस के राज्यों से जलती हुई पराली का धुंआ भी उडÃकर दिल्ली में घर करने लगा। एक वैज्ञानिक सवæक्षण की मानें तो इस प्रदूषण के कारण दिल्लीवासियों की औसतन आयु ५ वर्ष घट जाती है। हल्ला तो बहुत मचता है‚ पर ठोस कुछ नहीं किया जाता। देश के तमाम दूसरे शहरों में भी प्रदूषण का यही हाल है। रोजमर्रा की जिंदगी में कृत्रिम पदार्थ‚ तमाम तरह के रासायनिक‚ वातानुकूलन‚ खेतों में फर्टीलाइजर और पेस्टिसाइड‚ धरती और आकाश पर गाडिÃयां और हवाईजहाज और कल–कारखाने ये सब मिलकर दिनभर प्रति में जहर घोल रहे हैं। लॉकडाउन के दिनों में देशभर में आकाश एकदम साफ दिखाई दे रहा था और तो और पंजाब के जालंधर में रहने वाले लोगों अपने घरों की छत से ही हिमालय की वादियां नजर आ रही थीं। 

 यहां दशकों से रह रहे लोगों को पहले ये नजारा नहीं दिखा‚ बादल और प्रदूषण की वजह से हर तरफ धुआं–धुआं था‚ लेकिन लॉकडाउन के कारण ये धुआं छंट गया। गौरतलब है कि प्रदूषण के लिए कोई अकेला भारत जिम्मेदार नहीं है। दुनिया के हर देश में प्रति से खिलवाडÃ हो रहा है‚ जबकि प्रति का संतुलन बना रहना अत्यंत आवयक है। स्वार्थ के लिए पेडÃों की अंधाधुंध कटाई से ‘ग्लोबल वामिÈग' की समस्या बढÃती जा रही है।

 हाल ही के दिनों में यह देखने को मिला है कि भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान‚ पूसा ने पराली से होने वाले प्रदूषण से निपटने के लिए ‘बायो डिकम्पोजर' को विकसित किया है। इस तकनीक के अनुसार पराली को खाद में बदलने के लिए २० रुपये की कीमत वाली ४ कैप्सूल का एक पैकेट तैयार किया है। पूसा के वैज्ञानिकों के अनुसार ४ कैप्सूल से छिडÃकाव के लिए २५ लीटर घोल बनाया जा सकता है और इसका इस्तेमाल १ हेक्टेयर में किया जा सकता है। सबसे पहले ५ लीटर पानी मे १०० ग्राम गुडÃ उबालना है और ठंडा होने के बाद घोल में ५० ग्राम बेसन मिलाकर कैप्सूल घोलना है। इसके बाद घोल को १० दिन तक एक अंधेरे कमरे में रखना होगा‚ जिसके बाद पराली पर छिडÃकाव के लिए पदार्थ तैयार हो जाता है। इस घोल को जब पराली पर छिडÃका जाता है तो १५ से २० दिन के अंदर पराली गलनी शुरू हो जाती है और किसान अगली फसल की बुवाई आसानी से कर सकता है। आगे चलकर यह पराली पूरी तरह गलकर खाद में बदल जाती है और खेती में फायदा देती है। दिल्ली सरकार ने इस तकनीक के आकलन के लिए एक समिति का गठन भी किया है और इसकी रिपोर्ट दीपावली के बाद आने की सम्भावना है। अगर यह तकनीक कामयाब हो जाती है तो देशभर के किसानों को इसे अपनाना चाहिए‚ जिससे हर साल इन दिनों होने वाले प्रदूषण से मुक्ति मिल सकती है। 

 जिस तरह देश के कई बडÃे शहरों में पटाखों पर रोक लगा दी गई है‚ उसी तरह पराली को जलने से भी रोकने पर जोर देने की जरूरत है। एक जिले के अधिकारी के अधीन औसतन ५०० से अधिक गांव रहते हैं‚ जिनमें विभिन्न जातियों के समूह अपने–अपने खेमों में बंटे हैं। समय की मांग है कि जिला स्तर के अधिकारी सभी किसानों को जागरूक करें और ऐसी तकनीक का प्रयोग करने के लिए प्रेरित करें। सोचने वाली बात है कि अगर हम बैलगाडÃी के दिनों से मोटर गाडÃी की ओर बढÃेंगे तो इससे होने वाले प्रदूषण और पर्यावरण के नुकसान से निपटने के लिए भी कुछ आधुनिक तरीके ही खोजने होंगे। पर्यावरण के विषय में देश भर में चर्चा और उत्सुकता तो बडÃी है। पर उसका असर हमारे आचरण में दिखाई नहीं देता। शायद अभी हम इसकी भयावहता को नहीं समझे। शायद हमें लगता है कि पर्यावरण के प्रति हमारे दुराचरण से इतने बडÃे देश में क्या असर पडÃेगाॽ इसलिए हम कुंए‚ कुण्डों और नदियों को जहरीला बनाते हैं। वायु में जहरीला धुंआ छोडÃते हैं। वृक्षों को बेदर्दी से काट डालते हैं। अपने मकान‚ भवन‚ सडÃकें और प्रतिष्ठान बनाने के लिए पर्वतों को डायनामाइट से तोडÃ डालते हैं और अपराधबोध तक पैदा नहीं होता।

 जब प्रति अपना रौद्ररूप दिखाती है‚ तब हम कुछ समय के लिए विचलित हो जाते हैं। संकट टल जाने के बाद हम फिर वही विनाश शुरू कर देते हैं। हमारे पर्यावरण की रक्षा करने कोई पडÃोसी देश कभी नहीं आएगा। यह पहल तो हमें ही करनी होगी। हम जहां भी‚ जिस रूप में भी कर सकें‚ हमें प्रति के पंचतत्वों का शोधन करना चाहिए। पर्यावरण को फिर आस्था से जोडÃना चाहिए। तब कहीं यह विनाश रुûक पाएगा। पेयजल हमारे जीवन का एक अहम हिस्सा है। आजादी के बाद से आज तक हम पेयजल और सेनिटेशन के मद पर एक लाख करोडÃ रुûपया खर्च कर चुके हैं। बावजूद इसके हम पेयजल की आपूर्ति नहीं कर पा रहे। 

 खेतों में अंधाधुंध रसायनिक उर्वरकों का प्रयोग भूजल में फ्लोराइड और आसæनिक की मात्रा खतरनाक स्तर तक बढÃा चुका है‚ जिसका मानवीय स्वास्थ्य पर बुरा असर पडÃ रहा है। सबको सब कुछ मालूम है। पर कोई कुछ ठोस नहीं करता। जिस देश में नदियों‚ पर्वतों‚ वृक्षों‚ पशु–पक्षियों‚ पृथ्वी‚ वायु‚ जल‚ आकाश‚ सूर्य व चंद्रमा की हजारों साल से पूजा होती आई हो‚ वहां पर्यावरण का इतना विनाश समझ में न आने वाली बात है। पर्यावरण बचाने के लिए एक देशव्यापी क्रांति की आवयकता है। वरना हम अंधे होकर आत्मघाती सुरंग में फिसलते जा रहे हैं। जब जागेंगे‚ तब तक बहुत देर हो चुकी होगी और जापान के सुनामी की तरह हम भी कभी प्रति के रौद्र रूप का शिकार हो सकते हैं।

सौजन्य - राष्ट्रीय सहारा।

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Thursday, November 12, 2020

Editorial : बहुत कुछ कहता है जनादेश

बिहार में विधानसभा चुनावों के नतीजे आ गए हैं। कोरोना महामारी के भयपूर्ण वातावरण में चुनाव हुआ था जिसमें भाजपा–जेडीयू के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन(एनडीए) और राष्ट्रीय जनता दल के नेतृत्व वाले महागठबंधन के बीच सीधी लड़ाई थी। यूं और भी कई मोर्चे और दल जोरआजमाइश में लगे थे। कांटे की लड़ाई में भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए को मामूली बहुमत मिल गया है। २४३ सीटों वाली विधानसभा में उसे १२५ सीटें मिली हैं। महागठबंधन ११० पर है। राजद की ओर से नतीजों को प्रभावित करने अर्थात फरेब की शिकायत चुनाव आयोग से की गई है लेकिन राजनीति से जुड़े लोग भली–भांति जानते हैं कि ऐसे मामलों में क्या और कितना कुछ होता है। जो पराजित कर दिए जाते हैं‚ वे न्यायालय जाते हैं और उनके मामले में फैसला तब आता है‚ जब सदन का कार्यकाल समाप्त हो जाता है। जनतंत्र के इस खिलवाड़ से घाघ राजनेता परिचित होता है। जाने–अनजाने मैकियावेली की उस थीसिस से भी परिचित होता है‚ जिसमें उसने येन केन प्रकारेण सत्ता हासिल करने की नसीहत दी है। पारंपरिक दुनिया में तो हार बस हार होती है और जीत बस जीत।

 लेकिन हमें नहीं भूलना चाहिए कि मैकियावेली सोलहवीं सदी में था। वह समय का सामंतवादी दौर था। तब तक राजनीति में लोकतंत्र चिह्नित नहीं हुआ था। ‘जो जीता वही सिकंदर' का जमाना था लेकिन अब उस दुनिया की विदाई हो चुकी है। लोकतांत्रिक आधुनिक दुनिया में मैकियावेली का मुहावरा नहीं चलता‚ नहीं चलना चाहिए। आधुनिक संसदीय राजनीति में लोकलाज का महkव होता है। यह महत्व जब छीजने लगता हैं तब राजनीति प्रदूषित और फलस्वरूप बदनाम होने लगती है। यही कारण है कि एनडीए के बिहारी मुखिया नीतीश कुमार बहुमत का आंकड़ा हासिल करके भी कोई गौरव अनुभव नहीं कर रहे। कभी–कभार हार भी गरिमापूर्ण होती है और जीत भी गरिमाहीन। चुनाव में नीतीश चुनाव जीत कर भी निस्तेज दिख रहे हैं और तेजस्वी चुनाव हार कर भी नायक बन गए हैं। बिहार चुनावों के मीडिया और दूसरे सर्वे पूर्वानुमान महागठबंधन की बढ़त दिखा रहे थे। इस आकलन का कारण संभवतः तेजस्वी की सभाओं में उमड़ता जनसैलाब था। तेजस्वी ने जम कर मिहनत की थी। एक दिन उन्नीस–उन्नीस सभाएं कर क्रिकेट की तरह का रिकॉर्ड बनाया था। उन्होंने बिहार की जड़ राजनीति को कई स्तरों पर बदलने की कोशिश की। तीस वर्षों से बिहार की राजनीति में जात–पात का मुद्दा केंद्रीय तत्व बना हुआ था। बिना किसी मार्क्सवादी शब्दावली के तेजस्वी ने इसे इहलौकिक आधार दे दिया। चुनाव में दस लाख नौकरियों का वायदा कर चुनाव का व्याकरण इस तरह बदला कि भाजपा को भी झक मार कर उसे अपनाना पड़ा। कभी नीतीश की साइकिल योजना का मजाक लालू प्रसाद ने बच्चों को मोटरसाइकिल देने के वायदे से उड़ाया था। दस लाख नौकरियां देने के वायदे को भाजपा ने उन्नीस लाख नौकरियां देने के वायदे से दबाने की कोशिश की लेकिन तेजस्वी का जादू नौजवानों पर चल चुका था। इन सबसे रोजगार के सवाल चुनाव के केंद्र में आए। स्वाभाविक रूप से युवा भी राजनीति के केंद्र क्योंकि नौकरियों की दरकार इसी तबके को थी। 

 तेजस्वी ने बार–बार स्वास्थ्य‚ शिक्षा और रोजगार के सवाल को आगे किया। राजद की अपनी पारंपरिक मंडलवादी सोच को किनारे किया और सामाजिक न्याय को आÌथक न्याय से जोड़ कर उसे प्रगल्भ भी किया और गति भी दी। वह दो स्तरों पर लड़ रहे थे। बाहर में संघ परिवार से और अपने भीतर अपने ही परिवार से। राजद के पोस्टर उनके परिवार के चेहरों से भरे होते थे। इस चुनाव में केवल तेजस्वी का चेहरा दिखा। अपने परिवार को उन्होंने वाजिब जगह पर रख दिया। इसके लिए उन पर प्रश्न भी उछाले गए। उन्होंने इन्हें नजरअंदाज किया। अपनी विनम्रता और वाणी का संयम बनाए रखा। कभी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी या मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के प्रति ऐसे शब्दों का प्रयोग नहीं किया जो असंसदीय हों।

 तेजस्वी ने कुछ और भी प्रयोग किए। जातिवादी राजनीतिक संगठनों को दरकिनार कर कम्युनिस्टों के साथ गठबंधन किया और इस नाते अपनी राजनीति को गरीब–गुरबों और मिहनतकश अवाम के निकट ले गए। लेकिन‚ जैसा कि अब अधिक सही लगता हैं कि कांग्रेस को इतना अधिक महkव देना महागठबंधन को भारी पड़ गया। इसकी तरफ मैंने २४ अक्टूबर के एक लेख में (राष्ट्रीय सहारा) इशारा किया था। इस दफा महागठबंधन की लुटिया डूबी है‚ तो इसके लिए केवल और केवल कांग्रेस जिम्मेदार है। मैंने २४ अक्टूबर के लेख में बतलाया था कि कांग्रेस के भीतर नीतीश के एजेंट विराजमान हैं। नतीजे सामने हैं‚ यह बात सही प्रतीत होती है। महागठबंधन को जैसा नुकसान कांग्रेस ने पहुंचाया‚ लगभग वैसा ही नुकसान एनडीए खासकर नीतीश की पार्टी जेडीयू को चिराग पासवान के नेतृत्व वाली लोक जनशक्ति पार्टी ने पहुंचाया। लोक जनशक्ति पार्टी ने भाजपा के खिलाफ उम्मीदवार‚ कुछ अपवादों को छोड़ कर‚ नहीं दिए थे लेकिन एनडीए के दूसरे घटक जेडीयू के हर उम्मीदवार के खिलाफ उम्मीदवार उतारे। नतीजा यह कि भाजपा से पांच अधिक सीटों पर चुनाव लड़ने के बावजूद जेडीयू अपने ही मित्र दल भाजपा से बहुत पीछे रह गई। एनडीए में भाजपा ११० सीटों पर लड़ कर ७४ आई है और जेडीयू ११५ सीटें लड़ कर ४३ ही हासिल कर सकी है। हिंदुस्तानी अवाम पार्टी और विकासशील इंसान पार्टी की चार–चार सीटें हैं। महागठबंधन में १४४ सीटें लड़ कर राजद ने ७५ हासिल कीं जबकि ७० सीटें लड़ कर कांग्रेस महज १९ ला सकी। कम्युनिस्टों ने २९ सीटें लड़ कर १६ हासिल कीं। कोई भी समझ सकता है कि महागठबंधन को पीछे करने में किसकी भूमिका है।

 महागठबंधन और एनडीए के वोट शेयरिंग में बस ०.२ फीसद का अंतर है। एनडीए को ३४ .९ और महागठबंधन को ३४ .७३ फीसद वोट मिले हैं। सबसे अधिक वोट राजद (९७३६२४२) को मिले हैं‚ जो गिनती के कुल वोटों का २३.१ फीसद हैं। भाजपा को ८२०१४०८ वोट मिले जो मतदान का १९.५ फीसद हैं। चुनाव में मुख्यमंत्री जो भी हो‚ नायक के रूप में तेजस्वी उभर कर आए हैं। सब से अधिक चर्चा चिराग पासवान की हुई। यह अलग बात है कि उनकी पार्टी को विधानसभा में बस एक सीट मिल सकी। तेजस्वी की पार्टी राजद सबसे बड़ी पार्टी‚ सब से अधिक वोट लेने वाली पार्टी और नतीजों के बाद सब से अधिक चर्चा में रहने वाली पार्टी बन कर उभरी है। चुनाव तेजस्वी बनाम अन्य हो गया था।नतीजों ने भी इसी बात को रेखांकित किया है। वह बिहार की राजनीति के नये नायक बन गए हैं। 

सौजन्य - राष्ट्रीय सहारा।

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Monday, November 9, 2020

Editorial : हमें और बेहतर बनना होगा

अमेरिका में चुनाव का जो भी नतीजा हो मतगणना के दौरान डोनाल्ड ट्रंप ने जो–जो नाटक किए उससे उनका पूरी दुनिया में मजाक उडड़ा है। अपनी हार की आशंका से बौखलाए ट्रंप ने कई बार संवाददाता सम्मेलन करके विपक्ष पर चुनाव हड़पने के तमाम झूठे आरोप लगाए और उनके समर्थन में एक भी प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया। उनके इस गैर जिम्मेदाराना आचरण से दुनिया के सबसे पुराने लोकतंत्र के राष्ट्रपति के पद की गरिमा को भारी ठेस लगी है। ॥ पर हमारा आज का विषय ट्रंप नहीं बल्कि अमेरिकी टीवी चैनल हैं‚ जिन्होंने गत शुक्रवार को ट्रंप के संवाददाता सम्मेलन का सीधा प्रसारण बीच में ही रोक दिया। यह कहते हुए कि राष्ट्रपति ट्रंप सरासर झूठ बोल रहे हैं और बिना सबूत के दर्जनों झूठे आरोप लगा रहे हैं। इन टीवी चैनलों के एंकरों ने यह भी कहा ट्रंप के इस गैर जिम्मेदाराना आचरण से अमेरिकी समाज में अफरातफरी फैल सकती है और संघर्ष पैदा हो सकता है‚ इसलिए जनहित में हम राष्ट्रपति ट्रंप के भाषण का सीधा प्रसारण बीच में ही रोक रहे हैं। अमेरिका के समाचार टीवी चैनलों की इस बहादुरी और जिम्मेदाराना पत्रकारिता की सारी दुनिया में तारीफ हो रही है। दरअसल‚ अपनी इसी भूमिका के लिए ही मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है। ये भारत के समाचार टीवी चैनलों के लिए बहुत बड़ा तमाचा है। 


 दूरदर्शन तो अपने जन्म से ही सरकार का भोंपू रहा है। प्रसार भारती बनने के बाद उस स्थिति में थोडड़ा बदलाव जड़रूर आया है। पर कमोबेश वो आज भी सरकार का भोंपू बना हुआ है। भारत में स्वतंत्र टीवी पत्रकारिता इंडिया टुडे समूह ने अंग्रेजी वीडियो न्यूज पत्रिका ‘न्यूजट्रैक' से और मैंने ‘कालचक्र' हिंदी वीडियो समाचार पत्रिका से ३० वर्ष पहले शुरू की थी। तब अंग्रेजी दैनिक पॉयनियर में मेरा और न्यूजट्रैक की संपादक मधु त्रेहान का एक इंटरव्यू छपा था‚ जिसमें मधु ने कहा था‚ ‘हम मीडिया के व्यापार में हैं और व्यापार लाभ के लिए किया जाता है।' और मैंने कहा था‚ ‘हम जनता के प्रवक्ता हैं इसलिए जो भी सरकार में होगा उसकी गलत नीतियों की आलोचना करना और जनता के दुख–दर्द को सरकार तक पहुंचाना हमारा कर्तव्य है और हम हमेशा यही करेंगे।' जब से निजी टीवी चैनलों की भरमार हुई है तबसे लोगों को लगा कि अब टीवी समाचार सरकार के शिकंजे से मुक्त हो गए। पर ऐसा हुआ नहीं। व्यापारिक हितों को ध्यान में रखते हुए ज्यादातर समाचार चैनल राजनैतिक खेमों में बंट गए हैं। ऐसा करना उनकी मजबूरी भी था। क्योंकि जितना आडम्बरयुक्त और खर्चीला साम्राज्य इन टीवी चैनलों ने खडड़ा कर लिया है‚ उसे चलाने के लिए मोटी रकम चाहिए। जो राजनैतिक दलों या औद्योगिक घरानों के सहयोग के बिना मिलनी असम्भव है। फिर भी कुछ वर्ष पहले तक कुल मिलाकर सभी टीवी चैनल एक संतुलन बनाए रखने का कम से कम दिखावा तो कर ही रहे थे। पर पिछले कुछ वषाç में भारत के ज्यादातर समाचार चैनलों का इतनी तेजी से पतन हुआ कि रातों–रात टीवी पत्रकारों की जगह चारण और भाटों ने ले ली। 


 जो रात दिन चीख–चीख कर एक पक्ष के समर्थन में दूसरे पक्ष पर हमला करते हैं। इनकी एंकरिंग या रिपोÍटग में तथ्यों का भारी अभाव होता है या वे इकतरफा होते हैं। इनकी भाषा और तेवर गली मोहल्ले के मवालियों जैसी हो गई है। इनके ‘टॉक शो' चौराहों पर होने वाले छिछले झगडड़ों जैसे होते हैं। और तो और कभी चांद पर उतरने का एस्ट्रोनॉट परिधान पहनकर और कभी राफेल के पायलट बन कर जो नौटंकी ये एंकर करते हैं‚ उससे ये पत्रकार कम जोकर ज्यादा नजर आते हैं। इतना ही नहीं दुनिया भर के टीवी चैनलों के पुरुष और महिला एंकरों और संवाददाताओं के पहनावे‚ भाषा और तेवर की तुलना अगर भारत के ज्यादातर टीवी चैनलों के एंकरों और संवाददाताओं से की जाए तो स्थिति स्वयं ही स्पष्ट हो जाएगी। ॥ भारत के ज्यादातर समाचार टीवी चैनल पत्रकारिता के अलावा सब कुछ कर रहे हैं। यह शर्मनाक ही नहीं दुखद स्थिति है। गत शुक्रवार को अमेरिका के राष्ट्रपति के झूठे बयानों का प्रसारण बीच में रोकने की जो दिलेरी अमेरिका के टीवी एंकरों ने दिखाई वैसी हिम्मत भारत के कितने समाचार टीवी एंकरों की हैॽ उधर अर्नब गोस्वामी की गिरफ्तारी को लेकर भी जो विवाद हुआ है उसे भी इसी परिप्रेIय में देखने की जरूरत है। अगर आप यूट्यूब पर मेरे नाम से खोजें तो आपको तमाम टीवी शो ऐसे मिलेंगे‚ जिनमें एंकर के नाते अर्नब ने हमेशा मुझे पूरा सम्मान दिया है और मेरे संघषाç का गर्व से उल्लेख भी किया है। जाहिर है कि मैं अर्नब के विरोधियों में से नहीं हूं। टीवी समाचारों के ३१ बरस के अपने अनुभव और उम्र के हिसाब से मैं उस स्थिति में हूं कि एक शुभचिंतक के नाते अर्नब की कमियों को उसके हित में खुल कर कह सकूं। ॥ पिछले कुछ वषाç में अर्नब ने पत्रकारिता की सीमाओं को लांघ कर जो कुछ किया है उससे स्वतंत्र टीवी पत्रकारिता कलंकित हुई है। अर्नब के अंधभक्तों को मेरी यह टिप्पणी अच्छी नहीं लगेगी। पर हकीकत यह है कि अर्नब भारतीय टीवी का एक जागरूक‚ समझदार और ऊर्जावान एंकर था‚ लेकिन अब उसने अपनी वह उपलब्धि अपने ही व्यवहार से नष्ट कर दी। ॥ कहते हैं जब जागो तब सवेरा। हो सकता है कि अर्नब को इस आपराधिक मामले में सजा हो जाए या वो बरी हो जाए। अगर वो बरी हो जाता है तो उसे एकांत में कुछ दिन पहले ध्यान करना चाहिए और फिर चिंतन और मनन कि वो पत्रकारिता की राह से कब और क्यों भटकाॽ यही चेतावनी बाकी समाचार चैनलों के एंकरों और संवाददाताओं के लिए भी है कि वे लोकतंत्र के इस चौथे स्तंभ का सदस्य होने की गरिमा और मर्यादा को समझें और टीवी पत्रकार की तरह व्यवहार करें‚ चारण और भाट की तरह नहीं।


सौजन्य - राष्ट्रीय सहारा।

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Wednesday, November 4, 2020

Editorials अच्छी नहीं अनबन की आंच

केंद्र का रूतबा राज्यों पर इस खातिर‚ इस तरीके से कायम किया गया कि जिस सूत्र में देश की ५६५ रियासतों को पहले गृह मंत्री वल्लभ भाई पटेल पिरो गए थे‚ वो धागा सरदारी तासीर से बंधा रहे। संविधान निर्माताओं ने ब्रिटेन से संसदीय व्यवस्था ली और अमेरिका से उनका फेडरल यानी संघीय ढांचा। राज्य सभा के गठन के पीछे सोच यही रहा कि राज्यों की बात और जरूरत दरकिनार न हों। आबादी के मुताबिक उच्च सदन में राज्यों की नुमाइन्दगी रही। 


 संघ‚ राज्य और समवर्ती सूची के जरिए आपसी मामलों का बंटवारा संविधान के अनुच्छेद २४६ के मार्फत किया गया ताकि दखल का लिहाज रहे और सूबों की आजाद खयाली भी देश हित के दायरे में रहे। केंद्रीय कानून और फैसले राज्य की मनमर्जी पर हमेशा भारी रहेंगे‚ ये पुख्ता तौर पर लिख दिया गया‚ लेकिन सूबे के अंदरूनी मामलों में केंद्र तभी अपने पैर अड़ा सकता है जब दुनिया से भारत सरकार के किए वादों को अमली जामा पहनाने में कोई आनाकानी कर रहा हो। फिर भी कुछ ऐसे राज्य हैं‚ जो हमेशा केंद्र से तने हुए रहते हैं। केंद्र और राज्य में अलग–अलग पाÌटयों की सरकार होने से केंद्र के हर फरमान को राज्य अक्सर जनता के फायदे नुकसान से ज्यादा राजनीतिक रु. आब से तोलते हैं और नाफरमानी भी करते हैं। कोविड की मार के शुरूआती दौर में भी ऐसे राज्यों को काबू करना मुश्किल था जिन्हें हर फैसले में साजिश की बू आती है। इस दौरान पश्चिम बंगाल सबसे बेलगाम सूबा साबित हुआ। संविधान के अनुच्छेद २४५ में संसद को ये हF है कि वो देश के किसी भी हिस्से के लिए कानून बना सके‚ उसे लागू कर सके। 


 स्वास्थ्य का मामला भले ही राज्य के दायरे का हो लेकिन १८९७ के महामारी कानून के तहत कोविड को कुदरती महामारी की तरह देखा गया। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन कानून‚ २००५ के तहत केंद्र ने आपात हालात संभालने के लिए राज्यों के लिए स्वास्थ्य निर्देश जारी किए। इस दौरान प्रशासनिक और वित्तीय कमान दोनों अपने हाथ में लेकर दबाव भी बनाया ताकि राज्य केंद्रीय एजेंसियों के बताए रास्ते पर चलकर हालात से निपटें। कमोबेश सभी राज्यों ने हर आदेश–निर्देश माना क्योंकि एक की भी आनाकानी पूरे देश में बिगाड़ की वजह बन सकती थी। कोर्ट में कुछ मामलों को चुनौती मिली तो वहां से भी फैसला यही आया कि हर व्यक्ति को मेडिकल मदद मुहैया कराना और जन–स्वास्थ्य की फिक्र साझी हो। कुछ राज्यों ने केंद्र की ताकीद के बावजूद बाजार–कारोबार खोलने का फैसला लिया तो इस मनमानी पर केंद्र ने सख्ती दिखाई ताकि हालात बेकाबू न हों। बावजूद इसके केरल‚ पश्चिम बंगाल‚ महाराष्ट्र और राजस्थान जैसे राज्य ‘तू डाल–डाल मैं पात–पात' की तर्ज पर चलते रहे। इस दौर में राज्यों का आपसी तनाव भी जगजाहिर हुआ जब एक राज्य की सीमा में दूसरे इलाके के नागरिकों के दाखिले और सहूलियतों पर भी ऐतराज हुआ। उसी तरह कई राज्य अपने हिसाब से सीबीआई की राज्य में जांच के अधिकार पर भी केंद्र से गुत्थमगुत्था होते रहे हैं। उन्हें लगता है ये राजनीतिक हथियार हैं‚ जिसे केंद्र राज्यों पर अपना दबाव बनाने और अपनी कतार में खड़ा होने के लिए मजबूर करता है। 


 पिछले दो–तीन सालों में आंध्र प्रदेश‚ पश्चिम बंगाल‚ छत्तीसगढ़‚ राजस्थान और अब महाराष्ट्र ने राज्य की इजाजत के बगैर सीबीआई जांच से इनकार किया है। कानूनी नजरिए से सीबीआई संसदीय व्यवस्था से उपजी एजेंसी है भी नहीं। इसे दिल्ली सरकार के स्पेशल पुलिस एक्ट के तहत बनाया गया‚ जबकि नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी यानी एनआईए संसदीय कानून से वजूद पाने वाली संस्था है। फिर भी छत्तीसगढ़ ने तो धारा १३१ का हवाला देकर एनआईए तक को भी चुनौती दे दी। नागरिक संशोधन कानून यानी सीएए के मामले में केंद्र और राज्य के बीच चली खींचतान में केरल ने भी धारा १३१ के बूते कोर्ट में दस्तक दी थी। ये धारा केंद्र–राज्य के बीच ऐसे मामलों में विवाद के निपटारे के लिए है। इन मामलों ने जो भी रंग लिया‚ लेकिन ये फिर से जाहिर हुआ कि केंद्र और राज्यों के मामलों में अहम के टकराव से बचने के लिए कोई ऐसी कारगर व्यवस्था जरूर होनी चाहिए‚ जहां लोकहित की सुनवाई हो। साथ ही देश के संघीय ढांचे से छेड़छाड़ किसी भी तरफ से न हो। जब केंद्र और राज्य एक दूसरे का हाथ थामे बगैर अपनी–अपनी धुन में चलते हैं तो कई फैसले लागू होने में अनिगनत साल ले लेते हैं। एक देश‚ एक कर यानी जीएसटी लागू होने में करीब दो दशक का समय बीत गया और आखिरकार सारे खतरे मोल लेते हुए‚ तमाम अड़चनों को झेलते हुए लागू तभी हो पाया जब जीएसटी काउंसिल ने एक–एक सवाल का हल बातचीत से निकालना मंजूर किया। संशोधन होेते चले गए और मामला धीरे–धीरे संभलता गया। राज्यों में सरकारें किसी की भी हो मगर एक रवायत ये भी रही कि प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों की नियुक्तियों में भी केंद्र–राज्य आमने–सामने होते रहे हैं। सत्ताओं की पसंद के अफसरों को कायदे ताक में रखकर मन–मुताबिक कुÌसयां हासिल होती रही हैं। 


 सेवा का विस्तार देकर मुख्य सचिव के पद पर सेवा में बनाए रखने की राजस्थान सरकार की कवायद को इस बार केंद्र ने नामंजूर कर दिया। इसे भी संघीय आजमाइश और दखलंदाजी की ही तरह देखा जा सकता है। फिर भी प्रशासनिक सुधार के नजरिए से ये फैसले अहम हैं। केंद्र और राज्य के बीच पिछले सालों में ऐसे कई मामले पेश हुए जिन पर रजामंदी नहीं होने पर राज्यों ने झुकना मंजूर नहीं किया। हालिया कृषि अध्यादेश हों या केंद्रीय शिक्षा नीति में भाषा को लेकर उठा बवाल या पिछले साल लागूू हुआ मोटर व्हीकल कानून; कुछ राज्यों ने आवाज उठाई तो कुछ ने इन्हें सिरे से खारिज कर दिया। 


 खेती–किसानी और व्यापार कारोबार यंू तो राज्य के हक का मामला है लेकिन यहां केंद्र ने खाने–पीने की वस्तुओं के व्यापार से इसे जोड़कर देखा जिसमें केंद्र और राज्य दोनों की बराबर दखल है। अक्सर नीतियों के जमीन तक पहुंचने में देरी में आपसी तनातनी ही वजह होती है। जरूरी है कि राज्यों के साथ सलाह–मशविरा होता रहे। उन पर फैसले थोपने की नौबत ना आए। केंद्र असल में देश की सत्ता का केन्द्र नहीं‚ सबको बांधे रखने का संघ ही है जहां से हर राज्य को अपनी खूबियों के साथ बढ़ने का रास्ता मिलता है। लोकतंत्र की थिरकन के लिए जरूरी है कि जुदा सुरों पर एतराज न रहे। एहतियात ये भी बरता जाए कि शोर सड़क और बहस स्टूडियो की बजाय संसद में और फैसले लोकहित में हों।

सौजन्य - राष्ट्रीय सहारा। 

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