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Editorials : BECA समझौताः अमेरिका से दोस्ती

आखिरकार भारत और अमेरिका के बीच उस बेसिक एक्सचेंज एंड कोऑपरेशन एग्रीमेंट (बेका) पर समझौता हो गया जिस पर बरसों से काम चल रहा था। यह दोनों देशों के बीच सामरिक सहयोग बढ़ाने की समझ के तहत किया जाने वाला चौथा समझौता है। इससे पहले दोनों देश 2002 में जनरल सिक्यॉरिटी ऑफ मिलिट्री इनफॉर्मेशन एग्रीमेंट, 2016 में लॉजिस्टिक्स एक्सचेंज मेमोरैंडम ऑफ एग्रीमेंट और 2018 में कॉम्पैटिबिलिटी एंड सिक्यॉरिटी एग्रीमेंट पर दस्तखत कर चुके हैं। माना जा रहा है कि

बेका समझौता दोनों देशों के बीच रक्षा और भू-राजनीति के क्षेत्र में सहयोग और तालमेल को पूर्णता प्रदान करने वाला है। हालांकि अमेरिका जैसी सुपरपावर के साथ रक्षा सहयोग बढ़ाने की बात जब भी उठती है तब उसके साथ कई तरह की आशंकाएं भी जुड़ी होती हैं। इसी बेका समझौते को लेकर जब बातचीत शुरू हुई तो तत्कालीन यूपीए सरकार ने कई तरह की चिंताएं जाहिर की थीं। समझौते के इस बिंदु तक पहुंचने में अगर इतना वक्त लगा तो उसका कारण यह था कि लंबी बातचीत के जरिए दोनों पक्षों ने एक-दूसरे की आशंकाओं को दूर करने के रास्ते खोजे और फिर सहमति को पक्का किया।

बहरहाल, इस समझौते के बाद अब भारत को अमेरिकी सैन्य उपग्रहों द्वारा जुटाई जानी वाली संवेदनशील सूचनाएं और चित्र रियल टाइम बेसिस पर उपलब्ध हो सकेंगे। अमेरिका वैसे महत्वपूर्ण आंकड़े, मैप आदि भी भारत के साथ शेयर कर सकेगा जिनके आधार पर अपने सामरिक लक्ष्य पूरी सटीकता से हासिल करना भारत के लिए आसान हो जाएगा। खासकर दो पड़ोसी राष्ट्रों के साथ मौजूदा तनावपूर्ण रिश्तों के संदर्भ में देखें तो यह समझौता विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो जाता है। लेकिन ऐसे समझौते तात्कालिक संदर्भों तक सीमित नहीं होते। न ही ये एकतरफा तौर पर फायदेमंद होते हैं। ध्यान रहे, यह समझौता ऐसे समय हुआ है जब अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव अपने अंतिम दौर में है। दो देशों के बीच कोई समझौता यूं भी किसी खास सरकार का मामला नहीं होता, लेकिन अमेरिकी आम चुनाव की मतदान तिथि से ऐन पहले हुआ यह समझौता इस बात को भी रेखांकित करता है कि दोनों देशों के संबंध अब खास नेताओं के बीच की पर्सनल केमिस्ट्री पर निर्भर नहीं रह गए हैं। यह दोनों देशों के बीच बढ़ते सहयोग और बेहतर होते तालमेल का ठोस संकेत है। किसी भी अन्य रिश्ते की तरह यह नजदीकी भी दोनों देशों को लाभ पहुंचा रही है। सिर्फ रक्षा क्षेत्र की बात करें तो भारत-अमेरिका सहयोग बढ़ना शुरू होने के बाद से, यानी 2007 से अब तक अमेरिकी कंपनियां भारत को 21 अरब डॉलर से ज्यादा के हथियार बेच चुकी हैं। बदली परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए दोनों देशों के रिश्तों में बढ़ता तालमेल न केवल भारत और अमेरिका के राष्ट्रीय हितों की दृष्टि से बल्कि विश्व शांति और क्षेत्रीय संतुलन के लिए भी उपयोगी है।


सौजन्य - NBT।

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Editorials : राहत की बात

भारत को कोरोना विषाणु महमाारी के विरुद्ध लड़़ाई के हर क्षेत्र में सफलता मिल रही है। निश्चित तौर पर इसका श्रेय अस्पतालों में भर्ती मरीजों की देखभाल करने वाले चिकित्साकर्मियों सहित महामारी के चिकित्सकीय प्रबंधन करने में शामिल केंद्र और राज्यों के बीच बेहतर तालमेल को दिया जाना चाहिए। 


इसी बेहतर तालमेल का मिलाजुला परिणाम यह है कि अक्टूबर के इस महीने में बीते सोमवार को दूसरी बार २४ घंटे के भीतर ५० हजार से कम नये मामले सामने आए। पिछले आठ महीने के बाद मृत्यु दर भी घटकर ८.५ फीसद पर आ गई है। साढ़े  तीन महीने बाद एक दिन में महामारी से होने वाली मौतों का मामला भी ५०० से नीचे आ गया है। 


प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी समय–समय पर राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ महामारी की समीक्षा करते रहे हैं और संबंधित एजेंसियों को निर्देश भी जारी करते रहे हैं। उन्होंने देश के नागरिकों को कई बार सावधान भी किया है। त्योहारों से पहले पिछले मंगलवार को उन्होंने देशवासियों को सावधान किया था कि लॉकड़ाउन भले हट गया है‚ लेकिन कोरोना का वायरस नहीं गया है। उन्होंने नारा भी दिया कि‚ ‘जब तक दवाई नहीं‚ तब तक ढिलाई नहीं।' प्रधानमंत्री की चेतावनियों का नागरिकों के साथ–साथ महामारी की रोकथाम में जुटे लोगों पर भी पड़़ रहा है।


 पिछले दिनों प्रधानमंत्री कार्यालय ने संकेत दिया था कि अगले वर्ष फरवरी–मार्च तक महामारी का टीका भी बाजार में उपलब्ध हो जाएगा। इन दिनों केंद्र सरकार टीके के समुचित वितरण की तैयारियों में जुट गई है। केंद्रीय मंत्री प्रताप चंद्र सारंगी ने कहा है कि केंद्र सरकार ने हर नागरिक को कोरोना का टीका प्रदान करने के लिए ५० हजार करोड़़ रुûपये की व्यवस्था की है। देश के सभी नागरिकों को मुफ्त में टीका दिया जाएगा। यह खबर सभी देशवासियों के लिए राहत भरी है। क्योंकि पिछले दिनों बिहार विधानसभा चुनाव के घोषणा पत्र में भाजपा ने सूबे के हर व्यक्ति को मुफ्त में कोरोना का टीका देने का वादा किया है। 


उसके बाद यह विवाद का विषय बन गया था। शायद इसीलिए केंद्रीय मंत्री प्रताप चंद्रको यह कहना पड़़ा है कि हर देशवासियों को मुफ्त में टीका दिया जाएगा। जाहिर है जब कोरोना का टीका का फासला बहुत कम रह गया है तो हमें पहले से और ज्यादा सतर्क रहने की जरूरत है। क्योंकि किसी एक व्यक्ति की मौत भी उसके परिवार‚ देश और समाज के लिए भारी पड़़ रही है। 


सौजन्य - राष्ट्रीय सहारा।

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Editorials : क्लाइमेट पॉलिसी वक्त की मांग

एक समय था जब यह माना जाता था कि दुनिया खत्म होगी आणविक युद्ध के माध्यम से। जब शीत युद्ध का माहौल था‚ लेकिन अब यह दुनिया अपनी विलासिता और मूर्खता के कारण तबाह होगी‚ जिसके लक्षण दिखाई भी दे रहे हैं। भूराजनीतिक वर्चस्व आज भी विदेश नीति की धार बना हुआ है। चीन की बेपनाह शक्ति प्रदर्शन और शीर्ष पर पहुंचने की बेताबी ने दुनिया को एक ऐसे मोड़ पर ला खड़ा किया है‚ जहां से तबाही का मंजर हर किसी को नजर आ रहा है। अमेरिका अपनी जिद पर अड़ा हुआ है कि वह ग्रीन एनर्जी की प्राथमिकता को स्वीकार कर दोयम दरजे की शक्ति नहीं बनना चाहता। इसलिए अमेरिकी राष्ट्रपति ने पेरिस समझौते से हाथ खींच लिया था। अगर कार्बन जनित ऊर्जा की बात करें तो चीन इसमें सबसे अव्वल है‚ उसका कार्बन एमिशन (उत्सर्जन) भी सबसे ज्यादा है। 

अमेरिका और चीन मिलकर तकरीबन ४० प्रतिशत से ज्यादा गंदगी वायुमंडल में फैलाते हैं। अगर उसमें यूरोपीय देशो को शामिल कर लिया जाए तो यह औसत ७५ प्रतिशत के ऊपर चला जाता है। मालूम है कि १७ शताब्दी के उतरार्द्ध से लेकर अभी तक वायुमंडल का तापमान १।१ सेंटीग्रेड बढ़ चुका है। इसके लिए मुख्यतः दोषी यूरोपीय औद्यौगिक देश और अमेरिका है‚ जिनके कारण पिछले २०० वर्षो में पृथ्वी का तापमान इस हालत में पहुंच चुका है कि समुद्री तट पर स्थित देश जलमग्न होने से आक्रांत है। इसमें भारत के भी कई शहर हैं। छोटे–छोटे देशों ने परम्परागत ऊर्जा के साधन जैसे कोयला‚ डीजल और पेट्रोल से हाय तौबा कर लिया है‚ लेकिन उनके आकार इतने छोटे हैं कि समस्या का समाधान नहीं हो सकता। 


 यूरोपीय देशों में भी ग्रीन इÈधन की ललक बढ़ी है। उनका भी दायरा छोटा है। प्रश्न उठता है कि क्या चीन‚ अमेरिका और दर्जनों मध्यम दरजे की शक्तियां अपनी विदेश नीति को सीधे क्लाइमेट पालिसी (जलवायु नीति) बनाने के लिए तैयार है कि नहींॽ अगर नहीं तो दुनिया की समाप्ति भी सुनिश्चित है। तीन महkवपूर्ण प्रश्न हैं‚ जिसका विश्लेषण जरूरी है। पहला‚ भारत के लिए हरित ऊर्जा एक विकल्प नहीं बल्कि जरूरत है। दरअसल‚ यह जरूरत केवल भारत की नहीं बल्कि पूरे विश्व की है। १९९२ में सम्पन्न ‘रियो सम्मलेन' से लेकर २०१५ के बीच कई अंतरराष्ट्रीय सम्मलेन सयुक्त राष्ट्र संघ के तत्वावधान में संपन्न हुए। हर बार चेतावनी दी गई। चेतावनी का वैज्ञानिक आधार था। ब्यूनर्स आयर्स में १९९८ में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में वैज्ञानिकों ने कहा था कि अगर २०२० तक फॉसिल फ्यूल एनर्जी को बुनियादी रूप से कम नहीं किया गया तो २०२० में आपातकालीन स्तिथि पैदा हो सकती है‚ जिसका अंदाजा किसी को भी नहीं होगा। २०२० में कोरोना की अद्भुत महामारी से दुनिया सिकुड़ कर घरों में बंद हो गई। न्यूयार्क और पेरिस जैसे शहर जो कभी बंद नहीं होते थे‚ सन्नाटा पसर गया। २०१५ के पेरिस मीटिंग में चेतावनी एक सच्चाई बन गई। कहा गया कि २०५० तक अगर कार्बन मुक्त ऊर्जा का बंदोबस्त दुनिया के बड़े और विकसित देश नहीं कर लेते तो मानवता हर तरीके से खतरे में है। विश्व को तबाह करने के लिए आणविक युद्ध की जरूरत नहीं पड़ेगी। दुनिया अपने कर्मों के भार से समाप्त हो जाएगा। 


आश्चर्य इस बात का है कि इतना सब कुछ होने के बाद भी दुनिया के पुरोधा इस बात को समझने की कोशिश नहीं कर रहे हैं। जिस डाली पर बैठे हैं उसी डाली को काटने की मूर्खता कर रहे हैं। दुनिया के वैज्ञानिक मानते हैं कि वातावरण के गर्म होने का खमियाजा पूरी दुनिया के लिए मुसीबत है‚ लेकिन भारत और भारत के पडÃोसी देशों के लिए संकट ज्यादा तीखा और बहुरंगी है। चूंकि भारत सहित भारत के पडÃोसी देश ट्रॉपिकल जोन में आते हैं। घनीभूत आबादी है। आÌथक व्यवस्था कमजोर है। विकास की गति को भी बढ़ाना है। इसलिए भारत सहित पूरे दक्षिण एशिया के देशों में हरित ऊर्जा के अलावा और कोई विकल्प शेष नहीं है। दरअसल‚ सुखद आश्चर्य यह है कि भारत की वर्तमान सरकार हरित ऊर्जा को बहाल करने की जुगत में जुट गई है। यह कागजों से उतरकर जमीनी स्तर पर दिखाई भी देने लगा है॥। भारत में ऊर्जा का मुख्य उपयोग के कई खंड है‚ सबसे बड़ा ढांचा बिजली उत्पादन का है‚ जिसके सहारे अन्य व्यवस्थाएं चलती है। दूसरा परिवहन का है‚ जिसमें रेल और रोड ट्रांसपोर्ट के साथ कार्गो और हवाई जहाज आते हैं। तीसरा फैक्टरी का है‚ जिसमें मूलतः लोहा और सीमेंट फैक्टरी को ज्यादा इÈधन की जरूरत पड़ती है‚ चौथा घरेलू जरूरतें हैं और पांचवा कृषि व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए ऊर्जा की जरूरत पड़ती है। भारत ने पिछले ६ सालों में सौर ऊर्जा का आकर १७ जीबी से बढÃाकर ७८ जीबी कर लिया है। प्रधांनमंत्री नरेन्द्र मोदी की कोशिश दुनिया में एक स्मार्ट सौर ग्रिड के जरिये दुनिया को जोड़ने की है‚ जिसमें एक सूर्य‚ एक ग्रिड और एक विश्व की परिकल्पना भारत की अनोखी देन है। सबसे मजेदार बात यह भी है कि सौर ऊर्जा की कीमत फॉसिल फ्यूल से चार गुणा कम है। 


हरित ऊर्जा की सबसे बड़ी मुसीबत इसकी अबाध निरंतरता है। रात में सूर्य नहीं चमकता‚ इसके लिए स्टोरेज की जरूरत पड़ेगी। वह एक चुनौती है‚ जिसे आधुनिक टेक्नोलॉजी के जरिये पूरा कर लिया जाएगा। हर तरीके से भारत २०५० तक अपनी परम्परगत ऊर्जा व्यवस्था को बदलकर हरित ऊर्जा को स्थापित करने में सक्षम है। हरित ऊर्जा हर तरीके से विकेंद्रित होगा‚ अगर भारत के प्रधानमंत्री ने तमाम विवशताओं के बावजूद ग्रीन एनर्जी के आधार को अपना संकल्प बना लिया है‚ जिसमें २०५० तक फॉसिल फ्यूल्स से स्थांतरण ग्रीन एनर्जी में हो जाएगा। नीति आयोग के द्वारा रोडमैप भी तैयार किया गया। 

 अगर भारत यह सब कुछ कर सकता है तो अमेरिका और अन्य देश क्यों नहीं कर सकतेॽ चीन क्यों नहीं करना चाहताॽ यह संघर्ष सामूहिक है। १९९८ में सयुक्त राष्ट्र संघ के तत्वावधान में सम्पान वाÌषक जलवायु अधिवेशन में यह बात कही गई थी कि अगर २०२० तक कार्बन जनित ऊर्जा में ३० प्रतिशत कमी नहीं की गई तो २०२० में आपदा की पूरी आशंका है‚ यह कितनी खतरनाक होगी इसका अंदाजा नहीं। देखना है कि दुनिया की महाशक्तियों के ज्ञान चक्षु खुलते भी है कि नहींॽ अगर ऐसा होता है तो क्लाइमेट पॉलिसी ही विदेश नीति होनी चाहिए।


सौजन्य - राष्ट्रीय सहारा।

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Opinion : मायूस ठेलों को राहत की आस

वर्षों से सड़कों पर मेहनत कर गुज़र बसर करने वाले त्योहारी मौसम में भी मायूस हैं। कोरोना के शुरूआती दौर में जिनके मुंह का निवाला सबसे पहले छिना उनमें ये तबका बड़ा है जो हर दिन की कमाई की बदौलत जिन्दा रहता है। ना बचत कर पाता है‚ न छत का इन्तजाम‚ न ही घर परिवार की फर्जअदायगी। कर्ज में ही डूबा रहता है क्योंकि मौसम की मार‚ ओहदेदारों की बदनीयति और हालात का शिकार रहते हुए ठेले खुद कभी भरपेट नहीं रह पाते। अपने बच्चों की परवरिश ही उसका छोटा सा ख्वाब है‚ जिसे वो मोलभाव करने वालों से जिरह की जिद छोड़कर बमुश्किल जिन्दा रखता है।  


कभी आप उसकी दुखती रगों को छुएंगे तो मालूम होगा कि प्रशासन और नेता इन्हें इन्सान नहीं सड़कों पर बिखरे फिजूल सामान की तरह देखते हैं‚ जिन्हें कहीं से उठाकर कहीं भी फेंक दिया जाए। देश की अर्थव्यवस्था को छोटे दुकानदार और व्यवसायी किस हद तक मजबूती देते हैं इसका अहसास तब होता है जब मन्दी की मार में बड़े धराशायी हो जाते हैं। दुनिया भर की गड़बड़ाई गणित के दौरान भारत के अन्नदाताओं ने और औरतों की छोटी–छोटी बचत के साथ ही फेरीवालों और फुटकर सामान बेचने वालों ने भी देश की सांसों को जिन्दा रखा। हाल का दौर उन्हें क्यों अखरता जिन व्यवसायियों का गल्ला पहले ही भरा–पूरा था‚ लेकिन जिनके चूल्हे आठ दस दिन से ज्यादा की आग ना जुटा पाए उनकी गैरत ने उन्हें हाथ भी नहीं फैलाने दिए।  


कुछ ठेलेवालों ने खुदकुशी तक कर ली। मगर ये हताशा बाजार को चमकाने वाले इश्तेहारों की भीड़ में दब कर रह गई। देश की आबादी में करीब ढाई फीसद हिस्सेदारी वाले ठेले–थड़ीवालों के लिए केन्द्र सरकार ने ५० लाख लोन देकर राहत का ऐलान किया‚ जिसकी जमीनी हकीकत ये है कि बैंक खानापूÌत कर असल जरूरतमन्दों की दावेदारी कई बहाने से खारिज कर रहे हैं। फॉर्म भरने प्रक्रिया में ही उनकी उम्मीदें भरना तो दूर जेब ही हल्की होकर लौट रही है। इस हल्के में नहीं लेना चाहिए। सड़क के किनारे‚ मोहल्ले के नुक्कड़ और बाजारों के फुटपाथ पर फल‚ सब्जियां‚ नाश्ता‚ खाना‚ खिलौने‚ कपड़े‚ बैग‚ जूते सहित हमारी रोजाना की जरूरतों का अनगिनत सामान हमें हमारी जेब पर भार बने बगैर यहां हासिल है। पूरे देश की अर्थव्यवस्था में इनकी हिस्सेदारी का ठीक हिसाब कभी इसलिए नहीं हो पाया क्योंकि ये असंगठित तबका है। इनका लेखा–जोखा नगर निकायों के पास इसलिए नहीं रहता। शहरों में यातायात व्यवस्था दुरूस्त करने या भीड़–भाड़ कम करने या सफाई अभियानों या अतिक्रमण हटाने की मुहिम के नाम पर थड़ी ठेले वालों पर ही गाज गिरती है। हफ्ता वसूली की जड़ें इतनी गहरी हैं कि हर दिन देश भर में करोड़ों की कमाई भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ती है। इन दिनों त्योहारों पर बाजारों में रौनक लौट रही है मगर खुशियां बेचते दिलों में इस बात की दहशत पल रही है कि जाने कब कोई डंडा ठेला पलट दे और फिर ठेलों और सामान को छुड़ाने के लिए रिश्वत का इन्तजाम करना पड़े। पुलिस और निगम के कारिंदों से मिलने वाली धौंस और उगाही इतनी आम बात है कि ठेला व्यवसायी भी इसे अपनी किस्मत ही मान कर बैठे हैं। ॥ 


फेरीवालों की फिक्र की पहल वाजपेयी सरकार ने २००४ में फेरीवालों का संसार नीति बनाकर की। फिर २००९ में भी नीति बनी‚ फुटपाथों के भरोसे आजीविका बसर करने वालों के हक के बारे में समझ बनी और आखिरकार २०१३ में सुप्रीम कोर्ट में बॉम्बे हॉकर यूनियन की याचिका पर फैसला आने के बाद केन्द्र में २०१४ में कानून बना और उन्हें आजीविका का हक हासिल हुआ। राज्य सरकारों ने अपने यहां पहले से बनी वेंडर नीतियों और फिर केन्द्रीय कानून को लेकर भी खानापूÌत की तो हेरिटेज सिटी थड़ी ठेला यूनियन के तले एक जुझारू ठेला व्यवसायी बनवारी लाल ने २०१५ में सुप्रीम कोर्ट दस्तक दी। कोर्ट ने हिदायत दी कि कानून पर अमल हो और संवेदनशील इलाकों को छोड़कर वेंडिंग जोन बनाए जाएं। मगर तब तक इन्हें अपनी जगह से बेदखल करना गैर–कानूनी होगा। कानून ने तो सांविधानिक अधिकार मानते हुए फुटपाथ–ठेले व्यवसायियों को उनकी मर्जी की जगह कमाई करने की आजादी भी सौंपी है। ये सब वेंडिंग समिति के जरिए होगा।  


ज्यादातर राज्यों में पहली केन्द्रीय नीति आने के बाद हॉकर्स‚ पथविक्रेता‚ स्ट्रीट वेंडर जैसे अलग–अलग नाम से नीति लाकर इनकी फिक्र तो की। कई जगह कवायद भी हुई‚ लेकिन ज्यादातर मामला सिर्फ कागजी फुर्ती का ही रहा। इन्दौर‚ पटना‚ भुवनेश्वर जैसे कई शहरों ने काफी अमल भी किया‚ लेकिन जयपुर जैसे हेरिटेज शहरों में जगह–जगह नॉन–वेंडिंग जोन की तख्तियां लग गई। मानो पूरा शहर ही संवेदशील इलाका हो। बिहार के ठेला व्यवसायियों ने तो इस चुनाव में मांग भी रखी है कि राज्य में कानून लागू करते हुए लाइसेन्स मिले‚ स्मार्ट सिटी के नाम पर थड़ी–ठेलेवाले नजरअंदाज न हों‚ आवास सहित दूसरी सरकारी योजनाओं और बीमा‚ हेल्थ कार्ड से जोड़ें‚ लोन आसानी से मुहैया हो। कानूनन फुटपाथ–ठेलों पर सामान बेचने वालों का सर्वे होना है‚ जब तक और कहीं बसाने का इन्तजाम नहीं होगा तब तक हटाया नहीं जाना है‚ नई बसावट से पहले उनकी सहूलियत का ख्याल रखना है और तमाम मसलों के हल और आवाज के लिए वेंडिग समिति का वजूद भी होना है‚ लेकिन देश भर में ही टाउन वेंडिंग समिति तक को नेताओं और दबंगों ने अपनी घुसपैठ से नहीं बख्शा। असल हकदार हर जगह दरकिनार हैं। 


 इलाज सिर्फ यही है कि सरकार ईमानदार अफसरों को असल ठेले व्यवसायियों की पहचान करने और उन्हें लाइसेन्स देने का जिम्मा दे दे। एक और दुखती रग है इनकी जिसका इलाज तो सरकारों को बिना वक्त गंवाए करना ही चाहिए। जिस बेदर्दी से सामान उठाने‚ फेंकने और ठेलों की जब्ती की हरकत नगर निकाय करता है उसका हर्जाना उन्हें ही भुगतने का फरमान हो तो इस पर लगाम लगे। ठेले–फुटपाथ पर कमाई करने वाले आत्मनिर्भर बनने की चाह वाले भारत के ही पहिए हैं‚ जिन्हें दौड़ता देखना हमारे अपने ही दमखम का नजारा होगा। इस वक्त रफ्तार में रहना‚ फिक्रमंद होना साझी जरूरत है।

सौजन्य - राष्ट्रीय सहारा।

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अलोकप्रिय घोषणा

केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और भाजपा के नेताओं ने बीते गुरुûवार को पटना में अपनी पार्टी का घोषणा पत्र जारी किया। इस घोषणा पत्र में भाजपा ने सूबे के हर व्यक्ति को मुफ्त में कोरोना का टीका देने का वादा किया है। वास्तविकता यह है कि चुनाव घोषणा पत्र न तो अपनी विवेकशीलता के लिए जाने जाते हैं और न अपनी सधी हुई भाषा के लिए। घोषणा पत्रों में प्रायः अप्राप्तय लIयों की बात की जाती है और भाषा भी अतिरंजनापूर्ण होती है। चुनाव से पहले जिस तरह के वादे किए जाते हैं और जिस तरह से लोगों की अपेक्षाओं को जगाया जाता है‚ उसका एक विलक्षण उदाहरण बिहार विधानसभा के चुनाव में देखने को मिल रहा है।


 अभी तक तो केंद्र सरकार इस बात पर विचार–विमर्श कर रही थी कि पहले से असाध्य बीमारियों से ग्रसित कमजोर जीवन शक्ति वाले लोगों और कोरोना के विरुûद्ध लड़़ाई लड़़ने वाले स्वास्थ्यकर्मियों‚ पुलिसकर्मियों और सफाईकर्मियों को सबसे पहले कोरोना का टीका दिया जाएगा। अब तक केंद्र राज्यों के साथ मिलकर कोरोना के विरुûद्ध समान नीतियों‚ समान कार्यप्रणाली‚ नियंत्रण के समान उपायों आदि के साथ जंग लड़़ रही थी। केंद्र की इस चिंता में सभी ने साझेदारी की है‚ लेकिन कोरोना का टीका निर्माण के बाद उसके वितरण को लेकर सुचारू व्यवस्था बनाए जाने की बात हो ही रही थी कि भाजपा ने कोरोना के टीका को चुनावी मुद्दा बनाकर एक अनावश्यक विवाद खड़़ा कर दिया है। 


अहम सवाल यह है कि जब कोरोना के टीके का वितरण एक वैज्ञानिक प्रक्रिया के साथ होता है तो किसी एक विशेष राज्य को कैसे प्राथमिकता दी जा सकती हैॽ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी बार–बार टीके के निर्माण और वितरण के संबंध में आशाएं जगा रहे हैं। महामारी का संकट केवल बिहार का ही नहीं समूचे देश का संकट है। अभी तक सभी राज्यों ने तमाम निरोधक कदम उठाए हैं। इसलिए टीके को लेकर सभी राज्यों की समान अपेक्षाएं भी हैं और इन समान अपेक्षाओं का सम्मान करना हर दल और हर सरकार का दायित्व है। यह ऐसा मुद्दा है‚ जिसको राजनीति से और राज्यों की आंतरिक समस्याओं से पूरी तरह अलग रखा जाना चाहिए।


 भाजपा ने कोरोना और उसके उपचार को राजनीति से जोड़़कर और इसे चुनावी मुद्दा बनाकर गलत उदाहरण प्रस्तुत किया है। लोकप्रियता के चलते की गई यह घोषणा अलोकप्रिय घोषणा हो गई है॥।


सौजन्य - राष्ट्रीय सहारा।

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पाठ्यक्रम में कटौती : Rashtriya Sahara Editorial


कोरोना के कारण सीबीएसई द्वारा कक्षा ९ से १२ तक के पाठ्यक्रम में कटौती स्वागतयोग्य कदम है। पाठ्यक्रम में ३० प्रतिशत की कमी करने का निर्णय लिया गया है। इसका मतलब यह होगा कि जो अध्याय पाठ्यक्रम से हटाए गए हैं‚ वे बोर्ड और आंतरिक परीक्षाओं का हिस्सा नहीं होंगे। हालांकि कक्षा एक से लेकर आठ तक के पाठ्यक्रम में सीबीएसई ने किसी कमी का ऐलान नहीं किया है‚ लेकिन उम्मीद की जानी चाहिए कि इन कक्षाओं के छात्र–छात्राओं पर से भी पढÃाई का बोझ घटेगा। सीबीएसई का यह निर्णय आकस्मिक नहीं‚ बल्कि सुविचारित है। दरअसल‚ कोरोना के कारण उत्पन्न असाधारण परिस्थितियों को देखते हुए सीबीएसई को कक्षा ९ से १२ तक के पाठ्यक्रम में कमी करने को कहा गया था। कोरोना के कारण देश भर में स्कूल बंद हैं। हालांकि कुछ स्कूलों की ओर से ऑनलाइन शिक्षा की व्यवस्था की गई है‚ लेकिन अधिकतर छात्र इससे वंचित रहे। ऑनलाइन शिक्षा की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि स्कूल और उसके छात्र–छात्राओं के पास इसके लिए आवश्यक सुविधा हैं‚ या नहीं। जाहिर है जो छात्र गरीब परिवार के होंगे‚ वे इस व्यवस्था से बाहर हो जाएंगे‚ क्योंकि नई तकनीक उनकी पहुंच के बाहर है। ऐसा न हो कि नई तकनीक संपन्न परिवार के बच्चों के लिए ही फायदेमंद रहे। लेकिन मौजूदा संकट के लिए सरकार और स्कूल प्रशासन को दोष देना उचित नहीं होगा‚ क्योंकि कोरोना के कारण इन्हें तैयारी करने तक का समय नहीं मिला जबकि इसके लिए पहले से कोई तैयारी नहीं थी‚ चाहे वह पाठ्यक्रम के स्तर पर हो या शिक्षकों के। ऐसी स्थिति में यह पूरी कवायद छात्रों को व्यस्त रखने तक सीमित हो गई है और शिक्षण अधिगम के मूल उद्श्देय से भटकती प्रतीत होती है। न केवल भारत‚ बल्कि संपूर्ण दुनिया में कोरोना ने शिक्षा व्यवस्था को अस्त–व्यस्त कर दिया है। अधिकतर देशों में स्कूल पूर्णतः या अंाशिक रूप से बंद कर दिए गए हैं। स्कूलों की बंदी से न केवल छात्र‚ शिक्षक और अभिभावक प्रभावित हुए हैं‚ बल्कि इसके दूरगामी सामाजिक–आर्थिक नतीजे भी रहे‚ खासकर वंचित समुदाय के बच्चों के लिए। बहरहाल‚ भारत सरकार का यह फैसला सराहनीय है‚ जिससे सभी विद्यार्थी लाभान्वित होंगे। कम से कम उन पर पढÃाई और परीक्षा का तनाव तो कम होगा ही। ॥

 सौजन्य - राष्ट्रीय सहारा।
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बेहतर भविष्य की आश्वस्ति : Rashtriya Sahara Editorial


अनेक गंभीर वैश्विक और स्थानीय चुनौतियों के बीच हमारे देश को एक बेहतर भविष्य की ओर कैसे बढÃना है‚ इसकी एक समग्र सोच बनाने के साथ यह भी जरूरी है कि हम अपने इतिहास और विरासत से इसके लिए प्रेरणा और जरूरी सबक प्राप्त करें। इतिहास को कई oष्टिकोणों से देखा जा सकता है और यदि एक बेहतर दुनिया बनाने के लिए जरूरी सरोकारों की oष्टि से देखा जाए तो कुछ सवाल अधिक महkवपूर्ण होंगे। इतिहास के किस दौर में आपसी भाईचारे‚ सुलह–समझौते और परस्पर सहयोग का माहौल अधिक मजबूत हुआ और किन कारणों से हुआॽ किस दौर में मनुष्य ने केवल समृद्धि नहीं अपितु संतोष को भी समुचित महkव दियाॽ किस दौर में समता और न्याय के जीवन–मूल्य को अधिक महkव मिलाॽ किस दौर में >ंचे आदशाç से प्रेरित होकर लोग व्यापक जन–हित के मुद्दों के लिए अधिक आगे आएॽ किस दौर में लोग पेडÖपौधों‚ जीव–जंतुओं की रक्षा के प्रति अधिक संवेदनशील हुएॽ किस दौर में मनुष्य ने भावी पीढिÃयों का‚ भविष्य का अधिक ध्यान रखाॽ॥ ये बहुत महkवपूर्ण विषय हैं क्योंकि सबसे बडÃा सरोकार तो धरती पर दुख–दर्द कम करना ही है। जब समाज में करुणा‚ भाईचारे‚ सहयोग और न्याय के जीवन–मूल्य मजबूत होंगे तभी दुख–दर्द भी कम होगा। यदि हम इतिहास के अध्ययन से यह समझ सके कि समाज में किस दौर में ये जीवन–मूल्य बहुत मजबूत हुए और इस तरह का माहौल बनाने में किन कारणों‚ प्रेरकों और उत्प्रेरकों की मुख्य भूमिका रही तो यह इतिहास का सर्वाधिक मूल्यवान योगदान होगा। हम अपने इतिहास में झांक कर देखना चाहिए कि कब–कब इन मूल्यों के अनुरूप सशक्त आवाज हमारे देश में उठी‚ वे कौन–सी विशेष स्थितियां थीं जिनमें यह आवाज इतनी गहरी हो सकी कि उसने बहुत बडÃी संख्या में लोगों को प्रभावित किया॥। हमारे इतिहास में ऐसे चार समय तो निश्चित तौर पर नजर आते हैं। ऐसा पहला समय ईसा पूर्व छठी शताब्दी का था अथवा आज से लगभग २६०० वर्ष पहले का समय था। इस समय गंगा के मैदानों में या इसके आसपास अनेक सुधारवादी धार्मिक संप्रदायों का जन्म हुआ जिन्होंने प्रचलित कुरीतियों का विरोध करते हुए सादगी‚ अहिंसा‚ सहयोग और समता का संदेश दिया। इनमें से दो संप्रदायों का इतिहास पर स्थायी प्रभाव बौद्ध और जैन धर्म के रूप में हुआ। महावीर जैन ने अहिंसा के बहुत व्यापक रूप का प्रचार किया। अपरिग्रह के उनके सिद्धांत ने सादगी के जीवन को प्रतिपादित किया और आधिपत्य पर आधारित संबंधों का विरोध किया। महात्मा बुद्ध ने समता और अहिंसा पर जोर देने के साथ–साथ धर्म के रास्ते को कर्मकांडों से मुक्त करा उसे व्यावहारिक बनाया। मध्यम मार्ग का संदेश देते हुए उन्होंने कहा–जीवन रूपी वीणा को इतना मत कसो कि वह टूट जाए। उसे इतना ढीला भी मत छोडÃो कि उसमें से स्वर ही न निकले॥। दूसरा समय आज से लगभग २२५० वर्ष पहले का है जब कलिंग–युद्ध के बाद सम्राट अशोक ने एक बहुत शक्तिशाली सेना होने के बावजूद आक्रमण और विजय की नीति को पूरी तरह छोडà दिया और इसके स्थान पर धर्म विजय को अपनाया। कुछ हद तक मिस्र के अखनातोन को छोडÃकर प्राचीन विश्व के इतिहास मेंे ऐसा कोई अन्य उदाहरण नहीं मिलता है। उनने अपने जीवन को जन कल्याण और पशु पक्षियों के कल्याण में लगा दिया। उनने बौद्ध धर्म का प्रचार दूर–दूर तक किया पर साथ ही अन्य धमाç के प्रति पूरी सहनशीलता दिखाई। अहिंसा के रास्ते पर चलते हुए ही अशोक ने देश में अद्भुत राजनीतिक एकता स्थापित की॥। भारतीय इतिहास में ऐसा तीसरा ऐतिहासिक दौर तेरहवीं से सोलहवीं शताब्दी के भक्ति और सूफी आंदोलन का है‚ जिसे हम आध्यात्मिकता की गहराइयों में उतर कर जीवन की एक सार्थक समझ बनाने की oष्टि से देख सकते हैं। दक्षिण भारत में यह भक्ति लहर इस समय से पहले ही देखी गई। प्रचलित सामाजिक कुरीतियों और इनके पोषक निहित स्वाथाç के विरुद्ध बहादुरी और दिलेरी से किए गए विद्रोह की oष्टि से देखें या दो समुदायों द्वारा एक दूसरे को समझने और भाईचारे से रहने की oष्टि से देखें‚ हर oष्टि से यह बहुत प्रेरणादायक समय था॥। हमारे इतिहास का ऐसा चौथा प्रेरणादायक दौर निश्चय ही ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध आजादी की लडÃाई का दौर था जिसके साथ समाज–सुधार के अनेक आंदोलन भी अनिवार्य तौर पर जुडÃे हुए थे। एक पवित्र और बेहद जरूरी उद्देश्य की प्राप्ति के लिए कितनी कुर्बानी दी जा सकती हैं‚ कितना कष्ट सहा जा सकता है‚ कितनी असंभव लगने वाली चुनौती भी स्वीकार की जा सकती हैं‚ कितना अथक प्रयास किया जा सकता है–इसकी बहुत ही हिम्मत बंधाने वाली अनेक मिसालें इस दौर में कायम हुइÈ। साथ ही‚ यह सामाजिक बदलाव के अनेक महkवपूर्ण प्रयोगों का समय था जिन्हें वांछित सफलता मिली हो या न मिली हो‚ लेकिन उनसे हम बहुत कुछ सीख सकते हैं। ॥ इन सभी महkवपूर्ण दौरों से पहले समस्याएं बहुत बढà गई थीं। समस्याएं बहुत बढà जाने पर ये विभिन्न दौर उम्मीद लेकर आए। बौद्ध धर्म और जैन धर्म के उदय से पहले हिंसा‚ विषमता और कर्मकांड़ों से समाज बुरी तरह ग्रस्त था। अशोक द्वारा शांति का मार्ग अपनाने से पहले भीषण हिंसा के कलिंग युद्ध में बहुत बडÃी संख्या में लोग मारे गए थे और बर्बाद हुए थे। भक्ति और सूफी आंदोलन की जरूरत को जिस समाज ने पहचाना वह तरह–तरह के भेदभाव‚ निरर्थक हिंसा और अंधविश्वास से उत्पन्न कष्ट भुगत रहा था। आजादी की लडÃाई में कुछ सबसे साहसी और नई समझ बनाने वाले कार्य तब हुए जब शोषण और जुल्म से समाज बुरी तरह त्रस्त हो चुका था। अतः स्पष्ट है कि मौजूदा समाज की अधिक समस्याओं से विचलित नहीं होना है। वर्तमान कमजोरियों के बावजूद ऐसी प्रेरणादायक शुरुûआत हो सकती है‚ जो हमारी समस्याओं के वास्तविक और स्थायी हल खोजने या समाधान निकालने के साथ–साथ भटकी हुई दुनिया में एक वैकल्पिक रास्ते की उम्मीद भी जगाए॥।

 सौजन्य - राष्ट्रीय सहारा।
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चुनौतियों के बीच उम्मीदें


हाल  ही में ९ जनवरी को नीति आयोग द्वारा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ अर्थशा्त्रिरयों‚ कारोबारी जगत के दिग्गजों और उद्यमियों की बजट–पूर्व बैठक में शामिल विशेषज्ञों ने नये बजट में आÌथक वृद्धि के लिए विभिन्न महkवपूर्ण सुझाव दिए। विशेषज्ञों ने कहा कि बजट में राजकोषीय चिंता को दरकिनार रखते हुए आÌथक विकास को गति देने के लिए खर्च और सार्वजनिक निवेश बढ़ाए जाने चाहिए। विशेषज्ञों ने कहा कि यद्यपि राजकोषीय अनुशासन अच्छी बात है‚ लेकिन आÌथक सुस्ती के दायरे को देखते हुए यह एक चुनौतीपूर्ण दौर है। ऐसे में राजकोषीय खर्च बढ़ने से बाजारों पर प्रतिकूल असर नहीं होगा। बैठक में शामिल विशेषज्ञों ने कृषि‚ ग्रामीण क्षेत्र‚ वाहन उद्योग‚ इलेक्ट्रॉनिक्स‚ उपभोक्ता वस्तुओं के उद्योग‚ शिक्षा तथा स्वास्थ्य क्षेत्र में सुधार के लिए सुझाव दिए। साथ ही‚ सरकार को सार्वजनिक निवेश‚ कर्ज विस्तार‚ निर्यात वृद्धि‚ सरकारी बैंकों के कामकाज में सुधार‚ कारोबार में सरलता‚ खपत बढ़ाने‚ आयकर राहत और रोजगार सृजन पर बजट को फोकस करने की सलाह दी गई। इसी तरह की सलाह और सुझाव वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन को भी अर्थशा्त्रिरयों‚ उद्यमियों और कारोबार क्षेत्र के विशेषज्ञों ने दिए थे। ॥ निश्चित रूप से प्रधानमंत्री मोदी और वित्त मंत्री सीतारमन को आÌथक वृद्धि से संबंधित जो सुझाव प्राप्त हुए हैं‚ उनकी ओर बजट निर्माण में ध्यान दिए जाने से इस समय उभरती हुई आÌथक चुनौतियों से निपटा जा सकेगा। स्पष्ट दिखाई दे रहा है कि इस समय अमेरिका–ईरान के बीच उभरे तनाव के बाद कच्चे तेल की तेजी से बढ़ती कीमतें‚ देश में पिछले एक वर्ष से चला आ रहा आÌथक सुस्ती का परिवेश तथा राजकोषीय घाटे की बढ़ती चिंताएं वर्ष २०२०–२१ के बजट की सबसे बड़ी आÌथक चुनौतियां हैं। स्थिति यह है कि २०२० में जनवरी के पहले सप्ताह में कच्चे तेल की कीमतों में १० फीसदी का इजाफा हो गया है‚ और ये कीमतें ७१ डॉलर प्रति बैरल के पार पहंुच गई हैं। इसी तरह हाल ही में ७ जनवरी को राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय ने अनुमान जताया है कि चालू वित्तीय वर्ष २०१९–२० में देश की विकास दर घटकर पांच फीसदी रह जाएगी। यह पिछले आठ वषाç की न्यूनतम विकास दर है। साथ ही‚ भारतीय अर्थव्यवस्था में भारी सुस्ती है। नये बजट में निर्धारित राजकोषीय घाटा जीडीपी के ३.३ फीसदी से बढ़कर करीब ३.६ फीसदी के स्तर पहुंच गया है। चालू वित्तीय वर्ष में टैक्स कलेक्शन २.५ लाख करोड़ रु पये कम रहा है। विनिवेश भी लIय से कम है। ॥ ऐसे में देश और दुनिया की उभरती आÌथक परिस्थितियों के कारण २०२०–२१ के बजट में वित्त मंत्री आÌथक सुस्ती की चुनौतियों को सामने रखते हुए विभिन्न वर्गों की उम्मीदों को ध्यान में रखते हुए दिखाई देंगी। वित्त मंत्री प्रमुखतया खेती और किसानों को लाभांवित करते हुए दिखाई दे सकती हैं। महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के लिए अतिरिक्त धन मिल सकता है। निश्चित रूप से नये बजट में कृषि क्षेत्र की जरूरतों को पूरा करने को सरकार उच्च प्राथमिकता देगी॥। नये बजट में उन स्टार्टअप को मदद मिलती हुई दिखाई देगी जो कृषि उत्पादों के लिए लाभकारी बाजार प्रदान करने तथा उचित मूल्य पर अंतिम उपभोक्ताओं को आपूÌत करने में मदद कर रहे हैं। वित्त मंत्री ग्रामीण क्षेत्र के आÌथक और सामाजिक बुनियादी ढांचे को बढ़ाने के उपायों के साथ–साथ कृषि एवं संबद्ध क्षेत्रों के विकास के माध्यम से बेरोजगारी और गरीबी को दूर करने वाले कामों को प्रोत्साहन देते हुए दिखाई देंगी। ॥ बजट २०२०–२१ के तहत वित्त मंत्री देश के छोटे आयकरदाताओं‚ नौकरीपेशा और मध्यम वर्ग के अधिकांश लोगों को लाभांवित करते हुए दिखाई दे सकती हैं। वित्त मंत्री नये बजट के तहत पांच लाख रु पये तक की मौजूदा आयकर छूट को जारी रख सकती हैं। साथ ही‚ ५ से १० लाख रु पये तक की वाÌषक आय पर जो २० फीसदी की दर से आयकर है‚ उसे घटाकर १० फीसदी कर सकती हैं। दस से २० लाख रु पये तक की वाÌषक आय पर जो मौजूदा ३० फीसदी आयकर की दर है‚ उसे घटाकर २० फीसदी कर सकती हैं। ॥ गौरतलब है कि अर्थव्यवस्था को गतिशील करने के लिए वित्त मंत्री एक जनवरी‚ २०२० को घोषणा कर चुकी हैं कि सरकार आगामी पांच वषाç में बुनियादी ढांचा क्षेत्र की परियोजनाओं में १०२ लाख करोड़ रुûपये का निवेश करेगी। ऐसे में वित्त मंत्री बजट के तहत बंदरगाहों‚ राजमार्गों और हवाई अड्डों के निर्माण पर व्यय बढ़ाते हुए दिखाई देंगी क्योंकि निजी क्षेत्र की निवेश योजना अब भी ठंडी पड़ी है। निस्संदेह बजट में स्वास्थ्य‚ शिक्षा‚ छोटे उद्योग–कारोबार और कौशल विकास जैसे विभिन्न आवश्यक क्षेत्रों के लिए बजट आबंटन बढ़ते हुए दिखाई दे सकते हैं। डिजिटल भुगतान के लिए भी नए प्रोत्साहन दिए जा सकते हैं। ॥ इसमें कोई दोमत नहीं हैं कि वित्त मंत्री बजट में अर्थव्यवस्था को गतिशील बनाए रखने के लिए आम आदमी की क्रय शक्ति बढ़ाने के लिए ग्रामीण विकास‚ बुनियादी ढांचा और रोजगार बढ़ाने वाली सार्वजनिक परियोजनाओं पर जोरदार व्यय बढ़ाएंगी। इसलिए हम आशा करें कि वित्त मंत्री नये बजट में आवश्यक वस्तु अधिनियम को नरम करने‚ अनुबंध खेती को बढ़ावा देने‚ बेहतर मूल्य के लिए वायदा कारोबार को प्रोत्साहन देने‚ कृषि उपज की नीलामी के लिए न्यूनतम आरक्षित मूल्य लागू करने‚ शीतगृहों के निर्माण में वित्तीय सहायता देने जैसे कामों को आगे बढ़ाए जाने की रणनीति के साथ आगे बढ़ेंगी जिससे कि कृषि अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने में मदद मिलेगी। ॥ हम आशा करें कि वित्त मंत्री बजट को आÌथक एवं वित्तीय oष्टिकोण से बेहतर बनाने की ऐसी डगर पर आगे बढ़ेंगी जिसमें सरकार द्वारा राजकोषीय जवाबदेही एवं बजट प्रबंधन अधिनियम की समीक्षा समिति की अनुशंसाओं का ध्यान रखा गया हो। आशा करें कि वित्त मंत्री बजट के तहत विनिवेश का उपयुक्त लIय घोषित करेंगी। साथ ही‚ उपयुक्त रूप से करों की वसूली से अपनी आमदनी के लIय की प्राप्ति संबंधी नई रणनीति भी प्रस्तुत करेंगी। निस्संदेह पूरे देश को बजट से ही आÌथक चुनौतियों से राहत पाने की अपेक्षा है। देखना है कि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन वर्ष २०२०–२१ के नये बजट के समक्ष दिखाई दे रही आÌथक एवं वित्तीय चुनौतियों के बीच एक संतुलित और विकासमूलक बजट किस तरह पेश करती हैं। ॥

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