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-Rajeev Kumar (Editor-in-chief)

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Monday, April 19, 2021

आपका धर्म नहीं पूछता (राष्ट्रीय सहारा)

पिछले वर्ष कोरोना ने जब अचानक दस्तक दी तो पूरी दुनिया थम गई थी। सदियों में किसी को कभी ऐसा भयावह अनुभव नहीं हुआ था। तमाम तरह की अटकलें और अफवाहों का बाजार गर्म हो गया। एक दूसरे देशों पर कोरोना फैलाने का आरोप लगने लगे। चीन को सबने निशाना बनाया। पर कुछ तो राज की बात है कोरोना कि दूसरी लहर में। जब भारत की स्वास्थ्य और प्रशासनिक व्यवस्था लगभग अस्त–व्यस्त हो गई है तो चीन में इस दूसरी लहर का कोई असर क्यों नहीं दिखाई दे रहाॽ क्या चीन ने इस महामारी के रोकथाम के लिए अपनी पूरी जनता को टीके लगवा कर सुरक्षित कर लिया हैॽ 


 कोविड की पिछली लहर आने के बाद से ही दुनिया भर के वैज्ञानिकों ने इसके मूल कारण और उसका तोड़ निकालने की मुहिम छेड़ दी थी। पर भारत में जिस तरह कुछ टीवी चौनलों और राजनैतिक दलों ने कोविड फैलाने के लिए तब्लीगी जमात को जिम्मेदार ठहराया और उसके सदस्यों को शक की नजर से देखा जाने लगा वो बड़ा अटपटा था। प्रशासन भी उनके पीछे पड़ गया। जमात के प्रांतीय अध्यक्ष के खिलाफ गैर जिम्मेदाराना भीड़ जमा करने के आरोप में कई कानूनी नोटिस भी जारी किए गए। दिल्ली के निजामुद्दीन क्षेत्र को छावनी में तब्दील कर दिया गया। यही मान लिया गया कि चीन से निकला यह वायरस सीधे तब्लीगी जमात के कार्यक्रम का हिस्सा बनने के लिए ही आया था। ये बेहद गैर–जिम्मेदाराना रवैया था। माना कि मुसलमानों को लIय करके भाजपा लगातार हिंदुओं को अपने पक्ष में संगठित करने में जुटी है। पर इसका मतलब यह तो नहीं कि जानता के बीच गैरवैज्ञानिक अंधविश्वास फैलाया जाए। 


जो भी हो शासन का काम प्रजा की सुरक्षा करना और समाज में सामंजस्य स्थापित करना होता है। इस तरह के गैर जिम्मेदाराना रवैये से समाज में अशांति और अराजकता तो फैली ही‚ जो ऊर्जा और ध्यान कोरोना के उपचार और प्रबंधन में लगना चाहिए थी वो ऊर्जा इस बेसिरपैर के अभियान में बर्बाद हो गई। हालत जब बेकाबू होने लगे तो सरकार ने कड़े कदम उठाए और लॉकडाउन लगा डाला। उस समय लॉकडाउन का उस तरह लगाना भी किसी के गले नहीं उतरा। सबने महसूस किया कि लॉकडाउन लगाना ही था तो सोच–समझकर व्यावहारिक दृष्टिकोण से लगाना चाहिए था। क्योंकि उस समय देश की स्वास्थ्य सेवाएं इस महामारी का सामना करने के लिए तैयार नहीं थी इसलिए देश भर में काफी अफरा–तफरी फैली‚ जिसका सबसे ज्यादा खामियाजा करोड़ों गरीब मजदूरों को झेलना पड़ा। बेचारे अबोध बच्चों के लेकर सैकड़ों किलोमीटर पैदल चल कर अपने गांव पहुंचे। लॉकडाउन में सारा ध्यान स्वास्थ्य सेवाओं पर ही केंद्रित रहा‚ जिसकी वजह से धीरे धीरे स्थित नियंत्रण में आती गई। उधर वैज्ञानिकों के गहन शोध के बाद कोरोना की वैक्सीन तैयार कर ली और टीका अभियान भी चालू हो गया‚ जिससे एक बार फिर समाज में एक उम्मीद की किरण जागी। इसलिए सभी देशवासी वही कर रहे थे जो सरकार और प्रधानमंत्री उनसे कह रहे थे। फिर चाहे कोरोना भागने के लिए ताली पीटना हो या थाली बजाना। पूरे देश ने उत्साह से किया। ॥ ये बात दूसरी है कि इसके बावजूद जब करोड़ों का प्रकोप नहीं थमा तो देश में इसका मजाक भी खूब उड़ा। क्योंकि लोगों का कहना था कि इसका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं था‚ लेकिन हाल के कुछ महीनों में जब देश की अर्थव्यवस्था सही रास्ते पर चलने लगी थी तो कोरोना की दूसरी लहर ने फिर से उम्मीद तोड़ दी है। आज हर तरफ से ऐसी सूचनाएं आ रही हैं कि हर दूसरे घर में एक न एक संक्रमित व्यक्ति है। अब ऐसा क्यों हुआॽ इस बार क्या फिर से उस धर्म विशेष के लोगों ने क्या एक और बड़ा जलसा कियाॽ या सभी धर्मों के लोगों ने अपने–अपने धार्मिक कार्यक्रमों में भारी भीड़ जुटा ली और सरकार या मीडिया ने उसे रोका नहींॽ तो क्या फिर अब इन दूसरे धर्मावलम्बियों को कोरोना भी दूसरी लहर के लिए जिम्मेदार ठहराया जाएॽ ये फिर वाहियात बात होगी। कोरोना का किसी धर्म से न पहले कुछ लेनादेना था न आज है। सारा मामला सावधानी बरतने‚ अपने अंदर प्रतिरोधी क्षमता विकसित करने और स्वास्थ्य सेवाओं के कुाल प्रबंधन का है‚ जिसमें कोताही से ये भयावह स्थित पैदा हुई है। इस बार स्थित वाकई बहुत गम्भीर है। लगभग सारे देश से स्वास्थ्य सेवाओं के चरमराने की खबरें आ रही है। 


 संक्रमित लोगों की संख्या दिन दूनी और रात चौगुनी बढ़ रही है और अस्पतालों में इलाज के लिए जगह नहीं है। आवश्यक दवाओं का स्टॉक काफी स्थानों पर खत्म हो चुका है। नई आपूर्ति में समय लगेगा। श्मशान घाटों तक पर लाइनें लग गई हैं। स्थिति बाद से बदतर होती जा रही है। मेडिकल और पैरा मेडिकल स्टाफ के हाथ पैर फूल रहे हैं। इस अफरा–तफरी के लिए लोग चुनाव आयोग‚ केंद्र व राज्य सरकारों‚ राजनेताओं और धर्म गुरुओं को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं‚ जिन्होंने चुनाव लड़ने या बड़े धार्मिक आयोजन करने के चक्कर में सारी मर्यादाओं को तोड़ दिया। आम जनता में इस बात का भी भारी आक्रोश है कि देश में हुक्मरानों और मतदाताओं के लिए कानून के मापदंड अलग–अलग हैं। जिसके मतों से सरकार बनती है उसे तो मास्क न लगाने पर पीटा जा रहा है या आर्थिक रूप से दंडित किया जा रहा है‚ जबकि हुक्मरान अपने स्वार्थ में सारे नियमों को तोड़ रहे हैं। 


 सोशल मीडिया पर नावæ का एक उदाहरण काफी वायरल हो रहा है। वहां सरकार ने आदेश जारी किया था कि १० से ज्यादा लोग कहीं एकत्र न हों पर वहां की प्रधानमंत्री ने अपने जन्मदिन की दावत में १३ लोगों को आमंत्रित कर लिया। इस पर वहां की पुलिस ने प्रधानमंत्री पर १.७५ लाख रुपये का जुर्माना ठोक दिया‚ यह कहते हुए अगर यह गलती किसी आम आदमी ने की होती तो पुलिस इतना भारी दंड नहीं लगाती‚ लेकिन प्रधानमंत्री ने नियम तोड़ा‚ जिनका अनुसरण देश करता है‚ इसलिए भारी जुर्माना लगाया। प्रधानमंत्री ने अपनी गलती मानी और जुर्माना भर दिया। हम भारत को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र बताते हुए नहीं थकते पर क्या ऐसा कभी भारत में हो सकता हैॽ हो सकता तो आज जनता इतनी बदहाली और आतंक में नहीं जी रही होती।


सौजन्य - राष्ट्रीय सहारा।

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Friday, April 16, 2021

क्या परीक्षाएं संभव हैंॽ (राष्ट्रीय सहारा)

कोरोना के बढ़ते प्रकोप में परीक्षा का सवाल एक बार फिर से उठ खड़ा हुआ है। अप्रैल माह में बोर्ड परीक्षाओं सहित अनेक प्रवेश परीक्षाओं का आयोजन होता है। इन आयोजनों को तात्कालिक रूप से टाला जा रहा है। वर्तमान में इसके अलावा हमारे पास कोई विकल्प नहीं है। इस विकल्प को स्वीकार करने के साथ ही शिक्षक‚ विद्यार्थी और शिक्षा तंत्र से जुड़े लोगों के बीच चर्चा हैं कि बच्चों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए भविष्य में परीक्षाएं हों या न हों। 


 जब हम परीक्षाओं के लिए ‘ना' कहते हैं‚ तो आने वाले वषाç में बिना ‘मार्कशीट' वाले विद्यार्थी किन समस्याओं से जूझेंगे‚ इस सवाल को संज्ञान में नहीं लेते। जब परीक्षा को अनिवार्य मानते हैं‚ तो तात्कालिक आपदा में बच्चों के जोखिम का आकलन नहीं करते। ‘हां' या ‘ना' के बीच हमें परीक्षा की प्रकृति के सापेक्ष उन विकल्पों पर विचार करना है‚ जो सीखने के लिए आकलन में हमारी मदद कर सकें। हमारी शिक्षा व्यवस्था में परीक्षा परिणाम तुलना एवं चयन के आधार बनते हैं। इनमें भी हमारा भरोसा केवल सत्रांत परीक्षा पर होता है। 


इनके आधार पर केवल अगले शिक्षा स्तर में प्रवेश ही नहीं दिया जाता‚ बल्कि ये परीक्षा परिणाम प्रत्येक विद्यार्थी के आने वाले १० से १५ वषाç में बार–बार उसके प्रदर्शन की कसौटी बनकर उपस्थित होते हैं। परीक्षा परिणामों के आधार पर लगभग ५ वषाç के दौरान उत्तीर्ण हुए हमउम्र साथियों के बीच की तुलना‚ विशेष रूप से नौकरी के लिए‚ की जाती है। इन सच्चाइयों के कारण ही सीखने की प्रक्रिया के स्थान पर ‘अंक पत्र' ही हमारे लिए सबसे मूल्यवान बन जाते हैं। यह विश्वास ही परीक्षा की उस प्रक्रिया और संरचना को जन्म देता है‚ जो समस्यामूलक है। आपदाकाल में देखें तो परीक्षा की यही प्रकृति मूल बाधा है। शिक्षा का एक लIय मूल्यों का पोषण करना भी है। 


इसके विपरीत हमारी परीक्षा व्यवस्था मूल्यविहीन अध्यापक‚ विद्यार्थी और अभिभावक की मान्यता पर टिकी है। जिस ढंग से सत्रांत परीक्षाओं का आयोजन होता है‚ उससे पता चलता है कि ये सभी भागीदार ईमानदारी के साथ मूल्यांकन कार्य में सहयोग नहीं करेंगे। नकल करना–करवाना‚ पक्षपात करना‚ अधिक अंक के लिए दबाव बनाने आदि के संशय को दूर करने के लिए हमारा परीक्षा तंत्र खड़ा हुआ है। वैसे तो इस तंत्र में प्रत्येक परीक्षार्थी स्वयं ही प्रश्न पत्र को हल करता है। यह कोई सहभागी कार्य नहीं होता। लेकिन ‘परीक्षार्थी' इतना संदिग्ध होता है कि एक केंद्र पर बड़ी संख्या में एकत्रित होकर वयस्कों सहित कैमरे की निगरानी में वे परीक्षा देते हैं। वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन के लिए शिक्षक मूल्यांकन केंद्रों पर एकत्रित होते हैं। 


 परीक्षा की यह संरचना कोरोनाकाल में सुरक्षा के मानकों एवं व्यवहारों से मेल नहीं खाती। आपदा काल में बच्चों की सुरक्षा के लिए अपरिहार्य है कि वे एक बड़े केंद्र पर सामूहिक रूप से एकत्रित न हों‚ केंद्र तक आने–जाने के लिए कोई यात्रा न करें आदि। परीक्षा की वर्तमान संरचना और तंत्र यह सुनिश्चित नहीं कर पा रहे। आपदा काल में परीक्षा तंत्र की सख्ती और कठोरता ने परीक्षा को तनाव का पर्याय बना दिया है। हर हितचिंतक इस दुविधा में रहा कि परीक्षा हो या न होॽ वर्तमान आपदाकाल में ‘परीक्षा' पर विचार करने की अनिवार्य शर्त है कि हम शिक्षक‚ विद्यार्थी और अभिभावक मूल्यविहीनता के प्रचलित ठप्पे के स्थान पर वायदा करें कि हम ईमानदारी के साथ परीक्षा के भागीदार बनें। आपदा काल में परीक्षा की समस्या का यह पहला समाधान होगा। पुनःश्च हम अपने शिक्षण शास्त्रीयज्ञान‚ प्रौद्योगिकी और नवाचार के माध्यम से परीक्षा की संरचनागत सीमाओं का विकल्प खोज सकते हैं। 


परीक्षा की विश्वसनीयता एवं वैधता को सुनिश्चित करने के लिए बाह्य कसौटियों जैसे–केंद्र पर उपस्थिति की अनिवार्यता‚ मूल्यांकन के लिए शिक्षकों की उपस्थिति आदि की बाधाओं को तोड़ने के लिए विद्यार्थी‚ शिक्षक और अभिभावक की भूमिका में परिवर्तन करना होगा। परीक्षा के संचालन को इतना विकेंद्रित करना होगा कि परीक्षार्थी अपने घर से ही परीक्षा दे सकें। उनके शिक्षक ‘सतत एवं व्यापक मूल्यांकन' के मॉडल द्वारा विद्याÌथयों के प्रदर्शन के वास्तविक आंकड़े उपलब्ध कराएं। इससे बाह्य परीक्षा की आवृत्ति और अवधि‚ दोनों को कम किया जा सकता है। सूचना प्रौद्योगिकी का उपयोग करते हुए ऑनलाइन परीक्षा का विकल्प भी अपनाया जा सकता है। इस विकल्प के साथ दो चुनौतियां हैं। पहली‚ संसाधनों की उपलब्धता और दूसरी‚ ‘डिजिटल डिवाइड' के प्रभाव से परीक्षा को मुक्त रखना। इसके लिए संसाधनों की उपलब्धता और उनके प्रयोग के प्रति सकारात्मक अभिवृत्ति का विकास करना होगा। लोकवस्तु के रूप में शिक्षा के लिए सूचना प्रौद्योगिकी के संसाधनों को जन–जन तक पहुंचाए बिना यह विकल्प मध्यमवर्गीय परिवार एवं नगरीय केंद्रों तक ही प्रभावी होगा। ‘आपदाकाल में अपरिहार्य खर्च' के रूप में सरकार को इसे वहन करना होगा। 


 इसके साथ–साथ हमें आकलन के तरीकों एवं उपकरणों में विविधता और उनकी समतुल्यता पर भी विचार करना होगा। ध्यान रखना होगा कि दूरदराज के कस्बाई विद्यालयों‚ जो कोरोना के प्रभाव से अपेक्षाकृत सुरक्षित हैं‚ में आकलन और मुंबई‚ दिल्ली और लखनऊ जैसे कोरोना से अति प्रभावित क्षेत्रों के विद्यालयों में आकलन एक समान नहीं हो सकता। इस विषमता के बीच शिक्षक ऐसे कर्ता के रूप में हैं‚ जो हमारी मदद कर सकते हैं। विद्याÌथयों और अभिभावकों के सहयोग से आकलन के स्थानीय और सांदÌभक तरीकों का प्रयोग कर सकते हैं। इसके आधार पर विद्याÌथयों के अंकों या ग्रेडों को निर्धारित कर सकते हैं। इस स्थिति में आकलन में विचलन बहुत अधिक होगा। इसके लिए सांख्यिकीय स्तर पर सापेक्षिक आकलन के लिए नये मापकों का प्रयोग एक उपाय हो सकता है। इस तरीके में आंतरिक मूल्यांकन का हिस्सा बढ़ाते हुए विद्याÌथयों के प्रदर्शन से जुड़े प्रमाणों को एकत्रित किया जा सकता है। ॥ हमें ध्यान रखना होगा कि परीक्षा‚ कोरोना आपदा के दौरान विद्याÌथयों ने जो सीखा है‚ उसका सकारात्मक फीडबैक देने की प्रणाली हो। यह ‘अंतिम फैसला' देने की परीक्षा न होकर उनकी उपलब्धियों और इसके आधार पर मार्गदर्शन की व्यवस्था बने। सत्रांत परीक्षा के ‘शुतुरमुर्ग समाधान' से बाहर ठोस और वैकल्पिक व्यवस्था का प्रयोग करना होगा। इस व्यवस्था में विद्यार्थी केंद्रिकता और सुरक्षित विकल्पों को प्राथमिकता देनी होगी। राज्य का यह प्रयत्न सार्थक हो‚ इसके लिए प्रत्येक विद्यार्थी‚ शिक्षक और अभिभावक की ओर से यह आश्वासन भी होना चाहिए कि वे सुरक्षित और शुचितापूर्ण परीक्षा नवाचारों के भागीदार बनने के लिए सहमत हैं। 

सौजन्य - राष्ट्रीय सहारा।

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Saturday, April 10, 2021

नाइंसाफी है देर से मिला इंसाफ (राष्ट्रीय सहारा)

इस बात सूरत में बीस साल पहले शिक्षा से जुड़ी एक कांफ्रेंस में जुटे १२३ लोग–जिनमें से पांच लोगों की इस दौरान मौत भी हो चुकी है–जिन्हें प्रतिबंधित सिमी संगठन से जुड़ा बताया गया था‚ उनकी इतने लम्बे वक्फे के बाद हुई बेदाग रिहाई के बारे में कही जा सकती है। समूह में शामिल लोग आल इंडिया माइनॉरिटी एजुकेशन बोर्ड के बैनर तले हुए कांफ्रेंस के लिए देश के दस अलग–अलग राज्यों से लोग एकत्रित थे‚ जिनमें कुछ राजस्थान से आए दो कुलपति‚ चार–पांच प्रोफेसर‚ डॉक्टर‚ इंजीनियर तथा एक रिटायर्ड न्यायाधीश तथा अन्य पेशों से सम्बद्ध पढ़े–लिखे लोग शामिल थे।


 इन लोगों को बेदाग रिहा करते हुए अदालत ने पुलिस पर तीखी टिप्पणी की है कि उसका यह कहना कि यह सभी लोग प्रतिबंधित संगठन ‘सिमी' से जुड़े थे‚ न भरोसा रखने लायक है और न ही संतोषजनक है‚ जिसके चलते सभी अभियुक्तों को संदेह का लाभ देकर बरी किया जाता है।' मालूम हो इन सभी को एक साल से अधिक समय तक ऐसे फर्जी आरोपों के लिए जेल में बंद रहना पड़ा था और अदालती कार्रवाई में शामिल होने के लिए आना पड़ता था। इन १२३ में से एक जियाउद्दीन अंसारी का सवाल गौरतलब है कि ‘अदालत ने हमें सम्मानजनक ढंग से रिहा किया है‚ लेकिन उन लोगों–अफसरों का क्या –जिन्होंने हमें नकली मुकदमों में फंसाया था‚ क्या उन्हें भी दंडित होना पड़ेगा।' 


 अदालत की पुलिस की तीखी टिप्पणी दरअसल हाल के समयों में इसी तरह विभिन्न धाराओं में जेल के पीछे बंद दिशा रवि जैसे अन्य मुकदमों की भी याद दिलाती है‚ जहां पुलिस को अपने कमजोर एवं पूर्वाग्रहों से प्रेरित जांच के लिए लताड़ मिली थी। तय बात है कि सूरत के फर्जी मुकदमे में गिरफ्तार रहे इन लोगों की बेदाग रिहाई न इस किस्म की पहली घटना है और न ही आखिरी। कुछ माह पहले डॉ. कफील खान की हुई बेदाग रिहाई‚ जब उन्हें सात माह के बाद रिहा किया गया‚ दरअसल इसी बात की ताईद करती है कि अगर सरकारें चाहें तो किसी मासूम व्यक्ति के जीवन में कितना कहर बरपा कर सकती है। याद रहे उच्च अदालत के सख्त एवं संतुलित रवैये का बिना यह मुमकिन नहीं थी‚ जिसने डॉ. कफील खान के खिलाफ खड़ी इस केस को ही ‘अवैध' बताया। अगर हम अपने करीब देखें तो ऐसे तमाम लोग मिल सकते हैं‚ जो इसी तरह व्यवस्था के निर्मम हाथों का शिकार हुए‚ मामूली अपराधों में न्याय पाने के लिए उनका लम्बे समय तक जेलों में सड़ते रहना या फर्जी आरोपों के चलते लोगों का अपनी जिंदगी के खूबसूरत वर्षों को जेल की सलाखों के पीछे दफना देना। पता नहीं लोगों को एक युवक आमिर का वह प्रसंग याद है कि नहीं जिसे अपनी जिंदगी के १४ साल ऐसे नकली आरोपों के लिए जेल में गुजारने पड़े थे‚ जिसमें कहीं दूर–दूर तक उसकी संलिप्तता नहीं थी। उस पर आरोप लगाया गया था कि दिल्ली एवं आसपास के इलाकों में हुए १८ बम विस्फोटों में वह शामिल था। यह अलग बात है कि यह आरोप जब अदालत के सामने रखे गए तो एक एक करके अभियोजन पक्ष के मामले खारिज होते गए और आमिर बेदाग रिहा हो गया। 


 यह अलग बात है कि इन चौदह सालों में उसके पिता का इंतकाल हो चुका था और मां की मानसिक हालत ऐसी नहीं थी कि वह बेटे की वापसी की खुशी को महसूस कर सके। आमिर को जिस पीड़ादायी दौर से गुजरना पड़ा‚ जिस तरह संस्थागत भेदभाव का शिकार होना पड़ा‚ पुलिस की साम्प्रदायिक लांछना को झेलना पड़ा‚ यह सब एक किताब में प्रकाशित भी हुआ है। ‘£ेमड एज ए टेररिस्ट (२०१६) शीर्षक से प्रकाशित इस किताब के लिए जानी–मानी पत्रकार एवं नागरिक अधिकार कार्यकर्ता नंदिता हक्सर ने काफी मेहनत की है। क्या यह कहना मुनासिब होगा कि सरकारें जब एक खास किस्म के एजेंडा से भर जाती है और लोगों की शिकायतों के प्रति निÌवकार हो जाती है तो ऐसे ही नजारों से हम बार–बार रूबरू होते रहते हैं। सवाल यह उठता है कि आखिर इस बात को कैसे सुनिश्चित किया जाए कि आने वाले वक्त में सूरत के सम्मेलन से गिरफ्तार १२३ लोगों को या आमिर जैसे लोगों को जिस स्थिति से गुजरना पड़ा था‚ वैसी त्रासदी अन्य किसी निरपराध को न झेलनी पड़े‚ और क्या तरीका हो सकता है कि इन बेगुनाहों को झूठे आरोपों के इस बोझ की साया से–भले ही वह कानूनन मुक्त हो गए हों–कैसे मुक्ति दिलाई जा सकती है॥। शायद सबसे आसान विकल्प है ऐसे लोगों को–जिनके साथ व्यवस्था ने ज्यादती की–आÌथक मुआवजा देना‚ जैसा कि पिछले साल राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने किया जब उसने छत्तीसगढ़ सरकार को यह निर्देश दिया कि वह उन मानवाधिकार कार्यकर्ताओं‚ विदुषियों को मुआवजा प्रदान करें जिन पर वर्ष २०१६ में झूठे एफआईआर दर्ज की गई थी। मालूम हो कि अध्यापकों‚ कार्यकर्ताओं का वह दल–जिसमें प्रोफेसर नंदिनी सुंदर‚ प्रो. अर्चना प्रसाद‚ कामरेड विनीत तिवारी‚ कामरेड संजय पराते आदि शामिल थे–मानवाधिकारों के हनन की घटनाओं की जांच करने वहां गया था। 


 मानवाधिकार आयोग ने कहा कि ‘हमारी यह मुकम्मल राय है कि इन लोगों को इन झूठे एफआईआर के चलते निश्चित ही भारी मानसिक यातना से गुजरना पड़ा‚ जो उनके मानवाधिकार का उल्लंघन था और राज्य सरकार को उन्हें मुआवजा देना ही चाहिए।' लेकिन क्या ऐसा मुआवजा वाकई उन सालों की भरपाई कर सकता है‚ उस व्यक्ति तथा उसके आत्मीयों को झेलनी पड़ती मानसिक पीड़ा को भुला दे सकता है‚ निश्चित ही नहीं! मुआवजे की चर्चा चल रही है और बरबस एक तस्वीर मन की आंखों के सामने घूमती दिखी जो पिछले दिनों वायरल हुई थी। इस तस्वीर में एक अश्वेत व्यक्ति को बेंच पर बैठे दिखाया गया था‚ जिसके बगल में कोई श्वेत आदमी बैठा है और उसे सांत्वना दे रहा है। खबर के मुताबिक श्वेत व्यक्ति ने उसके सामने एक खाली चेकबुक रखा था और कहा था कि वह चाहे जितनी रकम इस पर लिख सकता है‚ मुआवजे के तौर पर। अश्वेत आदमी का जवाब आश्चर्यचकित करने वाला था‚ ‘सर‚ क्या वह रकम मेरी पत्नी और बच्चों को लौटा सकती है‚ जो भयानक गरीबी में गुजर गए जिन दिनों मैं बिना किसी अपराध के जेल में सड़ रहा था।'॥

सौजन्य - राष्ट्रीय सहारा।

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Tuesday, April 6, 2021

आतंकवादी हैं ये (राष्ट्रीय सहारा)

छत्तीसगढ़ के बीजापुर में माओवादियों ने फिर साबित किया कि आतंकवाद की तरह खून और हिंसा के अलावा उनका कोई मानवीय उद्देश्य नहीं। पूरा देश शहीद और घायल जवानों के साथ है। करीब चार घंटे चली मुठभेड़ में १५ माओवादियों के ढेर होने का मतलब उनको भी बड़ी क्षति हुई है। साफ है कि वे भारी संख्या में घायल भी हुए होंगे। किंतु‚ २२–२३ जवानों का शहीद होना बड़ी क्षति है। ३१ से अधिक घायल जवानों का अस्पताल में इलाज भी चल रहा है। इससे पता चलता है कि माओवादियों ने हमला और मुठभेड़ की सघन तैयारी की थी। 


 जो जानकारी है माओवादियों द्वारा षडयंत्र की पूरी व्यूह रचना से घात लगाकर की गई गोलीबारी में घिरने के बाद भी जवानों ने पूरी वीरता से सामना किया‚ अपने साथियों को लहूलुहान होते देखकर भी हौसला नहीं खोया‚ माओवादियों का घेरा तोड़ते हुए उनको हताहत किया तथा घायल जवानों और शहीदों के शव को घेरे से बाहर भी निकाल लिया। कई बातें सामने आ रहीं हैं। सुरक्षाबलों को जोनागुड़ा की पहाडि़यों पर भारी संख्या में हथियारबंद माओवादियों के होने की जानकारी मिली थी। छत्तीसगढ़ के माओवाद विरोधी अभियान के पुलिस उप महानिरीक्षक ओपी पाल की मानें तो रात में बीजापुर और सुकमा जिले से केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के कोबरा बटालियन‚ डीआरजी और एसटीएफ के संयुक्त दल के दो हजार जवानों को ऑपरेशन के लिए भेजा गया था। माओवादियों ने इनमें ७०० जवानों को तर्रेम इलाके में जोनागुड़ा पहाडि़यों के पास घेरकर तीन ओर से हमला कर दिया। 


 इस घटना के बाद फिर लगता है मानो हमारे पास गुस्से में छटपटाना और मन मसोसना ही विकल्प है। यह प्रश्न निरंतर बना हुआ है कि आखिर कुछ हजार की संख्या वाले हिंसोन्माद से ग्रस्त ये माओवादी कब तक हिंसा की ज्वाला धधकाते रहेंगेॽ ध्यान रखिए माओवादियों ने १७ मार्च को ही शांति वार्ता का प्रस्ताव रखा था। इसके लिए उन्होंने तीन शर्तं रखी थीं–सशस्त्र बल हटें‚ माओवादी संगठनों से प्रतिबंध खत्म हों और जेल में बंद उनके नेताओं को बिना शर्त रिहा किया जाए। एक ओर बातचीत का प्रस्ताव और इसके छठे दिन २३ मार्च को नारायणपुर में बारूदी सुरंग विस्फोट में पांच जवान शहीद हो गए। दोपहर में सिलगेर के जंगल में घात लगाए माओवादियों ने हमला कर दिया था। ऐसे खूनी धोखेबाजों और दुस्साहसों की लंबी श्रृंखला है। साफ है कि इसे अनिश्चितकाल के लिए जारी रहने नहीं दिया जा सकता। यह प्रश्न तो उठता है कि आखिर दो दशकों से ज्यादा की सैन्य– असैन्य कार्रवाइयों के बावजूद उनकी ऐसी शक्तिशाली उपस्थिति क्यों हैॽ निस्संदेह‚ यह हमारी पूरी सुरक्षा व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। यहीं से राजनीतिक इच्छाशक्ति प्रश्नों के घेरे में आती है। पिछले करीब ढाई दशक से केंद्र और माओवाद प्रभावित राज्यों में ऐसी कोई सरकार नहीं रही जिसने इन्हें खतरा न बताया हो। यूपीए सरकार ने आंतरिक सुरक्षा के लिए माओवादियों को सबसे बड़ा खतरा घोषित किया था। केंद्र के सहयोग से अलग–अलग राज्यों में कई सैन्य अभियानों के साथ जन जागरूकता‚ सामाजिक–आÌथक विकास के कार्यक्रम चलाए गए हैं‚ लेकिन समाज विरोधी‚ देश विरोधी‚ हिंसाजीवी माओवादी रक्तबीज की तरह आज भी चुनौती बन कर उपस्थित हैं। हमें यहां दो पहलुओं पर विचार करना होगा। 


 भारत में नेताओं‚ बुद्धिजीवियों‚ पत्रकारों‚ एक्टिविस्टों का एक वर्ग माओवादियों की विचारधारा को लेकर सहानुभूति ही नहीं रखता उनमें से अनेक इनको कई प्रकार से सहयोग करते हैं। राज्य के विरु द्ध हिंसक संघर्ष के लिए वैचारिक खुराक प्रदान करने वाले ऐसे अनेक चेहरे हमारे आपके बीच हैं। इनमें कुछ जेलों में डाले गए हैं‚ कुछ जमानत पर हैं। इनके समानांतर ऐसे भी हैं‚ जिनकी पहचान मुश्किल है। गोष्ठियों‚ सेमिनारों‚ लेखों‚ वक्तव्यों आदि में जंगलों में निवास करने वालों व समाज की निचली पंक्ति वालों की आÌथक–सामाजिक दुर्दशा का एकपक्षीय चित्रण करते हुए ऐसे तर्क सामने रखते हैं‚ जिनका निष्कर्ष यह होता है कि बिना हथियार उठाकर संघर्ष किए इनका निदान संभव नहीं है। अब समय आ गया है जब हमारे आपके जैसे शांति समर्थक आगे आकर सच्चाइयों को सामने रखें। अविकास‚ अल्पविकास‚ असमानता‚ वंचितों‚ वनवासियों का शोषण आदि समस्याओं से कोई इनकार नहीं कर सकता‚ लेकिन इसका दूसरा पक्ष भी है। केंद्र और राज्य ऐसे अनेक कल्याणकारी कार्यक्रम चला रहे हैं‚ जो धरातल तक पहुंचे हैं। 


 उदाहरण के लिए प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत बनाए जा रहे और बने हुए आवास‚ स्वच्छता अभियान के तहत निÌमत शौचालय‚ ज्योति योजनाओं के तहत बिजली की पहुंच‚ सड़क योजनाओं के तहत दूरस्थ गांवों व क्षेत्रों को जोड़ने वाली सड़कों का लगातार विस्तार‚ किसानों के खाते में हर वर्ष ६००० भुगतान‚ वृद्धावस्था व विधवा आदि पेंशन‚ पशुपालन के लिए सब्सिडी जैसे प्रोत्साहन‚ आयुष्मान भारत के तहत स्वास्थ्य सेवा‚ कई प्रकार की इंश्योरेंस व पेंशन योजनाएं को साकार होते कोई भी देख सकता है। हर व्यक्ति की पहुंच तक सस्ता राशन उपलब्ध है। कोई नहीं कहता कि स्थिति शत–प्रतिशत बदल गई है‚ लेकिन बदलाव हुआ है‚ स्थिति बेहतर होने की संभावनाएं पहले से ज्यादा मजबूत हुई हैं तथा पहाड़ों‚ जंगलों पर रहने वालों को भी इसका अहसास हो रहा है। ॥ इसमें जो भी इनका हित चिंतक होगा वो इनको झूठ तथ्यों व गलत तर्कों से भड़का कर हिंसा की ओर मोड़ेगा‚ उसके लिए विचारों की खुराक उत्पन्न कराएगा‚ संसाधनों की व्यवस्था करेगा या फिर जो भी सरकारी‚ गैर सरकारी कार्यक्रम हैं‚ वे सही तरीके से उन तक पहुंचे‚ उनके जीवन में सुखद बदलाव आए इसके लिए काम करेगाॽ साफ है माओवादियों के थिंक टैंक और जानबूझकर भारत में अशांति और अस्थिरता फैलाने का विचार खुराक देने वाले तथा इन सबके लिए संसाधनों की व्यवस्था में लगे लोगों पर चारों तरफ से चोट करने की जरूरत है। निश्चित रूप से इस मार्ग की बाधाएं हमारी राजनीति है। तो यह प्रश्न भी विचारणीय है कि आखिर ऐसे लोगों के खिलाफ कार्रवाई में राजनीतिक एकता कैसे कायम होॽ 

सौजन्य - राष्ट्रीय सहारा।

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Saturday, April 3, 2021

कोरोना के साये में ( राष्ट्रीय सहारा)

जयसिंह रावत

महाकुंभ २०२१ के शुरू होने से पहले ही कुंभ नगरी हरिद्वार में एक बार फिर कोविड–१९ के उभार ने नई मुसीबत खड़ी कर दी है। यात्रियों के बोरोकटोक आवागमन से हरिद्वार में हर रोज दस–बीस मामले सामने आ रहे हैं। महाकुंभ के आयोजन से ठीक पहले हरिपुर कलां स्थित एक आश्रम में एक साथ ३२ कोरोना संक्रमित श्रद्धालु सारे पाए गए। देश–विदेश के यत्रियों की अनियंत्रित भीड़ कोरोना लेकर आ भी रही है और यहां से संक्रमण लेजा भी रही है। अतीत में भी कुंभ मेला और महामारियों का चोली दामन का साथ रहा है। १८९१ के कुंभ में फैला हैजा तो यूरोप तक पहुंच गया था। इसी प्रकार कई बार कुंभ में फैली प्लेग की बीमारी भारत के अंतिम गांव माणा तक पहुंच गई थी। 


रॉयल सोसाइटी ऑफ ट्रॉपिकल मेडिसिन एण्ड हाइजीन के संस्थापक सर लियोनार्ड रॉजर्स (द कण्डीसन इन्फुलेंयेसिंग द इंसीडेंस एण्ड स्पेड आफ कॉलेरा इन इंडिया) के अनुसार सन् १८९० के दाक में हरिद्वार कुंभ से फैला हैजा पंजाब होते हुए अफगानिस्तान‚ पर्सिया रूस और फिर यूरोप तक पहुंचा था। सन् १८२३ की प्लेग की महामारी में केदारनाथ के रावल और पुजारियों समेत कई लोग मारे गए थे। गढ़वाल में सन् १८५७‚ १८६७ एवं १८७९ की हैजे की महामारियां हरिद्वार कुंभ के बाद ही फैलीं थीं। सन् १८५७ एवं १८७९ का हैजा हरिद्वार से लेकर भारत के अंतिम गांव माणा तक फैल गया था। वाल्टन के गजेटियर के अनुसार हैजे से गढ़वाल में १८९२ में ५‚९४३ मौतें‚ वर्ष १९०३ में ४‚०१७‚ वर्ष १९०६ में ३‚४२९ और १९०८ में १‚७७५ मौतें हुयीं। ॥ कुंभ महापर्व पर करोड़ों सनातन धर्मावलम्बियों की आस्था की डुबकियों के साथ ही महामारियों का भी लम्बा इतिहास है। अकेले हरिद्वार में एक सदी से कम समय में ही केवल हैजा से ही लगभग ८ लाख लोगों की मौत के आंकड़े दर्ज हैं। अतीत में जब तीर्थ यात्री हैजे या प्लेग आदि महामारियों से दम तोड़ देते थे तो उनके सहयात्री उनके शवों को रास्ते में ही सड़ने–गलने के लिए लावारिस छोड़ कर आगे बढ़ जाते थे। अब हालात काफी कुछ बदल तो गए हैं मगर फिर भी कोरोना के मृतकों के शवों के साथ छुआछूत का व्यवहार आज भी कायम है। संकट की इस घड़ी में उत्तराखंड़ सरकार धर्मसंकट में पड़ गई है‚ क्योंकि वह न तो भीड़ को टालने के लिए कठोर निर्णय ले पा रही है और ना ही उसके पास करोड़ों लोगों को कोरोना महामारी के प्रोटोकॉल का पालन कराने का इंतजाम है। सरकार की ओर से नित नये भ्रमित करने वाले बयान आ रहे हैं। सरकार के डर और संकोच का परिणाम है कि कुंभ के आधे से अधिक स्नान पर्व निकलने पर भी सरकार असमंजस की स्थिति से बाहर नहीं निकल सकी। हालांकि शासन का हस्तक्षेप तब भी पंडा समाज और संन्यासियों को गंवारा नहीं था जो कि आज भी नहीं है। कुंभ और महामारियों का चोली दामन का साथ माना जाता रहा है। भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी की घुसपैठ के बाद १७८३ के कुंभ के पहले ८ दिनों में ही हैजे से लगभग २० हजार लोगों के मरने का उल्लेख इतिहास में आया है। 


हरिद्वार सहित सहारनपुर जिले में १८०४ में अंग्रेजों का शासन शुरू होने पर कुंभ में भी कानून व्यवस्था और सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए उनका हस्तक्षेप शुरू हुआ। ॥ अंग्रेजों ने शैव और बैरागी आदि संन्यासियों के खूनी टकराव को रोकने के लिए सेना की तैनाती करने के साथ ही कानून व्यवस्था बनाये रखने और महामारियां रोकने के लिए पुलिसिंग शुरू की तो १८६७ के कुंभ का संचालन अखाड़ों के बजाय सैनिटरी विभाग को सौंपा गया। उस समय संक्रामक रोगियों की पहचान के लिए स्थानीय पुलिसकर्मियों को तैनात किया गया। उसके बाद १८८५ के कुंभ में भीड़ को नियंत्रित करने के लिए बैरियर लगाए गए। सन् १८९१ में सारे देश में हैजा फैल गया था। उस समय पहली बार मेले में संक्रमितों को क्वारंटीन करने की व्यवस्था की गई। पहली बार मेले में सार्वजनिक शौचालयों और मल निस्तारण की व्यवस्था की गई। खुले में शौच रोकने के लिए ३३२ पुलिसकर्मी तैनात किए गए थे‚ लेकिन पुलिस की रोकटोक के बावजूद लोग तब भी खुले में शौच करने से बाज नहीं आते थे और उसके १३० साल बाद आज भी स्थिति में ज्यादा बदलाव नहीं आया। दक्षिण अफ्रीका से लौटने के बाद जब गांधी जी हरिद्वार कुंभ में पहुंचे थे तो उन्होंने भी लोगों के जहां तहां खुले में शौच किए जाने पर दुख प्रकट किया था॥। आर. दास गुप्ता (टाइम ट्रेंड ऑफ कॉलेरा इन इण्डिया–१३ दिसम्बर २०१५) के अनुसार हरिद्वार १८९१ के कुंभ में हैजे से कुल १‚६९‚०१३ यात्री मरे थे। विश्वमॉय पत्ती एवं मार्क हैरिसन ( द सोशल हिस्ट्री ऑफ हेल्थ एण्ड मेडिसिन पद कालोनियल इंडिया) के अनुसार महामारी पर नियंत्रण के लिए नॉर्थ वेस्टर्न प्रोविन्स की सरकार ने मेले पर प्रतिबंन्ध लगा दिया था तथा यात्रियों को मेला क्षेत्र छोड़ने के आदेश दिये जाने के साथ ही रेलवे को हरिद्वार के लिए टिकट जारी न करने को कहा गया था। आर. दास गुप्ता एवं ए.सी. बनर्जी ( नोट ऑन कालेरा इन द यूनाइटेड प्रोविन्सेज) के अनुसार सन् १८७९ से लेकर १९४५ तक हरिद्वार में आयोजित कुंभों और अर्ध कुंभों में हैजे से ७‚९९‚८९४ लोगों की मौतें हुइÈ।


 हरिद्वार कुंभ में हैजा ही नहीं बल्कि चेचक‚ प्लेग और कालाजार जैसी बीमारियां भी बड़ी संख्या में यात्रियों की मौत का कारण बनती रहीं। सन् १८९८ से लेकर १९३२ तक हरिद्वार समेत संयुक्त प्रांत में प्लेग से ३४‚९४२०४ लोग मरे थे। सन् १८६७ से लेकर १८७३ तक कुंभ क्षेत्र सहित सहारनपुर जिले में चेचक से २०‚९४२ लोगों की मौतें हुइÈ। सन् १८९७ के कुंभ के दौरान अप्रैल माह में प्लेग से कई यात्री मरे। यह बीमारी सिंध से यत्रियों के माध्यम से हरिद्वार पहुंची थी। प्लेग के कारण कनखल का सारा कस्बा खाली करा दिया गया था। सन् १८४४ में प्लेग की बीमारी का प्रसार रोकने के लिए कंपनी सरकार ने हरिद्वार में शरणार्थियों के प्रवेश पर रोक लगा दी थी। सन् १८६६ के कुंभ में अखाड़ों और साधु–संतों ने भी सोशल डिस्टेंसिंग का पालन किया था। उसी दौरा ब्रिटिश हुकूमत ने हरिद्वार में खुले में शौच पर प्रतिबंध लगा दिया था। उसी साल कुंभ मेले के संचालन की जिम्मेदारी स्वास्थ्य विभाग को सौंपी गई थी।

सौजन्य - राष्ट्रीय सहारा।

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Friday, April 2, 2021

टीकाकरण की मानवीय अहमियत (राष्ट्रीय सहारा)

इन  दिनों देश में कोरोना की दूसरी लहर और कुछ राज्यों में कोरोना के नये डबल म्यूटेंट मिलने से जहां एक ओर लोगों की स्वास्थ्य चिंताएं बढ़ गई है‚ वहीं आÌथक चुनौतियां भी बढ़ गई हैं। देश के कई राज्यों में एक बार फिर से लॉकडाउन और नाइट कर्फ्यू के हालात दिखने लगे हैं। ऐसे में हाल ही में २३ मार्च को केंद्र सरकार ने गंभीर होते कोरोना संक्रमण को नियंत्रित करने के लिए नई रणनीति सुनिश्चित करके नये दिशा–निर्देश जारी किए हैं। 


 गौरतलब है कि एक अप्रैल २०२१ से ४५ की उम्र पार के लोगों को कोरोना टीकाकरण का बड़ा फैसला किया है। इस महkवपूर्ण फैसले से न केवल देश के करोड़ों लोगों की कोरोना चिंताएं कम होंगी‚ वरन देश की विकास दर के सामने खड़ी कोरोना चुनौती भी कम होगी। ज्ञातव्य है कि देश में सभी स्वास्थ्य कर्मी‚ £ंटलाइन वर्कर्स‚ ६० साल से अधिक उम्र के लोग तथा ४५ वर्ष से ज्यादा उम्र के गंभीर बीमारी से ग्रसित लोग टीकाकरण के दायरे में आ चुके हैं। ऐसे लोगों को अब तक कोरोना टीके की करीब ४.८५ करोड़ खुराक दी जा चुकी है। 


 विगत १७ मार्च को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कोरोना वायरस संक्रमण में बढ़ोतरी के मद्देनजर राज्यों के मुख्यमंत्रियों से वर्चुअल चर्चा करते हुए कहा कि देश के १६ राज्यों के ७० जिलों में कोरोना संक्रमण के मामलों में १५० फीसद की वृद्धि देखी गई है। आठ राज्यों में कोरोना की दूसरी लहर से नये मामलों में चिंताजनक तेजी दिखाई दे रही है। ये राज्य महाराष्ट्र‚ तमिलनाडु‚ पंजाब‚ मध्य प्रदेश‚ दिल्ली‚ गुजरात‚ कर्नाटक और हरियाणा हैं। निसंदेह तेजी से बढ़ती हुई कोरोना की दूसरी लहर को रोकने के लिए त्वरित और निर्णायक कदम उठाने जाने की जरूरत इसलिए है‚ क्योंकि वर्ष २०२१ में दुनिया के अधिकांश आÌथक एवं वित्तीय संगठनों ने कोरोना संक्रमण के नियंत्रित हो जाने के मद्देनजर भारत की विकास दर में तेजी वृद्धि की संभावना बताई है। हाल ही में ९ मार्च को आÌथक सहयोग एवं विकास संगठन (ओईसीडी) ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि नये वित्त वर्ष २०२१–२२ में भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास दर में बड़े इजाफे की संभावना है। कहा गया है कि भारत की जीडीपी में नये वित्त वर्ष में १२.६ फीसद की दर से वृद्धि होगी। इससे भारत विश्व में सबसे तेजी से विकसित होने वाली बड़ी अर्थव्यवस्था का स्थान फिर हासिल कर लेगा। ऐसे में देश में कोरोना की दूसरी लहर से बढ़ते हुए मानवीय और आÌथक खतरों को रोकने और बढ़ती हुई विकास दर को अनुमानों के मुताबिक >ंचाई देने के लिए कोरोना संक्रमण से संबंधित इन तीन बातों पर ध्यान देना होगा। एक‚ भारत को कोरोना वैक्सीन के निर्माण की वैश्विक महाशक्ति बनाया जाए। दो‚ अधिक लोगों का वैक्सीकरण किया जाए और तीन‚ कोरोना वैक्सीन की बर्बादी रुûके॥। वस्तुतः भारत दुनिया के उन चमकते हुए देशों में सबसे आगे है‚ जिन्होंने कोरोना का मुकाबला करने के लिए कोरोना की अधिक दवाइयां बनाई और कोरोना वैक्सीन के निर्माण में >ंचाई प्राप्त की है। यह भी स्पष्ट दिखाई दे रहा है कि कोविड महामारी से जूझ रहे दुनिया के १५० से अधिक देशों को भारत ने कोरोना से बचाव की अनिवार्य दवाइयां मुहैया कराई है और ७० से अधिक देशों को कोरोना वैक्सीन की आपूÌत की है। भारत में १६ जनवरी से शुरू हुए दुनिया के सबसे बड़े टीकाकरण में ऑक्सफोर्ड–एस्ट्रोजेनेका के साथ मिलकर बनाई गई सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया की ‘कोविशील्ड' तथा स्वदेश में विकसित भारत बायोटेक की ‘कोवैक्सीन' का उपयोग टीकाकरण के लिए किया जा रहा है। संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव एंटोनिया गुतेरस ने कोरोना टीकाकरण के मद्देनजर भारत को दुनिया की सबसे बड़ी ताकत बताया है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि विगत १२ मार्च को क्वाड्रीलेटरल सिक्योरिटी डायलॉग (क्वाड) ग्रुप के चार देशों–भारत‚ अमेरिका‚ ऑस्ट्रेलिया और जापान ने वर्चुअल मीटिंग में यह सुनिश्चित किया है कि वर्ष २०२२ के अंत तक एशियाई देशों को दिए जाने वाले कोरोना वैक्सीन के १०० करोड़ डोज का निर्माण भारत में किया जाएगा। ऐसे में निश्चित रूप से भारत कोरोना वैक्सीन निर्माण की महाशक्ति बनाने की डगर पर आगे बढ़ता हुआ दिखाई दे सकेगा। 


यद्यपि इस समय सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया द्वारा बनाए जा रहे एस्ट्राजेनेको–ऑक्सफोर्ड के टीके कोविशील्ड और भारत बायोटेक के टीके कोवैक्सीन का निर्माण देश में बड़े पैमाने पर हो रहा है‚ लेकिन अब अन्य कंपनियों के कोरोना वैक्सीन भी तेजी से बाजार में आना जरूरी हैं। अब संक्रमण को रोकने के लिए उन लोगों का टीकाकरण करना भी उतना ही महkवपूर्ण है‚ जो संक्रमण के उच्च जोखिम में हैं। उन लोगों की रक्षा करना भी महkवपूर्ण है‚ जिन्हें काम के लिए घरों से बाहर निकलना पड़ता है। ऐसे में खुदरा और ट्रेड जैसे क्षेत्रों में काम कर रहे लोगों की कोरोनावायरस से सुरक्षा जरूरी है। रिटेलरों ओर ट्रेडरों को सार्वजनिक आवाजाही के कारण कोविड–१९ के संक्रमण का खतरा ज्यादा होता है‚ जिसे देखते हुए इस क्षेत्र में काम कर रहे लोगों का £ंटलाइन वर्कर्स की तरह टीकाकरण जरूरी है। इस बात पर भी ध्यान दिया जाना होगा कि भारत में कोरोना टीकाकरण अभियान के तहत ६.५ प्रतिशत खुराक की बरबादी हो रही है‚ जिसके चलते केंद्र सरकार ने राज्यों से टीके के अधिकतम उपयोग को बढ़ावा देने और अपव्यय को कम करने के लिए कहा है। तेलंगाना जैसे कई राज्य राष्ट्रीय औसत से बहुत अधिक खुराक की बरबादी कर रहे हैं। तेलंगाना में १७.५ फीसद खुराक बरबाद हो रही है तो वहीं आंध्र में ११.६ प्रतिशत और उत्तर प्रदेश में ९.४ प्रतिशत टीकों की बरबादी हो रही है। यद्यपि वर्ष २०२१ की शुरुûआत से ही अर्थव्यवस्था और विकास दर में सुधार दिखाई दे रहा है‚ लेकिन अर्थव्यवस्था को तेजी से गतिशील करने और वर्ष २०२१ में भारत को दुनिया में सबसे तेज विकास दर वाला देश बनाने की वैश्विक आÌथक रिपोर्टों को साकार करने के लिए कोरोना के नये बढ़ते हुए संक्रमण के नियंत्रण पर सर्वोच्च प्राथमिकता से ध्यान देना होगा। ॥ वस्तुतः भारत दुनिया के उन चमकते हुए देशों में सबसे आगे है‚ जिन्होंने कोरोना का मुकाबला करने के लिए कोरोना की अधिक दवाइयां बनाई और कोरोना वैक्सीन के निर्माण में >ंचाई प्राप्त की है। यह भी स्पष्ट दिखाई दे रहा है कि कोविड महामारी से जूझ रहे दुनिया के १५० से अधिक देशों को भारत ने कोरोना से बचाव की अनिवार्य दवाइयां मुहैया कराई है और ७० से अधिक देशों को कोरोना वैक्सीन की आपूÌत की है।

सौजन्य - राष्ट्रीय सहारा।

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Thursday, April 1, 2021

भारत पर चीन के 'वॉटर बम‘! (राष्ट्रीय सहारा)

पिछले दिनों भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने असम में महाबाहु–ब्रह्मपुत्र योजना की शुरुआत की। साथ ही‚ अन्य कई बड़े प्रोजेक्ट्स की आधारशिला भी रखी। असम में कनेक्टिवटी के उद्देश्य से महाबाहु–ब्रह्मपुत्र योजना शुरू की जा रही है। इस योजना के अंतर्गत कई छोटी–बड़ी परियोजनाओं को शामिल किया गया है। इन परियोजनाओं की मदद से रो–पैक्स सेवाओं से तटों के बीच संपर्क बनाने की कोशिश है। साथ ही‚ सड़क मार्ग से यात्रा की दूरी भी कम हो जाएगी। वहीं‚ दूसरी ओर चीन ने तिब्बत के मुहाने‚ जो अरु णाचल प्रदेश से महज ३० किलोमीटर दूर है‚ पर दुनिया का अभी तक सबसे विशालकाय डैम बनाने की घोषणा कर दी है। चीन ने अरु णाचल प्रदेश से सटे तिब्बत के इलाके में ब्रह्मपुत्र नदी पर हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट बनाने की तैयारी भी कर ली है।


 ब्रह्मपुत्र नदी पर बांध बनाने का चीन का फैसला भारत–चीन के रिश्तों में तनाव की नई वजह बन सकता है। ब्रह्मपुत्र नदी को चीन में यारलंग जैंगबो नदी के नाम से जाना जाता है। यह नदी एलएसी के करीब तिब्बत के इलाकों में बहती है। अरु णाचल प्रदेश में इस नदी को सियांग और असम में ब्रह्मपुत्र नदी के नाम से जाना जाता है। हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट के नाम पर चीन इस नदी पर जो बांध बनाएगा उससे नदी पर पूरी तरह चीन का नियंत्रण हो जाएगा। यह चीन की १४ पंचवर्षीय योजना का हिस्सा है। चीन की इस साजिश से भारत‚ पाकिस्तान‚ भूटान और बांग्लादेश पूरी तरह से प्रभावित होंगे। निरंतर १९५४ से लेकर आज तक हर वर्ष ब्रह्पुत्र नदी की विभीषिका भारत के उत्तर–पूर्वी राज्यों को तबाह करती रही है। हर वर्ष बाढ़ एक मुसीबत बन जाती है। इस डैम के बन जाने के बाद चीन जल संसाधन को आणविक प्रक्षेपास्त्र की तरह प्रयोग कर सकता है। विशेषज्ञों ने इसे वॉटर कैनन का नाम दिया है।


 भारत की नीति अंतरराष्ट्रीय नदी के संदर्भ में दुनिया के सामने एक मानक बनी हुई है। पाकिस्तान के साथ इंडस संधि की प्रशंसा आज भी होती है। उसी तरह २००७ में बांग्लादेश के साथ रिवर संधि दोनों देशों के लिए सुकून का कारण है। वहीं‚ चीन अपने पडोसी देशों के साथ अंतरराष्ट्रीय नदी को एक तुरु प की तरह प्रयोग करता है। अगर जनसंख्या की दृष्टि से देखें तो चीन की आबादी २० फीसदी है जबकि उसके पास स्वच्छ पानी का औसत महज ५ प्रतिशत भी नहीं है। उसके बावजूद दुनिया की महkवपूर्ण नदियों‚ जो तिब्बत के पठार से निकलती हैं‚ पर डैम बनाकर चीन दुनिया को पूरी तरह से तबाह कर देने की मुहिम में है। मेकांग नदी आसिआन देशों के लिए जीवनदायिनी है लेकिन चीन ने अलग–अलग मुहानों पर डैम बना कर नदी को इतना कलुषित कर दिया है कि वह अन्य देशों में पहुंचने पर एक नाले में तब्दील दिखाई देती है। यही हालत चीन ब्रह्मपुत्र के साथ कर रहा है। इसके परिणाम घातक होंगे। चीन भारत के चार महkवपूर्ण राज्यों की कृषि व्यवस्था और जीवन स्तर को खतरे में डाल सकता है‚ अगर यह डैम बनकर तैयार हो गया तो। पहले तो यही कि नदियों के बहाव को रोक लिया जाएगा। 


मालूम हो कि तिब्बत में ब्रह्मपुत्र के साथ ३३ सहायक नदियां उससे मिलती हैं। उसी तरह भारत में अरुणाचल प्रदेश से प्रवेश करने के उपरांत १३ नदियां पुनः उसका अंग बन जाती हैं। अगर चीन इनका इस्तेमाल एक कैनन की तरह करेगा तो बाढ़ का ऐसा आलम बन सकता है जिससे पूरा का पूरा क्षेत्र ही बहाव में विलीन हो जाएगा। अगर चीन ने बहाव को रोक लिया तो कृषि व्यवस्था तबाह होगी। ॥ चीन पहले ही ब्रह्मपुत्र नदी पर कई छोटे–छोटे बांध बना चुका है। चीन के पॉवर कंस्ट्रक्शन कोऑपरेशन के चेयरमैन और पार्टी के सेक्रेटरी यान झियोंग ने कहा है कि ताजा पंचवर्षीय योजना के तहत इस बांध को बनाया जाएगा। यह योजना वर्ष २०२५ तक चलेगी। लोवी इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट में कहा गया है‚ ‘चीन ने तिब्बत के जल पर अपना दावा ठोका है‚ जिससे वह दक्षिण एशिया में बहने वाली सात नदियों सिंधु‚ गंगा‚ ब्रह्मपुत्र‚ इरावडी‚ सलवीन‚ यांगट्जी और मेकांग के पानी को नियंत्रित कर रहा है। ये नदियां पाकिस्तान‚ भारत‚ बांग्लादेश‚ म्यांमार‚ लाओस और वियतनाम में होकर गुजरती हैं।' पिछले कुछ वषाç में ऐसे कम से कम तीन अवसर आ चुके हैं‚ जब चीन ने जान बूझकर ऐसे नाजुक मौकों पर भारत की ओर नदियों का पानी छोड़ा जिसने भारत में भारी तबाही मचाई। जून‚ २००० में अरु णाचल के उस पार तिब्बती क्षेत्र में ब्रह्मपुत्र पर बने एक डैम का हिस्सा अचानक टूट गया जिसने भारतीय क्षेत्र में घुसकर भारी तबाही मचाई थी। उसके बाद जब भारत के केंद्रीय जल शक्ति आयोग ने इससे जुड़े तथ्यों का अध्ययन किया तो पाया गया कि चीनी बांध का टूटना पूर्वनियोजित शरारत थी। रक्षा विशेषज्ञों की चिंता है कि यदि भारत के साथ युद्ध की हालत में या किसी राजनीतिक विवाद में चीन ने ब्रह्मपुत्र पर बनाए गए बांधों के पानी को ‘वॉटर–बम की तरह इस्तेमाल करने का फैसला किया तो भारत के कई सीमावर्ती क्षेत्रों में जान–माल और रक्षा तंत्र के लिए भारी खतरा पैदा हो जाएगा।


 प्रश्न उठता है कि भारत के पास विकल्प क्या हैंॽ भारत चीन को रोक कैसे सकता हैॽ चीन भौगोलिक रूप से ऊपर स्थित है। नदी वहां से नीचे की ओर आती है। भारत ने पडÃोसी देशों के साथ नेकनीयती रखते हुए संधि का अनुपालन किया‚ वहीं चीन किसी भी तरह से अंतरराष्ट्रीय नदियों पर किसी भी देश के साथ कोई संधि नहीं की है अर्थात वह जैसा चाहे वैसा निर्णय ले सकता है। इसलिए मसला मूलतः पावरगेम पर अटक जाता है। भारत हिमालयन ब्लंडर दो बार कर चुका है। पहली बार जब नेहरू ने तिब्बत को चीन का अभिन्न हिस्सा मान लिया। दूसरी बार तब जब अटलबिहारी वाजपेयी ने स्वायत्त तिब्बत को भी चीन का हिस्सा करार दे दिया। और बात भारत के हाथ से निकल गई। समस्या की मूल जड़ तिब्बत को चीन द्वारा हड़पने और भारत की मंजूरी से शुरू होती है। निकट भविष्य में ऐसा प्रतीत नहीं होता कि भारत की तिब्बत नीति में कोई सनसनीखेज परिवर्तन हो पाएगा। दूसरा तरीका क्वाड का है। इसके द्वारा चीन पर दबाव बनाया जा सकता है। भारत इस कोशिश में लगा भी हुआ है। बहरहाल‚ समय बताएगा कि भारत और चीन के बीच में संघर्ष वॉटर कैनन का होगा या आणविक मिसाइल काॽ ॥ प्रो. सतीश कुमार॥

सौजन्य - राष्ट्रीय सहारा।

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Saturday, March 27, 2021

सामयिकदांव पर तमिलों का भविष्य (राष्ट्रीय सहारा)

ऐतिहासिक मान्यता रही है कि दक्षिण भारत के तमिलों ने सिंहलियों को पराजित किया था‚ इसीलिए सिंहली तमिलों को लेकर आशंका ग्रस्त रहे हैं और उनकी यह नीति भारत के संदर्भ में सदैव नजर आती है। श्रीलंका में करीब २० लाख तमिल बसते हैं‚ जो कई वषाç से सामाजिक‚ धाÌमक और आÌथक उत्पीड़न सहने को मजबूर है। तमिल बराबरी पाने के संविधानिक अधिकारों के लिए लगातार संघर्षरत है‚ लेकिन भारत की कोई भी पहल श्रीलंका में अब तक वह १३वां संविधान संशोधन अधिनियम लागू करवाने में सफल नहीं हो सकी है‚ जिससे तमिलों के गरिमापूर्ण जीवन जीने के लिए कई तरह के अधिकार मिलने का मार्ग प्रशस्त हो सकता है। 


 भारत के सामने बड़ी चुनौती यह रही है कि वह श्रीलंका की सरकार से उसे लागू करवाएं। इसके विपरीत श्रीलंका ने अपनी राजनीतिक व्यवस्था में सिंहली राष्ट्रवाद की स्थापना कर और भारत विरोधी वैदेशिक ताकतों से संबंध मजबूत करके भारत पर दबाव बढ़ाने की लगातार कोशिश की है‚ जिससे वह तमिलों को लेकर अपने पड़ोसी देश से सौदेबाज़ी कर सके। फिलहाल श्रीलंका अपनी इस नीति में सफल होता दिखाई दे रहा है। दरअसल‚ पिछले महीने भारत यात्रा पर आएं श्रीलंका के विदेश सचिव एडमिरल जयनाथ कोलंबेज ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में भारत का सक्रिय समर्थन मांगते हुए कहा था की भारत उसे मुश्किल वक्त में छोड़ नहीं सकता। अब संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में श्रीलंका पर तमिलों के व्यापक नरसंहार के आरोप का प्रस्ताव पास हुआ तो वोटिंग के दौरान चीन और पाकिस्तान ने प्रस्ताव के विरोध में वोट किया‚ जबकि भारत ने वोटिंग से दूरी बनाए रखते हुए गैरहाजिर रहने का फैसला लिया। 

 यह श्रीलंका की राजनियक विजय रही क्योंकि तमिलों का संबंध सीधे भारत से है और भारत की इस पर खामोशी उसके नियंत्रण और संतुलन की नीति दर्शाती है। हालांकि इसका कोई भी दीर्घकालीन लाभ भारत को मिलता दिखाई नहीं पड़ रहा। श्रीलंका में प्रवासी भारतीयों की समस्या एक प्रमुख राजनीतिक मुद्दा रही है। ब्रिटिश औपनिवेशिक काल में भारत के तमिलनाडु राज्य से गये तमिलों की तादाद अब श्रीलंका में लाखों में है‚ लेकिन मानवधिकारों को लेकर उनकी स्थिति बेहद खराब है। श्रीलंका के जाफना‚ बट्टिकलोवा और त्रिंकोमाली क्षेत्र में लाखों तमिल रहते है जिनका संबंध दक्षिण भारत से है। श्रीलंका के सिंहली नेताओं द्वारा तमिलों के प्रति घृणित नीतियों को बढ़ावा देने से तमिलों का व्यापक उत्पीड़न बढ़ा और इससे इस देश में करीब तीन दशकों तक गृहयुद्ध जैसे हालात रहे। २००९ में श्रीलंका से तमिल पृथकतावादी संगठन लिट्टे के खात्मे के साथ यह तनाव समाप्त हुआ‚ जिसमें हजारों लोगों की जाने गई। इस दौरान श्रीलंका की सेना पर तमिलों के व्यापक जनसंहार के आरोप लगे। वैश्विक दबाव के बाद श्रीलंका ने सिंहलियों और तमिलों में सामंजस्य और एकता स्थापित करने की बात कही लेकिन हालात जस के तस बने हुए हैं। 

 गोटाभाया राजपक्षे की नीतियां तमिल और अन्य अल्पसंख्यक समूहों के प्रति घृणा को बढ़ावा देने वाली है। करीब एक दशक पहले श्रीलंका से तमिल पृथकतावादी संगठन लिट्टे के खात्मे के बाद हजारों तमिलों को श्रीलंका की सेना ने बंदी बनाया था और यह विश्वास भी दिलाया था कि उन्हें वापस उनके घर लौटने दिया जाएगा‚ लेकिन इतने वषाç बाद भी सैकड़ों तमिल परिवार हर दिन अपने प्रियजनों के घर लौटने की बाट जोह रहे हैं और उनके लौट आने की कोई उम्मीद दूर दूर तक नजर नहीं आती। इन तमिलों का संबंध भारत के दक्षिणी राज्य तमिलनाडु से है। इसीलिए भारत सरकार की भूमिका इस संबंध में बेहद महkवपूर्ण और निर्णायक हो सकती है। भारत श्रीलंका की भौगोलिक स्थिति को लेकर सतर्क रहता है और उसकी यह दुविधा वैदेशिक नीति में साफ नजर आती है। श्रीलंका की भू राजनीतिक स्थिति उसका स्वतंत्र अस्तित्व बनाती है‚ लेकिन भारत से उसकी सांस्कृतिक और भौगोलिक निकटता सामरिक oष्टि से ज्यादा असरदार साबित होती है। 

 श्रीलंका भारत से निकटता और निर्भरता से दबाव महसूस करता रहा है और यह भारत के लिए बड़ा संकट है। भारत जहां श्रीलंका की एकता‚ अखंडता और सुरक्षा को लेकर जिम्मेदारी की भूमिका निभाता रहा है वहीं श्रीलंका की सरकारों का व्यवहार बेहद असामान्य और गैर जिम्मेदार रहा है। श्रीलंका में शांति और स्थिरता के लिए भारत की सैन्य‚ सामाजिक और आÌथक मदद के बाद भी तमिल संगठन लिट्टे से निपटने के लिए श्रीलंका ने भारत के प्रतिद्वंद्वी देश पाकिस्तान से हथियार खरीदें। पिछले एक दशक में श्रीलंका के ढांचागत विकास में चीन ने बड़ी भूमिका निभाई है और चीन का इस समय श्रीलंका में बड़ा प्रभाव है। १९६२ के भारत चीन युद्’ के समय श्रीलंका की तटस्थ भूमिका हो या १९७१ के भारत पाकिस्तान युद्ध में पाकिस्तान के लड़ाकू विमानों को तेल भरने के लिए अपने हवाई अड्डे देने की हिमाकत‚ श्रीलंका भारत विरोधी कार्यों को करने से कभी पीछे नहीं हटा है। ॥ श्रीलंका में भारतीय तमिलों के हितों की रक्षा तथा भारत की सामरिक सुरक्षा के लिए अग्रगामी और आक्रामक कूटनीति की जरूरत है। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में श्रीलंका के विरु द्’ रखा गया प्रस्ताव श्रीलंका पर दबाव बढ़ाने के लिए बड़ा मौका था‚ जिस पर भारत का कड़ा रु ख श्रीलंका पर मनौवैज्ञानिक दबाव बढ़ा सकता था। कूटनीति के तीन प्रमुख गुण होते है‚ अनुनय‚ समझौता तथा शक्ति की धमकी। भारत श्रीलंका के साथ अनुनय और समझौता सिद्धांत से अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करने में असफल रहा है‚ यह समझने की जरूरत है। राजपक्षे बंधु सिंहली हितों‚ अतिराष्ट्रवाद को बढ़ावा देने तथा चीन और पाकिस्तान के साथ संबंध मजबूत करने की नीति पर कायम है। ऐसे में उनसे तमिल और भारतीय हितों के संरक्षण की उम्मीद नहीं की जा सकती।


सौजन्य - राष्ट्रीय सहारा।

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Friday, March 26, 2021

दिल्ली का अबूझ फैसला (राष्ट्रीय सहारा)

देश की राजधानी दिल्ली की शासन व्यवस्था उप राज्यपाल की कलम से ही चलेगी। केंद्र में सत्तारूढ़ø भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार ने लंबे समय से चले आ रहे इस विवाद का हल निकाल लिया है। बुधवार को विपक्ष के भारी हंगामे के बीच राष्ट्रीय राजधानी राज्यक्षेत्र (संशोधन) विधेयक २०२१ को राज्यसभा की मंजूरी मिलते ही यह तय हो गया कि दिल्ली के बॉस अब उपराज्यपाल ही होंगे। 


विधेयक को लोकसभा २२ मार्च को ही पास कर चुकी थी। विधेयक में यह स्पष्ट कर दिया गया है कि दिल्ली में सरकार का मतलब उप राज्यपाल है। इसके कानून बनने से दिल्ली सरकार के लिए किसी भी कार्यकारी फैसले से पहले उप राज्यपाल की अनुमति लेना आवश्यक होगा। 


विधेयक का विरोध कर रहे विपक्ष के इसे प्रवर समिति को भेजने की मांग खारिज होने के बाद मतविभाजन में इसके ४५ के मुकाबले ८३ मतों से पारित होते ही विधेयक ने कानून बनने की राह की अंतिम बाधा पार कर ली। विधानसभा चुनावों में एकतरफा जीत हासिल करके दिल्ली में सत्तारूढ़ø अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली आम आदमी पार्टी की सरकार के लिए यह भारी झटका है। वह पहले दिन से ही अपने अधिकारो को लेकर केंद्र सरकार से भिड़Ãी हुई थी। 


उसका कहना था केंद्र के दखल पर उप राज्यपाल उसे काम नही करने देते। उप राज्यपाल का तर्क था कि सरकार अपनी मनमानी करना चाहती है। मामला सुप्रीम कोर्ट तक गया जहां पांच जजों की बेंच ने जुलाई २०१८ को संविधान के अनुच्छेद २३९ एए की समीक्षा करते हुए जिसमें दिल्ली को विशेष दर्जा देने का प्रावधान किया गया था‚ यह स्पष्ट कर दिया था कि उप राज्यपाल को सरकार की सलाह और सहयोग से काम करना होगा। विवाद यहां थम जाना चाहिए था लेकिन इसकी परिणति बुधवार को पारित विधेयक के रूप में हुई। आप सहित पूरा विपक्ष केंद्र के इस फैसले के विरोध में है। मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने इसे लोकतंत्र के लिए दुखद बताया है । 


यद्यपि गृह राज्यमंत्री जी किशन रेड्ड़ी का कहना है कि उप राज्यपाल और दिल्ली सरकार के बीच अधिकारों को लेकर पैदा हुए संदेह और भ्रांतियों को दूर करने के लिए ऐसा किया गया है लेकिन आप का कहना है कि विधानसभा चुनावो में बुरी तरह हारी भाजपा इसके जरिए दिल्ली में पिछले दरवाजे से शासन करना चाहती है।


सौजन्य - राष्ट्रीय सहारा।

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महामारी और भारत (राष्ट्रीय सहारा)

पिछले दिनों अमेरिकी शोध संस्थान पिउ रिसर्च सेंटर ने भारतीय अर्थव्यवस्था पर कोरोना विषाणु महामारी के असर से संबंधित एक शोध रिपोर्ट प्रकाशित की है। इसमें भारत के विभिन्न आय वर्ग समूहों के परिवारों पर महामारी के प्रभावों का आकलन किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक‚ कोरोना महामारी ने भारतीय परिवारों की जीवन दिशा को नकारात्मक ढंøग से गहरे तक प्रभावित किया है। भारत के मध्य आर्य वर्ग समूह के करीब ३२.२ करोड़़ लोग खिसक कर निचले पायदान पर आ गए। यह अनुमान लगाया गया था कि २०११ से २०१९ के दौरान करीब ५.७ करोड़़ लोगों की आर्थिक स्थिति बेहतर हुई थी और यह वर्ग अपनी आर्थिक प्रगति करके मध्य वर्ग में शामिल हो गया था। इस वर्ग की रोजाना आय करीब १० ड़ॉलर से लेकर २० ड़ॉलर के बीच थी।


 कोरोना महामारी के दौर में प्रति दिन २ ड़ॉलर से कम लोगों की संख्या बढ़øकर ७.५ करोड़़ हो गई यानी ये सभी लोग एक झटके में गरीबी रेखा के नीचे आ गए। ऐसा नहीं है कि महामारी का असर केवल निम्न आय समूह के लोगों पर ही पड़़ा। वास्तव में महामारी ने उच्च आय वर्ग समूह के लोगों को भी प्रभावित किया। पिउ के मुताबिक‚ उच्च आय वाले लोगों की संख्या में भी करीब दस लाख की गिरावट आई है। इसके अलावा‚ उच्च मध्यम आय श्रेणी में ७० लाख‚ मध्य आय श्रेणी में ३.२ करोड़़ और कम आय वाले लोगों की संख्या में करीब ३.५ करोड़़ की गिरावट आई है। 


रिपोर्ट में महामारी का भारत और चीन की अर्थव्यवस्था पर तुलनात्मक अध्ययन किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक‚ भारत की तुलना में चीन की अर्थव्यवस्था बेहतर है। वहां कोरोना काल में गरीबी का स्तर लगभग पहले जैसा ही रहा और मध्यम आय वाले लोगों की आबादी में सिर्फ एक करोड़़ की गिरावट आई। लेकिन उच्च आय वाले वर्ग में चीन के मुकाबले भारत की स्थिति बेहतर देखी गई।


 भारत में जहां उच्च आय वाले वर्ग में दस लाख की गिरावट आईहै‚ वहीं चीन में यह संख्या करीब तीस लाख थी। उच्च–मध्यम आय श्रेणी में भी भारत से ज्यादा और कम आय वाले लोगों की संख्या में भारत के आसपास ही गिरावट दर्ज की गई। हालांकि कोरोना महामारी के चलते पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पटरी से उतर आईहै‚ लेकिन पिउ रिसर्च सेंटर की मानें तो भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिति ज्यादा खराब है। भारतीय अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए कामगारों को सुरक्षा देने के साथ कानूनी संरक्षण की भी जरूरत है।


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कांग्रेस चुप क्योंॽ (राष्ट्रीय सहारा)

महाराष्ट्र में इन दिनों जो चल रहा है‚ उसे पूरा देश देख रहा है। न केवल देख रहा है‚ बल्कि राजनीतिक और प्रशासनिक नैतिकता और शुचिता भी इस पर शमिÈदा हो रही है। इस तरह की घटना देश में कभी नहीं घटी होगी। भारतीय राजनीति और प्रशासनिक व्यवस्था में इस तरह का पल पहले कभी नहीं आया था जब वर्तमान डीजी और एक नामचीन महानगर का पूर्व पुलिस आयुक्त अपने ही गृह मंत्री पर सीधा आरोप लगाए कि उनकी शह पर १०० करोड़ रुûपये प्रति माह अवैध वसूली का लIय रखा गया था। 


परमबीर सिंह ने मुख्यमंत्री के नाम पत्र लिखकर गृह मंत्री के ऊपर आरोप लगाया कि उन्होंने असिस्टेंट पुलिस इंस्पेक्टर सचिन वाझे को बार और रेस्टोरेंट से प्रति माह १०० करोड़ रु पए उगाही करने का लIय दिया था। वाझे फिलहाल मुकेश अंबानी के घर के बाहर विस्फोटक सामग्री रखने के आरोप में एनआईए की हिरासत में है। इस मामले रोज नये–नये पर्दाफाश हो रहे हैं।


 विस्फोटक वाली स्कॉÌपयो कार से मिली धमकी भरी चिट्ठी का राज भी खुल गया है। इस चिट्ठी को खुद वाझे ने ही रखा था। टूटी–फूटी इंग्लिश वाली चिट्ठी को विनायक शिंदे के घर से मिले प्रिंटर से प्रिंट किया गया था‚ जिसकी जांच फोरेंसिक टीम के जरिए की जा रही है। एनआईए ने वाझे के खिलाफ गैर–कानूनी गतिविधियां (निवारण) अधिनियम (यूएपीए) की धाराएं भी लगाई हैं। 


 केंद्रीय गृह मंत्रालय ने २० मार्च को इस मामले की जांच एनआईए को सौंप दी थी। लेकिन एटीएस की जांच भी जारी थी। यह इतना गंभीर मामला है कि पुलिस ही विस्फोटक सामग्री रखती है तथा इस रहस्य को जानने वाले मनसुख हिरेन की हत्या कर देती है‚ यदि विरोधी पक्ष नेता देवेंद्र फड़णवीस इस मुद्दे को मजबूती से नहीं उठाते तो इस मामले को विस्फोटक रखने वाली पुलिस जांच करके खुद को क्लीन चिट दे देती तथा मनसुख हिरेन की हत्या को आत्महत्या बता कर केस बंद कर देती लेकिन यह अन्याय एक जागरूक नेता देवेंद्र फड़णवीस ने होने नहीं दिया। 


 जब परमबीर सिंह पत्र लिखकर इतना गंभीर आरोप लगा रहे हैं‚ और उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया तो सर्वोच्च न्यायालय ने मामले को गंभीर मानते हुए उन्हें उच्च न्यायालय जाने की सलाह दी है‚ तब भी उद्धव ठाकरे सरकार गृह मंत्री देशमुख को बचाने में लगी है। यह राजनीति की बहुत बड़ी विसंगति है‚ जिसकी शिल्पकार कांग्रेस है। 


 यह एकदम साफ बात है कि यह तीन दलों की सरकार है‚ तो तीनों दल मिलकर ही निर्णय लेते होंगे तो वसूली का निर्णय भी मिलकर ही लिया गया होगा। और संभव है कि उस रकम के बंटवारे में ये तीनों दल भी शामिल होंगे। अगर यह निर्णय मिलकर नहीं लिया गया होता तो संजय राठौडÃ की तरह कांग्रेस यहां भी कार्रवाई का दबाव बनाती क्योंकि संजय राठौडÃ के अपराध में कोई गिरोह शामिल नहीं था। यह उनका व्यक्तिगत था तो उस मामले में आधी/अधूरी कार्यवाई की गई। सचिन वाझे प्रकरण में १०० करोड़ रुûपये महीने वसूली का कार्य गिरोह बनाकर किया गया है‚ इसलिए कोई कुछ बोलने को तैयार नहीं है। इसलिए नहीं बोलने को तैयार हैं कि इस १०० करोड़ रुûपये में उनका भी हिस्सा था। कांग्रेस के पास भी गृह राज्य मंत्री का प्रभार है तथा बंटी पाटिल गृह राज्य मंत्री हैं‚ तो सचिन वाझे द्वारा वसूले गए पैसों की बंदरबांट कांग्रेस में भी होती थी यानी कि इसका एक हिस्सा कांग्रेस के आका राहुल गांधी और प्रियंका गांधी को भी जाता होगा। इसीलिए राहुल गांधी और प्रियंका भी इस मामले में मौन साधे हुए हैं वरना भाजपा–शासित राज्यों में छोटी–सी घटना होने पर राहुल और प्रियंका की बयानबाजी होती है तथा ट्वीट और दौरा होने लगता है। 


 कांग्रेस का १९५७ से लेकर आज तक इतिहास भ्रष्टाचार का काला अध्याय है तथा राजनीति में कांग्रेस को ही भ्रष्टाचार की जननी माना जाता है। अगर महाराष्ट्र के भ्रष्टाचार में कांग्रेस शामिल नहीं होती तो यह वही कांग्रेस है जिसने इंद्र कुमार गुजराल की सरकार केवल इसलिए गिरा दी थी कि १९९८ में आई जस्टिस मिलाप चंद्र जैन आयोग की रिपोर्ट में राजीव गांधी की हत्या में डीएमके के ऊपर संदेह व्यक्त किया गया था। डीएमके उस सरकार में शामिल थी। इसलिए कांग्रेस सरकार से बाहर हो गई। इसी कांग्रेस ने प्रधानमंत्री चंद्रशेखर की सरकार इसलिए गिरा दी थी कि हरियाणा पुलिस के कुछ लोग राजीव गांधी के घर के बाहर दिखे थे। इससे कांग्रेस को शक हुआ की चंद्रशेखर सरकार राजीव गांधी की जासूसी करवा रही है। जब कांग्रेस केंद्र की सरकार से बाहर हो जा रही थी तो वही कांग्रेस प्रदेश की सत्ता से बाहर क्यों नहीं हो रही। अब बात स्पष्ट हो गई कि कांग्रेस भी इस वसूली की हिस्सेदार है।


 इसीलिए इस मुद्दे पर कांग्रेस बिल्कुल मौन है‚ तो राष्ट्रवादी प्रमुख शरद पवार झूठी जानकारी दे रहे हैं। अनिल देशमुख नागपुर थे‚ अस्पताल में थे‚ इलाज चल रहा था‚ वे होम क्वारंटीन थे‚ उनकी मुलाकात किसी से नहीं हुई इत्यादि‚ इत्यादि। इस झूठ का पूरा पर्दाफाश देवेंद्र फड़णवीस ने किया। इस तरह का जघन्य और महाराष्ट्र को बदनाम करने का कार्य कभी नहीं हुआ जो कार्य महाविकास अघाडÃी सरकार के संरक्षण में किया जा रहा है। इसमें सिर्फ राष्ट्रवादी कांग्रेस ही दोषी नहीं है‚ बल्कि इसमें बड़ा दोष कांग्रेस का भी है‚ और इसीलिए भारतीय जनता को पूरा भरोसा है कि जल्दी ही दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा।


सौजन्य - राष्ट्रीय सहारा।

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Thursday, March 25, 2021

बाजारवाद का खेला जारी (राष्ट्रीय सहारा)

इन दिनों वैसे तो अर्थव्यवस्था के क्षेत्र से आ रही लगभग सभी खबरें निराश करने वाली हैं‚ लेकिन सबसे बुरी खबर यह है कि आम आदमी को महंगाई से राहत मिलने के कोई आसार अभी तो नहीं ही हैं। पेट्रोल‚ डीजल और रसोई गैस के साथ ही अनाज‚ दाल–दलहन‚ चीनी‚ घी‚ तेल‚ तमाम तरह के मसाले‚ फल‚ सब्जी‚ दूध‚ दवाई इत्यादि आवश्यक वस्तुओं के दाम आसमान छू रहे हैं। अंदेशा यही है कि ये कीमतें आगे और भी बढÃेंगी। ऐसे में आवश्यक वस्तुओं की कीमतों की इस मार को महंगाई कहना उचित या पर्याप्त नहीं है। यह साफ तौर पर बाजार द्वारा सरकार के संरक्षण में जनता के साथ की जा रही लूट–खसौट है। इससे ज्यादा कुछ नहीं है। 


 ऐसा नहीं कि महंगाई का कहर कोई पहली बार टूटा हो। महंगाई पहले भी होती रही है‚ जरूरी चीजों के दाम पहले भी अचानक बढÃते रहे हैं‚ लेकिन थोडेÃ समय बाद फिर नीचे आए हैं। मगर इस समय तो मानो बाजार में आग लगी हुई है। वस्तुओं की लागत और उनके बाजार भाव में कोई संगति नहीं रह गई है। इस मामले में जहां आम आदमी लाचार है और सरकार से आस लगाए हुए है कि वह कुछ करेगी‚ वहीं सरकार सिर्फ विकास और राष्ट्रवाद का बेसुरा राग अलापते हुए जनता को आत्मनिर्भर बनने की नसीहत दे रही है। उसकी नीतियों से महंगाई बढÃती जा रही है और वह खुद भी आए दिन पेट्रोल–डीजल के दाम बढाकर और अपनी इस करनी को देश के आÌथक विकास के लिए जरूरी बताकर आम आदमी के जले पर नमक छिडÃकने का काम कर रही है। 


सरकार की ओर से कीमतों में उछाल के जो भी स्पष्टीकरण दिए गए हैं‚ वे कतई विश्वसनीय नहीं हैं। पिछले साल मानसून कमजोर रहा या पर्याप्त बारिश नहीं हुई‚ ये ऐसे कारण नहीं हैं कि इनका असर सभी चीजों पर एक साथ पडÃे। इसका सबसे बडÃा प्रमाण यह है कि कीमतें इतनी ज्यादा होने के बावजूद बाजार में किसी भी आवश्यक वस्तु का अकाल–अभाव दिखाई नहीं पडÃता। जब आपूÌत कम होती है तो बाजार में चीजें दिखाई नहीं पडÃती हैं और उनकी कालाबाजारी शुरू हो जाती है। अभी न तो जमाखोरी हो रही है‚ और न ही कालाबाजारी। हो रही है तो सिर्फ और सिर्फ बेहिसाब–बेलगाम मुनाफाखोरी। लगता है मानो सरकार या सरकारों ने अपने आपको जनता से काट लिया है। यह हमारे लोकतंत्र का बिल्कुल नया चेहरा है–घोर जननिरपेक्ष और शुद्ध बाजारपरस्त चेहरा। 


 तीन दशक पहले तक जब किसी चीज के दाम असामान्य रूप से बढÃते थे तो सरकारें हस्तक्षेप करती थीं। यह अलग बात है कि इस हस्तक्षेप का कोई खास असर नहीं होता था क्योंकि उस मूल्य वृद्धि की वजह वाकई में उस चीज की दुर्लभता या अपर्याप्त आपूÌत होती थी। यह स्थिति पैदा होती थी उस वस्तु के कम उत्पादन की वजह से। अब तो सरकारों ने औपचारिकता या दिखावे का हस्तक्षेप भी बंद कर दिया है। वे बिल्कुल बेफिक्र हैं–महंगाई का कहर झेल रही जनता को लेकर भी और जनता को लूट रही बाजार की ताकतों को लेकर भी। 


सरकारें महंगाई बढÃने पर उसके लिए जिम्मेदार बाजार के बडÃे खिलाडिÃयों को डराने या उन्हें निरु त्साहित करने के लिए सख्त कदम भले ही न उठाए पर आम तौर पर सख्त बयान तो देती ही हैं‚ लेकिन अब तो ऐसा भी नहीं हो रहा है। अब तो सरकार की ओर से महंगाई को विकास का प्रतीक बताया जाता है‚ और इस पर सवाल उठाने वालों को विकास विरोधी करार दे दिया जाता है। पिछले दिनों खाद्य एवं नागरिक आपूÌत मंत्री के पद पर रहते हुए दिवंगत हुए रामविलास पासवान ने तो अपनी मृत्यु से कुछ समय पहले यह सलाह भी दे डाली थी कि अरहर की दाल महंगी है‚ तो लोग खेसारी दाल खाना शुरू कर दें। मक्कारी और बेशर्मी की हद तो यह है कि सरकार समर्थक कारोबारी योग गुरू ने तो यह भी नसीहत दे डाली थी कि ज्यादा दाल खाने से मोटापा बढÃता है। इसलिए लोग दाल का सेवन ज्यादा न करें। तो सरकारी पक्ष के मूर्खता और मक्कारी से युक्त ऐसे बयान मुनाफाखोरों को लूट की खुली छूट ही देते हैं। 


 अगर इस महंगाई का कुछ हिस्सा उत्पादकों तक पहुंच रहा होता या अनाज और सब्जी उगाने वाले किसान मालामाल हो रहे होते‚ तब भी कोई बात थी। लेकिन ऐसा भी नहीं हो रहा है। इस अस्वाभाविक महंगाई का लाभ तो बिचौलिए और मुनाफाखोर बडेÃ व्यापारी उठा रहे हैं। अगर सरकार को जनता से जरा भी हमदर्दी या उसकी तकलीफों का जरा भी अहसास हो तो वह अपने खुफिया तंत्र से यह पता लगा सकती है कि कीमतों में उछाल आने की प्रक्रिया कहां से शुरू हो रही है‚ और इसका फायदा किस–किसको मिल रहा है। यह पता लगाने में हफ्ते–दस दिन से ज्यादा का समय नहीं लगता। लेकिन अभी तो कीमतों में बेतहाशा बढÃोतरी की ऐसी कोई व्याख्या या वजह उपलब्ध नहीं है‚ जो समझ में आ सके। ऐसा लगता है कि मानो किसी रहस्यमय शक्ति ने बाजार को अपनी जकडÃन में ले रखा है‚ जिसके आगे आम जनता ही नहीं‚ सरकार और प्रशासन तंत्र भी असहाय और लाचार है।


 सरकार अगर चाहे तो वह इस समय बढÃते दामों पर काबू पाने के लिए दो तरह से हस्तक्षेप कर सकती है। पहला तो यह कि अगर बाजार से छेडÃछाडÃ नहीं करना है तो सरकार खुद ही गेहूं‚ चावल‚ दलहन‚ चीनी आदि वस्तुएं बाजार में भारी मात्रा में उतार कर कीमतों को नीचे लाए। ऐसा करने से उसे कोई नहीं रोक सकता बशर्ते उसमें ऐसा करने की मजबूत इच्छाशक्ति हो। हस्तक्षेप का दूसरा तरीका यह है कि बाजार पर योजनाबद्ध तरीके से अंकुश लगाया जाए। इसके लिए उत्पादन लागत के आधार पर चीजों के दाम तय कर ऐसी सख्त प्रशासनिक व्यवस्था की जाए कि चीजें उन्हीं दामों पर बिकें जो सरकार ने तय किए हैं। जब सरकार कृषि उपज के समर्थन मूल्य तय कर सकती है‚ तो बाजार में बिकने वाली चीजों की अधिकतम कीमतें क्यों नहीं तय कर सकतीॽ॥ लेकिन अभी तो सरकार की ओर से कुछ भी होता नहीं दिख रहा है। जाहिर है कि जन सरोकारी व्यवस्था की लगाम सरकार के हाथ से छूट चुकी है‚ जिसकी वजह से महंगाई का घोडÃा बेकाबू हो सरपट दौडेÃ जा रहा है। सब कुछ बाजार के हवाले है‚ और बाजार की अपने ग्राहक या जनता के प्रति कोई जवाबदेही नहीं है। यह नग्न बाजारवाद है‚ जिसका बेशर्म परीक्षण किया जा रहा है। सवाल यही है कि अगर सब कुछ बाजार को ही तय करना है‚ तो फिर सरकार के होने का क्या मतलब हैॽ काहे मतलब की सरकारॽ हम जिस समाज में रह रहे हैं‚ उस पर क्या लोकतंत्र का कोई नियम लागू होता हैॽ

सौजन्य - राष्ट्रीय सहारा।

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Wednesday, March 24, 2021

रक्षक के भक्षक बनने का मामला (राष्ट्रीय सहारा)

 

किसी को कल्पना नहीं रही होगी कि मुकेश अंबानी के घर एंटीलिया के सामने जिलेटिन वाली स्कॉÌपयो मिलने का मामला इतना बड़ा बवंडर पैदा कर सकता है। पहले इसे आतंकवादियों की करतूत माना गया और तिहाड़़ जेल में बंद इंडियन मुजाहिद्दीन के एक आतंकवादी से उसके तार जोड़े गए। अब इस पर कोई बात नहीं कर रहा। पूरा मामला घूम कर मुंबई पुलिस और महाराष्ट्र सरकार के ईर्द–गिर्द सिमट गया है। राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) के हाथ में आते ही मामला जिस ढंग से विस्फोटक बनता जा रहा है‚ वह किसी को भी अचंभित करने के लिए पर्याप्त है॥। मुंबई पुलिस के पूर्व आयुक्त परमबीर सिंह द्वारा मुख्यमंत्री को भेजे गए अपने पत्र में गृह मंत्री अनिल देशमुख पर लगाया गया आरोप‚ कि उन्होंने सचिन वाजे को हर महीने १०० करोड़ वसूली के लिए कहा था‚ असाधारण है। 

 अगर मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे और महाअघाड़़ी सरकार के रणनीतिकारों ने मान लिया था कि परमबीर को आयुक्त के पद से हटाने तथा पुलिस प्रशासन में कई फेरबदल के बाद मामले की आंच राजनीतिक नेतृत्व तक नहीं पहुंचेगी तो उनकी सोच गलत साबित हो रही है। इतना बड़ा अधिकारी अपने गृह मंत्री पर बिना किसी प्रमाण के ऐसा आरोप नहीं लगा सकता। निस्संदेह परमबीर पर भी प्रश्न खड़ा है कि पुलिस आयुक्त के रूप में उनका कर्त्तव्य क्या थाॽ वास्तव में परमबीर के आरोपों का मूल स्वर यही है कि मंत्री के आदेश पर मुंबई पुलिस का एक महकमा आपराधिक गतिविधियों में ंलिप्त था। इस दौरान अनेक बड़े मामलों को गलत मोड़ दिया गया। पत्र में जैसा विवरण है‚ उसे आसानी से झुठलाया नहीं जा सकता। मसलन‚ वे कह रहे हैं कि देशमुख अपने सरकारी आवास पर सचिन वाजे और कई पुलिस अधिकारियों को बुलाते थे। कायदे से गृह मंत्री के स्तर पर सचिन वाझे जैसे असिस्टेंट पुलिस इंस्पेक्टर स्तर के अधिकारी के साथ बैठक करने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। 

पत्र में करीब १७५० पब और बार का जिक्र है‚ और उनके अनुसार जिसे बताते हुए गृह मंत्री कह रहे हैं कि उनसे प्रति महीना दो से तीन लाख रुûपये लिए जाएं तो ४० करोड़़ के आसपास प्रति महीना इकट्ठा हो जाएगा। एसीपी सोशल सÌवस ब्रांच‚ संजय पाटिल का जिक्र है‚ जिसे उन्होंने घर पर बुलाकर हुक्का पार्लर से वसूली की बात की। देशमुख के निजी सचिव मिस्टर परांडे़ की उपस्थिति का भी जिक्र है। दादरा और नगर हवेली के सांसद मोहन डेलकर की मौत के मामले में गृह मंत्री की ओर से लगातार आत्महत्या के लिए उकसाने का केस दर्ज करने के दबाव तक के अति गंभीर आरोप भी हैं। ॥ परमबीर के आरोपों पर आपका चाहे जो मत हो‚ लेकिन एटीएस की जांच में कोई प्रगति क्यों नहीं हो सकी और एनआईए के आने के बाद क्यों पूरा मामला खुलता जा रहा है‚ इसका जवाब देश को मिल गया है। एनआईए की जांच से इतना तो साफ हो गया है कि पूरे मामले की साजिश पुलिस मुख्यालय तथा सचिन वाजे के घर पर ही रची गई। जांच में मंत्रियों और नेताओं के नाम भी सामने आ जाएं तो आश्चर्य नहीं। मनसुख और उनका परिवार दुर्भाग्यशाली साबित हुए। उनकी स्कॉÌपयो वापस नहीं आएगी। यह मालूम होने के बावजूद उन्होंने वाजे को चाबी थमाई। जिस स्थिति में उनकी मृत्यु हुई उसे आत्महत्या मानना कठिन है। वास्तव में वह इस साजिश के मुख्य गवाह हो सकते थे‚ इसलिए संदेह सच्चाई बनता दिख रहा है कि मनसुख की हत्या कर शव को फेंका गया। पहले से ही लग रहा था कि सचिन वाजे मामले में अकेले नहीं हो सकता। देश के सबसे बड़े उद्योगपति के घर के बाहर जिलेटिन वाली गाड़ी खड़ा कर उसे दबाव में लाने का दुस्साहस छोटा पुलिस अधिकारी नहीं कर सकता। इसलिए परमबीर सिंह की शिकायत‚ बेशक इस समय आरोप है‚ में दम है। वैसे भी वाजे वसूली के मामले में पुलिस सेवा से बाहर हो गया था। उसने पूरी कोशिश की और जब पुनर्बहाली नहीं हुई तो शिवसेना में शामिल हो गया। डेढ़ दशक से ज्यादा समय बाद उद्धव सरकार में पुलिस में उसकी वापसी होती है‚ और वह भी पीआईयू यानी अपराध जांच इकाई में। आप देख लीजिए‚ टीआरपी में हेरफेर के आरोप‚ अर्णब गोस्वामी‚ कंगना रनौत आदि बहुचÌचत मामले उसके हाथ में दिए गए। परमबीर का कहना सही लगता है कि सीधे गृह मंत्री से संबंध होने के कारण वह कई बार उन्हें भी नजरअंदाज करके काम करता था। यह अलग बात है कि पुलिस आयुक्त होकर उन्होंने यह सब क्यों सहन किया। इसका एक और पहलू भी है। चूंकि बड़े से बड़े पुलिस अधिकारी का कॅरियर सरकार के हाथों में होता है‚ इसलिए वह चाहे–अनचाहे गैर–कानूनी और असंवैधानिक आदेशों‚ इच्छाओं‚ कदमों‚ फैसलों का समर्थन करने या उनके अनुसार कार्रवाई करने को मजबूर रहता है। स्वाभिमानी और ईमानदार पुलिस अधिकारी विरोध कर सकता है लेकिन उसे परिणाम भुगतना पड़ सकता है। स्थानांतरित कर दिया जाएगा या उत्पीडि़त किया जाएगा। इसलिए बड़े अधिकारी भी राजनीतिक नेतृत्व के सामने नतमस्तक रहते हैं। ज्यादातर आराम से उनके साथ मिलकर हर तरह का काम करते हुए मनचाहा पद और पदोन्नति पाते हैं। यह हमारी व्यवस्था की त्रासदी है। वास्तव में यह रक्षक के ही भक्षक बन जाने का मामला है। ॥ सोचिए‚ यह कैसी व्यवस्था है‚ जिसमें पुलिस के बड़े अधिकारी स्वीकार रहे हैं कि उनके जानते हुए उनकी पुलिस गुंडों‚ दादाओं‚ अपराधियों की तरह वसूली कर सरकार तक पहुंचा रही है‚ गैर–कानूनी काम कर रही है और वे उसे चुपचाप देखने या सहभागिता करने को विवश हैंॽ निश्चित ही इस विस्फोटक आरोप के राजनीतिक परिणाम होंगे। उद्धव सरकार का इकबाल खत्म मानिए। 

सारे विवादित और बहुचÌचत मामले एवं पुलिस की कार्रवाइयां संदेह के घेरे में आ गए हैं। यह तो संभव नहीं कि पुलिस और मंत्री के बीच इस तरह की दुरभिसंधियों की जानकारी महाअघारी के नेताओं को नहीं हो। पत्र में तो मुख्यमंत्री तक शिकायत पहुंचाने का भी संकेत है। सवाल उठता है कि इतनी वसूली को क्या अकेले देशमुख रख रहे थेॽ कोई अकेले ऐसा नहीं कर सकता। गलत तरीके से मुकदमों और गैर–कानूनी पुलिस कार्रवाइयां अंधेरे में तो हो नहीं रही थीं। दूसरों की भी संलिप्तता निश्चित रूप से है। जो संलिप्त नहीं थे उनने आवाज क्यों नहीं उठाईॽ सच कहें तो महाअघाड़़ी के किसी नेता या मंत्री के लिए इन प्रश्नों का अब वैसा जवाब देना कठिन है‚ जिससे लोग सहमत हो सकें।

 जाहिर है‚ उच्चस्तरीय व्यापक दायरों वाली स्वतंत्र जांच से ही कुछ हद तक सच्चाई सामने आ सकती है। हां‚ महाराष्ट्र में पुलिस प्रशासन के साथ राजनीति में बहुआयामी सफाई की आपातकालीन आवश्यकता एक बार फिर रेखांकित हुई है। यहां भी प्रश्न वही है कि आखिर इसे कैसे और कौन अंजाम देगाॽ॥

सौजन्य - राष्ट्रीय सहारा।

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Monday, March 22, 2021

नारों से नहीं सजते धर्मक्षेत्र (राष्ट्रीय सहारा)

चार  बरस पहले जब योगी सरकार बनी तो हर हिंदू को लगा कि अब हमारे धर्मक्षेत्रों को बडÃे स्तर पर सजाया–संवारा जाएगा। तब अपने इसी कॉलम में मैंने लिखा था कि‚ ‘अगर धाम सेवा के नाम पर‚ छलावा‚ ढोंग और घोटाले होंगे‚ तो भगवान तो रुûष्ट होंगे ही‚ सरकार की भी छवि खराब होगी। इसलिए हमारी बात को ‘निंदक नियरे राखिए' वाली भावना से उप्र के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी जी सुनेंगे‚ तो उन्हें लोक और परलोक में यश मिलेगा। यदि वे निहित स्वार्थों की हमारे विरुûद्ध की जा रही लगाई–बुझाई को गंभीरता से लेंगे तो न सिर्फ ब्रजवासियों और ब्रज धाम के कोप भाजन बनेंगे‚ बल्कि परलोक में भी अपयश ही कमाएंगे।' ॥ तब इस लेख में मैंने उन्हें आगाह किया था कि‚ ‘धर्मनगरियों व ऐतिहासिक भवनों का जीणोंर्द्धार या सौंदर्यीकरण जटिल प्रक्रिया है। इसलिए कि चुनौतियां अनंत हैं। लोगों की धार्मिक भावनाएं‚ पुरोहित समाज के पैतृक अधिकार‚ वहां आने वाले आम आदमी से अति धनी लोगों तक की अपेक्षाओं को पूरा करना‚ सीमित स्थान और संसाधनों के बीच व्यापक व्यवस्थाएं करना‚ इन नगरों की कानून व्यवस्था और तीर्थयात्रियों की सुरक्षा को सुनिश्चित करना।' इस सबके लिए जिस अनुभव‚ कलात्मक अभिरुûचि व आध्यात्मिक चेतना की आवश्यक्ता होती है‚ प्रायः उसका प्रशासनिक व्यवस्था में अभाव होता है। कारण यह है कि सडÃक‚ खड़ं़जे की मानसिकता से टेंड़र निकालने वाले‚ डीपीआर बनाने वाले और ठेके देने वाले‚ इस दायरे के बाहर सोच ही नहीं पाते। सोच पाते तो इन शहरों में कुछ कर दिखाते। पिछले इतने दशकों में इन धर्मनगरियों में विकास प्राधिकरणों ने क्या एक भी इमारत ऐसी बनाई है‚ जिसे देखा–दिखाया जा सकेॽ क्या इन प्राधिकरणों ने शहरों की वास्तुकला को बढÃाया है या इन पुरातन शहरों में दियासलाई के डिब्बों जैसे अवैध बहुमंजिले भवन खडÃे कर दिए हैंॽ नतीजतन‚ ये सांस्कृतिक स्थल अपनी पहचान तेजी से खोते जा रहे हैं। माना कि शहरी विकास की प्रक्रिया में मकान‚ दुकान‚ बाजार बनाने होते हैं‚ पर पुरातन नगरों की आत्मा को मारकर नहीं। अंदर से भवन कितना ही आधुनिक क्यों न हो‚ बाहर से उसका स्वरूप‚ उस शहर की वास्तुकला की पहचान को प्रदर्शित करने वाला होना चाहिए। भूटान ऐसा देश है‚ जहां एक भी भवन भूटान की बौद्ध संस्कृति के विपरीत नहीं बनाया जा सकता। होटल‚ दफ्तर या दुकान‚ कुछ भी हो‚ सबके खिडÃकी‚ दरवाजे और छज्जे बुद्ध विहारों के सांस्कृतिक स्वरूप को दर्शाते हैं। दुनिया के पर्यटन वाले तमाम नगर इस बात का विशेष ध्यान रखते हैं जबकि उप्र में आज भी पुराने ढर्रे से सोचा–किया जा रहा है। फिर कैसे सुधरेगा इन नगरों का स्वरूपॽ ॥ २०१७ में जब मैंने उप्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को उनके कार्यालय में तत्कालीन पर्यटन सचिव अवनीश अवस्थी की मौजूदगी में ब्रज के बारे में पावर प्वाइंट प्रस्तुति दी थी‚ तो योगी जी से स्पष्ट शब्दों में कहा कि महाराज! दो तरह का भ्रष्टाचार होता है‚ ‘करप्शन ऑफ डिजाइन' और ‘करप्शन ऑफ इम्पलीमेंटेशन' यानी नक्शे बनाने में भ्रष्टाचार और निर्माण करने में भी भ्रष्टाचार। निर्माण का भ्रष्टाचार तो भारतव्यापी है। पर डिजाइन का भ्रष्टाचार तो और भी गंभीर है यानी तीर्थस्थलों के विकास की योजनाएं बनाने में ही सही समझ और अनुभवी लोगों की मदद नहीं ली जाएगी और उद्देश्य अवैध धन कमाना होगा‚ तो योजनाएं ही नाहक महkवाकांक्षी बनाई जाएंगी। गलत लोगों से नक्शे बनवाए जाएंगे और सत्ता के मद में डंडे के जोर पर योजनाएं लागू करवाई जाएंगी। नतीजतन‚ धर्मक्षेत्रों का विनाश ही होगा‚ विकास नहीं। ॥ जैसे अयोध्या के दर्जनों पौराणिक कुंड़ों की दुर्दशा सुधारने के बजाय अकेले सूर्य कुंड़ के सौंदर्यीकरण पर शायद १४० करोडÃ रुपये खर्च किए जाएंगे जबकि यह कुंड़ सबसे सुंदर और दुरुस्त दशा में है और दो करोडÃ में ही इसका स्वरूप निखारा जा सकता है। पीडÃा के साथ कहना पडÃ रहा है कि योगीराज में ब्रज सजाने के नाम पर प्रचार तो बहुत हुआ‚ धन का आवंटन भी खुलकर हुआ‚ पर कोई भी उल्लेखनीय काम ऐसा नहीं हुआ जिससे ब्रज की संस्कृति और धरोहरों का संरक्षण या जीणाæद्धार इस तरह हुआ हो जैसा विश्व स्तर पर विशेषज्ञों द्वारा किया जाता है। सबसे पहली गलती तो यह हुई है कि जिस‚ ‘उप्र ब्रज तीर्थ विकास परिषद' को ब्रज विकास के सारे निर्णय लेने के असीमित अधिकार दिए गए हैं‚ उसमें एक भी व्यक्ति इस विधा का विशेषज्ञ नहीं है। परिषद का आज तक कानूनी गठन ही नहीं हुआ जबकि इसके अधिनियम २०१५ की धारा ३ (त) के अनुसार‚ कानूनन इस परिषद में ब्रज की धरोहरों के संरक्षण के लिए किए गए प्रयत्नों के संबंध में ज्ञान‚ अभिज्ञता और ट्रैक रिकर्ड रखने वाले पांच सुविख्यात व्यक्तियों को लिया जाना था। उनकी सलाह से ही प्रोजेक्ट और प्राथमिकताओं का निर्धारण होना था अन्यथा नहीं जबकि अब तक परिषद में सारे निर्णय‚ उन दो व्यक्तियों ने लिए हैं‚ जिन्हें इस काम अनुभव नहीं है॥। इसी प्रकार इसके अधिनियम २०१५ की धारा ६ (२) के अनुसार परिषद का काम मथुरा स्तर पर करने के लिए जिलास्तरीय समिति के गठन का भी प्रावधान है‚ जिसमें ६ मशहूर विशेषज्ञों की नियुक्ति की जानी थी। (१) अनुभवी लैंडस्केप डिजाइनर व इंटर्पेटिव प्लानर (२) ब्रज क्षेत्र का अनुभव रखने वाले पर्यावरणविद् (३) ब्रज के सांस्कृतिक और पौराणिक इतिहास के सुविख्यात विशेषज्ञ (४) ब्रज साहित्य के प्रतिष्ठित विद्वान (५) ब्रज कला के सुविख्यात मर्मज्ञ (६) ब्रज का कोई सुविख्यात वकील‚ सामाजिक कार्यकर्ता या जनप्रतिनिधि जिसने ब्रज के सांस्तिक विकास में कुछ उल्लेखनीय योगदान दिया हो। इन सबके मंथन के बाद ही विकास की परियोजनाएं स्वीकृत होनी थीं पर जानबूझकर ऐसा नहीं किया गया ताकि मनमानी तरीके से निरर्थक योजनाओं पर पैसा बर्बाद किया जा सके जिसकी लंबी सूची प्रमाण सहित योगी जी को दी जा सकती है‚ यदि वे इन चार वर्षों में परिषद की उपलब्धियों का निष्पक्ष मूल्यांकन करवाना चाहें तो। अज्ञान और अनुभवहीनता के चलते ब्रज का जैसा विनाश इन चार वर्षों में हुआ है‚ वैसा ही पिछले तीन दशकों में‚ हर धर्मक्षेत्र का किया गया है। इसके दर्जनों उदाहरण दिए जा सकते हैं। फिर भी अनुभव से कुछ सीखा नहीं जा रहा। सारे निर्णय पुराने ढर्रे पर ही लिए जा रहे हैं‚ तो कैसे सजेंगी हमारी धर्मनगरियांॽ मैं तो इसी चिंता में घुलता जा रहा हूं। शोर मचाओ तो लोगों को बुरा लगता है और चुप होकर बैठो तो दम घुटता है कि अपनी आंखों के सामने‚ अपनी धार्मिक विरासत का विनाश कैसे हो जाने देंॽ


सौजन्य - राष्ट्रीय सहारा।

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Saturday, March 20, 2021

कोरोना ने दिया झटका (राष्ट्रीय सहारा)

बिहार‚ छतीसगढ़‚ गुजरात‚ झारखंड‚ कर्नाटक‚ केरल‚ मध्य प्रदेश‚ महाराष्ट्र‚ ओडि़शा‚ राजस्थान‚ उत्तर प्रदेश‚ पश्चिम बंगाल और उत्तराखंड ने हाल में वित्त वर्ष २०२१–२२ के लिए बजट पेश किया है। इन राज्यों की मौजूदा वित्तीय स्थिति और उनके बजटीय प्रावधानों से साफ हो जाता है कि कोरोना महामारी ने राज्यों में आÌथक संकट बढ़ाया है। महामारी से इन राज्यों की आमदनी कम हुई है‚ जबकि खर्च बढ़ा है। 


 आमदनी से ज्यादा खर्च होने की वजह से राजकोषीय घाटा बढ़ा है। इन राज्यों का राजकोषीय घाटा यानी आमदनी और खर्च के बीच का अंतर राज्यों की जीडीपी के परिप्रेIय में वित्त वर्ष २०२०–२१ में ४.५ प्रतिशत के स्तर तक पहुंचने का अनुमान है। हालांकि‚ पेश किए गए बजट यानी वित्त वर्ष २०२१–२२ के लिए जीडीपी के परिप्रेIय में औसत राजकोषीय घाटा ३.३ प्रतिशत रहने का अनुमान है। चालू वित्त वर्ष के संशोधित अनुमान के अनुसार इन राज्यों का वित्तीय घाटा ५.८ लाख करोड़ रुûपये के स्तर पर पहुंच सकता है‚ जबकि आगामी वित्त वर्ष में घटकर ५.० लाख करोड़ रुûपये रह सकता है। प्रतिकूल स्थिति होने के बावजूद इन राज्यों द्वारा खर्च में कटौती करने एवं अन्य सुधारात्मक उपायों को अमलीजामा पहनाने की वजह से इनका राजकोषीय घाटा खतरनाक स्तर से नीचे है। सभी राज्यों की आÌथक स्थिति पर कोरोना महामारी का प्रभाव एक समान नहीं पड़ा है। किसी राज्य में राजकोषीय घाटा का स्तर ज्यादा रहा है तो किसी में कम। राजकोषीय घाटा/ज्यादा रहने का कारण राज्य की जनसंख्या‚ प्रवासी मजदूरों की संख्या‚ आÌथक स्थिति‚ स्वास्थ्य अवसंरचना‚ कमजोर या मजबूत आपूÌत „ाृंखला‚ कारोबार का स्वरूप आदि रहा है।


 राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) ने वित्त वर्ष २०२०–२१ के लिए वास्तविक रूप में जीडीपी में ८.०० प्रतिशत संकुचन का अनुमान लगाया है‚ जबकि नॉमिनल आधार पर इसके ३.८ प्रतिशत संकुचित होने का अनुमान लगाया गया है। हालांकि‚ वित्त वर्ष २०२१–२२ के लिए पेश किए गए केंद्रीय बजट में १४.४ प्रतिशत की दर से विकास होने का अनुमान लगाया गया है। कुछ राज्यों ने चालू वित्त वर्ष में‚ वित्त वर्ष २०१९–२०२० के मुFाबले नॉमिनल सकल राज्य घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) का अनुमान उदारता से लगाया है‚ जिसका प्रभाव प्रति व्यक्ति जीएसडीपी पर oष्टिगोचर हो रहा है। कर्नाटक‚ उत्तर प्रदेश और प. बंगाल जैसे राज्यों के आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष २०२०–२१ में वित्त वर्ष २०१९–२० की तुलना में प्रति व्यक्ति जीएसडीपी में १०‚००० रुûपये से अधिक की वृद्धि हो सकती है‚ जबकि राष्ट्रीय स्तर पर वित्त वर्ष २०२०–२०२१ में वित्त वर्ष २०१९–२०२० के बनिस्बत प्रति व्यक्ति जीडीपी में लगभग ७‚२०० रु पये की गिरावट दर्ज की जा सकती है। इस प्रकार‚ राज्यों के आंकड़ों और एनएसओ के आंकड़ों में कहीं–कहीं विरोधाभास परिलक्षित होता है। ॥ कोरोना काल में राज्यों को सीजीएसटी और एसजीएसटी से कमाई उम्मीद के अनुरूप नहीं रही है। यह संशोधित बजटीय अनुमान से २१.२ प्रतिशत कम रही है। कच्चे तेल और उससे बने उत्पादों पर लगाए जाने वाले वैट और बिक्री कर से होने वाली कमाई भी बजटीय अनुमान से १४.७ प्रतिशत कम रही है। कमाई में हो रही कमी की भरपाई के लिए राज्यों ने खर्च में कटौती की है‚ और उधारी का दामन थामा है। पूंजीगत खर्च में राज्यों द्वारा लगभग ११.३ प्रतिशत की कटौती की गई है। बावजूद इसके‚ वित्त वर्ष २०१९–२० से वित्त वर्ष २०२०–२१ में इस मद में ६.६ प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है‚ जिसे अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा संकेत माना जा सकता है‚ क्योंकि पूंजीगत खर्च आम तौर पर आधारभूत संरचना को मजबूत करने के लिए किए जाते हैं‚ जिसकी फिलवक्त ज्यादा जरूरत है। प्रति व्यक्ति कर्ज में सबसे ज्यादा २० प्रतिशत की बढ़ोतरी कर्नाटक राज्य की हो सकती है। वित्त वर्ष २०२१–२२ में कर्नाटक‚ केरल और उत्तराखंड जैसे राज्यों का प्रति व्यक्ति कर्ज ६०‚००० रुûपये से अधिक होने का अनुमान है। पूंजीगत व्यय की तुलना में राजस्व व्यय में वित्त वर्ष २०२०–२१ के दौरान कम खर्च हुआ है। पूंजीगत व्यय के तहत सरकार द्वारा अमूमन संपत्ति का अधिग्रहण‚ इमारतों‚ प्रौद्योगिकी‚ उपकरणों के उन्नयन व रखरखाव आदि पर खर्च किया जाता है। इसका इस्तेमाल नई परियोजनाओं में निवेश करने के लिए भी किया जाता है। वहीं‚ राजस्व व्यय के तहत विभिन्न सरकारी विभागों और सेवाओं पर खर्च‚ ऋण की किस्त एवं ब्याज अदायगी‚ सब्सिडी आदि पर खर्च किया जाता है। यह करों के भुगतान‚ शुल्क व दंड आदि मदों पर भी खर्च किया जाता है। जीवन में स्वास्थ्य सर्वोपरि है‚ को महामारी ने साबित कर दिया है। इस वजह से कुछ राज्यों ने वित्त वर्ष २०२१–२२ के बजट में स्वास्थ्य से जुड़े सभी संसाधनों तक आम लोगों की पहुंच सुलभ और उन्हें किफायती बनाने पर जोर दिया है‚ लेकिन १३ में से ६ राज्यों ने वित्त वर्ष २०२०–२१ में स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मद में कम खर्च किए हैं‚ लेकिन वित्त वर्ष २०२१–२२ में इस मद के लिए ज्यादा प्रावधान किए हैं। वहीं‚ ५ राज्यों ने बजट में स्वास्थ्य और परिवार कल्याण के मद में २० प्रतिशत से ज्यादा राशि की बढ़ोतरी की है। हालांकि‚ राजस्व की कमी की वजह से अन्य २ राज्य बजट में स्वास्थ्य क्षेत्र पर अपेक्षित ध्यान नहीं दे पाए हैं।


 कोरोना काल में राज्य एवं केंद्र सरकारों ने स्वास्थ्य क्षेत्र में अनुसंधान एवं शोध के महkव को अच्छी तरह से समझ लिया है। कुछ अपवाद को छोड़कर ग्रामीण‚ कस्बा‚ शहर एवं महानगर सभी जगहों पर स्वास्थ्य सेवाओं का हाल बेहाल है। मोटे तौर पर कुशल मानव संसाधन और स्वास्थ्य उपकरणों की भारी कमी है। स्वास्थ्य क्षेत्र को मजबूत बनाकर ही कोरोना वायरस या अन्य आपदाओं से मुकाबला किया जा सकता है। वित्त वर्ष २०२१–२२ के लिये पेश किए गए १३ राज्यों के बजट में स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मद पर औसत खर्च में वृद्धि ६.५ प्रतिशत की दर से हुई है‚ जबकि केंद्र सरकार ने बजट में इस मद में ११७.६ प्रतिशत की बढ़ोतरी की है। आंकड़ों से साफ है‚ स्वास्थ्य सुविधाओं को हासिल करने के लिए राज्यों की केंद्र पर निर्भरता बहुत ज्यादा है। इधर‚ रिजर्व बैंक ने ‘राज्य वित्त–बजट २०२०–२१ का एक अध्ययन' में अनुमान लगाया है कि कुछ साल राज्यों के लिए चुनौतीपूर्ण रहेंगे। लहाजा‚ राज्यों को प्रभावी रणनीतियों की मदद से खुद को आÌथक रूप से सशक्त बनाना होगा। 


 (डॉ. घोष भारतीय स्टेट बैंक के ‘समूह मुख्य आÌथक सलाहकार' हैं। सतीश सिंह आÌथक मामलों के जानकार हैं)


सौजन्य - राष्ट्रीय सहारा।

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Friday, March 19, 2021

वझे को सरकार की शह! (राष्ट्रीय सहारा)

पूरे देश में महाराष्ट्र सरकार और मुंबई पुलिस चर्चा में है और जिस प्रकार की नकारात्मक चर्चा हो रही है वह मुंबई पुलिस की गौरवशाली परम्परा को कलंकित कर रही है। जिस मुंबई पुलिस की प्रशंसा सम्पूर्ण वि·ा में होती थी‚ उसके द्वारा इस प्रकार से कृत्य किए जाने पर लोग हैरान और परेशान हैं। ये बात सच है सभी क्षेत्रों में आपराधिक लोग रहते हैं और मुंबई पुलिस इससे अछूती नहीं है‚ लेकिन सरकार का काम रहता है उसको किस प्रकार से कंट्रोल किया जाए‚ लेकिन यह सरकार जब स्वयं अपराधियों को संरक्षण देकर अपराध को बढ़ावा दे रही है तो आम जनता तो अब भगवान भरोसे ही रहेगी। 


इससे पूर्व मुंबई पुलिस की साख पर बट्टा लगाने की घटनाएं हो चुकी हैं। जैसे कि दया नायक व रविंद्र आंग्रे जैसे एनकाउंटर स्पेशलिस्ट। लखन भैया फर्जी एनकाउंटर मामले में १३ पुलिसकÌमयों को कोर्ट ने आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। तेलगी स्टैम्प कांड में भी मुंबई पुलिस के कई आला अफसरों को जेल की हवा खानी पड़ी थी। तत्कालीन पुलिस के रंजीत शर्मा को जेल जाना पड़ा था। साथ में संयुक्त पुलिस आयुक्त श्रीधर वगल व पुलिस उपायुक्त प्रदीप सावंत को भी। किसी भी संस्था की पहचान अच्छी बिल्डिंग से नहीं अपितु वहां बैठे व्यक्ति से होती है। योग्यता और वरिष्ठता को जब आप दरकिनार करके एजेंडे के तहत लोगों को प्रमुख पद देंगे तो यह परिस्थिति उत्पन्न होगी ही। 


 मुंबई पुलिस में चर्चा है कि एक असिस्टेंट पुलिस इंस्पेक्टर को सरकार को इतना संरक्षण प्राप्त था कि बहुत सारे आईपीएस अधिकारी तथा सचिन वझे से सीनियर लोग उसे सर कहकर बोलते थे। कारण स्पष्ट था सचिन वझे के द्वारा ट्रांसफर–पोस्टिंग होती थी। सचिन वझे जिस क्राइम ब्रांच के इंटलीजेंस को हेड कर रहा था वह पद पुलिस इंस्पेक्टर का है‚ जिसे एक असिस्टेंट पुलिस इंस्पेक्टर हेड कर रहा था। कारण स्पष्ट है उस विभाग को सरकार ने वझे के द्वारा वसूली केंद्र बना रखा था। सचिन वझे एक समय शिवसेना पार्टी के प्रवक्ता रहे हैं तथा उनका पीछे का इतिहास भी अपराधियों जैसा रहा है। ख्वाजा यूनुस कांड को याद कीजिए। उस सचिन वझे के लिए भाजपा सरकार में शिव सेना नौकरी में वापस लाने के लिए उद्धव ठाकरे तत्कालीन मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस को फोन करके सिफारिश कर रहे थे‚ लेकिन देवेंद्र फड़नवीस का संकल्प था कि अपराधियों को सत्ता से दूर रखना जिसके तहत उन्होंने सचिन वझे को नौकरी में वापस नहीं लाया। अब जब स्वयं यह तीन पहियों की सरकार चल रही हो तो वझे की वापसी को कैसे रोका जा सकता है। वझे को लाकर वसूली केंद्र का प्रमुख व्यक्ति उसे नियुक्त कर दिया गया है। वझे की ताकत का आप इसी बात से अंदाजा निकाल सकते हैं‚ वझे मुख्यमंत्री से मीटिंग करते थे‚ गृह मंत्री से मीटिंग करते थे‚ पुलिस आयुक्त से मीटिंग की खबर बनती थी। जो लोग सरकारी व्यवस्था जानते हैं; उनको पता है सरकारी प्रोटोकाल क्या होता है‚ लेकिन महाराष्ट्र सरकार को प्रोटोकाल से क्या लेना देनाॽ ॥ महाराष्ट्र सरकार जिस प्रकार सचिन वझे के बचाव में उतरी थी‚ मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे कहते हैं सचिन वझे कोई ओसामा बिन लादेन नहीं है। इस तरह का बचाव करना कितना हास्यास्पद है तथा सरकार इस मामले में कितने गहरे तरीके से जुड़ी हुई है। यह मामला यदि एटीएस के पास रहता तो मनसुख हिरेन की हत्या को आत्महत्या सिद्ध करके मामले को रफा–दफा कर देते‚ लेकिन अन्याय के विरुûद्ध लड़ने वाले तथा महाराष्ट्र के हितों को सर्वोपरि रखने वाले देवेंद्र फड़नवीस ने यह मुद्दा इतना जोर से उठाया कि यह आम जनता का मुद्दा हो गया। मुंबई और महाराष्ट्र में रहने वाली आम जनता की प्रतिक्रिया है कि जब मुकेश अम्बानी के विरु द्ध इस प्रकार का षड्यंत्र सरकार से संरक्षण प्राप्त पुलिस अधिकारी कर सकता है तो आम जनता की रक्षा कैसे होगी‚ यह जो डर का माहौल बना हुआ उसका केवल एक मात्र उपाय योग्य लोगों का चुनाव करना ही है। 


 इस मामले की जांच एनआईए कर रही है। सचिन वझे गिरफ्तार भी हो चुके हैं। बहुत सारे राज खुलेंगे‚ संरक्षण देने वाले भी गिरफ्त में आएंगे ऐसी लोगों की आशा है। मुंबई पुलिस आयुक्त परमबीर सिंह का तबादला करके उनको डीजी होमगार्ड कर दिया गया। हेमंत नगराले मुंबई के नये पुलिस आयुक्त बनाए गए हैं। हेमंत नगराले ने चार्ज सम्भालते ही कहा मुंबई पुलिस की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगा है उसको बहाल करना चुनौती है। सवाल यह है जब तक सरकार माफियाओं को पालने की मानसिकता से नहीं निकलेंगी तब तक इस प्रकार की गतिविधियां चलती रहेंगी। राजनीति का अपराधिकरण होना अच्छा नहीं है‚ जब रक्षक ही भक्षक बन जाए तो प्रदेश किस तरफ जाएगा उसकी कल्पना नहीं की जा सकती। यह सरकार अपने वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के सम्मान की रक्षा करने में भी नाकामयाब रही है। तभी तो महाराष्ट्र की उद्धव ठाकरे सरकार से आईपीएस लॉबी बुरी तरह से नाराज हो गई है। वरिष्ठ आईपीएस संजय पांडे ने मुख्यमंत्री के नाम पत्र लिखकर कहा है कि उनके साथ अन्याय हुआ है। 


 पुलिस फोर्स में उनके कॅरियर को लेकर एक मजाक बना दिया गया है। सबसे वरिष्ठ अधिकारियों में से एक संजय पांडे को होमगार्ड डीजी के पद से हटाकर दूसरी जगह भेज दिया गया है। पांडे़ आरोप लगाते हैं कि ‘वझे पर निश्चित ही किसी का हाथ है। बिना किसी सीनियर के सपोर्ट के वह यह सब कैसे कर सकता हैॽ इसकी जांच होनी चाहिए वझे के पीछे कौन हैॽ उनको पकड़ना चाहिए। यूपीएससी के नियमों का महाराष्ट्र में किस तरह से मजाक बनाया जा रहा है‚ उसका नतीजा आज सबके सामने है। जिस तरह से जूनियर अधिकारियों को बड़ी पोस्ट मिलती है‚ उसी का नतीजा है कि सचिन वझे या एंटीलिया जैसे केस होते हैं।' पांडे़ कहते हैं मैं नाराज नहीं हुआ हूं बल्कि जुल्म हुआ है मेरे ऊपर। मैंने मुख्यमंत्री और गृह मंत्री को लिखा है। बहुत से लोग नाराज हैं। मैं किसी का नाम नहीं लूंगा। आज संकट के दौर में महाराष्ट्र खड़ा है तथा देवेंद्र फड़नवीस के सुशासन को याद कर रहा है। मुंबई पुलिस की इस दुर्दशा से अच्छे और ईमानदार अधिकारी बहुत ही मायूस दिख रहे हैं। 


राजनीति का अपराधिकरण होना अच्छा नहीं है‚ जब रक्षक ही भक्षक बन जाए तो प्रदेश किस तरफ जाएगा उसकी कल्पना नहीं की जा सकती। यह सरकार अपने वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के सम्मान की रक्षा करने में भी नाकामयाब रही है। तभी तो महाराष्ट्र की उद्धव ठाकरे सरकार से आईपीएस लॉबी बुरी तरह से नाराज हो गई है। वरिष्ठ आईपीएस संजय पांडे ने मुख्यमंत्री के नाम पत्र लिखकर कहा है कि उनके साथ अन्याय हुआ है॥


सौजन्य - राष्ट्रीय सहारा।

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Thursday, March 18, 2021

रेलवे में निजी पूंजी ( राष्ट्रीय सहारा)

रेल मंत्री पीयूष गोयल ने स्पष्ट किया है कि रेलवे का निजीकरण कभी नहीं होगा। यह सरकारी संपत्ति है‚ और इसे निजी हाथों में सौंपे जाने का सवाल ही पैदा नहीं होता। लोक सभा में वर्ष २०२१–२२ के लिए रेल मंत्रालय के नियंत्रणाधीन अनुदानों की मांगों पर चर्चा का जवाब देते हुए मंगलवार को रेल मंत्री ने यह आश्वासन दिया।


 उन्होंने सरकार पर निजीकरण और कॉरपोरेटाइजेशन को बढ़ावा  देने संबंधी आरोपों को दुर्भाग्यपूर्ण करार दिया। कहा कि सरकार और निजी क्षेत्र मिलकर काम करेंगे तभी हम देश का उज्ज्वल भविष्य बनाने में सफल हो सकेंगे। बेशक‚ रेल सेवा को बेहतर बनाने के लिए निजी निवेश को प्रोत्साहन देना भी जरूरी है। रेलवे को देश के विकास का इंजन माना जाता है। 


यह विभाग देश में सबसे बड़़ा रोजगार प्रदाता है‚ लेकिन इसकी सेवाओं को बेहतर किए जाने की गुंजाइश हमेशा बनी रही है। इसलिए जरूरी है कि रेलवे में महkवाकांक्षी योजनाओं को कार्यान्वित किया जाए। रेलवे स्टेशन विश्वस्तरीय हों। इस क्रम में देश के पचास स्टेशनों का मॉड़ल डि़जाइन तैयार किया गया है। स्टेशनों के प्रतीक्षालय नयनाभिराम बनें और स्टेशनों पर लिफ्ट और एस्केलेटर जैसी सुविधाएं मुहैया कराई जाएं तो यात्रियों के लिए सफर आनंदकारी अनुभव हो सकता है। रेलवे लाइनों के आसपास सौंदर्यीकरण किए जाने की बात भी जब–तब होती रही है। आने वाले समय में रेलवे को पूरी तरह रिन्यूएबल इनर्जी पर निर्भर कर दिया जाना है।


 साथही‚ २०२३ तक रेलवे शत–प्रतिशत विद्युतीकृत कर दी जाएगी। सरकार ने २०३० तक एक महkवाकांक्षी योजना को क्रियान्वित करने का मंसूबा बांधा है। इस सबके लिए खासे धन की जरूरत होगी। सो‚ रेलवे में निजी क्षेत्र का सहयोग लेने से इनकार नहीं किया जाना चाहिए। कहना न होगा कि रेलवे का कायाकल्प करने के प्रयास में निजी क्षेत्र आगे बढ़øकर सहयोग करता है‚ उससे निवेश मिलता है‚ तो यकीनन देश हित में होगा। इससे अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी। मालवाहक गाडि़यां चलें और निजी क्षेत्र इसमें निवेश करना चाहता है‚ तो इसमें आपत्ति नहीं होनी चाहिए। इस पूर्वाग्रह के चलते तो कतई नहीं कि निजी क्षेत्र सरकार के कल्याणकारी लIयों से इतर अधिक से अधिक लाभ–अर्जन के उद्देश्य से प्रेरित होता है। दरअसल‚ सरकारी संस्थानों में निजी पूंजी की भूमिका को स्वीकारने का माइंड़सेट बनने में अभी कुछ समय लगेगा। ॥

सौजन्य - राष्ट्रीय सहारा।

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Tuesday, March 16, 2021

फैसले का संदेश स्पष्ट (राष्ट्रीय सहारा)

बहुचर्चित और विवादित बाटला हाउस मुठभेड़ का फैसला आ गया है। दिल्ली के साकेत न्यायालय ने इंडियन मुजाहिदीन के आतंकवादी आरिज खान को दोषी करार देते हुए साफ लिखा है कि अभियोजन द्वारा पेश चश्मदीद गवाह‚ दस्तावेज एवं वैज्ञानिक सबूत आरिज पर लगे आरोपों को साबित करते हैं। इसमें संदेह की कहीं कोई गुंजाइश नहीं है। न्यायालय ने साफ लिखा है कि आरिज व उसके साथियों ने इंस्पेक्टर मोहन चंद शर्मा की हत्या की थी और पुलिसकÌमयों पर गोली चलाई थी। न्यायालय ने यह भी कहा है कि आरिज खान अपने चार साथियों मोहम्मद आतिफ अमीन‚ मोहम्मद साजिद‚ मोहम्मद सैफ एवं शहजाद अहमद के साथ बाटला हाउस में मौजूद था। 


 न्यायालय का फैसला उन लोगों को करारा प्रत्युत्तर है जो शहीद इंस्पेक्टर मोहन चंद शर्मा के बलिदान को कमतर करते हुए पूरे मामले को पुलिस द्वारा गढ़ा गया एवं मुठभेड़ को फर्जी करार देने का अभियान लगातार चलाए हुए थे। करीब साढ़े १२ वषाç बाद आया यह फैसला हम सबको उद्वेलित करने के लिए पर्याप्त है। वैसे २५ जुलाई २०१३ को न्यायालय ने शहजाद को आजीवन कारावास की सजा देकर बाटला हाउस मुठभेड़ को सही करार दिया था। बावजूद इसके शोर कम नहीं हुआ। याद करिए १३ सितम्बर २००८ को जब दिल्ली में करोल बाग‚ कनॉट प्लेस और ग्रेटर कैलाश में एक के बाद एक श्रृंखलाबद्ध धमाके हुए तो कैसी स्थिति बनी थीॽ उन धमाकों में ३० लोग मारे गए और १०० से अधिक घायल हुए थे। यह तो संयोग था कि पुलिस ने समय रहते कनॉट प्लेस के रीगल सिनेमा‚ इंडिया गेट एवं संसद मार्ग से चार बमों को धमाके से पहले बरामद कर नि्क्रिरय कर दिया था अन्यथा आतंकवादियों ने अपनी ओर से कोई कसर नहीं छोड़ी थी। 


पुलिस के आरोप पत्र और फैसले को देखें तो इसमें पूरी घटना का सिलसिलेवार वर्णन है। पुलिस की जांच से पता लग गया था कि इंडियन मुजाहिदीन या आईएम के आतंकवादियों ने इन घटनाओं को अंजाम दिया है और वे सभी बाटला हाउस के एल १८ स्थित फ्लैट नंबर १०८ में छिपे हैं। इंस्पेक्टर मोहन चंद शर्मा की टीम १९ सितम्बर २००८ की सुबह सादे कपड़ों में सेल्समैन बनकर आतंकियों को पकड़ने के लिए पहुंची। इन्होंने ज्यों ही दरवाजा खटखटाया अंदर से गोली चलनी शुरू हो गई। गोलीबारी में दो आतंकवादी आतिफ अमीन और मोहम्मद साजिद मारे गए‚ शहजाद अहमद और आरिज खान भाग निकलने में सफल हो गए‚ जबकि जीशान पकड़ में आ गया। मोहन चंद शर्मा वहीं शहीद हो गए थे। जैसे ही पुलिस ने लोगों की धरपकड़ शुरू की व्यापक विरोध शुरू हो गया‚ जिसमें राजनीतिक दल‚ एनजीओ‚ एक्टिविस्ट‚ जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय के छात्र संगठन–शिक्षक संगठन शामिल थे। जो मोहन चंद शर्मा बहादुरी से लड़ते हुए हमारी आपकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए बलिदान हो गए उनको ही दोषी और अपराधी साबित किया जाने लगा। यह भी आरोप लगा कि पुलिस वालों ने ही उनको गोली मार दी। हालांकि ये लोग भी नहीं बता सके कि आखिर आरिज खान है कहांॽ 


 दिल्ली विस्फोट एक व्यापक साजिश का हिस्सा था। सोचिए‚ ये कितने शातिर थे और हिंसा और खून से राजधानी को दहलाने का उन्माद कितना गहरा था। यह भी ध्यान रखने की बात है कि आरिज खान एवं कुरैशी को उनके किसी रिश्तेदार ने शरण नहीं दी। दोनों भागते फिर रहे थे। वे नेपाल गए जहां उन्होंने जाली दस्तावेजों से नेपाल की नागरिकता प्राप्त की तथा वहां के एक युवक निजाम खान के सहयोग से किराए पर घर ले लिया। उन्होंने वहां मतदाता पहचान पत्र एवं पासपोर्ट भी बनवा लिये तथा नेपाल की एक युवती से शादी भी कर ली। इस तरह के आतंकवादियों के पक्ष में अगर देश के बड़े लोग खड़े हो जाएं तो इससे दुर्भाग्यपूर्ण कुछ नहीं हो सकता। आज इनके पक्ष में आवाज उठाने वालों से देश चाहेगा कि वे सामने आएं और बताएं कि न्यायालय के फैसले के बाद उनका क्या कहना है। दिल्ली पुलिस की जगह न्यायिक जांच की मांग की जा रही थी। मामले को दिल्ली उच्च न्यायालय और सर्वोच्च अदालत तक ले जाया गया। इनकी अपील पर दिल्ली उच्च न्यायालय ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को दो महीने के भीतर मामले की जांच पूरी करने को कहा था। आयोग ने दिल्ली पुलिस को क्लीन चिट देते हुए मुठभेड़ को वास्तविक माना। इसके बाद न्यायिक जांच की मांग खारिज कर दी गई। 


 इस फैसले को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी गई। वहां मामला खारिज हो गया। कोई यह नहीं कह सकता कि इस मामले की कानूनी लड़ाई में आरोपितों की ओर से कहीं भी कोई कमी रही। सच तो यह है कि न्यायालय में जितना संभव था वकीलों ने दोषियों को बचाने के लिए पूरी ताकत लगा दी। आरिज की तरफ से पेश अधिवक्ता ने कहा कि यह स्पष्ट नहीं है कि इंस्पेक्टर शर्मा को कौन सी गोली लगी हैॽ घटनास्थल से आरिज की तस्वीरें‚ उसके शैक्षणिक प्रमाण पत्र आदि की बरामदगी को भी चुनौती दी गई‚ लेकिन यह नहीं बता सके कि आखिर पुलिस को ये सब मिला कहां सेॽ इंस्पेक्टर शर्मा के गोली लगने के स्थान‚ उनके सुराख पर भी प्रश्न उठाए गए। अंततः साबित हुआ कि उनको लगी गोली से बने घाव उनके कपड़े पर हुए सुराख से मेल खाते हैं तथा गिरे आंसू उनके घाव को दर्शाते हैं। 


 वैसे फैसला आने के पहले ही दिल्ली पुलिस के एक अधिकारी करनैल सिंह ने‚ जो उस समय विशेष शाखा के प्रमुख थे ‘बाटला हाउस एनकाउंटर दैट शूक द नेशन' नामक पुस्तक में इस बात का सिलसिलेवार और विस्तार से जिक्र किया कि किस तरह से दिल्ली धमाकों के सिलसिले में विशेष शाखा को बाटला हाउस में आतंकवादियों के छिपे होने का पता चला था‚ कैसे कार्रवाई हुई और कैसे एक सही मुठभेड़ को फर्जी करार देने की कोशिश हो रही है। वास्तव में दिल्ली एवं देश के आम लोगों को पुलिस की जांच पर कोई संदेह नहीं था‚ लेकिन उस वर्ग ने इसे संदेहास्पद बना दिया‚ जो प्रायः आतंकवादी घटनाओं को संदेह के घेरे में लाता है‚ पकड़े गए संदिग्ध आतंकवादियों को मासूम बताने के लिए बनावटी तथ्यों और तर्कों का जाल बुनता है तथा पुलिस एवं सरकारों को कठघरे में खड़ा करता है। अभी मामला ऊपर के न्यायालयों में जाएगा। वर्तमान फैसले के आलोक में ऐसे लोगों से फिर निवेदन किया जा सकता है कि सुरक्षा के मामले में राजनीति और तथाकथित विचारधारा के नाम पर इस तरह का वितंडा आत्मघाती हो सकता है।

सौजन्य - राष्ट्रीय सहारा।

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Saturday, March 13, 2021

दागी पुलिसकर्मी पर मेहरबानी क्योंॽ (राष्ट्रीय सहारा)

आचार्य पवन त्रिपाठी


बई पुलिस का नाम पूरे देश में सम्मान के साथ लिया जाता है। एक समय ऐसा भी था कि मुंबई पुलिस को अपराध अन्वेषण के मामले में इंग्लैैंड की स्कॉटलैंड यार्ड के बाद दूसरे नम्बर पर माना जाता था पर आज या कहें कि पिछले कुछ सालों से मुंबई पुलिस को अनेक आरोप और कलंक भी झेलने पड़े हैं। एक बात ध्यान में रखें कि जहां धुआं रहता है वहीं आग भी होती है। इसलिए अंबानी के आवास के पास जिलेटिन मिली गाड़ी के मामले में सचिन वझे के ऊपर जो आरोप लगे हैं‚ उनमें जरूर कुछ सच्चाई है।


 एक बात यह भी है कि महाराष्ट्र कैडर पाकर पुलिस अधिकारी स्वयं को गौरवान्वित महसूस करते हैं‚ लेकिन आज मुंबई सहित महाराष्ट्र में जो हो रहा है‚ वे न सिर्फ पुलिस को कलंकित कर रहे हैं‚ बल्कि आम लोगों का भी प्रशासन से भरोसा उठता जा रहा है। यह स्थिति बहुत ही चिंताजनक है। नवम्बर‚ २०१९ में जब से महाराष्ट्र में तीन पहियों वाली सरकार बनी है‚ तब से सारे हालात तेजी से बदल गए हैं। इस बेमेल सरकार पर किसी व्यक्ति का नियंत्रण नहीं है। यह विसंगतियों वाला गठबंधन है‚ जो केवल स्वार्थवश बना है तो स्वाभाविक है कि हालात भी काबू के बाहर जाएंगे। कोरोना जहां देश भर में कम हो रहा वहीं मुंबई समेत महाराष्ट्र में इसका कहर जारी है‚ महाराष्ट्र में इसकी स्थिति काफी चिंताजनक है। कोरोना के समय जब मुंबइकर को सत्ता के सहयोग की आवश्यकता थी तो मुख्यमंत्री समेत पूरा मंत्रिमंडल क्वारंटीन हो गया था। उस समय विरोधी पक्ष नेता देवेंद्र फड़नवीस संपूर्ण महाराष्ट्र का दौरा कर सहायता पहुंचवाने का कार्य लगातार कर रहे थे‚ मुख्यमंत्री को पता है कि महाराष्ट्र की जनता ने जनादेश देवेंद्र फड़नवीस को मुख्यमंत्री बनाने के लिए दिया था‚ तो जनता के प्रति जिम्मेदारी भी उन्हीं की है।


 केंद्र सरकार द्वारा कोरोना से निपटने के लिए जो भी सहायता आई उसका भी वितरण महाराष्ट्र सरकार ने उचित तरीके से न करके जनता को उसके हाल पर छोड़ दिया। पालघर में जिस तरह पुलिस की उपस्थिति में साधु/संतों की बेरहमी से पीटकर हत्या कर दी गई‚ उसको देखकर संपूर्ण देश का हिंदू समाज बहुत ही आहत और आक्रोशित हुआ‚ लेकिन सरकार के कान पर जूं तक नहीं रेंगी। पालघर की घटना ने महाराष्ट्र सरकार और पुलिस को कठघरे में खड़ा कर दिया‚ लेकिन सरकार के ऊपर कोई फर्क नहीं पड़ा। वर्तमान महाराष्ट्र सरकार जिनके कंट्रोल में है‚ वे शरद पवार हिंदू आतंकवाद भगवा आतंकवाद की थ्योरी बनाने वालों में से प्रमुख सदस्य थे‚ इसी महाराष्ट्र सरकार के मंत्री विजय वडेटीवार कहते हैं कि साधु–संत नालायक होते हैं। इस तरह की मानसिकता वाले लोग सरकार चलाएंगे तो स्वाभाविक है कि साधु/संतों पर इस तरह की अमानवीय घटनाए होंगी। महाराष्ट्र सरकार ने रेस्टोरेंट‚ दारू की दुकानें तो खोल दी थीं‚ लेकिन मंदिर खोलने से परहेज था। यह आस्था का सबसे बड़ा मजाक है। भाजपा के लंबे आंदोलन के बाद सरकार को मंदिर खोलने पर मजबूर होना पड़ा। सुशांत सिंह राजपूत की घटना हो या कंगना के साथ किए गए दुर्व्यवहार की घटना‚ इन सभी मामलों में सरकार की भूमिका पर संदेह हुआ।


 वर्तमान में महाराष्ट्र सरकार और पुलिस जिस कारण चर्चा में है‚ वह भी दुर्भाग्यपूर्ण है। मामला है मुकेश अम्बानी के मुंबई स्थित आवास अंटीलिया के बाहर स्काÌपयो में विस्फोटक सामग्री का मिलना। यह सब घटनाक्रम जिस तरीके से हुआ उस पर प्रश्न चिह्न लगना स्वाभाविक है। विस्फोटक मिलने के बाद जिस तरह से घटनाएंं हो रही हैं; चाहे रहस्यमय तरीके से मनसुख हिरेन का शव मिलना हो या पुलिस अधिकारी सचिन वझे का घटना स्थल पर इतना जल्दी पहुंचना हो। मनसुख हिरेन की पत्नी के अनुसार हिरेन की स्काÌपयो सचिन वझे लगातार अपने प्रयोग में लाते थे। उसी स्काÌपयो से विस्फोटक सामग्री भी बरामद हुई। मनसुख हिरेन की रहस्यमय मृत्यु से पूर्व उनको पूछताछ के लिए पुलिस ने बुलाया भी था तथा सचिन वझे लगातार हिरेन के संपर्क में थे। हिरेन की पत्नी के अनुसार हिरेन अपनी पत्नी को बता रहे थे कि ये लोग मुझे फंसा देंगे। आखिर कौन सा रहस्य मनसुख हिरेन जानते थे‚ जिसको खोलने पर बड़ा विस्फोट होता जिसके कारण उनको जान तक गंवानी पड़ी। महाराष्ट्र विधानसभा का सत्र भी हो गया। इस घटना को लेकर महाराष्ट्र भर में आक्रोश है। सबकी इच्छा है कि इस मामले में दूध का दूध पानी का पानी होना चाहिए‚ विरोधी पक्ष नेता देवेंद्र फड़नवीस ने इस मुद्दे को बहुत ही जोरदार और आक्रामक तरीके से विधानसभा में उठाया और इस प्रकरण में दोषी दिख रहे सचिन वझे को निलम्बित करके गिरपतारी की मांग की। पर सरकार ने क्या किया। सचिन वझे का सिर्फ तबादला करके ही अपने कर्त्तव्य की इतिश्री समझ ली। महाराष्ट्र सरकार जिस तरह से सचिन वझे को बचा रही है‚ उससे जनता में संदेश जा रहा है कि वझे सरकार का क्या रहस्य जानता है‚ जिसको छुपाने के लिए उसे बचाया जा रहा है। देवेंद्र फड़नवीस ने विधानसभा में धनंजय गावडे का जिक्र किया जिस पर बहुत सारे आपराधिक मामले भी दर्ज हैं तथा सचिन वझे और धनंजय गावडे एक साथ चालीस लाख रुûपये की जबरन वसूली के मामले में अभियुक्त हैं तथा अभी जमानत पर बाहर हैं।


 देवेंद्र फड़नवीस ने हिरेन की पत्नी के बयान का जिक्र करते हुए विधानसभा में कहा कि हिरेन की अंतिम लोकेशन धनंजय गावड़े के पास बताई गई है‚ यह पूरा मामला बहुत ही संदिग्ध है। महाराष्ट्र एटीएस ने मनसुख हिरेन के केस को हत्या का मुकदमा दर्ज करके मामले की जांच प्रारंभ कर दी है। वहीं केंद्रीय एजेंसी एनआईए ने विस्फोटक सामग्री मिलने तथा उसके अन्य पहलुओं पर अपनी जांच प्रारंभ कर दी है। विरोधी पक्ष नेता देवेंद्र फड़नवीस जिस तरीके से आक्रामक होकर यह सब विषय उठा रहे हैं‚ उससे महाराष्ट्र की जनता को संपूर्ण विश्वास है कि किसी भी अपराधी को महाराष्ट्र सरकार बचा नहीं पाएगी। आज नहीं तो कल फैसला हो कर रहेगा। 


 (ये लेखक के निजी विचार हैं)

सौजन्य - राष्ट्रीय सहारा।

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Friday, March 12, 2021

अब तो बंद हो विभेद ( राष्ट्रीय सहारा)

संविधान निर्माता डॉ. अंबेडकर ने कहा था कि कोई भी समाज तब तक विकसित नहीं हो सकता है जब तक कि समाज के हर क्षेत्र में महिलाओं की समान भागीदारी न हो जाए। यही वजह रही कि डॉ. अंबेडकर ने मौलिक अधिकारों को संविधान की धारा १४ से लेकर धारा १८ तक में परिभाषित करते हुए लैंगिक विभेद को भेद माना और इसके लिए प्रावधान किया कि राज्य किसी भी नागरिक‚ फिर चाहे वह स्त्री ही क्यों न हो‚के समान अधिकार सुनिश्चित करे।


 खैर‚ यह संविधान की बात है। हकीकत कुछ और ही है। महिलाओं की भागीदारी लगभग हर क्षेत्र में पुरु षों की तुलना में बहुत कम है। फिर चाहे वह शासन–प्रशासन का मामला ही क्यों न हो। बीते ८ मार्च‚ २०२१ को पूरे विश्व में अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की धूम रही। भारत में भी इसे महkवपूर्ण उत्सव के रूप में मनाया गया। यहां तक कि संसद में भी महिलाओं को विशेष अवसर दिए गए। देश के विभिन्न राज्यों की विधानसभाओं में महिलाओं को सदन के संचालन की जिम्मेदारी तक दी गई। यह सब इसलिए किया गया ताकि महिलाओं को सशक्त बनाया जा सके लेकिन आश्चर्यजनक यह कि इस साल भी कहीं भी किसी ने भी संसद में महिलाओं के लिए ३३ फीसदी आरक्षण का मामला नहीं उठाया। न तो विपक्षी राजनीतिक दलों के द्वारा और ना ही सत्ता पक्ष के द्वारा। यहां तक कि जिन राज्यों के विधानसभाओं में सदन का संचालन महिला सदस्यों द्वारा किया गया‚ वहां भी इस मुद्दे पर कोई बात नहीं हुई। 


 यह वाकई आश्चर्यजनक है कि एक समय सबसे महkवपूर्ण लगने वाला महिला आरक्षण का मुद्दा ठंडे बस्ते में इस तरह क्यों पड़ा है कि अब कोई नाम तक नहीं लेना चाहताॽ इसी सवाल पर विचार करते हैं‚ लेकिन इससे पहले जान लें कि वर्तमान लोक सभा में कुल ५४३ सांसदों में ७८ महिला सांसद हैं‚ और आजादी के बाद से यह अधिकतम आंकड़ा (करीब १४ फीसदी) है। वहीं‚ राज्य सभा में महिला सांसदों की संख्या २५ है। ध्यातव्य है कि लोक सभा में महिला सांसदों की हिस्सेदारी घटती–बढ़ती रहती है‚ लेकिन राज्य सभा में महिलाएं आजादी के साथ ही पिछड़ गइÈ। मतलब यह कि वर्ष १९५२ से लेकर अब तक कुल २०८ महिला सांसद निर्वाचित अथवा मनोनीत हुई हैं। इनमें उन प्रतिनिधियों के दूसरे अथवा तीसरे कार्यकाल भी शामिल हैं‚ जो एक बार से अधिक सदस्य बनीं। ये आंकड़े बताते हैं कि कैसे संसद में महिलाओं की भागीदारी एक तिहाई के आधे से भी कम रही है। गौरतलब है कि वर्ष १९७४ में पहली बार संसद में महिलाओं की हिस्सेदारी का सवाल उठा था। तब सत्तासीन रहीं इंदिरा गांधी ने यह पहल की। लेकिन आपातकाल के कारण मामला ठंडे बस्ते में चला गया। फिर १९९३ में यह सवाल मुखर हुआ और इस बार एक ठोस पहल की गई। संविधान के ७३वें और ७४वें संशोधन के तहत पंचायतों तथा न्यायपालिका में एक तिहाई आरक्षण का कानून बनाया गया‚ लेकिन इसका संबंध संसद और विधानसभाओं में आरक्षण से नहीं था। संसद में महिलाओं को एक तिहाई आरक्षण मिले‚ इस दिशा में पहली बार ठोस पहल करने का श्रेय पूर्व प्रधानमंत्री एच. डी. देवगौड़ा को जाता है। उनकी सरकार ने १२ सितम्बर‚ १९९६ को ८१वां संशोधन विधेयक लोक सभा में प्रस्तुत किया। इसके तहत महिलाओं को ३३ फीसदी आरक्षण देने की बात थी परंतु सरकार अल्पमत में आ गई और सरकार गिर गई।


 दरअसल‚ तब यह मामला उठा कि आरक्षण के अंदर आरक्षण हो। मतलब यह कि जिस तरह से ४९.५ फीसदी आरक्षण सरकारी सेवाओं में आरक्षित वर्गों को देय है‚ उसी हिसाब से संसद के अंदर भी हो। लेकिन तब कांग्रेस‚ भाजपा‚ वाम दल आदि इसके लिए तैयार नहीं हुए जबकि आरक्षण की राजनीति करने वाली पाÌटयां अड़ी रहीं। परंतु बाद की सरकारों ने भी अपना प्रयास जारी रखा। मसलन‚ २६ जून‚ १९९८ को वाजपेयी सरकार ने बिल लोक सभा में पेश किया। लेकिन सरकार इसे पारित नहीं करवा सकी और अल्पमत में आ गई। इसी प्रकार २२ नवम्बर‚ १९९९ को फिर से बिल लोक सभा में पेश किया गया और हश्र पूर्व की तरह ही हुआ। बाद में वर्ष २००२ और २००३ में भी वाजपेयी सरकार द्वारा विधेयक पेश किया गया लेकिन सरकार को असफलता हाथ लगी। फिर वर्ष २००४ का साल आया और कांग्रेस–नीत सरकार अस्तित्व में आई‚ जिसने अपने घोषणापत्र में महिलाओं के लिए संसद में ३३ फीसदी आरक्षण का वादा किया था। यूपीए सरकार को अपना वादा ६ मई‚ २००८ को याद आया और उसने एक विधेयक राज्य सभा में पेश किया। तब हंगामा हुआ और विधेयक को कानून एवं न्याय संबंधी स्थायी समिति के पास भेज दिया गया। फिर १७ दिसम्बर‚ २००९ को स्थायी समिति ने अपनी रिपोर्ट सदन में रखी‚ जिसका जदयू‚ राजद‚ सपा द्वारा यह कहकर विरोध किया गया कि सरकार पहले आरक्षित वर्गों की महिलाओं के लिए पृथक आरक्षण का विधेयक लाए। इस दिशा में अंतिम पहल ८ मार्च‚ २०१० को की गई जब मनमोहन सिंह सरकार द्वारा एक बिल राज्य सभा में पेश किया गया। तब भाजपा और वाम दल एक साथ इस मुद्दे पर आए लेकिन सरकार में शामिल राजद द्वारा इसका विरोध किया गया परंतु उसके विरोध के बावजूद ९ मार्च को बिल भारी बहुमत से पारित कराया गया। तब ऐसा लगने लगा था कि लोक सभा में सरकार इसे जल्द ही पारित करा लेगी और संसद में महिलाओं को एक तिहाई हिस्सेदारी मिलने लगेगी लेकिन तब से यह मामला ठंडे बस्ते में पड़ा है।


 अब इसकी सुध न तो भाजपा के नेताओं द्वारा ली जा रही है‚ और ना ही विपक्ष के द्वारा। ऐसे में सवाल उठता है कि यदि किसी राजनीतिक दल को इसके स्वरूप पर विरोध था तो यह मुमकिन था कि उसके लिए राह तलाशी जा सकती थी। लेकिन कहीं कोशिश नहीं की जा रही है। बहरहाल‚ मौजूदा केंद्र सरकार के पास राज्य सभा और लोक सभा‚ दोनों में स्पष्ट बहुमत है‚ और यदि वह चाहे तो महिलाओं के लिए ३३ फीसदी आरक्षण के लिए विधेयक आसानी से पारित कराया जा सकता है। लेकिन सरकार इस दिशा में सोच ही नहीं रही है। यह देश की आधी आबादी के साथ अन्याय नहीं तो क्या हैॽ॥ महिला आरक्षण के मुद्दे की सुध न तो भाजपा के नेताओं द्वारा ली जा रही है‚ और न ही विपक्ष के द्वारा। सवाल है कि किसी राजनीतिक दल को इसके स्वरूप पर विरोध है‚ तो उसके लिए राह क्यों नहीं तलाशी जाती। लेकिन कोशिश नहीं हो रही। मौजूदा सरकार के पास राज्य सभा और लोक सभा‚ दोनों सदनों में बहुमत है‚ और वह चाहे तो महिलाओं के लिए ३३ फीसदी आरक्षण का विधेयक पारित कराया जा सकता है ।

सौजन्य - राष्ट्रीय सहारा।

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