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-Rajeev Kumar (Editor-in-chief)

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Wednesday, March 24, 2021

सिंधु संवाद से आशाएं (प्रभात खबर)

ढाई साल से अधिक समय की तनावपूर्ण अवधि के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल संधि से संबंधित बैठक हो रही है. वैसे तो दोनों पड़ोसियों के संबंधों में लगातार तनातनी रहती है, लेकिन पिछले कुछ सालों में जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद और अलगाववाद बढ़ाने में पाकिस्तान की अधिक सक्रियता के कारण दोनों देशों के बीच संवाद की प्रक्रिया स्थगित हो गयी थी. पुलवामा में पाकिस्तान-समर्थित आतंकियों द्वारा भारतीय सुरक्षाबलों के एक काफिले पर हमले के बाद भारत को पाक-अधिकृत कश्मीर में बालाकोट में स्थित आतंकी ठिकानों पर हवाई हमला करना पड़ा था.



उस कार्रवाई के जरिये भारत ने स्पष्ट संकेत दिया था कि आतंकी हमलों को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता. जम्मू-कश्मीर की संवैधानिक और प्रशासनिक संरचना में बदलाव से बौखलाये पाकिस्तान ने आतंकियों की घुसपैठ बढ़ाने के इरादे से नियंत्रण रेखा व अंतरराष्ट्रीय सीमा पर लगातार युद्धविराम का उल्लंघन कर भारत के धैर्य को चुनौती देने की कोशिश की.



इसका एक नतीजा यह हुआ कि सिंधु और उसकी सहायक नदियों के पानी के बंटवारे और इससे जुड़ी परियोजनाओं पर बातचीत के सिलसिले पर विराम लग गया. बीते दिनों दोनों देश युद्धविराम के समझौते के पालन पर फिर सहमत हुए हैं और इससे यह उम्मीद बढ़ी है कि सभी द्विपक्षीय मसलों पर संवाद की प्रक्रिया एक बार फिर शुरू हो सकेगी. इस कड़ी में सिंधु जल प्रबंधन पर चर्चा स्वागतयोग्य है. साल 1960 में हुए समझौते के प्रावधान के अनुसार दोनों देशों के आयोगों की सालाना बैठक अपेक्षित है.


हालांकि इस बैठक से अनेक उम्मीदें जुड़ी हुई हैं, पर ऐसा अंदेशा है कि पाकिस्तान अपनी आदत के मुताबिक भारतीय परियोजनाओं पर सवाल उठायेगा. समझौते में विभिन्न नदियों के पानी के उपयोग तथा नदियों पर विद्युत परियोजनाएं लगाने के बारे में स्पष्ट प्रावधान हैं. पूर्वी नदियों- सतलुज, ब्यास और रावी के कुल पानी- लगभग 33 मिलियन एकड़ फीट- का निर्बाध रूप से सालाना इस्तेमाल कर सकता है. पाकिस्तान के हिस्से में पश्चिमी नदियों- सिंधु, झेलम और चेनाब- का लगभग 135 मिलियन एकड़ फीट पानी है.


समझौते में पाकिस्तान को यह अधिकार भी है कि पश्चिमी नदियों पर भारत की जलविद्युत परियोजनाओं की रूप-रेखा पर चिंता जता सकता है तथा उनका परीक्षण कर सकता है. भारत ने हमेशा पाकिस्तान के इस अधिकार का सम्मान किया है. फिर भी ऐसी आशंका है कि वह पहले की परियोजनाओं के साथ लद्दाख क्षेत्र में प्रस्तावित आठ परियोजनाओं पर सवाल उठाये.


उसका यह रवैया नदियों से संबंधित नहीं होकर भू-राजनीतिक रणनीति से अधिक प्रेरित हो सकता है. विभिन्न मामलों में चीन के साथ पाकिस्तान की जुगलबंदी पूरी दुनिया के सामने है. अंदेशों के बावजूद यह कहा जा सकता है कि दोनों देशों के बीच अमन-चैन की दिशा में यह बातचीत मील का पत्थर साबित हो सकती है. दो सालों से रुके अटारी-वाघा चौकी के रास्ते होनेवाले व्यापार के शुरू होने की उम्मीद भी बढ़ी है.

सौजन्य - प्रभात खबर।

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दिलचस्प हो गया है असम चुनाव (प्रभात खबर)

By रशीद किदवई 

 

देश के पांच राज्यों पश्चिम बंगाल, असम, केरल, तमिलनाडु और पुदुचेरी में विधानसभा चुनाव की गहमागहमी चल रही है. बंगाल और केरल के साथ ही असम चुनाव पर भी लोगों की नजर है. चुनावी विश्लेषक असम में भाजपा को मजबूत बता रहे थे, लेकिन कांग्रेस की सक्रियता और सोची-समझी रणनीति के तहत उठाये जा रहे कदमों से अब वहां भी मामला बराबर का दिखाई देने लगा है.



शुरुआती धारणाओं के विपरीत कांग्रेस ने असम चुनाव में भाजपा के सामने कड़ी चुनौती खड़ी कर दी है. भाजपा को हेमंत बिस्वा सरमा के प्रभाव और उससे भी ज्यादा मुस्लिम विरोधी सांप्रदायिक कार्ड पर पूरा भरोसा था. उसे यह भी लगता था कि हेमंता के कांग्रेस छोड़ देने के बाद कांग्रेस संगठन चरमरा गयी है. शुरुआत में ऐसा नजर भी आ रहा था. लेकिन, आज असम की तस्वीर भिन्न है. अब कांग्रेसी खेमे में हर दिन जीत की रणनीति पर बात हो रही है.



आश्चर्यजनक रूप से कांग्रेस कार्यकर्ता विधानसभा सीटों पर बूथ तक सक्रिय हो गये हैं. कांग्रेस ने जो गठबंधन किया है, वह भाजपा के लिए परेशानी का सबब बन गया है. बदरुद्दीन अजमल की पार्टी एआइयूडीएफ से गठबंधन के बाद कांग्रेस की सीटों में इजाफा होने के संकेत हैं. बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट (बीपीएफ) से हुए समझौते का लाभ भी कांग्रेस को मिलेगा. यह पहले भाजपा के साथ था.


कांग्रेस ने अपने चुनावी वादों को गारंटी कहा है. इनमें सीएए लागू नहीं करने की गारंटी के अलावा हर गृहिणी को प्रतिमाह 2000 रुपये, पांच लाख सरकारी नौकरियां, 200 यूनिट तक मुफ्त बिजली की घोषणा है, जिससे हर घर में लगभग 14 सौ रुपये प्रतिमाह की बचत हो सकेगी. इनमें सबसे बड़ी गारंटी चाय बागान मजदूरों को प्रतिदिन 365 रुपये मजदूरी देने की है.


कांग्रेस नये-नये दांव खेल रही है, स्वाभाविक ही उससे बीजेपी खेमे में चिंता है. भाजपा असम में शुरू से ही सांप्रदायिक कार्ड खेल रही थी. कांग्रेस उससे अलग हट कर गंभीर मसले उठा रही है. फिलहाल, भाजपा के पास कोई ढंग का उत्तर या जनता के लिए ऑफर नहीं है, सो उसके नेता अब सीधे एआइयूडीएफ पर हल्ला बोल रहे हैं. भाजपा नेताओं में अमित शाह से लेकर जेपी नड्डा और शिवराज सिंह चौहान तक एआइयूडीएफ विरोधी उन्मादी बयान दे रहे हैं.


यह नेता आज एआइयूडीएफ को सांप्रदायिक कह रहे हैं, लेकिन इसी भाजपा ने असम के नगांव विधानसभा क्षेत्र के स्थानीय निकाय चुनाव में एआइयूडीएफ के साथ समझौता किया था. शिवसेना तो उनकी पुरानी साथी थी ही और तब वह सांप्रदायिक भी नहीं थी. कांग्रेस खेमे का कहना है कि भाजपा आज असम में सरकार बनाने की लालसा लिये जिस रास्ते पर चल रही है, उसने असम की पहचान, असमिया संस्कृति को ही खतरे में डाल दी है.


कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा है कि कांग्रेस असम के उस विचार की हिफाजत करने का वादा करती है, जिसमें संस्कृति, भाषा, परंपरा, इतिहास और सोचने का तरीका समाहित है. कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष ने मीडिया से कहा कि आप जानते हैं कि भाजपा और आरएसएस संपूर्ण भारत और असम की विविधतापूर्ण संस्कृति पर हमले कर रहे हैं. हम इसकी रक्षा करेंगे. उन्होंने लोगों से कहा कि पार्टी के चुनावी घोषणा-पत्र में कांग्रेस का चुनाव चिह्न जरूर बना है, लेकिन असल में यह आम जनता का घोषणा पत्र है. उनके शब्द थे ‘इसमें असम के लोगों की आकांक्षाएं समाहित हैं.’


असम में अब न तो नरेंद्र मोदी, न अमित शाह, न जेपी नड्डा और न सर्बानंद सोनोवाल सीएए की बात कर रहे हैं. उन्हें मालूम है कि यहां सीएए का मुद्दा बीजेपी के खिलाफ जायेगा. अलबत्ता हिंदुत्ववादी पार्टी असम में घुसपैठ रोकने के नाम पर पांच साल और मांग रही है, हालांकि वह वोटर को यह नहीं बता पा रही है कि पिछले पांच साल में उसने कितने घुसपैठियों को वापस भेजा या घुसपैठ रोकने के लिए सीमा पर क्या किया?


असम की राजनीतिक परिस्थितियां समझने के साथ ही वहां की भौगोलिक जानकारी रखने वाले कहते हैं कि भाजपा प्रदेश से सटी बांग्लादेश सीमा को पूरी तरह बंद करने के प्रयास कभी नहीं करती. सीमा पर भाजपा कोई सख्ती इसलिए भी नहीं दिखाती, क्योंकि कथित तौर पर भारत के इस हिस्से से बड़े पैमाने पर गौ-तस्करी होती है.


चुनाव प्रचार की गर्मी बढ़ने के साथ असम में परिस्थितियां बदल रही हैं. भाजपा और कांग्रेस दोनों ही अपने मतादाताओं को रिझाने में लगे हैं. असम में चुनाव का स्थानीय स्तर पर आकलन करनेवाले कहते हैं कि कथित मुख्यधारा का मीडिया सारी बातों का आकलन अपनी सुविधानुसार करने में लगा हुआ है. उसे देखकर लगता है कि वह उसी मुस्लिम विरोधी धारणा के निर्माण में लगा है, जो बीजेपी के अनुकूल है. बिना इस बात की चिंता किये कि इस तरह के ध्रुवीकरण के नतीजे क्या होंगे!


असम में तीन चरण में मतदान होने हैं. पहले चरण के लिए 27 मार्च को वोट डाले जायेंगे. दूसरे चरण का मतदान 1 अप्रैल को जबकि 6 अप्रैल को तीसरे दौर के साथ वहां मतदान संपन्न होगा. देखना दिलचस्प होगा कि इस बार असम के मतदाता क्या फैसला सुनाते हैं. वर्ष 2016 के विधानसभा चुनाव में वहां के मतदाताओं ने भाजपा को भरपूर समर्थन देकर सबको चौंका दिया था. इस बार असम पर सब की नजरें लगी हुई हैं कि यह चुनाव क्या रुख इख्तियार करते हैं.

सौजन्य - प्रभात खबर।

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गंगा-पद्मा मैत्रीबंधन होगा सशक्त (प्रभात खबर)

भारत और बांग्लादेश की पचास साल की मित्रता द्विपक्षीय संबंधों का एक आदर्श उदाहरण बन चुकी है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस अनूठी मैत्री के पांच दशक पूरा होने और 'मुजीब बोरशो' (बांग्लादेश के संस्थापक बंग बंधु शेख मुजीबुर रहमान की जन्मशताब्दी) के उपलक्ष्य में आयोजित विशेष कार्यक्रम में सम्मिलित होने के लिए दो दिवसीय यात्रा पर बांग्लादेश जायेंगे.


यह दौरा 26 और 27 मार्च को होगा. दोनों देशों के बीच यह विश्वसनीय, अद्वितीय और अपरिहार्य साझेदारी बंगाल की खाड़ी क्षेत्र और भारत के पूर्वी पड़ोस में प्रगति, समृद्धि और स्थिरता की महत्वपूर्ण कुंजी है.


भारत और बांग्लादेश सभ्यतागत और सांस्कृतिक संबंधों को साझा करते हैं. बांग्लादेश के राष्ट्रगान ‘आमार सोनार बांग्ला’ और भारत के राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ के रचनाकार गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर को दोनों देशों में एकसामान रूप से आदर और सम्मान दिया जाता है. बांग्लादेश के कुश्तिया जिले (जो अब शिलादाहा में है) में अपनी पारिवारिक संपत्ति की देखभाल करते हुए कविगुरु टैगोर की मुलाकात गगन हरकारा और लालन फकीर से हुई थी, जिन्होंने उन्हें बहुत प्रभावित किया था.

दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक सम्मिश्रण और संयोजन की इस विरासत ने चलचित्रों, संगीत और खान-पान के परिदृश्य को न केवल समृद्ध किया है, अपितु एक जीवंत आदान-प्रदान की निरंतर प्रक्रिया भी स्थापित की है. बांग्लादेश में भारतीय फिल्मों और टीवी धारावाहिकों की बड़ी लोकप्रियता है. साथ ही, बांग्लादेश के कलाकार भारतीय फिल्मों में भी काम करते रहे हैं.


उदाहरण के लिए, जया अहसन ने समीक्षकों द्वारा प्रशंसित ‘विसर्जन’ और ‘एक जे छिलो राज’ जैसी फिल्मों में अभिनय किया है. बांग्लादेश की राष्ट्रीय मछली हिलसा या ईलिश बंगाली लोगों में सबसे लोकप्रिय है. भारत में खाने-पीने के शौकीन मॉनसून का बेसब्री से इंतजार करते हैं, जब पद्मा नदी की हिलसा से उनकी रसोई के पकवानों में चार चांद लग जाता है. इसके बरक्स बांग्लादेश में तंदूरी चिकेन और मसाला डोसा भी समान रूप से लोकप्रिय हैं और लोगों को खूब भाते हैं.


दोनों देश रेल, सड़क और हवाई मार्ग से जुड़े हुए हैं. साल 2008 में कोलकाता और ढाका के बीच रेलवे संपर्क को 43 साल के अंतराल के बाद मैत्री एक्सप्रेस के साथ पुनर्जीवित किया गया था. वर्तमान में दोनों देश पेट्रापोल (भारत) और बेनापोल (बांग्लादेश), सिंघाबाद (भारत) और रोहनपुर (बांग्लादेश), गेदे (भारत) और दर्शन (बांग्लादेश) के बीच यातायात प्रारंभ करने के लिए 1965 से पूर्व की स्थिति बहाल करने का प्रयास कर रहे हैं.


प्रधानमंत्री मोदी और प्रधानमंत्री शेख हसीना ने 55 साल के बाद हल्दीबाड़ी-चिल्हाटी रेल संपर्क को पुनर्जीवित किया है. दोनों देशों के बीच 'एयर बबल' (हवाई गलियारा) समझौते के माध्यम से वायुमार्ग खोलना उन लोगों के लिए राहत भरा होगा, जो भारत में उपचार के लिए आते हैं. त्रिपुरा में सबरूम जिले को बांग्लादेश के रामगढ़ से जोड़नेवाली फेनी नदी पर 'मैत्री सेतु’ का उद्घाटन न केवल भारत की पड़ोस की प्राथमिकता को रेखांकित करता है, बल्कि यह चटगांव बंदरगाह के साथ भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को जोड़ने के लिए एक महत्वपूर्ण कड़ी प्रदान करता है.


व्यापार और वाणिज्य के लिए दोनों देशों के लिए यह एक सुखद स्थिति है. पिछले एक दशक में द्विपक्षीय व्यापार लगातार बढ़ा है. इससे बांग्लादेश दक्षिण एशिया में भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार बन गया है. इस क्षेत्र में विस्तार की असीम संभावनाएं हैं. आज जब बांग्लादेश अपनी स्वतंत्रता की स्वर्ण जयंती और पड़ोसी मित्र भारत के साथ राजनयिक संबंधों की 50वीं वर्षगांठ मना रहा है, तो बीते पांच दशकों में हुए बदलाव को भी रेखांकित किया जाना चाहिए.


पाकिस्तान से बांग्लादेश की मुक्ति के समय, जब बांग्लादेश नरसंहार, प्राकृतिक आपदा और भुखमरी से त्रस्त था, तब तत्कालीन अमेरिकी विदेश सचिव हेनरी किसिंजर ने देश के भविष्य को लेकर हताशापूर्ण टिप्पणी की थी. लेकिन आज भारत की तरह बांग्लादेश भी गर्व के साथ दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है. दोनों देशों के मध्य व्यापार-वाणिज्य की अपार संभावनाओं का अभी भी दोहन करने की आवश्यकता है. वर्तमान में बांग्लादेश के साथ व्यापार भारत के व्यापार का सिर्फ एक प्रतिशत और बांग्लादेश के व्यापार का मात्र 10 प्रतिशत है.


यातायात, परिवहन और अनेक सुधारों के जरिये बेहतर माहौल बनाने के प्रयासों से संबंधों को उत्तरोत्तर गति मिली है और ये प्रयास नये-नये अवसर पैदा कर रहे हैं. समझौतों और परियोजनाओं के समय पर कार्यान्वयन से दोनों अर्थव्यवस्थाओं को निश्चित ही काफी बढ़ावा मिलेगा.


प्रकृति का अंधाधुंध विनाश हमारे समय की प्रमुख चुनौती है. भारत और बांग्लादेश दुनिया के सबसे बड़े सदाबहार वन 'सुंदरवन' का घर हैं. यह अनन्य और दुर्लभ वनस्पतियों और जीवों का आश्रय है तथा लाखों लोगों को आजीविका प्रदान करता है. इतना ही नहीं, सुंदरवन दोनों देशों के तटीय इलाकों में भयावह चक्रवातों के खिलाफ एक प्राकृतिक कवच के रूप में कार्य करता है और जान-माल की हिफाजत करता है.


वनों की कटाई और तस्करों से सुंदरवन की रक्षा के लिए दोनों सरकारों के बीच एक व्यापक नीति विकसित करना समय की जरूरत है. सुंदरवन के दुर्गम इलाके और पारगम्य सीमा ने तस्करों और आतंकवादियों को इसके माध्यम से मानव, हथियार और नशीले पदार्थों की तस्करी के लिए आकर्षित किया है. दोनों देशों में खुफिया और कानून प्रवर्तन संस्थाओं को इस खतरे को रोकने के लिए बेहतर समन्वय और खुफिया जानकारी साझा करने की दिशा में चल रहे प्रयासों को और मजबूत करने की जरूरत है.


यह एक शानदार पहलू है कि भारत और बांग्लादेश के बीच 54 नदियां बहती हैं. पारवर्ती नदियों में जल का बंटवारा और प्रदूषण ऐसे मुद्दे हैं, जिन्हें जल्द और सौहार्दपूर्वक हल करने की आवश्यकता है. कुछ विषमताओं के बावजूद, सक्रिय आर्थिक और सुरक्षा सहयोग दोनों देशों के पारस्परिक हित में हैं. दोनों सरकारों को इस मंत्र को अंगीकार करना चाहिए और इसे लागू करने की दिशा में सतत प्रयत्नशील रहना चाहिए. आशा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आगामी यात्रा गंगा-पद्मा मैत्री बंधन को सशक्त करने के साथ ही परस्पर संबंधों के नये आयामों को नयी दिशा देने का कार्य करेगी.

सौजन्य - प्रभात खबर।

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Tuesday, March 23, 2021

पहचानों की परस्पर लड़ाई का चुनाव (प्रभात खबर)

By प्रभु चावला 

 

वर्तमान चुनावी हंगामा अदम्य पहचानों के बीच जोरदार लड़ाई है, विचारधाराओं के बीच नहीं. राजनीतिक दल और उनके नेता दुख दूर करने के प्रगतिशील प्रस्तावों पर भी बहुत कम बोलते हुए हाशिये के भारतीयों को संबोधित नहीं करते. समृद्ध भारत में संपत्ति के उचित वितरण का कोई वादा सामने नहीं रखा जा रहा है. इसके बजाय वे अपने वैचारिक मतदाताओं के वर्ग को परिभाषित करने के लिए राष्ट्रीय विविधता का दोहन करते हैं.



बेहद लोकप्रिय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में उभरती भाजपा ने तय किया है कि विविधता से भरा भारत समान सांस्कृतिक और राजनीतिक छतरी के नीचे ही तेजी से विकास कर सकता है. हर राज्य में डबल इंजन की सरकार के चुनाव का इसका नारा सहकारी संघवाद के बरक्स राजनीतिक केंद्रवाद के स्थापत्य को प्रमुखता देता है.



यह मान लिया गया है कि केंद्र में सत्तारूढ़ दल के हाथ में राज्यों की सत्ता भी हो, ताकि सभी नीतियां बिना बाधा लागू हो सकें. लेकिन भाजपा के एक समान भारत के विचार को न केवल क्षेत्रीय क्षत्रपों, बल्कि कांग्रेस और वाम जैसे राष्ट्रीय दलों की भी उग्र चुनौती मिल रही है, जो मतदाताओं से उनकी विशिष्ट सांस्कृतिक, धार्मिक और सामाजिक पहचान को बचाने का आह्वान कर रहे हैं.


असम में भाजपा की सरकार है और वह पूर्वी भारत में अपने राजनीतिक साम्राज्य को मजबूत करने के लिए बंगाल जीतने की आंकाक्षी है. दिल्ली स्थानांतरित होने से पहले कोलकाता ब्रिटिश शासन की राजधानी था और अब भी भद्रलोक के नेतृत्व में देश की बौद्धिक राजनीति होने का दावा करता है. अमित शाह और उनके दस्ते ने बंगाल जीतने के साथ तमिलनाडु, पुद्दुचेरी और केरल में दो अंकों में सीटें पाने का लक्ष्य रखा है.


देश की कुल 4121 विधानसभाओं में से सांस्कृतिक एवं राजनीतिक रूप से विविधतापूर्ण पांच राज्यों के इस चुनाव में 624 सीटों पर मतदान होगा. इनमें से भाजपा के पास अभी केवल 65 सीटें हैं, जबकि कांग्रेस के पास 115 और ममता बनर्जी के पास 211 विधायक हैं. तमिलनाडु में अन्ना द्रमुक और द्रमुक के पास तीन-चौथाई से अधिक सीटें हैं. केरल में वाम गठबंधन और कांग्रेस गठबंधन के खाते में लगभग सौ प्रतिशत सीटें हैं, जबकि भाजपा का केवल एक विधायक है.


अमित शाह की रणनीतिक प्रतिभा से संचालित मोदी की भाजपा लक्ष्य-आधारित अभियान चला रही है. वे पहले संख्या तय करते हैं और फिर उसके हिसाब से नारों, संसाधनों, लोगों और रणनीति की व्यवस्था करते हैं. साल 2016 में जीतीं तीन सीटों के बरक्स उन्होंने इस बार 200 का आंकड़ा पार करने का फैसला किया है. असम में शाह ने पार्टी को 2016 से 40 सीटें अधिक जीतकर शतक बनाने का निर्देश दिया है.


लेकिन सभी राज्यों में जीत का सूत्र एक ही है. यह जय श्रीराम से शुरू होता है और विकास के साथ समाप्त होता है. इनके बीच प्रचारकों को इस बात पर जोर देने को कहा गया है कि इन राज्यों में भ्रष्टाचार, तुष्टिकरण की राजनीति और वंशवाद के वर्चस्व के कारण बीते 70 सालों से विकास अवरुद्ध रहा है. पश्चिम बंगाल में ही राष्ट्रवाद और क्षेत्रवाद के बीच असली लड़ाई लड़ी जा रही है.


यहां प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री की प्रतिष्ठा भी दांव पर है. ममता बनर्जी आक्रामकता के साथ अपनी क्षेत्रीय पहचान को सामने रख रही हैं, तो भाजपा भी राज्य को केसरिया छतरी के नीचे लाने के लिए हरसंभव कोशिश कर रही है. ममता बनर्जी के दस साल के शासन की थकान और अल्पसंख्यक तुष्टिकरण का लाभ उठाते हुए भाजपा दो सालों से हिंदू वोटों को लामबंद करने में लगी है.


इसने पहले कहीं भी इतनी ऊर्जा और वित्तीय संसाधन नहीं झोंका है. तृणमूल कांग्रेस ने इस चुनाव को बाहरी बनाम भीतरी की लड़ाई बना दिया है और वह भाजपा पर अकेली महिला मुख्यमंत्री के विरुद्ध षड्यंत्र रचने और बंगाल की सांस्कृतिक एकता से खिलवाड़ करने का आरोप लगा रही है.


पहचान के असमंजस ने लगभग सभी राज्यों में लगभग सभी पार्टियों के राजनीतिक अवसरवाद का खुलासा कर दिया है. भाजपा पूरे विपक्ष पर अल्पसंख्यकों और अवैध आप्रवासन के प्रति नरमी का आरोप लगाती है, पर इसने भी असम में अपना रवैया नरम कर दिया है. बंगाल में वह नागरिकता संशोधन कानून लागू करने का वादा कर रही है, लेकिन स्थानीय हिंदुओं व मुस्लिमों की नाराजगी से बचने के लिए असम में वह चुप है.


दक्षिण में क्षेत्रीय पार्टियां राष्ट्रीय एक समानता के लिए संघवाद पर अपने रुख को नहीं छोड़ना चाहती हैं. तमिलनाडु में सत्तारूढ़ अन्ना द्रमुक ने संसद में नागरिकता संशोधन कानून के पक्ष में मतदान किया था, पर अब वह धार्मिक पहचान से परहेज करनेवाली अपनी द्रविड़ छाप बनाये रखने के लिए इस कानून की वापसी चाहती है. प्रधानमंत्री मोदी ने तमिल संस्कृति से जुड़ने के महत्व को समझा है.


अपने हालिया ‘मन की बात’ संबोधन में उन्होंने दुनिया की सबसे पुरानी भाषा तमिल को न सीख पाने के लिए अफसोस जताया. असम में उन्होंने कांग्रेस पर उन लोगों का साथ देने का आरोप लगाया, जो असम चाय को बर्बाद करना चाहते हैं. कोरोना टीका लगवाते समय उन्होंने असम का गमछा पहना था और नर्सें केरल और पुद्दुचेरी से थीं. इसे टीकाकारों ने क्षेत्रीय पहुंच बनाने की कोशिश के रूप में देखा है.

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भगत सिंह के सपनों का भारत (प्रभात खबर)

By प्रो एस इरफान हबीब 

 

 

भगत सिंह महज एक शहीद नहीं हैं. बेशक उनकी शहादत हमारे लिए बहुत मायने रखती है, लेकिन भगत सिंह की शहादत भर का सम्मान करना उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि नहीं होगी, अगर हम उनके विचारों का अनुसरण न करें. भगत सिंह ने देश के लिए एक क्रांतिकारी विरासत छोड़ी है. हर साल 23 मार्च को उनका शहादत दिवस भर मना लेने की बजाय, वह किस तरह का भारत चाहते थे, नौजवानों से उनकी क्या उम्मीदें थीं, इस दिशा में मुकम्मल पहल होनी चाहिए.



भगत सिंह ने अपने विचारों को अपने लेखों में बखूबी व्यक्त किया है. मौजूदा दौर में युवाओं समेत हर किसी को उनके लिखे को पढ़ना और विचारों को आत्मसात करना चाहिए. सांप्रदायिकता, छुआछूत और विश्व बंधुत्व पर उनके विचार आज भी प्रासंगिक हैं.



सांप्रदायिकता के खिलाफ उन्होंने ने एक बहुत ही महत्वपूर्ण लेख लिखा और सवाल उठाये कि हमारे देश में सांप्रदायिकता क्यों फैली है! फिरकापरस्ती व सांप्रदायिकता के मामले में 1920 का दशक देश के लिए बहुत खराब था. चौरी चौरा कांड के बाद हिंदू-मुस्लिम सांप्रदायिक फिरकों के बीच फैली हिंसा से खिन्न होकर भगत सिंह ने अपने लेख में लिखा कि देश के ज्यादातर नेता सांप्रदायिक या गैरजिम्मेदार हो गये हैं.


वे जानते ही नहीं कि देश को कैसे रखा जाये. इसके बाद उन्होंने प्रेस को दंगों के लिए जिम्मेदार ठहराया. भगत सिंह ने लिखा कि प्रेस ने बहुत मायूस किया. प्रेस लोगों को सही रास्ता दिखाने की बजाय भड़काऊ शीर्षक लगाती है. लेख का अंत वह इस निष्कर्ष के साथ करते हैं कि सांप्रदायिक दंगों का मूल कारण आर्थिक तंगी है. हिंसा का कोई धर्म नहीं होता. वह हिंदू में भी हो सकती है और मुस्लिम में भी. भगत सिंह का यह लेख आज के लिए एक सबक है.


छुआछूत पर भगत सिंह ने लिखा था-'हम किस तरह के समाज में रहते हैं, जहां 20 करोड़ की आबादी में छह करोड़ लोगों को ऐसा बनाकर छोड़ दिया गया है, जिनके छूने भर से बाकी लोगों का धर्म भ्रष्ट हो जाता है.' छुआछूत पर उनका यह लेख आज भी प्रासंगिक है. इस लेख में उन्होंने उस समय के राजनेताओं पर भी सवाल खड़े किये हैं. उन्होंने लिखा कि हमारे यहां कई बड़े नेता ऐसे हैं, जो अपनी सभाओं में अछूत लोगों काे मंच पर बुलाते हैं, उनको गले लगाते हैं, ये दिखाने के लिए कि हम ब्राह्मण होने के बावजूद बराबरी का व्यवहार कर रहे हैं. लेकिन, ये नेता घर जाकर कपड़ों समेत नहाते हैं.


आज कई राजनेताओं को यह कहते सुना जा सकता है कि विश्वविद्यालयों में युवाओं का काम शिक्षा ग्रहण करना है, राजनीति करना नहीं. भगत सिंह का इस पर एक लेख है-'छात्र और राजनीति.' इसमें वह लिखते हैं-'छात्रों की ये जिम्मेदारी है कि देश में जो कुछ गलत हो रहा है, उसके खिलाफ अवाज उठायें. अपने चारों तरफ होनेेवाले घटनाक्रम के प्रति सजग रहें.' इस लेख में भगत सिंह इटली, यूरोप, रूस समेत दुनिया भर में हुए छात्र आंदोलनों का उदाहरण देते हैं.


इस लेख को लिखते समय भगत सिंह और उनके सभी साथी क्रांतिकारी खुद युवा थे. यह कहा जाता है कि उस समय ब्रिटिश सरकार के खिलाफ लड़ाई थी, इसलिए युवा आवाज उठा रहे थे. अब तो देश की राष्ट्रवादी सरकार है, तो भगत सिंह का विचार लागू नहीं होता. लेकिन भगत सिंह ने एक बार नहीं, कई बार अपने लेख, अदालत के बयान, नौजवान भारत सभा के प्लेटफॉर्म, हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के मेनिफेस्टो में दोहराया है कि हमारी लड़ाई सिर्फ अंग्रेजों से नहीं है.


यह ऊंच-नीच के खिलाफ, गरीबों-मजदूरों के हक की लड़ाई है और यह लड़ाई हम तब तक लड़ेंगे, जब तक इन लोगों को इनका हक नहीं मिल जाता, फिर चाहे ब्रिटिश रहें या उनके बदले हमारे काले शासक आ जायें. उन्होंने अपने एक मेनिफेस्टो में लिखा था-'हम तब तक लड़ते रहेंगे, जब तक कि 98 फीसदी लोगों को शासन में भागीदारी प्राप्त न हो जाये. केवल दो फीसदी लोग देश पर शासन करते हैं, जो अमीर हैं. बाकी के 98 फीसदी को शासन में भागीदारी दिलाना हमारा फर्ज है. शोषित समाज जब तक रहेगा, तब तक हमारी लड़ाई चलती रहेगी.


आजकल नारों की राजनीति बहुत हो रही है. भगत सिंह ने लाहौर में 1926 में जब नौजवान भारत सभा बनायी थी, उसके घोषणापत्र और बैठकों में उन्होंने कहा कि राजनीतिक सभाओं और रैलियों में इस्तेमाल होनेवाले धार्मिक नारे तीनों धर्मों के लोगों को बांट रहे हैं. यह एहसास करा रहे हैं कि आप भारतीय नहीं, हिंदू, मुसलमान, सिख हैं. इसलिए हम धार्मिक नारों की बजाय तीन धर्मनिरपेक्ष नारों- इंकलाब जिंदाबाद, भारत के मजदूरों एक हो और हिंदुस्तान जिंदाबाद का इस्तेमाल करेंगे.


यह कदम भगत सिंह ने तब उठाया, जब देश में सांप्रदायिक राजनीति चल रही थी और आर्य समाज का शुद्धिकरण चल रहा था. इस सबके बीच भगत सिंह ने नौजवान भारत सभा का गठन किया, जो एक अलग किस्म के भारत की कल्पना कर रही थी. महज 23 साल की आयु में भगत सिंह दुनिया से चले गये, जिसमें सक्रिय जीवन सिर्फ छह से सात साल का रहा. इस छोटी-सी समयावधि में उन्होंने इतने बड़े और अहम विचारों की विरासत देश को सौंपी है. आज उनकी शहादत भर को याद करने की बजाय, उनके विचारों काे जिंदा रखने की जरूरत है.

सौजन्य - प्रभात खबर।

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Monday, March 22, 2021

जल संरक्षण आवश्यक (प्रभात खबर)

सदियों पहले रहीम ने लिखा था- रहिमन पानी राखिये, बिन पानी सब सून. दुनिया आज एक भयावह जल संकट के कगार पर खड़ी है और प्राकृतिक तौर पर उपलब्ध पानी को बचाने के अलावा इस संकट के समाधान का कोई दूसरा रास्ता नहीं है. लगभग सवा तीन अरब आबादी ऐसे खेतिहर इलाके में रहती है, जहां पानी की बड़ी किल्लत है. एक अनुमान के मुताबिक, साल 2040 तक 18 साल से कम आयु का हर चौथा बच्चा ऐसी जगहों पर रह रहा होगा, जहां पानी की बहुत अधिक कमी होगी. ऐसे बच्चों की तादाद करीब 60 करोड़ होगी.



अगले एक दशक में 70 करोड़ लोग इस समस्या के कारण पलायन के लिए मजबूर होंगे. आज दुनिया की लगभग एक-तिहाई आबादी साल में कम-से-कम एक महीने गंभीर कमी का सामना करती है. भूजल के सबसे बड़े तंत्रों का एक-तिहाई हिस्सा मुश्किलों से घिर चुका है. हमारे देश में भी पानी की कमी की समस्या चिंताजनक स्थिति में है. स्वच्छ पेयजल तक आधी से अधिक आबादी की पहुंच नहीं है और हर साल लगभग दो लाख लोग इस वजह से मारे जाते हैं. नीति आयोग ने मौजूदा हालत को भारत के इतिहास का सबसे गंभीर जल संकट माना है.



साल 2050 तक इस संकट के कारण सकल घरेलू उत्पादन के छह फीसदी मूल्य का नुकसान होगा. इन तमाम चुनौतियों के साथ घरों, शहरों, खेतों और उद्योगों की पानी से जुड़ी जरूरतें भी बढ़ती जा रही हैं. इस संदर्भ में हमें यह भी याद रखा जाना चाहिए कि भूजल के साथ-साथ नदियों और जलाशयों के प्रदूषण की स्थिति भी चिंताजनक होती जा रही है. केंद्र सरकार ग्रामीण और शहरी परिवारों को पेयजल मुहैया कराने की महत्वाकांक्षी योजना पर काम कर रही है.


बारिश के पानी को संग्रहित करने के अलावा इस्तेमाल हो चुके पानी के शोधन पर भी जोर दिया जा रहा है. सिंचाई सुविधा के विस्तार के कार्यक्रम भी चल रहे हैं. इसके अलावा, खेती में कम पानी के उपयोग को भी प्रोत्साहित किया जा रहा है, लेकिन इन पहलों में तेजी की दरकार है, क्योंकि समस्या बेहद गंभीर है. इसका अनुमान इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि अगले एक दशक में हमारे देश में पानी की प्रति व्यक्ति वार्षिक उपलब्धता आज के 1588 घन मीटर की आधी रह जायेगी.


आंकड़े बताते हैं कि हमारे जलाशयों में मानसून से पहले जून के महीने में पानी साल-दर-साल घटता जा रहा है. देश की जीवन रेखा कही जानेवाली गंगा, गोदावरी और कृष्णा जैसी बड़ी नदियां हाल के सालों में कई जगहों पर सूख गयी है. इनके अलावा भूजल के स्तर में गिरावट ने खतरे की घंटी बजा दी है. भारत में ग्रामीण क्षेत्र में 85 फीसदी, शहरों में 45 फीसदी और सिंचाई में 65 फीसदी पानी की आपूर्ति भूजल से ही होती है. जाहिर है कि चुनौतियां कम होने की जगह बढ़ रही हैं. ऐसे में पानी और पानी के स्रोतों के संरक्षण के अलावा हमारे पास कोई विकल्प नहीं है.

सौजन्य - प्रभात खबर।

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पहल है जल जीवन मिशन (प्रभात खबर)

By प्रसांता दास 

 

जल जीवन मिशन को एक सुनहरे मौके के रूप में देखा जा सकता है. यह एक ऐसा मौका है, जिसके तहत सभी घरों में नल के द्वारा शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा गया है. झारखंड के परिप्रेक्ष्य में हमें इस मौके को हाथों-हाथ लेने की आवश्यकता है, क्योंकि झारखंड राज्य की भौगोलिक बनावट अधिकतर पठारों से आच्छादित है और शुद्ध पानी के लिए हमें प्रतिदिन जद्दोजहद करनी पड़ती है. स्वच्छ भारत मिशन के सफलतापूर्वक क्रियान्वयन के उपरांत पूरे देश में जल जीवन मिशन योजना की शुरुआत की गयी है.



इस वर्ष के जल दिवस का थीम है-‘जल का मूल्य पहचानो’. इसके लिए हमें जल जीवन मिशन के तहत जितना प्रयास जल पहुंचाने के लिए करना है, उससे कहीं अधिक इन बातों पर ध्यान देना होगा, जो काफी महत्वपूर्ण एवं प्रासंगिक हैं, जैसे- जल स्रोतों की पहचान करना एवं उनको पुनर्जीवित एवं संरक्षित करना. इसके अलावा समुचित तकनीक का प्रयोग कर जल की गुणवत्ता को सुनिश्चित करना, निरंतर एवं निर्बाध पेयजल उपलब्ध कराना, गंदे पानी का समुचित प्रबंधन करना एवं सफलतापूर्वक क्रियान्यवन के लिए सभी सहयोगी एवं सहभागी समूहों का क्षमतावर्धन करना भी महत्वपूर्ण है.



झारखंड में जल जीवन मिशन से जुड़ी कई चुनौतियां हैं, जिनका ध्यान कार्यक्रम के क्रियान्वयन के क्रम में रखना उचित होगा. झारखंड राज्य पठारों एवं जंगलों से भरा हुआ है, यहां की भौगोलिक संरचना अन्य प्रदेशों से अलग है और वार्षिक वर्षा दर भी अन्य राज्यों की तुलना में अधिक है. यहां करीब 1237 मिली सालाना बारिश होती है, परंतु जल संरक्षण का समुचित प्रबंध नहीं होने के कारण अधिकांश पानी बगैर उपयोग के नदी-नालों में बह जाता है. झारखंड में सतही जल का अभाव है.


अधिकतर नदियों एवं तालाबों में पूरे वर्ष पानी नहीं रह पाता. दामोदर, स्वर्णरेखा, कोयल जैसी ही कुछ नदियां हैं, जिनमें पूरे वर्ष पानी भरा रहता है. इस पर एक वृहत कार्य योजना बनाने की आवश्यकता है. नल द्वारा जल के आच्छादन का प्रतिशत राज्य में बहुत ही कम है. मात्र 12 प्रतिशत आबादी को ही नल द्वारा जल प्राप्त होता है. इसे 100 प्रतिशत पर पहुंचाना एक चुनौती है, जो सामुदायिक सहभागिता के बिना संभव नहीं है.


हालांकि चुनौतियां बड़ी हैं, लेकिन नीतिगत फैसले एवं ठोस क्रियान्वयन के द्वारा हम इसको सफलतापूर्वक संपन्न कर सकते हैं. हम जानते हैं कि राज्य में स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) की सफलता में रानी मिस्त्रियों की भूमिका सराहनीय रही है. उन्होंने अपने कार्यों एवं योगदानों से न केवल मिशन को गति प्रदान की, बल्कि अपनी आजीविका के लिए भी एक नया आयाम ढूंढ लिया. इस प्रकार समुदाय में एक नये सहयोगी समूह का निर्माण हुआ. जल जीवन मिशन में महिलाओं के लिए काफी संभावनाएं हैं.


जल व्यवस्था का सही संचालन एवं रख-रखाव में अग्रसर होकर महिलाएं महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं. इसी प्रकार से ग्राम स्तरीय संस्थागत व्यवस्था में ग्राम जल एवं स्वच्छता समिति की भी भूमिका अहम रही है. ग्राम स्तर पर विभाग की यह न्यूनतम इकाई है और क्रियान्वयन संबंधी इनके पास व्यापक अनुभव हैं. मिशन के क्रियान्वयन, संचालन एवं रख-रखाव में इनकी भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है और इसलिए इनका कार्यक्रम में शुरू से जुड़ाव होना आवश्यक है.


विभिन्न विभागों के बीच समन्वय भी आवश्यक है, क्योंकि इसके बिना कार्यक्रम की सफलता संभव नहीं है. जल संरक्षण, जल भरण, कृषि पैटर्न समतलीकरण, वन संरक्षण, पौधारोपण जैसे मुद्दों को लेकर सभी विभागों के बीच समन्वय आवश्यक है.


यह भी देखा गया है कि ऊपरी स्तर पर तो समन्वय हो जाता है, परंतु निचले स्तर पर नियमित समन्वय के अभाव के कारण क्रियान्वयन को पर्याप्त गति नहीं मिल पाती और कार्य की गुणवत्ता भी उम्मीद के अनुसार नहीं हो पाती. इसलिए ऊपरी स्तर के साथ-साथ निचले स्तर पर समन्वय को भी सुनिश्चित करना आवश्यक है.


आने वाले दिनों में झारखंड में पंचायत चुनाव प्रस्तावित है. चुनाव उपरांत जन प्रतिनिधियों का जल जीवन मिशन कार्यक्रम पर प्रशिक्षण जरूरी है, क्योंकि पंचायत ही इस मिशन के क्रियान्वयन, रख-रखाव एवं संचालन के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार है. अतः जल जीवन मिशन पर व्यापक प्रशिक्षण की व्यवस्था अपेक्षित है.


नल द्वारा जल की व्यवस्था एक तकनीकी व्यवस्था है, ऐसे में व्यवस्था के लिए एवं इसके बाद योजना का स्वामित्व बनाये रखने हेतु प्रशिक्षित तकनीशियन का समूह तैयार करना आवश्यक है, जिससे पंचायत स्तर पर चयनित युवाओं को प्रशिक्षित कर कार्यक्रम को मजबूती प्रदान की जा सके.


जल संरक्षण और जल प्रबंधन एक-दूसरे के पूरक हैं. बिना जल संरक्षण किये अगर हम जल का दोहन करेंगे, तो आने वाले समय में जल संकट की समस्या उत्पन्न हो जायेगी. झारखंड के कई जिले जैसे कि पलामू, गढ़वा में फ्लोराइड का प्रकोप है, जिस कारण लोगों में अपंगता स्पष्ट दिखाई देती है. कुछ क्षेत्रों में लौह मात्रा अत्यधिक होने से समुदाय के लोग विभिन्न बीमारियों से लंबे समय के लिए ग्रसित हो जाते हैं.


इसलिए जल जीवन मिशन में यह व्यवस्था की गयी है कि सभी जल स्रोतों की जांच हो एवं जिलास्तरीय मान्यताप्राप्त प्रयोगशाला से सर्टिफिकेट प्रदान किया जाये. जल जांच हेतु उपयुक्त व्यवस्था करने के साथ-साथ सभी स्तरों पर जल सहभागिता, जन आंदोलन एवं उचित प्रशिक्षण को सुनिश्चित करना भी जल जीवन मिशन की सफलता को सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है.

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व्यापक पुलिस सुधार की जरूरत (प्रभात खबर)

By प्रकाश सिंह 

 

मुंबई पुलिस से जुड़े हाल के विवादास्पद प्रकरण का सबसे बड़ा सबक यह है कि पुलिस व्यवस्था में व्यापक सुधारों की जरूरत है. यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि ऐसे सुधारों को लेकर न तो केंद्र सरकार और न ही राज्यों की सरकारें कोई प्रतिबद्धता दिखा रही हैं. इसका नतीजा यह है कि हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं. यदि सचिन वझे प्रकरण की जांच राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआइए) ने ईमानदारी से की, तो सारी बातें हमारे सामने आ जायेंगी.


अभी जो स्थिति हमारे सामने आयी है, वह यह है कि जिस नापाक गठजोड़ की बात कई सालों से हम करते आ रहे हैं, उसे तोड़ा जाना चाहिए, लेकिन हमारी सरकारें इस दिशा में कोई भी ठोस कदम उठाने के लिए तैयार नहीं हैं. यह नापाक गठजोड़ है नेता का, नौकरशाही का, पुलिस का और अपराधी का. ये सभी इस गठजोड़ के जरिये एक-दूसरे का फायदा उठाते हैं. मतलब यह कि इन सभी की जेब भरती रहे और ये सभी बचे भी रहें.



इस गंभीर मसले के बारे में बहुत पहले से लिखा जा रहा है. इस संबंध में विभिन्न समितियों की रिपोर्टें और संस्तुतियां भी हैं कि क्या किया जाना चाहिए, लेकिन कोई कोशिश नहीं हो रही है. इसकी वजह यह है कि अब नेता खुद ही अपराधी हो गया है. एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) की रिपोर्ट बताती है कि हमारी लोकसभा में 43 प्रतिशत ऐसे जन-प्रतिनिधि बैठे हैं, जिनकी आपराधिक पृष्ठभूमि है.


ये किसी विदेशी मीडिया या संस्था का लिखा हुआ नहीं है कि कोई कह दे कि किसी निहित स्वार्थ के कारण ऐसा बताया जा रहा है. एडीआर हमारे देश की एक प्रतिष्ठित संस्था है, जिससे विद्वान और ईमानदार लोग जुड़े हुए हैं. आपराधिक छवि या पृष्ठभूमि के सांसदों के बारे में विश्लेषण उनका है. अब सवाल यह है कि जब ऐसे लोग संसद में बैठे हैं, तो आपराधिक गठजोड़ को तोड़ने की पहल कौन करेगा. इसको तोड़ने का अर्थ तो यह होगा कि उनको नुकसान होगा, उनकी पोल खुलेगी. ऐसा कौन नेता चाहेगा?


यह सच है कि चाहे नेता सदन के भीतर हों या बाहर, उनमें अपराधियों की संख्या बहुत बड़ी है. चुनाव में जीतने की ज्यादा उम्मीद वैसे लोगों की होती है, जिनकी आपराधिक पृष्ठभूमि होती है. विश्लेषक बताते हैं कि स्वच्छ छवि के व्यक्ति के जीतने की संभावना कम होती है. जो जितना बेईमान होगा, वह उतना ही साम-दाम-दंड-भेद के प्रयोग से अपनी जीत को हासिल करेगा.


ऐसे लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है. चुनाव प्रक्रिया में भी सुधार की बड़ी जरूरत है, लेकिन न तो चुनाव आयोग इस पर गंभीर है और न ही सरकार. चुनाव प्रक्रिया में सुधार की पहल करना चुनाव आयुक्तों का दायित्व है, किंतु हमारे चुनाव आयुक्त ऐसे सुधार की बात तब करते हैं, जब वे सेवामुक्त हो जाते हैं. यही काम वे पद पर रहते हुए कर सकते हैं और उन्हें ऐसा करना चाहिए.


अब आते है सचिन वझे के मामले पर. फिलहाल तो यह साफ दिख रहा है कि इसमें सत्ता पक्ष के नेताओं और वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की मिलीभगत है. वझे एक बहुत छोटे स्तर का अधिकारी, सहायक सब इंस्पेक्टर है. किसी राज्य में इस स्तर के अधिकारी को थाने का प्रभार भी नहीं दिया जा सकता है. ऐसे अधिकारी को किसी छोटी चौकी का प्रभार दिया जा सकता है. जब इतना छोटा अधिकारी ऐसा बड़ा काम कर सकता है, तो यह बेहद गंभीर बात है.


काम भी ऐसा कि एसयूवी में जिलेटिन रख कर उसे देश के सबसे बड़े उद्योगपति के घर के सामने खड़ा कर दिया जाता है, उसमें एक पत्र रखा जाता है कि अंबानी इतनी बड़ी रकम बिट्क्वाइन क्रिप्टोकरेंसी के जरिये दें. गाड़ी के पुराने मालिक की हत्या हो जाती है आदि आदि. इतना बड़ा आपराधिक काम सचिन वझे जैसा आदमी अपने विवेक से या अपने स्तर पर नहीं कर सकता है. इसमें वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की संलिप्तता अवश्य ही है.


वरिष्ठ पुलिस अधिकारी तब तक ऐसा नहीं करेंगे, जब तक उन्हें राजनीतिक संरक्षण और निर्देश नहीं है. उदाहरण के लिए, अगर उद्योगपति से सौ करोड़ रुपये की उगाही होती, तो आधा पार्टी के पास जाता और बाकी रकम का आपस में बंटवारा कर लिया जाता. यह खेल नहीं हो पाया और बीच में मामले का खुलासा हो गया.


यदि यह षड्यंत्र सफल हो जाता, तो संभावना है कि ऐसा ही कुछ होता. यह अनुमान के आधार पर मैं कह रहा हूं. पूरा मामला तो एनआइए की जांच से ही सामने आ सकेगा. अलबत्ता, यह भी इस बात पर निर्भर करेगा कि अगर वह सच को बाहर लाना चाहेगी, तभी पूरा सच उजागर होगा.


इस प्रकरण को हमें व्यापक परिदृश्य में देखना चाहिए. हमारे देश में कई ऐसे बड़े नेता हैं, जिन्होंने राजनीति में रह कर अकूत धन अर्जित किया है. यह सबके सामने है. इसके लिए किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं है, पर किसी का कुछ नहीं बिगड़ता. कुछ अत्यधिक बेईमान सरकारों में भी काबिज हैं.


ऐसा इसलिए है कि इन नेताओं और इनकी पार्टियों के समर्थन से सरकारों के बनने-बिगड़ने का खेल चलता रहता है. राजनीतिक स्वार्थों को साधने के लिए सच को दफन कर दिया जाता है. ऐसे में हम जांच एजेंसियों की क्षमता या क्षमता के अभाव पर अफसोस करें या राजनीति को रोएं या फिर भ्रष्ट व आपराधिक नेताओं को सत्ता में लानेवाली जनता पर दुख जताएं? क्या जनता को नहीं दिख रहा कि राजनीतिक पार्टियां या राजनेता क्या और कैसे काम कर रहे हैं? क्या जनता का भी कोई नैतिक आदर्श नहीं रह गया है?


हमें सारा दोष केवल पुलिस व्यवस्था की खामियों पर नहीं थोपना चाहिए. खास कर तब, जब हमारी सत्ता में, सरकारों में इतनी गड़बड़ियां हैं और उन्हीं के अधीन पुलिस तंत्र को रख दिया गया है. सुधार तो सरकारों का काम है. हमारा सुझाव यह है कि पुलिस तंत्र को बाहरी दबाव से मुक्त किया जाए और उसे स्वायत्त रूप से काम करने दिया जाए.


जनता को भी ईमानदारी को महत्व देना चाहिए, अन्यथा उसकी शिकायत का कोई मतलब नहीं रह जाता है. मीडिया को भी शिकायत करने से पहले आत्ममंथन भी करना चाहिए. हमने जिन्हें कभी साइकिल पर चलते देखा है, आज वे चैनलों के मालिक बन बैठे हैं. कुल मिला कर, हमें कई स्तरों पर बेहतरी की कोशिश करनी है और यह जल्दी होना चाहिए़.

सौजन्य - प्रभात खबर।

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Saturday, March 20, 2021

वायु प्रदूषण से निपटना जरूरी (प्रभात खबर)

By ज्ञानेंद्र रावत 

 

वायु प्रदूषण के मामले में हमारी स्थिति दुनिया में सबसे ज्यादा खराब है़. एक स्विस ऑर्गनाइजेशन द्वारा तैयार 'वर्ल्ड एयर क्वालिटी रिपाेर्ट, 2020 ' में बताया गया है कि दुनिया के 30 सबसे अधिक प्रदूषित शहरों में हमारे देश के 22 शहर शामिल है़ं हमारे यहां वायु की गुणवत्ता इतनी खराब है कि अस्थमा, हृदय रोग, फेफड़ों के रोग समेत अनेक जानलेवा बीमारियों से जूझते रोगियों की तादाद दिनों-दिन बढ़ रही है़ यह इस बात का संकेत है कि प्रदूषण के मामले में देश की हालत चिंताजनक है़



हमारा देश दुनिया के सबसे ज्यादा प्रदूषित देशों की सूची में पांचवे स्थान पर है़ इस सूची में पहला स्थान बांग्लादेश, दूसरा पाकिस्तान, तीसरा मंगोलिया और चौथा अफगानिस्तान का है़. हवा के प्रदूषित होने से इनमें घुलनेवाले छोटे-छोटे कण सांस के जरिये हमारे फेफड़ों तक पहुंचते है़ं, फिर हृदय, फेफड़ों, सांस आदि रोगों में वृद्धि करते है़ं दिल्ली स्थित गोविद बल्लभ पंत अस्पताल में प्रतिदिन इन रोगियों की बढ़ती संख्या इस बात का सबूत है कि देश की राजधानी भी प्रदूषण से अछूती नहीं है़.



देश की राजधानी ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र भी प्रदूषण से बहुत ज्यादा त्रस्त है़ दिल्ली विश्व की सबसे ज्यादा प्रदूषित राजधानी है़ गाजियाबाद तो प्रदूषण में शीर्ष स्थान पर है, जो स्वास्थ्य मानकों के लिहाज से बेहद खतरनाक है़ देश के वे 22 शहर, जो विश्व के सर्वाधिक प्रदूषित 30 शहरों में शामिल हैं, वहां वायु प्रदूषण का स्तर भयावह स्तर तक पहुंच गया है़ दुखद है कि इस भयावह स्थिति काे देखते हुए भी सरकार मौन है़ केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और प्रदूषण पर नियंत्रण करनेवाली अन्य संस्थाएं भी इस दिशा में नाकाम साबित हुई है़ं


अगर वायु प्रदूषण फैलाने वाले कारकों पर नियंत्रण लगा होता, तो देश को इतनी भयावह स्थिति का सामना नहीं करना पड़ता़ प्रदूषण का यह स्तर हमारी असफलता का सबूत है़ वायु प्रदूषण के इतने व्यापक पैमाने पर फैलने का कारण वाहनों की दिनों-दिन बढ़ती संख्या, भवन निर्माण पर प्रतिबंध का नाकाम रहना, भवन निर्माण सामग्री का खुलआम सड़कों पर पड़े रहना और औद्योगिक प्रतिष्ठानों से निकलने वाला जहरीला धुआं है़ इसे विडंबना ही कहेंगे कि वायु प्रदूषण बढ़ने के लिए अक्सर किसानों द्वारा पराली जलाने को जिम्मेदार ठहरा दिया जाता है़


जबकि वैज्ञानिक अनुसंधान के आधार पर पराली केवल 2.37 प्रतिशत प्रदूषण के लिए ही जिम्मेदार है़ वायु प्रदूषण बढ़ाने में जब पराली का स्तर इतना निम्न है, तो हम कैसे यह कहने के अधिकारी हैं कि प्रदूषण बढ़ाने में पराली का योगदान है़ आज से छह साल पहले सरकार ने घोषणा की थी कि एनटीपीसी पराली को खरीदेगी और उससे गैस बनायेगी, लेकिन इस दिशा में अभी तक कोई कारगर पहल नहीं हुई है़ कुछ प्रतिशत पराली की खरीद तो हुई है, लेकिन उसका कितना इस्तेमाल हुआ है और उससे कितनी गैस बनी है, सरकार उसका विवरण अभी तक नहीं दे पायी है.


पार्टिकुलेट मैटर भी खतरनाक स्तर को पार कर गया है, लेकिन इसे लेकर सरकार की चिंता नगण्य है़ प्रदूषण चाहे वायु का हो या जल का, बढ़ता ही जा रहा है. प्रदूषण पर जल्द ही लगाम लगनी चाहिए. उत्तराखंड की त्रासदियां पर्यावरण विरोधी नीतियों का ही परिणाम है़ गंगा को लें, तो वह 2014 के बाद से आज 20 गुना ज्यादा मैली है और उस पर बन रहे बांध गंगा जल के विलक्षण गुण को नष्ट करने के प्रमुख कारण है़ं


लॉकडाउन से उपजी परेशानियों को छोड़ दें, तो इस दौरान हमारी प्राकृतिक संपदा, पर्यावरण, नदियों और वायु की गुणवत्ता को सबसे ज्यादा लाभ पहुंचा है़ चूंकि इस दौरान सड़कों पर वाहनों की आवाजाही पर प्रतिबंध थे, जिससे वायु प्रदूषण घटा और प्रकृति की हरियाली लौट आयी़ नदियों का जल साफ हुआ़ लॉकडाउन पर्यावरण सरंक्षण की दिशा में अहम कारक साबित हुआ, लेकिन लॉकडाउन के बाद जैसे ही पाबंदियां हटीं, हर तरह के प्रदूषण के स्तर में वृद्धि हो गयी़ वायु प्रदूषण को कम करने के लिए सरकार द्वारा बनायी जाने वाली विकास नीति पर्यावरण के हित में होनी चाहिए, उसकी विरोधी नही़ं लेकिन आजादी से लेकर आज तक कभी भी सरकार ने पर्यावरण अनुकूल विकास नीतियां नहीं बनायी है़ं आज से 110 वर्ष पहले महात्मा गांधी ने कहा था कि मानव यंत्र का गुलाम न हो़ यंत्र एक सहायक की भूमिका में हो़ वर्तमान स्थिति उसके एकदम उलट है़


हम भले ही विकसित राष्ट्रों की श्रेणी में, महाशक्तियों के साथ खड़े होने का दावा करें, हम उससे कोसों दूर है़ं जब विकास जनहितकारी होगा, पर्यावरण हितैषी होगा, तभी देश की प्राकृतिक संपदा सुरक्षित रह पायेगी़ आज हमारे देश की 67. 4 प्रतिशत भूमि बंजर हो चुकी है़ यह सब बढ़ते तापमान और जलवायु परिवर्तन का दुष्परिणाम है़


यदि हमने अभी इसे नहीं रोका, तो बहुत जल्द हम दाने-दाने को मोहताज हो जायेंगे़ समय आ गया है कि हम भौतिक संसाधनों की अंधी चाहत की ओर न दौड़ें, प्रकृतिप्रदत्त संसाधनों की रक्षा करें क्योंकि ये सीमित है़ं विकास जब-जब मानवीय हितों के विपरित होता है, उसका दुष्परिणाम आर्थिक, सामाजिक और भौगोलिक स्तर के साथ प्राकृतिक संपदा पर भी होता है़ इसलिए हमारा पहला कर्तव्य है कि हम मानवहित और प्रकृतिप्रदत्त संसाधनों की रक्षा की नीतियां बनाएं.

सौजन्य - प्रभात खबर।

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Friday, March 19, 2021

बेहतर हो शहरीकरण (प्रभात खबर)

आर्थिक विकास के साथ-साथ पुराने शहरों के विस्तार और नये शहर बसाने की जरूरत भी बढ़ती जा रही है. प्रदूषण, गंदगी और भीड़ को देखते हुए शहरीकरण की प्रक्रिया पर भी नये सिरे से सोचा जाना चाहिए. साल 2011 की जनगणना के अनुसार, हमारे देश की आबादी का 31 फीसदी हिस्सा शहरों में बसता है. यह आंकड़ा 2030 में 40 फीसदी और 2050 में 50 फीसदी से ज्यादा हो सकता है.



हाल ही में वित्त आयोग ने केंद्र सरकार को आठ नये शहर बसाने के लिए आठ हजार करोड़ रुपये का अनुदान दिया है. आदर्श शहरीकरण का उदाहरण प्रस्तुत करने का यह एक शानदार अवसर है. ये परियोजनाएं राष्ट्रीय विकास की प्रक्रिया को नयी गति दे सकती हैं. इन शहरों को प्रदूषणमुक्त बनाने के साथ इनमें संसाधनों के समुचित उपयोग को बढ़ावा दिया जा सकता है. इस प्रयास में शहरीकरण के अच्छे और खराब अनुभवों का भी इस्तेमाल किया जाना चाहिए. बीते कुछ सालों में सरकार ने शहरों की बेहतरी के लिए अनेक पहलें की है.



राष्ट्रीय जल जीवन मिशन के तहत 2026 तक 2.68 करोड़ शहरी परिवारों तक पेयजल पहुंचाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है. शहरों में साफ हवा के साथ साफ पानी की समस्या बेहद गंभीर है. स्वच्छ ऊर्जा पर जोर देकर सरकार प्रदूषण और कचरे की बढ़ती चुनौतियों से निजात पाने की कोशिश में है. एक हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया के सबसे अधिक प्रदूषित 30 शहरों में 22 भारत में हैं. अभी देश में केवल 13 ऐसे शहर हैं, जहां स्वच्छ ऊर्जा के लिए लक्ष्य निर्धारित किये गये हैं या इस संबंध में नीतियां तय की गयी हैं.


इन शहरों में 6.76 करोड़ लोग बसते हैं. यह संख्या शहरी आबादी का 18 फीसदी हिस्सा है. इससे साफ है कि शहरों के सुधार की दिशा में देश को लंबी यात्रा करनी है. बेहतर शहरीकरण के लिए यह जरूरी है कि उपनगरों के विस्तार और नये शहरों के निर्माण की प्रक्रिया में सरकार, किसानों, भवन निर्माताओं व खरीदारों के बीच भरोसा बढ़े. इससे जमीन लेने, गुणवत्ता बढ़ाने और परियोजनाओं को जल्दी पूरा करने में मदद मिलने के साथ लोग बसने के लिए भी उत्साहित होंगे.


एक तरफ शहर में आवास की कमी है, तो दूसरी तरफ विभिन्न कारणों से तैयार आवास खाली पड़े हैं. आवास परियोजनाओं का समय पर पूरा नहीं होना भी पुरानी समस्या है. गंदगी और प्रदूषण तथा पानी की कमी का सबसे बड़ा कारण यह है कि शहर बनाने या विस्तार करने में योजनाओं को ठीक से या तो तैयार नहीं किया जाता है या फिर उन पर ठीक से अमल नहीं किया जाता है.


नगर निगमों और नगरपालिकाओं की संरचना, उनके अधिकार और उन्हें प्राप्त होनेवाले संसाधन पर समुचित विचार करने की आवश्यकता बहुत समय से महसूस की जा रही है, लेकिन इस दिशा में कोई ठोस प्रयास नहीं हुए हैं. हमें यह समझना होगा िक बेहतर भारत बनाने के लिए बेहतर शहरीकरण आधारभूत शर्त है और इसे प्राथमिकता देने की जरूरत है.

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जॉनसन का दौरा (प्रभात खबर)

ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन के अगले महीने होनेवाले भारत दौरे से दोनों देशों को बड़ी उम्मीदें हैं. कोरोना महामारी की मुश्किलों की वजह से वे मुख्य अतिथि के रूप में गणतंत्र दिवस समारोह में शामिल नहीं हो सके थे. इस यात्रा का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है कि यूरोपीय संघ से बाहर निकलने के बाद पहली बार ब्रिटिश नेता किसी बड़े देश का दौरा करेंगे. ब्रिटेन ने तीन दशक बाद विश्व में अपनी स्थिति को लेकर व्यापक समीक्षा भी घोषित की है.

हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शांति एवं समृद्धि के लिए प्रयासरत भारत, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और जापान की साझेदारी से भी जॉनसन जुड़ना चाहते हैं. हालांकि भारत और ब्रिटेन के द्विपक्षीय संबंध बहुत मजबूत हैं तथा दोनों लोकतांत्रिक देश लंबे अरसे से परस्पर सहयोग बढ़ाने पर जोर देते रहे हैं, लेकिन अभी भी संभावनाओं को साकार करने की गुंजाइश है. यूरोपीय संघ से हटने के बाद से ब्रिटेन को नये व्यापारिक सहयोगियों की दरकार है.

निवेश और निर्यात के लिए भारत एक स्वाभाविक विकल्प है. भारत भी अपनी अर्थव्यवस्था के विस्तार के लिए ब्रिटेन जैसे बाजार में ज्यादा मौजूदगी चाहता है. चीन के विस्तारवाद, पाकिस्तान के आतंकवाद, भारतीय संप्रभुता को चुनौती देने की कोशिशों के विरोध तथा अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य में भारत की अहमियत के समर्थन में ब्रिटेन लगातार खड़ा रहा है. चीनी आक्रामकता पर अंकुश लगाने तथा बहुपक्षीय विश्व व्यवस्था को सुनिश्चित करने के लोकतांत्रिक देशों की पहलों में भारत और ब्रिटेन एक-साथ खड़े होते रहे हैं.


जॉनसन ने ब्रिटिश संसद में कहा है कि वे दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के साथ संबंध मजबूत करने के लिए भारत जा रहे हैं. इस यात्रा के तुरंत बाद जून में ब्रिटेन में आयोजित होनेवाली जी-सात देशों के शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी शामिल होंगे. बीते लगभग डेढ़ दशक में दोनों देशों के बीच व्यापार में दोगुने से भी अधिक बढ़ोतरी हुई है.


साल 2015-16 और 2019-20 के बीच ब्रिटेन से आनेवाले प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में करीब 50 प्रतिशत की वृद्धि हुई है. जलवायु परिवर्तन, स्वच्छ ऊर्जा और वैश्विक स्वास्थ्य जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में भारत ने ठोस उपलब्धियां हासिल की हैं. ब्रिटेन इन क्षेत्रों में सहभागिता बढ़ाने का इच्छुक है. ऐसी उम्मीद है कि इस साल दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों की मुलाकात के बाद व्यापार सहयोग के विस्तार पर ठोस घोषणा भी हो जायेगी, जो संभावित व्यापार समझौते का आधार बन सकती है. पिछले कुछ समय में ब्रिटेन ने अनेक देशों के साथ व्यापार समझौते किये हैं.


दिसंबर में विदेश सचिव डॉमिनिक राब ने चार दिनों की भारत यात्रा में आशा व्यक्त की थी कि ऐसा समझौते पर जल्दी ही दोनों देशों के बीच सहमति बन सकती है. भारतीय मूल के 15 लाख ब्रिटिश नागरिक दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक कड़ी हैं. दोनों देशों को उम्मीद है कि महामारी के बाद बदलती विश्व व्यवस्था के लिए ब्रिटिश प्रधानमंत्री की भारत यात्रा मील का एक पत्थर साबित होगी.

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वायु प्रदूषण से निपटना जरूरी (प्रभात खबर)

वायु प्रदूषण के मामले में हमारी स्थिति दुनिया में सबसे ज्यादा खराब है़. एक स्विस ऑर्गनाइजेशन द्वारा तैयार 'वर्ल्ड एयर क्वालिटी रिपाेर्ट, 2020 ' में बताया गया है कि दुनिया के 30 सबसे अधिक प्रदूषित शहरों में हमारे देश के 22 शहर शामिल है़ं हमारे यहां वायु की गुणवत्ता इतनी खराब है कि अस्थमा, हृदय रोग, फेफड़ों के रोग समेत अनेक जानलेवा बीमारियों से जूझते रोगियों की तादाद दिनों-दिन बढ़ रही है़ यह इस बात का संकेत है कि प्रदूषण के मामले में देश की हालत चिंताजनक है़



हमारा देश दुनिया के सबसे ज्यादा प्रदूषित देशों की सूची में पांचवे स्थान पर है़ इस सूची में पहला स्थान बांग्लादेश, दूसरा पाकिस्तान, तीसरा मंगोलिया और चौथा अफगानिस्तान का है़. हवा के प्रदूषित होने से इनमें घुलनेवाले छोटे-छोटे कण सांस के जरिये हमारे फेफड़ों तक पहुंचते है़ं, फिर हृदय, फेफड़ों, सांस आदि रोगों में वृद्धि करते है़ं दिल्ली स्थित गोविद बल्लभ पंत अस्पताल में प्रतिदिन इन रोगियों की बढ़ती संख्या इस बात का सबूत है कि देश की राजधानी भी प्रदूषण से अछूती नहीं है़.



देश की राजधानी ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र भी प्रदूषण से बहुत ज्यादा त्रस्त है़ दिल्ली विश्व की सबसे ज्यादा प्रदूषित राजधानी है़ गाजियाबाद तो प्रदूषण में शीर्ष स्थान पर है, जो स्वास्थ्य मानकों के लिहाज से बेहद खतरनाक है़ देश के वे 22 शहर, जो विश्व के सर्वाधिक प्रदूषित 30 शहरों में शामिल हैं, वहां वायु प्रदूषण का स्तर भयावह स्तर तक पहुंच गया है़ दुखद है कि इस भयावह स्थिति काे देखते हुए भी सरकार मौन है़ केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और प्रदूषण पर नियंत्रण करनेवाली अन्य संस्थाएं भी इस दिशा में नाकाम साबित हुई है़ं


अगर वायु प्रदूषण फैलाने वाले कारकों पर नियंत्रण लगा होता, तो देश को इतनी भयावह स्थिति का सामना नहीं करना पड़ता़ प्रदूषण का यह स्तर हमारी असफलता का सबूत है़ वायु प्रदूषण के इतने व्यापक पैमाने पर फैलने का कारण वाहनों की दिनों-दिन बढ़ती संख्या, भवन निर्माण पर प्रतिबंध का नाकाम रहना, भवन निर्माण सामग्री का खुलआम सड़कों पर पड़े रहना और औद्योगिक प्रतिष्ठानों से निकलने वाला जहरीला धुआं है़ इसे विडंबना ही कहेंगे कि वायु प्रदूषण बढ़ने के लिए अक्सर किसानों द्वारा पराली जलाने को जिम्मेदार ठहरा दिया जाता है़


जबकि वैज्ञानिक अनुसंधान के आधार पर पराली केवल 2.37 प्रतिशत प्रदूषण के लिए ही जिम्मेदार है़ वायु प्रदूषण बढ़ाने में जब पराली का स्तर इतना निम्न है, तो हम कैसे यह कहने के अधिकारी हैं कि प्रदूषण बढ़ाने में पराली का योगदान है़ आज से छह साल पहले सरकार ने घोषणा की थी कि एनटीपीसी पराली को खरीदेगी और उससे गैस बनायेगी, लेकिन इस दिशा में अभी तक कोई कारगर पहल नहीं हुई है़ कुछ प्रतिशत पराली की खरीद तो हुई है, लेकिन उसका कितना इस्तेमाल हुआ है और उससे कितनी गैस बनी है, सरकार उसका विवरण अभी तक नहीं दे पायी है.


पार्टिकुलेट मैटर भी खतरनाक स्तर को पार कर गया है, लेकिन इसे लेकर सरकार की चिंता नगण्य है़ प्रदूषण चाहे वायु का हो या जल का, बढ़ता ही जा रहा है. प्रदूषण पर जल्द ही लगाम लगनी चाहिए. उत्तराखंड की त्रासदियां पर्यावरण विरोधी नीतियों का ही परिणाम है़ गंगा को लें, तो वह 2014 के बाद से आज 20 गुना ज्यादा मैली है और उस पर बन रहे बांध गंगा जल के विलक्षण गुण को नष्ट करने के प्रमुख कारण है़ं


लॉकडाउन से उपजी परेशानियों को छोड़ दें, तो इस दौरान हमारी प्राकृतिक संपदा, पर्यावरण, नदियों और वायु की गुणवत्ता को सबसे ज्यादा लाभ पहुंचा है़ चूंकि इस दौरान सड़कों पर वाहनों की आवाजाही पर प्रतिबंध थे, जिससे वायु प्रदूषण घटा और प्रकृति की हरियाली लौट आयी़ नदियों का जल साफ हुआ़ लॉकडाउन पर्यावरण सरंक्षण की दिशा में अहम कारक साबित हुआ, लेकिन लॉकडाउन के बाद जैसे ही पाबंदियां हटीं, हर तरह के प्रदूषण के स्तर में वृद्धि हो गयी़ वायु प्रदूषण को कम करने के लिए सरकार द्वारा बनायी जाने वाली विकास नीति पर्यावरण के हित में होनी चाहिए, उसकी विरोधी नही़ं लेकिन आजादी से लेकर आज तक कभी भी सरकार ने पर्यावरण अनुकूल विकास नीतियां नहीं बनायी है़ं आज से 110 वर्ष पहले महात्मा गांधी ने कहा था कि मानव यंत्र का गुलाम न हो़ यंत्र एक सहायक की भूमिका में हो़ वर्तमान स्थिति उसके एकदम उलट है़


हम भले ही विकसित राष्ट्रों की श्रेणी में, महाशक्तियों के साथ खड़े होने का दावा करें, हम उससे कोसों दूर है़ं जब विकास जनहितकारी होगा, पर्यावरण हितैषी होगा, तभी देश की प्राकृतिक संपदा सुरक्षित रह पायेगी़ आज हमारे देश की 67. 4 प्रतिशत भूमि बंजर हो चुकी है़ यह सब बढ़ते तापमान और जलवायु परिवर्तन का दुष्परिणाम है़


यदि हमने अभी इसे नहीं रोका, तो बहुत जल्द हम दाने-दाने को मोहताज हो जायेंगे़ समय आ गया है कि हम भौतिक संसाधनों की अंधी चाहत की ओर न दौड़ें, प्रकृतिप्रदत्त संसाधनों की रक्षा करें क्योंकि ये सीमित है़ं विकास जब-जब मानवीय हितों के विपरित होता है, उसका दुष्परिणाम आर्थिक, सामाजिक और भौगोलिक स्तर के साथ प्राकृतिक संपदा पर भी होता है़ इसलिए हमारा पहला कर्तव्य है कि हम मानवहित और प्रकृतिप्रदत्त संसाधनों की रक्षा की नीतियां बनाएं.

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टीका लेने के लिए लोगों को प्रेरित करें (प्रभात खबर)

By डॉ ललित कांत 

 

हमारा देश कोरोना महामारी के मामले में बड़े नाजुक दौर से गुजर रहा है. कोविड-19 के संक्रमण को महामारी घोषित हुए एक साल हो चुका है और इस अवधि में इसे काबू में लाने में कामयाबी मिल रही थी. कुछ क्षेत्रों में बीच-बीच में मामले बढ़ते थे, पर पिछले साल के आखिर तक संख्या में बड़ी गिरावट आ चुकी थी. इस साल फरवरी से फिर संक्रमण में तेजी आने लगी है.



जनवरी के मध्य से चल रहे टीकाकरण अभियान के तहत अब तक तीन करोड़ से अधिक लोगों को टीके की एक या दोनों खुराक दी चुकी है. लेकिन यह प्रक्रिया निर्धारित लक्ष्य से कम गति से चल रही है. अगर हमें महामारी के प्रसार को नियंत्रित करना है, तो टीकाकरण में तेजी लानी होगी. पिछले एक साल में हमें कई अनुभव भी हासिल हुए हैं. उन अनुभवों से सीख लेने की जरूरत है.



संक्रमण रोकने के लिए जो पाबंदियां पहले लगी थीं, उनमें धीरे-धीरे बहुत छूट दी जा चुकी है. यातायात, बाजार, घूमने-फिरने आदि का सिलसिला पहले जैसा ही चल पड़ा है. सामाजिक आयोजन भी लगभग सामान्य तरीके से होने लगे हैं. इन सब वजहों से कुछ क्षेत्रों में संक्रमण के मामले बढ़ने लगे. अब स्थिति यह है कि 70 जिलों में संक्रमण में 150 प्रतिशत से अधिक की बढ़ोतरी दिख रही है.


ऐसे 55 जिले हैं, जहां 100 से 150 प्रतिशत तक की बढ़त है. इस पृष्ठभूमि में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रभावित राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ जो बैठक की है, वह बहुत महत्वपूर्ण है. विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्रियों से चर्चा के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने आवश्यक और प्रासंगिक बिंदुओं को रेखांकित किया है. उन्होंने संक्रमण को नियंत्रित करने पर जोर देते हुए टीकाकरण तेज करने की जरूरत बतायी है.


उन्होंने मुख्यमंत्रियों को याद दिलाया कि पहले भी संक्रमण में बढ़ोतरी हुई थी और सभी राज्यों ने अपने प्रयासों से उस पर काबू पाया था. अब जब फिर चुनौती गंभीर हुई है, तो हमें उसी मुस्तैदी से इसका सामना करना है. पाबंदियों में ढील की वजह से मास्क पहनने को लेकर लोग कुछ लापरवाह हुए हैं. इसे ठीक करने की जरूरत है. जांच करने, संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आये लोगों की पहचान करने तथा प्रभावित लोगों के उपचार की व्यवस्था करने की प्रक्रिया को फिर से तेज किया जाना चाहिए.


इसी के जरिये पहले महामारी को नियंत्रित किया जा सका था. प्रधानमंत्री मोदी की यह बात भी उल्लेखनीय है कि हमें रैपिड टेस्टिंग पर बहुत भरोसा नहीं करना चाहिए. कुछ राज्यों में यही जांच अधिक मात्रा में की जा रही है. आरटी-पीसीआर जांच के तरीके पर जोर देना बेहद अहम है. इस जांच की मात्रा 60-70 फीसदी होनी चाहिए.


इस संदर्भ में हमें याद रखना चाहिए कि पहले चरण में संक्रमण के बहुत अधिक मामले बड़े शहरों से आ रहे थे, लेकिन अब मध्यम आकार के और छोटे शहर तथा उनके आसपास के ग्रामीण क्षेत्र प्रभावित हो रहे हैं. इन जगहों पर जांच और उपचार की सुविधाएं अपेक्षाकृत कम हैं. यदि ऐसी जगहों पर संक्रमण इसी तेजी से बढ़ता रहा, तो हम बहुत जल्दी बड़ी परेशानी में पड़ सकते हैं. प्रधानमंत्री ने मुख्यमंत्रियों को सचेत किया है कि अगर अभी हमने ध्यान नहीं दिया और महामारी ग्रामीण इलाकों में फैल गयी, तो उस पर काबू पाना मुश्किल हो जायेगा. इन क्षेत्रों में जांच की सुविधा उपलब्ध कराने पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए.


उपचार की व्यवस्था तुरंत कर पाना संभव नहीं होता है. ऐसे में मरीजों को शहरों में ले जाने के लिए एंबुलेंस का इंतजाम रखा जाना चाहिए. यह भी महत्वपूर्ण है, और इस पर देशभर में चर्चा भी हो रही है, कि वायरस के नये प्रकार किस हद तक खतरनाक हैं और उनकी पहचान कैसे हो सकती है. इसके लिए सभी राज्यों को अपने यहां ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए कि वे वायरस के नमूनों को आनुवांशिक विश्लेषण के लिए बड़ी प्रयोगशालाओं में भेजें. देश में करीब एक दर्जन ऐसी संस्थाएं हैं, जहां ऐसे विश्लेषण हो सकते हैं. इससे हमारे पास वायरस के बारे में अधिक जानकारी मिलेगी.


प्रधानमंत्री मोदी ने टीकाकरण अभियान को लेकर जो बातें कही हैं, उन पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए. यदि हमें निर्धारित लक्ष्य के अनुसार आगामी महीनों में करोड़ों लोगों को खुराक देनी है, तो मौजूदा गति को तेज करना होगा. पिछले सप्ताह औसतन हर रोज 12.6 लाख खुराक दी गयी है. यह आंकड़ा संतोषजनक नहीं है. इसे बेहतर करने के लिए सरकारी अस्पतालों के साथ निजी अस्पतालों और स्वयंसेवी संस्थानों को मिलकर काम करना होगा.


शासन तंत्र की मुस्तैदी से ही इन समस्याओं का समाधान हो सकेगा. महामारी रोकने के लिए अगली कतार में जूझ रहे कर्मचारियों में थकान भी पसर रही है. स्वास्थ्यकर्मियों समेत अन्य कर्मचारियों को उत्साहित करने के लिए कुछ प्रयासों की आवश्यकता है. उन्हें प्रशिक्षित करने की प्रक्रिया भी जारी रहनी चाहिए.


यदि हम महामारी के दूसरे चरण को जल्दी काबू कर सकें, तो बहुत अच्छा होगा क्योंकि जिन इलाकों में अब इसके प्रसार की आशंका है, वहां हमारे पास समुचित संसाधन नहीं हैं और नियंत्रण न होने की स्थिति में मामला बिगड़ सकता है. हमें याद रखना चाहिए कि 1918 में इंफ्लूएंजा की महामारी की दूसरी लहर अधिक भयावह साबित हुई थी. उसमें बड़ी संख्या में लोग संक्रमित भी हुए थे, बीमारी ज्यादा तकलीफदेह थी और मृतकों की संख्या भी अपेक्षाकृत अधिक थी. ऐसी ही स्थिति अभी यूरोप के कुछ देशों में है. हमें सावधान और सचेत रहने की आवश्यकता है.

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Thursday, March 18, 2021

पर्यावरण के लिए प्रतिबद्धता (प्रभात खबर)

By डॉ उत्तम कुमार सिन्हा 

 

पर्यावरण संरक्षण और स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देने का प्रयास स्पष्ट तौर पर दिख रहा है. वर्ष 2015 के पेरिस जलवायु समझौते के आधार पर भारत इसके लिए प्रतिबद्ध है. हमने अतिरिक्त प्रयास के रूप में संचित कॉर्बन सिंक के लिए भी लक्ष्य निर्धारित किया हुआ है. यानी 2.523 बिलियन टन कॉर्बन डाइऑक्साइड के आधार पर 2030 तक अतिरिक्त वन्य क्षेत्र में बढ़ोतरी की जायेगी.



इसके मुताबिक 25 से 30 मिलियन हेक्टेयर वनावरण होना चाहिए. पेरिस समझौते के समय ही 2015 में ग्रीन इंडिया मिशन लांच किया गया था, यह एक प्रकार का नेशनल एक्शन प्लान ऑन क्लाइमेट चेंज है. ग्रीन मिशन का उद्देश्य सीधे तौर पर पेरिस जलवायु समझौते से जुड़ा हुआ है. कॉर्बन सिंक और वन आवरण क्षेत्र में बढ़ोतरी के लिए हमने जो प्रतिबद्धता ली है, वह ग्रीन इंडिया मिशन के तहत आ जाता है.



अब सवाल है कि हम निर्धारित लक्ष्य को अगले दस वर्षों में हासिल कर पायेंगे? हालांकि, स्पष्ट तौर पर कुछ कहना बहुत जल्दी होगा. अभी हमारे पास 10 वर्ष का समय है और काफी उम्मीदें हैं. अगर हम अच्छी योजना बनायें और उसे लागू करें, तो यह संभव है. सरकार की प्रतिबद्धता से इसका संकेत मिल रहा है. प्रधानमंत्री मोदी जब वैश्विक मंचों पर प्रतिबद्धता जाहिर करते हैं, तो एक विश्वास होना चाहिए कि इस सरकार में यह प्राथमिकता में है.


हालांकि, सरकार यह भी कहती है कि आर्थिक विकास जरूरी है, इसे कैसे संतुलित किया जाये, यह एक बड़ी चुनौती है. नवीकरणीय ऊर्जा के लक्ष्य को पूरा करने की दिशा में हम आगे बढ़ रहे हैं. प्रधानमंत्री ने भी कहा था कि 2022 तक हम 175 गीगावाट नवीकरणीय ऊर्जा लक्ष्य को प्राप्त कर लेंगे और 2030 तक 450 गीगावाट का लक्ष्य होगा. नवीकरणीय ऊर्जा हमारी राष्ट्रीय प्रतिबद्धता के लक्ष्य को हासिल करने में एक अहम घटक होगी. सौर ऊर्जा का तेजी से विस्तार हो रहा है. लागत में भी कमी आ रही है. ऐसे तमाम संकेतक बता रहे हैं कि हम अपने लक्ष्य की दिशा में बढ़ रहे हैं.


स्वच्छ ऊर्जा हमारे एनडीसी (नेशनली डिटर्मिंड कंट्रीब्यूशन) का अहम घटक है. लगभग 40 प्रतिशत संचयी विद्युत शक्ति गैर-जीवाश्म ईंधनों से होगी, यानी कोयला या पेट्रोलियम पर निर्भरता कम होगी. यह बड़ा बदलाव होगा. लेकिन, इसमें हमें अंतरराष्ट्रीय सहयोग की भी जरूरत है. इसके लिए विकसित देशों से तकनीकी हस्तांतरण और कम लागत में अंतरराष्ट्रीय वित्त उपलब्धता आवश्यक है. वर्ष 2015 में बने ग्रीन क्लाइमेट फंड में विकसित देश अंशदान करते हैं. उससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वित्त पोषण किया जाता है.


भारत का कहना है कि हमारे पास कोयला एक अहम प्राकृतिक संसाधन है और भविष्य में इसका इस्तेमाल करेंगे. लेकिन, यह प्रदूषणकारी है. इससे विरोधाभास उत्पन्न होता है. हम कोयले का इस्तेमाल करेंगे, लेकिन क्लीन कोल टेक्नोलॉजी के माध्यम से, जो अंतरराष्ट्रीय सहयोग के आधार पर ही आयेगी.


निर्धारित लक्ष्य तक पहुंचने में कई कठिनाईयां और चुनौतियां हैं. कोविड के कारण अनेक समस्याएं उत्पन्न हुई हैं. हमें अर्थव्यवस्था को गति देनी है और इसके लिए ज्यादा से ज्यादा ऊर्जा का इस्तेमाल करेंगे. इसके लिए हमें अपनी योजना पर नये सिरे से काम करना होगा. वन आवरण बढ़ाने में विज्ञान और तकनीकी की महत्वपूर्ण भूमिका है. रिमोट सेंसिंग तकनीक से पता लगा सकते हैं कि पूरे देश में कितनी अनुपयोगी जमीन है. जहां-जहां ऐसी जमीनें हैं, वहां हमें वानिकी करना होगा.


अगर हम इस भूभाग पर वानिकी करें, तो हम अपने उद्देश्य को पूरा कर सकेंगे. दूसरा, हमें पारदर्शी व्यवस्था बनानी होगी. अपनी प्रगति का मूल्यांकन करना होगा. अगर हमें मालूम होगा कि कहीं कोई कमी आ रही है, तो हम प्रयासों को और तेज कर सकेंगे. तीसरा, फंडिंग एक बड़ा मसला है. एनडीसी में जितनी भी कवायद है, उसके लिए बजट की आवश्यकता है. निर्धारित उद्देश्यों को पूरा करने के लिए हमारा बजट पर्याप्त नहीं है.


उम्मीद है कि जब अर्थव्यवस्था सुधरेगी, तो ग्रीन इंडिया मिशन का बजट आवंटन बढ़ेगा. विभागीय भ्रष्टाचार भी बड़ी समस्या है. पारदर्शिता के मुद्दे पर गंभीर होना होगा. जब कोई प्रतिबद्धता होती है, खासकर जलवायु परिवर्तन, वन कार्ययोजना, नदी, बाढ़ राहत आदि में, तो प्रभावी प्रशासनिक व्यवस्था का होना जरूरी है. बजट बढ़ाने, भ्रष्टाचार को घटाने और क्षमता बढ़ोतरी पर ध्यान देना होगा. तीसरा, केंद्र और राज्य संबंधों को मजबूत करना होगा.


केंद्र की सोच वैश्विक है, लेकिन कई बार राज्य की चिंताएं केंद्र के साथ संतुलन नहीं बिठा पाती हैं. जलवायु परिवर्तन कार्ययोजना के मामले में तालमेल नहीं बैठता है. केंद्र की सोच के इतर राज्यों की अलग व्यवस्था होती है. इसमें केवल अधिकारी ही नहीं, बल्कि किसानों, ग्रामीणों और सामान्य नागरिकों की सोच में भी बदलाव लाना होगा. उन्हें भी व्यापक स्तर पर इस मुहिम का हिस्सा बनाना होगा.


चौथा, हमें कृषि-वानिकी पर फोकस करना होगा. वानिकी का उद्देश्य केवल पौधारोपण तक ही सीमित नहीं होना चाहिए. इसे कृषि-वानिकी के माध्यम से लाभकारी भी बनाया जा सकता है. इसके माध्यम से आप अनुपयोगी जमीन को इस्तेमाल में ला सकते हैं. कुछ वर्ष पूर्व वानिकी से जुड़ा एक कानून बना था कि अगर व्यावसायिक उद्देश्य के लिए वनों को काटा जाता है, तो उसे संतुलित करने के लिए कंपनियों को वानिकी हेतु अनुदान देना होगा. यह एक महत्वपूर्ण प्रतिपूरक प्रावधान है. समय आ गया है कि इस फंड का प्रभावी तरीके से वानिकी के लिए इस्तेमाल किया जाये.

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वर्चुअल समाज का बढ़ता दायरा (प्रभात खबर)

By अंबरीश गौतम 

 

 

वैश्वीकरण को एक प्रक्रिया के रूप में समूचे विश्व को एकीकृत करने का माध्यम माना गया है. इसमें दूरस्थ से निकटस्थ को और निकट स्थान से दूरस्थ क्षेत्रों को जोड़ने की क्षमता है. इसी क्षमता के कारण ही वैश्वीकरण ने भूमंडल के विभिन्न क्षेत्रों, भूखंडों, स्थलों और जनसांख्यिकीय आकृति को एक-दूसरे से जोड़ने में सफलता प्राप्त की है. इन्हें जोड़ने में पूंजी, तकनीक, संसाधन, वस्तुओं एवं सेवाओं की खरीद-बिक्री की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है. इसी प्रक्रिया ने पूरे विश्व को एकीकृत किया है, जहां पर भाषा, राजनीति, शिक्षा, संस्कृति, शासन और आचार-विचार के विविध स्वरूपों में एकरूपता बनाने का प्रयास किया गया है.



यह उसी तरह से है, जैसे किसी विस्तृत जमीन का समतलीकरण करते हुए उसे खेल के मैदान में रूपांतरित कर दिया जाता है. यह प्रक्रिया इस प्रकार से की जाती है कि खेल के मैदान के एक छोर से दूसरे छोर तक आसानी से नजर रखी जा सके और संपर्क बनाये रखा जा सके.



वैश्वीकरण के माध्यम से विश्व की सभी संस्थाओं, जैसे आर्थिक, शैक्षणिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक माध्यमों को इस प्रकार के सांचे में ढाला गया है कि वे भी खेल के मैदान के विभिन्न बिंदुओं के रूप में कार्य कर सकें. साथ ही उनमें कुछ इस प्रकार का समन्वय स्थापित किया जा सके कि एक छोर से खींची जाने वाली रस्सी दूसरे छोर पर स्थित संस्था संरचना को जोड़ कर उसमें वांछित परिवर्तन कर सके. कहने का तात्पर्य है कि यदि एक छोर पर राजनीतिक बयार बहे, तो अंतिम छोर की भी राजनीति प्रभावित हो. यदि एक छोर पर क्रांति आये, तो अंतिम छोर भी उसी के अनुरूप परिवर्तित हो सके.


हालांकि वैश्वीकरण द्वारा संपन्न समतलीकरण की इस प्रक्रिया में एक तत्व कहीं न कहीं छूटा हुआ दिखाई पड़ता है, वह है- विभिन्न क्षेत्रों के बीच आपसी संपर्क एवं संवाद. संपर्कों और संवादों की यह व्यवस्था मानव रहित नहीं स्थापित की जा सकती है, क्योंकि उससे न तो उसमें पूर्णता आ पायेगी और न ही भविष्य में होनेवाली किसी मानवीय भूल से इनकार किया जा सकता है.


ऐसी स्थिति में संपर्क एवं संवाद के माध्यम के रूप में वर्चुअलीकरण की प्रक्रिया आरंभ की गयी है. यह प्रक्रिया मूल रूप से सूचना प्रौद्योगिकी और सूचना तकनीक पर आधारित है. इसमें समतल किये गये खेल के मैदान के विभिन्न बिंदुओं के रूप में रोबोटिक्स, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, नॉन-ह्यूमन कम्युनिकेशन, इंटरनेट, सेटेलाइट, टेक्नोलॉजी, नैनो टेक्नोलॉजी और नैनो पार्टिकल्स आदि का प्रयोग आरंभ हो चुका है.


आज के दौर में आरंभ की गयी यह प्रक्रिया रोबोटिक्स पर आधारित है, जहां पर मनुष्य का मनुष्य के बीच संपर्क फाइबर ऑप्टिक्स पर टिका है. इन फाइबर ऑप्टिक्स के माध्यम से संचालित की जाने वाली सूचनाएं बिना गलती और बिना छेड़छाड़ के एक स्थान से दूसरे स्थान तक भेजी जा रही हैं. इसमें लेशमात्र की भी गलती की गुंजाइश नहीं रहती है. इस तकनीकी उन्नति की ही देन है कि मानवीय न्यूरॉन से बनने वाले संपर्क सूत्र अब ऑप्टिकल न्यूरॉन से बनते हुए संचालित किये जा रहे हैं.


संचालन की यह प्रक्रिया सिर्फ वैश्विक स्तर की विभिन्न संस्थाओं के बीच संपर्क सूत्र का माध्यम नहीं रही है, बल्कि मानव जीवन के उपयोग में आने वाली छोटी-छोटी संस्थाओं जैसे परिवार, सामाजिक सरोकार, मनुष्यों के आपसी संबंध, बात-व्यवहार, शिक्षा आदि सभी गतिविधियों को अपने घेरे में ले चुकी है. यह परिवर्तन इतना प्रभावी रूप ले चुका है कि इससे वर्तमान में विश्व का कोई भी व्यक्ति अपने आपको अलग नहीं कर पा रहा है.


वास्तव में मनुष्य की ऑप्टिकल फाइबर पर बढ़ती हुई यही निर्भरता वर्चुअल दुनिया का निर्माण कर रही है. आज के दौर का कोई संस्थान इस तकनीकी बदलाव से अछूता नहीं है. दूसरे शब्दों में कहें, तो यह तकनीक, क्षमता उन्नयन और विकास की वाहक बन रही है. चाहे स्कूल, कॉलेज हों, सरकारी कार्यालय हों या पूजा-पाठ हों, व्यापार या वाणिज्य हों, खाद्यान हों, सभी वर्चुअल ग्राउंड बन गये हैं. इसकी खासियत है कि इसमें बिना प्रत्यक्ष उपस्थिति के मनुष्य अपनी समूची आवश्यकताओं की पूर्ति कर पा रहा है. यही वर्चुअल दुनिया है तथा संपादित की जाने वाली प्रक्रिया वर्चुअलाइजेशन. वर्चुअल संरचना के निर्माण में वर्तमान संचार सुविधाओं ने क्रांतिकारी योगदान दिया है.


ऐसा लगता है कि समाज के स्तर पर पूर्व में स्थापित सामाजिक संरचना के सामानांतर एक नयी वर्चुअल सामाजिक संरचना निर्मित हो गयी है, जिसमें व्यक्तियों का आमने-सामने होना आवश्यक नहीं है, बल्कि यह वर्चुअल सामाजिक संरचना लोगों को आपस में जोड़े हुए है. इसे वर्चुअल सामाजिक संपर्क कहा जा सकता है. इसमें क्रिया है, प्रतिक्रिया है और अन्तः क्रिया भी है, जिसमें सभी सामाजिक गतिविधियां सिमट-सी गयी हैं. सामाजिक गतिविधियों में हो रहे इस बदलाव के कारण नये सामाजिक परिदृश्य का निर्माण हो रहा है. हालांकि,


इस प्रक्रिया से मनुष्यों पर नकारात्मक प्रभाव भी दिखाई पड़ रहे हैं, जिसमें चिड़चिड़ापन, मानसिक अव्यवस्था, अकेलापन, विलगाव जैसी स्थितियां उत्पन्न हो रही हैं. मानसिक अस्वस्थता और अकेलेपन जैसी चिंताओं से समाज में नयी-नयी प्रकार की बीमारियां भी उत्पन्न हो रही हैं. हालांकि, इन परिस्थितियों के बावजूद यह कहा जा सकता है कि निश्चित तौर पर हम वैश्विक समाज से निकल कर वर्चुअल समाज का निर्माण कर रहे हैं. यही वैश्विक समाज के बाद का वर्चुअल समाज है.

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इन्फ्रास्ट्रक्चर बैंक एक जरूरी कदम (प्रभात खबर)

By अभिजीत मुखोपाध्याय 

 

देश में इंफ्रास्ट्रक्चर एवं विकास परियोजनाओं के लिए वित्तीय संसाधन जुटाने हेतु राष्ट्रीय बैंक की स्थापना की घोषणा सराहनीय पहल है. इस संबंध में दो पहलुओं पर चर्चा जरूरी है. कोरोना महामारी के कारण संकटग्रस्त अर्थव्यवस्था में सुधार के लिए खर्च बढ़ाना आवश्यक है और इसके लिए इंफ्रास्ट्रक्चर एक उचित माध्यम है. इस क्षेत्र में अधिक खर्च करने की मांग भी व्यापक स्तर पर उठती रही है. दूसरी बात यह है कि हमारे देश में पहले से ही ऐसे वित्तीय संस्थान हैं, लेकिन विभिन्न कारणों से बीते कुछ दशकों में उनकी स्थिति बिगड़ती चली गयी है.



वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने विशेष राष्ट्रीय बैंक की घोषणा करते हुए कहा है कि इसकी शुरुआत 20 हजार करोड़ रुपये के कोष से होगी, जिसमें सरकार पांच हजार करोड़ का प्रारंभिक अनुदान मुहैया करायेगी. किसी समय सीमा का निर्धारण अभी नहीं किया है, पर सरकार को उम्मीद है कि अगले कुछ सालों में यह संस्थान शुरुआती पूंजी के आधार पर तीन लाख करोड़ रुपये तक जुटा सकेगी. पूंजी जुटाने के लिए पेंशन फंड जैसी बचतों का इस्तेमाल होगा.



साल 2019 के आखिरी महीनों में केंद्र सरकार ने एक नेशनल इंफ्रास्ट्रक्चर पाइपलाइन बनाने की बात की थी, जिसमें 2025 तक 111 लाख करोड़ रुपये जुटाने का प्रस्ताव था. वह भी एक महत्वपूर्ण प्रयास था, लेकिन अगर हम थोड़ा पीछे जाकर देखें, तो हमारे देश में बहुत सारी परियोजनाएं लंबित हैं. कोरोना काल में लॉकडाउन की वजह से मार्च से सितंबर के बीच भी परियोजनाओं का काम ठप रहा था, जिनका मूल्य लगभग 11.5 लाख करोड़ था. इस वजह से भी कई परियोजनाएं देर से पूरी हो सकेंगी.


परियोजनाओं में सरकार और निजी क्षेत्र की सहभागिता पर लगातार जोर दिया जाता रहा है. यदि हम 2004 से 2008-09 तक की वृद्धि का हिसाब करें, तो उसमें इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं का बड़ा योगदान था. लेकिन बाद में यह प्रक्रिया कई कारणों से ठप पड़ गयी. इसमें मुख्य वजह सरकार और निजी क्षेत्र की भागीदारी की व्यवस्था का पेच था. निजी क्षेत्र की यह चाहत होती है कि पहले सरकार पैसा लगाये और कर्जों की उपलब्धता को गारंटी या अन्य तरीकों से सुनिश्चित करे. किसी परियोजना द्वारा दी जा रही सेवा की मांग कम होने से भी निजी क्षेत्र निराश होता है और अन्य परियोजनाओं पर इसका नकारात्मक असर होता है.


उदाहरण के लिए, यदि कोई सड़क बनती है, तो निजी क्षेत्र को उम्मीद होती है कि दस साल या एक निश्चित अवधि में वह टोल टैक्स वसूल कर अपने निवेश व मुनाफे को कमाकर सड़क को सरकार को सौंप देगा. परंतु, यदि वाहनों की आवाजाही कम होती है, तो यह आकलन प्रभावित हो सकता है.


लंबित परियोजनाओं के संदर्भ में यह भी उल्लेखनीय है कि एक दौर ऐसा भी आया, जब तिमाही-दर-तिमाही सरकारी परियोजनाओं के रुकने या धीरे होने का सिलसिला तेज हो गया तथा लंबित परियोजनाओं में सरकारी परियोजनाओं की हिस्सेदारी 60 फीसदी तक हो गयी. साल 2019 में सरकार की ओर से लंबित परियोजनाओं की समस्या के समाधान के लिए समुचित प्रक्रिया अपनायी गयी थी. उनकी समीक्षा के बाद बड़ी संख्या में परियोजनाओं को चलाने या बेचने की सफल कोशिशें भी हुईं.


हालांकि ये प्रयास सही दिशा में हो रहे थे, लेकिन सरकार ने यह भी इंगित किया था कि लंबित परियोजनाओं को परिभाषित करने के कोई ठोस तरीके नहीं हैं. पर यह सच है कि ऐसी परियोजनाएं हैं और लॉकडाउन में उनमें बढ़ोतरी भी हुई है. ऐसे में ठीक ढंग से पूंजी की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए ठोस कदम की दरकार थी.


इंफ्रास्ट्रक्चर पर केंद्रित राष्ट्रीय बैंक की स्थापना ऐसी ही एक पहल है. अब यह देखा जाना चाहिए कि अगले कुछ साल, मान लें कि 2025 तक, इस बैंक के पास तीन लाख करोड़ रुपये की पूंजी जमा हो जायेगी, लेकिन हमारा राष्ट्रीय इंफ्रास्ट्रक्चर प्लान तो 111 लाख करोड़ रुपये का है. यदि बैंक कुछ अधिक, यहां तक कि तीन गुनी भी, राशि जुटा लेता है, तब भी प्लान और इस कोष के बीच बड़ा फासला बना रहेगा.


इस फासले को कम करने की एक उम्मीद इस बात से आती है कि जब सरकार अच्छा पूंजी आधार दे देगी, तो बहुत सारे निजी क्षेत्र के निवेशकों में इसमें पूंजी लगाने के लिए भरोसा पैदा होगा. लेकिन इस आशा को बीते अनुभवों के साथ जोड़कर देखें, तो इसके पूरा होने को लेकर निश्चित नहीं हुआ जा सकता है. यदि निजी निवेशक आते भी हैं, तो वे सरकार से गारंटी मांगेंगे और इस गारंटी के आधार पर वे बैंक से पूंजी उठायेंगे.


लेकिन क्या यह पूंजी 111 लाख करोड़ रुपये के लक्ष्य को हासिल कर सकेगी, इस सवाल को सामने रखा जाना चाहिए. बहरहाल, हमें आशावान रहना चाहिए और इस प्रक्रिया के तहत यदि 50-60 लाख करोड़ रुपये भी जुटाये जा सकेंगे, तो बहुत सारी परियोजनाओं को पूरा किया जा सकेगा. यह देश की विकास यात्रा में बेहद अहम साबित होगा.


नये सिरे से नया बैंक बनाने की मंशा के पीछे एक बड़ी वजह पहले की ऐसी संस्थाओं पर गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (एनपीए) का दबाव है. पेशेवर निदेशक बोर्ड के नेतृत्व में कुशल प्रबंधन, निगरानी और समीक्षा जैसे आयामों का ध्यान रखते हुए नयी संस्था पहले के खराब अनुभवों से सीखते हुए बेहतर प्रदर्शन कर सकती है. इस दृष्टि से भी इस पहल का स्वागत किया जाना चाहिए. पर शुरुआत में सरकार के सौ प्रतिशत स्वामित्व को कालांतर में 26 प्रतिशत करने के निर्णय पर भी विचार किया जाना चाहिए.


ऐसा करने से इस राष्ट्रीय बैंक से सरकार का नियंत्रण समाप्त हो जायेगा. तब क्या फिर से इस बैंक के साथ भी एनपीए की समस्या नहीं पैदा हो सकती है? सरकार इस बैंक के तहत दस साल तक कर राहत और अन्य छूट का भी प्रावधान कर रही है. इस आकर्षण से पूंजी जुटाने में मदद मिलेगी. किंतु इस संबंध में सरकारी और निजी क्षेत्र की भागीदारी के पुराने मॉडल को ही आगे बढ़ाया जायेगा या कोई बदलाव किया जायेगा, इस संबंध में संसद में विधेयक के पेश होने के बाद ही स्पष्ट रूप से कुछ कहा जा सकेगा.


यदि सरकार उस मॉडल पर ही आगे बढ़ेगी, तो उसकी खामियों पर उसे विधेयक तैयार करने के दौरान विचार कर लेना चाहिए ताकि पुराने रोगों से नया बैंक बचा रहे. परियोजना को लागू करने और पूरा करने के संबंध में भी अनुभवों का संज्ञान लिया जाना चाहिए. नयी वित्त संस्था को कम दरों पर कर्ज देने के लिए बैंकों और गैर-बैंकिंग संस्थाओं से प्रतियोगिता भी करनी होगी.

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Wednesday, March 17, 2021

पर्यावरण की बेहतरी (प्रभात खबर)


वर्ष 2015 में हुए पेरिस जलवायु समझौते में निर्धारित संकल्पों के अनुरूप भारत पर्यावरण संरक्षण और संवर्द्धन के लिए निरंतर प्रयत्नशील है. केंद्रीय पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने संसद को जानकारी दी है कि जी-20 देशों में भारत अकेला देश है, जो समझौते का अनुपालन कर रहा है.


वन क्षेत्रों को बचाना और बढ़ाना पर्यावरण को बचाने व बेहतर करने के लिए सबसे जरूरी है. बीते छह सालों में हरित क्षेत्र के आकार में 15 हजार वर्ग किलोमीटर की बढ़ोतरी उत्साहवर्द्धक है. केंद्र सरकार ने इस सिलसिले को जारी रखने के लिए राज्यों को 48 हजार करोड़ रुपये का आवंटन किया है, जिसका 80 प्रतिशत हिस्सा वन क्षेत्र के विस्तार पर खर्च करने का निर्देश है.



जीवाश्म आधारित ईंधनों पर निर्भरता कम करने के लिए स्वच्छ ऊर्जा के उत्पादन और उपभोग को प्रोत्साहित किया जा रहा है. न केवल देश में, बल्कि दुनियाभर में सौर ऊर्जा का विस्तार करने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन का गठन किया गया है, जिससे कई देश जुड़ चुके हैं. हमारे देश में अभी 90 गीगावाट स्वच्छ ऊर्जा का उत्पादन हो रहा है, जो अगले साल 175 गीगावाट होने की उम्मीद है.


यह तथ्य भी उल्लेखनीय है कि हमारे देश में इलेक्ट्रिक वाहनों की मांग बढ़ती जा रही है. साल 2017-18 में 69 हजार से कुछ अधिक ऐसे वाहनों की बिक्री हुई थी, जो बीते साल 1.67 से अधिक हो गयी. सरकार और उद्योग जगत को प्रदूषणरहित वाहनों के इस्तेमाल को बढ़ाने पर ज्यादा जोर देना चाहिए. जलवायु परिवर्तन और धरती का तापमान बढ़ने की सबसे बड़ी वजह कार्बन उत्सर्जन है. हमारे देश में 2005 की तुलना में कार्बन उत्सर्जन में 21 प्रतिशत की गिरावट आयी है.


स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देने और उत्सर्जन में व्यापक कटौती की आवश्यकता इसलिए भी है कि 2040 तक देश में ऊर्जा की मांग तीन गुनी हो जायेगी. हालांकि जलवायु परिवर्तन एक वैश्विक समस्या है और उसका समुचित समाधान अंतरराष्ट्रीय सहयोग से ही हो सकता है, लेकिन यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि इसके कुप्रभावों का अधिक सामना भारत जैसे देशों को ही करना है. ग्लेशियरों का पिघलने, समुद्री जल-स्तर के बढ़ने, बाढ़, सूखे, चक्रवात आदि से हमें बहुत नुकसान उठाना पड़ रहा है.


जंगलों में आग लगने की घटनाएं बढ़ने लगी हैं. बेमौसम की बरसात खेती पर कहर ढाने लगी है. पेयजल की कमी और भूजल का स्तर नीचे जाना चिंताजनक है. विकास की आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए ऊर्जा स्रोतों के साथ पानी की मांग भी बढ़ रही है. ऐसे में जलवायु को संतुलित रखते हुए पर्यावरण को बचाने की चुनौती बढ़ गयी है. निश्चित रूप से भारत की कोशिशें महत्वपूर्ण हैं, लेकिन इनसे संतुष्ट नहीं हुआ जा सकता है. वायु और जल प्रदूषण बढ़ता जा रहा है. भूक्षरण की चिंता भी गहन हो रही है. ऐसे में पर्यावरण के लिए आवंटन और निवेश बढ़ाया जाना चाहिए.

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Tuesday, March 16, 2021

कोरोना से नहीं डरतीं किताबें (प्रभात खबर)

पंकज चतुर्वेदी, वरिष्ठ पत्रकार

दिल्ली में ठंड के दिनों में घने कोहरे के बीच प्रगति मैदान का विश्व पुस्तक मेला बहुप्रतिक्षित रहता है. कोरोना आपदा के चलते भले ही वह पुस्तक-कुंभ न लग पाया हो, लेकिन पुस्तकों को जन-जन तक पहुंचाने के लिए कृतसंकल्प राष्ट्रीय पुस्तक न्यास (एनबीटी) ने देश-दुनिया के पुस्तक प्रेमियों के घर तक विश्व पुस्तक मेले को पहुंचा कर दुनिया के सबसे बड़े वर्चुअल पुस्तक मेले का आयोजन कर दिया.



गत पांच से नौ मार्च तक चले नयी दिल्ली विश्व पुस्तक मेले के पहले वर्चुअल संस्करण ने आगंतुकों, खरीदारों और साहित्यिक आयेाजनों का विश्व-कीर्तिमान स्थापित कर दिया है. भारत ने दुनिया को दिखा दिया कि कोई भी आपदा देश की सृजनात्मकता, वैचारिकी और ज्ञान-प्रसार में आड़े नहीं आ सकती.



ऐसा पहला अनुभव होने के बावजूद न आगंतुकों का उत्साह कम हुआ और न ही प्रकाशकों का. इस पुस्तक मेले में 135 से अधिक भारतीय और 15 से अधिक विदेशी प्रकाशकों ने सहभागिता दर्ज करायी. एक अनजान व अदृश्य जीवाणु ने जब दुनिया की चहलकदमी रोक दी, फिर भी कोई भी भय इंसान की सृजनात्मकता, विचारशीलता और उसे शब्दो में पिरो कर प्रस्तुत करने की क्षमता पर अंकुश नहीं लगा पाया.


इस अजीब परिवेश ने न केवल लिखने के नये विषय दिये, बल्कि इसमें लेखक-पाठक की दूरियां कम हुईं, तकनीक से मुहल्ले व कस्बों के विमर्श अंतरराष्ट्रीय हो गये. शुरूआत में जब मुद्रण संस्थान ठप रहे, तब सारी दुनिया की तरह पुस्तकों की दुनिया में भी कुछ निराशा-अंदेशा व्याप्त था. लेकिन घर में बंद समाज को त्रासदी के पहले हफ्ते में ही भान हो गया कि पुस्तकें ऐसा माध्यम हैं, जो सामाजिक दूरी को ध्यान में रखते हुए घरों में अवसाद से मुक्ति दिलाने में महती भूमिका निभाती हैं और ज्ञान का प्रसार भी करती हैं. भय भरे माहौल में लॉकडाउन में सकारात्मक सोच के साथ पठन-पाठन से लोगों को जोड़ने के लिए कई अभिनव प्रयोग किये गये.


प्रगति मैदान के पुस्तक मेले की लगभग तीन दशक से चल रहे अनवरत सिलसिले के टूटने पर निराश होना लाजिमी थी, लेकिन वर्चुअल पुस्तक मेले ने इस कमी को काफी कुछ पूरा किया. कुछ नहीं से कुछ होना भला है, परंतु छोटे प्रकाशकों, दूरस्थ अंचल के लेखकों व पाठकों के लिए तो प्रगति मैदान की भीड़ में किताबों के कुंभ में गोते लगाना ही पुस्तक मेला कहलाता है. कंप्यूटर संचालित इस आधुनिक व्यवस्था को भले ही नाम मेला का दिया गया हो, लेकिन आम लोगों के लिए तो सीमित तंत्र है.


पुस्तकों की संख्या कम होती है, भुगतान को लेकर भी दिक्कतें हैं. असल में मैदान में लगनेवाला मेला पुस्तकों के साथ जीने, उसे महसूस करने का उत्सव होता है, जिसमें गीत-संगीत, आलोचना, मनुहार, मिलन, असहमतियां और सही मायने में देश की विविधतापूर्ण भाषायी एकता की प्रदर्शनी भी होती है.


बीते एक साल में लेखकों और प्रकाशकों ने यह भांप लिया कि कोरोना के चलते लोगों की पठन अभिरूचि, जीवन शैली, अर्थतंत्र आदि में आमूल-चूल बदलाव होंगे. एनबीटी ने अपनी कई सौ लोकप्रिय पुस्तकों को निशुल्क पढ़ने के लिए वेबसाइट पर डाल दिया, तो राजकमल प्रकाशन ने पाठक के घर तक पुस्तकें पहुंचाने की योजना शुरू कर दी. कई अन्य प्रकाशक भी डिजिटल प्लेटफॉर्म को प्राथमिकता देने लगे.


हालांकि अभी ईबुक अधिक लोकप्रिय नहीं हुआ है, लेकिन बच्चों में ऑडियो बुक्स का प्रचलन बढ़ा है. बुद्धिजीवी वर्ग को समझने में ज्यादा देर नहीं लगी कि इस महामारी ने हमें अपनी जीवन शैली में बदलाव के लिए मजबूर किया है और इससे पठन अभिरूचि भी अछूती नहीं हैं. लोगों ने पहले फेसबुक जैसे निशुल्क प्लेटफॉर्म पर रचना पाठ, गोष्ठी, लेखक से मुलाकात और रचनाओं की ऑडियो-वीडियो प्रस्तुति प्रारंभ की और फिर जूम, गूगल, जैसे कई नये मंच आ गये. मोबाइल या कंप्यूटर पर लेखक को सुनने या सवाल करने का मोह घर के वे सदस्य भी नहीं छोड़ पाये, जो अभी तक पठन-पाठन से दूरी बनाये रखते थे.


नवंबर में दिल्ली में फेडरेशन आफ इंडियन पब्लिशर्स ने तीन दिन का एक वर्चुअल पुस्तक मेला किया था, जिसे विश्व का सबसे बड़ा वर्चुअल बुक फेयर कहा गया. दिसंबर में इंडिया इंटरनेशनल साइंस कांग्रेस में भी पुस्तक मेला के लिए एक स्थान था. तीस दिसंबर से दस जनवरी तक गुवाहाटी पुस्तक मेला हुआ और जहां हर दिन पचास हजार पुस्तक प्रेमियों ने पहुंच कर जता दिया कि अपनी पठन-पिपासा के लिए वे कोरोना वायरस से डर नहीं रहे.


लखनऊ में भी पुस्तक मेला हुआ और कई जगह प्रदर्शनी भी लग रही हैं. ऐसा नहीं है कि कोरोना संकट के साथ आये बदलावों से प्रकाशन व लेखन में सभी कुछ अच्छा ही हुआ है. नयी तकनीक ने भले ही ज्ञान के क्षेत्र में क्रांति ला दी है, लेकिन मुद्रित पुस्तकें आज भी विचारों के आदान-प्रदान का सबसे सशक्त माध्यम हैं. वे जरूरी शिक्षा और साक्षरता का एकमात्र साधन भी हैं. हमारी बड़ी आबादी अभी भी डिजिटल माध्यमों से गंभीरता से परिचित नहीं हैं.


हमारे प्रकाशन उद्योग की विकास दर पिछले साल तक बीस प्रतिशत सालाना रही, जो अब थम गयी है. लेकिन विषम स्थिति में भी बोधि प्रकाशन (जयपुर) जैसे संस्थान उम्मीद की लौ बरकरार रखते हुए सौ रूपये में दस पुस्तकों के सेट मुहैया करा रहे हैं. यह एक बानगी है कि किताबें हर विषम स्थिति का मुकाबला करते हुए किसी भी तकनीकी से जुड़ कर ज्ञान की ज्योति प्रज्जवलित रखती हैं.

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अर्थव्यवस्था में हो रहा सुधार (प्रभात खबर)

सतीश सिंह, मुख्य प्रबंधक, आर्थिक अनुसंधान विभाग, भारतीय स्टेट बैंक, मुंबई


राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) के ताजा आंकड़ों के अनुसार, चालू वित्त वर्ष की तीसरी तिमाही में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 0.4 प्रतिशत की दर से बढ़ोतरी हुई है. पहली तिमाही में जीडीपी में 23.9 प्रतिशत की गिरावट आयी थी. वित्त वर्ष 2021 में जीडीपी में आठ प्रतिशत की दर से और जीवीए में 6.5 प्रतिशत की दर से गिरावट आयी थी, जबकि वित्त वर्ष 2022 में जीडीपी में 11 प्रतिशत की दर से और नॉमिनल जीडीपी में 15 प्रतिशत की दर से वृद्धि हो सकती है.

तीसरी तिमाही में कृषि एवं संबद्ध क्षेत्र में वृद्धि 3.4 प्रतिशत की दर से हुई, जबकि 2019-20 में वृद्धि 3.9 प्रतिशत की दर से हुई थी. वित्त वर्ष 2021 में इसमें 3.00 प्रतिशत की दर से वृद्धि हो सकती है. तीसरी तिमाही में उद्योग क्षेत्र में वृद्धि सकारात्मक हो गयी है, जबकि पहली तिमाही में यह 35.9 प्रतिशत नकारात्मक थी. वृद्धि का कारण बिजली, गैस, जल आपूर्ति और अन्य उपयोगिता सेवाओं में 7.3 प्रतिशत की दर से वृद्धि का होना है. निर्माण क्षेत्र में भी 6.2 प्रतिशत की दर से वृद्धि हुई है. वित्त वर्ष 2021 में कृषि क्षेत्र को छोड़कर बिजली, गैस, पानी की आपूर्ति और अन्य उपयोगिता सेवाओं में सकारात्मक वृद्धि होने का अनुमान है.



तीसरी तिमाही में सेवा क्षेत्र में 1.0 प्रतिशत की दर से वृद्धि हुई है. सकारात्मक वृद्धि का मुख्य कारण वित्तीय, रियल एस्टेट और व्यावसायिक सेवाओं में 6.6 प्रतिशत की दर से वृद्धि होना है. तीसरी तिमाही में जीडीपी में सकारात्मक वृद्धि हुई है, लेकिन अंतिम उपभोग में नकारात्मक वृद्धि हुई है. सरकारी खर्च में वृद्धि के कारण अंतिम उपभोग व्यय में 2021 की चौथी तिमाही में सकारात्मक वृद्धि का अनुमान है. निजी अंतिम उपभोग व्यय में भी वृद्धि हुई है और 2021 की चौथी तिमाही में इसमें 3.1 प्रतिशत की दर से वृद्धि का अनुमान है. सकल स्थिर पूंजी निर्माण दर 2021 की दूसरी तिमाही में नकारात्मक रही, जो तीसरी तिमाही में वास्तविक और नाममात्र दोनों मानदंडों पर सकारात्मक हो गयी.


12 फरवरी, 2021 तक सभी अनुसूचित व्यावसायिक बैंक (एएससीबी) का वाइओवाइ ऋण वृद्धिशील आंकड़ा 6.6 प्रतिशत के स्तर पर पहुंच गया, जो पिछले साल की समान अवधि में 6.4 प्रतिशत था. वाइटीडी के आधार पर एएससीबी का ऋण वृद्धि 12 फरवरी, 2021 तक 3.2 प्रतिशत रहा, जो राशि में 3.3 लाख करोड़ रुपये था. 12 फरवरी, 2020 तक 2.8 प्रतिशत की दर से वृद्धिशील ऋण में वृद्धि हुई, जो राशि में 2.7 लाख करोड़ रुपये थी.


हाल ही में भारतीय रिजर्व बैंक ने अनुसूचित व्यावसायिक बैंक (एससीबी) के जमा और ऋण के तिमाही आंकड़े जारी किये हैं, जिसके अनुसार वाइओवाइ आधार पर ऋण में वृद्धि दिसंबर, 2020 में बढ़कर 6.2 प्रतिशत हो गयी, जो पिछली तिमाही में 5.8 प्रतिशत थी. सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का ऋण 6.5 प्रतिशत हो गया, जो दिसंबर 2019 में 3.7 प्रतिशत था. एएससीबी का जनवरी 2021 के दौरान वृद्धिशील ऋण वृद्धि लगभग सभी क्षेत्रों में बेहतर रहा.


जनवरी, 2021 के क्षेत्रवार आंकड़ों के अनुसार 33 एससीबी का वृद्धिशील ऋण लगभग सभी प्रमुख क्षेत्रों जैसे, कृषि, सेवा, उद्योग, व्यक्तिगत ऋण आदि में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई. वित्त वर्ष 2021 के अप्रैल से जनवरी के दौरान उद्योग और गैर-सरकारी वित्तीय कंपनी को छोड़कर लगभग सभी क्षेत्रों में वृद्धिशील ऋण में वृद्धि हुई है. उद्योग में ऋण वृद्धि नहीं होने का कारण उद्योग द्वारा बॉन्ड बाजार से पैसा जुटाना है. उद्योग के उपखंडों में खनन और उत्खनन, खाद्य प्रसंस्करण, कपड़ा, रत्न और आभूषण, पेट्रोलियम, कोयला उत्पाद, परमाणु ईंधन, कागज और कागज के बने उत्पाद, चमड़े और चमड़े के उत्पाद, वाहन, वाहन के पुर्जे और परिवहन उपकरण आदि क्षेत्रों में जनवरी 2021 में जनवरी, 2020 से तेज ऋण वृद्धि हुई है.


बीएफएसआइ और रिफाइनरी को छोड़कर 3000 से अधिक सूचीबद्ध कंपनियों के विश्लेषण से पता चलता है कि टॉप लाइन में लगभग पांच प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जबकि इबीआइडीटीए में लगभग 40 प्रतिशत की. तीसरी तिमाही में 2020 की तीसरी तिमाही की तुलना में कर के बाद लाभ (पैट) में 60 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गयी है. ऑटोमोबाइल, एफएमसीजी, फार्मा, सीमेंट, स्टील, उपभोक्ता टिकाऊ आदि क्षेत्रों ने उल्लेखनीय प्रदर्शन किये हैं.


कंपनियों की ऋण और ब्याज देयता में सितंबर, 2020 में 20 प्रतिशत की कमी आयी है, जबकि सितंबर, 2019 में 26 प्रतिशत की कमी आयी थी, जबकि मार्च, 2020 में 37 प्रतिशत की. इससे कंपनियां बैंकों का कर्ज चुकाने में समर्थ हुई हैं, साथ ही साथ वे कुशल तरीके से अपना वित्तीय प्रबंधन करने में भी सक्षम हुई हैं. विविध कॉरपोरेट के रेटिंग्स के विश्लेषण से पता चलता है कि अगस्त, 2020 के बाद से कॉरपोरेट के ऋण अनुपात में सुधार हो रहा है.


26 महत्वपूर्ण क्षेत्रों की अप्रैल, 2020 से अगस्त, 2020 की तुलना में सितंबर, 2020 से जनवरी, 2021 के दौरान उनकी रेटिंग्स में सुधार हुआ है. सितंबर, 2020 से जनवरी, 2021 के दौरान कुल मिलाकर 899 कॉरपोरेट की रेटिंग्स का उन्नयन हुआ है, जबकि 4998 कॉरपोरेट्स की रेटिंग्स नीचे गिरी हैं. भारत विश्व के उन प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में से एक है, जिसका कैलेंडर वर्ष 2020 की अंतिम तिमाही में सकारात्मक जीडीपी वृद्धि दर रहा है. आंकड़ों से साफ है अर्थव्यवस्था के सभी मानकों में निरंतर बेहतरी आ रही है.

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महामारी के बाद सामान्य होता अमेरिका (प्रभात खबर)

जे सुशील , अमेरिका में स्वतंत्र शोधार्थी


ठीक एक साल पहले मार्च के महीने में ही अमेरिका ने कोरोना महामारी के बढ़ते खतरे को गंभीरता से लेना शुरू किया था और कई राज्यों ने एक साथ व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को बंद करने का निर्णय किया था. तब से लेकर अब तक अमेरिका में संघीय सरकार भी बदल चुकी है. प्रतिनिधि संस्थाओं और राज्यों में भी राजनीतिक बदलाव हुए हैं. देश में अब तक पांच लाख से अधिक लोग कोरोना संक्रमण के कारण मारे गये हैं और अरबों डॉलर का आर्थिक नुकसान हो चुका है.



पिछला एक साल अमेरिका ही नहीं, पूरी दुनिया के लिए एक ऐसे अध्याय के रूप में गुजरा है, जिसके बारे में लंबे समय तक बात होती रहेगी. इस महामारी के कहर ने समूची मानवता को ऐसे अनुभवों से दो-चार किया है, जिनकी कल्पना भी सालभर पहले नहीं की जा सकती थी. इसके पूरे असर का ठीक-ठीक आकलन करने में भी बहुत समय लगेगा. प्रमुख राजनीतिक और आर्थिक शक्ति होने के नाते अमेरिका इस संकट से कैसे जूझ रहा है और आगे वह क्या करेगा, इस पर दुनिया की नजर भी जमी रहेगी.



अमेरिका में सरकार बदलने के साथ ही स्थिति सामान्य होने की तरफ तेजी से बढ़ी है और अब राष्ट्रपति जो बाइडेन ने घोषणा की है कि एक मई तक हर वयस्क को वैक्सीन लगाने की कोशिश की जायेगी. अगर मई तक ऐसा नहीं भी होता है, तो समझिए कि जून या जुलाई के महीने तक अमेरिका में उन सभी लोगों को वैक्सीन मिल जायेगी, जो वैक्सीन लगाना चाहते हैं. हालांकि अमेरिका में वैक्सीन लगवाना अनिवार्य नहीं है, लेकिन संभवतः कई संस्थान बिना वैक्सीन के अपने कर्मचारियों को वापस दफ्तरों में न आने दें, तो एक तरह से इसकी अनिवार्यता हो ही जायेगी.


फिलहाल लगभग सभी राज्यों में मेडिकल सेवाओं से जुड़े लोगों और पैंसठ की उम्र से अधिक के लोगों को तेजी से वैक्सीन लग चुका है, लेकिन युवाओं में कहीं-कहीं पर अचानक से कोरोना फैलने की खबरें भी आ रही हैं. ऐसे में बार-बार सावधानी बरतने के निर्देशों में भी कोई कमी नहीं आयी है. हालांकि अमेरिका में ही एक तबका ऐसा भी है, जो वैक्सीन का विरोध कर रहा है और वैक्सीन लगवाने को तैयार नहीं है. इसका मुख्य कारण वैक्सीन के बारे में फैली गलत सूचनाओं को माना जा रहा है और सरकार लगातार प्रयास कर रही है कि इन सूचनाओं का खंडन किया जाए.


वैक्सीन लगने के साथ ही धीरे-धीरे दुकानों, दफ्तरों और प्रतिष्ठानों को खोलने पर लगी रोक को भी हटाया जाने लगा है. यहां ये बताना जरूरी है कि पिछले एक साल में किसी भी समय इस देश में दवाई और दैनिक जरूरतों का सामान बेचनेवाली दुकानों को बंद नहीं किया गया था. भले ही उन दुकानों में कई बार सामान की आपूर्ति कम हो गयी थी, लेकिन दुकानों को बंद नहीं किया गया था. जो प्रतिष्ठान बंद हुए थे, उनमें प्रमुख थे- पब, रेस्तरां, सिनेमा हॉल, आर्ट गैलरियां, यूनिवर्सिटी, दफ्तर और ऐसी हर वह जगह, जहां लोगों की भीड़ होने की संभावना हो सकती थी.


पिछले एक साल में कोरोना महामारी के कारण कई छोटी दुकानें, रेस्तरां और कारोबार बंद हो चुके हैं और इससे लाखों डॉलर का नुकसान भी हो चुका है. अब धीरे-धीरे इन संस्थानों को भी खोला जा रहा है, लेकिन इन निर्देशों के साथ कि एक समय में कुछ ही लोग दफ्तर में रहें. मास्क पहने रहें और बार-बार हाथ धोते रहें. इन नियमों के साथ ही राष्ट्रपति बाइडेन ने उम्मीद जतायी है कि चार जुलाई को जब पूरा देश आजादी का पर्व मनायेगा, तो अमेरिका को कोरोना वायरस से भी आजादी मिल चुकी होगी.


चार जुलाई अमेरिकी समाज में वैसा ही महत्व रखता है, जैसा भारत में पंद्रह अगस्त. चार जुलाई की शाम को अमेरिका के लोग घर से बाहर निकलते हैं और जगह-जगह सरकार आतिशबाजी का इंतजाम करती है. यह एक कारण है कि बाइडेन चाहते हैं कि चार जुलाई से पहले ही हर वयस्क को टीका लगा दिया जाए क्योंकि भले ही लोग अभी घर से नहीं निकल रहे हैं, पर चार जुलाई को लोग बाहर निकलेंगे ही.


बाइडेन ने राष्ट्रपति बनने के बाद कोरोना महामारी को लेकर जिस तरह से तत्परता दिखायी है और बेकार की बयानबाजी न करते हुए संयम के साथ काम लिया है, उसका असर अमेरिकी समाज पर भी दिख रहा है. लोग संयमित हैं और मान रहे हैं कि अब वे इस महामारी को हरा देंगे. लोगों में अफरातफरी कम है. मास्क पहननेवाले लोगों की संख्या बढ़ी है और सड़क पर ऐसे नजारे कम हुए हैं, जहां लोग झुंड में घूम रहे हों.


बाइडेन की कार्यशैली भले ही कई लोगों को सुपरपावर देश के नेता के रूप में कमजोर लगती हो, लेकिन संभवतः कोरोना संक्रमण और नस्लभेद की घटनाओं से जूझ रहे देश को इस समय ऐसे ही नेता की जरूरत थी. बाइडेन ने अपने वादे के मुताबिक कोरोना महामारी के कारण परेशानी झेल रहे अमेरिकियों को नया राहत पैकेज भी दिया है और यह उम्मीद जतायी है कि स्थितियां जल्दी ही सामान्य हो जायेंगी. देश में मॉडेरना और फाइजर के बाद जॉनसन एंड जॉनसन ने भी नया टीका बनाया है, जिसे जल्दी ही इस्तेमाल में आने की आशा की जा रही है.


विशेषज्ञों का मानना है कि जॉनसन एंड जॉनसन का टीका मंजूर हो जाए, तो टीकाकरण अभियान में और तेजी आयेगी, क्योंकि कंपनी के पास एक बार में ही लाखों खुराक बनाने की क्षमता है. उल्लेखनीय है कि जॉनसन एंड जॉनसन का टीका एक ही खुराक का है और नब्बे प्रतिशत से अधिक प्रभावशाली बताया जा रहा है.


कोरोना महामारी से अमेरिका ने क्या सबक सीखा है और उन सबका आनेवाले समय में अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर क्या असर पड़ेगा, यह तो बाद में ही पता चल सकेगा. फिलहाल यह कहना ठीक होगा कि बाइडेन प्रशासन के पास महामारी पर काबू पाने के बाद भी जलवायु परिवर्तन की समस्या से निपटने, रूस और चीन के साथ अमेरिका के संबंधों को पुनर्परिभाषित करने, अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने जैसी कई कठिन चुनौतियां हैं, जिनसे सफलतापूर्वक जूझने के लिए उन्हें नये तौर-तरीके अपनाने होंगे, पर ऐसा लगता है कि बाइडेन प्रशासन ने इस दिशा में ठोस प्रयास करना शुरू कर दिया है.

सौजन्य - प्रभात खबर।

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