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सही समय पर उपचार है निदान



डॉ राजीव मेहता, वरिष्ठ मनोचिकित्सक, सर गंगाराम अस्पताल

नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो का वर्ष 2019 में आत्महत्या का आंकड़ा चिंतित करनेवाला है. प्रतिदिन 381 लोगों ने आत्महत्या की है. अवसाद और चिंता जैसे मानसिक विकारों से पीड़ित होने के कारण मनुष्य की उम्मीद खत्म हो जाती है. 90 प्रतिशत आत्महत्या के मामलों में यही कारण होता है. कुछ एक आवेगवश होती हैं. ऐसे मामलों में व्यक्ति को अवसाद या चिंता जैसी परेशानी तो नहीं होती लेकिन कुछ ऐसे कारण बन जाते हैं, जिससे वह आवेग में आकर तुरंत आत्महत्या करने का निर्णय कर लेता है.


यहां यह भी प्रश्न उठता है कि आखिर क्यों लोग अवसाद और चिंता से घिर जाते हैं. इनसे ग्रस्त होने के अलग-अलग आयु वर्ग में अलग-अलग कारण होते हैं. किशोरवय से युवावस्था तक देखें, तो पढ़ाई में, संबंधों में असफल रहना, माता-पिता द्वारा बहुत ज्यादा डांट-फटकार लगा देना, या जिद पूरी नहीं होना इस आयु वर्ग में आत्महत्या के कारण बनते हैं. यहां पार्टनर से ब्रेकअप आत्महत्या की प्रमुख वजह बनती है. बात-बात में मां-बाप या स्कूल में शिक्षकों द्वारा नुक्ताचीनी करना, आत्महत्या करने का दूसरा कारण है. माता-पिता या शिक्षक अपनी जगह सही होते हैं, लेकिन उनकी जरूरत से ज्यादा टोका-टोकी से बच्चों के अंदर अवसाद उत्पन्न हो जाता है और वे अपनी जान ले लेते हैं.

पच्चीस वर्ष से अधिक आयु के जो व्यक्ति आत्महत्या करते हैं, उसका प्रमुख कारण, करियर में सफल न होना, पति-पत्नी के आपसी संबंधों में कड़वाहट आना या शादी का टूट जाना, प्रेमी/प्रेमिका से अनबन, विवाहेतर संबंधों का घर में पता लग जाना, घर से दूर रहने के कारण अकेलापन घेर लेना है. इसके अलावा, भविष्य को लेकर बहुत ज्यादा चिंता, कोई ऐसी परेशानी आना, जिसे व्यक्ति झेल नहीं पाता और रोजमर्रा के दायित्वों को उठाने में असमर्थता से तनाव में आ जाता है. फिर ऐसी स्थिति में उसे अपना जीवन समाप्त करना ही बेहतर लगता है.


चालीस वर्ष की उम्र पार करने के बाद यदि आप कार्यस्थल पर अच्छा नहीं कर पा रहे हैं, तो नौकरी बचाये रखने की चिंता, जिम्मेदारियों का बहुत ज्यादा बढ़ जाना, घरेलू कलह, बच्चों का अपनी मर्जी का करना, अलग राह पर निकल जाना, उनमें शराब आदि बुरी लत का लगाना, उनका पढ़ाई में, करियर में पिछड़ते जाना व्यक्ति को तोड़ देता है. बच्चों की शादी यदि सही नहीं चल रही है तो भी माता-पिता काफी परेशान हो जाते हैं और परेशानियों का हल निकलता न देख अपनी जान ले लेते हैं.


साठ वर्ष का होने पर नौकरी खत्म हो जाती है, कइयों के पति/पत्नी की मृत्यु हो जाती है और अकेलापन घेर लेता है. बच्चों की माता-पिता के प्रति लापरवाही भी इस उम्र में काफी चोट पहुंचाती है. बीमारियों से घिर जाना और उनसे लड़ना भी इस उम्र में बहुत चुनौतीपूर्ण हो जाता है. संगी-साथी छूट जाते हैं. इन सब परेशानियों से लड़ते हुए व्यक्ति में अवसाद और चिंता के लक्षण उभरने लगते हैं, जिनका समय पर निदान न करना आत्महत्या का कारण बनता है.


अवसाद और चिंता के लक्षण होने पर व्यक्ति का मन उदास हो जाता है, वह परेशान व चिड़चिड़ा हो जाता है, किसी काम में उसका मन नहीं लगता है. उसकी नींद और भूख कम हो जाती है. वह किसी भी पल का आनंद नहीं उठा पाता है. उसकी एकाग्रता, धैर्य और याददाश्त कम हो जाती है, वह बातों को भूलने लगता है. व्यक्ति का आत्मविश्वास कम हो जाता है और वह बात-बात पर रोने लगता है. उसे अपना भविष्य अंधकारमय लगने लगता है. जब किसी व्यक्ति को उसका भविष्य अंधकारमय लगने लगता है, तो उसके मन में सबकुछ त्यागने के विचार आने शुरू हो जाते हैं.


यह विचार एक-एक कर आते हैं. पहले व्यक्ति को लगता है कि वह सबकुछ छोड़ कर कहीं चला जाये. या फिर वह सोचता है कि भगवान उसे उठा ले. अवसाद के बहुत ज्यादा बढ़ जाने से खुद को खत्म करने का विचार मन में आता है. इसके बाद व्यक्ति मरने के तरीके सोचता है और खुदकुशी का प्रयास करता है. खुदकुशी के प्रयास में कई बार इंसान बच भी जाता है. यहां दो चीजें होती हैं. पहला, खुदकुशी का जो तरीका अपनाया गया है, उसके अंदर मारक शक्ति कितनी है, दूसरा, उस व्यक्ति के भीतर मरने की कितनी इच्छा है.


पुरुषों की तुलना में महिलाओं में अवसाद दुगुना होता है, जबकि चिंता दोनों में बराबर ही होती है. लेकिन महिलाएं आत्महत्या के जो तरीके अपनाती हैं, अक्सर उसके अंदर मारक शक्ति कम होती है, इसलिए वो बच जाती हैं. जबकि पुरुष जो तरीके अपनाता है, उसकी मारक शक्ति बहुत अधिक होती है और वह मर जाता है.


आत्महत्या को रोकने के लिए, अवसाद को लेकर जो मिथ्याएं हैं, जैसे अवसाद को काउंसेलिंग से ठीक किया जा सकता है, यह अपने आप ठीक हो जाता है, सोच बदल कर इसे ठीक किया जा सकता है, उसे दूर करने की जरूरत है. जब दिमाग में किसी विशेष रसायन यानी न्यूरोट्रांसमीटर की कमी हो जाती है, तब इंसान की सोचने की शक्ति प्रभावित हो जाती है और उसके भीतर आत्महत्या के विचार आने लगते हैं. ऐसे में व्यक्ति को मनोचिकित्सक से दिखाने की जरूरत होती है, ताकि व्यक्ति का सही उपचार हो सके, उसे जरूरी रसायन मिल सके. जैसे ही व्यक्ति का उपचार पूरा होता है, उसके मस्तिष्क में उपस्थित रसायन की कमी दूर हो जाती है और वह पूर्णतः स्वस्थ हो जाता है.


(बातचीत पर आधारित)

सौजन्य - प्रभात खबर।

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चीन से साइबर मुकाबले की तैयारी : Prabhat Khabar Editorial

आलोक मेहता
आलोक मेहता, वरिष्ठ पत्रकार

alokmehta7@hotmail.com

लद्दाख और अन्य सीमाओं पर फिलहाल सीधे युद्ध का खतरा टल गया लगता है. प्रधानमंत्री ने लेह पहुंच कर न केवल भारतीय सेना का हौसला बढ़ाया, वरन चीन और पाकिस्तान को भी सीधा संदेश दे दिया कि शांति-सद्भावना के साथ जरूरत पड़ने पर भारत मुंह तोड़ जवाब देगा. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कूटनीतिक तथा सामरिक नीति ने पहले पाकिस्तान और अब चीन को बहुत हद तक अलग-थलग कर दिया है.


अमेरिका, फ्रांस, रूस, जापान, ऑस्ट्रेलिया, यूरोपीय समुदाय, आसियान इस समय चीन को विस्तारवादी और विनाशकारी करार देते हुए भारत के साथ खड़े दिख रहे हैं, लेकिन, ध्यान में रखना होगा कि आर्थिक मोर्चे पर असली चुनौती साइबर हमले हैं. हमारे सुरक्षा तंत्र में ताक-झांक व जासूसी के लिए चीन पिछले वर्षों के दौरान भी हैकिंग करता रहा है. चीन की 50-60 कंपनियों के एप्स पर रोक लगाने की घोषणा से निश्चिंत हो जानेवाले लोग भ्रम में हैं. सामान्यतः हम तात्कालिक संकट से निबटने पर अपनी पीठ थपथपा कर जल्दी खुश हो जाते हैं.


चीन 20-30 वर्षों की दीर्घकालिक रणनीति पर काम करता है. उसने परमाणु और जैविक हथियारों के साथ साइबर हमलों के लिए दस वर्षों से तैयारी की हुई है. उसने अपना जाल उस पर निर्भर पाकिस्तान और उत्तर कोरिया के अलावा बांग्लादेश, श्रीलंका, नेपाल, मलेशिया तथा अमेरिका, अफ्रीकी देशों तक फैला लिया है. हमारे कुछ साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ पिछले वर्षों से सरकार का ध्यान इस ओर दिलाने की कोशिश में लगे थे, लेकिन प्रशासनिक तंत्र और कुछ अहंकारी नेता-मंत्री केवल कमेटी रिपोर्ट और फाइलों को घुमाते रहे. यहां तक कि प्रधानमंत्री कार्यालय तक को आधी-अधूरी जानकारियां पहुंचा कर खानापूर्ति की गयी.

साइबर हमले की चीनी-पाकिस्तानी गतिविधियों के प्रमाण सामने आते रहे हैं. वर्ष 2016 में सेना के संवेदनशील ठिकानों और गोपनीय जानकारी एकत्र करने के लिए पाकिस्तानी जासूसी एजेंसी ने चीनी एप का उपयोग करके लगभग पांच सौ लोगों को झांसे में फंसाया और उनमें कुछ सेना से जुड़े युवा अधिकारी भी थे. उन्हें इस एप के माध्यम से हनी ट्रैप किया गया.

संयोग था कि एक गैर-सैनिक अधिकारी भी इस जाल में उलझा, लेकिन कुछ आशंका होने पर उसने इस साइबर मामलों में पुलिस अधिकारी से संपर्क कर लिया. अधिकारी ने पहले निजी तौर पर सारे संपर्कों के बारे में पूछताछ की तथा गहरे षड्यंत्र का मामला समझ में आते ही उसने पूरे सुरक्षा तंत्र को सतर्क किया. जांच में सबूत मिले कि इस एप को पाकिस्तान से संचालित कर जानकारी इकट्ठा करने की तैयारी थी. सेना के अधिकारियों को भी आगे सतर्क रहने को कहा गया. वह प्रयास विफल हुआ. इसके बाद हमारे साइबर विशेषज्ञ ऐसे हमलों से निबटने के लिए लगातार काम कर रहे हैं.

हां, वे यह अवश्य स्वीकारते हैं कि इंटरनेट, मोबाइल से हैकिंग के अलावा चीन कई वर्षों से एप एवं अन्य संचार साधनों से अधिकाधिक जानकारियां जमा करने के लिए सैकड़ों लोगों को शिक्षित-प्रशिक्षित कर रहा है. हमारे इंडस्ट्रियल एरिया की तरह कुछ बस्तियों में दिन-रात यह काम होता है. युवक साल-साल भर थोड़ी-सी छात्रवृत्ति पर यहां जोड़ दिये जाते हैं. मतलब वायरस की तरह हजारों तरह के गेम्स इस ढंग से तैयार हो सकते हैं, जिससे दुनिया के चुनिंदा देशों की अच्छी-बुरी सामाजिक, आर्थिक, सामरिक सूचनाओं का भंडार-कोष बनता रहे.

संयुक्त राष्ट्र के संगठन अंकटाड ने 2018 की रिपोर्ट में बताया था कि आज पूरी दुनिया की डिजिटल संपत्ति कुछ गिनी-चुनी अमेरिकी तथा चीनी कंपनियों के हाथों में सीमित होकर रह गयी है. यूं तो अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा के संबंध में बने संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों ने साइबर समस्याओं और खतरों पर 2004 से काम शुरू कर दिया था, लेकिन भारत सहित कई देशों ने इस मुद्दे पर प्रारंभिक वर्षों में विशेष ध्यान ही नहीं दिया. नतीजा यह है कि साइबर धंधे, षड्यंत्र, आक्रमण के लिए सक्रिय चीन तेजी से घुसपैठ करता गया है. इस खतरे को समझते हुए अंतरराष्ट्रीय संगठन की फरवरी, 2020 में हुई एक बैठक में डिजिटल दुनिया और साइबर चोरी तथा हमलों से बचने के लिए कई देशों ने नये मजबूत नियम-कानून बनाने की सिफारिश की है. भारत ने इसी दृष्टि से अपने संचार माध्यमों और डिजिटल कामकाज के लिए नियम-कानून की प्रक्रिया शुरू कर दी है.

अमेरिका तो चीन से मुकाबला कर रहा है. फिलहाल वह भारत से निकट संबंधों का दावा कर रहा है, लेकिन पिछले अनुभव बताते हैं कि सुरक्षा मामलों में उस पर पूरी तरह निर्भर नहीं रहा जा सकता है. वह भी गिरगिट की तरह अपने स्वार्थों के आधार पर दोस्ती-दूरी या दुश्मनी तक कर दिखाता है. केवल इस्राइल इस मामले में सर्वाधिक सहयोग कर सकता है. आतंकवाद से निबटने में उसने बहुत सावधानी तथा गोपनीयता से सहायता की है और आगे भी कर सकता है. युद्ध के लिए हथियार बेचनेवाले देश हमें अत्याधुनिक हथियार देने की पेशकश कर रहे हैं, लेकिन संचार और साइबर की सर्वाधिक श्रेष्ठ टेक्नोलॉजी के बिना कोई लड़ाई नहीं जीती जा सकती है.

प्रधानमंत्री ने लद्दाख में भारतीय सेना को संबोधित करते हुए चीन का नाम लिये बिना सीधे चेतावनी दे दी कि अब विस्तारवादी नीतियों को विकासवाद की नीतियों पर चलना होगा. विस्तारवाद, उपनिवेशवाद के साथ डिजिटल एकाधिकार तथा हमलों से निबटने के लिए भी उन्होंने संबंधित मंत्रालयों को निर्देश दे दिये हैं. चीन ने अपने आर्थिक साम्राज्य के लिए दक्षिण एशिया, दक्षिण पूर्वी एशिया, अफ्रीकी देशों, भारत, इंडोनेशिया, थाइलैंड, वियतनाम जैसे देशों के इंटरनेट आधारित एप्लीकेशंस को बड़े बाजार की तरह इस्तेमाल किया है.

अपनी कंपनियों और उन देशों की कंपनियों के साथ साझेदारी करके उसने बहुत अंदर तक घुसपैठ कर ली है. यह सीमा पर घुसपैठ से अधिक गंभीर एवं खतरनाक है. इस दृष्टि से भारत को ही नहीं, दुनिया के अधिकांश देशों को अपनी संप्रभुता, साइबर कारोबार की रक्षा करते हुए साइबर सुरक्षा और स्वात्तता के लिए मिलकर नये कानून बनाने होंगे.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

सौजन्य - प्रभात खबर।
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सिनेमा निर्देशन में अन्यतम हैं अदूर : Prabhat Khabar Editorial

अरविंद दास, लेखक एवं पत्रकार

arvindkdas@gmail.com

फ्रेंच सिने समीक्षा में फिल्म निर्देशक के लिए ‘ओतर’ यानी लेखक शब्द का इस्तेमाल किया जाता रहा है. दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित अदूर गोपालकृष्णन विश्व के ऐसे प्रमुख ‘ओतर’ हैं, जो पिछले पचास वर्षों से फिल्म निर्माण-निर्देशन में सक्रिय हैं. इस महीने उन्होंने अस्सीवें वर्ष में प्रवेश किया है और एक बार फिर से उनकी फिल्मों की चर्चा हो रही है. सिनेमा के जानकार सत्यजीत रे के बाद अदूर गोपालकृष्णन को भारत के सर्वश्रेष्ठ फिल्मकार कहते रहे हैं, जिनकी प्रतिष्ठा दुनियाभर में है. खुद रे उनकी फिल्मों को खूब पसंद करते थे.


सिनेमा के प्रति अदूर में आज भी वैसा ही सम्मोहन है, जैसा पचास वर्ष पहले था. अब भी उनके अंदर प्रयोग करने की ललक है. पिछले वर्ष मैंने अदूर गोपालकृष्णन की एक नयी फिल्म ‘सुखयांतम’ देखी थी. यह फिल्म तीन छोटी कहानियों के इर्द-गिर्द बुनी गयी है, जिसके केंद्र में ‘आत्महत्या’ है, पर हर कहानी का अंत सुखद है. हास्य का इस्तेमाल कर निर्देशक ने समकालीन सामाजिक-पारिवारिक संबंधों को सहज ढंग से चित्रित किया है. यह एक मनोरंजक फिल्म है, जो बिना किसी ताम-झाम के प्रेम, संवेदना, जीवन और मौत के सवालों से जूझती है.


खास बात यह है कि ‘सुखयांतम’ डिजिटल प्लेटफॉर्म के लिए बनायी गयी है. इसकी अवधि महज तीस मिनट है. दिल्ली के छोटे सिनेमा-प्रेमी समूह के सामने फिल्म के प्रदर्शन के बाद अदूर गोपालकृष्णन ने कहा था कि कथ्य और शिल्प को लेकर उन्होंने उसी शिद्दत से काम किया है, जितना वे फीचर फिल्म को लेकर करते हैं. अपने पचास वर्ष के करियर में पहली बार अदूर ने डिजिटल प्लेटफॉर्म के लिए निर्देशन किया है.

गौतमन भास्करन की लिखी जीवनी ‘ए लाइफ इन सिनेमा’ में अदूर एक जगह कहते है, ‘सिनेमा असल में फिल्ममेकर का अपना अनुभव होता है. उसकी जीवन के प्रति दृष्टि उसमें अभिव्यक्त होती है.’ अदूर की फिल्मों को देखने के बाद यह स्पष्ट हो जाता है कि फिल्म को निर्देशक का माध्यम क्यों कहा गया है. फिल्म के हर पहलू पर उनकी छाप स्पष्ट दिखती है. हालांकि, सिनेमा अदूर का पहला प्रेम नहीं था. शुरुआत में उनका रुझान थिएटर की तरफ ज्यादा था.

करीब पंद्रह वर्ष पहले दिल्ली में एक फिल्म समारोह के दौरान हुई मुलाकात में उन्होंने कहा था, ‘काॅलेज के दिनों में मेरी अभिरुचि नाटकों में थी. मैंने फिल्म के बारे में कभी नहीं सोचा था. जब मैंने 1962 में पुणे फिल्म संस्थान में प्रवेश लिया, तो वहां देश-विदेश की सर्वश्रेष्ठ फिल्मों को देख पाया. मुझे लगा कि यही मेरा क्षेत्र है, जिसमें मैं खुद को बेहतर ढंग से अभिव्यक्त कर सकता हूं.’

वर्ष 1964 में फिल्म निर्देशक ऋत्विक घटक एफटीआइआइ, पुणे में बतौर शिक्षक नियुक्त हुए थे. वे शीघ्र ही छात्रों के चेहते बन गये. व्यावसायिक सिनेमा के बरक्स 70 और 80 के दशक में भारतीय सिनेमा में समांतर फिल्मों की जो धारा विकसित हुई, अदूर मलयालम फिल्मों में इसके प्रणेता रहे. उनकी पहली फिल्म ‘स्वयंवरम’ (1972) को चार राष्ट्रीय पुरस्कार हासिल हुए. अदूर घटक और सत्यजीत रे दोनों के प्रशंसक रहे हैं, पर उनकी फिल्में घटक के मेलोड्रामा और एपिक शैली से प्रभावित नहीं दिखती हैं.

यथार्थ चित्रण पर जोर व मानवीय दृष्टि के कारण समीक्षक उनकी फिल्मों को रे के नजदीक पाते हैं. हालांकि, उनकी फिल्म बनाने की शैली काफी अलहदा है. उनकी फिल्में जीवन के छोटे-बड़े, अच्छे-बुरे अनुभवों को फंतासी के माध्यम से संपूर्णता में व्यक्त करती रही हैं. केरल का समाज, संस्कृति और देशकाल इसमें प्रमुखता से उभर कर आया है, पर भाव व्यंजना में वैश्विक है. यह विशेषता ‘एलिप्पथाएम’, ‘अनंतरम’, ‘मुखामुखम’, ‘कथापुरुषम’ आदि फिल्मों में स्पष्ट दिखायी देती है. ‘एलिप्पथाएम’ उनकी सबसे चर्चित फिल्म है.

सामंतवादी व्यवस्था के मकड़जाल में उलझे जीवन को ‘चूहेदानी में कैद चूहे’ के रूपक के माध्यम से ‘एलिप्पथाएम’ (1981) में व्यक्त किया गया है. फिल्म में संवाद बेहद कम है और भाषा आड़े नहीं आती. बिंबों, प्रकाश और ध्वनि के माध्यम से निर्देशक ने एक ऐसा सिने संसार रचा है, जो चालीस वर्ष बाद भी दर्शकों को एक नये अनुभव से भर देता है और नयी व्याख्या को उकसाता है. एक कुशल निर्देशक के हाथ में आकर सिनेमा कैसे मनोरंजन से आगे बढ़ कर उत्कृष्ट कला का रूप धारण कर लेती है, ‘एलिप्पथाएम’ इसका अन्यतम उदाहरण है. प्रसंगवश, सामंतवाद और उसके ढहते अवशेषों को रे ने भी ‘जलसाघर’ (1958) में संवेदनशीलता के साथ चित्रित किया है, पर दोनों फिल्मों के विषय के निरूपण में कोई समानता नहीं दिखती.

कहानी कहने का ढंग अदूर का नितांत मौलिक है, पर उतना सहज नहीं है, जैसा कि पहली नजर में दिखता है. कहानी के निरूपण की शैली के दृष्टिकोण से ‘अनंतरम’ सिने प्रेमियों के बीच विख्यात रही है. उनकी फिल्मों में स्त्री स्वतंत्रता का सवाल सहज रूप से जुड़ा हुआ आता है. साथ ही, राजनीतिक रूप से सचेत एक फिल्मकार के रूप में वे हमारे सामने आते हैं. इनमें आत्मकथात्मक स्वर भी सुनायी पड़ते हैं. हिंदी सिनेमा-प्रेमियों के लिए अभी भी अदूर की फिल्में पहुंच से दूर है. बड़े दर्शक वर्ग तक पहुंच के लिए अदूर की फिल्मों को ऑनलाइन सबटाइटल के साथ रिलीज की कोशिश होनी चाहिए.

सौजन्य - प्रभात खबर।
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राजनीतिक विमर्श की भाषा सुधरे

 अपर्णा
पिछले एक-डेढ़ दशक से राजनीतिक विमर्श की भाषा में जो बदलाव आया है, वह एक चिंतनीय प्रश्न है. चाहे वह राजनीतिक प्रवक्ताओं का इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में बहस हो या चुनावी सभाओं में नेताओं का भाषण, उसमें बहस की संस्कृति में आया बदलाव स्पष्ट दिखता है.भाषा की संस्कृति में जुमलेबाजी ने अपना स्थान बना लिया है, जो अराजकता, बर्बर और असभ्य अभिव्यक्ति के रूप में दिखायी पड़ता है. भाषा की संस्कृति में गिरावट अचानक नहीं हुई है. यह दो बातों पर निर्भर करती है. एक, देश की राजनीतिक संस्कृति, जिसका तात्पर्य है राजनीति में कैसे और किस प्रकार के लोगों का वर्चस्व है. सत्तर के दशक तक की राजनीति पर स्वतंत्रता आंदोलन की छाया थी.

उस आंदोलन के लोगों से प्रभावित अगली पीढ़ी ने राजनीतिक विमर्श को दायरे से बाहर नहीं जाने दिया. दूसरा आयाम राजनीति के इतर की बौद्धिक गतिविधियां हैं. इसमें साहित्य, कला, अकादमिक गतिविधियां इत्यादि शामिल हैं. राजनीति के बगल में होते हुए भी ये राजनीति की गोद में नहीं बैठते हैं.

स्वतंत्रता के पूर्वार्ध काल में साहित्यकारों, रंगकर्मियों और समाजशास्त्रियों पर वामदलों की छाप तो थी, पर उन्होंने अपनी स्वतंत्रता बचाये रखी. स्वतंत्र भारत के उत्तरार्ध में स्थिति बदल गयी और ये साहित्यकार, पत्रकार, रंगकर्मी खांचों में इस प्रकार बंट गये कि राजनीति को नियंत्रण करने की जगह वे स्वयं राजनीति से नियंत्रित होने लगे. 

सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, हरिवंश राय बच्चन, हजारी प्रसाद द्विवेदी, रामधारी सिंह दिनकर, सुमित्रानंदन पंत, सुब्रमण्यम भारती, रामनाथ गोयनका, श्यामलाल जैसे साहित्यकार और पत्रकार सामाजिक राजनीतिक व्यवस्था के संदर्भ में सोचते थे, न कि सत्ता का उतार-चढ़ाव उनकी चिंता का विषय था. ऐसे लोगों ने ही राजनीति को परिष्कृत करने और उस पर लगाम लगाने का काम किया. उत्तरार्ध काल में इसका अभाव है. यह गिरावट एकांगी नहीं साझा है.

आज विमर्श के गिरने का कारण राजनीति में कई तरह की अनियमितता है. आजादी के बाद कांग्रेस, सोशलिस्ट पार्टी, जनसंघ और कम्युनिस्ट यह चार धाराएं थीं. चारों की एक अघोषित आम सहमति थी- क्षेत्रवाद, भाषावाद, जातिवाद और सांप्रदायिकता को परास्त करना. लेकिन कालांतर में नयी पीढ़ियों का सामाजिक सांस्कृतिक पृष्ठभूमि से कमजोर लगाव के कारण वे इन आदर्शों को कुचलते गये. इस काल में एक और दुर्घटना हुई. राजनीति का वृहत्तर रूप चुनावी राजनीति से भिन्न होता है.

वह इस तरह की गिरावट पर पूर्वार्ध में अंकुश लगाने का काम करता था. जेपी, विनोबा सरीखे व्यक्तित्व और उनके द्वारा संचालित सीमित स्तर पर चलाये जानेवाले सामाजिक आंदोलन इसके अनुपम उदाहरण हैं. उत्तरार्ध काल में इसकी भी अनुपस्थिति ने नेताओं को स्वच्छंद बना दिया है.

यही कारण है कि आज टीवी डिबेट पर राष्ट्रीय-क्षेत्रीय दलों के प्रवक्ताओं द्वारा न सिर्फ असभ्य भाषा का प्रयोग होता है, बल्कि बहस भी अमर्यादित होती है. ये वही लोग हैं, जिन्हें दलों के आलाकमान चयन करते हैं. जाहिर है कि वे उनके इस बर्ताव को उचित और मनोनुकूल मानते हैं. भाषाई गिरावट को देखने और समझने का यह सबसे सहज स्वरूप है.

जब राजनीतिक संस्कृति या वातावरण में गिरावट आती है, तो वह देश की व्यवस्था को प्रभावित करने लगती है. तब बुद्धिजीवियों की निश्चित रूप से राजनीतिक भूमिका होती है. यह भूमिका निभाते समय साहित्यकार और कलाकार राजनीतिक कार्यकर्ता नहीं बनते हैं. इसका एक बड़ा उदाहरण 70 के दशक का है.

जब जेपी आंदोलन शुरू हुआ, तो उसके केंद्र में राजनीतिक पार्टियां आ गयीं. उसके समर्थन में धर्मवीर भारती ने धर्मयुग में जो कविता लिखी थी, जिसमें एक लाठी लेकर लड़खड़ाते आदमी से कांपती सत्ता के भय को दर्शाया था.

वह एक साहित्यकार का राजनीति में बेहतरीन हस्तक्षेप था. मर्यादित संकेतों द्वारा लोकतांत्रिक ताकतों के मनोबल को, आत्मविश्वास और उसकी शक्ति को एक साहित्यकार ऐसे ही बढ़ाता है. लेकिन बुद्धिजीवियों ने राजनीतिक कार्यकर्ता की भूमिका में जनादेश के पक्ष-विपक्ष में काम करना शुरू किया, तो उनकी भी भाषा बिगड़ गयी.

सवाल है कि इस समस्या का क्या समाधान है? जिन लोगों ने अपनी स्वायत्तता बचाये रखी है, उनकी भूमिका विमर्श और राजनीति की संस्कृति को बदलने में कार्य कर सकती है. ऐसा करने में ऐसे लोगों को सब तरफ से अलग-थलग पड़ने का जोखिम होता है.

भारत में राजनीति न्यूनतम स्तर पर चली जाये और विमर्श की भाषा जितनी भी निम्न हो जाये, सामान्य लोग उससे अप्रभावित रहते हैं, क्योंकि राजनीति पूर्ण संख्यात्मक हो गयी है. वह सामान्य लोगों की परवाह नहीं करती है. सामान्य लोगों के बीच में रहनेवाले विचारकों, चिंतक, कवि, लेखक, रंगकर्मी हैं, जिनका जगना ही भारत की राजनीति और विमर्श की संस्कृति के लिए पुनर्जागरण का प्रारंभ होगा.

चुनावी सभाओं से लेकर स्टूडियो तक जुबानी विमर्श में आयी गिरावट और कटुता में वृद्धि सामान्य लोगों को सोचने के लिए बाध्य करती है. इस देश में विमर्श की एक संस्कृति का लंबा इतिहास रहा है. नयी और पुरानी पीढ़ी के बीच का अंतर तभी भर पायेगा, जब इतिहास से सीख लेकर अहम पहलें होंगी, जो सामाजिक सत्ता को मजबूत करने का काम करेंगी.
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