Help Sampadkiya Team in maintaining this website

इस वेबसाइट को जारी रखने में यथायोग्य मदद करें -

-Rajeev Kumar (Editor-in-chief)

Showing posts with label Prabhat Khabar. Show all posts
Showing posts with label Prabhat Khabar. Show all posts

Friday, February 26, 2021

सुधरती अर्थव्यवस्था (प्रभात खबर)

विभिन्न आर्थिक सूचकांकों में लगातार बेहतरी से इंगित होता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था मंदी के भंवर से बाहर निकल चुकी है. महामारी रोकने के लिए लगे लॉकडाउन की वजह से चालू वित्त वर्ष की पहली दो तिमाहियों- अप्रैल से जून तथा जुलाई से सितंबर- में आर्थिक वृद्धि ॠणात्मक रही थी.



यदि लगातार दो तिमाही में वृद्धि दर नकारात्मक रहती है, तो तकनीकी आधार पर इसे मंदी का दौर कहा जाता है. लॉकडाउन और अन्य पाबंदियों के धीरे-धीरे हटने के साथ औद्योगिक और कारोबारी गतिविधियों में तेजी की वजह से अक्तूबर से दिसंबर के बीच अर्थव्यवस्था में धनात्मक बढ़ोतरी होने की पूरी उम्मीद है. आकलनों की मानें, तो 2020 के अंतिम तीन महीनों में सकल घरेलू उत्पादन की वृद्धि दर में 2019 की इस अवधि की तुलना में 0.5 प्रतिशत की बढ़त हो सकती है. शुक्रवार को तीसरी तिमाही के आंकड़े आनेवाले हैं. अर्थव्यवस्था में सुधार की इस उम्मीद का एक अहम आधार यह है कि जनवरी में लगभग सभी क्षेत्रों में बढ़ोतरी हुई है.



सेवा क्षेत्र में लगातार चौथे महीने विस्तार हुआ है. बिक्री और निर्यात में वृद्धि से निर्माण व उत्पादन में तेजी आयी है. आर्थिक गतिविधियों में बढ़त की वजह से रोजगार बढ़ने के संकेत भी स्पष्ट हैं. रोजगार और आमदनी का सीधा संबंध मांग बढ़ने से है. उल्लेखनीय है कि बीते साल अर्थव्यवस्था को अधिक मुद्रास्फीति से भी जूझना पड़ा है. मांग, उत्पादन और आमदनी के गतिशील होने से मुद्रास्फीति के भी स्थिर होने की आशा है. यात्री वाहनों की बिक्री मांग का महत्वपूर्ण सूचक होती है. इस साल जनवरी में पिछले साल जनवरी की तुलना में इसमें 11.4 प्रतिशत की बढ़त हुई है.


इस वर्ष कृषि उपज में रिकॉर्ड बढ़ोतरी से खाद्यान्न मुद्रास्फीति में कमी हो रही है. महामारी के दौरान अर्थव्यवस्था को सहारा देने तथा लोगों को राहत पहुंचाने के लिए सरकार ने लगातार पैकेज दिया था. आगामी बजट प्रस्ताव में भी आर्थिकी के विस्तार के प्रावधानों से उद्योग जगत और बाजार में भरोसे का संचार हुआ है. पिछले साल कृषि उत्पादों के निर्यात ने जहां अर्थव्यवस्था को आधार दिया था, वहीं इस वर्ष जनवरी में इंजीनियरिंग वस्तुओं, कीमती पत्थर, लौह अयस्क, आभूषण और कपड़ा के निर्यात में तेजी आयी है.


रिजर्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास ने भी विश्वास व्यक्त किया है कि अर्थव्यवस्था विकास के अहम मोड़ पर खड़ी है. फरवरी में हुए रिजर्व बैंक के सर्वेक्षण में उपभोक्ताओं ने नवंबर के सर्वेक्षण की तुलना में वर्तमान स्थिति को बेहतर माना है तथा उन्हें आशा है कि आगामी वित्त वर्ष भी अच्छा होगा. उपभोक्ताओं का भरोसा आर्थिक वृद्धि के लिए बेहद अहम है क्योंकि इसी आधार पर वे खरीदारी और निवेश करते हैं. अर्थव्यवस्था के भविष्य में भरोसा होने की वजह से ही शेयर बाजार में भी तेजी है. हालांकि वृद्धि दर के पहले की तरह गतिशील होने में समय लग सकता है, पर मौजूदा रुझान आगे लिए आश्वस्त करते हैं.

सौजन्य - प्रभात खबर।

Share:

मर्ज की दवा नहीं निजीकरण (प्रभात खबर)

By सतीश सिंह 

 

भारत के बैंकिंग इतिहास में ऐसा पहली बार होगा जब सरकार चार सरकारी बैंकों को बेचेगी या उनका निजीकरण करेगी. मार्च 2017 में, देश में 27 सरकारी बैंक थे, जिनकी संख्या अप्रैल 2020 में घटकर 12 रह गयी. अब चार सरकारी बैंकों- बैंक ऑफ इंडिया, बैंक ऑफ महाराष्ट्र, सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया और इंडियन ओवरसीज बैंक में सरकार अपनी हिस्सेदारी बेचना चाहती है. इनमें बैंक ऑफ इंडिया बड़ा बैंक है, जबकि अन्य तीन छोटे. बैंक ऑफ इंडिया में 50,000, सेंट्रल बैंक में 33,000, इंडियन ओवरसीज बैंक में 26,000 और बैंक ऑफ महाराष्ट्र में 13,000 कर्मचारी कार्यरत हैं. इनकी कुल 15,732 शाखाएं हैं.


सरकारी बैंकों के निजीकरण के मूल में कोरोना काल में सरकारी राजस्व में भारी कमी आना है. सरकार विनिवेश के जरिये इस कमी को पूरा करना चाहती है. हालांकि, वित्त वर्ष 2021 में सरकार के लिए विनिवेश के लक्ष्य को हासिल करना लगभग नामुमकिन है. इसलिए, वित्त वर्ष 2021 में विनिवेश के लक्ष्य को कम करके 32,000 करोड़ रुपये किया गया है. वित्त वर्ष 2022 के लिए सरकार ने विनिवेश से राजस्व हासिल करने का लक्ष्य 1.75 लाख करोड़ रखा है, जिसमें से एक लाख करोड़ सरकारी बैंकों और वित्तीय संस्थानों में सरकार की हिस्सेदारी बेचकर जुटाने का प्रस्ताव है.


इंडियन ओवरसीज बैंक में सरकार की हिस्सेदारी 95.8 प्रतिशत, बैंक ऑफ महाराष्ट्र में 92.5 प्रतिशत, सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया में 92.4 प्रतिशत और बैंक ऑफ इंडिया में 89.1 प्रतिशत है. बैंक ऑफ महाराष्ट्र और सेंट्रल बैंक में अगर सरकार अपनी हिस्सेदारी को घटा कर 51 प्रतिशत करती है, तो उसे 6,400 करोड़ रुपये मिलेंगे. इसी तरह, यदि सरकार बैंक ऑफ इंडिया और इंडियन ओवरसीज बैंक में अपनी पूरी हिस्सेदारी बेच देती है, तो उसे लगभग 28,600 करोड़ मिलेंगे.


इंडियन ओवरसीज बैंक के पास सबसे ज्यादा इक्विटी कैपिटल है, जबकि बैंक ऑफ इंडिया के शेयरों का बाजार मूल्य दूसरे सरकारी बैंकों से ज्यादा है. यदि सरकार दोनों बैंकों के प्रबंधन को अपने हाथों में रखते हुए अपनी हिस्सेदारी को मौजूदा कीमत पर बेचकर 51 प्रतिशत पर ले आती है, तो उसे लगभग 12,800 करोड़ मिलेंगे. माना जा रहा है कि सरकार, सरकारी बैंकों में अपनी हिस्सेदारी को 51 प्रतिशत तक लायेगी और उसके बाद उसे 50 प्रतिशत से नीचे लायेगी.


बैंकों को बेचने से सरकार को उसकी पूंजी वापस मिल जायेगी, इन बैंकों में और अधिक पूंजी डालने की जरूरत नहीं होगी, जिससे सरकार को अपनी वित्तीय स्थिति को मजबूत करने में मदद मिलेगी. इसके अलावा, वित्त मंत्रालय, केंद्रीय सतर्कता आयोग आदि जैसे सरकारी विभागों को इन संस्थानों की निगरानी और पर्यवेक्षण की आवश्यकता नहीं होगी, जिससे मानव संसाधन और धन दोनों की बचत होगी. कुछ लोग कयास लगा रहे हैं कि नये अधिग्रहणकर्ता बैंक को अधिक पूंजी वृद्धि के साथ कुशलता से चला पायेंगे.


बैंकों का बेहतर मूल्य सरकार को मिलेगा. निजी शेयरधारकों को लाभ होगा. बाजार में कुछ लोगों की यह भी राय है कि भले ही सरकार बैंकों को बेचना चाहती है, लेकिन इन्हें बेचना उसके लिए आसान नहीं होगा. बैंक ऑफ महाराष्ट्र की सकल गैर-निष्पादित परिसंपत्तियां (एनपीए) 31 दिसंबर 2020 को 8,072.43 करोड़ रुपये रहीं, जो 30 सितंबर 2020 को 9,105.44 करोड़ थीं. वहीं, 31 दिसंबर 2019 को यह 15,745.54 करोड़ थी. बैंक ऑफ इंडिया का दिसंबर 2020 में सकल एनपीए 5499.70 करोड़ रहा, जो सितंबर 2020 में 5623.17 करोड़ था.


इंडियन ओवरसीज बैंक का दिसंबर 2020 में सकल एनपीए घट कर 16,753.48 करोड़ हो गया, जो सितंबर 2020 में 17,659.63 करोड़ था. इसी तरह, सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया का दिसंबर 2020 में सकल एनपीए 29,486.07 करोड़ रहा, जो सितंबर 2020 में 30,785.43 करोड़ था. इन बैंकों के तिमाही प्रदर्शन से साफ हो जाता है कि इन चारों बैंकों का निजीकरण उनके खराब प्रदर्शन के कारण नहीं किया जा रहा है. चार सरकारी बैंकों के निजीकरण से वहां कार्यरत कर्मचारियों की नौकरी जाने की संभावना बढ़ जायेगी.


इसलिए, इन बैंकों के निजीकरण का नकारात्मक प्रभाव सरकार की कल्याणकारी छवि पर पड़ सकता है. इन बैंकों का सेवा शुल्क भी बढ़ जायेगा. ग्रामीण इलाकों में सेवा देने से भी ये बैंक परहेज करेंगे. सरकारी योजनाओं को लागू करने से भी इन्हें गुरेज होगा. विभिन्न गैर-पारिश्रमिक सेवाओं जैसे पेंशन वितरण, अटल पेंशन योजना, सुकन्या समृद्धि आदि से जुड़े कार्य भी ये बैंक नहीं करेंगे. राजस्व बढ़ाने के लिए बैंक म्यूचुअल फंड, बीमा आदि जैसी अधिक गैर-बैंकिंग सेवाएं प्रदान कर सकते हैं. चूंकि, मौजूदा समय में सरकारी योजनाओं को मूर्त रूप देने में सरकारी बैंकों का अहम योगदान है, इसलिए, चार बैंकों के निजीकरण से अन्य बचे हुए सरकारी बैंकों पर सरकारी योजनाओं को लागू करने का दबाव बढ़ जायेगा.


अभी भी देश का एक तबका निजीकरण को हर मर्ज की दवा समझता है, लेकिन यह पूरा सच नहीं है. कई निजी बैंक डूब चुके हैं. ताजा मामला यस बैंक और पीएमसी का है. कोरोना काल में निजी और सरकारी बैंकों ने कैसा प्रदर्शन किया है, यह किसी से छुपा नहीं है? सरकारी बैंकों के विनिवेश से कुछ हजार करोड़ जरूर मिल सकते हैं, लेकिन उससे सरकार को कितना फायदा होगा इसका भी आकलन करने की जरूरत है. फायदा नकदी में हो, यह जरूरी नहीं है. सवाल रोजगार जाने का और बचे हुए सरकारी बैंकों पर काम का दबाव बढ़ने का भी है.

सौजन्य - प्रभात खबर।

Share:

ओपिनियनसोशल मीडिया पर अंकुश जरूरी (प्रभात खबर)

डॉ अश्विनी महाजन, राष्ट्रीय सह संयोजक, स्वदेशी जागरण मंच


भारत में किसानों के आंदोलन के मद्देनजर माइक्रोब्लॉगिंग प्लेटफार्म ट्विटर की भूमिका विवादों का केंद्र बन गयी है, खासकर किसान नरसंहार जैसे हैशटैग ट्रेंडिंग के कारण ट्विटर पर भारत विरोधी मुहिम छेड़ना, हिंसा को बढ़ावा देना और भारत के खिलाफ नफरत को बढ़ावा देना आदि ट्विटर के अधिकारियों की ईमानदारी पर प्रश्नचिह्न लगाता है, जबकि सरकार इस तरह के घटनाक्रम को भारत के संविधान के खिलाफ होने का हवाला देते हुए ट्विटर को लेकर अपनी नाखुशी जाहिर कर चुकी है और दृढ़ता से कहा है कि इन ट्विटर हैंडलों के निलंबन से कम कुछ भी स्वीकार्य नहीं है, लेकिन ट्विटर का रवैया पूरी तरह से अनुपालन का नहीं लगता है. हाल की घटनाओं ने भारत की एकता और अखंडता के संबंध में सोशल मीडिया के दिग्गजों की भूमिका और रवैये पर गंभीर सवाल उठाये हैं. मुद्दा यह है कि क्या इन प्लेटफार्मों को मनमानी करने की छूट दी जा सकती है? ट्विटर मुद्दा अपनी तरह का एक मामला है. हालांकि, सोशल मीडिया कंपनियों के साथ अनैतिक और गैरकानूनी काम करने वाले मुद्दों का एक इतिहास जुड़ा हुआ है. 

राजनेता अपने लाभ के लिए सोशल मीडिया प्लेटफार्मों का उपयोग करते रहे हैं. हालांकि, पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपने कार्यकाल के अंतिम दौर में ट्विटर से टकराव में थे, लेकिन राष्ट्रपति के रूप में उनके कार्यकाल के दौरान और इससे पहले भी ट्विटर उनके लिए सबसे प्रिय मंच था. उन्हें अपने राजनीतिक एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए अन्य सोशल मीडिया प्लेटफार्मों का उपयोग करने के लिए भी जाना जाता था.


कुछ समय पहले रहस्योद्घाटन हुआ था कि जब ट्रंप पहली बार राष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ रहे थे, तब कैंब्रिज एनालिटिका नाम की कंपनी ने 8.7 मिलियन अमेरिकी लोगों के फेसबुक डेटा के आधार पर ट्रंप के चुनाव अभियान में काम किया और इस कंपनी ने ट्रंप की जीत में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी. कैंब्रिज एनालिटिका पहले भी सभी गलत कारणों से खबरों में रही है.


कुछ राजनीतिक दलों के लाभ के लिए भारत में सामाजिक विघटन को बढ़ावा देने हेतु भारतीयों के फेसबुक डेटा का उपयोग करते हुए इसे रंगे हाथों पकड़ा गया था. हालांकि, मार्क जुकरबर्ग ने फेसबुक उपयोगकर्ताओं की निजता के उल्लंघन के लिए माफी भी मांगी और फेसबुक की उस कारण से बहुत बदनामी भी हुई. इसने उसके बाजार मूल्यांकन को भी प्रभावित किया. हम अक्सर एक या दूसरे प्लेटफार्म द्वारा डेटा के उल्लंघन, रिसाव या अनैतिक बिक्री की घटना सुनते हैं. कैंब्रिज एनालिटिका की वेबसाइट ने यह भी दावा किया कि उसने 2010 के बिहार चुनाव में विजयी पार्टी के लिए काम किया था.


हालांकि, सोशल मीडिया कंपनियों की भूमिका को हमेशा संदेह की दृष्टि से देखा जाता रहा है. हाल ही में अमेरिका में संपन्न हुए राष्ट्रपति चुनाव ने ट्विटर को एक बड़े विवाद में डाल दिया, जब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को ट्विटर से लगातार झटके मिले. डोनाल्ड ट्रंप के ट्वीट पर ट्विटर की टिप्पणियों ने अमेरिकी मतदाताओं के मन में संदेह पैदा करने में प्रमुख भूमिका निभायी. संयुक्त राज्य अमेरिका में हिंसक प्रदर्शनों के बाद राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के ट्विटर अकाउंट को निलंबित कर दिया गया था, जिसने ट्विटर कंपनी को गंभीर विवादों से जोड़ दिया.


स्पष्ट है कि इन सोशल मीडिया कंपनियों के पास एक विशाल ग्राहक आधार है, जिससे वे ग्राहकों की निजी जानकारियों पर अधिक नियंत्रण रखते हैं. इसके अलावा उनके पास विभिन्न लॉगरिदम तकनीक का उपयोग करते हुए बड़ी मात्र में डेटा खंगालने की क्षमता है. वे सामाजिक और राजनीतिक आख्यानों को प्रभावित करके समाज और राजनीति को अलग–अलग तरीकों से प्रभावित कर सकते हैं.


यदि इन प्लेटफार्मों को मनमानी करने की अनुमति दी जाती है, तो हमारा सामाजिक ताना–बाना और हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था गंभीर रूप से संकट में आ सकती है. ट्रंप के ट्विटर अकाउंट को निलंबित करने का कोई तर्क हो भी सकता है, लेकिन इन कंपनियों के दोहरे मापदंडों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.


गौरतलब है कि जब मलेशिया के प्रधानमंत्री मोहातिर मोहम्मद ने ट्वीट कर एक विशेष धार्मिक समूह द्वारा धर्म आधारित हिंसा को उचित ठहराया था, तो ट्विटर ने उसे नजरंदाज कर दिया. 33.6 करोड़ खातों के साथ फेसबुक 40 करोड़ ग्राहकों के आधार वाले व्हॉट्सएप का सहयोगी है. साथ ही सात करोड़ भारतीय और 33 करोड़ वैश्विक उपयोगकर्ताओं के साथ ट्विटर एक बड़ा प्लेटफॉर्म है. ये सभी सोशल मीडिया कंपनियां जैसे चाहें, जिस तरह से चाहें, सामाजिक और राजनीतिक विचारों को बदलने की स्थिति में हैं. यह विशाल उदीयमान शक्ति उन्हें अजेय बनाती है.


चीनी एप्स पर प्रतिबंध लगाने से पहले भी कई भारतीय एप उभरे थे, लेकिन चीनी एप्स पर प्रतिबंध के बाद उनका व्यवसाय कई गुना बढ़ गया है. यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि चीन फेसबुक, व्हॉट्सएप या ट्विटर को अपने देश में अनुमति नहीं देता है. उनके पास अपने वैकल्पिक सोशल मीडिया मंच हैं. वर्तमान परिस्थितियों में, इन प्लेटफार्मों की लोकप्रियता और इनसे प्राप्त होने वाली उपभोक्ता संतुष्टि को देखते हुए इन प्लेटफार्मों पर तत्काल प्रतिबंध लगाना सही समाधान नहीं होगा, लेकिन उन्हें देश के कानून का पालन करने के लिए बाध्य किया जा सकता है.


हालांकि, यदि हम भारतीय प्लेटफार्मों को विकसित करने का प्रयास करें, तो सोशल मीडिया कंपनियों का मौजूदा विवाद हमारे लिए वरदान साबित हो सकता है. यह न केवल सोशल मीडिया में अंतरराष्ट्रीय दिग्गजों के एकाधिकार पर अंकुश लगायेगा, बल्कि अरबों डॉलर की विदेशी मुद्रा को बचाने में भी मदद करेगा. सोशल मीडिया प्लेटफार्म्स के बीच प्रतिस्पर्धा उन्हें और अधिक अनुशासित करेगी और हमारे लोकतंत्र के लिए खतरे को भी कम करेगी. इससे राष्ट्र की एकता और अखंडता पर संभावित खतरे को भी सफलतापूर्वक रोका जा सकता है.

सौजन्य - प्रभात खबर।

Share:

Saturday, January 23, 2021

Netaji Subhash Chandra Bose 125th Jayanti : हर भारतीय के हृदय में बसने वाले एक कालजयी नेता, पढ़ें सुभाषचंद्र बोस की जयंती पर गृहमंत्री अमित शाह का लेख (प्रभात खबर)

By अमित शाह, केंद्रीय गृह मंत्री 

 

Netaji Subhash Chandra Bose 125th Jayanti : आज सुभाषचंद्र बोस की 125वीं जन्म जयंती के अवसर पर मैं उस वीर को प्रणाम करता हूं, जिन्होंने देशहित में अपने जीवन का सर्वस्व अर्पित करके, रक्त के कतरे-कतरे से इस देश को सिंचित किया है. मैं प्रणाम करता हूं, बंगजननी के उस गौरवशाली संतान को, जिसने समस्त भारत को अपना नेतृत्व दिया है, देश को स्वाधीन कराने के लिए उन्होंने पूरी दुनिया का भ्रमण किया. जिनका जीवन कोलकाता में शुरू हुआ व कालांतर में वह भारतीय राजनीति के शिखर पर पहुंचे व उसके बाद बर्लिन से शुरू करके सिंगापुर तक भारत माता के संतानों को लेकर उन्होंने देशहित में वृहद अभियान चलाया. उनका जीवन दर्शन भारत के युवा समाज के लिए आदर्श है, उनके जीवन युवा समाज के तन-मन को राष्ट्रवादी भावना से भर देता है.


उस समय भारत मे सर्वाधिक जरूरत थी एक सटीक योजना लेकर देश को आगे ले जाने की, इस विचार के आधुनिक भारत के सर्वप्रथम प्रस्तावक थे सुभाषचंद्र. 1938 के फरवरी महीने में हरिपुर कांग्रेस में उन्होंने राष्ट्रीय योजना का मुद्दा उठाया था. दिसंबर 1936 में, पहली राष्ट्रीय योजना समिति का गठन किया गया था. उसी वर्ष सुभाष ने वैज्ञानिक मेघनाद साहा को एक साक्षात्कार में कहा : मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि यदि हमारी राष्ट्रीय सरकार बनती है, तो हमारा पहला काम राष्ट्रीय योजना आयोग का गठन करना होगा. स्वातंत्र्योत्तर योजना आयोग उनकी विरासत है.


यह विचार सुभाषचंद्र के दिमाग में अपने छात्र जीवन में आया. 1921 में उन्होंने देशबंधु चित्तरंजन दास को एक पत्र लिखा था, जिसमें उन्होंने कहा था कि वह सरकारी नौकरी नहीं चाहते हैं, अपितु राजनीति में शामिल होकर अपना योगदान करना चाहते हैं. इसके साथ ही उन्होंने संक्षिप्त, लेकिन स्पष्ट रूप से लिखा कि वह कांग्रेस के कार्यों में योजनाबद्ध कदम देखना चाहते हैं. आज के युवाओं के लिए राष्ट्र निर्माण के कार्य में सुभाषचंद्र के ये विचार आज भी प्रासंगिक हैं.


आजकल बहिरागत बोलने की बात शुरू हुई है. बहिरागत का मतलब अब तक लोग किसी दूर देश के व्यक्ति अथवा किसी घुसपैठिया को समझते थे. लेकिन देश के भिन्न अंश के लोगों को बहिरागत अथवा बाहरी बोलने की संकीर्ण क्षेत्रवाद सुभाषचंद्र के राज्य में शुरू करना दुर्भाग्यपूर्ण है. जिस राज्य ने भारत के लोगों में राष्ट्रवाद के विचार को पुनर्जीवित किया है, उसे 'वंदे मातरम' और जन-गण-मन राष्ट्र गान दिया, उस राज्य में ऐसी सोच बहुत दुखद व खतरनाक है. इस राज्य के लोगों के मुकुट में गहना, सुभाषचंद्र को तत्कालीन राष्ट्र की सबसे बड़ी संगठन इंडियन नेशनल कांग्रेस द्वारा अपना अध्यक्ष चुना गया था. लेकिन सुभाषचंद्र उनसे एक कदम आगे थे और अंतरराष्ट्रीय राजनीति से परिचित थे.


 

दुनिया के विभिन्न देशों के मुक्ति संघर्षों के इतिहास का अध्ययन करते हुए, उन्होंने सोचा कि देश की स्वतंत्रता के हित में विदेशी गठबंधन की आवश्यकता हो सकती है. 1932 में नेताजी को इलाज के लिए वियना जाना पड़ा. वहां उनकी मुलाकात एक अन्य वरिष्ठ कांग्रेसी नेता विठ्ठल भाई पटेल से हुई. भारत के ये दो देशभक्त नेता विदेश में भी राष्ट्र को स्वाधीन करने की चर्चा में व्यस्त रहे. वहां चर्चाओं में, उन्होंने महसूस किया कि देश की स्वतंत्रता के लिए विदेशी सहायता की आवश्यकता थी. उस समय बहुत कम भारतीय नेताओं ने इस तरह की अंतर्राष्ट्रीय सोच व्यक्त की थी. इसी अंतर्राष्ट्रीय सोच ने नेताजी सुभाष चंद्र को अंतर्राष्ट्रीय मंच पर एक सशक्त कदम उठाने और सशस्त्र बलों के साथ देश को स्वतंत्र करने के लिए आगे बढ़ने की ताकत दी. नेताजी युवा समाज के एक वीर सैनिक थे. मन आज भी यह सोचकर प्रसन्न होता है कि एक उच्च शिक्षित सज्जन, ब्रिटिश सरकार की गिरफ्त से बचकर, ब्रिटिश पुलिस की नजरों से बचकर और पूरे भारत को पार करके अलग-अलग नामों से अफगानिस्तान पहुंचे और वहां से मध्य-पूर्व होते हुए यूरोप पहुंच गये.


भारत के युवाओं के मन में यह साहस, देशभक्ति हमेशा प्रज्ज्वलित रही है. केवल यह ही नहीं, कुछ साल बाद, जब उन्हें अहसास हुआ कि जर्मनी में बैठकर काम नहीं होगा, तो उन्होंने भारत के समीप दक्षिण-पूर्व एशिया जाना तय किया और इस क्रम में नेताजी ने एक और साहसिक अभियान चुना. तब द्वितीय विश्वयुद्ध का सबसे खूनी अध्याय चल रहा था. तत्कालीन भारत के विशिष्ट नेता सुभाषचंद्र तीन महीने से लगातार पनडुब्बी में जर्मनी से सिंगापुर जा रहे थे. इस खतरनाक यात्रा का विवरण आज भी रोम-रोम पुलकित कर देता है. आज भी, मुझे यह सोचकर गर्व होता है कि भारत की स्वतंत्रता की घोषणा से बहुत पहले, नेताजी अंडमान द्वीप समूह में स्वतंत्रता का राष्ट्रीय ध्वज फहरा रहे थे.


भारत की पूर्वी सीमा पर इंफाल में स्वतंत्रता का झंडा फहराया गया था. आजाद हिंद फौज की 75वीं वर्षगांठ पर प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने दिल्ली में लाल किले पर राष्ट्रीय ध्वज फहराया था और भारत सरकार ने तय किया है कि अब से इस नायक को श्रद्धांजलि देने के लिए, सुभाषचंद्र का जन्मदिन 23 जनवरी को 'पराक्रम दिवस' के रूप में मनाया जायेगा. परंतु कांग्रेस और वामपंथी इस नायक के सम्मान पर ठेस पहुंचा रहे हैं. यह वे लोग हैं, जिन्होंने न नेताजी को तब सम्मान दिया और न ही आज देने के पक्षधर हैं. लेकिन नरेंद्र मोदी, सुभाष बाबू के सपनों और विचारोंवाला एक सशक्त व आत्मनिर्भर भारत बनाने के लिए संकल्पित हैं.


आज, सुभाषचंद्र बोस की 125वीं जयंती की उपलक्ष्य में, हम भारत मां के इस सुपुत्र के प्रति अपनी सच्ची श्रद्धा व्यक्त करते हैं. बंगाल व समस्त भारत के लोग इस वीर सेनानी को सदैव याद रखेंगे. भारत के युवा आजाद हिंद फौज की वीरता से प्रेरित होंगे. नेताजी देश विरोधी ताकतों को खत्म करने के हमारे संघर्ष में सबसे आगे रहेंगे.


मैं अपनी श्रद्धा वाणी को कविगुरु के शब्दों में समाप्त करूंगा : 'सुभाषचंद्र,.... मैंने आपको राष्ट्र की साधना की शुरुआत से ही देखा है. आपने जो विचार प्रकाशित किये हैं, उसमें संदेह की कोई गुंजाइश नहीं है. आपकी शक्ति की कठिन परीक्षा, जेल, निर्वासन, अपार दुःख व गंभीर बीमारियों के मध्य हुई है, किसी भी कठिनाई ने आपको अपने पथ से नहीं हिलाया, अपितु आपके चिंतन को और विस्तृत किया है, आपकी दृष्टि को देश की सीमाओं से परे इतिहास के विस्तृत क्षेत्र तक ले जाने का काम किया है.


आपने विपत्तियों को भी अवसर में बदला है. आपने बाधाओं को एक स्वाभाविक क्रम बना दिया. यह सब संभव हुआ है, क्योंकि आपने किसी भी हार को अपनी नियति नहीं मानी. आपकी इस चारित्रिक शक्ति को बंगाल के हृदय में संचारित करने की आवश्यकता अत्यंत महत्वपूर्ण है. आपके विचारों की शक्ति से ही हम प्रधानमंत्री मोदी जी के नेतृत्व में बंगाल को पुनः सोनार बंगला बनाने के लिए संकल्पित हैं.

सौजन्य - प्रभात खबर।

Share:

Friday, January 22, 2021

एकता का संदेश (प्रभात खबर)

ऐसे समय में जो बाइडेन ने राष्ट्रपति का पदभार संभाला है, जब अमेरिका कई समस्याओं से घिरा है तथा दुनिया में भी उसका प्रभाव कम हुआ है. चुनाव अभियान के दौरान और जीत के बाद वे इन चुनौतियों को रेखांकित करते रहे थे. बतौर राष्ट्रपति अपने पहले संबोधन में उन्होंने समाज और राजनीति में विभाजन को समाप्त कर सभी अमेरिकियों के राष्ट्रपति के रूप में काम करने का भरोसा दिलाया है.



उन्होंने महामारी की मुश्किल और लोगों की रोजी-रोटी पर इसके भयावह असर से भी देश को निकालने का वादा किया है. एक महाशक्ति होने के नाते वैश्विक राजनीति और आर्थिकी में अमेरिका के महत्व को भी बाइडेन ने स्पष्ट किया है. वैसे यह संबोधन एक औपचारिक संदेश था, लेकिन जब हम इसके संदर्भों को देखते हैं, तो यह एक ऐतिहासिक संदेश के रूप में स्थापित होता है.



एक पखवाड़े पहले अमेरिकी लोकतंत्र के केंद्र पर पूर्व राष्ट्रपति ट्रंप के समर्थकों का उत्पात हर उस संकट का प्रतीक है, जिससे अमेरिका आज जूझ रहा है. अश्वेत समुदाय और अवैध आप्रवासियों के विरुद्ध अमानवीय आचरण, उग्र श्वेत श्रेष्ठता का विस्तार तथा सत्ता प्रतिष्ठानों से लेकर समाज के बड़े हिस्से में हिंसा और विषमता को स्वाभाविक मानने की बढ़ती प्रवृत्ति जैसे कारकों ने देश को दो भागों में बांट दिया है. संबोधन का मुख्य स्वर इस बंटवारे को चिन्हित करना और इसे पाटने के लिए देश को एकजुट करना है.


अपने भाषण में उन्होंने ‘हम’ शब्द का सर्वाधिक प्रयोग किया है और राष्ट्रीय विभाजन को ‘असभ्य युद्ध’ की संज्ञा दी है. ‘हम’, ‘हमें’ और ‘हमारा’ जैसे सर्वाधिक प्रयुक्त शब्द जहां एकता का आह्वान करते हैं, वहीं कई बार बोले गये ‘मैं’ और ‘मेरा’ इंगित करते हैं कि बाइडेन देश का नेतृत्व करने के लिए कृतसंकल्प हैं तथा वे लोगों से भी उनके ऊपर भरोसा करने का निवेदन कर रहे हैं.


महामारी और ट्रंप प्रशासन की विफलताओं से अमेरिकी अर्थव्यवस्था बेहाल है. इसीलिए राष्ट्रपति के पहले संबोधन में संक्रमण की रोकथाम के साथ रोजगार और कारोबार चिंता प्राथमिकताओं में है. जलवायु परिवर्तन और बढ़ते तापमान को लेकर हालिया अमेरिकी बेपरवाही से धरती बचाने के अंतरराष्ट्रीय प्रयासों को धक्का लगा है. इन समस्याओं से अमेरिका भी प्रभावित है.


बाइडेन के संबोधन में इस वैश्विक चुनौती का उल्लेख प्रमुखता से हुआ है और उन्होंने पहले ही दिन पेरिस जलवायु समझौते में अमेरिका के फिर से शामिल होने की घोषणा की है. यह शेष विश्व के लिए एक सकारात्मक पहल है. ‘अमेरिका फर्स्ट’ की ट्रंप नीति से देश को क्या फायदा हुआ, यह तो बहस की बात है, पर इस रवैये के कारण अपने मित्र देशों और दुनिया से अमेरिका के संबंध कमजोर हुए. बाइडेन ने इन संबंधों को प्राथमिकता देने की बात कही है, जो भारत व दक्षिण एशिया के लिए अच्छा संकेत है. बाइडेन की राह आसान तो नहीं होगी, पर संबोधन में उनके अनुभव और संकल्प स्पष्ट रूप से प्रतिबिंबित होते हैं.

सौजन्य - प्रभात खबर।

Share:

प्रशासनिक सुधारों का सही समय (प्रभात खबर)

By जीएन बाजपेयी 

 

केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने वर्ष 2020-21 के बजट के रूप में एक युगांतकारी- सदी का विशिष्ट- बजट प्रस्तुत करने के अपने इरादे को सार्वजनिक तौर से जाहिर किया है. नीतियों की घोषणा और संसाधनों के आवंटन के संदर्भ में इस बात का मतलब अपने-अपने ढंग से निकाला जा सकता है, परंतु व्यापक विचार-विमर्श ने उन्हें अर्थव्यवस्था के सभी पहलुओं से संबंधित ढेर सारे सलाह उपलब्ध कराये हैं, लेकिन यह भी है कि इनमें से अधिकांश सलाह करों में छूट, वित्तीय विवेक, भौतिक एवं सामाजिक इंफ्रास्ट्रक्चर और उपभोग वृद्धि में संसाधनों के उदार आवंटन से संबंधित हैं.



वर्तमान राजनीतिक कार्यपालिका ने संरचनात्मक सुधारों से संबंधित उपादान उत्पादकता (फैक्टर प्रोडक्टिविटी) को कमोबेश पूरा कर लिया है. आशा है कि अनुभव से सीखते जाने की प्रक्रिया में भूमि, श्रम एवं पूंजी में सुधार तथा बेहतरी के प्रयास भी बरकरार रहेंगे. यदि आवंटन से जुड़ी कुशलता में बेहतरी आती है, तो संरचनात्मक सुधारों से अर्थव्यवस्था लाभान्वित होगी. संसाधनों की आवंटन की प्रभावोत्पादकता मध्यस्थता की गुणवत्ता से निर्धारित होती है. भारत में मध्यस्थ संस्थानों के कामकाज का रिकॉर्ड बहुत गौरवपूर्ण नहीं है.



कई वर्षों के कामकाज के दौरान हर एक संस्थान में ऐसे लोग पैदा हो जाते हैं, जो उत्पादकता या प्रदर्शन में बिना किसी समुचित योगदान के धन हासिल करने की कोशिश करते हैं. इसी तरह निहित स्वार्थ भी अस्तित्व में आ जाते हैं. राज्य के संगठन, कार्यपालिका की सहनशीलता और जनता के धैर्य के हिसाब से ऐसे तत्वों की संख्या बढ़ती रहती है.


स्वार्थी और धन बनाने पर आमादा तत्व अवरोध पैदा कर, बाड़ लगाकर और धन के गलत बहाव के लिए तंत्र में छेद बनाकर काम के पूरा होने या सेवा को सही जगह पहुंचने या उत्पादन की प्रक्रिया की अवधि बढ़ाते हैं और संसाधनों के समुचित आवंटन की क्षमता को नुकसान पहुंचाते हैं.


भारत ने विरासत में स्वतंत्रता से पहले के कुछ शासकीय संस्थानों को हासिल किया था, जिनमें न्यायपालिका और प्रशासन सबसे महत्वपूर्ण थे. जनसंख्या में बढ़ोतरी, राज्य के गठन में परिवर्तनों, अर्थव्यवस्था की संरचना तथा भारत के लोगों की आकांक्षाओं में बदलाव आदि के बावजूद इन संस्थानों में बहुत मामूली बदलाव ही हुए हैं. ऐसे में पूरी प्रणाली घुमावदार, मनमानीपूर्ण, निराशाजनक और बेमतलब हो चुकी है.


विश्व बैंक की वर्ष 2018 की रिपोर्ट के अनुसार, ठेकों को निर्धारित समय पर पूरा करने के मामले में दुनिया में भारत का स्थान 164वां है. पहली ही अदालत में किसी कंपनी के एक व्यावसायिक विवाद का निपटारा होने में औसतन 1445 दिन लग जाते हैं तथा इस कार्यवाही में विवादित मूल्य का 30 प्रतिशत खर्च हो जाता है.


संस्थाओं के स्वरूप में बदलाव, उनके कार्य क्षेत्र का पुनर्निर्धारण और कामकाज के तौर-तरीकों का पुनर्लेखन आज की प्राथमिक आवश्यकता है. बीते कुछ दशकों से प्रशासनिक सुधारों की मांग हो रही है. अनेक सरकारों ने इस मुद्दे को गंभीरता से लेते हुए कामकाज में बेहतरी लाने की कोशिश की है, लेकिन सेवाओं को सही ढंग से प्रदान करने तथा लक्षित लोगों की संतुष्टि के मामले में बेहतरी में मामूली बढ़ोतरी ही हो सकी है.


वर्तमान सरकार ने भी प्रशासनिक आयोग की सिफारिशों तथा विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों द्वारा प्रस्तावित परिवर्तनों पर ध्यान दिया है. राजस्व जिले की मौजूदा रूप-रेखा ब्रिटिश सरकार द्वारा मुख्य रूप से इसलिए बनायी गयी थी कि राजस्व की वसूली हो सके. यह कारण अब इतना अहम नहीं है कि जिला प्रशासन के कार्मिकों की इतनी बड़ी सेना रखी जाए. संस्था की क्षमता, संस्कृति और समन्वय उसी के इर्द-गिर्द बनायी गयी थी. इसलिए आज भी जिलाधिकारी या उपायुक्त ‘हुजूर’ बने हुए हैं.


जिलों और शहरों में प्रशासनिक तंत्र का आज जो प्रमुख उद्देश्य है, वह है विभिन्न नागरिक और कल्याण सेवाओं को मुहैया कराना तथा आर्थिक विकास को सहयोग देना. प्रशासन की अक्षमता और अकुशलता से समाज का असंतोष कभी-कभी अशालीन तरीकों के रूप में बाहर आता है. प्रणाली और प्रक्रिया में छोटे-मोटे बदलाव से संतोष को नहीं बढ़ाया जा सकता है.


ऐसी स्थिति में यदि सांस्थानिक रूप-रेखा और संरचना में पूरी तरह फेर-बदल संभव नहीं है, तो कम-से-कम उनकी दिशा का पुनर्निर्धारण करना तथा उन्हें उद्देश्य और अपेक्षित परिणाम से फिर जोड़ना अत्यावश्यक हो गया है. किसी संस्थान की कार्य क्षमता सूचना, प्रोत्साहन, दंड तथा उत्तरदायित्व से गुंथे अधिकार से निर्धारित होती है. हालांकि आयकर प्रशासन में दूरगामी बदलाव हुए हैं तथा सेवाओं के प्रदान करने में बेहतरी आयी है, लेकिन करदाताओं का भरोसा अभी भी पूरी तरह बहाल नहीं हुआ है, जिससे परिणामों पर बहुत गंभीर असर पड़ रहा है.


ऐसी ही स्थिति न्यायिक सेवाओं के साथ भी है. इस क्षेत्र में अनेक बदलाव की कोशिशें हुई हैं. इनमें से एक प्रयास अलग व्यावसायिक न्यायालयों और ट्रिब्यूनलों की स्थापना भी है. इसके बावजूद लोगों की मुश्किलें अब भी बर्दाश्त के बाहर हैं. यहां तक कि इन्सॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड जैसे बेहद व्यावहारिक कानून के डिजाइन ने भी मामूली मदद की है. यह एक चिंताजनक स्थिति है. इसके कारण बिल्कुल स्पष्ट हैं.


व्यवस्था की बनावट और कामकाज की प्रक्रियाएं पुरानी प्रकृति का ही अवतार हैं. निहित स्वार्थों तथा किसी भी तरह धन बनाने की जुगत में लगे लोग अब भी आराम से अपना काम कर रहे हैं. यदि न्याय देना उद्देश्य है, तो फिर ‘न्याय में देरी न्याय देने से इनकार है.' जब तक नये न्याय शास्त्र का निर्माण नहीं हो जाता है, तब तक पुराना न्याय शास्त्र और न्यायिक मनमानी अपनी प्रभुता नहीं चला सकते हैं. समानता के सिद्धांत से संचालित व्यवस्था में अपेक्षित परिणाम ही निर्धारक कारक होने चाहिए.


‘सदी का विशिष्ट बजट’ में ‘शासन के संस्थानों’ के पूरी तरह से फिर से रचने-गढ़ने का उद्देश्य समाहित होना चाहिए, जहां आम आदमी लाभों को ग्रहण करने में आगे रहे तथा साधन संपन्न लोगों को परिणामों के अपहरण की अनुमति नहीं होनी चाहिए.


ऐसा करना आज की सबसे अहम जरूरत है. यह सच है कि ऐसा एक साल में ही नहीं हो सकता है, लेकिन भविष्य के लिए एक कार्ययोजना बजट के दस्तावेज में स्पष्ट रूप से रेखांकित होनी चाहिए. अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति स्वर्गीय जॉन एफ केनेडी ने एक अर्थपूर्ण बात कही थी कि ‘जब सूरज चमक रहा हो, तब छत की मरम्मत का समय होता है.’ इस महत्वपूर्ण युगांतकारी परिवर्तन को हमारी संसद के दोनों सदनों द्वारा स्वीकृति देने और इसके लिए समाज की एकचित्तता का यही समय है.

सौजन्य - प्रभात खबर।

Share:

बड़े बदलाव के पुरोधा कर्पूरी ठाकुर (प्रभात खबर)

केसी त्यागी, पूर्व सांसद एवं प्रधान, महासचिव, जद (यू)

 

जननायक कर्पूरी ठाकुर का 24 जनवरी को जन्म दिवस है. देश इसे समता और स्वाभिमान दिवस के रूप में स्मरण करता है. बिहार के लगभग सभी राजनीतिक दल कार्यक्रमों और जनसभाओं का आयोजन करते हैं. रोचक है कि इसमें वे नेता एवं संगठन भी शामिल होते हैं, जो उनके जीवन-काल में उनके विचारों एवं कार्यक्रमों के विरोधी रहे. समता, जाति प्रथा का विनाश और स्वाभिमान से जीने की चाह का सपना सच में बदलने का प्रयास कर्पूरी ठाकुर द्वारा किया गया.



दुर्बल एवं साधनहीन लोगों में चेतना लाना, उन्हें संगठित करना और परिवर्तन का वाहक दस्ता बनाना असंभव जैसा कार्य है. विचारों की प्रखरता, अडिग विश्वास ने कर्पूरी जी को कभी विचलित नहीं होने दिया. डॉ आंबेडकर और कर्पूरी ठाकुर के आरक्षण, विशेष अवसर का सिद्धांत, समता, जाति-विनाश की राजनीति का विरोध कर रहे संगठन एवं व्यक्तियों के समूह उनके जन्म-मृत्यु दिवस पर भव्य कार्यक्रम आयोजित कर रहे हैं.



कर्पूरी ठाकुर जिन विचारों और कार्यक्रमों को जमीन पर उतारने में समर्पित रहे, वे डॉ लोहिया द्वारा प्रतिपादित थे. गैर-कांग्रेसवाद की राजनीति के जनक डॉ लोहिया बहुप्रयोगधर्मी थे. पार्टी के संगठनात्मक ढांचे और मंत्रिमंडल में भी विभिन्न वर्गों को आनुपातिक प्रतिनिधित्व दिलाने के लिए डॉ लोहिया आजीवन प्रयासरत रहे. जब 1967 में डॉ लोहिया की मृत्यु हुई, उस समय बिहार, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश, पंजाब समेत आधा दर्जन से अधिक प्रांतों में गैर-कांग्रेसी मुख्यमंत्री बने.


सोशलिस्ट पार्टी के असर वाले राज्यों की बागडोर पिछड़े वर्ग के नेताओं के हाथ में रही. उत्तर प्रदेश में चौधरी चरण सिंह, बिहार में कर्पूरी ठाकुर और हरियाणा में राव बीरेंदर सिंह पिछड़े वर्गों के स्थापित नेता थे. डॉ आंबेडकर 1942 में दलित एवं आदिवासी समूहों के लिए आरक्षण का प्रश्न उठा चुके थे, जो स्वतंत्र भारत में संभव हो सका. पिछड़े वर्गों की आधी से अधिक आबादी शिक्षा और नौकरी से दूर थी. स्वतंत्रता के बाद हिस्सेदारी को लेकर समय-समय पर आंदोलन भी होते रहे और आयोग भी गठित हुए.


पहला आयोग काका कालेलकर की अध्यक्षता में गठित हुआ, जिसने इन वर्गों की नगण्य हिस्सेदारी पर अफसोस जाहिर किया और आरक्षण लागू कर इन समूहों की हिस्सेदारी की जोरदार सिफारिश की. ये सिफारिशें लंबे समय तक धूल चाटती रहीं. निःसंदेह कांग्रेस पार्टी ऐसे किसी बड़े परिवर्तन की हिमायती नहीं रही. वर्ष 1967 के गैर-कांग्रेसी प्रयोग और 1977 में जनता पार्टी के गठन से परिस्थितियां बदलीं. उत्तर प्रदेश में राम नरेश यादव, बिहार में कर्पूरी ठाकुर, हरियाणा में चौधरी देवीलाल, पंजाब में प्रकाश सिंह बादल, उड़ीसा में नीलमणि राउत, गुजरात में बाबू भाई पटेल और बाद में महाराष्ट्र में शरद पवार किसान जातियों एवं पिछड़े वर्गों के मुख्यमंत्री बने.


कर्पूरी ठाकुर के सिर पर कांटों का ताज था. पार्टी के अंदर और बाहर निहित स्वार्थों के प्रतिनिधि मोर्चा लगाये हुए थे. 11 नवंबर, 1978 को बिहार विधानसभा में पिछड़ी जातियों के आरक्षण का प्रस्ताव आया, तो जनता पार्टी दो फाड़ हो गयी. कर्पूरी जी के कई साथी भी अपनी जाति समूहों के साथ चिपक गये. आरक्षण में आरक्षण का प्रस्ताव कई पिछड़ी जातियों के स्थापित नेताओं को भी नागवार गुजरा. जब अति पिछड़ों के लिए 12 प्रतिशत, सामान्य पिछड़ों के लिए आठ प्रतिशत, महिलाओं के लिए तीन प्रतिशत और सामान्य श्रेणी के लिए तीन प्रतिशत आरक्षण की घोषणा की गयी, तो कर्पूरी जी सबके निशाने पर आ गये. किसी ने उन्हें उत्तर भारत का पेरियार घोषित कर दिया, तो किसी ने उन्हें आंबेडकर. कुछ ने उन्हें महात्मा फुले और साहू जी महाराज का उत्तराधिकारी बताया. सामाजिक न्याय के इस संघर्ष में उनका मुख्यमंत्री पद चला गया, लेकिन वह शीर्षस्थ नेता के रूप में स्थापित हुए. आज वे हमारे बीच नहीं है, पर पूरे देश में कर्पूरी ठाकुर के आरक्षण फार्मूले पर अमल हो रहा है.


सामान्य श्रेणी के लिए संविधान में आरक्षण की कोई व्यवस्था नहीं थी, लेकिन पहले बिहार में नीतीश सरकार ने सवर्ण आयोग गठित कर इन वर्गों के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण की घोषणा की. बाद में केंद्र की मोदी सरकार ने आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण को लागू किया. महिलाओं के आरक्षण की चर्चा पहली बार कर्पूरी फार्मूले में शामिल हुई. पिछले दिनों मोदी सरकार ने कर्पूरी फार्मूले पर अमल करने हेतु ‘कोटा के अंदर कोटा’ सिद्धांत को लागू करने के लिए जी रोहिणी आयोग का गठन किया है.


कुछ राज्यों में पहले से ही अति पिछड़े इन सुविधाओं का लाभ उठा रहे हैं. बिहार में कर्पूरी ठाकुर के मानस पुत्र नीतीश कुमार ने अत्यंत पिछड़ों के साथ-साथ महादलित आयोग के जरिये अत्यंत दुर्बल वर्गों के आर्थिक-सामाजिक सशक्तीकरण का मार्ग प्रशस्त कर दिया है. आज किसी दल, व्यक्ति, समूह में इतना दम-खम नहीं है कि कर्पूरी फार्मूले का विरोध कर सके. सभी दलों, सभ्य समाज के प्रतिनिधि वर्ग को स्वर्गीय कर्पूरी ठाकुर को विनम्र श्रद्धांजलि देते हुए उन्हें भारतरत्न देने का आह्वान करना चाहिए, ताकि उनके अनुयायी गौरवान्वित महसूस कर सकें.

सौजन्य - प्रभात खबर।

Share:

Thursday, January 21, 2021

नये स्टार्टअप को प्रोत्साहन (प्रभात खबर)

By अरविंद मोहन. 

 

देश में उद्यमिता विकास और कारोबारी माहौल को बेहतर बनाने के लिए विभिन्न स्तरों पर प्रयास किये जा रहे हैं. स्टार्टअप पर 2015 के बाद से ही फोकस किया जा रहा है. बीच में ठहराव की स्थिति बनी थी. हालांकि, 2018 तक परिदृश्य में परिवर्तन स्पष्ट होने लगा था. इस दौरान कुछ बड़े व्यापार समझौतों पर हस्ताक्षर भी किये गये. साल 2018 के आसपास आठ-नौ बिलियन डॉलर की फंडिंग उपलब्ध हुई और 2019 में भी इसी तरह की वृद्धि दिखायी पड़ी.



हालांकि, कोविड-19 के चलते 2020 में स्टार्टअप को बड़ा झटका लगा. जो प्रयास किये जा रहे थे और उद्यमिता प्रोत्साहन का जो माहौल बन रहा था, वह अचानक ठहर गया. इस पृष्ठभूमि के बाद अब हमें आगे की शुरुआत करनी है. जब हम स्टार्टअप की बात करते हैं, तो यह समझना होगा कि एमएसएमई (सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम) के इकोसिस्टम को कैसे प्रोत्साहन दें. पिछले आठ-दस महीनों में अर्थव्यवस्था के सामने गंभीर चुनौतियां आयी हैं.



पिछले 30 वर्षों से हमारी अर्थव्यवस्था उस तरह का रोजगार पैदा नहीं कर पा रही है, जैसी हम अपेक्षा करते हैं. इस सदी के शुरुआती दशक में जीडीपी तेजी से बढ़ी, लेकिन उसके अनुपात में रोजगार नहीं आया. जब देश में 1991 में आर्थिक सुधार लाया गया, वह उद्योग केंद्रित सुधार था. हम देख रहे हैं 2006-07 के बाद से उसमें भी गिरावट की प्रवृत्ति रही है. देश की ये कुछ गंभीर समस्याएं हैं, जिन पर संजीदगी से विचार करने की जरूरत है.


भारत अभी एक संरचनागत चुनौती के दौर से गुजर रहा है. यह इसलिए भी है कि जब हमने पहली पीढ़ी का सुधार किया था, तो उसे हमने पूरा नहीं किया. अब एक चुनौती कृषि और एमएसएमई सेक्टर की तरफ से है. दोनों ही क्षेत्रों में संतोषजनक विकास नहीं दिखा, जिससे अर्थव्यवस्था में एक तरह का संरचनागत असंतुलन बन रहा है. हमारे सामने एक बड़ा उदाहरण चीन का है. कुछ दशकों में चीन भी तेजी से विकसित होनेवाली अर्थव्यवस्था रही है. लेकिन, वह भी एक प्रकार की मंदी में जा रही है. उनके सामने भी एक संरचनागत चुनौती है.


भारत में अभी अर्थव्यवस्था को गति देने की जरूरत है. बीते आठ-दस महीनों में अर्थव्यवस्था को बड़ा झटका लगा है. अर्थव्यवस्था 24 प्रतिशत तक नीचे लुढ़क गयी थी. माना जा रहा है कि नये वित्त वर्ष में भी अर्थव्यवस्था के समक्ष चुनौती बरकरार रहेगी. हालांकि, अब सुधार शुरू हो चुका है. इस चुनौतीपूर्ण स्थिति में भारत सरकार किस प्रकार के कदम उठा रही है. क्या उस परिप्रेक्ष्य में ये खरे उतरते हैं? सरकार 1000 करोड़ रुपये का फंड तैयार कर रही है.


इससे स्टार्टअप को गति देने की कोशिश की जायेगी. यह एक अच्छी पहल है. बीते आठ-दस महीनों में स्टार्टअप में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर निवेश का बड़ा हिस्सा दुनिया के दो क्षेत्रों में जा रहा था, एक उत्तरी अमेरिका में और दूसरा एशिया-प्रशांत क्षेत्र में. एशिया-प्रशांत क्षेत्र में जितनी भी फंडिंग और स्टार्टअप ग्रोथ दिखी, वह चीन में सर्वाधिक थी. साल 2019 तक यानी कोविड से पहले तक की तस्वीर देखें, तो चीन में स्टार्टअप में 800 बिलियन डॉलर का निवेश हो चुका था. इस अवधि में भारत में मात्र 80 बिलियन डॉलर का निवेश हुआ था.


हालांकि, भारत में भी तेजी आ रही थी और कई बड़े घराने खड़े हो गये, जिन्हें हम यूनिकॉर्न कहते हैं. इन स्टार्टअप की सफलता यहां की क्षमता और संभावनाओं को दिखाती है. लेकिन, बीते महीनों में निवेश में गिरावट आयी है, उससे उन स्टार्टअप पर अधिक असर पड़ा, जो शुरुआत कर चुके थे, लेकिन उनकी ग्रोथ आनी बाकी थी. वहां से निवेश खत्म हो गया. बड़े स्टार्टअप, जो सफल हो रहे थे, उन्हें भी दिक्कतें आयीं, लेकिन तुलनात्मक तौर पर वह कम थीं. अब 1000 करोड़ का फंड तैयार किया जा रहा है.


इससे स्टार्टअप को मदद मिलेगी. लेकिन, फंड देना ही पर्याप्त नहीं होगा. आमतौर पर 25 करोड़ तक के निवेश और सात साल से कम समय से काम कर रही कंपनी को स्टार्टअप की श्रेणी में रखा जाता है. हमें समझना होगा कि भारत की अर्थव्यवस्था में एमएमएसई सेक्टर की बड़ी भूमिका है. साथ ही हमें देश के विभिन्न कृषि-जलवायु क्षेत्र की आवश्यकताओं और मांगों को भी समझने की जरूरत है. स्टार्टअप फंड के साथ-साथ हमें इकोनॉमिक मैपिंग करनी होगी. देश में ज्यादातर स्टार्टअप इंजीनियरिंग पृष्ठभूमि वालों द्वारा शुरू किये गये हैं. शायद इन्हें वैश्विक और देश की संभावनाओं की समझ थी. भारत में सफल स्टार्टअप इनोवेशन आधारित थे.


भारत जैसे देश में हम छोटा इकोसिस्टम नहीं, बल्कि देश को परिवर्तित करने और आगे ले जाने वाले सिस्टम को विकसित कर रहे हैं. इसमें इनोवेशन एक हिस्सा है और दूसरा हिस्सा अवसर है. देश में अलग-अलग प्रदेशों में और बड़े प्रदेश के अलग-अलग क्षेत्रों में विविध संभावनाएं हैं. कहां पर किन उत्पादों की आवश्यकता है और वहां क्या संसाधन उपलब्ध हैं. इनके आधार पर हमें इकोनॉमिक मैपिंग करनी होगी.


स्थानीय स्तर पर उद्यम शुरू तो हो रहे हैं, लेकिन वे असफल हो जा रहे हैं, क्योंकि वे भेेड़चाल का हिस्सा हैं. किसी एक ही क्षेत्र में एक ही प्रकार के उद्यमों की भरमार हो जाती है, जिससे उनके असफल होने की संभावना बढ़ जाती है. समय आ गया है कि फंड के साथ-साथ विभिन्न कृषि-जलवायु क्षेत्रों की इकोनॉमिक मैपिंग की जाये, ताकि हमारे संभावित नवउद्यमियों को पता चल सके कि किस उत्पाद को, वे किस तरह से बेच सकते हैं. उन्हें पता चल सके कि वे अपने उद्यम को कैसे खड़ा कर सकते हैं. ऐसा करके हम देश के औद्योगिक माहौल को अपने देश की जनता के लिए उपयोगी बना पायेंगे.

सौजन्य - प्रभात खबर।

Share:

नहीं चलेगी मनमानी (प्रभात खबर)

केंद्र सरकार ने भारतीय उपयोगकर्ताओं के लिए संदेश सेवाप्रदाता व्हाट्सएप द्वारा जारी नयी निजता नीति को वापस लेने का निर्देश दिया है. सूचना तकनीक मंत्रालय ने इस निर्देश में सेवाप्रदाता को कहा है कि वह भारत में इन्हें लागू न करे. कुछ दिन पहले व्हाट्सएप ने उपयोगकर्ताओं को कहा था कि फरवरी के पहले सप्ताह के बाद वह अन्य एप्लीकेशनों और सेवाओं के साथ डाटा साझा करने की अपनी नीति में बदलाव कर रहा है.



व्हाट्सएप के इस्तेमाल को जारी रखने के लिए नयी नीति को मानना जरूरी था. इस पर यूजरों के अलावा तकनीकी विशेषज्ञों और इंटरनेट पर निजता की सुरक्षा के प्रयासों से जुड़े लोगों ने आपत्ति जतायी थी. हालांकि व्हाट्सएप ने यूजरों को भरोसा दिलाने की कोशिश की है कि उनका डाटा बिलकुल सुरक्षित है और उनका दुरुपयोग नहीं होगा, लेकिन अभी भी शंकाएं बनी हुई हैं.



ऐसे में सरकार का यह निर्देश एक सराहनीय कदम है. इससे व्हाट्सएप के साथ अन्य तकनीकी कंपनियों को भी यह संदेश जायेगा कि वे मनमाने ढंग से भारतीय यूजरों के लिए नियम नहीं बना सकते हैं. उल्लेखनीय है कि व्हाट्सएप, फेसबुक, िट्वटर, इंस्टाग्राम जैसे एप तथा अमेजन जैसी सेवाओं के भारत में बहुत बड़ी संख्या में यूजर हैं. तकनीक और इंटरनेट के विस्तार के साथ इन एपों और सेवाओं का विस्तार भी तेजी से हो रहा है.


यह तथ्य भी आपत्तिजनक है कि सोशल मीडिया और तकनीकी कंपनियां अमेरिका व यूरोप में निजता और डाटा सुरक्षा के अलग नियम रखती हैं और भारत में अलग. भारत में जब एप ने नीतियों में फेर-बदल की बात कही थी, तब उसने यह भी साफ किया था कि यूरोपीय यूजरों के लिए पहले के नियम ही लागू रहेंगे. इसके अलावा ये एप अपने मंच के दुरुपयोग को रोकने के लिए भी बहुत सक्रिय नहीं हैं. भारत में करीब दो दशक पहले सूचना तकनीक से संबंधित कानूनी प्रावधान किये गये थे, लेकिन इस अवधि में तकनीक का दायरा जितना बढ़ा है, उस हिसाब से वे प्रावधान प्रभावी नहीं हैं.


निजता को लेकर भी समुचित वैधानिक व्यवस्था नहीं है. इस संबंध में एक विधेयक संसद में प्रस्तावित है. सरकार की कोशिश है कि भारतीय यूजरों से जो डाटा जमा किया जाता है, उन्हें ये कंपनियां भारत में ही संग्रहित करें और उनका किसी भी तरह से बेजा इस्तेमाल न हो.


इस संबंध में ठोस कानूनी पहल की आवश्यकता है. कानून नहीं होने और यूजरों में निजता को लेकर जागरूकता की कमी का फायदा उठाते हुए एप व्यापक रूप से डाटा का दोहन करते हैं. एक समस्या यह भी है कि इस डाटा को हैकर या देशविरोधी तत्व अपने निहित स्वार्थों के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं. राष्ट्रीय सुरक्षा और वित्तीय व्यवस्था के लिए खतरनाक कई एपों को सरकार ने प्रतिबंधित किया है. ऐसे में यूजर को किसी िकभी एप या इंटरनेट का इस्तेमाल सोच-समझ कर करना चाहिए, अन्यथा उन्हें नुकसान उठाना पड़ सकता है.

सौजन्य - प्रभात खबर।

Share:

बाइडेन काल में भारत-अमेरिका संबंध (प्रभात खबर)

By अवधेश कुमार 

 

अमेरिका में सत्ता परिवर्तन के साथ भारत के साथ रिश्तों के वर्तमान एवं भविष्य को लेकर चल रही चर्चा स्वाभाविक है. डोनाल्ड ट्रंप के शासनकाल में दोनों देशों के रिश्ते इतने गहरे हुए कि एशिया-प्रशांत क्षेत्र का नाम हिंद-प्रशांत क्षेत्र हो गया. ट्रंप प्रशासन ने भारत को ऐसे सहयोगी का दर्जा दिया, जो केवल नाटो देशों को ही प्राप्त था. कुछ ऐसे समझौते हुए, जो अमेरिका अपने निकटतम देशों के साथ ही करता है. चीन के साथ हमारे तनाव के दौर में भी ट्रंप प्रशासन ने खुलकर भारत का पक्ष लिया.



दक्षिण चीन सागर में भी चीन के खिलाफ जितना कड़ा तेवर ट्रंप ने अपनाया, वैसा पूर्व राष्ट्रपतियों में नहीं देखा गया. एकाध अवसर को छोड़ दें, तो ट्रंप भारत के आंतरिक मामलों पर कोई बयान देने से बचते थे या ऐसा बयान नहीं देते थे, जिससे हमारे लिए कोई परेशानी खड़ी हो. राष्ट्रपति जो बाइडेन और उपराष्ट्रपति कमला हैरिस की मानवाधिकार, जम्मू व कश्मीर, नागरिकता संशोधन कानून आदि मामलों पर अब तक प्रकट की गयीं भारत विरोधी भावनाएं हमारे सामने हैं.



चुनाव जीतने के बाद अपनी विदेश नीति को लेकर दिये बाइडेन के कई बयानों से भारत में चिंता पैदा हुई. उन्होंने चीन के साथ कुछ नरमी का संकेत दिया. साथ ही एशिया-प्रशांत क्षेत्र नीति में भी बदलाव की बात की. लेकिन पिछले कुछ दिनों में आये बयान पूर्व के तेवर से थोड़े अलग हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनकी बातचीत के जो अंश सामने आये, वे हमारे लिए काफी अनुकूल हैं.


इन सबको आधार बनाकर हम बाइडेन काल में भारत-अमेरिकी संबंधों का एक मोटा-मोटी सिंहावलोकन कर सकते हैं. बाइडेन के भारत के प्रति व्यवहार की दो तस्वीरें हमारे सामने हैं. एक, 1992 में सीनेटर के रूप में उन्होंने रूस से क्रायोजेनिक इंजन खरीदने की राह में बाधा खड़ी की थी. दूसरा, सीनेटर और उपराष्ट्रपति के रूप में उनका व्यवहार भारत के पक्षकार का भी रहा. साल 2006 में उन्होंने कहा था कि 2020 के मेरे सपने की दुनिया में अमेरिका और भारत सबसे नजदीकी देश है.


साल 2008 में जब भारत-अमेरिका नाभिकीय समझौते पर सीनेटर के रूप में बराक ओबामा को थोड़ी हिचक थी, तब बाइडेन ने केवल उनको ही नहीं समझाया, अनेक रिपब्लिकन और डेमोक्रेट के बीच इस संधि का पक्ष रखकर इससे सहमत कराया. उपराष्ट्रपति के काल में उन्होंने सामरिक क्षेत्र में भारत के साथ मजबूत रिश्तों की वकालत की.


ओबामा के कार्यकाल में भारत को बड़ा रक्षा साझेदार घोषित किया गया, रक्षा लॉजिस्टिक आदान-प्रदान और एक-दूसरे के ठिकानों को उपयोग करने के समझौते हुए. राष्ट्रपति बाइडेन इन सबसे पीछे हटने की कोशिश करेंगे, ऐसा मानने का कोई तार्किक कारण नजर नहीं आता.


बिल क्लिंटन से लेकर जॉर्ज बुश व बराक ओबामा तक सबने भारत के साथ बहुआयामी संबंध मजबूत करने की कोशिश की. जहां तक चीन का सवाल है, तो बाइडेन ने पिछले दिनों न्यूयॉर्क टाइम्स को िदये एक साक्षात्कार में साफ किया कि चीन के साथ प्रारंभिक व्यापार सौदों को वे फिलहाल रद्द नहीं करेंगे. उन्होंने कहा कि वे अमेरिका के भू-राजनीतिक प्रतिद्वंदी के साथ भविष्य की बातचीत में अपने लाभ को अधिकतम रखना चाहते हैं.


चीन का रवैया और उसका शक्ति विस्तार भारत के लिए हमेशा चिंता का कारण रहा है. कोरोना काल में धोखेबाजी से लद्दाख में उसका सैन्य रवैया कितने तनाव और परेशानी का कारण है यह बताने की आवश्यकता नहीं. वह हमारे जमीन को कब्जाने में विफल हुआ, पर भारत उसके प्रति आश्वस्त नहीं हो सकता. इसमें अमेरिका जैसे देश का साथ और सहयोग पहले की तरह रहे, यह चाहत हमारी होगी. इस बीच भारत अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ क्वाड संगठन में सक्रिय हुआ है, जो अभी अमेरिका की मुक्त एवं स्वतंत्र हिंद-प्रशांत रणनीति के मूल में है.


अगर बाइडेन इस समय किसी तरह चीन के साथ तनाव कम करके सहयोग बढ़ाने की ओर अग्रसर होते हैं, तो हमें अपनी सामरिक नीति पर पुनर्विचार की आवश्यकता पैदा होगी. यह सच है कि रिचर्ड निक्सन से लेकर बराक ओबामा तक सारे राष्ट्रपति चीन के शक्तिशाली होने में सहयोगी भूमिका निभाते रहे. दक्षिण चीन सागर में भी चीन ने अपने कृत्रिम द्वीप का निर्माण कर उसका सैन्यकरण कर लिया, लेकिन अमेरिका ने उसके खिलाफ सख्ती नहीं बरती. ओबामा ने तो यहां तक कहा कि हमें समृद्ध चीन के बजाय दुर्बल और आक्रामक चीन से अधिक खतरा होगा.


ट्रंप के कार्यकाल में ही चीन नीति पलटी गयी. यह भारत के अनुकूल था. चीन जिस तरह पाकिस्तान का साथ देता है, उसमें अमेरिका का रुख पहले की तरह सख्त नहीं रहा, तो क्या होगा? भारत के लिए चीन और पाकिस्तान दोनों चिंता के विषय हैं. चीन-पाकिस्तान गठजोड़ के प्रति अमेरिका की किसी तरह की नरमी से भारत की सुरक्षा चुनौतियां बढ़ जायेंगी.


भारत के लिए एक और चिंता का कारण हिंद-प्रशांत क्षेत्र भी है. ट्रंप प्रशासन ने भारत के महत्व को रेखांकित करते हुए ही एशिया-प्रशांत का नाम बदलकर हिंद-प्रशांत क्षेत्र कर दिया था. बाइडेन ने मुक्त और स्वतंत्र हिंद-प्रशांत की जगह सुरक्षित एवं समृद्ध हिंद प्रशांत की बात कही है. ऐसे में हमारी सामरिकरण नीति में बदलाव करना पड़ सकता है. इन आशंकाओं को हम नजरअंदाज नहीं कर सकते.


सत्ता आने के पहले के वक्तव्यों और सत्ता में आने के बाद की नीतियों में कई बार फर्क होता है. भारत के लिए अमेरिका का महत्व है, तो अमेरिका को भी भारत की महत्ता का आभास है. उम्मीद कर सकते हैं कि बाइडेन और कमला हैरिस चीन द्वारा विश्व के लिए पैदा की जा रहीं चुनौतियों और समस्याओं को देखते हुए अपने हितों का सही विश्लेषण करेंगे. सत्ता में आने के पूर्व क्लिंटन और ओबामा दोनों का व्यवहार याद करें.


बाद में उन्होंने भारत को जितना महत्व दिया, वह भी हमारे सामने है. ओबामा ने अमेरिका-भारत संबंधों को 21वीं सदी की सबसे निर्णायक साझेदारी घोषित किया था. संभावना यही है कि बाइडेन भी ऐसे ही करेंगे. वे उस व्यापार संधि को साकार कर सकते हैं, जिसे ट्रंप करना चाहते थे. क्लिंटन ने भारत यात्रा के बाद पाकिस्तान जाकर जिस तरह आतंकवाद पर उसे खरी-खोटी सुनायी थी, उसे कोई भुला नहीं सकता. वैसी ही भूमिका ओबामा के विदेश सचिव के रूप में हिलेरी क्लिंटन ने निभायी थी. ऐसे कई वाकये हैं, जिनके आलोक में विचार करने पर हमारे लिए ज्यादा चिंता नहीं होनी चाहिए.

सौजन्य - प्रभात खबर।

Share:

Friday, January 15, 2021

क्रिकेट में नस्लवाद पर प्रहार जरूरी (प्रभात खबर)

अभिषेक दुबे, वरिष्ठ खेल पत्रकार

ऑस्ट्रेलिया की टीम जब भारत के खिलाफ टी-20 सीरीज में इंडिजिनस जर्सी पहन कर मैदान पर उतरी, तो यह राष्ट्रीय टीम के खिलाड़ियों का अपने पुरखों, बीते कल, आज और आनेवाले कल के मूलनिवासी क्रिकेटरों के स्वागत का एक नायाब अंदाज था. लेकिन सिडनी में तीसरे टेस्ट मैच के आते-आते यह भावना तार-तार होती दिखी. सिडनी में भारत-ऑस्ट्रेलिया के बीच जब टेस्ट मैच का रोमांच चरम पर था, भारतीय खिलाड़ी मोहम्मद सिराज और जसप्रीत बुमराह पर नस्लवादी टिप्पणियां की गयी़ं

भारत के इन दो क्रिकेटरों के प्रदर्शन को ऑस्ट्रेलिया के दर्शकों का एक तबका हजम नहीं कर सका और नस्लवादी टिप्पणी करने लगा. हालांकि अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट संस्था, क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया और मेजबान टीम के अहम खिलाड़ियों ने इसकी आलोचना की. यह ध्यान देने योग्य है कि रंगभेद या नस्लवाद के खिलाफ अधिकतर कदम सिर्फ संकेतात्मक ही रहे हैं. नस्लवाद या रंगभेद के खिलाफ ऑस्ट्रेलिया में माहौल कैसे बनता है, इसे समझना जरूरी है. भारतीय टीम के ऑस्ट्रेलिया में पहले टेस्ट में करारी हार और ऐतिहासिक कम स्कोर के बाद मेहमान टीम के 0-4 से ‘व्हाइटवाश’ के कयास लगाये जाने लगते हैं.

हालांकि अंग्रेजी के जानकार कहते हैं कि इस शब्द का अर्थ नस्लवादी नहीं होता और खेल में इसका अर्थ विरोधी टीम का सफाया होता है. लेकिन कई बार विरोधी खिलाड़ियों, दर्शकों और मीडिया के एक बड़े तबके ने इसी भाव से ‘व्हाइटवाश’ का इस्तेमाल किया है.


मेलबर्न में खेले जा रहे दूसरे टेस्ट मैच में बुमराह और सिराज जैसे खिलाड़ियों की मदद से भारतीय टीम मेजबान टीम को हराने में सफल होती है. इसके बाद ऑस्ट्रेलिया के पूर्व क्रिकेटर और मीडिया का बड़ा तबका भारतीय खिलाड़ियों पर कभी क्वारंटीन नियमों के उल्लंघन का आरोप लगाते हैं, तो कभी व्यक्तिगत हमले करते हैं. दिलचस्प यह है कि भारतीय खिलाडियों द्वारा क्वारंटीन नियम तोड़ने के अधिकतर मामले बेबुनियाद पाये जाते हैं. लब्बोलुवाब यह कि एक माहौल सा तैयार होता है.


सिडनी में तीसरे टेस्ट मैच में जैसे ही गेंद और बल्ले के बीच टक्कर चरम पर होती है, दर्शकों का एक तबका मोहम्मद सिराज और जसप्रीत बुमराह जैसे भारतीय खिलाड़ियों पर ‘ब्राउन डॉग,’ ‘मंकी’ जैसी भद्दी और आपत्तिजनक टिप्पणी करने लगते हैं. मोहम्मद सिराज जब इसे बर्दाश्त नहीं कर सके तो कप्तान अजिंक्य रहाणे और अंपायर से शिकायत की. लेकिन रविचंद्रन अश्विन जैसे सीनियर खिलाड़ियों की मानें, तो उनके साथ ऐसा कई बार हो चुका है.


दर्शक कई बार तैश में आकर इस कदर आपत्तिजनक टिप्पणी करते हैं कि सीमा रेखा के आसपास क्षेत्ररक्षण करना मुश्किल हो जाता है़ निर्धारित स्थान से तीन या चार कदम पहले खड़े होने को मजबूर होना पड़ता है. सिडनी क्रिकेट ग्राउंड पर यह समस्या और गंभीर हो जाती है. ऑस्ट्रेलिया के पूर्व क्रिकेटर, मैदान पर मौजूद क्रिकेटर, मीडिया के एक तबके और यहां तक की पहले अंपायर और मैच अधिकारियों द्वारा विरोधी टीम के खिलाफ माहौल बनाने के इस तरीके का जिक्र कई बार मेहमान टीम जिक्र कर चुकी है. ऐसे माहौल तैयार किये जाने का खमियाजा सिर्फ विरोधी टीम और खिलाड़ियों को उठाना पड़ा है, ऐसा नहीं है.


ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट के अंदर भी एक वर्ग के खिलाड़ियों, मैच से जुड़े अधिकारियों को समय-समय पर इस सोच का सामना करना पड़ा है. ऑस्ट्रेलिया के पूर्व टेस्ट क्रिकेटर और पाकिस्तानी मूल के उस्मान ख्वाजा को अनेक बार इस माहौल से गुजरना पड़ा है. विरोधी टीम के खिलाड़ी, यहां तक कि उनके माता-पिता भी मैच के दौरान और बाद में नस्लवादी टिप्पणियां किया करते थे. उस्मान ख्वाजा के साथ क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया के सेलेक्टर्स ने भी कई मर्तबा भेदभाव किया. ऑस्ट्रेलिया के सीनियर टीम के एक और क्रिकेटर डेनियल क्रिश्चियन, जो देशज मूल के हैं, ने भी इसके खिलाफ कई बार खुल कर बोला है.


लेकिन इसके बाद उन्हें ऑनलाइन ट्रोलिंग का शिकार होना पड़ा है़ ऑस्ट्रेलिया के एक और क्रिकेटर एंड्यू साइमंड्स ने एक निजी मुलाकात में कहा था कि उन्हें भी इस सोच का कई बार शिकार होना पड़ा है़ सिडनी में नस्लवाद पर शोध कर रहे एशियाई मूल के एक छात्र ने एक बार मुझसे कहा था कि ऐसी सोच आज भी दुनिया के कई हिस्से और कम या बराबर हर विधा में मौजूद है. लेकिन खेल के मैदान पर वार और पलटवार सार्वजनिक तौर पर दिखता है और दिखाया जाता है.


इस वर्ग, रंग या ऐसे लोग मुझे कैसे हरा सकते हैं- यही सोच इस भयावह बीमारी की मूल वजह बनती है. यदि इस सोच के खिलाफ लड़ना है तो ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट और खेल प्रशासन को उस प्रक्रिया के खिलाफ हमला बोलना होगा जिसे वो माहौल का नाम देते हैं. भारत में भी यह अलग-अलग रूप में सामने आता है़ वेस्टइंडीज के क्रिकेटर डैरेन सैमी ने भी कहा था कि इंडियन प्रीमियर लीग में उन्हें नस्लवादी टिप्पणी का शिकार होना पड़ा था. बीसीसीआइ को भी इस सोच पर करारा प्रहार करने की जरुरत है़


भारतीय क्रिकेट के लिए वह अहम दिन था जब टीम इंडिया के क्रिकेटर एक अलग तरह की जर्सी पहने हुए थे. उनकी जर्सी के पीछे उनका नहीं, उनकी मां का नाम लिखा हुआ था. यह हर मां का इस्तकबाल था जो अपने बच्चे को बेहतर इंसान बनने का संस्कार देती हैं. लेकिन हम इस सोच को उस समय तार-तार कर देते हैं जब आवेश में आकर महिला सूचक गलियों का इस्तेमाल करते हैं. नस्लवाद या किसी वर्गीय भेदभाव को अगर जड़ से मिटाना है तो संकेतों से आगे बढ़कर सोच पर प्रहार जरूरी है.

सौजन्य - प्रभात खबर।

Share:

ट्रंप पर महाभियोग के मायने (प्रभात खबर)

जे सुशील, स्वतंत्र शोधार्थी

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के खिलाफ कांग्रेस में दूसरी बार महाभियोग लगाया गया है. अमेरिका के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है कि किसी राष्ट्रपति के खिलाफ दो बार महाभियोग लगाया गया हो. दो साल पहले जब उनके विरुद्ध महाभियोग चला था, तब आरोप साबित नहीं हुए थे, लेकिन इस बार उनकी ही रिपब्लिकन पार्टी के कई नेताओं ने महाभियोग चलाने का समर्थन किया है. इस बार उन पर आरोप हैं सशस्र विद्रोह के लिए लोगों को भड़काने का.



यह मामला कुछ दिन पहले कैपिटल हिल में प्रदर्शनकारियों के धावा बोलने से जुड़ा हुआ है, जब राष्ट्रपति ट्रंप के आह्वान पर बड़ी संख्या में लोग कैपिटल हिल में घुस आये थे. कैपिटल हिल यानी अमेरिका का संसद भवन, जहां नवंबर के चुनाव में राष्ट्रपति निर्वाचित हुए जो बाइडेन के चुने जाने पर आधिकारिक मुहर लगनेवाली थी. डोनाल्ड ट्रंप चुनाव के बाद से लगातार कहते रहे हैं कि चुनावों में बड़े पैमाने पर धांधली हुई है, जबकि अदालतों और चुनाव से जुड़े अधिकारियों ने धांधली के ऐसे आरोपों को सही नहीं पाया है.



पूरा मामला इतना संगीन है कि कैपिटल हिल पर हमले को लेकर कई गिरफ्तारियां हो चुकी हैं और सौ से अधिक लोगों की खोज की जा रही है. इन पर हमले में शामिल होने के आरोप हैं तथा घटना के वीडियो और तस्वीरों के आधार पर इनकी पहचान करने की कोशिश चल रही है. इस मामले में कैपिटल हिल की सुरक्षा सुनिश्चित करने वाले दो अधिकारियों ने इस्तीफा दे दिया है. ट्रंप प्रशासन से भी कुछ लोगों ने अपना असंतोष व्यक्त करते हुए त्यागपत्र दिया है. अमेरिकी राजनेताओं का एक तबका चाहता है कि इस मामले में ट्रंप को छोड़ा न जाये और उन्हें सजा मिले, लेकिन यह कैसे संभव हो पायेगा, यह अभी स्पष्ट नहीं है.


महाभियोग की प्रक्रिया से पहले प्रतिनिधि सभा में डेमोक्रेटिक पार्टी के सदस्यों ने यह कोशिश भी की थी कि संविधान का 25वां संशोधन लागू हो, जिसके एक प्रावधान के तहत उपराष्ट्रपति चाहे, तो राष्ट्रपति के अधिकार अपने हाथ में ले सकता है. उस स्थिति में यह माना जाता है कि राष्ट्रपति अपने दायित्व को निभाने में सक्षम नहीं हैं. हालांकि इस बारे में प्रतिनिधि सभा में मतदान के बावजूद उपराष्ट्रपति माइक पेंस ने ऐसा फैसला करने से इनकार कर दिया. इसके बाद ही महाभियोग का प्रस्ताव लाया गया, जो अब पारित हो गया है.


महाभियोग के प्रस्ताव पर बहस और वोटिंग अगले हफ्ते ही संभव है और अगले हफ्ते ट्रंप का कार्यकाल भी खत्म हो जायेगा. इसका सीधा मतलब यह है कि ट्रंप को महाभियोग के तहत पद से हटाया नहीं जा सकता है. वे राष्ट्रपति पद से बीस जनवरी को ऐसे भी हट ही जायेंगे क्योंकि उनका कार्यकाल खत्म हो जायेगा.


लेकिन उनके पद से हटने के बाद भी महाभियोग के प्रस्ताव पर बहस होगी और वोटिंग भी. इस वोटिंग में उम्मीद की जा रही है कि सीनेट के कुछ रिपब्लिकन सदस्य भी ट्रंप को दोषी साबित करने के लिए वोट देंगे. महाभियोग प्रस्ताव पारित होने के लिए सीनेट में दो तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है. अगर प्रस्ताव पारित भी हो जाता है तो ट्रंप को पद से हटाना संभव नहीं होगा, लेकिन ये जरूर संभव होगा कि वो आगे किसी भी पद पर नियुक्त नहीं हो सकेंगे.


इसके पीछे यह तर्क भी दिया जा रहा है कि महाभियोग साबित होने पर ट्रंप रिपब्लिकन पार्टी से भी हटाये जायेंगे और वे अगली बार राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव नहीं लड़ पायेंगे. उधर इस समय ट्रंप क्या सोच रहे हैं, यह पहले उनके ट्विटर हैंडल से पता चलता था, जहां वे लगातार ट्वीट करते रहते थे. लेकिन अब ट्रंप को न केवल ट्विटर ने, बल्कि फेसबुक और यूट्यूब ने भी प्रतिबंधित कर दिया है. यह भी सोशल मीडिया में पहली बार हुआ है कि किसी देश के राष्ट्रपति को पूर्ण रूप से प्रतिबंधित कर दिया गया हो.


महाभियोग से पहले राष्ट्रपति ट्रंप ने व्हाइट हाउस के जरिये बयान जारी कर लोगों से अपील की है कि वे किसी भी तरह की हिंसा न करें. यह बयान इस संदर्भ में देखा जा सकता है कि फेडरल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन (एफबीआइ) ने देश के कई राज्यों की संसद पर चढ़ाई किये जाने की आशंका जतायी थी. राजधानी वाशिंगटन अभी भी सुरक्षा के मामले में हाई अलर्ट जैसी स्थिति में ही है, जहां बीस जनवरी को जो बाइडेन राष्ट्रपति पद के लिए शपथ लेनेवाले हैं. बीस जनवरी को राष्ट्रपति के शपथ ग्रहण की सुरक्षा पेंटागन ने अपने हाथ में ले ली है और बताया जाता है कि सुरक्षा के लिए नेशनल गार्ड तैनात किये जायेंगे.


राष्ट्रपति ट्रंप के चार साल के कार्यकाल का अंत जिस तरह से हुआ है, वह किसी भी तरह से एक आदर्श स्थिति तो नहीं कही जा सकती है, पर जो भी हुआ है, उसने कई गंभीर सवाल खड़े किये हैं. मसलन, क्या ट्विटर, फेसबुक या गूगल जैसी कंपनियां किसी राष्ट्राध्यक्ष को अपने प्लेटफॉर्म पर प्रतिबंधित कर सकती हैं? कॉरपोरेट कंपनियों की ताकत पर एक अलग बहस अमेरिका में छिड़ चुकी है. साथ ही, पारंपरिक मीडिया की भूमिका को लेकर भी कई तरह की बातें हो रही हैं.


ट्विटर के प्रमुख जैक डॉरसी ने एक सीरीज में ट्वीट करते हुए न केवल ट्रंप पर पाबंदी लगाने के फैसले को सही बताया है, बल्कि यह भी कहा है कि इस तरह का फैसला लेना कंपनी के लिए अत्यंत कठिन था. जैक के अनुसार, ऐसा फैसला यह भी दर्शाता है कि एक प्लेटफॉर्म के तौर पर ट्विटर समाज में एक स्वस्थ बहस लाने में सफल नहीं रहा है.


दूसरी तरफ, फेसबुक ने ऐसी किसी नैतिक बहस से खुद को दूर रखते हुए कंपनी में सिविल राइट के लिए एक वाइस प्रेसिडेंट नियुक्त किया है. फेसबुक के इस कदम को कंपनी को नयी सरकार के किसी कठोर फैसले से बचने की कवायद के रूप में भी देखा जा रहा है. कई डेमोक्रेट सांसद लगातार फेसबुक की आलोचना करते रहे हैं कि वह गोरे राष्ट्रवादियों को अपनी गलतबयानी और फेक न्यूज फैलाने का मंच देता रहा है.


ट्रंप के कार्यकाल से कई और नैतिक सवाल भी खड़े हुए हैं कि अमेरिका आखिर किसका है. क्या यह गोरे राष्ट्रवादियों का देश है या फिर जैसा कि लगातार एक बड़ा तबका कहता रहा है कि अमेरिका प्रवासियों का देश है, जहां लंबे समय तक दूसरे देशों के लोग आते रहे और अपना भविष्य बनाते रहे. नये राष्ट्रपति जो बाइडेन के सामने कोविड, बेरोजगारी, अर्थव्यवस्था के सवालों को छोड़कर अमेरिका के उच्च नैतिक आदर्शों को भी पुनर्स्थापित करने की चुनौती होगी.

सौजन्य - प्रभात खबर।

Share:

Thursday, January 14, 2021

वित्तीय चुनौतियां (प्रभात खबर)


फंसे हुए कर्ज की बढ़ती मात्रा कई सालों से हमारे बैंकिंग प्रणाली के लिए बड़ी समस्या बनी हुई है. कोरोना महामारी से मंदी की मार झेलती हमारी अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाकर उसे गतिशील बनाने के लिए इस चुनौती का समुचित समाधान करना बहुत जरूरी है. भारतीय रिजर्व बैंक ने चेतावनी दी है कि अगर बैंकों ने गैर निष्पादित परिसंपत्तियों (एनपीए) के निपटारे और वसूली में मुस्तैदी नहीं दिखायी, तो आगामी सितंबर में एनपीए का अनुपात 13.5 फीसदी हो जायेगा, तो सालभर पहले 7.5 फीसदी के स्तर पर था.



अपनी अर्द्धवार्षिक वित्तीय स्थायित्व रिपोर्ट में केंद्रीय बैंक ने यह आशंका भी जतायी है कि यदि एनपीए बढ़त का यह आंकड़ा मार्च, 2022 तक बरकरार रहा, तो 1999 के बाद से यह सबसे खराब स्थिति होगी. महामारी से पैदा हुईं समस्याओं के समाधान के लिए सरकार द्वारा उद्योगों और उद्यमों को विभिन्न प्रकार के राहत मुहैया कराये गये हैं. सरकार की कोशिश है कि बाजार में मांग बढ़े, ताकि उत्पादन में तेजी आये.



इससे रोजगार के अवसर भी पैदा होंगे. उत्पादन और निर्माण के लिए आवश्यक निवेश के लिए बैंकों से धन लेने के लिए भी कारोबारियों को प्रोत्साहित किया जा रहा है. लेकिन एनपीए के दबाव और भावी कर्जों की वसूली को लेकर अनिश्चितता की वजह से बैंकों द्वारा कर्ज देने में हिचकिचाहट देखी जा सकती है. कुछ दिन पहले वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को यह कहना पड़ गया था कि बैंक ग्राहकों को ऋण उपलब्ध कराने में कोताही न बरतें.


उल्लेखनीय है कि बीते कुछ समय से सरकार ने बैंकों को अतिरिक्त पूंजी भी मुहैया करायी है और भविष्य के लिए भी आश्वासन दिया है. ऐसा इसलिए किया गया है कि बैंकों के पास कारोबार के जरूरी पूंजी की कमी न हो. एक प्रकार से यह सरकार के लिए आसान फैसला नहीं है क्योंकि राजस्व में कमी की स्थिति में विभिन्न योजनाओं के लिए इस धन का इस्तेमाल किया जा सकता था.


लेकिन अर्थव्यवस्था में बैंकिंग तंत्र की स्थिति रीढ़ की हड्डी की तरह होती है, इसलिए उनके वित्तीय स्वास्थ्य को ठीक रखना भी जरूरी है. एनपीए बढ़ने की आशंकाएं इसलिए भी मजबूत हुई हैं क्योंकि कोरोना काल के संकट से उद्योग जगत से लेकर छोटे कारोबारियों तक को नुकसान हुआ है.


इससे उनकी चुकौती पर नकारात्मक असर पड़ सकता है. सितंबर, 2020 में बैंकों का पूंजी अनुपात घटकर 15.6 फीसदी रहा था, जो इस साल सितंबर में 14 फीसदी रहने का अनुमान है. खराब वित्तीय स्थिति में यह आंकड़ा 12.5 फीसदी भी हो सकता है.


वैसी स्थिति में नौ बैंक कम से कम नौ फीसदी पूंजी अनुपात रखने की शर्त से नीचे चले जायेंगे. ऐसा होना बैंकिंग सेक्टर के लिए भारी संकट होगा. अर्थव्यवस्था में सुधार से उम्मीदें जरूर बढ़ी हैं, लेकिन शेयर बाजार की लगातार बड़ी उछाल ने भी रिजर्व बैंक को चिंतित कर दिया है क्योंकि यह वास्तविक आर्थिक व वित्तीय स्थिति को प्रतिबिंबित नहीं करता है.

सौजन्य - प्रभात खबर।

Share:

भारतीय संस्कृति में सूर्य का महत्व (प्रभात खबर)

प्रमोद भार्गव, लेखक व पत्रकार

आमतौर पर सूर्य को प्रकाश और गर्मी का अक्षुण्ण स्रोत माना जाता है. लेकिन अब वैज्ञानिक जान गये हैं कि सूर्य का अस्तित्व समाप्त होने पर पृथ्वी पर विचरण करने वाले सभी जीव-जंतु तीन दिन के भीतर मृत्यु को प्राप्त हो जायेंगे. सूर्य के हमेशा के लिए अंधकार में डूबने से वायुमंडल में मौजूद समूची जलवाष्प ठंडी होकर बर्फ बन गिर जायेगी और कोई भी प्राणी जीवित नहीं रह पायेगा.



करीब 50 करोड़ वर्ष पहले से प्रकाशमान सूर्य की प्राणदायिनी उर्जा की रहस्य-शक्ति को हमारे ऋषि-मुनियों ने पांच हजार वर्ष पहले ही जान लिया था और ऋग्वेद में लिख गये थे, ‘आप्रा द्यावा पृथिवी अंतरिक्षः सूर्य आत्मा जगतस्थश्च.’ अर्थात विश्व की चर तथा अचर वस्तुओं की आत्मा सूर्य ही है. ऋग्वेद के मंत्र में सूर्य का आध्यात्मिक और वैज्ञानिक महत्व उल्लिखित है. हमारे ऋषियों ने हजारों वर्ष पहले जिस सत्य का अनुभव किया था, उसकी विज्ञान सम्मत पुष्टि अब 21वीं सदी में हो रही है.



सौरमंडल के सौर ग्रह, उपग्रह और उसमें स्थित जीवधारी सूर्य से ही जीवन प्राप्त कर रहे हैं. पृथ्वी पर जीवन का आधार सूर्य है. सभी जीव-जंतु और वनस्पति जगत का जीवन चक्र पूर्ण रूप से सूर्य पर आश्रित है. काल गणना का दिशा बोध भी मनुष्य को सूर्य ने ही दिया. इसलिए दुनिया की सभी जातियों और सभ्यताओं ने सूर्य को देवता के रूप में पूजा. भारतीय परिप्रेक्ष्य में, वैदिक काल में ज्ञान और प्रकाश के एकीकरण के लिए सूर्योपासना की जाती थी.


तैत्रिय-संहिता में उल्लेख है कि सूर्य के प्रकाश से ही चंद्रमा चमकता है. छांदोग्य उपनिषद में सूर्य को ब्रह्म बताया गया है. गायत्री मंत्र में सूर्य को तेज और बुद्धि का पर्याय माना गया है. सूर्य की किरणों से चिकित्सा पर कई पुस्तकें लिखी गयी हैं. यजुर्वेद में स्पष्ट कहा गया है कि अंतरिक्ष में व्याप्त सभी विकिरणों में सूर्य की किरणें ही जीव जगत के लिए लाभदायी हैं.


वैदिक रूप में सूर्य को काल गणना का कारण मान लिया गया था. ऋतुओं में परिवर्तन का कारण भी सूर्य को माना गया. वैदिक समय में ऋतुचक्र के आधार पर सौर वर्ष या प्रकाश वर्ष की गणना शुरू हो गयी थी, जिसमें एक वर्ष में 360 दिन रखे गये. वर्ष को वैदिक ग्रंथों में संवत्सर नाम से जाना जाता है. नक्षत्र, वार और ग्रहों के छह महीने तक सूर्योदय उत्तर-पूर्व क्षितिज से, अगले छह महीने दक्षिण पूर्व क्षितिज से होता है. इसलिए सूर्य का काल विभाजन उत्तरायण और दक्षिणायन के रूप में है. उत्तरायण के शुरू होने के दिन से ही रातें छोटी और दिन बड़े होने लगते हैं.


यही दिन मकर तथा कर्क राशि से सूर्य को जोड़ता है. इसलिए इस दिन भारत में मकर-संक्रांति का पर्व मनाने की परंपरा है. वेदकाल में जान लिया गया था कि प्रकाश, ऊर्जा, वायु और वर्ष के लिए समस्त भूमंडल सूर्य पर ही निर्भर है. वेदकालीन सूर्य में सात प्रकार की किरणें और सूर्य रथ में सात घोड़ों के जुते होने का उल्लेख है. सात प्रकार की किरणों को खोजने में आधुनिक वैज्ञानिक भी लगे हैं. नये शोधों से ज्ञात हुआ है कि सूर्य किरणों के अदृश्य हिस्से में अवरक्त और पराबैंगनी किरणें होती हैं.


भूमंडल को गर्म रखने और जैव रासायनिक क्रियाओं को छिप्र रखने का कार्य अवरक्त किरणें और जीवधारियों के शरीर में रोग प्रतिरोधात्मक क्षमता बढ़ाने का काम पराबैंगनी किरणें करती हैं. दुनिया के सबसे बड़े मेले सिंहस्थ और कुंभ भी सूर्य के एक निश्चित स्थिति में आने पर ही लगते हैं. सिंहस्थ का पर्व तब मनाया जाता है, जब सूर्य सिंह राशि में आता है. वैदिक ग्रंथों के अनुसार, देव और दानवों ने समुद्र मंथन के दौरान अमृत कलश प्राप्त किया था, इसे लेकर विवाद हुआ था.


तब विष्णु ने सुंदरी रूप धरकर देवताओं को अमृत और दानवों को मदिरा पान कराया. राहु ने यह बात पकड़ ली. वह अमृत कलश लेकर भागा. विष्णु ने सुदर्शन चक्र छोड़कर राहु का सिर धड़ से अलग कर दिया. इस छीना-झपटी में जहां-जहां अमृत की बूंदें गिरीं, वहां-वहां सिंहस्थ और कुंभ के मेले लगने लगे. इस वैदिक घटना को वैज्ञानिक संदर्भ में भी देखा जा रहा है.


प्रसिद्ध वैज्ञानिक डाॅ राम श्रीवास्तव का कहना है कि हमारे सौरमंडल में एमएस 403 का एक तारा है. यह हमारे सूर्य से दस हजार गुना बड़ा सूर्य है. इसे एक ब्लैक होल निगल रहा है और यह छूटकर भागने के लिए ब्लैक होल के चारों ओर चक्कर काट रहा है. इस पूरी प्रक्रिया में एमएस 433 के दोनों ओर से अतिशबाजी निकल रही है. वैज्ञानिकों ने जब इसके प्रकाश का परीक्षण किया, तो पाया कि 433 में ऐसे अनेक तत्व हैं, जिन्हें हमारा विज्ञान आज भी नहीं पहचानता. ऐसे तत्व अन्य किसी तारे में मौजूद नहीं हैं.


यह भी एक विचित्र संयोग है कि जब सिंहस्थ का मेला लगता है, तो एसएस 433 सूर्य के साथ सिंह राशि के बीचो-बीच स्थित रहता है और सिंहस्थ व कुंभ स्नान के समय इससे निकलने वाला प्रकाश तथा आतिशबाजी सीधे पृथ्वी की ओर इंगित रहते हैं.


करीब छह हजार वर्ष पहले किये गये एक पूर्ण सूर्यग्रहण के अध्ययन से अनुमान लगाया गया कि दो धुरियां हैं, पहली, जिस पर धरती घूमती है और सूर्य का चक्कर लगाती है. दूसरी, जिस पर चंद्रमा धरती का चक्कर लगाता है. जिन बिंदुओं पर आकर वे एक-दूसरे से मिलते हैं, उन्हें राहु और केतु कहा जाता है. ग्रहण का प्रभाव तभी सामने आता है जब सूर्य और चंद्रमा एक सीध में आकर निकट से निकलते हैं.

सौजन्य - प्रभात खबर।

Share:

व्हाट्सएप और निजी डाटा सुरक्षा (प्रभात खबर)

पीयूष पांडे, सोशल मीडिया विश्लेषक

व्हाट्सएप ने उपयोगकर्ताओं का डाटा साझा करने से संबंधित नीतियों में जो बदलाव किया है, वह चिंताजनक जरूर है क्योंकि इसमें उसके डाटा को दूसरे प्लेटफॉर्म को देने का प्रावधान है. लेकिन यह चिंता उस स्तर की नहीं है, जितना शोर मचाया जा रहा है. व्हाट्सएप ने स्पष्ट किया है कि जो सामान्य यूजर हैं, उनके दोस्तों और परिजनों से होनेवाली चैट को व्यापारिक उद्देश्यों के लिए साझा नहीं किया जायेगा.



यहां सवाल व्हाट्सएप का नहीं है, बल्कि यह है कि क्या लोग वास्तव में अपनी निजता को लेकर चिंतित है. सवाल यह है कि क्या आपने किसी एप को डाउनलोड करते समय उसकी निजता नीति को ठीक से पढ़ा है या किसी एप की नीति से चिंतित होकर उसे आपने डिलीट किया है. बीते दशक में कई बार ऐसे मौके आये हैं, जब निजता नीति को लेकर शोर मचा है. साल 2011 में जब फेसबुक ने अपनी नीतियों को बदला था, तब भी सवाल उठाये गये थे.



हमें यह समझना होगा कि जब आप किसी एप की सेवा के लिए कोई भुगतान नहीं कर रहे हैं, तो आप स्वयं एक उत्पाद के रूप में इस्तेमाल होते हैं. प्रश्न यह है कि उन कंपनियों की सेवा के एवज में आप उन्हें क्या दे रहे हैं, तो आप अपना डाटा यानी अपनी सूचनाएं दे रहे हैं और उस डाटा का वैश्विक व्यापार है, इसमें कोई संदेह नहीं है. इसी व्यापार के बाजार के आधार पर फेसबुक, गूगल, इंस्टाग्राम जैसी कंपनियों का राजस्व अरबों-खरबों डॉलर में है.


फेसबुक के पास ही लगभग 70 बिलियन डॉलर का राजस्व है. जब फेसबुक को व्हाट्सएप से तगड़ी चुनौती मिली थी, तब फेसबुक ने इसे बहुत महंगे दाम में खरीद लिया था. गूगल भी इसे खरीदने का इच्छुक था. चूंकि सारा खेल अधिक से अधिक डाटा जुटाने का है, इसलिए फेसबुक ने अधिक कीमत दी. डाटा के इस्तेमाल के द्वारा सभी कंपनियां टारगेटेड विज्ञापन देना चाहती हैं. व्यक्ति की जरूरत और दिलचस्पी के हिसाब से उसे विज्ञापन देने की कोशिश होती है, ताकि वह उत्पाद या सेवा खरीदे. यह पूरी दुनिया में हो रहा है.


अब निजता को लेकर जो चिंताएं व्यक्त की जा रही हैं, ऐसा इसलिए है कि लोगों को डाटा के दुरुपयोग की आशंका है. कंपनियों के पास यूजर का जो डाटा है, उनका इस्तेमाल कैसे और कहां होगा, इसकी गारंटी कोई नहीं ले सकता है. इंटरनेट की दुनिया बहुत अलग तरह से काम करती है. यदि कंपनियां केवल विज्ञापन या वस्तुओं व सेवाओं की खरीद-बिक्री के लिए डाटा का इस्तेमाल कर रही हैं, उसे तो स्वीकार किया जा सकता है, लेकिन हैकर इस डाटा का इस्तेमाल दूसरे तरीके से कर सकते हैं और करते भी हैं.


हमारे देश में ही इंटरनेट धोखाधड़ी, फर्जीवाड़े और डाटा चोरी के मामले बीते कुछ सालों में बड़ी तेजी से बढ़े हैं. डाटा का गलत इस्तेमाल कर राष्ट्रीय सुरक्षा को नुकसान पहुंचाया जा सकता है. कुछ समय पहले अमेरिका में प्रिज्म नामक एक कार्यक्रम चलाया जाता था. इसके तहत सोशल मीडिया की एजेंसियों से लोगों का सारा डाटा जुटाया जाता था. फेसबुक, गूगल, ट्विटर आदि की वजह से उस कार्यक्रम के पास सारी सूचनाएं थीं.


उस समय विकीलीक्स के संस्थापक जूलियन असांज ने एक साक्षात्कार में कहा था कि फेसबुक, याहू, गूगल जैसी तमाम कंपनियां खुफिया एजेंसियों के लिए सबसे बेहतरीन जासूसी मशीन हैं क्योंकि इनसे सारा डाटा बैठे-बिठाये मिल जाता है कि कौन कहां जा रहा है, कौन क्या लिख-पढ़ रहा है, क्या खरीद रहा है आदि. उस विवाद के बाद इन कंपनियों को सफाई देनी पड़ी थी, किंतु यह सच है कि प्रिज्म के जरिये अमेरिकी खुफिया एजेंसियों के पास सारी जानकारियां हैं.


भारत में भी ऐसी स्थिति बन सकती है क्योंकि हमारे देश में साइबर कानून बहुत कमजोर हैं. साल 2001 में जो सूचना तकनीक से संबंधित कानून बने थे, उसमें एक-दो बार ही मामूली संशोधन हुए हैं. ऐसे में निजता और डाटा सुरक्षा को लेकर चुनौतियां बहुत बढ़ गयी हैं. मौजूदा कानूनों में आज और आगे की जरूरतों के मुताबिक समुचित संशोधन करने की बड़ी जरूरत है.


हमारे नीति-निर्धारकों और राजनीतिक नेतृत्व में सूचना तकनीक व सुरक्षा से जुड़े सवालों की कोई खास चिंता नहीं है. निजी डाटा सुरक्षा विधेयक लंबे समय से लंबित है और उसे कानूनी रूप देने को लेकर सक्रियता नहीं दिखती है. यदि यह विधेयक पारित हो जाता, तो सोशल मीडिया, मैसेजिंग एप और इंटरनेट सेवाप्रदाताओं पर कुछ कड़े प्रावधान लागू हो जाते तथा निजता को लेकर हमारी आशंकाएं बहुत हद तक कम हो जातीं.


वैसी स्थिति में व्हाट्सएप या अन्य एप अपनी नीतियों में मनमाने बदलाव नहीं कर पाते. सोशल मीडिया के प्लेटफॉर्म एक पैकेज की तरह हैं, जिनका सकारात्मक पहलू भी है और नकारात्मक भी. इन मंचों के उचित इस्तेमाल से बड़ी संख्या में लोग एक-दूसरे से जुड़े हैं तथा उनके काम और कारोबार का दायरा बढ़ा है. नुकसान यह है कि अब अफवाहों को पंख लगने में देर नहीं लगती, झूठी व गलत बातों को बिना जांचे-परखे लोग आगे बढ़ा देते हैं.


एक दिक्कत तो यह है कि लोग सचेत नहीं हैं और सोशल मीडिया पर कही-लिखी बातों पर आंख मूंद कर भरोसा कर लेते हैं तथा उन बातों को दूसरे लोगों तक पहुंचाने लगते हैं. सोशल मीडिया पर अपनी सक्रियता की जवाबदेही को लेकर बहुत सारे लोग लापरवाह रहते हैं. दूसरी बात यह है कि सूचना तकनीक से संबंधित कानून कमजोर हैं. इसी वजह से अधिकतर मामलों में कार्रवाई नहीं हो पाती. इसका फायदा सोशल मीडिया कंपनियों को भी होता है. तीसरी बात यह है कि इन कानूनों को लागू करनेवाली एजेंसियां और उनके अधिकारी न तो सोशल मीडिया के हिसाब को ठीक से समझते हैं और न ही मौजूदा कानूनी प्रावधानों को.


अगर किसी छोटे कस्बे में सूचना तकनीक या डाटा सुरक्षा से जुड़ा कोई मामला सामने आता है, तो वहां की स्थानीय पुलिस के पास आवश्यक प्रशिक्षण और संसाधनों की कमी के कारण उसकी सही जांच हो पाना मुश्किल है. सोशल मीडिया का इस्तेमाल करनेवाले लोगों की बड़ी भारी तादाद के अनुपात में हमारे पास अधिकारी भी नहीं हैं. भारत में फेसबुक के 50 करोड़ से अधिक यूजर हैं.


ऐसा ही व्हाट्सएप के साथ है. जीमेल के यूजर तो इससे भी अधिक हो सकते हैं. करीब दो साल पहले दिल्ली में सूचना तकनीक के मामलों के लिए अलग अदालत बनायी गयी थी, लेकिन छह महीने बीत जाने के बाद भी वहां एक भी मामले सुनवाई पूरी नहीं हो सकी थी. ये समस्याएं निजता और डाटा सुरक्षा तथा सोशल मीडिया के दुरुपयोग के मसले को और अधिक जटिल बना देती हैं.

सौजन्य - प्रभात खबर।

Share:

Wednesday, January 13, 2021

बर्ड फ्लू का कहर (प्रभात खबर)

देश के दस राज्यों- उत्तर प्रदेश, केरल, राजस्थान, मध्य प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, गुजरात, दिल्ली, महाराष्ट्र और उत्तराखंड- में फैले बर्ड फ्लू (एवियन इंफ्लूएंजा) महामारी से लाखों पक्षियों की मौत हो चुकी है. कई जगहों पर पॉल्ट्री फॉर्मों, पार्कों, तालाबों आदि को बंद कर दिया गया है तथा बड़ी तादाद में मुर्गियों और बतखों को मारने की योजना बन रही हैं. हमारे देश में पहली बार यह महामारी 2006 में फैली थी. बर्ड फ्लू के वायरस दुनिया में सदियों से मौजूद हैं, लेकिन बीती सदी में चार बड़े प्रकोपों के मामले सामने आये थे.

वायरस के चिड़ियों से मनुष्यों में फैलने का कोई मामला अभी तक प्रकाश में नहीं आया है, लेकिन प्रशासनिक स्तर पर समुचित निगरानी रखी जा रही है. अन्य राज्य भी सतर्क हैं. पाबंदियों और लोगों में डर के कारण पॉल्ट्री उत्पादों की खपत में गिरावट से आर्थिक नुकसान का सिलसिला भी शुरू हो गया है. अभी कोरोना संकट टला भी नहीं है कि यह नयी मुसीबत आ गयी है. बड़ी संख्या में पक्षियों की मौत पर्यावरण, जैव विविधता और पारिस्थितिकी के लिए भी चिंताजनक है.

भारत समेत समूची दुनिया जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से जूझ रही है. ऐसे में मनुष्य और पशु-पक्षियों में किसी भी महामारी का फैलना एक गंभीर समस्या है. बर्ड फ्लू के बढ़ते कहर को देखते हुए कृषि से संबंधित संसद की स्थायी समिति ने पशुपालन मंत्रालय को जानवरों के टीके की उपलब्धता सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है. केंद्र सरकार ने राज्यों से कहा है कि पक्षियों को मारने के दौरान समुचित सुरक्षा व्यवस्था रहनी चाहिए.

उल्लेखनीय है कि इस फ्लू का वायरस मुख्य रूप से सितंबर से मार्च के बीच आनेवाले प्रवासी पक्षियों के जरिये देश में आता है. इन पक्षियों से स्थानीय पंक्षी संक्रमित होते हैं. जानकारों के मुताबिक, इस वायरस के मनुष्यों के संपर्क में आने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता है. इस कारण समुचित सतर्कता बरतना जरूरी है. लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं है कि पक्षियों की इस महामारी से हम बहुत अधिक भयभीत हो जाएं.

अफवाहों और अपुष्ट सूचनाओं से भी हमें सावधान रहना चाहिए. हमें विशेषज्ञों और सरकारी निर्देशों के अनुसार इस स्थिति का सामना करना चाहिए. सरकार ने कहा है कि पॉल्ट्री बंद करने या चिकेन खाने से परहेज की कोई जरूरत नहीं होनी चाहिए. यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि मांस व अंडा ठीक से पकाया जाये क्योंकि अधिक तापमान पर वायरस खत्म हो जाता है.

कच्चा या अधपका अंडा व मांस नहीं खाना चाहिए. इस संक्रमण के लक्षणों, जैसे गले में खरास, बुखार, दर्द, खांसी आदि, के बारे में जागरुकता का प्रसार होना चाहिए. यह वायरस शिशुओं, बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं, प्रसूताओं तथा गंभीर बीमारियों से ग्रस्त लोगों को निशाना बना सकता है. संक्रमण प्रभावित क्षेत्रों में ऐसे लोग सचेत रहें. बेचैन होने की जगह हमें बचाव पर ध्यान देना चाहिए.

सौजन्य - प्रभात खबर।

Share:

ऊर्जा केंद्रित हो शहर नियोजन (प्रभात खबर)

अरविंद मिश्रा, ऊर्जा विशेषज्ञ


देश के 400 से अधिक गैर महानगरीय व छोटे शहरों में सीएनजी गैस पाइपलाइन बिछाने का काम प्रगति पर है. कोरोना के अदृश्य विषाणु पर सवार वर्ष 2020 ने हमारी नीतियों एवं बुनियादी अधोसंरचनाओं की ताकत तथा कमजोरी दोनों की वस्तुस्थिति से अवगत कराया है तथा हमारे शहरों को नये सिरे से संवारने का संदेश दिया है. नये दशक में प्रवेश करते हुए हमें शहरीकरण की चुनौतियों के समाधान के साथ शहरों को समावेशी विकास के मानकों पर खरा उतरने में सक्षम बनाना होगा.



ऊर्जा ही वह संसाधन है, जिस पर लगभग हर छोटी-बड़ी मानवीय गतिविधि टिकी होती है. पिछले दो दशक में भारत में शहरीकरण अभूतपूर्व रफ्तार से बढ़ा है. विश्व आर्थिक मंच ने हालिया रिपोर्ट में फिर दोहराया है कि कई वर्षों तक भारत के विकास की धुरी शहर बने रहेंगे. संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2050 तक भारत की आधी आबादी शहर केंद्रित हो जायेगी.



यही कारण है कि शहरी नियोजन वर्तमान में केंद्र सरकार की प्राथमिकताओं में है. साल 2004 से 2014 के बीच 1.57 लाख करोड़ रुपये शहरी नियोजन में खर्च किये गये, जबकि पिछले छह साल में ही 10.57 लाख करोड़ का भारी भरकम बजट शहरों को व्यवस्थित करने में खर्च किया जा चुका है. शहरीकरण के विस्तार के साथ ऊर्जा की मांग बढ़ेगी. वह भी तब, जब हम विश्व में ऊर्जा के चौथे बड़े उपभोक्ता हैं.


ऐसे में नीति नियोजकों को ऊर्जा आपूर्ति के साथ पर्यावरणीय संतुलन बनाये रखने की दोहरी जिम्मेदारी को साधना होगा. यह दायित्व बोध यूरोप में 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में शुरू हुए गार्डन सिटी मूवमेंट की याद दिलाता है. उस अभियान के अंतर्गत यूरोप और अमेरिका में पर्यावरण अनुकूल और ऊर्जा की आत्मनिर्भरता से युक्त शहर बसाये गये. इसी ऊर्जा आत्मनिर्भरता की ओर भारत गैस आधारित अर्थव्यवस्था के जरिये धीरे-धीरे कदम बढ़ा रहा है. देश में सीएनजी नेटवर्क का तेजी से विस्तार हो रहा है.


यह प्रस्तावित विस्तार वहां के ऊर्जा अर्थशास्त्र के साथ सामाजिक जीवन को भी स्पंदित कर रहा है. लेकिन इसके लिए हमारे छोटे शहर और वहां के स्थानीय निकाय कितने तैयार हैं, इसकी समीक्षा करनी होगी. शहरी नियोजन के जानकारों के मुताबिक, ऊर्जा आत्मनिर्भरता के प्रयास शहरों की मौजूदा बुनियादी अवसंरचना को व्यवस्थित किये बिना संभव नहीं हैं.


आज शायद ही कोई ऐसा शहर हो, जहां अवैध कॉलोनियां और अतिक्रमण की गंभीर चुनौती मौजूद न हो. चंड़ीगढ़, बंेगलुरु, गांधीनगर, पंचकुला, जमशेदपुर, गौतमबुद्ध नगर और नवी मुंबई जैसे शहरों में ऊर्जा की उपलब्धता और उसमें अक्षय ऊर्जा की भागीदारी एक अनुकरणीय पहल है. इन शहरों में जगह की भले ही कमी हो, लेकिन किसी भी कम जनसंख्या घनत्व वाले शहर के मुकाबले यहां अधिक हरित क्षेत्र मौजूद है.


शहरों को ऊर्जा सुरक्षा प्रदान करने के लिए अन्य योजनाओं में भी व्यापक पैमाने पर निवेश करना होगा. इससे रोजगार के मौके भी बढ़ेंगे. सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में इस संबंध में कई अहम निर्णय लिये हैं. केंद्र सरकार ने 2030 तक अर्थव्यवस्था में प्राकृतिक गैस की हिस्सेदारी 6.2 प्रतिशत से बढ़ाकर 15 प्रतिशत करने का लक्ष्य रखा है.


साल 2016 में प्रारंभ हुई ऊर्जा गंगा जैसी परियोजनाएं इस लक्ष्य को हासिल करने में सहायक सिद्ध होंगी, बशर्ते छोटे शहरों की बुनियादी आधारभूत संरचना विशाल ऊर्जा परियोजनाओं को अंगीकार करने योग्य हों. हाल ही में बंगाल के उत्तर 24 परगना जिले में स्थापित राज्य का पहला तेल एवं गैस रिजर्व राष्ट्र को समर्पित किया गया है. शहरी गैस वितरण प्रणाली के अतिरिक्त शहरों को ऊर्जा नियोजन हेतु ठोस अपशिष्ट से बायोमास बनाने की योजना को लोकप्रिय बनाना होगा. महाराष्ट्र और गुजरात में कई सहकारी समितियों ने ग्रामीण और शहरी इलाकों में सफलतापूर्वक संयंत्र स्थापित कर ऊर्जा आत्मनिर्भरता की ओर कदम बढ़ाया है.


गांव में गोबर गैस प्लांट की तर्ज पर शहरों में किचने वेस्ट से ही रसोई गैस तैयार करने की तकनीक को प्रोत्साहित करें, तो शहरों की शक्ल और सूरत बदलते देर नहीं लगेगी. शहरों को ऊर्जा में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में कई देश तेजी से कदम बढ़ा रहे हैं. ब्रिटेन और जर्मनी जैसी महाशक्तियां ही नहीं, तेल से संपन्न सऊदी अरब जैसे देश भी प्रभावी पहल कर रहे हैं.


सऊदी अरब में तो बकायदा नियोम नामक एक ऐसा शहर बसने जा रहा है, जो हाइड्रोजन इकोनॉमी और अक्षय ऊर्जा संसाधनों से पूरी तरह आत्मनिर्भर होगा. कार्बन मुक्त ईंधन हमारे शहरों में एक नयी परिवहन क्रांति ला सकते हैं. केंद्र सरकार इसी क्रम में ग्रीन सिटी की अवधारणा को भी प्रोत्साहित कर रही है. कोरोना काल के बीच जुलाई में मध्यप्रदेश के रीवा और गुजरात के कच्छ में सौर ऊर्जा की वैश्विक परियोजनाएं राष्ट्र को समर्पित की गयी हैं.


विकास की कोई भी योजना आर्थिक संसाधनों के बिना सफल नहीं हो सकती है. हाल में देश के नौ बड़े नगर निगमों ने म्युनिसिपल बॉन्ड जारी करने की पहल की है. इससे छोटे शहर ऊर्जा समेत अपनी दूसरी बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए आर्थिक संसाधन जुटा सकेंगे. यदि हम शहरों का नियोजन करते समय ऊर्जा के विविध रूपों की स्थानीय स्तर पर उत्पादकता के साथ उपलब्धता के प्रयासों को प्राथमिकता देंगे, तो इसका लाभ शहर ही नहीं, हमारी भावी पीढ़ियों के साथ पर्यावरण को भी मिलेगा.


सौजन्य - प्रभात खबर।

Share:

पाकिस्तानी इशारे पर चीन का वीटो (प्रभात खबर)

अशोक मेहता, मेजर जनरल (सेवानिवृत)


चीन ने एक बार फिर संयुक्त राष्ट्र की महत्वपूर्ण इकाई सुरक्षा परिषद में भारत की राह में रोड़े अटकाने का प्रयास किया है. उसने भारत को आतंकवाद, आतंकी गिरोह अल कायदा और उससे जुड़े समूहों पर बनी एक सब्सिडियरी कमिटी का अध्यक्ष बनने से रोक दिया है. यदि भारत इस कमिटी का अध्यक्ष बनता, तो उसे कई तरह के लाभ होते. सबसे पहली बात तो यही है कि किसी भी तरह की कमिटी का अध्यक्ष बनने से उस देश की हैसियत बढ़ती है.



सो, भारत का असर भी बढ़ता. अल कायदा सैंक्शंस कमिटी का अध्यक्ष बनने का सबसे बड़ा लाभ भारत को यह होता कि वह उससे जुड़े किसी भी व्यक्ति को आतंकवादी के रूप में नामित कर सकता था और उस पर पाबंदी लगाने की प्रक्रिया की शुरुआत कर सकता था. एक कमिटी का अध्यक्ष बनने के बाद उस देश को किसी को भी वैश्विक आतंकवादी घोषित करने का अधिकार मिल जाता है, उसे ऐसा करने की अनुमति होती है.



ऐसा होना किसी भी देश के लिए बड़ी बात होती है. इससे पहले भी जब मसूद अजहर को आतंकवादी घोषित करना था, तो तीन बार चीन ने सैंक्शंस कमिटी में वीटो के अपने विशेषाधिकार का इस्तेमाल कर उस पर रोक लगा दी थी. आखिर में जब अमेरिका ने कोशिश की और दबाव डाला, तब मसूद अजहर को आतंकवादी घोषित किया गया.


चीन द्वारा अल कायदा सैंक्शंस कमिटी का अध्यक्ष बनने से भारत को रोकने के पीछे पाकिस्तान का बहुत बड़ा हाथ है. यह बात एकदम स्पष्ट है कि पाकिस्तान के कहने पर ही चीन ने भारत के रास्ते में अड़ंगा डाला है और कमिटी का अध्यक्ष नहीं बनने दिया है. दूसरी बात यह है कि जब से लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर भारत और चीन के बीच तनाव पैदा हुआ है, भारत और चीन दोनों का रवैया भी बदल गया है.


हालांकि यह कोई विशेष आश्चर्य वाली बात नहीं है. सच तो यह है कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के जो पांच स्थायी सदस्य देश हैं, उनके पास किसी को भी अध्यक्ष बनने से रोकने का विशेष अधिकार है और स्थायी सदस्य होने के नाते चीन ने भारत के साथ यही किया है. इसके अतिरिक्त, एक कमिटी लीबिया के ऊपर और एक तालिबान सैंक्शंस पर भी है, लेकिन भारत को इन दोनों कमिटियों का अध्यक्ष बनने से रोकने की कोशिश चीन ने नहीं की है.


इन दोनों कमिटियों का अध्यक्ष भारत होगा. लेकिन अल कायदा सैंक्शंस कमिटी, जिसका अध्यक्ष बनना भारत चाह रहा था, उसमें चीन ने बाधा डाल दिया है. सो, भारत अब इस कमिटी का अध्यक्ष नहीं होगा. इस कमिटी की अध्यक्षता अब नाॅर्वे कर रहा है. अब जब नाॅर्वे इस कमिटी की अध्यक्षता करेगा, तो किसी को आतंकवादी घोषित करने या नहीं करने का अधिकार अब उसके पास है. लेकिन भारत नाॅर्वे पर प्रभाव डालने की कोशिश अवश्य करेगा, यह कहा जा सकता है. चूंकि भारत के पास अधिकार नहीं है, ऐसे में उसके लिए मौका भी कम ही होगा.


मसूद अजहर को आतंकवादी घोषित करने को लेकर चीन पर जब अमेरिका ने दबाव बनाया और दबाव के कारण उसे मसूद अजहर को बेमन से आतंकवादी घोषित करना पड़ा, उसे चीन आज तक भूल नहीं पाया है. अपने अहं को पहुंची चोट का बदला एक तरीके से चीन ने भारत को अल कायदा कमिटी का अध्यक्ष बनने से रोक कर लिया है. चीन को लगता है कि भारत के कहने पर ही अमेरिका ने उस पर दबाव बनाया था.


कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि भारत-चीन के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा पर तनाव, चीन-पाकिस्तान का मिलाप और मसूद अजहर को दबाव में आतंकवादी घोषित करना ही भारत को अध्यक्ष बनने से रोकने के प्रमुख कारण हैं. चीन के इस कदम का एक और कारण तालिबान को खुश करना भी हो सकता है क्योंकि तालिबान के साथ उसके अच्छे संबंध हैं. जहां तक अल कायदा के साथ चीन के ताल्लुक की बात है, तो उसके साथ उसका कोई ताल्लुक नजर नहीं आता है.


चीन के इस कदम से स्पष्ट है कि भारत को उसके साथ केवल सीमा विवाद को लेकर ही नहीं, बल्कि व्यापक अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और रणनीति के स्तर पर भी लड़ना होगा. इसके लिए भारतीय नेतृत्व को सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों के साथ व्यापक साझेदारी बनानी पड़ेगी. हालांकि इस समय चीन और रूस दोनों ही एक तरफ हैं. ऐसी स्थिति में हर हाल में रूस चीन का ही समर्थन करेगा और उसका साथ देगा. लेकिन परिषद के अन्य तीन स्थायी सदस्यों- फ्रांस, ब्रिटेन और अमेरिका- के साथ भारत को अपना सहकार बढ़ाना पड़ेगा और उसमें मजबूती लानी पड़ेगी.


पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की समस्या यह है कि यदि कोई भी स्थायी सदस्य देश किसी मुद्दे पर ना कर दे, तो उस पर आगे बढ़ना बहुत मुश्किल हो जाता है. इन तकनीकी दिक्कतों के बावजूद भारत को उपरोक्त तीनों देशों के साथ परस्पर कूटनीतिक समझ को मजबूती देनी होगी. एक जरूरी बात और है कि न सिर्फ सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों के साथ, बल्कि संयुक्त राष्ट्र महासभा के सदस्य देशों के साथ भी भारत को अपने संबंधों को ठोस बनाना होगा. हालांकि यह सच है कि इस विश्व संस्था में सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य ही निभाते हैं और उनका प्रभाव ही सबसे ज्यादा कारगर होता है.


लेकिन अन्य देशों के साथ ठोस आपसी समझ के आधार पर भारत दबाव बनाने की स्थिति में आ सकता है. जहां तक यह प्रश्न है कि आखिर चीन कब तक भारत की राह में रोड़े अटकाता रहेगा और भारत से उलझता रहेगा, तो इसका सीध उत्तर है कि चीन के साथ भारत का यह तनाव अब स्थायी हो गया है. जब भी जलवायु परिवर्तन, वैश्विक गवर्नेंस या कोविड जैसे मामलों को छोड़कर कूटनीति, राजनीति, सुरक्षा आदि की बात होगी, तो उसमें चीन भारत के लिए समस्याएं खड़ी करेगा.


इसे हमें स्थायी चुनौती मानकर चलना होगा. चीन के ऐसा करने के पीछे की मंशा भारत को आगे बढ़ने और एक शक्तिशाली देश बनने से रोकना है. उनका पहले से ही यह मुद्दा रहा है कि भारत विकास की दौड़ में उससे आगे न निकलने पाये. उसकी प्रतिस्पर्धा केवल अमेरिका के साथ नहीं है, एशिया में उसकी प्रतिस्पर्धा भारत के साथ है. वह किसी भी कीमत पर भारत को एशिया का सबसे शक्तिशाली देश नहीं बनने देना चाहता है. इसीलिए जब भी मौका मिलता है, वह भारत की राह बाधित करने का प्रयास करता है.


सौजन्य - प्रभात खबर।

Share:

Tuesday, January 12, 2021

बेहतर हो स्वास्थ्य सेवा (प्रभात खबर)

कुछ दिन पहले एक संसदीय समिति ने रेखांकित किया था कि अगर कोरोना वायरस के संक्रमण के उपचार के लिए निजी अस्पतालों ने अपने दरवाजे पहले खोल देते और उपचार के एवज में बड़ी रकम की मांग नहीं रखते, तो कई लोगों को मरने से बचाया जा सकता था. उल्लेखनीय है कि महामारी के शुरुआती दिनों में सस्ते जांच और उपचार मुहैया करने के लिए अदालतों तक को दखल देना पड़ा था. इस महामारी ने यह भी इंगित किया है कि न केवल शहरों में, बल्कि ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में स्वास्थ्य केंद्रों और चिकित्साकर्मियों की समुचित उपलब्धता सुनिश्चित कराना जरूरी है.


संक्रमित लोगों की बड़ी संख्या को देखते हुए अस्थायी केंद्र बनाने की मजबूरी तो थी ही, स्वास्थ्यकर्मियों को दिन-रात काम भी करना पड़ा था. लगभग सौ साल के बाद देश और दुनिया ने ऐसी महामारी का सामना किया है, लेकिन यह भी सच है कि कई अन्य देशों की तरह हमारे देश के विभिन्न इलाकों में अक्सर जानलेवा बीमारियों का कहर टूटता रहता है. संक्रमित और दूषित पानी से भी बड़ी तादाद में मौतें होती हैं. ऐसे रोगों को सामान्य चिकित्सा और मामूली दवाओं के जरिये ठीक किया जा सकता है.


प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र न होने और निजी अस्पतालों में महंगे इलाज की वजह से कई लोग साधारण बीमारी को अनदेखा कर देते हैं, जो बाद में गंभीर रूप धारण कर लेती है. भारत उन देशों में शामिल है, जो स्वास्थ्य के मद में बहुत कम सरकारी खर्च करते हैं. हमारे देश में यह आंकड़ा सकल घरेलू उत्पादन का सवा से डेढ़ फीसदी के बीच है. ऐसे में निजी अस्पतालों और क्लिनिकों को कमाई का बड़ा मौका मिल गया है. इलाज के खर्च और गुणवत्ता को लेकर निगरानी की कोई ठोस व्यवस्था भी नहीं है.


अनेक रिपोर्टों में बताया गया है कि हमारे देश में हजारों परिवार गंभीर बीमारियों के भारी खर्च की वजह से हर साल गरीबी की चपेट में आ जाते हैं. सरकार ने बीमा योजनाओं और कल्याणकारी कार्यक्रमों के जरिये स्वास्थ्य सेवाओं को सुलभ बनाने की दिशा में अहम कदम उठाये हैं. आगामी सालों में सार्वजनिक खर्च में बढ़ोतरी करने और हर जिले में मेडिकल कॉलेज खोलने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है.


विभिन्न राज्य सरकारें भी अपने स्तर पर प्रयासरत हैं. इसमें कोई दो राय नहीं है कि चिकित्सा में निजी क्षेत्र की बड़ी भागीदारी जरूरी है, किंतु सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं और संसाधनों में बढ़ोतरी भी नीतिगत प्राथमिकता होनी चाहिए. इस महामारी के कारण अन्य कई गंभीर बीमारियों से ग्रस्त लोगों को नियमित इलाज मिलने में बाधा आयी है. तपेदिक, कैंसर, मधुमेह आदि रोग भी बड़ी संख्या में मौतों का कारण बन रहे हैं. इस स्थिति के सबसे बड़े भुक्तभोगी गरीब और वंचित हैं. भारत को स्वस्थ और समृद्ध देश बनाने के लिए हमें अपनी स्वास्थ्य सेवा को बेहतर बनाने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए.


सौजन्य - प्रभात खबर।

Share:

अमेरिकी राजनीति में भारतीय लोग (प्रभात खबर)

वप्पला बालाचंद्रन, पूर्व विशेष सचिव, कैबिनेट सेक्रेटेरियट


सेंट जेवियर पालाथिंगल छह जनवरी को वाशिंग्टन में हुई ट्रंप रैली में भारतीय झंडा लहराते हुए दिखे थे. बाद में यह रैली उग्र हो गयी और इसने अमेरिकी कांग्रेस की इमारत पर हमला कर दिया था. विंसेंट ने हमारी मीडिया को बताया है कि त्रिशूर के इंजीनियरिंग कॉलेज से पढ़ाई करने के बाद वे 1992 में अमेरिका चले गये थे. उनका दावा है कि वे वर्जिनिया में रिपब्लिकन पार्टी की स्टेट सेंट्रल कमेटी के सदस्य हैं और वे 'चुनावी धांधली' के विरोध में ट्रंप रैली में शामिल हुए थे.



उनका कहना है कि पहले वे डेमोक्रेट समर्थक थे और उन्होंने बराक ओबामा को दो बार वोट दिया है. विंसेंट का यह भी दावा है कि कुछ उपद्रवी रैली में घुस आये थे, अन्यथा रैली शांतिपूर्ण थी. उनका आरोप है कि उपद्रवी वामपंथी एंटीफा या ब्लैक लाइव्स मैटर के सदस्य हो सकते हैं. वे पांच ट्रंप रैलियों में शामिल हो चुके हैं, पर हिंसा केवल इसी बार हुई है. ब्लैक लाइव्स मैटर के प्रदर्शनों के दौरान हुई हिंसा के लिए ट्रंप ने हमेशा एंटीफा को दोषी ठहराया था.



बहरहाल, अमेरिकी न्याय विभाग कैपिटोल पुलिस के साथ घटनाक्रम की जांच कर रहा है और इसमें कोई संदेह नहीं है कि जांच में विंसेंट के दावों को भी परखा जायेगा. अमेरिकी मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक दुनियाभर में दिखाये गये पुते चेहरे और वाइकिंग सिंगों वाले शख्स की पहचान एरिजोना के जैक एंजेली के रूप में हुई है, जो ट्रंप समर्थक है और धुर दक्षिणपंथी समूह 'क्यूएनॉन' का सदस्य है.


इस लेख का उद्देश्य उस घटना के बारे में बात करना नहीं है, बल्कि अमेरिका में मेरे अपने अनुभवों के आधार पर भारतीय अमेरिकियों की राजनीतिक गतिविधियों तथा एक समुदाय में धार्मिक आधारों पर दो दलों में विभाजन पर उनके असर के बारे में चर्चा करना है. अमेरिका में बसे भारतीय 1920-30 के दौर में तारकनाथ दास, हर दयाल, मुबारक अली खान और जेजे सिंह आदि अनेक लोगों के नेतृत्व में राजनीतिक रूप से सक्रिय थे. उनके प्रयासों से दलीप सिंह सौंद के अमेरिकी कांग्रेस के सदस्य (1957-63) बनने का रास्ता साफ हुआ था, जो नब्बे के दशक तक कांग्रेस के एकमात्र भारतीय सदस्य थे.


वह एक बेहद अहम संघर्ष था, क्योंकि दूसरे विश्वयुद्ध में सभी आप्रवासन रोक दिये गये थे. साल 1946 में ल्यूस-सेलार कानून के तहत भारतीयों को विशेष श्रेणी देकर उनके आप्रवासन की अनुमति दी गयी. यह इंडिया लीग के अध्यक्ष जेजे सिंह के दोनों दलों के कांग्रेस सदस्यों के साथ अभियान चलाने से ही हो सका था. इस कानून को प्रख्यात वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन, प्रसिद्ध लेखक पर्ल एस बक और कैलिफोर्निया के पूर्व गवर्नर अपटन सिंक्लेयर का समर्थन भी मिला था.


भले ही इस कानून का झुकाव उत्तरी और पश्चिमी यूरोप के पक्ष में था, पर इससे अमेरिका में रह रहे तीन हजार भारतीयों को लाभ हुआ और उन्हें नागरिकता मिल गयी. साल 1952 में एक आप्रवासन कानून पारित हुआ, जिसमें एशियाई देशों के लिए हर साल महज सौ वीजा देने का ही प्रावधान था.


असली फायदा 1965 में लिंडन जॉनसन के राष्ट्रपति रहते हुए बने कानून से हुआ, जिसमें देशों के कोटा सिस्टम को खत्म कर प्रवासी परिवारों की एकजुटता को बढ़ावा दिया गया, लेकिन दक्षिण एशिया से आये परिवारों की जीवनशैली एकाकी थी और उनकी गतिविधियां मंदिरों-मस्जिदों और दक्षिण एशियाई त्योहारों तक सीमित थीं. भारतीय समुदाय की संख्या तो बढ़ रही थी, पर वह राजनीति से अलग-थलग ही रहा.


अस्सी के दशक में युवा कांग्रेस के पूर्व कार्यकर्ता डॉ जॉय चेरियन तथा उनके साथियों- कृष्ण श्रीनिवास, गोपाल वशिष्ठ, दिनेश पटेल, डॉ सुरेश प्रभु, स्वदेश चटर्जी आदि कई लोगों ने भारतीय अमेरिकियों से राजनीति में भाग लेने का आह्वान किया. इनमें दोनों दलों से संबद्ध लोग थे. उन्होंने 1963 में टॉम डाइन द्वारा स्थापित यहूदी लॉबी समूह की तर्ज पर काम करना शुरू किया.


भारत के हितों को आगे बढ़ाने के इरादे से 1983 में दोनों दलों से जुड़े लोगों का एक समूह बनाया गया. डॉ थॉमस अब्राहम और इंदर सिंह जैसे कार्यकर्ताओं ने भारतीय अमेरिकियों के दायरे को फिजी, गुयाना, सुरीनाम आदि देशों तक बढ़ाया, जहां कभी गिरमिटिया मजदूर ले जाये गये थे. इन्होंने 1989 में वैश्विक भारतीय प्रवासियों का एक संगठन बनाया. इन प्रयासों से भारतीय आप्रवासी अधिक दिखने लगे. ये सभी धर्मनिरपेक्ष और दोनों दलों से संबद्ध थे तथा इनमें सभी धर्मों और समुदायों की उपस्थिति थी.


दुर्भाग्य से इस आंदोलन को पहला बड़ा झटका वरिष्ठ कांग्रेस नेता सिद्धार्थ शंकर रे ने दिया, जो अमेरिका में भारत के राजदूत थे. साल 1993 में उन्होंने 'ओवरसीज फ्रेंड्स ऑफ बीजेपी' को 1893 में विवेकानंद द्वारा शिकागो में दिये गये प्रसिद्ध भाषण के शताब्दी समारोह से अलग कर दिया. कारण यह बताया गया कि यह भारत सरकार का आधिकारिक कार्यक्रम है.


उस समय से भारतीय अमेरिकियों का भाजपा से संबद्ध हिस्सा भारतीय अमेरिकी संगठनों के आयोजनों से दूरी बरतने लगा. दरार बढ़ने के इस सिलसिले को 2014 से और बढ़ावा मिला. प्रधानमंत्री और अन्य उच्च स्तरीय दौरों में भाजपा या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से संबद्ध या उनके समर्थकों को ही शामिल किया जाने लगा. बाकियों को आमंत्रित नहीं किया जाता.


साल 2016 के चुनाव से ठीक पहले एक नया संगठन- हिंदूज फॉर ट्रंप- का गठन हुआ था. इससे दोनों दलों से संबद्ध लोगों के समूह ने खुद को अलग-थलग महसूस किया. इसका नतीजा यह हुआ कि अमेरिका में भारत के पक्ष में सक्रिय लॉबी कमजोर हुई है और इसका फायदा पाकिस्तान को मिला है, क्योंकि भारतीय अमेरिकी गतिविधियों से गैर-हिंदुओं को हटा दिया गया है.

सौजन्य - प्रभात खबर।

Share:
Copyright © संपादकीय : Editorials- For IAS, PCS, Banking, Railway, SSC and Other Exams | Powered by Blogger Design by ronangelo | Blogger Theme by NewBloggerThemes.com