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Saturday, November 28, 2020

गौवंश बचायेंगे, तो बचेगा पर्यावरण (प्रभात खबर)

पंकज चतुर्वेदी, वरिष्ठ पत्रकार

मध्य प्रदेश में बाकायदा विधानसभा का गौ सत्र बुलाया गया, तो छत्तीसगढ़ ने गाय का गोबर खरीदना शुरू कर दिया है. उप्र सरकार ने गाय को जिबह करने पर विशेष कानून बना दिया है. वास्तव में इस समय कई कारणों से व्यापक स्तर पर गौवंश बचाने की जरूरत है. इनमें बढ़ती आबादी, घटते रकबे, कोरोना के बाद उपजी मंदी-बेरोजगारी के बीच कुपोषण के बढ़ते आंकड़े और कार्बन उत्सर्जन तीस से पैंतीस फीसदी कम करने की हमारी अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धता आदि कुछ प्रमुख कारण शामिल हैं.



विभिन्न सरकारों द्वारा चलायी जा रही योजनाओं से गौवंश संरक्षण के लिए गौशालाएं तो खुल सकती हैं, लेकिन जब तक गौवंश आज से चार दशक पहले की तरह हमारी सामाजिक-आर्थिक धुरी नहीं बनेगा, उसके संरक्षण की बात बेमानी होगी. खेती को लाभकारी बनाने, कार्बन उत्सर्जन कम करने और सभी को पौष्टिक भोजन मुहैया करवाने की मुहीम गौवंश पालन के बगैर संभव नहीं है. इसके लिए गाय की अनिवार्यता को बढ़ावा देने की जरूरत है. मानव सभ्यता के आरंभ से ही गौवंश इंसान के विकास पथ का सहयात्री रहा है.



मोहनजोदड़ो व हड़प्पा से मिले अवशेष साक्षी हैं कि पांच हजार वर्ष पहले भी हमारे यहां गाय-बैल पूजनीय थे. आज भी भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था का मूल आधार गौवंश है. हालांकि भैंस के बढ़ते प्रचलन तथा कतिपय कारखाना मालिकों व पेट्रो उद्योग के दवाब में गांवों में अब टैक्टर व अन्य मशीनों का प्रयोग बढ़ गया है. लेकिन धीरे-धीरे अब समझ आने लगा है कि हल खींचने, पटेला फेरने, अनाज से दानों व भूसे को अलग करने, फसल काटने, पानी खींचने और अनाज के परिवहन में छोटे किसानों के लिए बैल न केवल किफायती हैं, बल्कि धरती व पर्यावरण के संरक्षक भी हैं.


लोगों को यह संदेश देना जरूरी है कि गाय केवल अर्थव्यवस्था ही नहीं, पर्यावरण की भी संरक्षक है. इसीलिए इसे बचाना जरूरी है. एक सरकारी अनुमान है कि आने वाले आठ वर्षों में भारत की सड़कों पर कोई 27 करोड़ आवारा मवेशी होंगे. उन्हें सलीके से रखने का व्यय पांच लाख, चालीस हजार करोड़ होगा. जबकि इतना ही पशुधन तैयार करने का व्यय कई हजार करोड़ होगा. हमारे पास यह धन पहले से उपलब्ध है, बस हम इसका सही तरीके से इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं.


डेनमार्क में दूध देने वाली प्रत्येक गाय का वार्षिक दुग्ध उत्पादन औसत 4,101 लीटर है, स्विटजरलैंड में 4,156, अमेरिका में 5,386 और इंग्लैंड में 4,773 लीटर है. वहीं भारत की गाय सालाना 500 लीटर से भी कम दूध देती है. यानी, भारत में गाय के दूध का उत्पादन दुनिया में सबसे कम है.


हमारे यहां की ब्रंदावनी व थारपार जैसी किस्म की गायें एक दिन में 22 लीटर तक दूध देती हैं. लेकिन महंगी होने के कारण इन गायों का प्रचलन बहुत कम है. जाहिर है कि भारत में गाय पालना बेहद घाटे का सौदा है. जब गाय दूध देती है तब तो पालक उसकी देखभाल करता है और जब दूध देना बंद कर देती है, तो उसे सडक पर छोड़ देता है.


ऐसा नहीं है कि पहले बूढ़ी गायें नहीं हुआ करती थीं, लेकिन 1968 तक देश के हर गांव-मजरे में तीन करोड़, बत्तीस लाख, पचास हजार एकड़ गौचर की जमीन हुआ करती थी. सनद रहे कि चरागाह की जमीन बेचने या उसके अन्य काम में इस्तेमाल पर हर तरह की रोक है.


शायद ही कोई ऐसा गांव या मजरा होगा जहां पशुओं के चरने की जमीन के साथ कम से कम एक तालाब और कई कुएं न हों. जंगल का फैलाव भी पचास फीसदी तक था. पर आधुनिकता की आंधी में लोगों ने चारागाह, तालाब सब खत्म कर दिये. ऐसे में निराश्रित पशु खेत के ही सहारे तो रहेगा.


गौवंश पालन से दूध व उसके उत्पाद को बढ़ाकर कम कीमत पर स्थानीय पौष्टिक आहार तैयार किया जा सकता है. गाय व बैल का ग्रामीण विकास व खेती में इस्तेमाल हमारे देश को डीजल खरीदने में व्यय होने वाली विदेशी मुद्रा के भार से बचाने के साथ ही डीजल संचालित ट्रैक्टर, पंप व अन्य उपकरणों से होने वाले घातक प्रदूषण से भी निजात दिलाता है.


वहीं छोटे रकबे के किसान के लिए बैल का इस्तेमाल ट्रैक्टर के बनिस्पत सस्ता होता है. गोबर और गौमूत्र का खेती-किसानी में इस्तेमाल न केवल लागत कम करता है, बल्कि गोबर का खेत में प्रयोग कार्बन की मात्रा को नियंत्रित करने का बड़ा जरिया भी है. फसल अवशेष, जिन्हें जलाना इस समय की एक बड़ी समस्या है, गौवंश का उपयोग बढ़ने पर उनके आहार में प्रयुक्त हो जायेगा. एक बात और, उपलों को जलाने से ऊष्मा कम मिलती है और कार्बन व अन्य वायु-प्रदूषक तत्व अधिक. इसकी जगह गोबर का कंपोस्ट के रूप में इस्तेमाल ज्यादा सही होगा.


सरकार में बैठे लोग जानते हैं कि भारत में मवेशियों की संख्या लगभग तीस करोड़ है. इनसे लगभग तीस लाख टन गोबर प्रतिदिन मिलता है. इसमें से तीस प्रतिशत को कंडा/उपला बना कर जला दिया जाता है. ब्रिटेन में गोबर गैस से हर साल सोलह लाख यूनिट बिजली का उत्पादन होता है. चीन में डेढ करोड़ परिवारों को घरेलू ऊर्जा के लिए गोबर गैस की सप्लाइ होती है.


यदि गोबर का सही इस्तेमाल हो, तो प्रतिवर्ष लगभग छह करोड़ टन लकड़ी बचायी जा सकती है. साढे तीन करोड़ टन कोयला बच सकता है. कई करोड़ लोगों को रोजगार मिल सकता है. आज भी भारत के राष्ट्रीय आय में पशुपालकों का प्रत्यक्ष योगदन छह फीसदी है. अतः देश व समाज के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले पशुधन को सहेजने के प्रति दूरंदेशी नीति व कार्य योजना आज समय की मांग है.

सौजन्य - प्रभात खबर।

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Thursday, November 26, 2020

Editorial : औद्योगिक नीति में स्थायित्व जरूरी (प्रभात खबर)

डॉ अजीत रानाडे, 

अर्थशास्त्री एवं सीनियर फेलो, तक्षशिला इंस्टीट्यूशन


एक समय मोबाइल फोन हैंडसेट में नोकिया पूरी दुनिया में शीर्ष पर था. इसका सबसे बड़ा मैन्युफैक्चरिंग प्लांट भारत के पेरुंबुदूर में था, जो विशेष आर्थिक जोन का हिस्सा था. छह वर्ष में इसने 50 करोड़ से अधिक हैंडसेट का प्रोडक्शन किया, जिसमें अधिकांश का निर्यात किया गया. नोकिया ने 30,000 से अधिक लोगों को रोजगार दिया था, जिसमें अप्रत्यक्ष रोजगार भी था.



साथ ही बड़ी संख्या में महिलाओं को रोजगार मिला हुआ था. भारत में विनिर्माण का बड़ा केंद्र बनाने के क्या मायने हैं, नोकिया वास्तव में इसका रॉकस्टार उदाहरण था. वैश्विक ब्रांड के तौर पर उच्च गुणवत्ता वाले उत्पादों और उच्च गुणवत्ता वाले रोजगार के लिए भी नोकिया की पहचान थी. उस समय यह 'मेड इन इंडिया' का बड़ा ब्रांड था. लेकिन, 'मेक इन इंडिया' का नारा बनने से बहुत पहले ही नोकिया का प्लांट बंद हो गया. बिजनेस स्कूलों के लिए यह एक केस स्टडी बन चुका है कि कैसे स्वप्न जैसी सफल कहानी का अंत हो गया.



भारतीय कारखानों की बर्बादी के विस्तृत विवरण के लिए यह स्थान नहीं है. कर अधिकारियों द्वारा दिखाया गया अत्यधिक उत्साह, टैक्स टेररिज्म की सीमाबंदी और वादाखिलाफी भी इसकी एक वजह रही. नोकिया की असफलता का भी दोष है कि वह स्मार्टफोन की वैश्विक क्रांति के साथ तालमेल नहीं बिठा सका. वह कम कीमत के बड़े पैमाने पर फीचर फोन के उत्पादन क्षमता में ही फंसा रहा. इस दुखद कहानी से बचा जा सकता था और नोकिया के साथ-साथ वैश्विक बाजार में भारत की मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग क्षमता की शानदार कहानी लिखी जा सकती थी.


अहम है कि हमने नोकिया की कहानी से क्या सीखा? कर वसूलने वालों के अति उत्साह की कहानी अब भी जारी है. पूर्वी एशियाई स्तर पर कॉरपोरेट टैक्स रेट और नयी मैन्युफैक्चरिंग सुविधाओं के 15 प्रतिशत तक नीचे आने के बावजूद पुरानी मानसिकता बरकरार है. भारत की कर व्यवस्था, जिसमें जीएसटी भी शामिल है, वह बोझिल है और प्रतिस्पर्धा को रोकती है.


फोन बनाने के लिए हम एप्पल को भारत में आकर्षित करने में सफल रहे, यह खुशी का विषय है. लेकिन, नोकिया द्वारा सालाना 10 करोड़ फोन प्रोडक्शन के लक्ष्य को हासिल करने की तुलना में यह बहुत ही कम है. एप्पल की कहानी सफल रहने की बड़ी वजह ‘उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन योजना’ रही, जो उत्पादन को बढ़ावा देने से संबंधित है.


इसका 13 क्षेत्रों में विस्तार किया गया है, जिसमें मोबाइल फोन, दवाओं, बैट्री सेल, मानव निर्मित वस्त्र, ऑटो कंपोनेंट और सोलर पैनल शामिल हैं. अगले पांच वर्षों में प्रोत्साहन पर कुल बजट की व्यवस्था लगभग दो ट्रिलियन रुपये है. ऐसा लगता है कि पीएलआइ योजना को संरक्षण (वाया इंपोर्ट टैरिफ) द्वारा सहयोग दिया जायेगा. यह पुरानी अर्थशास्त्र पाठ्यपुस्तक का दृष्टिकोण है कि देश में निवेश आकर्षित करने के लिए आप टैरिफ दीवार को ऊंचा कर देते हैं.


अतः विदेशी कंपनियों को भारत के बड़े उपभोक्ता बाजार तक पहुंचने के लिए इस दीवार को पार करना होगा. इससे वे भारत में निवेश के लिए मजबूर होंगे. नोकिया या श्रीपेरुंबुदूर से हमें यह सीख नहीं मिलती. प्लांट भारत में टैरिफ दीवार पार करके नहीं आया था, बल्कि सस्ते श्रम और कौशल के साथ एसइजेड में कारोबार सुगमता की वजह से वह आकर्षित हुआ था.


अगर हम इंपोर्ट टैरिफ को बढ़ाकर घरेलू उत्पादन को प्रोत्साहन देते हैं, तो इससे घरेलू खरीदारों के लिए कीमतों में इजाफा होगा. आयातित पुर्जों का प्रयोग कर अपने उत्पादों को दोबारा निर्यात करनेवाले उद्यमियों के लिए यह निर्यात कर की तरह ही होगा.


दुर्भाग्य से, टैरिफ में कमी लाने की ढाई दशक पुरानी प्रगति को भारत ने 2018 में पलट दिया. तब से औद्योगिक उत्पादों पर भारत का औसत आयात टैरिफ 13 प्रतिशत से बढ़कर 18 प्रतिशत हो चुका है. उच्च आयात शुल्क से घरेलू कीमतें बढ़ जाती है. पीएलआइ योजना का दृष्टिकोण विजेताओं और चैंपियन को चुनना है. कुछ क्षेत्रों के लिए तो यह सही है.


जैसे, भारत एडवांस्ड फार्मास्युटिकल्स इंटरमीडिएट्स (एपीआइ) के 68 प्रतिशत आयात के लिए चीन पर निर्भर है, जिसे कम करने की जरूरत है. लेकिन, भारत पश्चिम को बड़े स्तर पर दवा निर्यात करता है, जिसके लिए वह चीन से एपीआइ के आयात पर निर्भर है. अतः एपीआइ के लिए पीएलआइ अच्छा है.


चीन पर निर्भरता खत्म करने में कुछ समय लगेगा. कुल मिलाकर, विजेताओं और चैंपियन को चुनने का काम सरकार का नहीं होना चाहिए, विशेषकर तीव्र प्रौद्योगिकी के मामले में. कल्पना कीजिये, अगर नोकिया के सस्ते 2जी फोन के बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए सरकार की पीएलआइ योजना लागू होती, तो यह अप्रचलित प्रौद्योगिकी के भुगतान में फंस जाती . अगर इसे अचानक बंद कर देती, तो सरकार अपनी बाध्यता से मुकरने की दोषी होती.


फास्ट टेक्नोलॉजी के औद्योगिक क्षेत्र में उत्पादन को प्रोत्साहन देने में यह आशंकाएं रहती हैं. पीएलआइ स्कीम के साथ एक और समस्या है कि सरकार कई सारे विवरण निर्दिष्ट करने और सूक्ष्म प्रबंधन का प्रयास करती है. यह सरकार के नौकरशाही दृष्टिकोण या सब्सिडी के गलत इस्तेमाल को रोकने की सतर्कता की वजह से हो सकता है. इस प्रकार औद्योगिक नीति बहुत दखल देनेवाली, बहुत ही निर्देशात्मक, विजेताओं को चुनने की बहुत उत्सुक और संरक्षणवाद पर बहुत आधारित होती है, जिससे सफलता के बजाय उलझन बढ़ती है.


बीएसएनएल का हालिया मामला एक उदाहरण है. अपने 4जी नेटवर्क के लिए चीनी आपूर्तिकर्ता के साथ तय निविदा से अलग होने के लिए उसे मजबूर किया गया. नया बिडर्स 89 प्रतिशत अधिक महंगा था और बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए उसके पास अनुभव नहीं था. सोलर पैनल में यही असंगति है, जहां एक तरफ हम सौर क्षमता के 100 गीगावॉट के लक्ष्य को प्राप्त करना चाहते हैं, तो वहीं विदेशी आपूर्तिकर्ताओं पर टैरिफ बाधा लगाते है.


इससे घरेलू सोलर पावर के उत्पादन की लागत बढ़ेगी. अत्यधिक शर्तें थोपने से भारत की औद्योगिक नीति असंगत बन जायेगी. बेहतर होगा कि व्यापक तौर पर नीतियों में निजी और विदेशी निवेशकों को स्थायित्व, पूर्वानुमान और सततता प्रदान की जाए. यदि आप सफल होना चाहते हैं, तो सूक्ष्म विनिर्देशों को छोड़ना होगा.                   

सौजन्य - प्रभात खबर।

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Editorial : स्पष्ट हों जी-20 सम्मेलन के उद्देश्य (प्रभात खबर)

मधुरेंद्र सिन्हा, वरिष्ठ पत्रकार


मानवता की रक्षा के लिए अमीर देशों को अपने खजाने का मुंह खोलना ही पड़ेगा. आज यूरोपीय देशों की यह जिम्मेदारी है कि वे अफ्रीका के गरीब देशों को कोविड-19 के चंगुल से मुक्त कराने में हाथ बटाएं. इस बार जी-20 सम्मेलन ऐसे समय हुआ जब पूरी दुनिया कोविड-19 महामारी से जूझ रही है. लाखों लोगों को जिंदगी से हाथ धोना पड़ा है, देशों की अर्थव्यवस्थाएं तबाह हो गयी हैं और कई देशों के करोड़ों लोग दाने-दाने को मोहताज हो गये हैं. देशों का एक-दूसरे से आवागमन ठप है. जाहिर है, ऐसे में यह सम्मेलन किसी खास जगह नहीं हो सकता था.



हालांकि सउदी अरब इसका मेजबान था और उसने खासी तैयारियां भी कर रखी थीं. लेकिन यह सम्मेलन वर्चुअल हुआ और सदस्य देशों के राष्ट्राध्यक्षों ने वीडियो के जरिये इसमें भाग लिया. दरअसल, जी-20 दुनिया के 19 देशों की सरकारों और यूरोपियन यूनियन का एक अंतरराष्ट्रीय मंच है, जिसे अंतरराष्ट्रीय वित्तीय स्थिरता को बढ़ावा देने के लिए बनाया गया है.



हालांकि कोरोना महामारी ने इस बार इन देशों को कोविड पर ही चर्चा केंद्रित करने पर मजबूर कर दिया. सम्मेलन में कोरोना का टीका आने पर दुनिया के सभी देशों को देने की व्यवस्था तथा फंड कैसे दिया जाये, इसी बात पर चर्चा हुई. इसकी संयुक्त विज्ञप्ति में भी यह बात कही गयी कि आज की चुनौतियों में इस समूह के लिए वैश्विक कार्रवाई, एकजुटता तथा पारस्परिक सहयोग जैसी जिम्मेदारियां और बढ़ गयी हैं एवं इसके लिए हम सभी साथ खड़े हैं ताकि लोगों का सशक्तिकरण, पृथ्वी की रक्षा हो और नयी सीमाएं खोली जा सकें.


यह भी कहा गया कि कोविड-19 के बाद के विश्व को मजबूत, टिकाऊ, संतुलित और समग्र बनाने के लिए जी-20 प्रतिबद्ध है. इन देशों ने मनी लाॅन्ड्रिंग और दहशतगर्दी के लिए धन देनेवालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की भी बात की, जो पाकिस्तान को चुभ रही है. कहा गया कि इस सम्मेलन का उद्देश्य एक स्वतंत्र, न्यायोचित, मुक्त अंतरराष्ट्रीय व्यापार को बढ़ावा देना है ताकि कोविड के बाद पूरी दुनिया में सुचारु रूप से अबाध व्यापार हो सके.


यह बात इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि 2020 में सारी दुनिया का कारोबार घटकर 4.4 प्रतिशत रह गया है और अब इसे पटरी पर लाना टेढ़ी खीर साबित होगी. गरीब देशों के पास इतने स्रोत नहीं हैं कि वे कोविड-19 के टीके की खोज करें और उसे जनता में बांटें. जी-20 देशों ने कहा है कि वे दुनिया के देशों को कोविड का टीका उपलब्ध करायेंगे. उन्होंने यह भी कहा कि इसके लिए जरूरी फंड भी दिये जायेंगे ताकि टीके का विकास, देशों में उसका पूर्ण उत्पादन और सुचारु वितरण हो सके.


लेकिन यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि इस बारे में कोई विस्तृत रूपरेखा नहीं बनायी गयी, न ही यह बताया गया कि कौन सा देश कितनी फंडिंग करेगा. यह बात इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सिर्फ दिलासा देने से बात नहीं बनेगी. मानवता की रक्षा के लिए अमीर देशों को अपने खजाने का मुंह खोलना ही पड़ेगा. आज यूरोपीय देशों की यह जिम्मेदारी है कि वे अफ्रीका के गरीब देशों को कोविड-19 के चंगुल से मुक्त कराने में हाथ बटायें.


परंतु यह तभी संभव होगा जब इन देशों को बड़ी राशि तथा अन्य संसाधन दिये जायेंगे. एक समय इंग्लैंड सहित कई यूरोपीय देशों ने अफ्रीकी देशों से काफी लाभ उठाया था और अब उसे चुकाने का समय है. जी-20 के देश अपने-अपने फंड के बारे में खुलकर बतायें और यह भी बतायें कि वे व्यावहारिक रूप में इन गरीब देशों की मदद करेंगे.


भारत ने इस सम्मेलन में काफी आशावादिता दिखायी. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि भारत पर्यावरण के मामले में न सिर्फ पेरिस समझौते के अपने लक्ष्य को हासिल कर रहा है, बल्कि उससे भी अधिक कर रहा है. प्रधानमंत्री ने पहले ही बताया था कि भारत ने कार्बन उत्सर्जन में 30-35 प्रतिशत कटौती का लक्ष्य रखा है और उसे पाने की ओर वह अग्रसर है.


उन्होंने यह भी कहा कि जलवायु परिवर्तन के खिलाफ अलग-थलग होकर लड़ाई लड़ने के बजाय एकीकृत, व्यापक और समग्र सोच को अपनाया जाना चाहिए. उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि संपूर्ण विश्व तभी तेजी से प्रगति कर सकता है, जब विकासशील राष्ट्रों को बड़े पैमाने पर टेक्नोलॉजी और वित्तीय सहायता मुहैया करायी जाये. उनकी इस बात में बहुत दम है, क्योंकि इस समय उत्कृष्ट टेक्नोलॉजी मुट्ठी भर देशों के पास ही है जिसे उन्हें अन्य देशों को देना चाहिए.


उन्होंने यह भी कहा कि हर मनुष्य को समृद्ध करने से ही मानवता समृद्ध होगी. भारत ने कार्बन उत्सर्जन को रोकने के लिए कई बड़े कदम उठाये हैं जिनमें एलइडी बल्बों का ज्यादा इस्तेमाल और सौर ऊर्जा के बढ़ते उत्पादन ने बड़ी भूमिका निभायी है. आठ करोड़ परिवारों को खाना बनाने के लिए गैस कनेक्शन देना भी एक बड़ा कदम है, जिससे न केवल महिलाओं के स्वास्थ्य में सुधार हुआ है बल्कि कार्बन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन में भी कमी आयी है.


अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने गुस्से का यहां भी इजहार किया और पेरिस समझौते से बाहर रहने के अपने फैसले को फिर से दुहराया. उन्होंने कोविड-19 से विश्वव्यापी संघर्ष के बारे में भी कुछ नहीं कहा, न ही पर्यावरण बचाने के बारे में कोई सकारात्मक बात की. इससे साफ हो गया है कि अमेरिका इस मंच पर बाकी देशों से अलग-थलग खड़ा है.


अमेरिका के आर्थिक सहयोग के बिना ये दोनों बड़े काम नहीं हो सकते. लेकिन खैरियत है कि नव-निर्वाचित राष्ट्रपति जो बाइडन ने अमेरिका के पेरिस समझौते में वापसी के जोरदार संकेत दिये हैं. कुल मिलाकर इस बार का जी-20 सम्मेलन उतना जोरदार और प्रोत्साहित करने वाला नहीं प्रतीत हुआ. इसमें शामिल देशों को अभी और स्पष्ट शब्दों में न केवल अपनी बात कहनी होगी, बल्कि तुरंत कुछ करके दिखाना भी होगा.                       

सौजन्य - प्रभात खबर।

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Editorial : गुपकार के इरादे पर सवाल की गुंजाइश (प्रभात खबर)

प्रभु चावला, एडिटोरियल डायरेक्टर,द न्यू इंडियन एक्सप्रेस


महानगर का गुपकार रोड कश्मीर का लुटियन दिल्ली है. सत्ता की ओर जाते इस दो किलोमीटर लंबे रास्ते के ढलान और मोड़ एक अशांत जगह में शांतिपूर्ण सपने की तरह हैं तथा इसके दोनों ओर छोटे-बड़े लगभग 150 घर व कार्यालय हैं. यह डल झील पर बने ललित होटल से शुरू होता है तथा अब्दुल्ला परिवार के आवास पर खत्म होता है. यह मार्ग जम्मू-कश्मीर का सबसे प्रभावशाली पता है, जहां कश्मीर के संभ्रांत, वरिष्ठ सैन्य व राज्य सरकार के अधिकारी, केंद्रीय गुप्तचर ब्यूरो व रॉ के अधिकारी तथा कुछ वरिष्ठ राजनेताओं का वास है.


इस सड़क पर अब्दुल्ला परिवार के तीन बड़े बंगले हैं. सरकार ने पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती और माकपा नेता युसुफ तारिगामी को भी एक-एक बंगला दिया है. अचरज की बात नहीं है कि पूर्व पत्रकार खालिद जहांगीर को भी केसरिया खेमे में आने के बाद इसी सड़क पर एक आवास दिया गया. जहांगीर भाजपा के उम्मीदवार के रूप में फारूक अब्दुल्ला से लड़े थे और उन्हें लगभग चार हजार वोट ही मिले थे.



भाजपा ने इसके बाशिंदों को एक अलग ही नाम दे दिया है- गुपकार गिरोह. इसका कारण यह है कि चार अगस्त, 2019 को फारूक अब्दुल्ला ने हिरासत से छूटने के बाद अपने निवास पर क्षेत्रीय पार्टियों की एक बैठक बुलायी थी, जिसमें गुपकार घोषणा के लिए पीपुल्स अलायंस का गठन हुआ था. यह घोषणा एक संयुक्त संकल्प है, जिसमें किसी भी कीमत पर अनुच्छेद 370 को बचाने की बात कही गयी है. इस पर नेशनल कांफ्रेंस, कांग्रेस, पीडीपी, माकपा, जम्मू-कश्मीर पीपुल्स कांफ्रेंस तथा अवामी नेशनल कांफ्रेंस के नेताओं ने दस्तखत किया था.


इसके एक दिन बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्ववाली एनडीए सरकार ने अनुच्छेद 370 और 35ए को हटा दिया था तथा फारूक अब्दुल्ला, उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती समेत 500 स्थानीय नेताओं को हिरासत में ले लिया गया था. पंद्रह महीनों के बाद स्थानीय पार्टियों और भाजपा के बीच एक राजनीतिक युद्ध शुरू हो गया है. यह लड़ाई राज्य के लोगों को आतंकियों से बचाने, युवाओं को रोजगार दिलाने, उद्यमियों के लिए समुचित व्यावसायिक माहौल उपलब्ध कराने, पर्यटन को बढ़ावा देने और कश्मीरी पंडितों की सुरक्षित वापसी के लिए नहीं है.


यह लड़ाई केवल अनुच्छेद 370 के बारे में है, जो मातृभूमि के साथ कश्मीर के पूर्ण एका के बीच दीवार था तथा इसने सात दशकों तक भारत की विकास यात्रा में समान अवसर हासिल करने से कश्मीरियों को वंचित रखा था. घाटी आज भी आतंकियों के लिए आसान निशाना है. अब किसी भी तरह से सत्ता हथियाने के लिए एक नया गठबंधन उभर रहा है. यदि गुपकार अलायंस को कूट नाम दें, तो यह कुचक्र 370 कहा जा सकता है, जो पाखंड का नया अगुवा है. सभी अवसरवादियों की तरह, जिनमें विसंगति एक मुख्य प्रवृत्ति होती है, नेशनल कांफ्रेंस से लेकर पीडीपी तक विरोधाभासी रवैया दिखा रहे हैं.


अनुच्छेद 370 हटाने के अपने मुख्य संकल्प से डिगे बिना भाजपा ने एक भरोसेमंद और लचीले सहयोगी के रूप में महबूबा मुफ्ती को मुख्यमंत्री बनाया था. अब वे इस कुचक्र के उपाध्यक्ष के रूप में राष्ट्रीय ध्वज को फहराने से इनकार कर रही हैं. उन्होंने अपने उद्गार में कहा कि उन्होंने एक उदारवादी, धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक भारत में विलय किया था और वे आज के भारत के साथ सहज नहीं महसूस कर रही हैं. उनके गुपकार अलायंस के सहयोगी फारूक अब्दुल्ला अलगाववादी विचारों के वादक हैं, जो बार-बार तिरस्कार के एक ही रिकॉर्ड को बजाते रहते हैं.


उनका कहना है कि यह समूह भारत का शत्रु नहीं है- ‘मैं आपको बताना चाहता हूं कि गुपकार अलायंस को राष्ट्र-विरोधी बताना भाजपा का झूठा प्रचार है. इसमें कोई संदेह नहीं है कि यह भाजपा-विरोधी है, पर यह राष्ट्र-विरोधी नहीं है. नेशनल कांफ्रेंस पहले स्वेच्छा से एनडीए का हिस्सा रह चुका है.


जब जब अवसरवाद का मौका आया है, नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी अपने दुश्मनों और एक-दूसरे के साथ खड़े हो जाते हैं. अब उन्हें लगता है कि विभाजित रहने से न केवल सत्ता, बल्कि वे अपनी प्रासंगिकता भी खो देंगे. अभी इस अलायंस में सभी साथ है, पर मलाई बांटने को लेकर जल्दी ही वे एक-दूसरे के विरोध में खड़े हो जायेंगे. भाजपा का एकमात्र गुण है, उसका अनुच्छेद 370 पर वैचारिक निरंतरता. इसने अतीत में घाटी के अधिकतर दलों के साथ अपवित्र गठबंधन बनाया है.


श्रीनगर की गद्दी हथियाने के चक्कर में इसने महबूबा मुफ्ती को नेता भी बनाया और सीढ़ी भी. मुफ्ती से अलग होने के बाद इसने पीपुल्स कांफ्रेंस के सज्जाद लोन को आगे बढ़ाया. वे अब गुपकार अलायंस के सक्रिय सदस्य हैं. अमित शाह ट्विटर पर गरज रहे हैं कि गुपकार गिरोह वैश्विक हो रहा है और वह जम्मू-कश्मीर में विदेशी शक्तियों का हस्तक्षेप चाहता है.


क्षुब्ध उमर अब्दुल्ला ने ट्वीट किया कि गृह मंत्री के इस हमले के पीछे की बेचैनी को वे समझते हैं. उन्हें बताया गया था कि अलायंस चुनाव का बहिष्कार करेगा तथा इससे भाजपा और राजा की नयी पार्टी को खुला मैदान मिल जायेगा. वे ऐसा नहीं होने देंगे. कांग्रेस ने इस अलायंस का हिस्सा होने से साफ इनकार किया है. इससे साफ है कि ऐसा रवैया सिर्फ दिखावे के लिए है, किसी विचारधारात्मक प्रतिबद्धता से प्रेरित नहीं.


उदाहरण के लिए, भाजपा के विरोधी उस पर अवसरवाद का आरोप लगाते हैं. कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल ने भाजपा के पुराने गठबंधनों की याद दिलायी है. कारगिल के नेशनल कांफ्रेंस के नेतृत्ववाली लद्दाख स्वायत्त पहाड़ी विकास काउंसिल में भाजपा भी हिस्सेदार है. यह शाब्दिक युद्ध जिला विकास काउंसिल की 280 सीटों के लिए होनेवाले आगामी चुनाव से भी संबंधित है.


अनधिकृत सूत्रों के मुताबिक, भाजपा का अनुमान था कि पंचायत चुनाव की तरह इस चुनाव में भी स्थानीय दल भाग नहीं लेंगे. लेकिन फारूक अब्दुल्ला ने अपने सहयोगियों को इस चुनाव को अनुच्छेद 370 पर जनमत संग्रह बनाने तथा इसी एजेंडे पर कांग्रेस के साथ लड़ने पर राजी कर लिया. भाजपा ने राष्ट्रवाद बनाम शेष का अपना पुराना प्रभावी मंत्र फिर से अपनाया है.


गुपकार अलायंस को गिरोह तथा आतंक व गरीबी समर्थक बताकर वह फिर जम्मू-कश्मीर के मतदाताओं में ध्रुवीकरण कर रही है. भाजपा ने भ्रष्टाचार बढ़ाने और आतंकवाद को अनदेखा करने के तंत्र को सफलतापूर्वक ध्वस्त किया है, लेकिन इसे अभी भी युवाओं का भरोसा हासिल करना है, जो रोजगार के अभाव में बंदूक थाम रहे हैं. कश्मीर को आत्मनिर्भर बनाने की जगह घाटी के राजनेता अपने वंश और मिलावटी विचार को किसी तरह आगे बढ़ाने की जुगत लगा रहे हैं.

                        

सौजन्य - प्रभात खबर।

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Editorial : निवेशकों का भरोसा बचाना जरूरी (प्रभात खबर)

सतीश सिंह, मुख्य प्रबंधक, आर्थिक अनुसंधान विभाग, भारतीय स्टेट बैंक, मुंबई


लक्ष्मी विलास बैंक (एलवीबी) को संकट से बाहर निकालने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक ने टीएन मनोहरन को प्रशासक नियुक्त किया है. मनोहरन के अनुसार, बैंक के पास जमाकर्ताओं के पैसे लौटाने के लिए पर्याप्त धन है, लेकिन सवाल है कि बैंक खस्ताहाल क्यों हुआ? इसके लिए कौन जिम्मेदार है?


बैंकों के नियामक क्या कर रहे थे? बैंक के डूबने पर निवेशकों की जिंदगीभर की कमाई एक झटके में स्वाहा हो जाती है. चौरानवे साल पुराने इस निजी बैंक का विलय सिंगापुर के डीबीएस बैंक के साथ किये जाने का प्रस्ताव क्या सही है? क्या हमारे देसी बैंक के साथ विलय नहीं किया जा सकता था?



हालांकि, मनोहरन का कहना है कि बैंक का विलय डीबीएस बैंक की भारतीय इकाई के साथ किया जा रहा है. लेकिन मनोहरन के तर्क को समीचीन नहीं माना जा सकता है. पूर्व में भी डूबने वाले बैंकों का सफल विलय देसी बैंकों के साथ किया गया है. भारत में चाहे यस बैंक हो, आइडीबीआई या पीएनबी हो, सबको बचा लिया गया है. आइडीबीआई बैंक को बचानेवाले भारतीय जीवन बीमा निगम के शेयर इसमें बहुलता में हैं, जिससे यह बैंक पहले से मजबूत हुआ है.


हालांकि, सहकारी बैंक भाग्यशाली नहीं हैं. एलवीबी का मामला सामने आने के तुरंत बाद रिजर्व बैंक ने इसके विलय की घोषणा डीबीएस के साथ कर दी, लेकिन पंजाब एंड महाराष्ट्र को-ऑपरेटिव बैंक (पीएमसी) के संकट को अभी भी दूर नहीं किया गया है. एलवीबी ने पूर्व में इंडिया बुल्स हाउसिंग और क्लिक्स कैपिटल के साथ विलय की कोशिश की थी, लेकिन उसे केंद्रीय बैंक ने मंजूरी नहीं दी.


एलवीबी की 570 शाखाएं हैं, जिनमें 85 प्रतिशत दक्षिण भारत में है और इसमें आधे से तो अधिक तमिलनाडु में हैं. इसका जमा घटकर 20,050 करोड़ रुपये हो गया है. इसमें चालू खाता और बचत खाता के 6,070 करोड़ रुपये हैं और शेष मियादी खाते के जमा हैं. जमाकर्ताओं की संख्या लगभग 20 लाख है. एलवीबी ने करीब 17,000 करोड़ रुपये का कर्ज विविध ऋणियों को दे रखा है, जो सितंबर तिमाही में 16,630 करोड़ रुपये था.


एलवीबी को अस्तित्व बनाये रखने के लिए 1,500 करोड़ रुपये की जरूरत है. वहीं, डीबीएस की कुल रेगुलेटरी पूंजी 7,109 करोड़ रुपये है, जबकि एलवीबी के विलय के बाद जरूरत 7,023 करोड़ रुपये की ही है. इसकी कॉमन इक्विटी टियर-1 कैपिटल 12.84 प्रतिशत है, जबकि रिजर्व बैंक के मुताबिक, जरूरत 5.5 प्रतिशत की है. जून, 2020 तक डीबीएस बैंक भारत का सीआरएआर 15.99 प्रतिशत था, जबकि एलवीबी का 0.17 प्रतिशत था.


सभी वित्तीय मानकों पर खरा उतरने के कारण विलय के बाद भी डीबीएस के परिचालन पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा. इसकी पुष्टि मनोहरन ने भी की है.


फिलहाल, एलवीबी पर एक महीने के लिए लेन-देन पर रोक लगा दी गयी है. ग्राहकों में अफरातफरी मची हुई है, जिसका कारण केवल 25,000 रुपये निकालने की अनुमति का होना है. आपात स्थिति में ग्राहक पांच लाख रुपये तक की निकासी कर सकते हैं.


मनोहरन के अनुसार, 16 दिसंबर के बाद इन बंदिशों को हटा लिया जायेगा. एलवीबी का टियर-1 पूंजी पर्याप्तता अनुपात 30 जून, 2020 तक नकारात्मक 0.88 प्रतिशत हो गया था, जबकि यह न्यूनतम 8.875 प्रतिशत होना चाहिए. इसमें जमा राशि में भी सिकुड़न आ रही थी और कुल ऋण परिसंपत्तियों में 20 प्रतिशत से अधिक गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (एनपीए) में तब्दील हो चुकी थी, जबकि मार्च, 2017 में इसका एनपीए केवल 2.7 प्रतिशत था.


इन सब वजहों से 25 सितंबर को एलवीबी की सालाना आम बैठक में शेयरधारकों ने निदेशकों को बाहर का रास्ता दिखा दिया. शेयरधारकों ने बैंक की खराब हालत के लिए निदेशकों और प्रबंध निदेशक एवं मुख्य कार्याधिकारी एस सुंदर को भी दोषी माना.


एलवीबी ने अपनी बर्बादी की पटकथा खुद से लिखी है. इसने 720 करोड़ रुपये रैनबैक्सी के पूर्व प्रमोटर्स मलविंदर और शिविंदर सिंह की कंपनियों में निवेश किये था, जिसके बदले बैंक के पास मियादी जमा रखी गयी, लेकिन मामले के अदालत में जाने से बैंक का पैसा फंस गया. त्रुटिपूर्ण कारोबारी योजना, जरूरत से अधिक हस्तक्षेप करनेवाले प्रवर्तक के होने, कमजोर निदेशक मंडल और कारोबारी निरंतरता के अभाव में एलवीबी की वित्तीय स्थिति लगातार खराब होती चली गयी.


तेजी से कॉरपोरेट ऋण बढ़ाने, वित्तीय अनियमितता, खुदरा कारोबार पर ध्यान नहीं देने से भी बैंक की वित्तीय स्थिति खस्ताहाल हुई. सितंबर, 2019 में रिजर्व बैंक ने इसे तत्काल वित्तीय सुधार की जरूरत वाले बैंकों की श्रेणी में डाल दिया. इसके साथ 21 सरकारी बैंकों में से 11 बैंकों को भी पीसीए में डाला गया था. पीसीए में डालने के बाद बैंक न तो नयी शाखा खोल सकता है और न ही उधारी दे सकता है और न ही कोई अन्य नया फैसला ले सकता है.


एलवीबी ने 30 जून, 2020 को 0.17 प्रतिशत पूंजी पर्याप्तता अनुपात (सीएआर) और 1.83 प्रतिशत नकारात्मक टियर-1 सीएआर दर्ज किया था. नियामकीय अनुपालन के लिए इसे क्रमश: 10.875 प्रतिशत और 8.875 प्रतिशत रहना जरूरी है. बैंकों में जमा पैसों को सुरक्षित मानने के कारण ही आज 140 लाख करोड़ रुपये जमा हैं, लेकिन बैंकों के डूबने से ग्राहकों का विश्वास डगमगा रहा है.


आमजन अपनी गाढ़ी कमाई बैंक में सुरक्षा के लिए रखते हैं. अगर इसी तरह बैंक डूबते रहे तो निवेशकों का भरोसा कम होगा और वे बैंक में पैसा जमा करने से परहेज करेंगे, जिससे बैंकों की उधारी दरों में इजाफा होगा, क्योंकि उन्हें सस्ती पूंजी मिलने में मुश्किल होगी.

                        

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Thursday, November 19, 2020

आरसीइपी से दूरी सही फैसला ( प्रभात खबर)

By डॉक्टर जयंतीलाल भंडारी,  अर्थशास्त्री


हाल ही में दुनिया के सबसे बड़े ट्रेड समझौते रीजनल कांप्रिहेंसिव इकोनॉमिक पार्टनरशिप (आरसीइपी) ने 15 देशों के हस्ताक्षर के बाद मूर्तरूप ले लिया है. इसमें 10 आसियान देशों- वियतनाम, लाओस, म्यांमार, इंडोनेशिया, मलेशिया, फिलीपींस, सिंगापुर, थाइलैंड, ब्रूनेई और कंबोडिया के अलावा चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड शामिल हैं.



आरसीइपी समूह के देशों में विश्व की लगभग 47.6 प्रतिशत जनसंख्या रहती है, जिसका वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में करीब 31.6 प्रतिशत और वैश्विक व्यापार में करीब 30.8 प्रतिशत का योगदान है. आरसीइपी समझौते पर हस्ताक्षर के बाद समूह के मेजबान देश वियतनाम के प्रधानमंत्री गुयेन जुआन फुक ने कहा कि आठ साल की कड़ी मेहनत के बाद हम इसे हस्ताक्षर तक ले आने में सफल हुए हैं. आरसीइपी समझौते के बाद बहुपक्षीय व्यापार प्रणाली को समर्थन देने में आसियान की प्रमुख भूमिका रहेगी.



आरसीइपी के कारण एशिया-प्रशांत क्षेत्र में एक नया व्यापार ढांचा बनेगा और उद्योग कारोबार सुगम हो सकेगा. साथ ही कोविड-19 से प्रभावित आपूर्ति शृंखला को फिर से खड़ा किया जा सकेगा. आरसीइपी के सदस्य देशों के बीच व्यापार पर शुल्क और नीचे आयेगा, जिससे समूह के सभी सदस्य देश लाभान्वित होंगे. प्रधानमंत्री मोदी ने पिछले वर्ष नवंबर, 2019 में आरसीइपी में शामिल नहीं होने की घोषणा की थी.


इस रुख में पिछले एक वर्ष के दौरान कोई बदलाव नहीं आया है. नवंबर, 2020 में फिर दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों के संगठन (आसियान) सदस्यों के साथ मोदी ने स्पष्ट किया कि मौजूदा स्वरूप में भारत आरसीइपी का सदस्य बनने का इच्छुक नहीं है. भारत के मुताबिक, आरसीइपी के तहत देश के आर्थिक तथा कारोबारी हितों के साथ कोई समझौता नहीं किया जा सकता है.


इस समझौते के मौजूदा प्रारूप में आरसीइपी की मूल भावना तथा वे मार्गदर्शन सिद्धांत परिलक्षित नहीं हो रहे हैं, जिन पर भारत ने सहमति दी थी. इस समझौते में भारत की चिंताओं का भी निदान नहीं किया गया है. इस समूह में शामिल नहीं होने का एक कारण यह भी है कि आठ साल तक चली वार्ता के दौरान वैश्विक आर्थिक और व्यापारिक परिदृश्य सहित कई चीजें बदल चुकी हैं तथा भारत इन बदलावों को नजरअंदाज नहीं कर सकता है.


भारत का मानना है कि आरसीइपी भारत के लिए आर्थिक बोझ बन जाता. इसमें भारत के हित से जुड़ी कई समस्याएं थीं और देश के संवेदनशील वर्गों की आजीविका पर इसका गंभीर प्रभाव पड़ता.


काफी समय से घरेलू उद्योग और किसान इस समझौते का विरोध कर रहे थे, क्योंकि उन्हें चिंता थी कि इसके जरिये चीन और अन्य आसियान के देश भारतीय बाजार को अपने माल से भर देंगे. इसके अलावा चीन के बॉर्डर रोड इनीशिएटिव (बीआरआइ) की योजना, लद्दाख में उसके सैनिकों की घुसपैठ, अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की बढ़ती हैसियत में रोड़े अटकाने की चीन की प्रवृत्ति ने भी भारत को आरसीइपी से दूर रहने पर विवश किया.


यह बात भी विचार में रही कि भारत ने जिन देशों के साथ एफटीए किया है, उनके साथ व्यापार घाटे की स्थिति और खराब हुई है. मसलन, दक्षिण कोरिया और जापान के साथ भी भारत का एफटीए है, लेकिन इसने भारतीय अर्थव्यवस्था को अपेक्षित फायदा नहीं पहुंचाया है.


आर्थिक और कारोबार संबंधी प्रतिकूलता के बीच आरसीइपी के मौजूदा स्वरूप में भारत के प्रवेश से चीन और आसियान देशों को कारोबार के लिए ऐसा खुला माहौल मिल जाता, जो भारत के अनुकूल नहीं होता. स्पष्ट है कि ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के कृषि और दूध उत्पादों को भी भारत का विशाल बाजार मिल जाता, जिनसे घरेलू कृषि और दूध बाजार के सामने नयी मुश्किलें खड़ी हो जातीं. यद्यपि अब आरसीइपी समझौता लागू हो चुका है.


लेकिन, आर्थिक अहमियत के कारण भारत के लिए विकल्प खुला रखा गया है. लेकिन वस्तु स्थिति यह है कि यदि अब भारत आरसीइपी में शामिल होना भी चाहे तो राह आसान नहीं होगी, क्योंकि चीन तमाम बाधाएं पैदा कर सकता है. वैश्विक बाजार में भारत को निर्यात बढ़ाने के लिए नयी तैयारी के साथ आगे बढ़ना होगा. कोविड-19 की चुनौतियों के बीच आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत भारत सरकार संरक्षण नीति की डगर पर आगे बढ़ी है.


इसके लिए आयात शुल्क में वृद्धि का तरीका अपनाया गया है. आयात पर विभिन्न प्रतिबंध लगाये गये हैं. साथ ही उत्पादन से जुड़े प्रोत्साहन भी दिये गये हैं. ये सब बातें वैश्विक कारोबार के लिए कठिनाई पैदा कर सकती हैं. अतएव, निर्यात की राह सरल बनाने के लिए कठिन प्रयासों की जरूरत होगी.


हम उम्मीद करें कि सरकार द्वारा 15 नवंबर को आरसीइपी समझौते से दूर रहने का निर्णय करने के बाद भी भारत आसियान देशों के साथ नये सिरे से अपने कारोबार संबंधों को इस तरह विकसित करेगा कि इन देशों में भी भारत के निर्यात संतोषजनक स्तर पर दिखायी दे सकें.


उम्मीद है कि सरकार नये मुक्त व्यापार समझौतों की नयी रणनीति की डगर पर आगे बढ़ेगी. सरकार द्वारा शीघ्रतापूर्वक यूरोपीय संघ के साथ कारोबार समझौते को अंतिम रूप दिया जायेगा. साथ ही अमेरिका के साथ व्यापार समझौते को भी अंतिम रूप दिये जाने पर आगे बढ़ा जायेगा. ऐसी निर्यात वृद्धि और नये मुक्त व्यापार समझौतों की नयी रणनीति के क्रियान्वयन से ही भारत अपने वैश्विक व्यापार में वृद्धि करते हुए दिखायी दे सकेगा.

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Opinion : ब्रिक्स की स्वायत्तता और भारत (प्रभात खबर)

राजन कुमार, एसोसिएट प्रोफेसर, जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी


ब्रिक्स उभरते देशों का एक अनूठा संगठन है. इसके सदस्य देश न केवल भौगोलिक रूप से दूरस्थ हैं, बल्कि राजनीतिक प्रणाली, इतिहास और वैचारिकता के कारण भी भिन्न हैं. चीन का सकल घरेलू उत्पाद दक्षिण अफ्रीका की तुलना में लगभग 40 गुना बड़ा है. चीन आर्थिक महाशक्ति है, तो रूस दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी सैन्य ताकत, जबकि भारत सबसे बड़ा लोकतंत्र है.



आखिर क्या कारण है कि इन विसंगतियों के बावजूद ये सभी देश एक साथ आने में कामयाब रहे? दरअसल, ब्रिक्स एक ऐसी सोच का परिणाम है, जो अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के संचालन में बदलाव चाहती है. द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद जिन अंतरराष्ट्रीय संगठनों का निर्माण हुआ, उनमें पश्चिमी देश हावी रहे हैं.



भारत, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका जैसी महत्वपूर्ण क्षेत्रीय शक्तियां अब भी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्य नहीं हैं और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष एवं विश्व व्यापार संगठन में भी इनकी भूमिका सीमित है. वर्ष 1998 में दिल्ली यात्रा के दौरान रूस के तत्कालीन प्रधानमंत्री एवगेनी प्रिमाकोव ने रूस-भारत-चीन (रिक) सहयोग समूह का प्रस्ताव रखा था. गोल्डमैन साॅक्स के प्रमुख अर्थशास्त्री रह चुके जिम ओ नील का अनुमान था कि ब्रिक्स ग्रुपिंग अमेरिका और यूरोप की आर्थिक क्षमता को पार कर जायेगी.


ब्रिक्स का उद्घाटन 2009 में येकातेरिनबर्ग में हुआ और एक वर्ष बाद दक्षिण अफ्रीका इसमें शामिल हुआ. उस समय अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था एक गहरे संकट से गुजर रही थी. पश्चिमी देशों की तुलना में ब्रिक्स देशों पर इसका प्रभाव काफी कम पड़ा था. चीन और भारत ने इस प्रतिकूलता में भी अपनी विकास दर को बनाये रखा था. तब ब्रिक्स ने यूरोप को वित्तीय सहायता देने की पेशकश की थी.


ब्रिक्स ने यूरो-जोन संकट को दूर करने के लिए आइएमएफ के माध्यम से 75 बिलियन डाॅलर का योगदान देने का वादा किया, जिसमें नयी दिल्ली का योगदान 10 बिलियन डाॅलर था. जानकारों का मानना है कि 2030 तक ब्रिक्स की अर्थव्यवस्था अमेरिका और यूरोपीय देशों से आगे निकल कर वैश्विक अर्थव्यवस्था में 37 प्रतिशत तक पहुंच जायेगी. ब्रिक्स देश अभी लगभग 19 प्रतिशत वैश्विक निर्यात, 16 प्रतिशत वैश्विक आयात और लगभग 19 प्रतिशत का प्रत्यक्ष बाह्य निवेश करते हैं.


अंतरराष्ट्रीय वित्तीय प्रणाली में सुधार के लिए ब्रिक्स का सबसे महत्वपूर्ण योगदान न्यू डेवलपमेंट बैंक (एनडीबी) और ब्रिक्स आकस्मिक रिजर्व व्यवस्था (सीआरए) का निर्माण था. वर्ष 2019 तक ब्रिक्स बैंक ने लगभग 13 बिलियन डाॅलर की लागत वाली 44 अवसंरचना परियोजनाओं को मंजूरी दी थी. एनडीबी कोविड महामारी आपातकालीन निधि के लिए 10 बिलियन डाॅलर की सहायता देने पर भी सहमत हुआ है.


आइएमएफ और विश्वबैंक की तुलना में ब्रिक्स ऋण बिना किसी शर्त के दिये जाते हैं. ब्रिक्स देशों के दबाव के कारण ही आइएमएफ और विश्व बैंक ने कोटा-प्रणाली और प्रबंधन में सुधार किया. ब्रिक्स भारत के बहुआयामी विदेश नीति और रणनीतिक स्वायत्तता के वांछित लक्ष्य को बनाये रखने में मदद करता है. भारत किसी एक खेमे में जाकर अपनी स्वायत्तता को खोना नहीं चाहता है.


ब्रिक्स की सदस्यता भारत को प्रतिष्ठा दिलाती है, क्योंकि वह चीन और रूस जैसे शक्तिशाली देशों के समकक्ष दिखता है. यह भारत को पाकिस्तान, तुर्की, नाइजीरिया और अर्जेंटीना जैसे देशों से अलग करता है. ब्रिक्स क्षेत्रीय नेताओं का संगठन है और इसका दायरा बहुत व्यापक है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 12वीं शिखर बैठक में कहा कि ब्रिक्स तीन मुख्य कारणों से महत्वपूर्ण है.


पहला, अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं (संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद, आइएमएफ और विश्व बैंक) में सुधार के मुद्दे पर अन्य सदस्य देशों के साथ समन्वय, दूसरा, आतंकवाद के खिलाफ ब्रिक्स की साझा रणनीति और व्यापार, निवेश, जलवायु परिवर्तन और कोविड महामारी के मुद्दों पर अंतर-ब्रिक्स सहयोग को बढ़ावा देना.


अपने आर्थिक और राजनीतिक प्रभाव को बढ़ाने के लिए भारत को अंतरराष्ट्रीय संगठनों में एक बड़ी भूमिका निभाने की आवश्यकता है. विशेषाधिकार प्राप्त राष्ट्रों ने नये सदस्यों को समायोजित करने के लिए कोई अधिक उत्साह नहीं दिखाया है. सुधार प्रक्रिया में जानबूझकर देरी की गयी है.


भारत को सुरक्षा परिषद में प्रवेश के लिए अन्य प्रभावशाली ब्रिक्स सदस्यों के समर्थन की आवश्यकता होगी. सभी सदस्यों ने समर्थन का वादा भी किया है. लेकिन चीन का रवैया भारत के समर्थन को लेकर अस्पष्ट रहा है. भारत आतंकवाद का शिकार है और प्रधानमंत्री मोदी सुरक्षा परिषद सहित सभी संभावित मंचों पर इस मुद्दे को उठाते रहे हैं.


इसके बरक्स चीन आतंकवाद के मुद्दे पर संयुक्त राष्ट्र संघ, एफएटीएफ और अन्य अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान को एक राजनयिक कवच प्रदान करता है. भारत हमेशा व्यापार को बढ़ावा देने और ब्रिक्स देशों के बीच सहयोग का समर्थन करता है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय व्यापार के नियम बदल रहे हैं.


विभिन्न देश शुल्क बढ़ा रहे हैं और संरक्षणवाद की वकालत कर रहे हैं. इन उपायों से वैश्विक अर्थव्यवस्था को मदद मिलने की संभावना नहीं दिखती है. चीन ने आसियान, जापान, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण अफ्रीका और न्यूजीलैंड के साथ क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक संधि (आरसीइपी) की है. भारत और अमेरिका इस समझौते का हिस्सा नहीं हैं.


ब्रिक्स सम्मेलन ने लद्दाख की सीमा पर भारत और चीन के बीच सैन्य गतिरोध के किसी संदर्भ से परहेज किया है, क्योंकि द्विपक्षीय सीमा विवाद ब्रिक्स के दायरे में नहीं आता. भारत ब्रिक्स की अगली बैठक की मेजबानी और अध्यक्षता करेगा. यदि आपसी रार में बढ़ोतरी होती रही, तो नेताओं के लिए बातचीत कर पाना और आपसी सहयोग को बढ़ाना मुश्किल होगा.


भारत और चीन के बीच सीमा संघर्ष ने भू-राजनीतिक सहयोग की संभावनाओं पर सवालिया निशान लगा दिया है. जब संगठन के दो प्रमुख सदस्य घातक सैन्य गतिरोध में उलझे हों, तो विश्व व्यवस्था को बदलने की बात बेमानी लगती है. जब ब्रिक्स अपने ही दो मुख्य सदस्यों के बीच के संघर्ष का समाधान कर पाने में सफल नहीं होता है, तो इसके प्रभावी भविष्य की संभावनाओं को बड़ा धक्का लग सकता है, जो किसी के भी व्यापक हित में नहीं होगा.

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Wednesday, November 18, 2020

Editorial : अक्षम सुरक्षा परिषद (प्रभात खबर)

शक्ति, संरचना, नियम और मानकों के मामले में भू-राजनीति संयुक्त राष्ट्र के गठन के बाद से पूर्णतः बदल चुकी है. इस कालखंड में दुनिया ने शक्ति संतुलन को बदलते और नयी शक्तियों को उभरते हुए देखा है. औपनिवेशक युग का अवसान और नये स्वतंत्र राष्ट्रों का उत्थान देखा है. लेकिन, इन बदलावों के बीच स्वयं संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ही अप्रासंगिक होता गया.



उसकी अपंग कार्यशैली आज की वैश्विक शांति और सुरक्षा से जुड़ी चिंताओं को हल कर पाने में सक्षम नहीं है. संयुक्त महासभा के 75वें सत्र में सुरक्षा परिषद की इसी अक्षमता का जिक्र करते हुए भारत के स्थायी प्रतिनिधि टीएस तिरुमूर्ति ने सही ही कहा कि यहां आइजीएन (अंतर-सरकारी वार्ता) विश्वविद्यालयों में होनेवाली बहस के प्लेटफॉर्म जैसी ही बनकर रह गयी है.



यहां नतीजों तक पहुंचने की कोशिशें नहीं होतीं और बीते एक दशक में यह केवल जोशीले भाषणों का मंच बना रहा है. कार्यवाही के निर्धारित नियम और रिकॉर्ड नहीं होना भी आइजीएन की लापरवाही को दर्शाता है. कुछ मुट्ठीभर देश ऐसे हालात के लिए जिम्मेदार हैं और सुधारों की राह में बड़े अवरोधक भी. भारत हमेशा खुली, समावेशी और पारदर्शी प्रक्रिया का समर्थक रहा है.


शांति स्थापना, प्रतिबंध लगाने और सुरक्षा परिषद प्रस्तावों के तहत सैन्य कार्रवाई जैसे प्रभावी फैसले लेने के लिए ही सुरक्षा परिषद का गठन किया गया था. लेकिन, जिस तरह से दुनिया के अनेक हिस्सों में शांति बाधित हुई और हिंसा का अंतहीन तांडव चला, उसे नियंत्रित कर पाने में सुरक्षा परिषद पूरी तरह से असफल ही रहा है.


पांच स्थायी सदस्य देशों के फैसले आज की वास्तविकता के अनुकूल नहीं हो सकते. शीत युद्ध के बाद वैश्विक आर्थिक ऑर्किटेक्चर बदल चुका है. भारत जैसे अनेक देशों का मानना है कि संयुक्त राष्ट्र में लोकतंत्र की कमी प्रभावी बहुपक्षवाद को बाधित करती है. बहुपक्षवाद और समुचित प्रतिनिधित्व के सवाल पर संयुक्त राष्ट्र की खामोशी दुर्भाग्यपूर्ण है.


दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र और एशिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाला भारत संयुक्त राष्ट्र के शांति मिशनों में सबसे बड़ा भागीदार भी रहा है. भारत की विदेश नीति विवादों के बजाय हमेशा विश्व शांति की पैरोकार रही है. सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्य के तौर पर भारत वैश्विक मसलों से निपटने में असरकारक भूमिका अदा कर सकता है.


भारत के अलावा दक्षिण अमेरिका और अफ्रीका का प्रतिनिधित्व न होना वर्तमान भू-राजनीतिक वास्तविकताओं से मुंह मोड़ने जैसा ही है. दक्षिण एशिया युद्ध, आतंकवाद और उन्माद से सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्रों में से एक है.


क्षेत्रीय स्तर पर इन चुनौतियों से निपटने के लिए भारत का सशक्त होना जरूरी है. भारत संयुक्त राष्ट्र का संस्थापक सदस्य है और इतने वर्षों बाद सुरक्षा परिषद में नुमाइंदगी नहीं मिलना सरासर गलत है. समय की मांग है कि वैश्विक शांति और सुरक्षा के लिए भारत जैसे देश विश्व मंच पर अपनी प्रभावी भूमिका अदा करें.


भारत जैसे अनेक लोकतंत्र समर्थक देशों का मानना है कि संयुक्त राष्ट्र में लोकतंत्र की कमी प्रभावी बहुपक्षवाद को बाधित करती है.


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हवा को स्वच्छ रखने से फिर चूके (प्रभात खबर)

पंकज चतुर्वेदी, वरिष्ठ पत्रकार


प्रदूषण के प्रति चिंता व अपील व्यक्त करने के बाद भी दिल्ली व उसके आस-पास लोगों ने दीपावली पर इतने पटाखे चलाये कि हवा के जहरीले होने का बीते चार वर्ष का रिकॉर्ड टूट गया. दीपावली की रात दिल्ली में कई जगह वायु की गुणवत्ता अर्थात एक्यूआइ 900 के पार था. लगभग एक गैस चैंबर के मानिंद, जिसमें नवजात बच्चों का जीना मुश्किल है,



सांस या दिल के रोगियों के जीवन पर इतना गहरा संकट कि स्तरीय चिकित्सा तंत्र भी उससे उबरने की गारंटी नहीं दे सकता. बीते एक महीने से एनजीटी से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक में जहरीली हवा से जूझने के तरीकों पर सख्ती से आदेश हो रहे थे. आतिशबाजी न जलाने की अपीलवाले लाखों रुपये के विज्ञापन पर चेहरे चमकाये जा रहे थे, दावे तो यह भी थे कि आतिशबाजी बिकने ही नहीं दी जा रही.



मौसम विभाग पहले ही बता चुका था कि पश्चिमी विक्षोभ के कारण बन रहे कम दवाब के चलते दीवाली के अगले दिन बरसात होगी. ऐसा हुआ भी. हालांकि दिल्ली-एनसीआर में थोड़ा ही पानी बरसा, उतनी ही देर में दिल्ली के दमकल विभाग को 57 ऐसे फोन आये, जिसमें बताया गया कि आसमान से कुछ तेलीय पदार्थ गिर रहा है, जिससे सड़कों पर फिसलन हो रही है.


असल में यह वायुमंडल में ऊंचाई तक छाये ऐसे धूल-कण का कीचड़ था, जो लोगों की सांस घोंट रहा था. यदि दिल्ली में बरसात ज्यादा हो जाती, तो मुमकिन है कि अम्ल-वर्षा के हालात बन जाते. अधिकांश पटाखे सल्फर डाइऑक्साइड और मैग्नीशियम क्लोरेट के रसायनों से बनते हैं, जिनका धुआं इन दिनों दिल्ली के वायुमंडल में टिका हुआ है.


इनमें पानी का मिश्रण होते ही सल्फ्यूरिक एसिड व क्लोरिक एसिड बनने की संभावना होती है. यदि ऐसा होता, तो हालात बेहद भयावह हो जाते और उसका असर हरियाली, पशु-पक्षी पर भी होता. जिस जगह ऐसी बरसात का पानी जमा होता, वह बंजर हो जाती.


यह बात अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत के लिए चिंता का विषय बन गयी है कि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की हवा बेहद विषाक्त है. एक्यूआइ 500 होने का अर्थ होता है कि अब यह हवा इंसान के सांस लेने लायक नहीं बची, जो समाज किसान की पराली को हवा गंदा करने के लिए कोस रहा था, उसने दो-तीन घंटे में ही कोरोना से उपजी बेरोजगारी व मंदी, प्रकृति संरक्षण के दावों तथा कानून के सम्मान सभी को कुचल कर रख दिया.


दिल्ली से सटे गाजियाबाद के स्थानीय निकाय का कहना है कि केवल एक रात में पटाखों के कारण दो सौ टन अतिरिक्त कचरा निकला. जब हवा में कतई गति नहीं है और आतिशबाजी के रासायनिक धुएं से निर्मित स्मॉग के जहरीले कण भारी होने के कारण ऊपर नहीं उठ पाते व इंसान की पहुंच वाले वायुमंडल में ही रह जाते हैं,


तो सांस लेने पर ये इंसान के फेफड़े में पहुंच जाते हैं. फेफड़ों का दुश्मन कोरोना वायरस हमारे आस-पास मंडरा रहा है, ऐसे में आतिशबाजी ने उत्प्रेरक का काम किया है और हो सकता है कि आनेवाले दिनों में कोविड-19 और भयावह तरीके से उभरे.


अतिशबाजी ने राजधानी दिल्ली की आबो-हवा को इतना जहरीला कर दिया है कि बाकायदा एक सरकारी सलाह जारी की गयी है कि यदि जरूरी न हो तो घर से न निकलें. फेफड‍़ों को जहर से भर कर अस्थमा व कैंसर जैसी बीमारी देनेवाले पीएम यानी पार्टिक्यूलर मैटर की निर्धारित सीमा 60 से 100 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर है, जबकि दीपावली के बाद यह सीमा कई जगह एक हजार के पार हो गयी है.


पटाखे जलाने से निकले धुंए में सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोऑ‍क्साइड, शीशा, आर्सेनिक, बेंजीन, अमोनिया जैसे कई जहर सांसों के जरिये शरीर में घुलते हैं. आतिशबाजी से उपजे शोर के घातक परिणाम तो हर साल बच्चे, बूढ़े व बीमार लोग भुगतते ही हैं. इससे उपजे करोड़ों टन कचरे का निबटान भी बड़ी समस्या है.


यह जान लें कि दीपावली पर परंपराओं के नाम पर कुछ घंटे जलायी गयी बारूद कई वर्षों तक आपकी ही जेब में छेद करेगी, जिसमें दवाइयों व डॉक्टर पर होनेवाला व्यय प्रमुख है. आतिशबाजी पर नियंत्रण करने के लिए अभी से ही आतिशबाजियों में प्रयुक्त सामग्री व आवाज पर नियंत्रण, दीपावली के दौरान हुए अग्निकांड, बीमार लोग, बेहाल जानवरों की सच्ची कहानियां सतत प्रचार माध्यमों व पाठ्य-पुस्तकों के माध्यम से आम लोगों तक पहुंचाने का कार्य शुरू किया जाये.


यह जानना जरूरी है कि दीपावली असल में प्रकृति पूजा का पर्व है. यह समृद्धि के आगमन और पशु धन के सम्मान का प्रतीक है. इसका राष्ट्रवाद और धार्मिकता से कोई ताल्लुक नहीं है. यह गैर-कानूनी व मानव-द्रोही कदम है. इस बार समाज ने कोरोना, मंदी, पहले से ही हवा में जहर होने के बावजूद दीपावली पर जिस तरह मनमानी दिखायी,


उससे स्पष्ट है कि अब आतिशबाजी पर पूर्ण पाबंदी के लिए अगले साल दीपावली का इंतजार करने के बनिस्पत, सभ्य समाज और जागरूक सरकार को अभी से काम करना होगा. ताकि अपने परिवेश की हवा को स्वच्छ रखने का संकल्प महज रस्म अदायगी न बन जाये.


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Tuesday, November 17, 2020

Editorial : बाइडेन के सामने नीतिगत चुनौतियां

करामतुल्लाह के गोरी, वरिष्ठ कूटनीति विशेषज्ञ


यह तय हो चुका है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बाद डेमोक्रेटिक पार्टी के जो बाइडेन अगले साल अमेरिका की बागडोर संभालेंगे. लेकिन, ट्रंप अभी भी अपनी हार स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं. डोनाल्ड ट्रंप कार्यकाल ठीक उसी तरह समाप्त हो रहा है, जैसे उसकी शुरुआत हुई थी- अमेरिका को विभाजित कर और उसमें ध्रुवीकरण कर. अपने कार्यालय में पहले क्षण से ही वे कभी सभी अमेरिकियों के राष्ट्रपति नहीं रहे हैं.



अमेरिका की आबादी के बदलते स्वरूप से खतरा महसूस करनेवाले श्वेत वर्चस्व के समर्थकों के विध्वंसक एजेंडे को उकसाने की अपनी संकीर्णता से उबरने का उन्होंने कभी प्रयास नहीं किया. ट्रंप ने कभी भी अपने समर्थकों तथा उन लोगों के बीच बढ़ती खाई को पाटने की कोई जहमत नहीं उठायी, जिन्हें वे अपना दुश्मन मानते रहे हैं.



उनका यह विक्षोभ से भरा व्यवहार अमेरिका तक ही सीमित नहीं रहा है. ‘अमेरिका फर्स्ट’ का उनका नारा अमेरिका के पारंपरिक सहयोगियों को नाराज करने का बहाना बन गया तथा इससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमेरिकी वादों व जवाबदेही का कोई मतलब ही नहीं रहा. उन्होंने बेपरवाही से नाटो के सहयोगी देशों को परेशानी में डाला, जलवायु परिवर्तन से संबंधित पेरिस समझौते से अमेरिका को अलग कर लिया, एशिया-प्रशांत क्षेत्र से जुड़े एक बहुपक्षीय आर्थिक सहयोग समझौते से भी नाता तोड़ लिया तथा ईरान के साथ हुए परमाणु समझौते से भी वे बाहर निकल गये, जिसे उनके पूर्ववर्ती राष्ट्रपति बराक ओबामा ने बड़ी मेहनत से साकार किया था.


इस्राइली दमन से दबे फिलिस्तीनियों के विरुद्ध खुली अवमानना के साथ ट्रंप ने तेलअवीव स्थिति अमेरिकी दूतावास का स्थानांतरण जेरूसलम में कर दिया, जो अंतरराष्ट्रीय कानूनों के साथ उनके प्रति अमेरिका की जवाबदेही के भी विरुद्ध था. लेकिन डोनाल्ड ट्रंप अपने पतन की गर्त में कोरोना महामारी से लड़ने की अपनी जिम्मेदारी से पूरी तरह इनकार करने की वजह से पहुंचे. किसी और वजह से कहीं ज्यादा इस संक्रमण के विरुद्ध अमेरिका का नेतृत्व करने में उनकी असफलता बाइडेन के सामने हार का कारण बनी.


लगभग ढाई लाख अमेरिकियों की मौत के बावजूद अमेरिकी इतिहास के इस सबसे मुश्किल दौर में अपनी असफलता को लेकर उन्होंने कोई अफसोस भी नहीं जताया. इस तबाही के दुख पर उन्होंने विश्व व्यापार संगठन और चीन के साथ उसके कथित गठजोड़ को निशाना बनाकर नमक छिड़कने का ही काम किया. इसके उलट जो बाइडेन ने कोविड संक्रमण से लड़ाई को अपनी सबसे बड़ी प्राथमिकता घोषित किया है. अपने गृह नगर में अपनी जीत की घोषणा करते हुए उन्होंने कहा कि वे शीर्षस्थ वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों की एक टीम तैयार करेंगे, जो इस महामारी से लड़ने की योजना बनायेगी.


बहरहाल, व्हाइट हाउस में राष्ट्रपति के कार्यालय के दरवाजे पर ट्रंप का फैलाया हुआ बहुत सारा कचरा है, जिसे बाइडेन को साफ करना होगा और उसके बाद ही वे उस व्यक्ति द्वारा अमेरिकी राजनीति को दिये गये घावों को ठीक करने का काम शुरू कर सकते हैं, जो प्रख्यात विद्वान नॉम चोम्स्की के शब्दों में मानवजाति के इतिहास में शासन करनेवाला सबसे खराब अपराधी है. विभाजन के प्रमुख प्रणेता ट्रंप एक ऐसे देश को विरासत में छोड़ रहे हैं, जो नस्लीय और सामाजिक तौर पर गंभीर रूप से बंटा है तथा उनकी नीतियों की वजह से जिसका अतिशय ध्रुवीकरण हो चुका है.


इसका अर्थ है कि बाइडेन को इस संदर्भ में बहुत कुछ करना है, जो लगभग साढ़े सात करोड़ वोट लेकर अमेरिकी लोकतंत्र के इतिहास में एक विशिष्ट अध्याय जोड़ चुके हैं. इतिहास बाइडेन के साथ उपराष्ट्रपति बनने जा रहीं कमला हैरिस ने भी रचा है, जो जमैका और भारतीय मूल की हैं. वे इस पद पर पहुंचनेवाली पहली महिला होने के साथ पहली गैर-श्वेत महिला भी होंगी. हैरिस अमेरिकी नेतृत्व के शीर्ष के बिल्कुल निकट जा पहुंची हैं.


अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विदेश नीति में भी बदलाव आयेगा, किंतु यह बहुत जल्दी नहीं होगा. नाटो और यूरोप के सहयोगियों के साथ संबंधों को सुधारने के साथ अफगानिस्तान में अमेरिका के सबसे लंबे युद्ध से निकालना शीर्ष प्राथमिकताएं होंगी. लेकिन यह कहना जितना आसान है, उतना करना नहीं. अफगानिस्तान बाइडेन की ईमानदारी और स्पष्टता के लिए बड़ी परीक्षा साबित हो सकता है. इस संदर्भ में पाकिस्तान पहले और भारत बाद में बाइडेन की विदेश नीति के राडार पर जगह पाने के लिए कोशिश करेगा.


ट्रंप ने अपने प्रशासन के रवैये से उलट यह संकोच के साथ माना था कि अफगान मसले के समाधान में और अमेरिका को आग से निकालने में पाकिस्तान की मदद की दरकार है. लेकिन उस प्रशासन ने अमेरिका के हटने के बाद के अफगानिस्तान में भारत की भूमिका को भी चिह्नित करने का प्रयास किया था. खासकर उस स्थिति में अगर अफगान तालिबान के साथ अंतिम समझौते में भारत किसी तरह शामिल न हो सका. लेकिन पाकिस्तान के साथ अमेरिका के संबंधों में उतार-चढ़ाव की संभावना बनी रहेगी.


पाकिस्तान को यह याद रखना चाहिए कि डेमोक्रेट प्रशासन का झुकाव रिपब्लिकन प्रशास0न की तुलना में पाकिस्तान की ओर कुछ कम ही होता है. भारत को ताजा भरोसा यह दिया जा सकता है कि उसके साथ नजदीकी सहयोग बनाना नये प्रशासन की प्राथमिकता है. भारतीय नेता और नीति निर्धारक भले यह स्वीकार न करें, पर भारत गुटनिरपेक्षता के दौर में भी अवसर मिलने पर अमेरिकी काफिले के साथ रवानगी के लिए तैयार रहता था. इसका एक उदाहरण यह है कि पंडित नेहरू 1962 में चीनी आक्रमण के समय जब राष्ट्रपति केनेडी से हथियार हासिल करना चाहते थे, तब वे अमेरिका के साथ रक्षा समझौता करने के लिए भी तैयार थे.


दरअसल, बाइडेन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ ट्रंप की तरह भले गलबहियां न करें, लेकिन अमेरिका के ऐसा करने की पूरी संभावना है. इसका कारण चीन के साथ उसकी तनातनी है और उसमें भारत का साथ संतुलन साधने में मददगार हो सकता है. भारत के लिए बाइडेन प्रशासन से आशंकित होने की कोई वजह नहीं है. लेकिन ट्रंप के साथ बेहद नजदीकी बना चुके सऊदी अरब और खाड़ी देशों के शेखों की चिंता बढ़ेगी. ईरान के प्रति अपनी नफरत में चूर ट्रंप अरब के तानाशाहों को तुष्ट करने के लिए किसी भी हद तक जा सकते थे. ईरान अपने संबंधों की कुछ मरम्मत की उम्मीद कर सकता है. एक नया खेल शुरू होनेवाला है.


(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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Editorial : न्यूनतम कीमत की गारंटी हो

By डॉ अश्विनी महाजन, एसोसिएट प्रोफेसर, दिल्ली विश्वविद्यालय 


केंद्र सरकार ने तीन कृषि कानूनों के माध्यम से कृषि वस्तुओं के मार्केटिंग कानूनों में व्यापक बदलाव किये हैं. आवश्यक वस्तु अधिनियम में संशोधन कर कृषि वस्तुओं के भंडारण पर लगी सीमाओं को हटा लिया गया है. इससे व्यापारी और कंपनियां कृषि वस्तुओं का ज्यादा भंडारण कर सकेंगे. ऐसा देखा गया कि चूंकि अब देश में कृषि वस्तुओं का पर्याप्त उत्पादन होता है, इसलिए भंडारण से कीमतें बढ़ने का कोई विशेष खतरा नहीं है, बल्कि अधिक उत्पादन होने पर भंडारण की सुविधाएं होनी जरूरी हैं.


इसके साथ ही एक अन्य कृषि अधिनियम के माध्यम से पूर्व की कृषि मंडियों (एपीएमसी मंडी) के बाहर और प्राइवेट मंडियों में भी कृषि वस्तुओं की खरीद हो सकेगी. संविदा खेती यानी ‘काॅन्ट्रैक्ट फार्मिंग’ के नियम भी बनाये गये हैं. ऐसा समझा जाता है कि इससे किसान को अपनी उपज पहले से ही निश्चित कीमत पर बेचना संभव होगा. लेकिन, किसानों के बीच यह भय भी व्याप्त है कि अब कृषि वस्तुओं की खरीद करते हुए व्यापारी और कंपनियां किसान का शोषण कर सकते हैं.


उनकी यह मांग है कि कृषि वस्तुओं की खरीद सरकार द्वारा घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम पर न हो. गौरतलब है कि सरकार गेहूं, धान, दाल सहित कई कृषि वस्तुओं की खरीद न्यूनतम समर्थन मूल्य पर करती है. यह भी सच है कि मात्र छह प्रतिशत कृषि वस्तुओं की ही खरीद सरकार द्वारा होती है और अधिकांश (लगभग 94 प्रतिशत) बाजार में ही बिकती हैं. चूंकि किसान आर्थिक दृष्टि से कमजोर होता है और कर्ज व जरूरी खर्चों के बोझ के चलते शोषण का शिकार हो सकता है, इसलिए उसके हितों की सुरक्षा हेतु कानूनी प्रावधान किये जाने चाहिए.


एक तरफ देशभर के किसान यह मांग कर रहे हैं कि नयी व्यवस्था में उन्हें अपने उत्पाद की उचित कीमत सुनिश्चित हो और मंडी के अंदर या मंडी के बाहर, सरकार अथवा निजी व्यापारी एवं कंपनियां न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम खरीद न कर पायें और इसके उल्लंघन पर दंड का प्रावधान हो. दूसरी तरफ इसके विरोध में कुछ अर्थशास्त्री एवं सरकारी तंत्र के कुछ लोग यह तर्क दे रहे हैं कि ऐसा करना विधिसंगत नहीं होगा और न्यूनतम समर्थन मूल्य निजी व्यापारियों पर थोपे जाने से वे किसान का उत्पाद खरीदने के प्रति हतोत्साहित होंगे और देशी किसानों से खरीद के बजाय विदेश से आयात करेंगे.


विरोधियों का यह भी तर्क है कि अधिक न्यूनतम समर्थन मूल्य से कृषि जिन्सों की कीमतें बढ़ जायेंगी, जिससे उपभोक्ताओं को नुकसान होगा. कुछ ऐसे आर्थिक विश्लेषक भी हैं, जो कहते हैं कि अधिक न्यूनतम समर्थन मूल्य खाद्य पदार्थों की महंगाई का कारण बनते हैं और देश की प्रतिस्पर्धा शक्ति दुनिया के बाजारों में कमजोर होती है. इससे कृषि उत्पादों का निर्यात भी प्रभावित हो सकता है. विरोधियों का यह भी कहना है कि संभव है कि खराब क्वालिटी के कृषि उत्पादों को भी उन्हें न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदना पड़ेगा, जो उनके लिए नुकसानदायी होगा.


ये सर्वथा गलत तर्क हैं. विभिन्न अर्थशास्त्रियों ने समय-समय पर यह स्थापित किया है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य के कारण महंगाई नहीं बढ़ती. इस संबंध में 2016 में संपन्न प्रो आर आनंद के शोध के अनुसार कि जब-जब खाद्यान्नों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में वृद्धि थोक मूल्य सूचकांक की तुलना में ज्यादा हुई, तब-तब किसानों द्वारा कीमत प्रोत्साहन के कारण उत्पादन बढ़ाया गया. इस शोध का मानना है कि अधिक समर्थन मूल्य से खाद्यान्नों की कीमत वृद्धि गैर खाद्य मुद्रा स्फीति से कम होगी. ऐसे शोध परिणाम अन्य अर्थशास्त्रियों ने भी निकाले हैं.


वास्तव में यदि किसानों का उनकी कमजोर आर्थिक स्थिति के चलते शोषण होता है और उन्हें कृषि कार्य करते हुए नुकसान का सामना करना पड़ता है, तो उसका परिणाम देश की अर्थव्यवस्था के लिए कभी कल्याणकारी नहीं होगा. हम जानते हैं कि जब-जब देश में कृषि उत्पादन बाधित होता है, तब-तब कृषि जिंसों की कमी के चलते खाद्य मुद्रा स्फीति बढ़ती है. इसका प्रभाव यह होता है कि जीवनयापन महंगा हो जाता है और मजदूरी दर बढ़ती है तथा अंतत: महंगाई और ज्यादा बढ़ जाती है. महंगाई बढ़ती है, तो ग्रोथ बाधित होती है.


न्यूनतम समर्थन मूल्य के विरोधियों के अन्य तर्कों में भी कोई दम नहीं है. उनका यह कहना कि यदि व्यापारियों और कंपनियों को ज्यादा कीमत देनी पड़ेगी, तो वे कृषि जिन्सों का आयात करेंगे. समझना होगा कि भारत में कृषि व्यापार का विषय नहीं, बल्कि जीवनयापन और संस्कृति है. किसानों के कल्याण से ही देश कृषि उत्पादन में आत्मनिर्भर रह सकता है. इसलिए अंतरराष्ट्रीय कीमतें कम होने पर आयात करने की बजाय आयातों पर ज्यादा आयात शुल्क और अन्य प्रकार से रोक लगाना ज्यादा कारगर उपाय है.


हम जानते हैं कि देश से सबसे ज्यादा निर्यात होनेवाली कृषि जिंस चावल है, जिसके उत्पादन को दशकों से उचित समर्थन मूल्य देकर प्रोत्साहित किया गया. वर्षों से दालों के क्षेत्र में भारत विदेशों पर इसलिए निर्भर रहा, क्योंकि किसानों को दालों का उचित मूल्य नहीं मिलता था. पिछले कुछ वर्षों से जब से दालों के लिए सरकार ने उच्च समर्थन मूल्य घोषित करना प्रारंभ किया, दाल उत्पादन डेढ़ गुना से भी ज्यादा हो गया. इसी प्रकार, यदि व्यापारी खराब गुणवत्ता के उत्पाद नहीं खरीदें, तो किसान स्वयं ही बढ़िया उत्पाद पैदा करने लगेंगे.


(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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Monday, November 16, 2020

Editorial : छठ बने पर्यावरण संरक्षण महापर्व

 आशुतोष चतुर्वेदी, प्रधान संपादक, प्रभात खबर

ashutosh.chaturvedi@prabhatkhabr.in

भारत में उत्सव और त्योहारों की प्राचीन परंपरा है. पूर्वी भारत का बड़ा पर्व है छठ और इसे महापर्व भी कहा जा सकता है. दीपावली निकल गयी है और छठ का माहौल बन गया है. व्रत रखनेवाली महिलाओं ने तैयारी शुरू कर दी है. कोरोना काल में थोड़ी बाधा भले ही आ गयी हो, लेकिन लोगों की आस्था में कोई कमी नहीं आयी है. कठिनाई के बावजूद लोग अपने घर पहुंचने लगे हैं. कुछ अरसा पहले तक छठ बिहार, झारखंड और पूर्वांचल तक ही सीमित था, लेकिन अब यह पर्व देश-विदेशव्यापी हो गया है. वैसे तो सभी पर्व-त्योहार महत्वपूर्ण होते हैं, लेकिन पूर्वांचल के लोगों के बीच धर्म और आस्था के प्रतीक के तौर पर छठ सबसे महत्वपूर्ण है.



छठ सूर्य अराधना का पर्व है और सूर्य को हिंदू धर्म में विशेष स्थान प्राप्त है. देवताओं में सूर्य ही ऐसे देवता हैं, जो मूर्त रूप में नजर आते हैं. कोणार्क का सूर्य मंदिर तो इसका जीता-जागता उदाहरण है. इस पर्व में अस्त होते अौर उगते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है. सूर्य को आरोग्य-देवता भी माना जाता है. सूर्य की किरणों में कई रोगों को नष्ट करने और निरोग करने की क्षमता पायी जाती है. माना जाता है कि ऋषि-मुनियों ने कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को इसका प्रभाव विशेष पाया और यहीं से छठ पर्व की शुरुआत हुई.



छठ को स्त्री और पुरुष समान उत्साह से मनाते हैं, लेकिन इस पुरुष प्रधान समाज में व्रत की प्रधान जिम्मेदारी केवल महिलाओं की है. आप एक सिरे से देख लीजिए- पति से लेकर बच्चों तक के कल्याण के सभी व्रत महिलाओं के जिम्मे हैं. छठ व्रत निर्जला और बेहद कठिन होता है, और बड़े नियम-विधान के साथ रखा जाता है. हालांकि कुछ पुरुष भी इस व्रत को रखते हैं, लेकिन अधिकांशत: कठिन तप महिलाएं ही करती हैं. चार दिनों के इस व्रत में व्रती को लंबा उपवास करना होता है. भोजन के साथ ही सुखद शय्या का भी त्याग किया जाता है. पर्व के लिए बनाये गये कमरे में व्रती फर्श पर एक कंबल अथवा चादर के सहारे ही रात बिताती है. छठ पर्व को शुरू करना कोई आसान काम नहीं है.


एक बार व्रत उठा लेने के बाद इसे तब तक करना होता है, जब तक कि अगली पीढ़ी की कोई विवाहित महिला इसके लिए तैयार न हो जाए. इसके नियम बहुत कड़े हैं. इसमें छूट की कोई गुंजाइश नहीं है. इसका मूल मंत्र है शुद्धता, पवित्रता और आस्था. इस दौरान तन और मन दोनों की शुद्धता और पवित्रता का भारी ध्यान रखा जाता है, लेकिन तकलीफ तब होती है कि जिस शुद्धता और पवित्रता की अपेक्षा इस त्योहार से की जाती है, उसका सार्वजनिक जीवन में ध्यान नहीं रखा जाता. यह महापर्व नदी-तालाबों के तट पर मनाया जाता है. दुखद यह है कि छठ के बाद इन स्थलों की स्थिति देख लीजिए.


वहां गंदगी का अंबार लगा मिलता है. हम स्वच्छता के इस महापर्व के बाद पूरे साल अपनी नदियों-तालाबों की कोई सुध नहीं लेते हैं और उन्हें जम कर प्रदूषित करते हैं, जबकि हमारे देश में नदियों को देवी स्वरूप मान कर उन्हें पूजा जाता है. यह हमारे संस्कार और परंपरा का हिस्सा है. एक तरफ नदियों को मां कह कर पूजा जाता है, तो दूसरी ओर हम उनमें गंदगी प्रवाहित करने में कोई संकोच नहीं करते हैं. हमने नदियों को इतना प्रदूषित कर दिया है कि वे पूजने लायक नहीं रहीं हैं. नदियों को जीवनदायिनी माना जाता है. यही वजह है कि अधिकांश प्राचीन सभ्यताएं नदियों के किनारे विकसित हुईं हैं.


आप गौर करें, तो पायेंगे कि उत्तर भारत के सभी प्राचीन शहर नदियों के किनारे बसे हैं, लेकिन हमने इन जीवनदायिनी नदियों की बुरी गत कर दी है. केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्ट के अनुसार देश में अधिकांश नदियों का अस्तित्व संकट में हैं. बोर्ड देश की 521 नदियों के पानी पर नजर रखता है. उसका कहना है कि देश की 198 नदियां ही स्वच्छ हैं. इनमें अधिकांश छोटी नदियां हैं, जबकि ज्यादातर बड़ी नदियां प्रदूषित हैं. दरअसल, हमें स्वच्छता के प्रति अपना नजरिया बदलना होगा. छठ में इतनी शुद्धता और पवित्रता का ध्यान, लेकिन अपने आसपास की स्वच्छता को लेकर ऐसा नजरिया किसी सूरत में स्वीकार्य नहीं हो सकता.


दरअसल, हम भारतीयों का सफाई के प्रति नकारात्मक रवैया है. भारतीय सफाई के लिए कोई प्रयास नहीं करते हैं और जो लोग सफाई के काम में जुटे होते हैं, उन्हें हम हेय दृष्टि से देखते हैं. स्वच्छता और सफाई के काम को करने में सांस्कृतिक बाधाएं भी आड़े आती हैं. देश में ज्यादातर धार्मिक स्थलों के आसपास अक्सर बहुत गंदगी दिखाई देती है. इन जगहों पर चढ़ाये गये फूलों के ढेर लगे होते हैं. कुछेक मंदिरों ने स्वयंसेवी संस्थाओं की मदद से फूलों के निस्तारण और उन्हें जैविक खाद बनाने का प्रशंसनीय कार्य प्रारंभ किया है, जिसकी जितनी तारीफ की जाए, कम है.


अन्य धर्म स्थलों को भी ऐसे उपाय अपनाने चाहिए. राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का सफाई के प्रति विशेष प्रेम था. वह लोगों से किसी काम का अनुरोध बाद में करते थे, पहले उस पर खुद अमल करते थे. 11 फरवरी, 1938 को हरिपुरा अधिवेशन में गांधीजी ने कहा था- जो लोग गंदगी फैलाते हैं, उन्हें यह नहीं मालूम कि वे क्या बुराई कर रहे हैं. महात्मा गांधी ने धार्मिक स्थलों में फैली गंदगी की ओर भी ध्यान दिलाया था. अगर आप गौर करें, तो पायेंगे कि आज भी अनेक धार्मिक स्थलों में गंदगी का अंबार लगा रहता है. यंग इंडिया के फरवरी, 1927 के अंक में गांधी ने बिहार के पवित्र शहर गया की गंदगी के बारे में भी लिखा था.


उनका कहना था कि उनकी हिंदू आत्मा गया के गंदे नालों में फैली गंदगी और बदबू के खिलाफ विद्रोह करती है. लोगों में जब तक साफ सफाई और प्रदूषण के प्रति चेतना नहीं जगेगी, तब तक कोई उपाय कारगर साबित नहीं होगा. हम लाखों-करोड़ों रुपये खर्च करके सुंदर मकान तो बना लेते हैं, लेकिन नाली पर ध्यान नहीं देते. अगर नाली है भी, तो उसे पाट देते हैं और गंदा पानी सड़क पर बहता रहता है. यही स्थिति कूड़े की है. हम कूड़ा सड़क पर फेंक देते हैं, उसे कूड़ेदान में नहीं डालते.


यह बात सबको स्पष्ट होनी चाहिए कि स्वच्छता का काम केवल सरकार के बूते का नहीं है. इसमें जन भागीदारी जरूरी है. सरकारें नदियों-तालाबों का प्रदूषण नियंत्रित करने की जिम्मेदारी अकेले नहीं निभा सकती हैं. प्रदूषण मुख्य रूप से मानव निर्मित होता है इसलिए इसमें सुधार एक सामूहिक जिम्मेदारी है. साथ ही हमारी जनसंख्या जिस अनुपात में बढ़ रही है, उसके अनुपात में सरकारी प्रयास हमेशा नाकाफी रहने वाले हैं.


हमें अपनी नदियों व तालाबों के प्रदूषण को नियंत्रित करने के प्रयासों में योगदान करना होगा, तभी स्थितियों में सुधार लाया जा सकता है. अगर हम ठान लें, तो यह कोई मुश्किल काम नहीं है. इसमें हर व्यक्ति कुछ न कुछ योगदान कर सकता है. यदि हम छठ पर्व को पर्यावरण संरक्षण का पर्व बना दें, तो देश और समाज का बहुत कल्याण हो सकता है.



सौजन्य - प्रभात खबर।

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Editorial : जैविक खेती की ओर भारतीय कृषि

By अशोक भगत 

पद्मश्री अशोक भगत, सचिव, विकास भारती, बिशुनपुर


कोरोना विषाणु का दंश झेल रही दुनिया को विषाणुओं के दुष्प्रभाव समझ में आने लगे हैं. ऐसे में हमें अपनी जड़ों की ओर मुड़ना चाहिए और प्रकृति समन्वय को संस्कृति का आधार बनाना चाहिए. हमारी संस्कृति का आधार गाय, गंगा, वेद यानी सकारात्मक ज्ञान, प्रकृति का संरक्षण व वैश्विक सोच रही है. भारतीय संस्कृति ऋषि और कृषि की संस्कृति है, जिसमें गो-पालन का विशेष महत्व है. इसमें गोवंश के प्रति एक विशेष प्रकार की आस्था है, जिसके मूल में इनकी उपादेयता के महत्व की स्वीकृति अौर धार्मिक भाव है.



आक्रांताओं या किसी और संस्कृति के प्रभाव के कारण शेष भारत में थोड़ी सांस्कृतिक विद्रुपता तो दिखती है, लेकिन जनजातीय समाज आज भी बहुत हद तक अपनी परंपराओं, संस्कृति और उत्सवधर्मिता पर कायम है. इस समाज में पशुपालन के महत्व को इसी बात से समझा जा सकता है कि इसके लिए यह समाज बाकायदा एक त्योहार मनाता है. दीवाली के ठीक दूसरे दिन झारखंड का जनजातीय समाज सोहराई पर्व मनाता है.



यह वस्तुत: पशुधन की पूजा का पर्व है। सोहराई के दिन समाज अपने पालतू जानवरों की पूजा ठीक उसी प्रकार करता है, जैसे शेष भारत में दीवाली के दिन देवी लक्ष्मी और गणपति गणेश की पूजा होती है. यह जनजातीय समाज के प्रकृति और जीव प्रेम को दर्शाता है. वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार, जीवाणुओं को मारा नहीं जा सकता है, अपितु उसकी मारक क्षमता कम की जा सकती है. इसमें गाय से प्राप्त दूध, गोबर, गोमूत्र बड़ी भूमिका निभा सकते हैं.


जैविक खेती का तो खूब प्रचार हो रहा है, लेकिन उसके साथ जीवामृत का प्रचार जरूरी है, खासकर झारखंड के ग्रामीण क्षेत्रों में. आज पूरी दुनिया रोग, युद्ध एवं प्राकृतिक आपदा से परेशान है. यह प्रकृतिजन्य कम, मानवनिर्मित ज्यादा है. यदि हम अपने आसपास के वातावरण को प्रकृति के अनुकूल बना लें, तो कई समस्याओं से सहज पार पा सकते हैं. पौधों के पोषक तत्वों द्वारा शरीर में प्रतिरोधी शक्ति का निर्माण होता है, जो हमें बीमारी से बचाती है. भूमि माता है एवं पौधा बच्चे. भू माता में प्रतिरोध शक्ति नहीं, तो पौधों में भी प्रतिरोध शक्ति नहीं आयेगी. इसका मतलब कि अगर पौधे में प्रतिरोधक शक्ति पैदा करना है, तो पहले भूमि में प्रतिरोधक शक्ति का निर्माण एवं विकास करना होगा.


भूमि को प्रतिरोधक शक्ति देनेवाले जीवद्रव्य की निर्मिती केवल और केवल जैविक खेती में होती है. इसे प्राकृतिक खेती भी कहा जाता है. रासायनिक खेती जीव द्रव्य, ह्युमस को नष्ट करती है. यदि हमें अपने को और अपने समाज को बचाना है, तो जैविक खेती को बढ़ावा देना ही होगा. यही नहीं, इससे हमारी परंपरा भी खंडित नहीं होती है. जैविक खेती में कुछ मात्रा में कीटों के आने की आशंका रहती है. इसकी रोकथाम के लिए कुछ जैविक कीटनाशकों का प्रयोग करना होता है। इन्हें बाजार से न लेकर अपने घरों में ही तैयार करना चाहिए. यह वनस्पतिजन्य कीटनाशक कीटों को मारते नहीं, उन्हें भगा देते हैं.


इनके छिड़काव से फसल सुरक्षित होती है एवं वातावरण पर भी इनका प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता है. जीवामृत बनाने के लिए देशी गाय का मूत्र और गोबर, पुराना गुड़, किसी भी दाल का बेसन, पानी तथा बरगद या पीपल के पेड़ के नीचे की एक मुट्ठी मिट्टी या फिर खेत की मेड़ की या फसल की जड़ों से चिपकी हुई मिट्टी का उपयोग किया जाता है. सबसे पहले गाय के मूत्र को एक कंटेनर में रखें तथा इसमें गाय का गोबर 10 किलोग्राम मिला दें. गोबर को मूत्र में इस तरह से मिलाएं कि मूत्र के साथ घुल जाए.


इसके बाद एक किलोग्राम गुड़ को किसी दूसरे बर्तन में पानी के साथ घोल लें. गुड़ का प्रयोग इसलिए करते हैं, ताकि तैयार मिश्रण में उपस्थित बैक्टीरिया ज्यादा एक्टिव हो जाएं. घुले हुए गुड़ को गोबरयुक्त मूत्र में मिला दें. फिर एक किलोग्राम बेसन को मिला दें. इस मिश्रण को एक बड़े से कंटेनर में डाल दें और कुछ देर तक एक लकड़ी से चलाते रहें. इसके बाद उसमें 200 लीटर पानी मिला दें. इसे चार दिन तक छोड़ दें, लेकिन रोज समय-समय पर एक लकड़ी से चलाते रहें. चार दिन बाद आप इसे पौधों पर उपयोग कर सकते हैं.


इसी प्रकार नीम से बेहद प्रभावशाली जैविक कीट नियंत्रक बनाया जा सकता है, जो रसचूसक कीट एवं इल्ली इत्यादि को नियंत्रित करने में कारगर होता है. इसका जैविकीय विघटन होने के कारण भूमि की संरचना में सुधार होता है. यह सिर्फ हानिकारक कीटों को मारता है, लाभदायक कीटों को हानि नहीं पहुंचता. हरित क्रांति के बाद से भारतीय खेती में जिस प्रकार रासायनिक उर्वरकों का आंख बंद कर प्रयोग हुआ है, उसने हमारी भूमि की संरचना बदल दी है. बहुत ही तेजी से खेती योग्य भूमि बंजर हो रही है. बड़ी मात्रा में किसानों का धन रासायनिक उर्वरकों पर खर्च हो रहा है.


पैदावार पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है. इन समस्याओं के समाधान के लिए जैविक खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है, जिसके अंतर्गत किसानों के पास उपलब्ध संसाधनों का प्रबंधन करके अधिक पैदावार लेना है. इसलिए कंपोस्ट खाद, वर्मी कंपोस्ट, जीवामृत, गोमूत्र आदि का प्रयोग करना है. इन दिनों सरकारी स्तर के साथ कई गैर सरकारी संगठन जीवामृत बनाने का प्रशिक्षण भी देते हैं. किसान वहां प्रशिक्षण प्राप्त कर जीवामृत अपने घर पर ही बना सकते हैं और अपनी जमीन को बंजर होने से बचा सकते हैं.


(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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Editorial : आयुर्वेद का विस्तार

पिछले कुछ समय से स्वास्थ्य को लेकर बढ़ती चिंताओं और चुनौतियों को देखते हुए संबंधित विशेषज्ञों और संस्थानों का ध्यान परंपरागत चिकित्सा प्रणालियों की उपयोगिता की ओर उन्मुख हुआ है. आधुनिक जीवन शैली से पैदा हो रही समस्याओं के साथ विभिन्न विषाणुओं की वजह से फैलनेवाली कोविड-19 व अन्य महामारियों की रोकथाम में प्राचीन ज्ञान परंपरा की भूमिका के महत्व को रेखांकित किया जा रहा है. इस कड़ी को आगे बढ़ाते हुए विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भारत में परंपरागत औषधियों का एक वैश्विक केंद्र स्थापित करने की महत्वपूर्ण घोषणा की है.



संस्था के महानिदेशक तेदारोस गेब्रेयसस ने कहा है कि यह केंद्र परंपरागत चिकित्सा को लेकर 2014 से 2023 की अवधि के लिए निर्धारित संगठन की कार्ययोजना का महत्वपूर्ण अंग होगा. इस पहल का स्वागत करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उम्मीद जतायी है कि जैसे दवाओं के उत्पादन और निर्यात में भारत बड़ी उपलब्धि दर्ज करते हुए ‘दुनिया की फार्मेसी’ बन चुका है, वैसे ही परंपरागत चिकित्सा विज्ञान को आगे बढ़ाने के लक्ष्य के साथ स्थापित होनेवाला यह केंद्र वैश्विक स्वास्थ्य का एक केंद्र बनेगा.



उल्लेखनीय है कि भारत सरकार स्वास्थ्य सेवा को हर व्यक्ति के लिए सुलभ और सस्ता बनाने के साथ आयुर्वेद एवं अन्य ज्ञान परंपराओं को आगे बढ़ाने के लिए निरंतर प्रयत्नशील है. कोरोना वायरस को नियंत्रित करने के लिए टीका बनाने के अंतरराष्ट्रीय प्रयासों में भागीदार होने के साथ भारत आयुर्वेद के अंतर्गत इस महामारी के बारे में शोध को भी प्रोत्साहित कर रहा है. राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति के तहत रोगों की रोकथाम और उनके निवारण के साथ स्वस्थ जीवन के लिए प्रयास हो रहे हैं. इस प्रक्रिया में आयुर्वेद की विशिष्ट भूमिका है. इसकी प्रशंसा स्वास्थ्य संगठन के प्रमुख ने भी की है.


भारत के लोग तो परंपरागत चिकित्सा पद्धति के महत्व से परिचित हैं, लेकिन यह बेहद संतोषजनक है कि विदेशों में भी इसकी लोकप्रियता बढ़ रही है. जैसा कि प्रधानमंत्री मोदी ने रेखांकित किया है, सितंबर में पिछले साल की तुलना में आयुर्वेदिक उत्पादों के निर्यात में 45 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है. इस वर्ष 13 नवंबर को विश्व आयुर्वेद दिवस के अवसर पर 75 से अधिक देशों में आयोजन हुए हैं, जिनमें 60 से अधिक अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने भाग लिया है. इसे आगे विस्तार देने के लिए आयुर्वेद की उपयोगिता को शोध और अनुसंधान का ठोस आधार देने की आवश्यकता है.


प्रधानमंत्री का यह कहना एकदम उचित है कि आयुर्वेद के ज्ञान को शास्त्रों, पुस्तकों और घरेलू नुस्खों से बाहर लाकर आधुनिक आवश्यकताओं के अनुरूप विकसित किया जाना चाहिए. इस प्रक्रिया में आयुर्वेद के शिक्षा संस्थानों, प्रयोगशालाओं तथा केंद्रों को बढ़-चढ़ कर काम करना चाहिए. इस कड़ी में जामनगर और जयपुर में आधुनिक संस्थानों की स्थापना स्वागतयोग्य निर्णय है. आयुर्वेद के विकास से भारत समेत विश्व के स्वास्थ्य को बेहतर करने में मदद मिलने के साथ इससे चिकित्सा क्षेत्र की अर्थव्यवस्था के भी विस्तार की भी संभावनाएं हैं.

सौजन्य - प्रभात खबर।

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Editorial : अर्थव्यवस्था की दिशा में जरूरी पहल

By अभिजीत मुखोपाध्याय, अर्थशास्त्री, ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन 


कोरोना महामारी के प्रसार को रोकने के लिए लागू किये गये लॉकडाउन तथा उससे पहले की समस्याओं की वजह से भारतीय अर्थव्यवस्था संकटग्रस्त है. इस संकट से निकलने की कोशिशों के क्रम में केंद्रीय वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने एक और बड़े पैकेज की घोषणा की है. आत्मनिर्भर भारत अभियान के इस तीसरे पैकेज में 2.65 लाख करोड़ रुपये से अधिक के उपायों का प्रावधान किया गया है.



यदि इसमें हम प्रधानमंत्री गरीब कल्याण पैकेज, अन्न योजना, रिजर्व बैंक के उपायों आदि के साथ आत्मनिर्भर भारत योजना के तीनों हिस्सों को जोड़ दें, तो केंद्रीय पैकेज का कुल आकार लगभग तीस लाख करोड़ का है. निश्चित रूप से यह न केवल आंकड़ों में बहुत बड़ी राशि है, बल्कि अर्थव्यवस्था को संभालने और उसे फिर से पटरी पर लाने के लिए बेहद जरूरी कदम भी है. प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना और फिर उसके तहत जरूरतमंद परिवारों को अनाज उपलब्ध कराने का कार्यक्रम त्वरित रूप से बहुत अहम था तथा इन उपायों से तात्कालिक राहत भी पहुंची है, लेकिन आर्थिक उपायों में पूर्ववर्ती योजनाओं में धन का आवंटन एक हद तक बढ़ाया गया था.



वह भी उल्लेखनीय है, किंतु माना जा रहा था कि वे आवंटन समस्याओं की गंभीरता को देखते हुए समुचित नहीं थे. उस कमी को आत्मनिर्भर भारत को दूसरे और तीसरे चरण में कुछ सीमा तक पूरा करने का प्रयास हुआ है, जो सराहनीय है. जहां तक ऋण वृद्धि का प्रश्न है, तो उसमें उल्लेखनीय बढ़ोतरी नहीं होना चिंताजनक है, क्योंकि औद्योगिक विकास का यह एक विशेष आधार है. धन का वितरण हुआ है, पर अभी उसकी बड़ी जरूरत बनी हुई है. आपूर्ति पक्ष में सरकार ने कुछ ठोस पहल की है.


रियल एस्टेट को बढ़ावा देने के लिए घर खरीदनेवालों को कर में छूट देना, मुश्किलों का सामना कर रहे कई औद्योगिक क्षेत्रों को आपात ऋण उपलब्ध कराना, फर्टिलाइजर सब्सिडी के लिए बड़ी रकम का आवंटन आदि उपाय खासा अहम हैं. लेकिन यह भी देखा जाना चाहिए कि मुश्किलों का सामना कर रहे उद्योगों की पहचान कोरोना काल से पहले की गयी है तथा ऋण के लिए उनके सामने उत्पादन बढ़ाने की शर्त भी है.


ऐसे में इस पहल का लाभ वे किस हद तक उठा पायेंगे, यह बाद में ही पता चल सकेगा, पर इतना जरूर है कि इसका कुछ फायदा तो उत्पादन में होगा ही. उम्मीद है कि अर्थव्यवस्था में सुधार के साथ मांग बढ़ने पर उत्पादन में भी तेजी आयेगी. कृषि क्षेत्र पहले से ही अनेक समस्याओं का सामना कर रहा है और कोरोना महामारी में भी उस पर दबाव बढ़ा है. इसके बावजूद अच्छे उत्पादन और निर्यात में वृद्धि के कारण इस क्षेत्र ने अर्थव्यवस्था को बहुत सहारा दिया है. ऐसे में 65 हजार करोड़ रुपये की फर्टिलाइजर सब्सिडी और अन्य उपाय (गरीब कल्याण योजना के कुछ हिस्सों के साथ) खेती और किसानों के लिए बड़ी राहत हो सकते हैं.


कृषि से जुड़े अन्य क्षेत्रों, बिजली, बीज आदि, में भी आवंटन के बारे में सरकार को सोचना चाहिए. पीएम आवास योजना में 18 हजार करोड़ का आवंटन भी वित्तमंत्री की घोषणा का अहम हिस्सा है. गरीब कल्याण योजना में भी 10 हजार करोड़ रुपये डाले जा रहे हैं. यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि आर्थिक मंदी की सबसे बड़ी मार गरीबों को झेलनी पड़ रही है और उन्हें सरकारी मदद की सबसे ज्यादा जरूरत है. रक्षा और अन्य क्षेत्रों में व्यय बढ़ाने के लिए 10 हजार करोड़ रुपये का निर्धारण भी उल्लेखनीय है. इससे इंफ्रास्ट्रक्चर भी बढ़ेगा. अन्य इंफ्रास्ट्रक्चर में भी सरकार ने धन देने को कहा है. इन तमाम क्षेत्रों में कोई भी आवंटन स्वागतयोग्य है.


लेकिन यह भी कहा जाना चाहिए कि निकट भविष्य में इस आवंटन में ठोस बढ़ोतरी की संभावनाओं को खुला रखा जाना चाहिए, क्योंकि विभिन्न आर्थिक गतिविधियों में गति पकड़ने में समय लगेगा और वे स्वयं ही अनेक समस्याओं से घिरे हैं, सो सरकार द्वारा वित्त उपलब्ध कराने का ही मुख्य विकल्प हमारे सामने है. सरकार को इसका भान है, तभी वह इस तरह के प्रावधान कर रही है, भले ही आवंटित राशि अपेक्षाकृत कम हो. भविष्य निधि में सरकार द्वारा योगदान देने का प्रस्ताव भी सराहनीय है. यदि कंपनियां इसका लाभ उठाना चाहती हैं, तो उससे रोजगार सृजन के अवसर भी पैदा होंगे.


लेकिन इसके साथ यह सवाल भी है कि क्या इस मुश्किल के दौर में कंपनियां नये लोगों को रखकर अपना खर्च बढ़ाने का जोखिम उठायेंगी, क्योंकि बाजार अभी भी असमंजस में है. यह समझना जरूरी है कि राहत पैकेज की आवश्यकता तात्कालिक है और वह अभी मिलेगी, तभी अर्थव्यवस्था को जल्दी सामान्य बनाया जा सकता है. वित्तमंत्री की पहले और अब की घोषणाओं में तुरंत आवंटन और सहयोग के अनेक प्रयास हैं, किंतु कई उपायों को दो-चार सालों की अवधि का विस्तार दिया गया है. इसका एक अर्थ यह है कि पैकेज की तमाम घोषित राशि फिलहाल मुहैया नहीं करायी जा सकती है यानी उन्हें अभी खर्च नहीं किया जायेगा.


इसी के साथ यह भी संज्ञान लिया जाना चाहिए कि अनेक योजनाओं में पहले के आवंटन को भी जोड़ा गया है. इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च करने में भी समय लगेगा. इस लिहाज से कहा जा सकता है कि अर्थव्यवस्था को सीधे धक्का देकर गतिशील करने के लिए जो पूरा प्रयास होना चाहिए, वह इस पैकेज में नहीं दिखता. अभी सरकार के सीधे वित्तीय हस्तक्षेप व आवंटन की बड़ी जरूरत है. यह सही है कि लॉकडाउन हटाने के बाद से अर्थव्यवस्था में कुछ उत्साहवर्धक संकेत हैं, लेकिन मंदी और संकट की गंभीरता ऐसी है कि आर्थिकी को पटरी पर आने में बहुत समय लगेगा.


यह भी सनद रहे कि कोरोना महामारी अभी भी बरकरार है तथा वैश्विक अर्थव्यवस्था भी अनिश्चितताओं से घिरी है. सरकार के मुख्य उपाय अभी भी आपूर्ति पक्ष की ओर अधिक केंद्रित हैं, जबकि मांग बढ़ाने पर भी ध्यान देने की जरूरत है. इसके लिए सीधे धन का प्रवाह सुनिश्चित करना जरूरी है. मांग, उत्पादन और रोजगार का परस्पर संबंध है.


बहरहाल, सिलसिलेवार ढंग से सरकार ने बीते महीनों में कई कदम उठाये हैं और आशा है कि आगे भी स्थितियों के अनुरूप वित्तीय राहत के उपाय होंगे. इस संदर्भ में पिछले कुछ महीने में उत्पादन, मांग तथा अर्थव्यवस्था में सुधार के ठोस आंकड़े भी महत्वपूर्ण हैं. उन्हें देखने के बाद ही निश्चित रूप से यह कहा जा सकेगा कि आत्मनिर्भर भारत की पहलकदमी के क्या असर हैं और उनमें किन आयामों पर अधिक ध्यान देने की जरूरत है.


(बातचीत पर आधारित)

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Editorial : प्रकाश पर्व का यथार्थ

ज्ञानेंद्र रावत, वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक



दीपावली या दीपोत्सव, शरद ऋतु के प्रमुख पर्व के रूप में जानी जाती है़ इस पर्व पर हमारे यहां ज्योति और प्रकाश की पूजा की प्राचीन परंपरा है़ प्राचीन समय से ही हमारे देश में किसी न किसी रूप में भगवान सूर्य की पूजा की जाती रही है़ मां गायत्री मंत्र यथार्थ में सूर्योपासना का ही मंत्र है़ समूचे विश्व में प्रकाश का एकमात्र अनादि और अनंत स्रोत सूर्य ही है़ विश्व की प्राचीन संस्कृतियों में बुद्धि को प्रकाश की प्रतिमूर्ति माना गया है़ उत्तर वैदिक काल में आकाशदीप के विधान से इसका उल्लेख मिलता है़ हमारे शास्त्रों के अनुसार श्राद्ध पक्ष में अपने पुरखों का आह्वान किया जाता है़ इसके उपरांत जब हमारे पूर्वज अपने लोकों को लौटते हैं तो उन्हें दीपक के जरिये मार्ग दिखाया जाता है़



इसे आकाशदीप कहते है़ं इसे किसी बांस के सहारे बहुत ऊंचाई पर टांगा जाता है़ आकाशदीप की परंपरा यूनान, चीन, थाईलैंड, जापान और दक्षिण अमरीका में आज भी दिखाई देती है़ बेथेलहम में भी इसका उल्लेख है़ भगवान राम के चौदह वर्ष के वनवास के बाद अयोध्या आगमन पर अयोध्या वासियों ने अपनी छतों पर ऊंचे बांसों के सहारे आकाशदीप टांगे थे, ताकि भगवान राम दीपों को देखकर यह समझ लें कि यही अयोध्या है़ प्राचीनकाल में राजा और प्रजा सभी कार्तिक माह शुरू होते ही आकाशदीप का जलाना शुभ मानते थे़



खगोल शास्त्रियों की भी स्पष्ट मान्यता है कि आश्विन और कार्तिक तथा फाल्गुन और चैत्र के दिनों में दो बार सूर्य विषुवत रेखा पर होता है, इसलिए इसे शरद संपात और वसंत संपात कहा जाता है़ इस बीच दिन-रात बराबर होते है़ं प्राचीनकाल से ही ऐसे समय उत्सवों और त्योहारों के मनाये जाने का उल्लेख मिलता है़ इस अवसर पर हर्षातिरेक में जलाशयों, नदियों और नावों पर दीप जलाये जाते थे़


इस तरह प्रकाश पर्व मनाने की परंपरा प्राचीनकाल से ही चली आ रही है़ ’प्राकृत गाथा सप्तशती’ के अनुसार, दीपोत्सव का समय दो हजार वर्ष से भी पहले का माना गया है़ इसमें महिलाओं द्वारा दीपक रखकर किसी पर्व को मनाये जाने का उल्लेख है़ वात्स्यायन के कामसूत्र में अमावस्या को यक्षरात्रि उत्सव मनाये जाने का उल्लेख मिलता है़


दरअसल दीपावली का पर्व प्रकाश पर्व है और इसे प्रकाशमान करता है दीपक. ओशो का कहना है कि इस अवसर पर मिट्टी के दीये में ज्योति जलाना इस बात का प्रतीक है कि मिट्टी के दीये में अमृत ज्योति संभाली जा सकती है़ क्योंकि मिट्टी पृथ्वी की और ज्योति प्रकाश का प्रतीक है़ अनन्य विशेषताओं से परिपूर्ण दीपक ज्ञान और प्रकाश का प्रतीक होने के साथ ही त्याग, बलिदान, साधना और उपासना का भी प्रतीक है़ यह हमारी संस्कृति का मंगल प्रतीक है, जो अमावस्या के घनघोर अंधकार में असत्य से सत्य और अंधेरे से प्रकाश की ओर जाने का मार्ग प्रशस्त करता है़


अंधकार को परास्त करते हुए वह संदेश देता है कि अंतःकरण को शुद्ध एवं पवित्र रखते हुए और अपनी चेतना, अपनी आत्मा में प्रकाश का संचार करते हुए ज्ञान का, धर्म का और कर्म का दीप जलाओ़ तब गहन तमस में जो प्रकाश होगा, उससे अंतःकरण में आशा, धैर्य और प्रभु भक्ति के संचार के साथ-साथ हर्ष और उल्लास से हृदय पुलकित हो उठेगा़ सत्य और न्याय की चहुं दिशाओं में विजय पताका फहरायेगी और धन-धान्य, यश- वैभव की अपार संपदायें तुम्हारे लिए अपने द्वार खोल देंगी़ इसी से हम दीपावली के पर्व पर ’दीपोज्योति नमोस्तुते’ कहकर दीपक को सादर नमन करते है़ं सच तो यह है कि प्रकाश की यह पूजा ही दीपावली का आधार है़


हमारी संस्कृति में इस पर्व पर समुद्रमंथन से निकले चौदह रत्नों में सर्वश्रेष्ठ वैभव यानी संपदा की देवी लक्ष्मी और बुद्धि-विवेक के स्वामी गणेश की आराधना को प्रमुखता दी गयी है़ लक्ष्मी-गणेश पूजन के साथ लक्ष्मी स्त्रोत, गौ एवं गौद्रव्य पूजन एवं दीपदान आदि मांगलिक कार्य उन प्रेरणाओं के परिचायक हैं जो सामाजिक व्यवस्था में आर्थिक संयम और पवित्र जीवन के लिए परमावश्यक है़ं इसी कारण इस दिन राजमहल से लेकर गरीब की झोपड़ी तक को दीपों से सजाने की परंपरा है़ यह पर्व समृद्धि पर्व के रूप में भी प्रतिष्ठित है़


इसमें किंचित मात्र भी संदेह नहीं है कि दीपावली ही नहीं वरन् अन्य भारतीय पर्व भी सांस्कृतिक, सामाजिक एवं राष्ट्रीय वातावरण बनाने में सहायक की भूमिका निभाते है़ं लेकिन यह भी सच है कि आज दीपावली का स्वरूप पूरी तरह बदल चुका है़ न पुरानी मान्यतायें, न ही परंपराएं ही शेष है़ं न पहले जैसी उत्सव प्रियता और हंसी के दर्शन होते हैं, न प्रेम और सद्भाव के ही़ दिखावा, प्रतिस्पर्धा, बनावट और स्वार्थ का बोलबाला है़ नैतिकता, चरित्र और मूल्यों की बात बेमानी हो चुकी है़


देश के मुट्ठीभर लोगों के लिए तो जिंदगी का हरेक दिन दीवाली सरीखा होता है़ जबकि देश की बहुसंख्यक आबादी के जीवन का अंधकार तो दीवाली के दिन जगमगाते सैकड़ों-हजारों बल्बों की चुंधियाती रोशनी भी दूर नहीं कर पाती है़ बाजारीकरण के दौर में त्योहारों की, संस्कृति की, मन-मस्तिष्क में मात्र स्मृतियां ही शेष रह गयी है़ं आज तो यही दिवाली है़ हमारे लिए तो यही उचित है कि हम मानवता के कल्याण के लिए प्रतिपल अपनी श्रद्धा के दीप जलायें और यथासंभव दूसरों को भी ऐसा करने की प्रेरणा दे़ं प्रकाश पर्व का वर्तमान में यही पाथेय है़


(ये लेखक के निजी विचार)

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Friday, November 13, 2020

Editorial : अर्थव्यवस्था की दिशा में जरूरी पहल

अभिजीत मुखोपाध्याय, अर्थशास्त्री, ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन


कोरोना महामारी के प्रसार को रोकने के लिए लागू किये गये लॉकडाउन तथा उससे पहले की समस्याओं की वजह से भारतीय अर्थव्यवस्था संकटग्रस्त है. इस संकट से निकलने की कोशिशों के क्रम में केंद्रीय वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने एक और बड़े पैकेज की घोषणा की है. आत्मनिर्भर भारत अभियान के इस तीसरे पैकेज में 2.65 लाख करोड़ रुपये से अधिक के उपायों का प्रावधान किया गया है.

यदि इसमें हम प्रधानमंत्री गरीब कल्याण पैकेज, अन्न योजना, रिजर्व बैंक के उपायों आदि के साथ आत्मनिर्भर भारत योजना के तीनों हिस्सों को जोड़ दें, तो केंद्रीय पैकेज का कुल आकार लगभग तीस लाख करोड़ का है. निश्चित रूप से यह न केवल आंकड़ों में बहुत बड़ी राशि है, बल्कि अर्थव्यवस्था को संभालने और उसे फिर से पटरी पर लाने के लिए बेहद जरूरी कदम भी है. प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना और फिर उसके तहत जरूरतमंद परिवारों को अनाज उपलब्ध कराने का कार्यक्रम त्वरित रूप से बहुत अहम था तथा इन उपायों से तात्कालिक राहत भी पहुंची है, लेकिन आर्थिक उपायों में पूर्ववर्ती योजनाओं में धन का आवंटन एक हद तक बढ़ाया गया था.

वह भी उल्लेखनीय है, किंतु माना जा रहा था कि वे आवंटन समस्याओं की गंभीरता को देखते हुए समुचित नहीं थे. उस कमी को आत्मनिर्भर भारत को दूसरे और तीसरे चरण में कुछ सीमा तक पूरा करने का प्रयास हुआ है, जो सराहनीय है. जहां तक ऋण वृद्धि का प्रश्न है, तो उसमें उल्लेखनीय बढ़ोतरी नहीं होना चिंताजनक है, क्योंकि औद्योगिक विकास का यह एक विशेष आधार है. धन का वितरण हुआ है, पर अभी उसकी बड़ी जरूरत बनी हुई है. आपूर्ति पक्ष में सरकार ने कुछ ठोस पहल की है.


रियल एस्टेट को बढ़ावा देने के लिए घर खरीदनेवालों को कर में छूट देना, मुश्किलों का सामना कर रहे कई औद्योगिक क्षेत्रों को आपात ऋण उपलब्ध कराना, फर्टिलाइजर सब्सिडी के लिए बड़ी रकम का आवंटन आदि उपाय खासा अहम हैं. लेकिन यह भी देखा जाना चाहिए कि मुश्किलों का सामना कर रहे उद्योगों की पहचान कोरोना काल से पहले की गयी है तथा ऋण के लिए उनके सामने उत्पादन बढ़ाने की शर्त भी है.


ऐसे में इस पहल का लाभ वे किस हद तक उठा पायेंगे, यह बाद में ही पता चल सकेगा, पर इतना जरूर है कि इसका कुछ फायदा तो उत्पादन में होगा ही. उम्मीद है कि अर्थव्यवस्था में सुधार के साथ मांग बढ़ने पर उत्पादन में भी तेजी आयेगी. कृषि क्षेत्र पहले से ही अनेक समस्याओं का सामना कर रहा है और कोरोना महामारी में भी उस पर दबाव बढ़ा है. इसके बावजूद अच्छे उत्पादन और निर्यात में वृद्धि के कारण इस क्षेत्र ने अर्थव्यवस्था को बहुत सहारा दिया है. ऐसे में 65 हजार करोड़ रुपये की फर्टिलाइजर सब्सिडी और अन्य उपाय (गरीब कल्याण योजना के कुछ हिस्सों के साथ) खेती और किसानों के लिए बड़ी राहत हो सकते हैं.


कृषि से जुड़े अन्य क्षेत्रों, बिजली, बीज आदि, में भी आवंटन के बारे में सरकार को सोचना चाहिए. पीएम आवास योजना में 18 हजार करोड़ का आवंटन भी वित्तमंत्री की घोषणा का अहम हिस्सा है. गरीब कल्याण योजना में भी 10 हजार करोड़ रुपये डाले जा रहे हैं. यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि आर्थिक मंदी की सबसे बड़ी मार गरीबों को झेलनी पड़ रही है और उन्हें सरकारी मदद की सबसे ज्यादा जरूरत है. रक्षा और अन्य क्षेत्रों में व्यय बढ़ाने के लिए 10 हजार करोड़ रुपये का निर्धारण भी उल्लेखनीय है. इससे इंफ्रास्ट्रक्चर भी बढ़ेगा. अन्य इंफ्रास्ट्रक्चर में भी सरकार ने धन देने को कहा है. इन तमाम क्षेत्रों में कोई भी आवंटन स्वागतयोग्य है.


लेकिन यह भी कहा जाना चाहिए कि निकट भविष्य में इस आवंटन में ठोस बढ़ोतरी की संभावनाओं को खुला रखा जाना चाहिए, क्योंकि विभिन्न आर्थिक गतिविधियों में गति पकड़ने में समय लगेगा और वे स्वयं ही अनेक समस्याओं से घिरे हैं, सो सरकार द्वारा वित्त उपलब्ध कराने का ही मुख्य विकल्प हमारे सामने है. सरकार को इसका भान है, तभी वह इस तरह के प्रावधान कर रही है, भले ही आवंटित राशि अपेक्षाकृत कम हो. भविष्य निधि में सरकार द्वारा योगदान देने का प्रस्ताव भी सराहनीय है. यदि कंपनियां इसका लाभ उठाना चाहती हैं, तो उससे रोजगार सृजन के अवसर भी पैदा होंगे.


लेकिन इसके साथ यह सवाल भी है कि क्या इस मुश्किल के दौर में कंपनियां नये लोगों को रखकर अपना खर्च बढ़ाने का जोखिम उठायेंगी, क्योंकि बाजार अभी भी असमंजस में है. यह समझना जरूरी है कि राहत पैकेज की आवश्यकता तात्कालिक है और वह अभी मिलेगी, तभी अर्थव्यवस्था को जल्दी सामान्य बनाया जा सकता है. वित्तमंत्री की पहले और अब की घोषणाओं में तुरंत आवंटन और सहयोग के अनेक प्रयास हैं, किंतु कई उपायों को दो-चार सालों की अवधि का विस्तार दिया गया है. इसका एक अर्थ यह है कि पैकेज की तमाम घोषित राशि फिलहाल मुहैया नहीं करायी जा सकती है यानी उन्हें अभी खर्च नहीं किया जायेगा.


इसी के साथ यह भी संज्ञान लिया जाना चाहिए कि अनेक योजनाओं में पहले के आवंटन को भी जोड़ा गया है. इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च करने में भी समय लगेगा. इस लिहाज से कहा जा सकता है कि अर्थव्यवस्था को सीधे धक्का देकर गतिशील करने के लिए जो पूरा प्रयास होना चाहिए, वह इस पैकेज में नहीं दिखता. अभी सरकार के सीधे वित्तीय हस्तक्षेप व आवंटन की बड़ी जरूरत है. यह सही है कि लॉकडाउन हटाने के बाद से अर्थव्यवस्था में कुछ उत्साहवर्धक संकेत हैं, लेकिन मंदी और संकट की गंभीरता ऐसी है कि आर्थिकी को पटरी पर आने में बहुत समय लगेगा.


यह भी सनद रहे कि कोरोना महामारी अभी भी बरकरार है तथा वैश्विक अर्थव्यवस्था भी अनिश्चितताओं से घिरी है. सरकार के मुख्य उपाय अभी भी आपूर्ति पक्ष की ओर अधिक केंद्रित हैं, जबकि मांग बढ़ाने पर भी ध्यान देने की जरूरत है. इसके लिए सीधे धन का प्रवाह सुनिश्चित करना जरूरी है. मांग, उत्पादन और रोजगार का परस्पर संबंध है.


बहरहाल, सिलसिलेवार ढंग से सरकार ने बीते महीनों में कई कदम उठाये हैं और आशा है कि आगे भी स्थितियों के अनुरूप वित्तीय राहत के उपाय होंगे. इस संदर्भ में पिछले कुछ महीने में उत्पादन, मांग तथा अर्थव्यवस्था में सुधार के ठोस आंकड़े भी महत्वपूर्ण हैं. उन्हें देखने के बाद ही निश्चित रूप से यह कहा जा सकेगा कि आत्मनिर्भर भारत की पहलकदमी के क्या असर हैं और उनमें किन आयामों पर अधिक ध्यान देने की जरूरत है.


(बातचीत पर आधारित)

सौजन्य - प्रभात खबर।

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Editorial : विपक्ष को चिंतन की जरूरत

राशिद किदवई, राजनीतिक विश्लेषक


बिहार चुनाव बहुत बराबरी और कांटे का लड़ा गया. लेकिन चुनाव प्रबंधन में भाजपा ने बाजी मारी है. चुनाव लड़ना एक कला होती है, जिसमें सिर्फ अपनी ताकत का आकलन करना ही पर्याप्त नहीं होता, बल्कि चुनाव की तैयारी, सहयोगियों को साथ लेकर चलना आदि तमाम बातें होती हैं, जिन पर काम करना होता है. वर्ष 2014 से भाजपा ने चुनाव को एक नयी दिशा प्रदान की है. अब चुनाव प्रबंधन पूर्णकालिक चीज हो गयी है. बहुत समय पहले से उसकी योजना बनती है.



भाजपा के भीतर बंगाल, असम, केरल, तमिलनाडु आदि में होनेवाली चुनाव की रूपरेखा, पूरी रणनीति बनी हुई है और उसी के आधार पर काम हो रहा है, जबकि विपक्ष जब जिस राज्य में चुनाव आता है, वह उसके लिए उसी समय काम करना शुरू करता है. कांग्रेस, जो एक राष्ट्रीय पार्टी है, अंदरूनी चुनौतियों से जूझ रही है. पूर्व में जिस तरह का राजनीतिक कौशल उसके पास था, वह धीरे-धीरे कमजोर पड़ता जा रहा है. दूसरे, चुनाव की घोषणा हो जाने के बाद कांग्रेस अपनी तैयारी शुरू करती है. यदि आप भाजपा से तुलना करें तो दोनों की चुनावी तैयारी में जमीन-आसमान का फर्क नजर आयेगा.



यह परिणाम में साफ-साफ परिलक्षित होता रहता है. छत्तीसगढ़ को यदि छोड़ दें, तो भाजपा बुरी तरह परास्त नहीं होती है. वह हारती भी है, तो मजबूती के साथ. बिहार के चुनाव में छोटे-बड़े कुल 27 दल मैदान में थे. जिसमें घोषित-अघोषित रूप से 22 दल एक तरफ रहे, जबकि महागठबंधन में कांग्रेस, आरजेडी व तीन वामदल रहे. इन 22 दलों ने प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से भाजपा को ही मजबूत किया. आरएलएसपी, बीएसपी या ओवैसी की पार्टी एआइएमआइएम का भाजपा के साथ तालमेल नहीं था, लेकिन अंततः इनका लाभ भी भाजपा को ही मिला. दूसरे, चिराग पासवान ने जिस तरह नीतीश कुमार के विरुद्ध अभियान चलाया, भले ही उन्हें एक ही सीट मिली, लेकिन जो पांच-छह प्रतिशत मत मिला, उससे भी विपक्ष को नुकसान हुआ. चिराग का मत यदि महागठबंधन को मिलता, तो उन्हें ज्यादा आसानी होती. तेजस्वी और राहुल गांधी का अति उत्साह और नौसिखियापन भी हार का कारण रहा.


मांझी की हम, वीआइपी आदि तमाम दल, जो पहले महागठबंधन का हिस्सा थे, उन्हें जाने नहीं देना चाहिए था. इन्होंने बहुत ज्यादा नुकसान पहुंचाया. यदि सब साथ मिलकर लड़े होते तो परिणाम अलग होता. भाजपा ने भी तो नीतीश कुमार को सम्मान देने व अपने साथ बनाये रखने के लिए उनको एक सीट ज्यादा दी. और अपनी सीटों में से वीआपी आदि पार्टी को भी सीटें दीं. जबकि कांग्रेस ने ऐसा नहीं किया. सीटों के लिए बारगेन कर 70 पर लड़ी व महज 19 पर जीत दर्ज की. कांग्रेस और आरजेडी में भी शह-मात का खेल चल रहा था. आरजेडी ने अपने हिसाब से अच्छी-अच्छी सीटें रख लीं और बची हुई कांग्रेस को दे दी.


दूसरे, कांग्रेस को जब उम्मीदवार नहीं मिले, तो उसने बाहर से आये लोगों जैसे काली पांडे, शत्रुघ्न सिन्हा के बेट लव सिन्हा आदि को टिकट दिया. यदि विपक्ष, खासकर कांग्रेस और आरजेडी मिलकर यथार्थ की धरातल पर थोड़ा काम करते, तो उनके परिणाम अच्छे होते. जहां उन्होंने मिलकर काम किया वहां परिणाम अच्छे आये. जैसे एमएल को साथ लेने से महागठबंधन को फायदा मिला है. विपक्ष को लगा कि जो तमाम लोग महागठबंधन से अलग होकर चुनाव लड़ रहे हैं, वे नीतीश का वोट काटेंगे, लेकिन यह दांव उल्टा पड़ गया. आरएलएसपी को सीट तो नहीं मिली, लेकिन जो वोट उसे मिले वे महागठबंधन से ही उसके खाते में गये.


मुस्लिम मतदाता भी एक कारक रहा. सीएए के विरोध के बाद देश का मुस्लिम मतदाता राजनीतिक रूप से थोड़ा उग्र हुआ है. उसको लगता है कि कांग्रेस और दूसरी जो धर्म-निरपेक्ष पार्टियां हैं, वह उनके लिए खड़ी नहीं हो रही हैं. इसका विकल्प उसने एआइएमआइएम में तलाशा. यह कांग्रेस और दूसरे धर्म-निरपेक्ष दलों के लिए एक चुनौती है कि वे हिंदू व मुस्लिम दोनों के मत खो रहे हैं. बिहार चुनाव परिणाम के मद्देनजर विपक्ष को चिंतन की जरूरत है. लेकिन दुर्भाग्यवश ऐसा नहीं होगा, क्योंकि विपक्ष बिखरा हुआ है. राजनीतिक प्रतिस्पर्धा सभी पार्टियों में होती है. अभी अगला पड़ाव बंगाल का है. वहां टीएमसी है, कांग्रेस और वाम दल हैं. औवैसी जैसे अन्य वोटकटवा राजनीतिक दल भी हैं.


तो प्रश्न है कि उनकी क्या भूमिका होगी. भारत का इतिहास देखें, तो जब-जब धर्म और आस्था का राजनीति में मिश्रण होता है, तब ऐसे दल वैचारिक तौर पर अलग होते हुए भी एक-दूसरे को मजबूती प्रदान करते हैं. लेकिन ऐसे परिवेश में धर्म-निरेपक्ष दल हाशिए पर चले जाते हैं, क्योंकि वे न ही हिंदू और न ही मुस्लिम अधिकार के साथ खड़े हो सकते हैं. नीतीश 15 वर्ष मुख्यमंत्री रहे और उसके बाद भी जदयू को 43 सीटें मिली हैं, तो कहना होगा कि नीतीश अपना अस्तित्व और अपनी जमीन बचाने में सफल रहे हैं. क्योंकि अकाली दल या छत्तीसगढ़ में भाजपा की स्थिति तो बहुत खराब हो गयी थी.


हो सकता है कि उन्हें नरेंद्र मोदी या वोटकटवा दलों का लाभ मिला हो. जहां तक तेजस्वी की बात है तो इक्क्तीस-बत्तीस वर्ष की उम्र में, बिना लालू यादव की मौजूदगी के खुद के दम पर उन्होंने अच्छा प्रदर्शन किया है. जीत में अनुभव की कमी जरूर आड़े आयी. राहुल को तेजस्वी से सीखना चाहिए कि किस तरह उन्होंने अपने आप को मुख्यमंत्री का दावेदार बनाया. राहुल तो अपने आप को किसी चीज का दावेदार भी नहीं बनाते हैं. जब तक आप दावेदारी नहीं ठोकेंगे, तब तक जनता आपको उस नजर से नहीं देखेगी.


(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

सौजन्य - प्रभात खबर।

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Editorial : कोरोना पर लगाम

बीते कई महीने से चल रहीं कोरोना महामारी पर काबू पाने की कोशिशें कामयाब होती दिख रही हैं. पिछले 106 दिनों में ऐसा पहली बार हुआ है, जब सक्रिय संक्रमित मामलों की संख्या पांच लाख के आंकड़े से नीचे है. अमेरिका तथा यूरोप और एशिया के अनेक देशों में पिछले कुछ समय से संक्रमण की दूसरी लहर का कहर है. ऐसे में भारत में सक्रिय मामलों का घटना बहुत संतोषजनक है. अस्सी लाख से अधिक लोग कोविड-19 के वायरस से छुटकारा पा चुके हैं. प्रति दस लाख आबादी में संक्रमितों की तादाद के लिहाज से भी भारत उन देशों में है, जहां यह अनुपात अपेक्षाकृत कम है. वैश्विक स्तर पर यह अनुपात 6439 संक्रमण का है, वहीं भारत में यह 6225 है. संक्रमण से मृत्यु की दर भी बहुत नीचे है.



यदि पिछले सात दिनों का हिसाब देखें, तो भारत में प्रति दस लाख आबादी में तीन मौतें कोरोना की वजह से हुई हैं, जबकि वैश्विक स्तर पर यह औसत सात है. संक्रमित होने की कुल दर घटकर 7.18 प्रतिशत पर आ गयी है. पिछले सप्ताह में तो यह केवल 4.2 प्रतिशत रही है. लगभग 12 करोड़ कोरोना जांच की संख्या के साथ भारत सबसे अधिक जांच करनेवाले देशों में दूसरे पायदान पर खड़ा है. ये आंकड़े इंगित करते हैं कि केंद्र सरकार के निर्देशन में राज्य सरकारों का प्रबंधन, अस्पतालों में स्वास्थ्यकर्मियों की मुस्तैदी तथा अलग-अलग तरह से कोरोना के खिलाफ जंग में अगली कतार में जूझ रहे लोगों की मेहनत आखिरकार रंग ला रही है.


लेकिन एक ओर जहां कोरोना पर लगाम लगने के संकेत स्पष्ट रूप से दिख रहे हैं, वहीं दूसरी ओर इस तथ्य पर भी हमारी नजर रहनी चाहिए कि अभी रोजाना हजारों संक्रमण के मामले सामने आ रहे हैं और सैकड़ों मौतें हो रही हैं. बीते दिन देशभर में 44,281 लोग कोरोना संक्रमण के शिकार हुए हैं तथा 512 संक्रमितों की जान गयी है. राजधानी दिल्ली समेत देश के कुछ हिस्सों में कई दिनों से संक्रमण में तेजी से बढ़ोतरी हुई है. पर्व-त्योहार का मौसम है. ठंड भी बढ़ने लगी है. इसी के साथ वायु प्रदूषण भी खतरनाक हो चला है. पहले से ही विशेषज्ञ चेतावनी देते रहे हैं कि इन स्थितियों में कोरोना वायरस के फैलने की आशंका बहुत अधिक है.


स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश को संदेश देकर सावधानी बरतने का आग्रह किया था. स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से भी लगातार कहा जा रहा है कि हमें किसी भी तरह से लापरवाह नहीं होना है तथा मास्क पहनने, सैनिटाइजर का इस्तेमाल करने और परस्पर दूरी रखने जैसे अहम निर्देशों का पालन करते रहना है. कोरोना पर अंकुश लगाने में जन-जागरूकता का बहुत योगदान रहा है, लेकिन कई लोग जाने-अनजाने निर्देशों का उल्लंघन कर संक्रमित होने का खतरा पैदा करते हैं. हमें निरंतर सतर्कता बरतते हुए दवाई व टीके की व्यवस्था होने तक अपने प्रयासों को जारी रखना होगा.

सौजन्य - प्रभात खबर।

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Editorial : प्रकाश पर्व का यथार्थ

ज्ञानेंद्र रावत, वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक

दीपावली या दीपोत्सव, शरद ऋतु के प्रमुख पर्व के रूप में जानी जाती है़ इस पर्व पर हमारे यहां ज्योति और प्रकाश की पूजा की प्राचीन परंपरा है़ प्राचीन समय से ही हमारे देश में किसी न किसी रूप में भगवान सूर्य की पूजा की जाती रही है़ मां गायत्री मंत्र यथार्थ में सूर्योपासना का ही मंत्र है़ समूचे विश्व में प्रकाश का एकमात्र अनादि और अनंत स्रोत सूर्य ही है़ विश्व की प्राचीन संस्कृतियों में बुद्धि को प्रकाश की प्रतिमूर्ति माना गया है़ उत्तर वैदिक काल में आकाशदीप के विधान से इसका उल्लेख मिलता है़ हमारे शास्त्रों के अनुसार श्राद्ध पक्ष में अपने पुरखों का आह्वान किया जाता है़ इसके उपरांत जब हमारे पूर्वज अपने लोकों को लौटते हैं तो उन्हें दीपक के जरिये मार्ग दिखाया जाता है़।

इसे आकाशदीप कहते है़ं इसे किसी बांस के सहारे बहुत ऊंचाई पर टांगा जाता है़ आकाशदीप की परंपरा यूनान, चीन, थाईलैंड, जापान और दक्षिण अमरीका में आज भी दिखाई देती है़ बेथेलहम में भी इसका उल्लेख है़ भगवान राम के चौदह वर्ष के वनवास के बाद अयोध्या आगमन पर अयोध्या वासियों ने अपनी छतों पर ऊंचे बांसों के सहारे आकाशदीप टांगे थे, ताकि भगवान राम दीपों को देखकर यह समझ लें कि यही अयोध्या है़ प्राचीनकाल में राजा और प्रजा सभी कार्तिक माह शुरू होते ही आकाशदीप का जलाना शुभ मानते थे़. 

खगोल शास्त्रियों की भी स्पष्ट मान्यता है कि आश्विन और कार्तिक तथा फाल्गुन और चैत्र के दिनों में दो बार सूर्य विषुवत रेखा पर होता है, इसलिए इसे शरद संपात और वसंत संपात कहा जाता है़ इस बीच दिन-रात बराबर होते है़ं प्राचीनकाल से ही ऐसे समय उत्सवों और त्योहारों के मनाये जाने का उल्लेख मिलता है़ इस अवसर पर हर्षातिरेक में जलाशयों, नदियों और नावों पर दीप जलाये जाते थे़.

इस तरह प्रकाश पर्व मनाने की परंपरा प्राचीनकाल से ही चली आ रही है़ ’प्राकृत गाथा सप्तशती’ के अनुसार, दीपोत्सव का समय दो हजार वर्ष से भी पहले का माना गया है़ इसमें महिलाओं द्वारा दीपक रखकर किसी पर्व को मनाये जाने का उल्लेख है़ वात्स्यायन के कामसूत्र में अमावस्या को यक्षरात्रि उत्सव मनाये जाने का उल्लेख मिलता है़


दरअसल दीपावली का पर्व प्रकाश पर्व है और इसे प्रकाशमान करता है दीपक. ओशो का कहना है कि इस अवसर पर मिट्टी के दीये में ज्योति जलाना इस बात का प्रतीक है कि मिट्टी के दीये में अमृत ज्योति संभाली जा सकती है़ क्योंकि मिट्टी पृथ्वी की और ज्योति प्रकाश का प्रतीक है़ अनन्य विशेषताओं से परिपूर्ण दीपक ज्ञान और प्रकाश का प्रतीक होने के साथ ही त्याग, बलिदान, साधना और उपासना का भी प्रतीक है़ यह हमारी संस्कृति का मंगल प्रतीक है, जो अमावस्या के घनघोर अंधकार में असत्य से सत्य और अंधेरे से प्रकाश की ओर जाने का मार्ग प्रशस्त करता है़

अंधकार को परास्त करते हुए वह संदेश देता है कि अंतःकरण को शुद्ध एवं पवित्र रखते हुए और अपनी चेतना, अपनी आत्मा में प्रकाश का संचार करते हुए ज्ञान का, धर्म का और कर्म का दीप जलाओ़ तब गहन तमस में जो प्रकाश होगा, उससे अंतःकरण में आशा, धैर्य और प्रभु भक्ति के संचार के साथ-साथ हर्ष और उल्लास से हृदय पुलकित हो उठेगा़ सत्य और न्याय की चहुं दिशाओं में विजय पताका फहरायेगी और धन-धान्य, यश- वैभव की अपार संपदायें तुम्हारे लिए अपने द्वार खोल देंगी़ इसी से हम दीपावली के पर्व पर ’दीपोज्योति नमोस्तुते’ कहकर दीपक को सादर नमन करते है़ं सच तो यह है कि प्रकाश की यह पूजा ही दीपावली का आधार है़

हमारी संस्कृति में इस पर्व पर समुद्रमंथन से निकले चौदह रत्नों में सर्वश्रेष्ठ वैभव यानी संपदा की देवी लक्ष्मी और बुद्धि-विवेक के स्वामी गणेश की आराधना को प्रमुखता दी गयी है़ लक्ष्मी-गणेश पूजन के साथ लक्ष्मी स्त्रोत, गौ एवं गौद्रव्य पूजन एवं दीपदान आदि मांगलिक कार्य उन प्रेरणाओं के परिचायक हैं जो सामाजिक व्यवस्था में आर्थिक संयम और पवित्र जीवन के लिए परमावश्यक है़ं इसी कारण इस दिन राजमहल से लेकर गरीब की झोपड़ी तक को दीपों से सजाने की परंपरा है़ यह पर्व समृद्धि पर्व के रूप में भी प्रतिष्ठित है़


इसमें किंचित मात्र भी संदेह नहीं है कि दीपावली ही नहीं वरन् अन्य भारतीय पर्व भी सांस्कृतिक, सामाजिक एवं राष्ट्रीय वातावरण बनाने में सहायक की भूमिका निभाते है़ं लेकिन यह भी सच है कि आज दीपावली का स्वरूप पूरी तरह बदल चुका है़ न पुरानी मान्यतायें, न ही परंपराएं ही शेष है़ं न पहले जैसी उत्सव प्रियता और हंसी के दर्शन होते हैं, न प्रेम और सद्भाव के ही़ दिखावा, प्रतिस्पर्धा, बनावट और स्वार्थ का बोलबाला है़ नैतिकता, चरित्र और मूल्यों की बात बेमानी हो चुकी है़

देश के मुट्ठीभर लोगों के लिए तो जिंदगी का हरेक दिन दीवाली सरीखा होता है़ जबकि देश की बहुसंख्यक आबादी के जीवन का अंधकार तो दीवाली के दिन जगमगाते सैकड़ों-हजारों बल्बों की चुंधियाती रोशनी भी दूर नहीं कर पाती है़ बाजारीकरण के दौर में त्योहारों की, संस्कृति की, मन-मस्तिष्क में मात्र स्मृतियां ही शेष रह गयी है़ं आज तो यही दिवाली है़ हमारे लिए तो यही उचित है कि हम मानवता के कल्याण के लिए प्रतिपल अपनी श्रद्धा के दीप जलायें और यथासंभव दूसरों को भी ऐसा करने की प्रेरणा दे़ं प्रकाश पर्व का वर्तमान में यही पाथेय है़

(ये लेखक के निजी विचार)

सौजन्य - प्रभात खबर।

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