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Friday, November 27, 2020

‘जम्मू-कश्मीर में केंद्र का एक के बाद एक नया प्रयोग’ (पंजाब केसरी)

आखिर कश्मीर कहां जा रहा है? पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित आतंकवाद के कारण यह बुरी तरह से उलझन में जकड़ा हुआ है। चार जैश-ए-मोहम्मद के आतंकी 18 नवम्बर को जम्मू के सांबा जिले के...

आखिर कश्मीर कहां जा रहा है? पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित आतंकवाद के कारण यह बुरी तरह से उलझन में जकड़ा हुआ है। चार जैश-ए-मोहम्मद के आतंकी 18 नवम्बर को जम्मू के सांबा जिले के रीगल क्षेत्र में एक सुरंग के माध्यम से जम्मू-कश्मीर में प्रवेश करने में कामयाब हो गए। शुक्र है कि उन्हें बी.एस.एफ. तथा पुलिस द्वारा तीन घंटों तक चले एनकाऊंटर में मार गिराया गया। 

ऐसा कहा जाता है कि यह सुरंग इससे पहले भी इस्तेमाल में लाई जा चुकी है। दशकों से आतंक को झेल रहे जम्मू-कश्मीर में यह एक नया विस्तृत पहलू है। नई दिल्ली ने हालांकि इस्लामाबाद के निरंतर ही आतंकी हमलों के खिलाफ एक कड़ा रुख अपनाया है तथा पाकिस्तान को इसके नतीजे भुगतने के लिए चेताया है। जम्मू-कश्मीर में अब मुख्य लक्ष्य जिला विकास परिषद (डी.डी.सी.) के चुनावों को शांतिपूर्ण ढंग से निपटाने का है जोकि सख्त सुरक्षा के बीच 28 नवम्बर से 19 दिसम्बर के बीच होने हैं। 

भूमि घोटाले जिसमें कि कुछ महत्वपूर्ण कश्मीरी नेता शामिल हैं, के बीच में सर्वप्रथम डी.डी.सी. चुनाव आयोजित होंगे जिनमें बहुत अधिक रुचि दिखाई दे रही है। वकील, कारोबारी, पूर्व पत्रकार तथा नए-नए नेता बने लोग डी.डी.सी. चुनावों के उम्मीदवार हैं। एक तरफ गुपकार घोषणा के लिए 7 पार्टियों का गठबंधन है जिसका नेतृत्व पूर्व सी.एम. फारुख अब्दुल्ला कर रहे हैं। इसमें महबूबा मुफ्ती भी शामिल हैं। इन सबका असंतोष इस बात को लेकर है कि सुरक्षा के नाम पर उन्हें स्वतंत्र रूप से चुनावी प्रचार करने की अनुमति नहीं दी जा रही। 

फारुख अब्दुल्ला ने प्रशासन पर लोकतांत्रिक प्रक्रिया में दखलअंदाजी करने का आरोप लगाया है। नैकां के साथ-साथ पी.डी.पी. ने भाजपा पर जम्मू-कश्मीर में आधिकारिक मशीनरी के दुरुपयोग का आरोप लगाया है।  उन्होंने कहा कि सुरक्षा के कारण गैर-भाजपा उम्मीदवारों को चुनावी प्रचार नहीं करने दिया जा रहा। जम्मू-कश्मीर प्रशासन को ऐसे आरोपों को देखने की जरूरत है। यदि वह सही तौर पर कश्मीर में जमीनी स्तर पर लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए चितित है। 

केंद्रीय गृह मंत्रालय ने दावा किया है कि लोकतांत्रिक विकेंद्रीयकरण की प्रक्रिया ने आतंकियों तथा पाकिस्तानी एजैंसियों को सकते में डाल दिया है। लोकतांत्रिक प्रक्रिया को जनता से भी समर्थन मिल रहा है। जैसा कि कश्मीर एक राजनीतिक लैबोरेटरी बन चुका है। बिना किसी स्पष्ट नतीजों के नई दिल्ली एक के बाद एक प्रयोग कर रही है। अलगाववादियों तथा आतंकी नेताओं को लुभाने के लिए पिछले कई वर्षों से कई प्रयास किए जा चुके हैं। उग्र कार्रवाइयों तथा कठोर नीतियों पर चलने वाले लोगों के मनों को भी जीतने का प्रयास किया जा रहा है। 

मेरा मानना है कि देश का नेतृत्व एकजुट होकर कार्रवाई करे तथा कश्मीरी समस्याओं को एक नियोजित तथा संगठित तरीके से निष्पादन किया जा सके। कश्मीर में आम लोगों के मनों में भी एक आशावादी माहौल बनाना होगा क्योंकि बंदूक हमारे जैसे लोकतंत्र में किसी भी समस्या को हल नहीं कर सकती। मुख्य बिंदू यह है कि अल्पावधि तथा लम्बी अवधि के पहलुओं में कश्मीर समस्या से निपटने के लिए कौन से कदम उठाए जा सकते हैं? 

1. पहली प्राथमिकता कश्मीरी लोगों को स्वच्छ तथा पारदर्शी प्रशासन दिया जाए। मुझे यह कहने में कोई बुराई नहीं की कि भाजपा नीत एन.डी.ए. सरकार इस मामले में असफल रही है।  
2. जम्मू-कश्मीर को एक बार फिर राज्य का दर्जा देना होगा। इस संदर्भ में केंद्र सरकार को भूमि कानून के प्रावधानों पर निगाह दौड़ानी होगी। 
3. समयबद्ध विकास आधारित कूटनीति तथा कार्य योजना को बनाना होगा जिससे ज्यादा से ज्यादा युवाओं के लिए नौकरियां उत्पन्न की जा सकें। सरकार को अपने मनों में यह बात रखनी चाहिए कि बेरोजगारी की समस्या एक बहुत बड़ा अभिशाप है जो आतंकियों के लिए एक तैयार सामग्री उपलब्ध करवाती है। 
4. आतंकी गतिविधियों तथा इसके संदिग्ध मंतव्यों के लिए विदेशी फंडों के प्रवाह पर पूरा नियंत्रण करना होगा।
5. पाक प्रायोजित आतंकी संगठनों तथा उनके संरक्षकों को सीमा पार से निपटने के लिए एक कठोर कार्य योजना बनाने की जरूरत है। 
6. सीमा पार चल रहे आतंकी कैंपों को मिटाने के लिए रास्ते तलाशने होंगे।
7. सभी राजनीतिक संगठनों से  एक बातचीत का दौर चलना चाहिए। 
8. कश्मीरी सोसाइटी के पुर्नर्माण के लिए भ्रष्टाचारमुक्त राजनीतिक प्रशासन की जरूरत है। 

इस संदर्भ में यह विचलित करने वाली बात है कि फारुख तथा उमर अब्दुल्ला जैसे हाईप्रोफाइल नेताओं के भूमि घोटाले में नाम सामने आए हैं। उच्च न्यायालय बधाई की पात्र है जिसने अपने 9 अक्तूबर के आदेश में केंद्र शासित प्रदेश को रोशनी एक्ट के अंतर्गत दी गई सभी भूमि को रिकवर करने के लिए कहा है। अदालत ने इसे गैर-कानूनी करार दिया है। क्या प्रधानमंत्री मोदी का प्रशासन कश्मीरी मसले पर एक क्रियाशील नीति का खेल खेलने को तैयार है? प्रधानमंत्री मोदी के मन को पढ़ना मुश्किल है। प्रधानमंत्री मोदी को यह महसूस करने की जरूरत है कि अस्थायी समाधान हमें दूर तक नहीं ले जा सकता।-हरि जयसिंह
 

सौजन्य - पंजाब केसरी।

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‘किसान समस्या सुलझाने के मामले में’ ‘केंद्र का अदूरदर्शिता पूर्ण रवैया’ (पंजाब केसरी)

केंद्र सरकार द्वारा लागू 3 नए कृषि कानूनों के विरुद्ध पंजाब और हरियाणा सहित देश के कुल 6 राज्यों के 200 से अधिक कृषक संगठन आंदोलन पर उतरे हुए हैं जिनका आरोप है कि इनके द्वारा केंद्र सरकार..

केंद्र सरकार द्वारा लागू 3 नए कृषि कानूनों के विरुद्ध पंजाब और हरियाणा सहित देश के कुल 6 राज्यों के 200 से अधिक कृषक संगठन आंदोलन पर उतरे हुए हैं जिनका आरोप है कि इनके द्वारा केंद्र सरकार किसानों को कार्पोरेट घरानों का बंधक बनाने व उन्हें खेती से बेदखल करने की तैयारी कर रही है।

कृषक संगठन इन कानूनों में बदलाव करके उनमें न्यूनतम समर्थन मूल्य (एम.एस.पी.) को शामिल करने व फसल के मंडीकरण बारे स्थिति साफ करने की मांग के समर्थन में आंदोलन कर रहे हैं। इस आंदोलन के कारण मालगाडिय़ां बंद रहने से पंजाब में सामान का आना-जाना बंद हो गया है और उद्योग-व्यवसाय के सामने भारी संकट के अलावा करोड़ों रुपए का घाटा रेलवे तथा उद्योग जगत को पड़ चुका है। 

13 नवम्बर को केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर के साथ पंजाब के लगभग 3 दर्जन कृषक संगठनों के प्रतिनिधियों की बैठक बेनतीजा रहने के बावजूद किसानों ने रेल की पटरियों से धरना हटा कर मालगाडिय़ां जाने की अनुमति तो भले ही दे दी परंतु उन्होंने अपनी पूर्व घोषणा के अनुसार 26 और 27 नवम्बर को दिल्ली में रोष प्रदर्शन का निर्णय नहीं बदला।

इसी के अनुसार 26 नवम्बर को तीनों कानून वापस लिए जाने तक आंदोलन जारी रखने को कृतसंकल्प पंजाब व हरियाणा के अलावा उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, राजस्थान व केरल के किसानों ने दल-बल के साथ दिल्ली की ओर कूच कर दिया है। पंजाब के किसानों ने अपने ट्रैक्टरों की ट्रालियों में ही अस्थायी आश्रय बना कर उनमें वर्षा आदि से बचाव का सारा प्रबंध करने के अलावा सोने के लिए बिस्तर, भोजन बनाने के सामान और राशन का पूरा बंदोबस्त भी कर लिया। रास्ते में जहां भी रोका गया वहां किसानों ने धरना लगा दिया। 

हालांकि हरियाणा सरकार द्वारा पंजाब के किसानों को रोकने के लिए ‘रैपिड एक्शन फोर्स’ (आर.ए.एफ.) भी लगाई गई थी तथा अनेक स्थानों पर किसानों की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए ‘ड्रोन कैमरे’ भी लगाए गए थे और प्रशासन द्वारा लाऊड स्पीकरों पर किसानों को वापस जाने की अपील भी की जा रही थी परंतु उन पर कोई असर नहीं हुआ। शम्भू बार्डर पर हरियाणा पुलिस ने उन पर पानी की बौछारें और आंसू गैस के गोले छोड़े जिससे किसान और भी भड़क उठे। उन्होंने सुरक्षा बलों द्वारा की हुई भारी बैरीकेङ्क्षडग और ट्रक आदि खड़ेकरके लगाए हुए अवरोधक तोडफ़ोड़ कर घग्गर नदी में फैंक दिए। 

गुरुग्राम तथा अन्य स्थानों पर भी सुरक्षा बलों द्वारा खड़े किए हुए अवरोधक भी किसानों को रोकने में सफल न हो सके। किसानों ने बसों आदि में बैठ कर भी दिल्ली में घुसने की कोशिश की। गुरुग्राम में एकत्रित किसानों के कारण कई किलोमीटर लम्बा जाम लग गया। 

करनाल, जींद, खनौरी सीमा तथा अन्य स्थानों पर उग्र किसानों की पुलिस से झड़पों के अलावा बैरीकेडों आदि की तोडफ़ोड़, पथराव तथा दिल्ली-राजस्थान सीमा पर भी सुरक्षा बलों के साथ झड़पें हुईं। इस बीच किसी भी समय दिल्ली कूच के लिए तैयार किसानों का काफिला 26 नवम्बर शाम पानीपत पहुंच कर रात्रि पड़ाव के लिए वहां रुक गया है। किसानों को दिल्ली जाने से रोकने के लिए हरियाणा सरकार ने 25 नवम्बर रात से ही ट्रकों तथा बड़े वाहनों को हाईवे पर रोक रखा है जिससे ट्रकों को बाबरपुर से आगे न जाने देने और ट्रैफिक रूट डायवर्ट करने के कारण भूखे-प्यासे बैठे ड्राइवरों को भारी परेशानी हो रही है। उनका कहना है कि वे तो किसानों और सरकार की लड़ाई के बीच बिना किसी कसूर के ही पिस रहे हैं तथा समय पर माल न पहुंचने के कारण उन्हें भाड़ा भी कम या नहीं मिलेगा। 

विवाह-शादियों का मौसम होने के कारण आम लोगों को तथा दिल्ली के अस्पतालों में डाक्टरी जांच आदि करवाने के लिए जाने वालों को भी भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। इस तरह की स्थिति में जहां केंद्र सरकार को तुरंत हस्तक्षेप करके मामला सुलझा कर सामान्य स्थिति बहाल करनी चाहिए परंतु केंद्र सरकार इस मामले में टालमटोल वाला रवैया ही अपनाती रही है। कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने अब आंदोलनकारियों के साथ तुरंत वार्ता करने के स्थान पर कई दिन बाद 3 दिसम्बर को किसान नेताओं को वार्ता के लिए बुलाया है जो सरकार की अदूरदॢशता को ही दिखाता है। यदि सरकार पहले ही किसान नेताओं से बात करके इस मामले को सुलझा लेती तो आज यह नौबत न आती और न ही कोई समस्या पैदा होती।—विजय कुमार 

सौजन्य - पंजाब केसरी।
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‘कोरोना का बढ़ता प्रकोप’‘न इधर के रहे न उधर के रहे’ (पंजाब केसरी)

‘कोरोना महामारी’ का प्रकोप अधिक तेजी से बढऩा शुरू हो जाने के कारण समूची दुनिया में हड़कंप मचा हुआ है तथा इससे निपटने के मामले में सरकार के सामने विचित्र स्थिति पैदा हो गई है कि ‘प्रतिबन्ध लगाएं तो मुसीबत और न लगाएं तो मुसीबत’। एक ओर जहां इससे निपटने के लिए सरकार को दोबारा कठोर

‘कोरोना महामारी’ का प्रकोप अधिक तेजी से बढऩा शुरू हो जाने के कारण समूची दुनिया में हड़कंप मचा हुआ है तथा इससे निपटने के मामले में सरकार के सामने विचित्र स्थिति पैदा हो गई है कि ‘प्रतिबन्ध लगाएं तो मुसीबत और न लगाएं तो मुसीबत’। एक ओर जहां इससे निपटने के लिए सरकार को दोबारा कठोर प्रतिबंध लागू करने के लिए विवश होना पड़ रहा है तो दूसरी ओर इसके कारण लोगों में बेरोजगारी और रोजी-रोटी की समस्या भी बढ़ गई है। 

कोरोना के बढ़ते प्रकोप के कारण जहां देश के कई राज्यों में नाइट कफ्र्यू और धारा-144 लगाने समेत रैस्टोरैंट आदि बंद करने का निर्देश दिया गया है, वहीं शादी, विवाह व अन्य समारोहों में मेहमानों की संख्या सीमित करने, नियमों का उल्लंघन करने पर जुर्माना बढ़ाने जैसे अन्य कड़े कदम उठाए गए हैं। इसी के अंतर्गत दिल्ली तथा महाराष्ट्र में शादी या अन्य समारोहों में शामिल होने वालों की अधिकतम संख्या घटा कर 50, उत्तर प्रदेश, राजस्थान व गुजरात में 100, मध्यप्रदेश में 200 की गई है। दिल्ली में मास्क न पहनने पर जुर्माने की राशि बढ़ा कर 2000 रुपए कर दी गई है। 

अब हरियाणा के सोनीपत, गुडग़ांव, फरीदाबाद, हिसार, रेवाड़ी और रोहतक जिलों में हाल के अंदर 50 और खुली जगह में 100 लोगों तथा अन्य जिलों में 100 व 200 लोगों को शामिल होने की अनुमति होगी। हिमाचल में रात 8 से सुबह 6 बजे तक सिर्फ सरकारी बसें चलाने, कार्यालयों में तृतीय एवं चतुर्थ श्रेेणी के कर्मचारियों की उपस्थिति घटा कर 50 प्रतिशत करने, शिमला, मंडी, कुल्लू व कांगड़ा जिलों में रात का कफ्र्यू लगाने तथा मास्क न पहनने पर जुर्माना बढ़ा कर 1000 रुपए कर दिया गया है। 

गुजरात और मध्यप्रदेश के बाद अब राजस्थान के सर्वाधिक कोरोना प्रभावित जिलों बीकानेर, जयपुर, जोधपुर, कोटा, उदयपुर, अलवर एवं भीलवाड़ा में भी रात्रि 8 बजे से सुबह 6 बजे तक कफ्र्यू लगा दिया गया है। कार्यालयों में कर्मचारियों की संख्या भी सीमित करने के अलावा बिना मास्क घूमने पर जुर्माना 200 रुपए से बढ़ा कर 500 रुपए किया गया है। पंजाब में अभी तक कोरोना के 1,48,444 कन्फर्म केस आ चुके हैं तथा 4692 लोगों की मौत भी हो चुकी है। कोरोना के बढ़ते मामलों को देखते हुए यहां 1 दिसम्बर से रात 10 बजे से सुबह 5 बजे तक रात्रिकालीन कफ्र्यू लगाने का निर्णय किया गया है। राज्य में रात 9.30 बजे के बाद सभी होटल, रैस्टोरैंट, मैरिज हाल आदि बंद रखने का आदेश दिया गया है तथा मास्क न पहनने पर जुर्माने की राशि 500 रुपए से बढ़ाकर 1000 रुपए कर दी गई है। 

कोरोना का तेजी से बढ़ता चक्र तोडऩे के लिए सख्ती बढ़ाते हुए केन्द्र सरकार ने 1 दिसम्बर से 31 दिसम्बर तक राज्यों को ‘कन्टेनमैंट जोन’ में सख्ती से नियम लागू करने के नए निर्देश दिए हैं तथा राज्यों को रात्रि कफ्र्यू लगाने की भी छूट दे दी है। जहां एक ओर कोरोना ने कहर ढा रखा है तो दूसरी ओर लोगों द्वारा स्वास्थ्य विभाग के दिशा-निर्देशों की उपेक्षा समस्या को और बढ़ा रही है  तथा बहुत कम लोग ही मास्क लगा रहे हैं और सिंगापुर के डाक्टरों के अनुसार यदि 70 प्रतिशत लोग भी मास्क लगाते व अन्य सुरक्षा सावधानियों का पालन करते तो स्थिति आज कुछ काबू में होती। 

अब जबकि सर्दियों का मौसम आ चुका है, देश के अग्रणी चिकित्सकों के अनुसार कोरोना वायरस के अधिक समय तक जिंदा रहने का खतरा पहले से बढ़ गया है। अत: समय की नजाकत को समझते हुए लापरवाही छोड़ सरकार के प्रयासों में पूरी कत्र्तव्यनिष्ठा से सहयोग करने में ही सबकी भलाई है ताकि इस मुसीबत से मुक्ति मिले, वर्ना एक और लॉकडाऊन को झेलना तथा पहले से भी अधिक संकटों का सामना करना होगा। इस समय तो कुल मिलाकर सरकार और लोगों के सामने ‘इधर जाऊं या उधर जाऊं’  वाली स्थिति पैदा हो गई है। यदि सरकार लॉकडाऊन और अन्य प्रतिबंध नहीं लगाती तो लोग बीमारी से मरेंगे और यदि लगाती है तो बेरोजगारी और भूख से मरेंगे। कोरोना ने सबको एक चौराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है, जहां सब लोग ऐसा महसूस कर रहे हैं जैसे वे ‘न इधर के रहे न उधर के’।—विजय कुमार 

सौजन्य - पंजाब केसरी।
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Thursday, November 26, 2020

Editorial : ‘एक आसान सा राजनीतिक औजार है लव जेहाद’ (पंजाब केसरी)

भारत एक बार पुन: एक नए अवतार में विभिन्न धर्मों और आस्थाआें के बीच संघर्ष में फंसा हुआ है और इस बार यह नया अवतार लव-जेहाद के रूप में सामने आया है जो एक आसान सा राजनीतिक औजार है और शिष्टाचार में लिपटा हुआ है और जिसने..

भारत एक बार पुन: एक नए अवतार में विभिन्न धर्मों और आस्थाआें के बीच संघर्ष में फंसा हुआ है और इस बार यह नया अवतार लव-जेहाद के रूप में सामने आया है जो एक आसान सा राजनीतिक औजार है और शिष्टाचार में लिपटा हुआ है और जिसने केन्द्र और अनेक राज्यों में भाजपा को सत्ता में आने में सहायता की और उसे हिंदू वोट दिलाए, जिसके अंतर्गत विभिन्न जातियों और धर्मों के बीच इश्क, मोहब्बत और शादी को लेकर विवाद पैदा हो गया है। इनको बलात् धर्मांतरण से जोड़ दिया गया है और इससे उत्पन्न राजनीतिक उथल-पुथल के चलते हमारा धर्मांतरण तुम्हारे धर्मांतरण से पवित्र के अपवित्र संघर्ष में बदल रहा है। 

लव जेहाद के बारे में हाल ही में जो विवाद पैदा हुआ वह हरियाणा के फरीदाबाद में कालेज के बाहर एक 21 वर्षीय छात्रा की गोली मार कर हत्या करने से शुरू हुआ। छात्रा के घर वालों का आरोप है कि आरोपी उस छात्रा पर धर्म परिवर्तन करने और उससे विवाह करने का दबाव डाल रहा था और इससे पुन: लव जेहाद का मुद्दा देश भर में उठने लगा। लव जेहाद की कार्य प्रणाली बहुत ही सरल है। युवा मुस्लिम अपने को सोनू भाई, पप्पू भाई आदि कहलाते हैं और हाथ पर लाल धागा बांध देते हैं ताकि वे हिन्दू दिखें और लोग उन्हें हिंदू समझें तथा गैर-मुस्लिम महिलाआें को अपने प्रेम के जाल में फंसाते हैं और उन्हें बलपूर्वक या धोखे से इस्लाम धर्म में परिवर्तित करने के एकमात्र उद्देश्य से उनके साथ भाग जाते हैं या उनके साथ विवाह कर लेते हैं। 

लव जेहाद पर अंकुश लगाने के लिए भाजपा शासित राज्यों उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, हरियाणा, कर्नाटक और असम ने कठोर कानून बनाने की तैयारी कर ली है। इन राज्यों ने यह कदम इलाहाबाद उच्च न्यायालय की हाल की इस टिप्पणी के बाद उठाया कि केवल विवाह के उद्देश्य के लिए धर्मांतरण अस्वीकार्य है। इसी के चलते पिछले वर्ष भाजपा शासित हिमाचल प्रदेश ने लव जेहाद विरोधी विधेयक पारित कराया। वस्तुत: मध्य प्रदेश ने धार्मिक स्वतंत्रता विधेयक 2020 का प्रस्ताव किया है जिसमें लव जेहाद को एक संज्ञेय और गैर-जमानती अपराध माना गया है जिसके लिए 5 वर्ष के कठोर कारावास की सजा का प्रावधान किया गया है। 

असम सरकार ने चेतावनी दी है कि वह एेसे हर व्यक्ति को जेल की सजा दिलाएगी जो असम की बेटियों का उत्पीड़न करेगा या अपनी पहचान छुपाकर उन्हें लव जेहाद का शिकार बनाएगा। असम भाजपा का कहना है कि यदि 2021 में वह पुन: सत्ता में आई तो एेसा कानून बनाएगी। हालांकि केन्द्रीय गृह मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि विद्यमान कानूनों में लव जेहाद को परिभाषित नहीं किया गया है और अब तक एेसा कोई मामला दर्ज नहीं हुआ है।

शायद कम लोगों को पता होगा कि लव जेहाद कार्यक्रम की शुरूआत 1996 में शुरू हुई और इसे केरल के कुछ मुस्लिम संगठनों का वरदहस्त प्राप्त था। यह शब्द पहली बार राज्य के पत्तनमथित्ता जिले में सितंबर 2009 में सुनने को मिला और तीन माह बाद इसका प्रयोग केरल उच्च न्यायालय के एक निर्णय में भी किया गया। न्यायालय ने इसे मुस्लिम युवाआें द्वारा प्रेम जाल में फंसाकर युवा हिन्दू लड़कियों को बलपूर्वक धर्मांतरित करवाने का कथित मुस्लिम षड्यंत्र बताया और राज्य सरकार से कहा कि लव जेहाद के एेसे धोखाधड़ी के कृत्य पर रोक लगाने के लिए एक कानून बनाने पर विचार करे। 

वस्तुत: धर्मान्तरण भारत में एक ज्वलंत और विस्फोटक सामाजिक और राजनीतिक मुद्दा बन गया है। यह 1920 में आर्य समाज और अन्य हिंदू पुनर्जागरण संगठनों द्वारा चलाए गए अभियान की तरह है। लव जेहाद के अंतर्गत मुस्लिम गुंडों द्वारा हिंदू महिलाआें का अपहरण और उनके धर्मांतरण, उनके साथ कथित रूप से बलात्कार, उन्हें लुभाना, उनका धर्मांतरण करना, प्रेम के जाल में फंसाना, बलपूर्वक विवाह करना इसके कारण हिन्दू और मुसलमानों के बीच मतभेद बढ़ते जा रहे थे। हालांकि उस समय लव जेहाद शब्द का प्रयोग नहीं किया गया था। आज उत्तर, दक्षिण, पूरब, पश्चिम कहीं भी जाआे, एक जैसी स्थिति देखने को मिल रही है। 

धर्म आज पैसा बनाने का साधन बन गया है। आपको ध्यान होगा कि अमरीका स्थित अपने मुख्यालयों से प्राप्त पैसे के बल पर अनेक चर्च समूहों ने तमिलनाड़ु, केरल, आंध्र प्रदेश, कश्मीर और कर्नाटक में अनेक हिंदुआें का धर्मांतरण कराया, उन्हें पैसा और रोजगार दिलाया और यह सिलसिला स्वतंत्रता के बाद से ही चल रहा है। दूसरी आेर विश्व हिन्दू परिषद और बजरंग दल ने भी अपने सशस्त्र युवा समूह रक्षा सेनाआें का गठन किया। समय आ गया है कि हमारे नेता इस बात पर गंभीरता से विचार करें क्योंकि गत वर्षों में लव जेहाद को लेकर अनेक लोग अपनी जानें गंवा चुके हैं साथ ही वे धर्म को राजनीति से अलग करने पर भी विचार करें।-पूनम आई. कौशिश
 

सौजन्य - पंजाब केसरी।

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Editorial : ‘ड्यूटी निभाने गए अधिकारियों और पुलिस पर हमला करने का तेजी से बढ़ रहा रुझान’ (पंजाब केसरी)

एक ओर देश में ‘कोरोना महामारी’ ने उत्पात मचा रखा है तो दूसरी ओर लोगों में ड्यूटी निभाने वाले कर्मचारियों पर हमलों के बढ़ रहे रुझान के कारण देश का माहौल खराब हो रहा है जिसके मात्र 6 दिनों के बीच 7 उदाहरण निम्र में दर्ज हैं : 


* 17 नवम्बर को अमृतसर के ‘मूलेचक’ गांव में जुआरियों को पकडऩे गई टीम पर आरोपियों ने हमला करके उन पर ईंट-पत्थर बरसाए जिससे एक इंस्पैक्टर के हाथ पर गहरी चोट आ गई और पुलिस पार्टी को वहां से भागना पड़ा। 

* इसी दिन फिरोजपुर में ‘खाईवाला अड्डा’ के निकट होमगार्ड के एक जवान ने गलत दिशा से आ रहे 2 स्कूटरी सवार युवकों को रोका तो उन्होंने उसे थप्पड़ मारा और उसकी पगड़ी उतार दी।

* 19 नवम्बर को मध्य प्रदेश के भोपाल में ‘ईरानी डेरा के निकट’ चोरी के आरोपियों को पकड़ने गई पुलिस पार्टी पर 12 महिलाओं एवं पुरुषों ने मिर्ची पाऊडर, लाठी, डंडों एवं पत्थरों से हमला कर दिया जिससे 2 पुलिस कर्मचारी घायल हो गए तथा पुलिस पार्टी को अपने बचाव में हवाई फायर करने पड़े। 


* 20 नवम्बर को नैनीताल के वन विभाग की टीम द्वारा ‘रैखोली’ गांव के जंगल में 3 लोगों को अवैध रूप से चीड़ का वृक्ष काटने से रोकने पर उन्होंने अधिकारियों पर तेजधार हथियार से हमला कर दिया।

* 20 नवम्बर को ही उत्तर प्रदेश में ‘ललिया’ थाना क्षेत्र के ‘उपटहवा’  गांव में जमीनी विवाद पर हुए झगड़े की जांच करने पहुंची पुलिस टीम पर 3 महिलाओं सहित गांव के 9 लोगों ने हमला कर दिया।

* 22 नवम्बर को ही बॉलीवुड के ड्रग्स कनैक्शन की पड़ताल के सिलसिले में गोरेगांव में छापामारी करने गई नार्कोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (एन.सी.बी.) की 5 सदस्यीय टीम पर लगभग 60 लोगों की भीड़ ने हमला कर दिया जिसके परिणामस्वरूप 2 अधिकारी गंभीर रूप से घायल हो गए। 


* 22 नवम्बर को दिल्ली के मोती नगर में ‘सिविल डिफैंस वालंटियर्स’ द्वारा बिना मास्क लगाए कार ड्राइव कर रहे दो युवकों को रोकने का प्रयत्न करने पर उन लोगों ने उनकी टीम के एक सदस्य पर कार चढ़ाने की कोशिश की जिससे उसे चोट भी आ गई। उल्लेखनीय है कि दिल्ली में कोरोना की रोकथाम के लिए मास्क नहीं लगाने वालों को 2000 रुपए जुर्माना भी किया जा रहा है।


इससे पहले भी हाल ही के दिनों में ड्यूटी निभा रहे सरकारी कर्मचारियों पर हमलों की अनेक घटनाएं हो चुकी हैं। सरकारी कर्मचारियों चाहे वे किसी भी विभाग से सम्बन्ध रखते हों, पर हमले और उनको अपनी ड्यूटी निभाने से रोकने का प्रयास करना सरासर अनुचित और राष्ट्रद्रोह की श्रेणी में रखने के योग्य है। अत: ऐसे मामलों में पूरी छानबीन के बाद दोषियों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई करके उन्हें नौकरी से निकाल कर जेलों में बंद करने की अत्यधिक जरूरत है ताकि ऐसा करने वालों के साथ-साथ दूसरों को भी नसीहत मिले।—विजय कुमार


सौजन्य - पंजाब केसरी।

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Tuesday, November 17, 2020

Editorial : ‘मानवता को लज्जित कर गई’ ‘इस बार की काली दीवाली’

दीवाली का त्यौहार सबके लिए सुख, समृद्धि और ‘सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे संतु निरामया:। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चितदु:खभाग्भवेत्॥’ की भावना के साथ आता है कि ‘हे प्रभु सभी सुखी रहें, सभी निरोगी रहें, सभी सन्मार्ग पर चलें और किसी को भी दुख प्राप्त न हो’। इसीलिए

दीवाली का त्यौहार सबके लिए सुख, समृद्धि और ‘सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे संतु निरामया:। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चितदु:खभाग्भवेत्॥’ की भावना के साथ आता है कि ‘हे प्रभु सभी सुखी रहें, सभी निरोगी रहें, सभी सन्मार्ग पर चलें और किसी को भी दुख प्राप्त न हो’। इसीलिए इस दिन लोगों द्वारा सबके लिए मंगलकामना करने की परम्परा युगों से चली आ रही है। 

धर्मग्रंथों के अनुसार लोगों को इस दिन विशेष रूप से शुचितापूर्ण आचरण करना चाहिए परंतु ऐसा प्रतीत होता है कि आज लोगों ने पर्वों के संदेश को पूरी तरह भुला कर इसके विपरीत आचरण करना शुरू कर दिया है। हमारे इसी कथन की पुष्टिï करती हैं दीवाली के दिन हुई मानवता को लज्जित करने वाली शर्मनाक घटनाएं जिनके मात्र दीवाली के एक दिन के ही 14 उदाहरण निम्र में दर्ज हैं : 

* दीवाली की रात उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले के भदरस गांव में एक छ: वर्षीय बच्ची की बलात्कार के बाद बर्बरतापूर्वक हत्या करके हत्यारा उसके फेफड़े भी निकाल कर ले गया। हाथ में नमकीन का पैकेट पकड़े बच्ची का निर्वस्त्र शव गांव के बाहर सरसों के खेत में पड़ा मिला। 
* संगरूर के निकटवर्ती गांव कल्याण में पुरानी रंजिश के चलते एक युवक की गोलियां मार कर हत्या कर दी गई। 
* इसी दिन होशियारपुर-ऊना रोड पर गांव खड़का में झारखंड निवासी एक प्रवासी मजदूर को उसी के भाइयों ने शराब पीने के दौरान हुए झगड़े के बाद डंडे से पीट-पीट कर मार डाला।
* अजनाला के गांव ‘गग्गोमाहल’ में वैल्डिंग की दुकान पर काम करने वाले 20 वर्षीय युवक ने वहां काम सीखने वाले 12 वर्षीय किशोर के  गुप्तांग में हवा भरने वाली ‘नोजल’ डाल कर हवा भर दी जिसके परिणामस्वरूप पेट फूल जाने से उसकी मृत्यु हो गई। 

* अजनाला के निकट गांव ‘घागरमल’ में देर रात एक व्यक्ति ने बेटी की ऑनलाइन पढ़ाई के लिए मोबाइल खरीदने को लेकर अपनी पत्नी के साथ हुए विवाद के चलते पत्नी के सिर में गोली मार कर उसकी हत्या कर दी।
* बिहार के पूर्वी चम्पारण में किसी व्यक्ति ने 6 साल की बच्ची से बलात्कार के प्रयास में विफल रहने पर गला दबा कर उसकी हत्या कर दी तथा उसके शरीर के विभिन्न अंगों, हाथ-पैर और गर्दन के छ: टुकड़े काट कर अलग-अलग स्थानों पर फैंक दिए। घटनास्थल पर खून से सना बच्ची का पायजामा, 10 रुपए का एक नोट तथा 5 व 1 रुपए के कुछ सिक्के बरामद हुए।
* इसी दिन बिहार के ‘कैमूर’ में एक युवक ने 8 वर्षीय बच्ची से बलात्कार करने के बाद उसकी हत्या कर दी। 

* बिहार के सासाराम में भी इसी दिन एक दिल दहला देने वाली घटना हुई जिसमें ‘गंगौली’ गांव में एक अधेड़ ने एक नाबालिग से बलात्कार करने के बाद उसका शव अपने घर में एक बक्से में बंद करके छिपा दिया जो बाद में उसके घर से बरामद होने पर ग्रामीणों ने उसे बुरी तरह पीटने के बाद पुलिस के हवाले कर दिया। 
* मध्य प्रदेश के ‘शहडोल’ में मामूली से विवाद में कुछ लोगों ने दीए जलाने की तैयारी कर रहे एक अध्यापक के घर में घुस कर उसकी हत्या कर दी।  
* राजस्थान में भरतपुर के गांव सुनहरा में ‘जहरीली’ शराब पीने से 5 लोगों की मृत्यु हो गई। 

* महाराष्ट्र के बीड जिले में एक युवक ने किसी बात पर नाराज होकर अपनी प्रेमिका पर ‘तेजाब’ की एक पूरी बोतल उंडेल दी जिसके परिणामस्वरूप 13 घंटे तड़पती रहने के बाद उसने दम तोड़ दिया। 
* कर्नाटक के ‘हवेरू’ जिले के एक गांव में एक युवक ने अपनी मां से बलात्कार करने के बाद उसकी हत्या कर दी। पुलिस के अनुसार एक वर्ष पूर्व इस युवक के पिता की मृत्यु के बाद उसकी मां ने अपने बेटे के साथ-साथ अनेक लोगों के साथ अवैध संबंध कायम कर लिए थे जबकि बेटा चाहता था कि उसकी मां सिर्फ उसी के साथ अवैध संबंध रखे। 

* दीवाली के दिन ही राजस्थान के जयपुर में एक महिला से बलात्कार के आरोपी व्यक्ति ने पैट्रोल छिड़क कर उसे जलाने का प्रयास किया। मां को बचाने के प्रयास में उसकी नाबालिग बेटी भी झुलस गई। महिला की स्थिति गंभीर है। स्पष्टत: ये घटनाएं इस बात का मुंह बोलता प्रमाण हैं कि आज लोगों ने पर्वों और उनमें निहित शिक्षाओं के संदेश को पूरी तरह भुला दिया है। अत: इस तरह का आचरण हमारे धर्म ग्रंथों की शिक्षाओं के सर्वथा विपरीत है। यदि मेल-मिलाप और भाईचारे का संदेश देने वाले शुभ पर्व के दिन भी इसी तरह चलता रहा तो देश और समाज कहां पहुंचेेगा!—विजय कुमार 

सौजन्य - पंजाब केसरी।

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Friday, November 13, 2020

Editorial : ‘जरूरतमंद बच्चों को स्मार्टफोन उपलब्ध करवाने की’ ‘अनूठी और प्रशंसनीय पहल’

 विश्वव्यापी ‘कोरोना महामारी’ के कारण विश्व के अन्य भागों के साथ-साथ इस वर्ष के शुरू में भारत में भी लॉकडाऊन के चलते शिक्षण संस्थान बंद कर दिए गए थे जिनमें से अभी भी अधिकांश बंद हैं। इसके बाद देश में ‘ऑनलाइन’ पढ़ाई पर जोर दिए जाने के बावजूद अनेक सरकारी स्कूलों में बच्चों को कम्प्यूटर उपलब्ध नहीं हैं और इसके साथ ही बड़ी संख्या में गरीब बच्चों के माता-पिता में ‘स्मार्टफोन’ खरीदने की सामथ्र्य न होने से ऐसे बच्चों की ‘ऑनलाइन’ पढ़ाई में बाधा आ रही है। 

‘स्मार्टफोन’ आजकल पढ़ाई का अनिवार्य हिस्सा बन जाने के कारण ही कुछ समय पूर्व हिमाचल प्रदेश में एक दम्पति ने अपनी गाय बेच कर ‘स्मार्टफोन’ खरीदा ताकि उनका बेटा ‘ऑनलाइन’ पढ़ाई जारी रख सके। यह तो एक उदाहरण मात्र है। आज न जाने कितने ऐसे छात्र-छात्राएं हैं जो  मोबाइल न होने के कारण ‘ऑनलाइन’ शिक्षा से वंचित हैं। इसी समस्या को देखते हुए हरियाणा में फरीदाबाद की ‘जिला एलीमैंट्री शिक्षा अधिकारी’ ‘रितु चौधरी ने एक अनूठी पहल की है’। 

उन्होंने जिले के विभिन्न स्कूलों के अध्यापकों तथा अन्य लोगों के सहयोग से जरूरतमंद बच्चों के लिए ‘मोबाइल बैंक’ स्थापित किया है जिसके अंतर्गत वह विभिन्न छात्र-छात्राओं में 20 मोबाइल फोन बांट चुकी हैं जबकि 120 ‘स्मार्टफोन’ जल्दी ही बांटने जा रही हैं। इसी अभियान के अंतर्गत एक ‘स्मार्टफोन’ उन्होंने 10वीं कक्षा की एक पिता विहीन 15 वर्षीय छात्रा को भी प्रदान किया है जिसकी मां मेहनत-मजदूरी करके परिवार का पालन-पोषण कर रही है। रितु चौधरी नए और पुराने दोनों तरह के ‘स्मार्टफोन’ स्वीकार कर रही हैं। शुरू-शुरू में ये ‘स्मार्टफोन’ एक एन.जी.ओ. तथा विभिन्न स्कूलों के अध्यापकों के सहयोग से प्राप्त किए गए और अब अन्य अध्यापकों ने भी ‘स्मार्टफोन’ ‘डोनेट’ करने शुरू कर दिए हैं। 

‘रितु चौधरी’ का कहना है कि ‘‘इस अभियान के अंतर्गत क्षेत्र के जरूरतमंद बच्चों को यथासंभव मोबाइल प्रदान करने की पहल से उन्हें अपनी शिक्षा सुचारू रूप से जारी रखने में कुछ सहायता अवश्य मिलेगी।’’जहां अनेक राज्यों की सरकारों ने छात्रों को मोबाइल फोन देने के वायदे करने के बावजूद ‘स्मार्टफोन’ नहीं दिए तथा उनकी घोषणाएं कागजों में ही दब कर रह गईं वहीं जरूरतमंद बच्चों को ऑनलाइन पढ़ाई जारी रखने में सहायता देने के उद्देश्य से ‘मोबाइल बैंक’ की स्थापना के लिए ‘रितु चौधरी’ और उनकी टीम के सदस्य बधाई के पात्र हैं। 

उल्लेखनीय है कि कुछ समय पूर्व राजधानी दिल्ली में भी कुछ लोगों तथा एन.जी.ओ. ने निजी स्तर पर जरूरतमंद बच्चों को ‘स्मार्टफोन’ बांटने का अभियान शुरू किया परंतु यह समस्या तो किसी एक स्थान की न होकर समूचे देश की है अत: अन्य स्थानों पर भी इस तरह की पहल करने की तुरंत आवश्यकता है।

इसके साथ ही संक्रमण के इस दौर में लोगों को शरीर का सही तापमान बताने वाले पुरानी शैली के ‘मर्करी थर्मामीटर’ घरों में रखने की भी आवश्यकता है ताकि सभी आयु वर्ग के लोग शरीर का तापमान नियमित रूप से जांचते रहें जो अत्यंत आवश्यक है। इसके साथ ही हमारा सुझाव है कि जरूरतमंद लोगों को ‘थर्मामीटर’ बांटने का अभियान भी शुरू करना चाहिए। स्कूलों में भी अध्यापकों द्वारा बच्चों को इस मामले में जागरूक करने की आवश्यकता है ताकि उनके स्वास्थ्य को पैदा होने वाले संभावित खतरे से बचा जा सके।—विजय कुमार    

 सौजन्य -पंजाब केसरी।
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Thursday, November 12, 2020

Editorial : ‘नौकरीपेशा महिलाओं’ ‘के विरुद्ध हिंसक हुआ तालिबान’

इसी वर्ष अमरीका ने अफगानिस्तान से अपने सैनिक वापस बुलाने के लिए तालिबान के साथ एक महत्वपूर्ण समझौते को अंतिम रूप दिया है। सभी चाहते हैं कि दशकों से खूनी संघर्ष में फंसे इस देश में शांति आ सके परंतु इस कदम के बाद वहां की सत्ता में

इसी वर्ष अमरीका ने अफगानिस्तान से अपने सैनिक वापस बुलाने के लिए तालिबान के साथ एक महत्वपूर्ण समझौते को अंतिम रूप दिया है। सभी चाहते हैं कि दशकों से खूनी संघर्ष में फंसे इस देश में शांति आ सके परंतु इस कदम के बाद वहां की सत्ता में तालिबान की पकड़ मजबूत होने से अगर किसी के मन में सर्वाधिक डर पैदा हुआ है तो वे हैं महिलाएं। 

अफगानिस्तान की कुल 2 करोड़ 60 लाख आबादी में से 1 करोड़ 42 लाख महिलाएं हैं। सभी जानते हैं कि जब तालिबान सत्ता में था तो महिलाओं की स्थिति कितनी दयनीय रही। वहां महिलाओं के बिना बुर्के घर से बाहर निकलने तक पर पाबंदी लगा दी गई। कोई महिला अकेली बाहर नहीं जा सकती थी, उसके साथ किसी मर्द का होना जरूरी था। अफगानिस्तान में शरिया कानून लागू करने के समर्थक तालिबान की सोच महिलाओं को केवल घर में बंद रखने की है लेकिन वे पुरुषों को सभी अधिकार देते हैं। वहां एक महिला पर हुआ हालिया हमला इसका एक और प्रमाण है कि वहां महिलाओं का घर से बाहर कदम निकालना और आत्मनिर्भर बनने की कोशिश करना रूढि़वादियों को कितना अखरता है। 

गजनी प्रांत में बंदूकधारियों ने अफगान पुलिस में नौकरी पाने वाली 33 वर्षीय ‘खतेरा’ पर गोलियां दागीं और उनकी आंखों में चाकू घोंप दिया। इस हमले ने न केवल ‘खतेरा’ की नेत्रज्योति छीन ली बल्कि स्वतंत्र करियर बनाने के उनके सपने को भी चकनाचूर कर दिया। कुछ महीने पहले ही वह गजनी पुलिस की अपराध शाखा में एक अधिकारी के रूप में भर्ती हुई थीं। बचपन से ही उनका सपना घर से बाहर निकल कर काम करना था और सालों तक अपने पिता को इसके लिए समझाने और मनाने में असफल रहने के बाद अंतत: उन्हें अपने पति से समर्थन मिला था। 

हालांकि, उनका हौसला टूटा नहीं है। वह कहती हैं, ‘‘अगर विदेश में इलाज से यह संभव हो सका और मुझे थोड़ी-बहुत नेत्र ज्योति वापस मिल जाए तो मैं नौकरी फिर से शुरू करूंगी।’’ ‘खतेरा’ पर हमला उस बढ़ते रुझान का संकेत है जिसके बारे मेें मानवाधिकार कार्यकत्र्ताओं का कहना है कि नौकरी करने वाली महिलाओं का विरोध हिंसक तरीके से किया जा रहा है। खतेरा के मामले में एक पुलिस अधिकारी होने के नाते तालिबान उनसे और भी नाराज हो सकता है। 

कार्यकत्र्ताओं का मानना है कि अफगानिस्तान के रूढि़वादी सामाजिक मापदंड और अमरीका के वहां से अपने सैनिकों को निकालने की योजना से तालिबान के बढ़ते प्रभाव से यह विरोध बढऩे लगा है। पिछले 20 वर्षों में अफगानिस्तान के हालात कुछ सुधरे थे परंतु अब एक बार फिर जैसे-जैसे तालिबान दोबारा आ रहा है, लगता है कि फिर हालात बिगड़ेंगे। वर्तमान में तालिबान दोहा में अफगान सरकार के साथ एक शांति समझौते के लिए बातचीत कर रहा है। कई लोगों को तालिबान के औपचारिक रूप से सत्ता में लौटने की उम्मीद है। बातचीत की प्रगति धीमी है और अधिकारियों, प्रमुख नेताओं से लेकर महिलाओं पर हमलों में वृद्धि हुई है। 

सौजन्य - पंजाब केसरी।

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Wednesday, November 11, 2020

Editorial : ‘रिहायशी इलाकों में मौत के कारखाने’‘अधिकारियों को नजर नहीं आते’

पिछले कुछ वर्षों से देश को वायु प्रदूषण की गंभीर समस्या का सामना करना पड़ रहा है। इस बार दीपावली पर पटाखों से निकलने वाले धुएं से यह प्रदूषण कई गुणा बढ़ जाने से स्वास्थ्य के लिए खतरा और भी बढ़ गया है। इसीलिए ‘नैशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल’ ने 9 से 30 नवम्बर की आधी रात तक एन.सी.आर. में पटाखे चलाने और उनकी बिक्री पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया है तथा शेष देश में रात 8 से 10 बजे तक ही ‘ग्रीन पटाखे’ अनार, फुलझड़ी चलाने, जिनसेे कोई धमाका नहीं होता तथा धूप, अगरबत्ती करने की अनुमति दी है ताकि लोग सुविधापूर्वक पूजा कर सकें। 

‘मुम्बई म्यूनीसिपल कार्पोरेशन’ ने 30 नवम्बर तक अपनी सीमा में निजी या सार्वजनिक स्थलों पर पटाखों पर रोक लगाते हुए दीवाली की रात 8 से 10 बजे तक ही सोसायटियों में सिर्फ फुलझडिय़ां व अनार चलाने की अनुमति दी है। इस बार देश में पहले लॉकडाऊन और फिर विभिन्न राज्यों में ‘गंभीर वायु गुणवत्ता’ वाले क्षेत्रों में पटाखों की बिक्री पर रोक लगा देने से भारत में पटाखे बनाने के सबसे बड़े केंद्र शिवकाशी के पटाखा उद्योग के लिए गंभीर संकट पैदा हो गया जिसे भारत में ‘पटाखा निर्माण का हब’ कहा जाता है। 

यहां पटाखा बनाने वाले 1000 के लगभग कारखानों का करोड़ों रुपए का कारोबार है। देश में पटाखों की कुल खपत का 80 प्रतिशत यहीं तैयार होता है। यहां बने पटाखे दूसरे देशों को भी निर्यात किए जाते हैं। कम से कम 2 लाख लोगों को यहां के पटाखा उद्योग में प्रत्यक्ष रोजगार मिला हुआ है। पहले ही ‘कोरोना’ के चलते मंदी की मार झेल रहे पटाखा निर्माताओं और व्यापारियों को इस आंशिक छूट से कुछ राहत मिल सकती है। 

इसी बीच पटाखों की बोरियों में शराब और करंसी की तस्करी किए जाने का समाचार भी मिला है। गत 8 नवम्बर को बिहार के रोहतास जिले में पटाखों की बोरियों और खिलौनों में छुपा कर लाई जा रही 20 पेटी शराब बरामद की गई। पटाखों की बोरियों में भेजी गई अवैध शराब पीने से कुछ लोगों के मारे जाने की भी चर्चा है। यह भी पता चला है कि बिहार में मतदाताओं में बांटने के लिए पटाखों की बोरियों में नकली करंसी भी छुपा कर भेजी जा रही है। इस तरह के माहौल के बीच सुरक्षा मापदंडों को धत्ता बताते हुए अवैध पटाखा निर्माता और जमाखोर भी इस धंधे में कूद पड़े हैं। इससे होने वाली दुर्घटनाओं में जानमाल की भारी तबाही हो रही है जिसके पिछले मात्र सवा महीने के 14 उदाहरण निम्र में दर्ज हैं :

* 28 सितम्बर को प. बंगाल के दक्षिण 24 परगना जिले के ‘चम्पाहाटी’ में एक अवैध पटाखा फैक्टरी में विस्फोट से पूरी इमारत राख का ढेर बन गई। 
* 18 अक्तूबर को आगरा की घनी आबादी वाली बस्ती ‘आजमपाड़ा’ में अवैध पटाखा गोदाम में 10 मिनट तक भीषण सिलसिलेवार धमाकों से 3 लोगों के चीथड़े उड़ गए तथा आस-पास के 20 मकानों में दरारें आ गईं।
* 19 अक्तूबर को बहराइच में एक व्यक्ति को अवैध रूप से पटाखे बनाने के लिए 21 किलो बारूद एवं अन्य कैमिकलों, विभिन्न आकार के छोटे-बड़े 1500 कच्चे बमों तथा 50 किलो दूसरी सामग्री के साथ पकड़ा गया।
* 23 अक्तूबर को तमिलनाडु के ‘मदुरै’ में एक निजी पटाखा फैक्टरी में विस्फोट से कम से कम 5 लोगों की मौत हो गई। 

* 29 अक्तूबर को मेरठ के ‘सरधना’ थाना क्षेत्र में एक अवैध पटाखा फैक्टरी में विस्फोट से 2 व्यक्तियों की मृत्यु तथा दर्जनों घायल हो गए। 
* 30 अक्तूबर को सहारनपुर के ‘बिहारीगढ़’ में अवैध पटाखा फैक्टरी में विस्फोट से एक महिला की मृत्यु व 10 मजदूर गंभीर रूप से झुलस गए। 
* 4 नवम्बर को कुशीनगर में ‘कप्तानगंज’ के रिहायशी इलाके में पटाखों के अवैध गोदाम में हुए विस्फोट के चलते आग लगने से 3 व्यक्ति जिंदा जल गए। 
* 4 नवम्बर को मध्यप्रदेश के ‘मुरैना’ के ‘जिगानी’ गांव में एक मकान में  रहस्यमय विस्फोट से पति-पत्नी और उनके दुधमुंहे बच्चे की मृत्यु हो गई। 

* 4 नवम्बर को गोरखपुर में एक अवैध पटाखा फैक्टरी के गोदाम में विस्फोट से 4 लोगों की मृत्यु तथा कम से कम 12 लोग घायल हुए। 
* 4 नवम्बर को मेरठ के जिसौरा गांव में अवैध पटाखा फैक्टरी से बड़ी मात्रा में अधबनी फुलझडिय़ां, देसी बम, सुतली बम, पटाखे और पटाखे बनाने में प्रयुक्त की जाने वाली सामग्री जब्त की गई।
* इसी दिन मेरठ की ‘मवाना’ पुलिस ने एक मकान पर छापा मार कर अवैध पटाखों का बड़ा भंडार जब्त किया। 
* 5 नवम्बर को जालंधर में प्रताप बाग के एक गोदाम में डंप किए लाखों रुपए के पटाखे जब्त करके एक व्यक्ति को गिरफ्तार किया गया।

* 6 नवम्बर को वाराणसी के घनी आबादी वाले इलाके ‘दालमंडी’ में 12 क्विंटल अवैध पटाखे जब्त किए गए। यहां कुछ दिनों में मकानों से 50 किं्वटल अवैध रूप से रखे पटाखे जब्त किए गए।
* 7 नवम्बर को राजपुरा में अवैध रूप से पटाखे बना रहे एक व्यक्ति को गिरफ्तार किया गया। 

स्पष्ट है कि उक्त घटनाओं से अवैध पटाखों का निर्माण एवं भंडारण करने वाले लोगों ने अतीत की घटनाओं से कोई सबक नहीं सीखा और लोगों की सुरक्षा के लिए खतरा बने हुए हैं।
इस मामले में संबंधित अधिकारी भी समान रूप से जिम्मेदार हैं जिन्हें अपने क्षेत्र में और यहां तक कि प्रतिबंध के बावजूद रिहायशी इलाकों में चल रहे इन ‘मौत के कारखानों’ का पता ही नहीं चलता।
अत: इन घटनाओं के लिए जिम्मेदार लोगों तथा संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध भी कड़ी कार्रवाई करके उन्हें नौकरी से निकाला जाए ताकि दूसरों को भी सबक मिले और वे इस तरह की लापरवाही करने से बाज आएं। 
इस बीच हमारा यह भी सुझाव है कि जहां कहीं भी स्कूल खोलने का राज्य सरकारों का प्रस्ताव है वहां स्कूल भाईदूज (16 नवम्बर) के कुछ दिन पश्चात ही खोले जाएं ताकि बच्चों की उपस्थिति यकीनी बनाई जा सके।—विजय कुमार 
सौजन्य - पंजाब केसरी।

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Monday, November 9, 2020

Editorial : अमरीकी चुनाव नतीजों का ‘भारत-अमरीका संबंधों पर असर’

अमरीका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति जो बाइडेन ने राष्ट्र के नाम अपने पहले संदेश में अपनी नीति के बारे में बात की है। उन्होंने कहा, ‘‘मैं देश को तोडऩे नहीं जोडऩे वाला राष्ट्रपति बनूंगा। राष्ट्रपति के तौर पर मैं ब्लू या रैड स्टेट नहीं देखता मैं सिर्फ यूनाइटिड स्टेट्स आफ अमेरिका

अमरीका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति जो बाइडेन ने राष्ट्र के नाम अपने पहले संदेश में अपनी नीति के बारे में बात की है। उन्होंने कहा, ‘‘मैं देश को तोडऩे नहीं जोडऩे वाला राष्ट्रपति बनूंगा। राष्ट्रपति के तौर पर मैं ब्लू या रैड स्टेट नहीं देखता मैं सिर्फ यूनाइटिड स्टेट्स आफ अमेरिका को देखता हूं। कठोर बयानबाजी को पीछे छोड़ कर एक-दूसरे को फिर से देखने, एक-दूसरे को फिर से सुनने का समय है।’’ 

3 नवम्बर को मतदान के बाद डोनाल्ड ट्रम्प (रिपब्लिकन) और जो बाइडेन (डैमोक्रेट) द्वारा जीत के दावों और जवाबी दावों तथा ट्रम्प द्वारा जो बाइडेन पर मतगणना में हेराफेरी के आरोपों के बीच 7 नवम्बर को देर से घोषित परिणामों में बाइडेन विजयी घोषित कर दिए गए और इस प्रकार दूसरी बार भी अमरीका का राष्ट्रपति बनने का ट्रम्प का सपना टूट गया। भारत में सभी लोगों का ध्यान इस बात पर टिका है कि जो बाइडेन के साथ भारत के रिश्ते कैसे होंगे क्योंकि अब परिदृश्य से डोनाल्ड ट्रम्प गायब हो चुके हैं। बेशक भारत-अमरीका के आपसी संबंधों के बारे में बहुत कुछ कहा गया है लेकिन यह बड़ी सच्चाई है कि दुनिया के दो सबसे बड़े लोकतंत्र लगातार एक-दूसरे के करीब आ रहे हैं। 

विश्लेषकों ने भारत तथा अमरीकी नेताओं के बीच व्यक्तिगत संबंधों पर बहुत अधिक जोर दिया है परंतु मुख्य नीति यह है कि अमरीकी-भारतीय संबंधों में प्रगति हुई है। अब जबकि जो बाइडेन अमरीका के राष्ट्रपति चुने जा चुके हैं तो लोगों के मन में यह प्रश्र है कि अब आगे क्या होगा? जो बाइडेन प्रशासन के अंतर्गत क्या बदल सकता है? बहुत ज्यादा नहीं। चाहे वाजपेयी और किं्लटन के दौर की बात करें या फिर बराक ओबामा तथा मनमोहन सिंह के दौर की बात करें तो यह बात सामने आती है कि भारत-अमरीका में द्विपक्षीय समझौतों के साथ विदेशी नीति के मुद्दों पर सहमति हुई थी। 

‘‘हालांकि 2015 में ओबामा (डैमोक्रेट) ने भी भारत यात्रा के दौरान हिन्दू बहुलता की आलोचना की थी। इसके बावजूद दोनों देशों के बीच संबंध काफी मजबूत हैं। अंतत: चीन के खिलाफ अपने सख्त रुख को लेकर अमरीका और भारत एक-दूसरे का साथ देंगे।’’ट्रम्प के साथ मोदी की कथित दोस्ती के बारे में जोरदार प्रचार के बीच यह बात याद रखनी चाहिए कि मीडिया ने अमरीका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा के साथ मोदी के संबंधों के बारे में भी ऐसी ही बातें कही थीं। दूसरे शब्दों में मोदी ने दिखाया है कि वह रिपब्लिकन और डैमोक्रेटिक दोनों नेताओं के साथ संबंध बना सकते हैं। 

यानी नेताओं के बीच आपसी व्यक्तिगत संबंधों पर जरूरत से अधिक जोर दिया जाता है जबकि व्यापक रुझान यही है कि गत दो दशकों के दौरान रक्षा तथा खुफिया तालमेल, व्यापार से लेकर लोगों के बीच संबंधों तक अमरीकी-भारतीय संबंध प्रगति पर हैं फिर चाहे सत्ता में किसी भी विचारधारा के नेता रहे हों। भारत उन कुछ विदेश नीति मुद्दों में से एक है जिन पर अमरीका के दोनों दल सहमत नजर आते हैं। हालांकि, जरूरी नहीं है कि बाइडेन के तहत सब कुछ निर्बाध तरीके से ही आगे बढ़ेगा। साल्वातोर बाबोन्स अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका ‘फॉरेन पॉलिसी’ में लिखते हैं, ‘‘भारत को इस बात से सावधान रहना चाहिए कि उपराष्ट्रपति के रूप में कमला हैरिस मानवाधिकारों को लेकर कैसे भारत पर सख्त हो सकती हैं।’’ 

भारत के अलावा भी बाइडेन के नेतृत्व में अन्य दक्षिण एशियाई देशों को लेकर अमरीकी नीतियों के संबंध में बहुत बदलाव नहीं होगा। जैसा कि ‘अली लतीफी’ ने गत सप्ताह ‘फॉरेन पॉलिसी’ में लिखा था, ‘‘अफगान जानते हैं कि उनके लिए फैसला पहले ही हो चुका है-बाइडेन के भी अमरीकी सैनिकों की वापसी जारी रखने की सम्भावना है जिसमें ट्रम्प के कार्यकाल के दौरान तेजी आई थी। पाकिस्तान और बंगलादेश के बारे में क्या? दोनों देश दुनिया के सबसे अधिक मुस्लिम आबादी वाले शीर्ष 5 देशों में शामिल हैं और इसी कारण वे ट्रम्प से निपटने की समस्या से बच निकले हैं। कोई संदेह नहीं कि पाकिस्तान को याद होगा कि बाइडेन ने 2008 में उसे सैन्य सहायता के रूप में 1.5 बिलियन डॉलर की मदद हासिल करने में मदद की थी-ऐसी मदद जिसके लिए उन्हें पाकिस्तान के दूसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान ‘हिलाल-ए-पाकिस्तान’ से सम्मानित किया गया। 

अगर बात करें अमरीकी चुनाव में भारतीय अमरीकियों की तो कमला हैरिस देश की पहली महिला उपराष्ट्रपति, पहली अश्वेत उपराष्ट्रपति और भारतीय मूल की पहली उपराष्ट्रपति बन गई हैं। यह भारतीय अमरीकी समुदाय के लिए एक बहुत बड़ा मील का पत्थर है जो अमरीका की आबादी का 1 प्रतिशत से अधिक हिस्सा है। कमला हैरिस भारत में मानवाधिकार को अच्छी तरह से लागू करने की बात कर सकती हैं। कई अन्य भारतीय अमरीकियों ने भी सदन की सीटों पर कब्जा करने में सफलता पाई है। डैमोक्रेट प्रॉमिला जयपाल, अमी बेरा, राजा कृष्णामूर्ति और रो खन्ना दूसरे कार्यकाल के लिए सदन में लौटेंगे लेकिन कई अन्य उम्मीदवार असफल भी रहे जिनमें टैक्सास से प्रेस्टन कुलकर्णी और मेन से चुनाव लड़ रहे ‘सारा गिडियोन’ शामिल हैं। भारतीय अमरीकियों ने इस चुनाव में बड़ी भूमिका निभाई है। चुनावों को लेकर विस्तार से आंकड़े सामने आने के बाद हम जान पाएंगे कि उनका समर्थन किसे मिला। 

सौजन्य - पंजाब केसरी।

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Editorial : ‘देश को खोखला कर रहा’ ‘भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी का घुन’

देश में दशकों से बढ़ रही भ्रष्टाचार रूपी विष बेल पहले की भांति फल-फूल रही है और विडम्बना यह है कि भ्रष्टाचार उन्मूलन तथा कानून व्यवस्था के लिए जिम्मेदार विभागों के अधिकारी एवं कर्मचारी भी इसमें संलिप्त हो गए हैं जिसके 12 दिनों के 17 उदाहरण निम्र में दर्ज हैं :

देश में दशकों से बढ़ रही भ्रष्टाचार रूपी विष बेल पहले की भांति फल-फूल रही है और विडम्बना यह है कि भ्रष्टाचार उन्मूलन तथा कानून व्यवस्था के लिए जिम्मेदार विभागों के अधिकारी एवं कर्मचारी भी इसमें संलिप्त हो गए हैं जिसके 12 दिनों के 17 उदाहरण निम्र में दर्ज हैं : 

* 27 अक्तूबर को ‘नशा निवारक कानून’ के अंतर्गत गिरफ्तार आरोपी को जमानत दिलवाने के बदले रिश्वत लेने के आरोप में ‘खालड़ा’ थाना के ए.एस.आई. सतनाम सिंह को गिरफ्तार कर सस्पैंड किया गया।  
* 28 अक्तूबर को फरीदकोट सैंट्रल जेल में बंद एक विचाराधीन हत्यारोपी को केस दर्ज करने का भय दिखा कर उससे 15,000 रुपए रिश्वत लेने के आरोप में जेल का सहायक सुपरिंटैंडैंट हरबंस सिंह पकड़ा गया। 
* 4 नवम्बर को पलवल में गौवध के आरोपियों से 80,000 रुपए रिश्वत लेते हुए एक ए.एस.आई. इकबाल और हवलदार धर्मेंद्र को दबोचा गया। 

* 4 नवम्बर को ही भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ने राजस्थान के ‘बारां’ जिले के नायब तहसीलदार हरि प्रकाश गुप्ता और ‘जालौर’ जिले के जूनियर सहायक बाबू लाल को क्रमश: 25,000 रुपए और 7700 रुपए रिश्वत लेते हुए पकड़ा।
* 5 नवम्बर को राजस्थान के ‘चूरू’ में ‘पारिवारिक न्यायालय’ के दर्जा चार कर्मचारी ‘भगवती प्रसाद’ को शिकायतकत्र्री के पति के विरुद्ध वसूली वारंट जारी करवाने की एवज में 40,000 रुपए रिश्वत लेते हुए काबू किया गया। 

* 5 नवम्बर को ही जयपुर में एक व्यक्ति को जारी ‘गुड्स एंड सर्विसिज़ टैक्स’ (जी.एस.टी.) का नोटिस दबाने के लिए 40,000 रुपए रिश्वत लेने के आरोप में विभाग के सुपरिंटैंडैंट और इंस्पैक्टर को पकड़ा गया। 
* 5 नवम्बर को ही बीकानेर में पैट्रोल पम्प चलाने के लिए ‘अनापत्ति प्रमाण पत्र’ (एन.ओ.सी.) जारी करने के बदले में 50,000 रुपए रिश्वत लेते हुए एग्जीक्यूटिव इंजीनियर ‘दान सिंह मीणा व तकनीकी सहायक सीता राम वर्मा’ को गिरफ्तार किया गया। 
अगले दिन 6 नवम्बर को अधिकारियों ने सीता राम के जयपुर स्थित मकान की तलाशी लेकर एक अलमारी में गुप्त रूप से बनाए गए लॉकर में छिपा कर रखे हुए 48 लाख रुपए जब्त किए। 

* 6 नवम्बर को राजस्थान में करौली थाना के अंतर्गत चंदेलीपुरा के चौकी इंचार्ज श्रीकृष्ण को एक समुदाय विशेष के विरुद्ध कार्रवाई करने के बदले 15,000 रुपए की रिश्वत लेते काबू किया गया।  
* 6 नवम्बर को ही प्रवत्र्तन निदेशालय (ई.डी.) ने अनेक प्लाट, फ्लैट, चौपहिया वाहन और बैंकों में जमा राशि सहित ‘पटना मैडीकल कालेज’ के पूर्व सुपरिंटैंडैंट ओ.पी. चौधरी की 3 करोड़ रुपए से अधिक की सम्पत्ति जब्त की। 
* 6 नवम्बर को ही चंडीगढ़ में पंजाब विजीलैंस ब्यूरो ने 2 सिपाहियों सर्बजीत सिंह और इकबाल सिंह तथा 2 अन्य व्यक्तियों जसप्रीत सिंह और सिमरनजीत सिंह को एक बस आप्रेटर के विरुद्ध केस दर्ज करने की धमकी देकर उससे 15,000 रुपए रिश्वत लेते हुए गिरफ्तार किया। 

* 6 नवम्बर को ही विजीलैंस विभाग ने ‘एंटी पावर थैफ्ट थाना’ बङ्क्षठडा में तैनात हवलदार वजीर सिंह को 13,000 रुपए रिश्वत लेते हुए पकड़ा।
* 6 नवम्बरको ही बिहार के बक्सर में एक ‘पोस्टमास्टर’ अरुण कुमार पांडे अपने ही एक कर्मचारी से 11,000 रुपए रिश्वत मांगता काबू आया।
* 6 नवम्बर को ही पटना के गुरु गोङ्क्षबद सिंह अस्पताल में क्लर्क ‘अंजनी कुमार वर्मा’ को शिकायतकत्र्ता से 50,000 रुपए रिश्वत लेते पकड़ा। 
* 6 नवम्बर को ही चंडीगढ़ स्थित सैंट्रल ‘गुड्स एंड सर्विसिज़ टैक्स’  (जी.एस.टी.) विभाग के सुपरिंटैंडैंट को शिकायतकत्र्ता से 20,000 रुपए रिश्वत लेते हुए गिरफ्तार किया । 

* 6 नवम्बर को ही कानपुर के एक फार्मा व्यवसायी को धमका कर उससे 10 लाख रुपए रिश्वत लेने के आरोप में श्रीगंगानगर के जवाहर नगर थाने के कांस्टेबल ‘नरेश चंद्र मीणा’ को भ्रष्टाचार निवारक ब्यूरो ने रिमांड पर लिया।
* 7 नवम्बर को हिमाचल के हमीरपुर में एक रेंज आफिसर को गुप्त सूचना के आधार पर 1000 रुपए रिश्वत लेते हुए पकड़ा गया। ये तो मात्र 12 दिनों की वे घटनाएं हैं जिनकी रिपोर्ट दर्ज हुई है जबकि इनके अलावा भी न जाने कितनी ऐसी घटनाएं हुई होंगी। ऐसी ही घटनाओं को देखते हुए जुलाई, 2011 में केंद्रीय वित्त मंत्रालय में ‘पूर्व मुख्य वित्तीय सलाहकार कौशिक बसु ने कहा था’ कि ‘‘रिश्वत देना क्यों न वैध घोषित कर दिया जाए क्योंकि यह बुराई कतई रुकने वाली नहीं है।’’ 

इसी प्रकार मार्च, 2019 में भारत के प्रमुख न्यायवेत्ता श्री फली एस. नरीमन ने एक भ्रष्टाचार विरोधी गोष्ठी में कहा था कि : ‘‘भारत में भ्रष्टाचार के विरुद्ध अभियान सफल नहीं हुआ है और यह एक सुनामी बन गया है...शायद हम (अपने जीते जी) भ्रष्टाचार का अंत नहीं देखेंगे... मुझे संदेह है कि यहां मौजूद कोई भी व्यक्ति चाहे वह कितना ही युवा क्यों न हो, कभी भ्रष्टाचार का अंत नहीं देख पाएगा...लोगों में भ्रष्टाचार के प्रति सहनशीलता दिखाई दे रही है और हमें इसे सहते रहना होगा।’’ भ्रष्टाचार के मामलों का लगातार सामने आना इस तथ्य का मुंह बोलता प्रमाण है कि इसे नकेल डालने के तमाम सरकारी दावों के बावजूद यह बढ़ता जा रहा है और केवल घोषणाओं से समाप्त होने वाला नहीं है। देश में हजारों अधिकारी और कर्मचारी रिश्वत लेते हुए पकड़े जाने के बावजूद आज भी सरकारी नौकरियों में बने हुए हैं। इसी प्रकार भ्रष्टïाचार में लिप्त रहे अनेक नेता संसद और विधानसभाओं तथा अपने जीवन में यह सभी कुछ कर रहे हैं। 

यदि अधिकारी और कर्मचारी इसी प्रकार भ्रष्टाचार करके देश के उत्थान में लगने वाला ‘करोड़ों-अरबों रुपयों’ का सार्वजनिक धन लूटते रहेंगे तो वह धन व्यर्थ चला जाएगा और देश को घुन की तरह खोखला कर देगा। अत: इस बुराई पर रोक लगाने के लिए सरकार को दोषियों के विरुद्ध कठोर और शिक्षाप्रद कदम उठाने की आवश्यकता है ताकि इस कुप्रवृत्ति पर रोक लगा कर देश का करोड़ों-अरबों रुपया बचाया जा सके और इसके प्रयोग से देश तरक्की की राह पर अग्रसर हो। नरीमन के अपरोक्त विचारों से हम पूर्णत: सहमत हैं कि हमारे देश से भ्रष्टाचार की बुराई कभी समाप्त नहीं होगी और देश इसी प्रकार लुटता रहेगा। हम विस्तारवादी नहीं हैं। लोगों का धन देश की उन्नति के लिए ही है अत: इसका उपयोग देश हित में ही होना चाहिए।—विजय कुमार 

सौजन्य - पंजाब केसरी।

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Editorial : आज के संदर्भ में हमारा पक्का विचार ‘कब्जाखोरी छोड़ो’ ‘विश्व को खुशहाल बनाओ’

आज विश्व एक अजीब माहौल से गुजर रहा है जब सत्ताधारी और प्रभावशाली लोगों ने अपनी सत्ता पर कब्जा बनाए रखने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रखा है और दुनिया एक तरह से ‘कब्जाखोरों’ से घिर गई है। अमरीका तथा विश्व के अन्यदेशों में एक ‘दीवालिया परम्परा

आज विश्व एक अजीब माहौल से गुजर रहा है जब सत्ताधारी और प्रभावशाली लोगों ने अपनी सत्ता पर कब्जा बनाए रखने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रखा है और दुनिया एक तरह से ‘कब्जाखोरों’ से घिर गई है। अमरीका तथा विश्व के अन्यदेशों में एक ‘दीवालिया परम्परा’ है जिसके अंतर्गत लोगों द्वारा मकानों, कारों तथा उधार खरीदी गई अन्य वस्तुओं की किस्तें अदा न करने पर लेनदार उन वस्तुओं पर कब्जा कर लेते हैं। 

इसी प्रकार सत्ताधारी भी अपनी सत्ता बनाए रखने व इसका विस्तार करने के हथकंडे अपना रहे हैं। ऐसा ही हथकंडा अपार सम्पदा के स्वामी अमरीका के राष्ट्रपति ‘डोनाल्ड ट्रम्प’ 1991 और 2009 के बीच अपने ‘होटल तथा कैसिनो व्यवसाय’ को 6 बार दीवालिया घोषित करके आजमा चुके हैं और उनका कहना है कि, ‘‘मैं चुनावों में भी इसी तरह टोटल विक्ट्री प्राप्त करूंगा।’’दिसम्बर 1941 में दूसरे विश्व युद्ध के दौरान रूस के तानाशाह ‘जोसेफ  स्टालिन’ (1878-1953) ने अपने नाम पर बसाए शहर ‘स्टालिनग्राद’ के युद्ध में जर्मन तानाशाह हिटलर की सेनाओं के विरुद्ध पीछे न हटने की जिद में रूसी सेना के 10 लाख से अधिक सैनिक मरवा दिए। हिटलर की सेनाओं को जर्मनी लौट जाने को मजबूर किया और रूसी सेनाएं बर्लिन तक जा पहुंचीं। 

विश्वयुद्ध में जर्मनी को हराने में ‘स्टालिन’ ने भूमिका निभाई व रूसी सेनाओं ने पूर्वी यूरोप के बड़े भाग पर कब्जा कर लिया। लम्बा शासन करने वाला ‘स्टालिन’ अपने अंतिम दिनों में बेहद शक्की हो गया था। सत्ता लिप्सा में वह अपने कई लोगों को शत्रु मानने लगा व जिस पर भी शक हुआ उसे मरवा दिया। ‘स्टालिन’ के बाद सोवियत संघ अनेक छोटे-छोटे देशों में बंट गया व इस समय ‘स्टालिन’ के पदचिन्हों पर चल रहा ‘व्लादिमीर पुतिन’ राज कर रहा है, उसने भी अगले 16 वर्ष अर्थात 2036 तक राष्ट्रपति के पद पर बने रहने के लिए कानून पारित करवा लिया था, परन्तु अब वह ‘पार्किंसन्स रोग से पीड़ित’ हो गया है तथा जनवरी 2021 में पद छोड़ सकता है। 

नेपाल, श्रीलंका, पाकिस्तान, मालदीव, बंगलादेश आदि सहित अनेक देशों की जमीन कब्जाने और अपने कर्ज के जाल में फंसा कर उन्हें भारत विरोधी गतिविधियों के लिए उकसाने वाले चीन के सर्वेसर्वा जिनपिंग ने भी जिंदगी भर राष्ट्रपति रहने की व्यवस्था की है। जहां चीनी नेता शिनजियांग प्रांत में मुसलमानों पर अत्याचारों को लेकर आलोचना झेल रहे हैं, वहीं उन्होंने ‘नेपाल में कई गांवों पर कब्जा’ कर लिया है और पाकिस्तान में भी अपने कई ठिकाने बना लिए हैं। श्रीलंका को भी जाल में फंसा कर उनकी ‘हम्बनटोटा’ बंदरगाह लीज पर ले ली है और बंगलादेश को भी प्रभाव में लेने के लिए जिनपिंग ने उसे 24 बिलियन डालर सहायता देने के अलावा वहां अनेक निर्माण परियोजनाएं शुरू कर दी हैं। चीन ने भारत के ‘पड़ोसी तिब्बत पर भी कब्जा’ कर लिया है और भारत द्वारा तिब्बतियों के धर्मगुरु ‘दलाई लामा’ को भारत में शरण देने पर भी वह भड़का हुआ है। हालांकि भारत ने भी नेपाल, श्रीलंका, बंगलादेश आदि में निवेश किया है परंतु इसके बावजूद इन देशों का झुकाव चीन की ओर ही अधिक है। 

उत्तर कोरिया के लोग ‘किम-उन-जोंग’ की तानाशाही तले पिस रहे हैं जिसने सत्ता पर पकड़ और मजबूत करने के लिए अपनी बहन ‘जो योंग’ को बड़ी जिम्मेदारियां दे दी हैं परंतु अभी भी सारी ताकत अपने हाथों में ही रखी है। ऐसे हालात में हमारा तो यही मानना है कि इस तरह की ‘कब्जाखोरी’ का रुझान गलत है। आखिर ‘दूसरे देशों के भू-भागों’ पर कब्जा करने का क्या लाभ। जो कुछ अपना है उसी में खुश रहो, अपने इस संसार को ठीक करो जिस प्रकार यूरोप तथा विश्व के अन्य अनेक लोकतांत्रिक देश तरक्की कर रहे हैं। लोग दूसरे देशों में जाकर काम करके खुशहाल हो रहे हैं। पाकिस्तान की गुलामी से आजाद होकर बंगलादेश भी तरक्की कर रहा है। ऐसा ही हर जगह होना चाहिए। 

आज भारत में हमने चुनावों को एक व्यवसाय बना लिया है और अनेक बुराइयां हमारे भीतर भी घर कर गई हैं जिसे कदापि उचित नहीं कहा जा सकता। आज आर्मेनिया और अजरबैजान के बीच भयानक युद्ध में हजारों लोग मारे जा चुके हैं और चीन में ‘उइगर मुसलमानों’ पर अमानवीय अत्याचार हो रहे हैं तथा पाकिस्तान में ‘गृह युद्ध’ जैसी स्थिति बनी हुई है, ऐसे हालात के बीच बार-बार यह चर्चा भी सुनाई देती है कि चीन और पाकिस्तान के साथ जारी विवाद के चलते क्या ‘हमारा भी चीन और पाकिस्तान के मध्य युद्ध होगा’। इस समय अमरीका में वीजा पर प्रतिबंध लगे हुए हैं, विश्व के अनेक भागों अमरीका, चीन, रूस, फ्रांस, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, कनाडा, नाइजीरिया, आर्मेनिया और अजरबैजान  आदि में हिंसा फैली हुई है। 

अश्वेतों और मुसलमानों पर हमलों, अत्याचारों और मारकाट के चलते बड़ी संख्या में लोग मारे जा रहे हैं। भारत में भी, जहां अभी तक सभी धर्मों के लोग मिलजुल कर रहते आ रहे हैं, लड़ाई-झगड़े के हालात बन गए हैं। अत: इसी डर से कि कहीं हमारे देश में भी ऐसी स्थितियां न बन जाएं, भारत, चीन और पाकिस्तान आपस में कतई युद्ध नहीं करेंगे, ऐसा हमारा पक्के तौर पर मानना है। संभवत: इसी के मद्देनजर पाकिस्तान, जिसने गुरुद्वारा श्री करतारपुर साहिब का प्रबंधन अपने हाथों में लेकर उसका नाम ‘प्रोजैक्ट बिजनैस प्लान’ कर दिया था, ने फिर से इसका नाम ‘करतारपुर कॉरीडोर प्रोजैक्ट’ रख दिया है। हालांकि इसकी पहले वाली पूरी स्थिति बहाल करने के लिए प्रयास जारी हैं।—विजय कुमार 

सौजन्य - पंजाब केसरी।

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Saturday, October 24, 2020

Editorials : ‘खुदरा महंगाई चोटी पर’ ‘आम आदमी का घरेलू बजट गड़बड़़ाया’

 देश में लगातार बढ़ती महंगाई एक बड़ी समस्या बनती जा रही है। इस समय जहां कोरोना महामारी के कारण लोगों के लिए गुजारा करना मुश्किल हो रहा है वहीं देश में खुदरा महंगाई में लगातार वृद्धि हो रही है। अगस्त में ‘खुदरा मूल्य सूचकांक’ (सी.पी.आई.) पर आधारित महंगाई

देश में लगातार बढ़ती महंगाई एक बड़ी समस्या बनती जा रही है। इस समय जहां कोरोना महामारी के कारण लोगों के लिए गुजारा करना मुश्किल हो रहा है वहीं देश में खुदरा महंगाई में लगातार वृद्धि हो रही है। अगस्त में ‘खुदरा मूल्य सूचकांक’ (सी.पी.आई.) पर आधारित महंगाई दर 6.69 प्रतिशत थी, जो सितम्बर महीने में बढ़ कर 7.34 प्रतिशत पर पहुंच गई। यह इस वर्ष पिछले 8 महीनों का सबसे ऊंचा स्तर है। 

गत वर्ष सितम्बर में खुदरा महंगाई दर 3.99 प्रतिशत थी तथा अक्तूबर 2019 के बाद से खुदरा महंगाई की दर 4 प्रतिशत से ऊपर ही बनी हुई है। इस कारण मसूर, मूंग, उड़द और चने की दालों में 10 से 20 रुपए प्रति किलो तक वृद्धि के अलावा चाय पत्ती और खाद्य तेल के भावों में भी भारी तेजी दर्ज की गई है। राष्ट्रीय स्तर पर सितम्बर में सब्जियों की कीमतों में अगस्त के 11.41 प्रतिशत के मुकाबले में 20.73 प्रतिशत वृद्धि देखने को मिली। इसी प्रकार दालों और इससे जुड़े उत्पादों की कीमतों में 14.67 प्रतिशत की वृद्धि हुई। जो तूअर की दाल 2 सप्ताह पूर्व 80 से 90 रुपए प्रति किलो बिक रही थी वह अब 125 रुपए किलो तक पहुंच गई है। 

एक महीने में ही सरसों का तेल 95 रुपए से बढ़ कर 135 रुपए प्रति लीटर हो गया और राशन का दूसरा सामान भी 20 से 30 प्रतिशत तक महंगा हुआ है। फलों, अंडों और मांस-मछली की कीमतों में भी वृद्धि हुई है। पिछले एक वर्ष की तुलना में आलू की कीमत 107.63 प्रतिशत अधिक है जबकि टमाटर और प्याज सहित हरी सब्जियों के भाव भी आकाश छू रहे हैं। थोक कीमतों पर आधारित मुद्रास्फीति भी सितम्बर में बढ़ कर 1.32 पर जा पहुंची जो गत वर्ष इसी अवधि में 0.33 प्रतिशत थी। 

एक ओर खाद्य वस्तुओं की महंगाई जारी है तो दूसरी ओर पैट्रोल और डीजल के लगातार बढ़ रहे दामों ने लोगों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं जिसका सर्वाधिक प्रभाव मध्यवर्गीय लोगों और कृषक वर्ग पर पड़ रहा है। एक ओर त्यौहारी सीजन शुरू हो रहा है तो दूसरी ओर खाद्य पदार्थों तथा सब्जियों की महंगाई ने आम उपभोक्ताओं का घरेलू बजट बिगाड़ कर उनकी परेशानी बढ़ा दी है। अत: उक्त स्थिति के दृष्टिगत खाद्य मंत्रालय को यथासंभव तुरंत निवारक उपाय करने की जरूरत है ताकि त्यौहारी सीजन में आम जन को महंगाई से कुछ राहत मिले और त्यौहारों का उल्लास फीका न हो।—विजय कुमार

सौजन्य - पंजाब केसरी।
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Sunday, September 6, 2020

‘समूचा विश्व’ अशांति, हिंसा और ‘असहिष्णुता की लपेट में




जैसे-जैसे अनेक देशों की सरकारों में निरंकुशता और स्वार्थलोलुपता बढ़ रही है, उसी अनुपात में लोगों में असंतोष और असहिष्णुता पैदा हो रही है। इससे विश्व में अशांति और हिंसा बढ़ रही ...
जैसे-जैसे अनेक देशों की सरकारों में निरंकुशता और स्वार्थलोलुपता बढ़ रही है, उसी अनुपात में लोगों में असंतोष और असहिष्णुता पैदा हो रही है। इससे विश्व में अशांति और हिंसा बढ़ रही है: 

* 24 अगस्त को पाक अधिकृत कश्मीर के ‘ददियाल’ में लगातार हो रहे मानवाधिकारों के उल्लंघन और अत्याचारों के विरुद्ध लोगों ने बड़े स्तर पर रैली निकाल कर प्रदर्शन किया। 
* 24 अगस्त को ही अमरीका में विस्कांसिन के केनोशा शहर में 2 महिलाओं का झगड़ा निपटा रहे जैकब ब्लैक नामक एक अश्वेत को पुलिस द्वारा गोली मारने के बाद हिंसा भड़क उठी और लोगों ने आगजनी व लूटमार शुरू कर दी। इस दौरान अमरीका के कई शहरों में फैले प्रदर्शनों पर नियंत्रण पाने के लिए पुलिस को बल प्रयोग करना पड़ा जिसमें 2 लोग मारे गए। 

* 25 अगस्त को पाक अधिकृत कश्मीर की राजधानी मुजफ्फराबाद में नीलम और जेहलम नदियों पर चीन द्वारा बांध बनाने के विरुद्ध लोगों ने ‘नदियों पर डैम न बनाओ, सानूं जिंदा रहन देओ’ नारे लगाते हुए विशाल मशाल जलूस निकाला। 
* 25 अगस्त को अफगानिस्तान के प्रांत गोर के शहरक जिले में तालिबान के हमले में 8 पुलिस कर्मचारी मारे गए। 
* 26 अगस्त को चीन सरकार की दमनकारी नीतियों के विरुद्ध हांगकांग में लोकतंत्र समर्थकों द्वारा किए जा रहे सरकार विरोधी प्रदर्शनों के सिलसिले में पुलिस ने 16 लोगों को गिरफ्तार किया।
* 27 अगस्त को अफगानिस्तान के परवान प्रांत में तालिबान आतंकवादियों ने 4 नागरिकों की हत्या कर दी। 

* 29 अगस्त को स्वीडन के मालमो शहर में दक्षिणपंथी कार्यकत्र्ताओं द्वारा कथित रूप से पवित्र कुरान की प्रति जलाने के विरोध में दंगे भड़क उठे। 
मजहबी नारों के बीच पुलिस और बचाव दल के सदस्यों पर पथराव किया गया। सड़कों पर टायर जलाए गए और आग लगाने की कोशिश की गई। 
* 29 अगस्त को अमरीका की राजधानी वाशिंगटन डी.सी. में हजारों लोगों ने नस्लीय भेदभाव और पुलिस बर्बरता के विरुद्ध प्रदर्शन किया। 
इसी दिन विस्कांसिन में एक अदालत के बाहर लगभग 1000 प्रदर्शनकारियों ने जैकब ब्लैक को गोली मारे जाने के विरोध में प्रदर्शन किया। 

* 29 अगस्त को ही लंदन के ट्राफलगर स्क्वायर पर हजारों लोगों ने लॉकडाऊन  लगाने और फेस मास्क का इस्तेमाल अनिवार्य करने के विरुद्ध प्रदर्शन किया। इसी दिन जर्मनी के बर्लिन शहर में कोविड-19 के मद्देनजर लगाई गई पाबंदियों के विरोध में दक्षिणपंथी चरमपंथियों ने प्रदर्शन किया और जर्मन संसद के अंदर घुसने का प्रयास किया। 
* 31 अगस्त को इंगलैंड के लंदन, कनाडा के टोरंटो और अमरीका के न्यूयार्क शहरों में पाकिस्तान सरकार द्वारा बलूच नागरिकों पर अत्याचारों के विरुद्ध प्रदर्शन किए गए। 

* 31 अगस्त को अमरीका के वाशिंगटन और न्यूयार्क शहरों में उइगर मुसलमान समुदाय के सदस्यों ने चीन में उन पर अत्याचारों के विरुद्ध प्रदर्शन करते हुए बीजिंग सरकार के खिलाफ अमरीकी सरकार और संयुक्त राष्ट्र से कार्रवाई करने का अनुरोध किया। इसी दिन बीजिंग में एक उइगर मुसलमान महिला ने अदालत को बताया कि शिनजियांग प्रांत के आइसोलेशन सैंटर में मुस्लिम महिलाओं को सप्ताह में एक बार मुंह ढंक कर निर्वस्त्र होना पड़ता था और उसके बाद उनके शरीर पर रोगाणुनाशक रसायन का छिड़काव किया जाता था। 

* 31 अगस्त को मैक्सिको सिटी में दवाओं की कमी, बेरोजगारी और गैंगवार के चलते जारी हिंसा के विरुद्ध हजारों लोगों ने प्रदर्शन किया। उन्होंने राष्टï्रपति एंड्रेस मैनुअल के विरुद्ध नारे लगाए और उनसे त्यागपत्र की मांग की। प्रदर्शनकारियों ने कहा कि दवा नहीं मिलने के कारण लोगों की मौत हो रही है और सरकार चुप है। 

* 31 अगस्त को ही पाकिस्तान के खैबरपख्तूनख्वाह प्रांत के दक्षिण वजीरीस्तान में सैनिकों पर आतंकवादियों द्वारा की गई अंधाधुंध फायरिंग के परिणामस्वरूप 3 सैनिक मारे गए तथा 3 अन्य घायल हो गए। 
विश्वभर में व्याप्त ङ्क्षहसा और असंतोष के ये तो मात्र 7 दिनों के चंद उदाहरण हैं जबकि इनके अलावा भी विश्व में इस अवधि के दौरान ङ्क्षहसा की न जाने कितनी घटनाएं हुई होंगी और हो रही हैं। राजनीतिक प्रेक्षकों के अनुसार पिछले 25 वर्षों में विश्व में लोकतंत्र की स्थिति कमजोर हुई है और निरकुंश शासन या तानाशाही का समर्थन करने वाली ताकतों की संख्या में वृद्धि हुई है और इन घटनाओं के पीछे  सरकारों की निरंकुश प्रवृत्ति का योगदान भी है। लिहाजा समाज में बढ़ रही हिंसा को देखते हुए यह प्रश्र उठना स्वाभाविक ही है कि आखिर विश्व में वह समय कब आएगा जब लोगों को ऐसी घटनाओं से मुक्ति मिलेगी और वे सुख-शांति से रह पाएंगे।—विजय कुमार 

सौजन्य - पंजाब केसरी।

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Thursday, July 9, 2020

रक्त प्लाज्मा से दूसरों का जीवन बचाएं : Punjab Kesri Editorial


 भले ही भारत में कुछ ऐसी स्वैच्छिक संस्थाएं हैं, जो रक्त प्लाज्मा दान करने का कार्य कर रही हैं। यहां तक कि कुछ लोगों ने रक्त प्लाज्मा की सुविधा से अपने मरीजों को लाभ भी पहुंचाया है। कुछ अमरीका में रहने वाले भारतीयों द्वारा कोरोना वायरस पीड़ितों के लिए रक्त प्लाज्मा की व्यवस्था करने हेतु कई संस्थान बनाए हैं,

भले ही भारत में कुछ ऐसी स्वैच्छिक संस्थाएं हैं, जो रक्त प्लाज्मा दान करने का  कार्य कर रही हैं। यहां तक कि कुछ लोगों ने रक्त प्लाज्मा की सुविधा से अपने मरीजों को लाभ भी पहुंचाया है। कुछ अमरीका में रहने वाले भारतीयों द्वारा कोरोना वायरस पीड़ितों के लिए रक्त प्लाज्मा की व्यवस्था करने हेतु कई संस्थान बनाए हैं, क्योंकि यह एक थैरेपी है जो कइयों की जिंदगियों को बचा सकती है। भारत में निश्चित रूप से भारतीय रैडक्रॉस संस्था है जो लोगों को रक्त प्लाज्मा के लिए प्रेरित कर रही है कि जो लोग इस बीमारी से सफलतापूर्वक लड़कर ठीक हो गए हैं, वे उन रोगियों के लिए अपना प्लाज्मा दान करें जो अब भी गंभीर रूप से पीड़ित हैं। इसके परिणामस्वरूप कुछ और लोग सामने आए हैं जिन्होंने रक्त दान भी किया है, परन्तु ऐसे लोग उंगलियों पर गिने जा सकते हैं जिन्होंने स्वेच्छा से स्वस्थ होने पर अपना प्लाज्मा दान किया है। उल्लेखनीय है कि एक व्यक्ति का प्लाज्मा दो रोगियों की जान बचा सकता है। 

तो कइयों का यह सोचना है कि कोविड-19 महामारी के दौरान रक्तदान करना ठीक नहीं। इसी कारण राजधानी दिल्ली में ब्लड बैंक खाली पड़े हैं, क्योंकि संक्रमण के डर के चलते स्वैच्छिक रक्त प्लाज्मा दान करने की संख्या में गिरावट आई है। उल्लेखनीय है कि दिल्ली सरकार ने भी कुछ दिन पूर्व रक्त प्लाज्मा बैंक शुरू करने का निर्णय लिया है। परन्तु ऐसा नहीं है क्योंकि प्लाज्मा केवल वे लोग दान कर सकते हैं जो कोरोना वायरस की चपेट से स्वस्थ होकर लौटे हैं और उन्हें ये बीमारी कुछ साल तो दोबारा नहीं हो पाएगी। उनके रक्त में वे एंटीबॉडीज हैं जो दूसरों को भी बचा सकती हैं और उन्हें भी सुरक्षित रख सकती हैं। ऐसे में रक्त दान देने से कतराना एक डर से अधिक कुछ नहीं। 

जबकि डाक्टरों ने स्पष्ट रूप से अनेकों निर्देश दिए हैं कि किन हालात में कौन-कौन प्लाज्मा दान दे सकता है। ‘‘यदि किसी का भी जीवन बचाने का मौका आए तो चूकना नहीं चाहिए।’’ यह कहना है उस अमरीकी महिला का जिसने सबसे पहले स्वस्थ होने पर अपना प्लाज्मा दान किया इसी सोच के अंतर्गत शायद न्यूयॉर्क के अस्पतालों में रक्तदान करने के लिए अनेकों ने अपने नाम रजिस्टर करवा रखे हैं तो अब क्या भारतीय दया,दान और उम्मीद की किरण जताने से पीछे हट जाएंगे। 


 सौजन्य - पंजाब केसरी।

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अब चीन से साइबर अटैक का खतरा : Punjab Kesri Editorial

दुनिया भर में इंफोर्मेशन टैक्नोलॉजी की तरक्की ने हमारा जीवन बहुत आसान बना दिया है परंतु इसका दुरुपयोग भी खूब होने लगा है। चूंकि आज सारा काम इंटरनैट और कम्प्यूटरों पर हो रहा है तो हैकर्स से अपने संवेदनशील तथा गोपनीय डाटा


दुनिया भर में इंफोर्मेशन टैक्नोलॉजी की तरक्की ने हमारा जीवन बहुत आसान बना दिया है परंतु इसका दुरुपयोग भी खूब होने लगा है। चूंकि आज सारा काम इंटरनैट और कम्प्यूटरों पर हो रहा है तो हैकर्स से अपने संवेदनशील तथा गोपनीय डाटा की सुरक्षा करना भी बेहद महत्वपूर्ण हो गया है। 

एक रिपोर्ट के अनुसार हाल ही में अमेरिका में सान फ्रांसिस्को की यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया के कम्प्यूटर सिस्टम्स को हैक करने के बाद डाटा लौटाने के लिए हैकर्स ने 1.14 मिलियन डॉलर की फिरौती वसूल की। दूसरी ओर ब्रिटेन की खुफिया एजैंसियां भी चीन सहित अन्य विरोधी देशों की ओर से यू.के. की रिसर्च लैब्स पर हो रहे साइबर अटैक्स को रोकने के लिए अलर्ट हैं। इन लैब्स में कोरोना की दवाई बनाने पर काम चल रहा है।  

साइबर अटैक का खतरा अब भारत पर भी मंडरा रहा है। हाल ही में 59 चाइनीज एप्स को भारत की ओर से बैन करने के बाद से ही चीन की ओर से साइबर अटैक की आशंका जताई जा रही है। ऐसे में सरकार उन सैक्टर्स और कम्पनियों की खास तौर से निगरानी कर रही है जिनमें चीन की ओर से निवेश किया गया है। 

ऐसे सैक्टर्स में कम्युनिकेशन और पावर के अलावा फाइनांशियल सैक्टर तक शामिल हैं। साइबर जगत के विशेषज्ञों का मानना है कि एप्स को बैन करना केवल एक शुरूआत है और इससे भड़का चीन बदले में भारतीय साइबर स्पेस को नुक्सान पहुंचाने की कोशिश कर सकता है। कुछ अधिकारियों के अनुसार लगभग सभी सैक्टर्स में पहले से बेहतर निगरानी की जा रही है। इसके अलावा पावर, टैलीकॉम और फाइनांशियल सर्विसेज से जुड़े सैक्टर्स का चाइनीज इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़ाव होने के चलते उन्हें भी अलर्ट पर रखा गया है। एक अधिकारी ने कहा, ‘‘कई वर्षों से हमने चीन को क्रिटिकल इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश की अनुमति दे रखी थी, ऐसे में उन नैटवक्र्स तक चीन की पहुंच है। इनमें कम्युनिकेशंस, पावर के अलावा फाइनांशियल सैक्टर भी शामिल हैं।’’

खतरा इस बात का है कि रिमोट लोकेशन्स से चीन भारत के इन नैटवक्र्स पर साइबर अटैक कर सकता है, इसे लेकर सभी संबंधितों से अलर्ट रहने के लिए कहा गया है। साइबर विशेषज्ञों के अनुसार सरकार उन कम्पनियों पर फोकस करेगी जिनमें चाइनीज निवेशकों की ओर से फंडिंग की गई है और इनकी निगरानी और सर्विलान्स अलग-अलग स्तर पर किया जाएगा। इसके अलावा सरकारी और प्राइवेट सैक्टर में इस्तेमाल किए जा रहे चीन में बने सर्विलांस डिवाइसेस पर भी नजर रखी जा रही है। एक विशेषज्ञ के अनुसार मौजूदा आर्थिक परिस्थितियों में कोई भी देश सीमा पर युद्ध के लिए तैयार नहीं है, ऐसे में साइबर स्पेस, ट्रेड और सप्लाई चेन को प्रभावित कर नुक्सान पहुंचाने की कोशिश जरूर की जा सकती है। चीन की ओर से फंडिंग पाने वाली कम्पनियों और खासकर टैक फम्र्स की अब निगरानी की जा रही है क्योंकि इन्हें आसानी से निशाना बनाया जा सकता है। 

पहले भी चाइनीज हैकर्स से जुड़ी चेतावनी सरकार की ओर से दी जा चुकी है और चीन की ओर से पहले भी डाटा पाने के लिए अटैक किए जाते रहे हैं और पिछले साल लाखों भारतीयों का मैडीकल डाटा चोरी होने का मामला सामने आया था। पिछले कुछ दिनों की ही बात करें तो चीन की ओर से साइबर अटैक के मामले तेजी से बढ़े हैं। गत माह ही महाराष्ट्र के साइबर विभाग ने एडवाइजरी जारी कर चेतावनी दी थी कि चीन के साइबर अपराधी बड़े स्तर पर फिशिंग हमले की योजना बना रहे हैं। राज्य साइबर विभाग के स्पैशल आई.जी. ने कहा था कि 4-5 दिनों में ही भारत के साइबर स्पेस पर संसाधन, जो खासकर सूचना, इंफ्रास्ट्रक्चर और बैंकिंग से जुड़े हैं, उन पर चीन से हमले किए जा रहे हैं। उन्होंने बताया था कि कम से कम ऐसे 40,300 साइबर हमलों की कोशिश हुई जिसमें से अधिकतर की ट्रेसिंग चीन के चेंगदू क्षेत्र में हुई है। 

ऐसे में बेहद जरूरी है कि इंटरनैट के सुरक्षित उपयोग के बारे में सभी संबंधित लोगों को जागरूक किया जाए। जैसे कि सोशल मीडिया पर किसी अनचाहे ईमेल, एस.एम.एस. या मैसेज में दिए अटैचमैंट को खोलने या क्लिक करने से बचें। ईमेल, वैबसाइट में वर्तनी की गलती और अज्ञात ईमेल भेजने वालों से भी सावधान रहें। इन दिनों ऐसे ई-मेल या लिंक से विशेष रूप से सावधान रहें जो खास ऑफर के साथ हों जैसे कोविड-19 टेस्टिंग, कोविड-19 मदद, ईनामी राशि, कैशबैक ऑफर्स आदि। किसी भी लिंक पर क्लिक करने या लॉगइन करने से पहले उसके यू.आर.एल. को अवश्य चैक कर लें।

सौजन्य - पंजाब केसरी।

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Thursday, January 16, 2020

डाक्टरों की लापरवाही से सरकारी अस्पतालों में रोगियों को असुविधा और मौतें

लोगों को सस्ती और स्तरीय शिक्षा एवं चिकित्सा,स्वच्छ पेयजल और लगातार बिजली उपलब्ध करवाना हमारी केंद्र और राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है परंतु ये दोनों ही इसमें विफल रही हैं और इसीलिए सरकारी स्कूलों में अपने बच्चों को पढ़ाने तथा सरकारी अस्पतालों में इलाज के दौरान होने वाली लापरवाही के कारण लोग वहां इलाज के लिए जाने से संकोच करते हैं।
09 जनवरी को मोगा के सरकारी अस्पताल के मैटर्निटी वार्ड में एक महिला ने फर्श पर बच्चे को जन्म दिया। उसने आरोप लगाया कि अस्पताल का स्टाफ उसके कराहने की आवाजें सुन कर भी सहायता के लिए नहीं आया।
10 जनवरी को उत्तर प्रदेश में जौनपुर के शाहगंज सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में प्रसव के लिए आई महिला की मौत हो गई। मृतका के परिजनों का आरोप है कि डाक्टरों ने बहुत देर तक उसे देखा ही नहीं जिस कारण उसकी तबीयत बिगड़ती चली गई जो उसकी मृत्यु का कारण बनी।
12 जनवरी को उत्तर प्रदेश के मानीमऊ स्थित सरकारी अस्पताल में प्रसव के लिए आई महिला के शरीर से डाक्टरों की लापरवाही से बहुत देर तक रक्त बहने के कारण उसकी मृत्यु हो गई। मृतका के परिजनों के अनुसार जब उन्होंने डाक्टरों से इसकी शिकायत की तो उन्होंने यह कह कर उन्हें आश्वस्त कर दिया कि जल्दी ही आराम आ जाएगा परंतु हुआ इसके विपरीत।
13 जनवरी को उत्तर प्रदेश में रायबरेली के काजीखेड़ा गांव की एक महिला की नसबंदी आप्रेशन के दौरान बरती गई लापरवाही के परिणामस्वरूप तबीयत बिगड़ जाने से मृत्यु हो गई।
14 जनवरी को फर्रुखाबाद के एक अस्पताल में आप्रेशन थिएटर में घुस कर आवारा कुत्ते ने वहां सिजेरियन आप्रेशन से जन्मे बच्चे को नोच-नोच कर मार डाला।
14 जनवरी को ही मध्य प्रदेश में शहडोल के बच्चा वार्ड में 12 घंटों के भीतर 6 नवजात बच्चों की मृत्यु का खुलासा हुआ।

उपरोक्त उदाहरणों से सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि स्टाफ, बुनियादी ढांचे की कमी और कुप्रबंधन के शिकार हमारे सरकारी अस्पताल किस कदर बदहाली के शिकार हो चुके हैं। डाक्टरों को कम से कम 60 हजार से 2 लाख रुपए या उससे भी अधिक मासिक वेतन मिलने के बावजूद करोड़ों रुपयों की लागत से निर्मित सरकारी अस्पतालों की यह दुर्दशा निश्चय ही एक ज्वलंत समस्या है जो दूर होनी चाहिए।  —विजय कुमार
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