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-Rajeev Kumar (Editor-in-chief)

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Friday, April 2, 2021

नवाचार : जापान का उपग्रह 'कैप्चर' करेगा अंतरिक्ष का कचरा (पत्रिका)

अंतरिक्ष से मलबे व कचरे को हटाने के लिए जापान ने हाल ही एक सैटेलाइट का प्रक्षेपण किया है। कजाकिस्तान स्थित एक अंतरिक्ष केंद्र से 22 मार्च को जापान स्टैंडर्ड टाइम (जेएसटी) के अनुसार दोपहर तीन बजे के बाद रूस के एक रॉकेट के जरिए यह सैटेलाइट लॉन्च किया गया, जो शाम तक अंतरिक्ष की कक्षा में पहुंच गया। निस्संदेह अंतरिक्ष की सफाई के लिए दुनिया में पहली बार गंभीरता से कोई प्रयास किया गया है। टोक्यो स्थित स्टार्ट-अप एस्ट्रोस्केल द्वारा निर्मित इस सैटेलाइट का उद्देश्य अंतरिक्ष से कचरा और मलबा हटाने संबंधी कार्य को अंजाम देना है।

सैटेलाइट में एक 'सर्विसर' सैटेलाइट या जिसे 'कैचर' भी कह सकते हैं, लगा है तथा एक 'क्लाइंट' सैटेलाइट है जो प्रतीकात्मक कचरे के ढेर को दर्शाती है। 'सर्विसर' सैटेलाइट, 'क्लाइंट' सैटेलाइट को 340 मील (550 किलोमीटर) के अक्षांश पर छोड़ता है और उसके बाद सेंसरों की सहायता से उस तक पहुंचता है। यह सैटेलाइट एक शक्तिशाली चुम्बक से प्रतीकात्मक कचरे को उठाता है और जैसे ही ये दोनों पृथ्वी के वायुमंडल में पहुंचते हैं, जल जाते हैं।

अंतरिक्ष में छोड़ दिए गए सैटेलाइट और रॉकेट ही अंतरिक्ष का कचरा हैं। माना जाता है कि अंतरिक्ष में 10 सेंटीमीटर से बड़े आकार के 20,000 से अधिक कचरे के टुकड़े फैले हुए हैं और तीव्र गति से पृथ्वी के चारों ओर चक्कर लगा रहे हैं। अगर कचरे का कोई टुकड़ा किसी कार्यशील सैटेलाइट या अंतरिक्ष में संचालित सुविधा केंद्र से टकरा जाता है तो न केवल उसकी कार्यप्रणाली में खराबी आ सकती है, यह किसी दुर्घटना का सबब भी बन सकता है।

सौजन्य - पत्रिका।
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भारत की बदलती अफगान नीति (पत्रिका)

भारत की अफगान नीति में पिछले कुछ समय में काफी बदलाव आए हैं। खासकर तालिबान के बारे में हमारा रवैया अब कुछ लचीला प्रतीत हो रहा है। ताजिकिस्तान में 9वें एशिया सम्मेलन के दौरान विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कहा कि अफगानिस्तान सरकार और तालिबान के बीच शांतिवार्ता का भारत समर्थन करता है। इस बयान का खास महत्त्व इसलिए है कि 1990 से ही भारत, तालिबान के साथ किसी तरह की डील के खिलाफ रहा है। धीरे-धीरे सख्ती में कमी तब महसूस की गई जब अमरीका और रूस की पहल पर होने वाली वार्ताओं के संदर्भ में भारत ने लचीला रुख दिखाया। विदेश मंत्री का ताजा बयान ऐसे समय आया है जबकि अमरीकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने नया प्रस्ताव पेश किया है। यह प्रस्ताव दो हिस्सों में है। पहला-परस्पर विरोधी पार्टियों को शामिल करते हुए 'यूनिटी ट्रांजिशन गवर्नमेंटÓ बनाना और दूसरा-भारत, पाकिस्तान, चीन, ईरान, रूस और अमरीका के राजदूतों की बहुपक्षीय कांफ्रेंस आयोजित करना। भारत ने अमरीका के प्रस्ताव का समर्थन करके अपने पुराने रुख में बदलाव का संकेत दिया था। अब तालिबान से बातचीत का समर्थन करने से साफ है कि हमारी अफगान नीति लचीली हुई है।

तालिबान के संदर्भ में भारत का लचीला होना दरअसल समय की नजाकत है। एक तरह से यह ठीक भी है। दुनिया की ताकतों के लगातार प्रयास के बावजूद अफगानिस्तान के एक बड़े हिस्से में इसका वजूद अब भी मजबूती से कायम है। अफगानिस्तान और अन्य देशों के लिए भी यह अब पहले जैसा 'अवांछित' नहीं रह गया है। अमरीका ने तो उसके साथ संधि भी की है। रूस शांति वार्ताओं का आयोजन करता रहा है। चीन ने भी तालिबान से संपर्क बनाया है। यूरोपीय देश बातचीत में रुचि लेते रहे हैं। इस जमीनी हकीकत को समझते हुए यदि भारत सरकार का रुख भी लचीला हुआ है, तो इसमें दोनों देशों का फायदा नजर आता है। अफगान सरकार के साथ हमारे रिश्ते हमेशा से अच्छे रहे हैं। भारत ने वहां काफी निवेश भी किया है। ऐसे में यदि सरकार पर पूरी तरह तालिबान का नियंत्रण हो जाता है, तो इससे हमें नुकसान ही होगा। इसलिए हमें शांति वार्ताओं में शामिल होकर यह सुनिश्चित करने का प्रयास करना चाहिए कि किसी समझौते से वहां तालिबान का वर्चस्व स्थापित न होने पाए। शांति वार्ताओं से एकदम अलग-थलग होकर ऐसा संभव नहीं है। हालांकि तालिबान को सत्ता में भागीदारी मिलने के बाद वहां क्या हालात बनेंगे, यह पक्के तौर पर कहना मुश्किल है। फिर भी आगे बढ़ती गतिविधियों पर नजदीक से नजर रखना ही समझदारी कही जाएगी।

सौजन्य - पत्रिका।
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अपनी दुनिया ट्रैवलॉग : अंडमान के दिल की धड़कन हैवलॉक द्वीप (पत्रिका)

संजय शेफर्ड

अंडमान निकोबार द्वीप समूह की यात्रा एक बड़ा सपना सच होने जैसा है।  2016 में जब पहली बार यहां आया तो इसे अद्भुत और अविश्वसनीय पाया। खासकर हैवलॉक द्वीप, जिसे अंडमान के दिल की धड़कन कहा जाता है और अब स्वराज द्वीप के नाम से भी जाना जाता है। यह द्वीप पोर्ट ब्लेयर के उत्तर-पूर्व में 39 किमी. की दूरी पर है। यहां हरियाली और सफेद बालू से भरे तट इसे दुनिया भर के खूबसूरत पर्यटन स्थलों में शुमार करते हैं।

इस जगह का वैश्विक महत्त्व 2004 में तब बढ़ा, जब विश्व की प्रतिष्ठित टाइम मैगजीन ने तट नम्बर 7 को एशिया का सर्वोत्तम तट घोषित किया। इस द्वीप पर गोविन्दा नगर, विजय नगर, श्याम नगर, कृष्ण नगर और राधा नगर नाम से कुल पांच गांव हैं, जिनके समुद्री तट अपने आप में बहुत अलग हैं। यहां विदेशी सैलानियों की भरमार रहती है।

द्वीप का नाम ब्रिटिश सैन्य कमांडर हेनरी हैवलॉक के नाम पर रखा गया था, जिसने भारत में सन् 1857 की क्रांति को बर्बरता से कुचला था। हैवलॉक के कई निवासी बांग्लादेश स्वाधीनता युद्ध के दौरान आए शरणार्थी और उनके वंशज हैं, जिन्हें भारत सरकार ने बसाया था। पोर्ट ब्लेयर से हैवलॉक द्वीप के लिए दिन में दो-तीन बार नियमित समय पर फेरी की सेवा उपलब्ध है। आप चाहें तो पोर्ट ब्लेयर से पवन हंस चॉपर के जरिए भी हैवलॉक पहुंच सकते हैं।

समुद्री आबोहवा के साथ एडवेंचर स्पोट्र्स जैसे स्कूूबा डाइविंग के विकल्प तो यहां मौजूद हैं ही, यदि आप प्रकृति प्रेमी हैं और शांत फिजा में समय बिताना चाहते हैं तो हैवलॉक किसी जन्नत से कम नहीं है। यहां के तटों की सफेद रेत, समुद्र का नीला पानी और लजीज सी-फूड कभी नहीं भूलने वाले अनुभव देते हैं। यहां टैक्सी और बाइक भी किराये पर मिल जाती है जिसके लिए आपको 400 रुपए तक खर्च करने पड़ सकते हैं।

अंडमान निकोबार के सभी द्वीपों पर आपको अपने बजट के हिसाब से रहने के और खाने के विकल्प मिल जाएंगे। यदि आप अंडमान की यात्रा पर हैं तो हैवलॉक जाना बिल्कुल भी नहीं भूलें।
(लेखक ट्रैवल ब्लॉगर हैं और मुश्किल हालात में काम करने वाले दुनिया के श्रेष्ठ दस ब्लॉगर में शामिल हैं)

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Wednesday, March 31, 2021

'एवर गिवन' संकट से क्या सबक लें हम (पत्रिका)

ईशान थरूर (स्तम्भकार, टुडेज वल्र्डव्यू न्यूजलेटर और स्तम्भ के लेखक)

बीते सप्ताह मंगलवार यानी 23 मार्च को स्वेज नहर में एफिल टॉवर की ऊंचाई से भी लंबे मालवाहक जहाज 'एवर गिवन' के फंसने से पैदा हुआ संकट इस सप्ताह सोमवार को भले ही खत्म हो गया हो, लेकिन पूरे एक सप्ताह चले इस प्रकरण से माल की आपूर्ति में देरी से विश्व व्यापार को हर दिन होने वाला नुकसान 9.6 बिलियन डॉलर के करीब रहा। इस प्रकरण ने एक बार फिर यह याद दिलाया कि विश्व अर्थव्यवस्था अब भी समुद्र के रास्ते ही आगे बढ़ रही है- और, यह कुल अंतरराष्ट्रीय व्यापार का करीब 70 प्रतिशत है।

जहाजों को खींचने वाले जहाजों और उपकरणों का बेड़ा और जहाज को बचाने वाला दल कई दिन की मशक्कत के बाद नहर के दो तटों के बीच फंसे जहाज को आखिरकार निकालने में कामयाब हो गया और इसे उत्तर दिशा में बिटर लेक्स (ग्रेट बिटर लेक और लिटल बिटर लेक) की ओर लेकर आगे बढ़ गया, जहां अधिकारी जहाज की व्यापक जांच कर पाएंगे और समुद्री यातायात में पैदा हुआ अवरोध भी खत्म हो जाएगा। स्वेज नहर से होकर आगे बढऩे का इंतजार कर रहे सैकड़ों जहाज और टैंकर को हरी झंडी मिलने में अभी करीब एक सप्ताह और लग सकता है। 'एवर गिवन' संकट का आपूर्ति शृंखला पर असर आने वाले कई महीनों तक देखा जा सकता है, लेकिन कई और ऐसे सबक हैं जो सालाना समुद्री यातायात के करीब दसवें हिस्से का अहम जरिया यानी स्वेज नहर में पैदा हुए इस संकट से हमें लेने चाहिए। मिस्र के राष्ट्रपति अब्दुल फतह अल-सीसी ने फंसे हुए जहाज को मुक्त कराने को राष्ट्र की कामयाबी करार दिया। तब भी इस पूरे प्रकरण के किरदार सही अर्थों में संयुक्त राष्ट्र के सक्रिय होने द्ग या इस मामले में सभवत: 'पुन: सक्रिय' होने - को दर्शाते हैं। विशालकाय मालवाहक जहाज को ही देखें तो एमवी एवर गिवन के स्वामित्व वाली कंपनी जापान की है, इसका संचालन ताइवान की कंपनी करती है, प्रबंधन जर्मनी की कंपनी करती है और इसका पंजीकरण पनामा में है। इसके चालक दल के सभी 25 सदस्य भारतीय हैं। जहाज की यात्रा एशिया से यूरोप माल ले जाने की है, स्पष्ट कहें तो नीदरलैंड्स के रोटरडैम बंदरगाह तक। यह संकट में फंसा मध्य-पूर्व के बवंडर में और इसका बचाव किया एक बहुराष्ट्रीय गठबंधन ने, जिसमें नीदरलैंड्स की जहाजों को बचाने वाली कंपनी और मिस्र के स्थानीय टगबोट संचालक शामिल रहे।

न्यूयार्क टाइम्स के पीटर गुडमैन के मुताबिक, एवर गिवन संकट ने वैश्विक अर्थव्यवस्था की क्षणभंगुरता को उजागर किया है। करीब डेढ़ सदी पहले जब स्वेज नहर को समुद्री यातायात के लिए खोला गया था, तो वैश्विक तीव्र शिपिंग के युग की शुरुआत हुई थी जो आने वाले दशकों में और तीव्र होती गई। बीते 50 सालों में जहाजों की माल ले जाने की क्षमता 1500 प्रतिशत तक बढ़ी, उपभोक्ता वस्तुओं की किस्मों का विस्तार हुआ और दुनिया भर में कीमतें कम हुईं। लेकिन जहाजों का आकार बढऩे से अब स्वेज नहर जैसे संकरे और बहुत अधिक यातायात वाले समुद्री मार्गों में परेशानियां पैदा होने लगी हैं। स्वेज नहर प्राधिकरण के एक पायलट के अनुसार, 'पहले की तुलना में आज जहाज आकार में बहुत बड़े हो चुके हैं और एवर गिवन जैसे जहाजों को नहर से निकालना बहुत मुश्किल हो गया है। ऐसी मुश्किलों का सामना हमने पहले कभी नहीं किया।' हाल ही 'द पोस्ट' के आउटलुक सेक्शन के लिए पूर्व मर्चेंट मरीनर साल्वाटोर मर्कोगलियानो ने लिखा, 'स्वेज से होकर न गुजरने वाले माल पर भी इसका असर पड़ेगा, क्योंकि माल बनाने के लिए दूसरे मार्गों से आने वाले जरूरी कलपुर्जों के लिए फैक्ट्रियों को इंतजार करना ही होगा।... गैस और तेल की कीमतों में उछाल देखने को मिलेगा।'

एवर गिवन संकट ने वैकल्पिक मार्गों पर चर्चा को पुनर्जीवित कर दिया है - अफ्रीका के दक्षिणी छोर के लंबे और काफी महंगे रास्ते से लेकर आर्कटिक में उत्तरी मार्ग की संभावना तक, क्योंकि दुनिया की छत की पिघलती बर्फ नए रास्ते खोलती नजर आ रही है। इसी संबंध में आर्कटिक में अंतरराष्ट्रीय सहयोग के लिए रूसी राजनयिक निकोलाई कोर्चुनोव कहते हैं, 'स्वेज नहर की घटना के बाद हर किसी को रणनीतिक समुद्री रास्तों की विविधता पर विचार करना चाहिए।' स्वेज नहर मार्ग में पैदा हुए अवरोध ने याद दिलाया है कि गिनती के महत्त्वपूर्ण समुद्री मार्ग पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था के साथ क्षेत्रीय ताकतों के रणनीतिक आकलन में कितनी अहम भूमिका निभाते हैं। स्वेज हो, पनामा हो, या मलक्का या होरमुज के जलडमरूमध्य हों, एक संकट वैश्विक बाजारों को हिला कर रख सकता है - और संदर्भ कुछ और हो तो प्रतिद्वंद्वी नौसेनाओं के बीच बड़े संघर्ष की भी वजह हो सकता है। ब्लूमबर्ग ओपिनियन के डेविड फिकलिंग और अंजनि त्रिवेदी लिखते हैं, 'पूर्वी एशिया का भूगोल देखें तो दक्षिण चीन सागर समेत वे तमाम समुद्री रास्ते जो ताइवान को फिलीपींस, जापान के ओकिनामा द्वीप समूह और चीन के मुख्य भूभाग से अलग करते हैं और जो मलक्का और सिंगापुर के जलडमरूमध्य व अन्य जलसंधि-सरीखे रास्तों से जुड़ते हैं, टकराव की स्थिति पैदा होने पर बड़े संकट का सबब बन सकते हैं।' सेवानिवृत्त यूएस एडमिरल और नाटो के पूर्व सुप्रीम एलाइड कमांडर जेम्स स्टावरिडिस तर्क देते हैं कि ये तमाम सबक दुनिया को पर्याप्त वजह देते हैं कि वैश्विक ताकतें वैश्विक समुद्री व्यापार के संभावित अवरोध बिंदुओं के संचालन के लिए सामूहिक प्रणाली विकसित करने का रास्ता निकालें।

द वॉशिंगटन पोस्ट

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आपका हक : साइबर सुरक्षा को मिले प्राथमिकता (पत्रिका)

विजया तिवारी, फोरेंसिक एक्सपर्ट

वर्तमान में सूचना प्रौद्योगिकी का महत्त्व बहुत बढ़ गया है। व्यवसाय ही नहीं, व्यक्ति के दैनिक जीवन में भी इसका दखल सामान्य बात हो गई है। इसके बिना अब काम नहीं चलता। सूचना और संचार के क्षेत्र में तकनीकी प्रगति अपूर्व तेजी से बढ़ रही है। दुनिया भर के देश आर्थिक और सामाजिक रूप से शक्तिशाली बनने के लिए अपनी तकनीक को उन्नत बनाने के इच्छुक हैं। प्रौद्योगिकी ने लोगों के सोचने-समझने के तरीके को भी बदल दिया है। जिस तरह से लोग कार्य करते हैं और जिस तरह से लोग प्रतिक्रिया करते हैं, उसमें भी अच्छा-खासा बदलाव आया है। आजकल ज्यादातर लोग तकनीक से अछूते नहीं रहे। चाहे-अनचाहे उनको इस तरह की तकनीक का इस्तेमाल करना ही पड़ता है। आज हालात ऐसे हो गए हैं कि बैंक के काम से लेकर सिनेमा का टिकट बुक कराने तक के लिए तकनीक का इस्तेमाल हो रहा है। यही वजह है कि साइबर क्राइम बहुत तेजी से बढ़े हैं। बैंक क्षेत्र में अत्याधुनिक तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है। इसके बावजूद अपराधी बैंकों और बैंक उपभोक्ताओं के साथ ठगी-धोखाधड़ी करने में कामयाब हो जाते हैं। असल में ऐसे अपराधी इस तकनीक में दो कदम आगे होते हैं, जिससे उनके लिए साइबर क्राइम आसान हो जाता है।

ब्रैंक फ्रॉड के अलावा, ईमेल फिशिंग, स्पूफिंग, मनी लॉन्ड्रिंग, हैकिंग, डेटा चोरी, तस्वीरों से छेड़छाड़ जैसे साइबर अपराध बहुत ज्यादा हो रहे हैं। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार वर्ष 2018 की तुलना में 2019 में साइबर क्राइम के दर्ज मामलों में बहुत ज्यादा बढ़ोतरी दर्ज की गई। ये आंकड़े गवाह हैं कि देश में साइबर क्राइम में किस तेजी से बढ़ोतरी हो रही है। ऐसे भी कई मामले होंगे, जिनको दर्ज ही नहीं कराया गया होगा। एफबीआई रिपोर्ट कहती है कि भारत शीर्ष 20 साइबर अपराध पीडि़त देशों में तीसरे स्थान पर है। यह वाकई चिंताजनक है। इससे साफ है कि साइबर सुरक्षा तंत्र में गंभीर खामी है और लोग भी इस संबंध में जागरूक नहीं हंै। कई बार लोगों को यह तक जानकारी नहीं होती कि साइबार क्राइम का शिकार होने के बाद कहां जाएं, कहां शिकायत करें।

अब आइए जानते हैं कि शिकार होने पर आपको क्या करना है और कहां रिपोर्ट करना है। अपने सभी साइबर अपराधों की रिपोर्ट अपने स्थानीय पुलिस स्टेशन के साइबर सेल में कर सकते हैं। शहरों में साइबर पुलिस स्टेशन हंै, जिनका गठन साइबर अपराधों की रोकथाम के लिए किया गया है। किसी भी तरह का साइबर अपराध होने पर वहां रिपोर्ट की जा सकती है और आम तौर पर पूरा शहर उनका अधिकार क्षेत्र होता है।

राष्ट्रीय स्तर पर साइबर अपराध की शिकायतें दर्ज करने के लिए ऑनलाइन पोर्टल्स भी उपलब्ध हैं (https: //cybercrime.gov.in/)। अगर साइबर क्राइम का शिकार हुए हैं, तो इस पोर्टल और वेब ऐड्रेस का प्रयोग करके अपराध की रिपोर्ट ऑनलाइन दर्ज करा सकते हैं। इसके लिए आपको खास तकनीकी ज्ञान की भी जरूरत नहीं। यह काम बहुत आसान है। अब समय आ गया है कि साइबर सुरक्षा को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

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जमा पूंजी: पुरानी कार नहीं है बेकार (पत्रिका)

असीम त्रिवेदी

कल रात बेटी ने मुझे फोन पकड़ाते हुए कहा- नानाजी को आपसे बात करनी है। फोन पर सुनाई दे रहा था न्यूज चैनल का शोर। मैंने ससुरजी से पूछा क्या हुआ। जवाब आया - अपनी 'रामप्यारी' (ससुर जी की पुरानी कार) का क्या करना है? ये चैनल वाले चिल्ला रहे हैं 20 साल से पुरानी कारें होंगी बेकार, 15 साल से पुरानी कार का लेना होगा फिटनेस प्रमाण पत्र, अब करना क्या है? अब क्या नई कार खरीदूं इस उम्र में? कभी-कभी तो काम आती है, अस्पताल जाने में बाकी तो टू-व्हीलर ही काम आता है। मैंने कहा- घबराएं नहीं, आपके पास दो विकल्प हैं।

पहला विकल्प - आपको अगर इसे रखना है तो थोड़े दिनों बाद जब सरकार अधिकृत एजेंसी नियुक्त कर देगी, वहां जाकर आप अपनी कार की फिटनेस चेक करवाकर सर्टिफिकेट ले कर पंजीयन प्रमाण पत्र नवीनीकरण करवा सकते हैं, पुरानी कार अगर फिट है तो हिट है। साथ ही हर साल राज्य सरकारें इस पर ग्रीन टैक्स लगाने की तैयारी में हैं।

दूसरा विकल्प - सरकार जिस एजेंसी को अधिकृत करेगी आप अपनी पुरानी कार को, अपना पैन नम्बर, वाहन पंजीयन पुस्तिका और अन्य मांगी गई जानकारियों के साथ उन्हें दे दीजिए, वे आपको 'वाहन जमा प्रमाण-पत्र' देंगे, साथ ही आपकी कार की आज की शो-रूम मूल्य का चार से छह प्रतिशत देंगे, यानी 20 से 25 हजार। राज्य सरकारें जल्द ही ऐसे प्रमाण पत्र के साथ नई कार लेने पर अनुमानित 25 प्रतिशत तक रोड टैक्स में छूट दे सकती हैं। कार निर्माता भी ऐसे प्रमाण पत्र के होते नई कार खरीदने पर आकर्षक डिस्काउंट देने की योजना बना रहे हैं। केंद्र सरकार अभी ऐसे प्रमाण पत्र धारकों को वाहन पंजीयन शुल्क में भी राहत देने के बारे में सोच रही है। यानी कुल मिला कर आपकी पुरानी कार आपको लगभग 50 हजार से 75 हजार का फायदा करवा सकती है।

मैंने कहा - आपके पास सोचने के लिए अभी 2-3 महीने हैं, एक तरफ पुरानी कार को रखने के लिए हर वर्ष का नियमित खर्च होगा जो सरकार को देना होगा, तो दूसरी ओर अगर आप नई कार लेना चाहते हैं है तो जब तक ये नियम लागू हों तब तक शो-रूम पर कार देखते रहिए कि कौन-सी लेनी है।

(लेखक सीए, ऑडिटिंग एंड अकाउंटिंग स्टैंडर्ड, कानूनी मामलों के जानकार हैं)

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Saturday, March 27, 2021

जोड़-तोड़ के नतीजे तय करेंगे राष्ट्रीय दलों का भविष्य (पत्रिका)

के.एस. तोमर

पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल, असम और पुडुचेरी में होने वाले विधानसभा चुनाव देश की भावी राजनीति की दिशा तय करेंगे। इन चुनाव परिणामों से ही तय होगा कि भाजपा दक्षिण में आगे बढ़ पाएगी या नहीं और अब कांग्रेस की स्थिति क्या रहेगी? उत्तर में अपनी स्थिति मजबूत करने के बाद भाजपा अब दक्षिण में अपनी विजय यात्रा आगे बढ़ाने कीकोशिश कर रही है, क्योंकि वह सिर्फ कर्नाटक तक ही सीमित नहीं रहना चाहती। दूसरी तरफ पश्चिम बंगाल के चुनावी मैदान में चार सांसदों को टिकट देकर पार्टी ने स्पष्ट कर दिया है कि पार्टी ममता बनर्जी को मात देने के लिए कोई कसर नहीं छोडऩा चाहती। अगर कांग्रेस केरल और पुडुचेरी में चुनाव नहीं जीत पाती है, तो यह राहुल गांधी के लिए शुभ संकेत नहीं होगा। केरल और पश्चिम बंगाल में वाम दलों का खराब प्रदर्शन उन्हें राष्ट्रीय राजनीति से और दूर कर सकता है।

भाजपा ने केरल में मेट्रोमैन 88 वर्षीय श्रीधरन को चुनाव मैदान में उतार कर साफ कर दिया है कि पार्टी ने मार्गदर्शक मंडल के सेवानिवृत्ति के नियमों को भी ताक पर रख दिया है। तमिलनाडु में द्रमुक-कांग्रेस गठबंधन भाजपा के सामने है, जहां कांग्रेस द्वारा 40 सीटें मांगने पर द्रमुक उसे 25 सीटों पर चुनाव लडऩे दे रही है। पूर्व मुख्यमंत्री जयललिता की करीबी रही शशिकला द्वारा राजनीति से संन्यास लेने की घोषणा के बाद तमिलनाडु में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या उनके समर्थक अन्नाद्रमुक के उम्मीदवारों का समर्थन करेंगे?

वरिष्ठ कांग्रेसी नेता तरुण गोगोई के निधन से असम में कांग्रेस के लिए चुनाव जीतना बड़ी चुनौती है। प्रियंका गांधी द्वारा असम के चाय बागानों में चाय की पत्तियां चुनना स्थानीय लोगों को लुभा पाया या नहीं, यह तो चुनाव नतीजे ही बता पाएंगे। कांग्रेस ने ऑल इंडिया डेमोक्रेटिक फ्रंट (एआइयूडीएफ), सीपीआइ, सीपीआइ (एम), सीपीआइ(एमएल) और आंचलिक गण मोर्चा के साथ मिल कर महागठबंधन बनाया है। भाजपा से अलग होकर बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट (बीपीएफ) भी इस गठबंधन में शामिल हो गया है। उधर असम गण परिषद (एजीपी), यूनाइटेड पीपुल्स पार्टी लिबरल (यूपीपीएल) और गण सुरक्षा पार्टी (जीएसपी) को साथ लेकर भाजपा 100 से ज्यादा सीटें जीतने का लक्ष्य लेकर चल रही है। समूचे देश की निगाहें इस वक्त प. बंगाल के चुनावों पर टिकी हैं। इस बीच भारतीय किसान यूनियन नेता राकेश टिकैत के सिंगूर जाने पर बहस छिड़ी है, क्योंकि उन्होंने किसानों से सीधे ही भाजपा को सबक सिखाने की अपील की है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक)

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आत्म-दर्शन: ताकि प्यासा नहीं रहे कोई (पत्रिका)

पोप फ्रांसिस, ईसाई धर्म गुरु

सब जानते हैं कि जल के बिना जीवन संभव नहीं है। इसलिए जल को बर्बाद या प्रदूषित नहीं किया जाए। यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि पानी सभी के लिए सुलभ हो। चिंता की बात यह है कि विश्व के 2.2 अरब लोग पीने योग्य पानी के लिए मशक्कत कर रहे हैं। यानी प्यासे को पानी पिलाने के लिए दुनियाभर में बहुत किया जाना चाहिए। जल के संरक्षण और उपयोग में अधिक जिम्मेदार होना है, क्योंकि यह हमारे ग्रह के संरक्षण के लिए अत्यंत आवश्यक है।

बिना पानी यहां कोई जीवन, कोई शहरी गतिविधि, कृषि या पशु पालन संभव नहीं है। फिर भी जल संरक्षण पर ध्यान नहीं दिया जा रहा। इसे बर्बाद करना, इसकी अवहेलना करना या इसे दूषित करना एक गलती है, जो लगातार दोहराई जा रही है। यह वाकई चिंता की बात है कि विकास और तकनीकी प्रगति के युग में पीने का पानी हर किसी की पहुंच में नहीं है।

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सामयिक: मोदी की मतुआ संघ से निकटता के निहितार्थ (पत्रिका)

कृपाशंकर चौबे

बांग्लादेश यात्रा के दौरान भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा मतुआ धर्म महासंघ के संस्थापक हरिचंद ठाकुर से जुड़े स्मृतिस्थल का 27 मार्च को दौरा कर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करने के गहरे निहितार्थ हैं। यह पहली बार है जबकि भारत का कोई प्रधानमंत्री हरिचंद ठाकुर स्मृतिस्थल (ओराकांडी, ढाका से 190 किमी. दूर) जा रहा है, तो निश्चित ही मतुआ धर्म के अनुयायियों में इसका बड़ा संदेश जाएगा। यह संदेश मोदी ने फरवरी 2019 में हरिचंद ठाकुर की प्रपौत्र वधू और मतुआ धर्म महासंघ की सबसे बड़ी नेता बीनापाणि देवी (बड़ो मां) से मुलाकात कर भी दिया था। बीनापाणि देवी वह पहली व्यक्ति थीं जिन्होंने बांग्लादेश से भारत आए शरणार्थियों को नागरिकता देने की मांग की थी। बंगाल में मतुआ धर्म महासंघ के अनुयायियों की संख्या करीब एक करोड़ से अधिक है।

मतुआ धर्म महासंघ की स्थापना हरिचंद ठाकुर (1882-1878) ने १९वीं सदी के मध्य में पूर्वी बंगाल के फरीदपुर के गोपालगंज में की थी। पूर्व और पश्चिम बंगाल में दलितों को धर्म का अधिकार सबसे पहले हरिचंद ठाकुर के मतुआ संघ ने ही दिया। मतुआ यानी जो मतवाले हैं, जो जाति, धर्म, वर्ण से ऊपर उठे हुए हैं। हरिचंद ने आजीवन अनुसूचित व पिछड़ी जातियों और जनजातियों को अपने मतुआ धर्म में शामिल कर उन्हें आगे बढऩे के लिए प्रेरित किया। हरिचंद ठाकुर ने मुख में नाम, हाथ में काम और सबको शिक्षा के अधिकार का नारा दिया और दलितों के लिए अनेक स्कूलों की स्थापना की। हरिचंद ने शूद्रों को अपनी संतानों को शिक्षा देने के लिए नारा दिया था प्रयोजन होने पर करो भिक्षा तब भी संतान को दो शिक्षा। धीरे-धीरे हरिचंद के संदेशों का असर होने लगा और मतुआ धर्म महासंघ आकार लेने लगा। हरिचंद ठाकुर के निधन के बाद महासंघ को उनके पुत्र गुरुचंद ठाकुर (1847-1937) ने आगे बढ़ाया। उन्होंने कहा था द्ग 'जार दल नेई, तार बल नेई', यानी 'जिनका दल नहीं, उनका बल नहीं।' पिता के पदचिह्नों पर चलते हुए गुरुचंद ने भी महासंघ का विस्तार करने के लिए कई स्कूलों की स्थापना की। परवर्ती काल में मतुआ आंदोलन को बढ़ाने का काम गुरुचंद के पौत्र प्रमथ रंजन विश्वास, रसीकलाल विश्वास, मुकुंद बिहारी मल्लिक, विराटचंद मंडल और विश्वदेव दास ने किया।

देश विभाजन के बाद पूर्वी बंगाल में हिंदुओं पर अत्याचार बढऩे लगा तो मतुआ धर्म महासंघ के अनुयायी बांग्लादेश से भागकर पश्चिम बंगाल समेत भारत के विभिन्न राज्यों का रुख करने लगे। स्वयं गुरुचंद के पौत्र प्रमथ रंजन विश्वास भी 13 मार्च 1948 को पश्चिम बंगाल के बनगांव आ गए और एक छोटा-सा घर बनाकर रहने लगे। पूर्वी बंगाल में दलितों पर होने वाले अत्याचार को रोकने के लिए ही जोगेंद्रनाथ मंडल ने पाकिस्तान की पहली सरकार में मंत्री पद स्वीकार किया था। मतुआ धर्म की तरह जोगेंद्रनाथ मंडल भी बांग्लाभाषी समाज में दलितों के जागरण के लिए समर्पित होकर काम करते रहे थे। मंडल स्वयं नाम शूद्र समुदाय से थे। देश विभाजन होने पर वे पूर्वी बंगाल में ही रह गए। तत्कालीन पूर्वी बंगाल में दलितों की स्थिति में सुधार लाने का सपना लेकर जोगेंद्रनाथ मंडल पाकिस्तान की पहली कैबिनेट में कानून और श्रम मंत्री बने। लेकिन लाख कोशिश के बावजूद मंडल अपना सपना पूरा नहीं कर सके। मुस्लिम लीग से उनका मोहभंग हुआ, तो मंत्री पद से त्याग पत्र देकर वह पश्चिम बंगाल लौट आए और आम्बेडकर की रिपब्लिकन पार्टी के लिए काम करते रहे। 1968 में वे चल बसे। जोगेंद्रनाथ मंडल जैसे नेताओं और मतुआ धर्म महासंघ के प्रयासों से बंगाल में दलित आंदोलन सिर्फ कोलकाता व आस-पास ही नहीं फैला, उसका विस्तार सुदूर जिलों तक में हो गया। गुरुचंद के पौत्र प्रमथ रंजन विश्वास ने 1948 के बाद बंगाल में महासंघ को संगठित करने का निरंतर यत्न किया। उनके निधन के बाद उनकी पत्नी बीनापाणि देवी (बड़ो मां) मतुआ धर्म की सबसे बड़ी नेता बनीं। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में मतुआ धर्म का समर्थन किसी पार्टी के लिए निर्णायक साबित हो सकता है। प्रधानमंत्री की बांग्लादेश यात्रा के दौरान गुरुचंद ठाकुर के स्मृतिस्थल जाने को उसी आईने में देखा जाना चाहिए।
(लेखक महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा में प्रोफेसर हैं)

सौजन्य - पत्रिका।
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Friday, March 26, 2021

आर्ट एंड कल्चर: फिल्म पुरस्कारों का ओझल हिस्सा (पत्रिका)

मिहिर पंड्या

यह हफ्ता राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों की घोषणा का रहा और हमेशा की तरह तमाम भारतीय भाषाओं में बनी उल्लेखनीय फिल्मों पर चर्चा करने की बजाय हमारा मीडिया बॉलीवुड को मिले चंद अभिनय पुरस्कारों और उनके पीछे की राजनीति पर चर्चा करने में उलझा रहा। सही है कि प्रत्यक्ष राजनीति से प्रेरित पुरस्कार सम्पूर्ण प्रक्रिया की गरिमा गिराते हैं और यह पतन बीते कुछ सालों में बहुत जाहिर होता जा रहा है। लेकिन इस सबके बीच राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों का एक और महत्त्वपूर्ण हिस्सा है, जो सुर्खियों से हमेशा ओझल ही रह जाता है। यह हिस्सा है गैर-फीचर फिल्म श्रेणी के पुरस्कार, जिसमें कई कमाल के वृत्तचित्रों, प्रयोगात्मक फिल्मों और लघु, एनिमेशन फिल्मों को पुरस्कृत किया जाता रहा है।

हमने अभी तक गैर-फीचर फिल्मों को लोकप्रिय वृत्त में आसानी से स्वीकार नहीं किया है, पर यह एक ऐसा क्षेत्र है जहां विश्व सिनेमा में कमाल का रोमांचक काम हो रहा है। हमें अपनी रुचियों के दरवाजे कुछ और खोलने होंगे। उदाहरण के लिए इस विधा में विश्व सिनेमा के सबसे चमकीले नाम ब्रिटिश फिल्म निर्देशक आसिफ कपाडिय़ा की दस्तावेजी फिल्में देखें। उनके परिचय के लिए आपको इतना याद दिला दूं कि वे आसिफ कपाडिय़ा ही थे जिन्होंने नब्बे के दशक में लोकप्रिय हिन्दी सिनेमा में हीरो बनने के लिए 'अनफिट' बताकर ठुकराया गए अविस्मरणीय अभिनेता इरफान खान को 2001 में अपनी फिल्म 'दि वॉरियर' में लींडिग हीरो का ब्रेक दिया था और उन्हें विश्व स्तर पर पहचान दिलाई थी। उनकी एफ-1 मोटर रेसिंग के चैम्पियन खिलाड़ी एयर्टन सेन्ना पर बनायी 'सेन्ना' और पॉप-सिंगर एमी वाइनहाउस पर बनायी 'एमी' के बाद अर्जेंटीना के मिथक बन चुके फुटबॉल खिलाड़ी डिएगो माराडोना पर बनायी हालिया डॉक्यूमेंट्री कुछ दिनों पहले नेटफ्लिक्स पर आई है। कपाडिय़ा अविश्वसनीय सफलता पाए और बेइंतहा चाहे गए, मगर वे त्रासदी से भरी जिंदगियों के वारिस इंसानों की कथा कहने में माहिर निर्देशक हैं। सिनेमा के इस नॉन-फिक्शन फॉर्म की अपरिमित संभावनाओं को नापने के लिए 'डिएगो माराडोना' देखिए।

इस बार के राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में सर्वश्रेष्ठ गैर-फीचर फिल्म का प्रतिष्ठित स्वर्ण कमल हेमंत गाबा निर्देशित डॉक्यूमेंट्री 'एन इंजीनियर्ड ड्रीम' को मिला है। हेमंत तकरीबन मेरी ही उमर के युवा हैं और इससे पहले 'शटलकॉक बॉयज' जैसी छोटे बजट की, पर बड़ी महत्त्वाकांक्षाओं से भरी फीचर फिल्म बना चुके हैं। मुझे उनकी पहली फिल्म की खुरदुरी सच्चाई बहुत भायी थी। 'एन इंजीनियर्ड ड्रीम' कोटा शहर की कोचिंग इंडस्ट्री में पढ़ रहे चार तरुण छात्रों की कहानी कहती है। उनका जीवन, उनके तनाव, उनकी महत्त्वाकाक्षाएं और उनके डर को इसमें दर्शाया गया है। इसे संभवत: हम कुछ साल पहले एक और युवा निर्देशक अभय कुमार द्वारा एलीट मेडिकल कैम्पस के भीतर रहकर बनाई गई शानदार दस्तावेजी फिल्म 'प्लासिबो' की परंपरा में रखकर देख सकते हैं। उम्मीद यही करनी चाहिए कि राष्ट्रीय पुरस्कार का तमगा ऐसी फिल्मों को ज्यादा बड़े दर्शक वर्ग तक पहुंचाएगा।
(लेखक सिनेमा-साहित्य पर लेखन करते हैं व दिल्ली विवि में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं)

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पुलिस सुधारों की राह में बाधा है 'दुरभिसंधि' (पत्रिका)

पुलिस और अपराधियों में सांठ-गांठ खतरनाक तो है ही, उससे ज्यादा खतरनाक है पुलिस, अपराधी और राजनेताओं के बीच गठजोड़। लेकिन, सबसे खतरनाक है चुनी हुई सरकार यानी कार्यपालिका और पुलिस की दुरभिसंधि', क्योंकि ऐसी 'दुरभिसंधि' के कारण सताए गए लोगों की गुहार सुनने वाला भी कोई नहीं होता। दोनों की 'आपराधिक दोस्ती' कई बार ऐसे गुल खिला देती है कि किस्से वर्षों तक गूंजते रहते हैं।

उद्योगपति मुकेश अंबानी के घर 'एंटीलिया' के बाहर विस्फोटकों से भरी 'एसयूवी' मिलने और मुंबई के कारोबारी मनसुख हिरेन की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत के बाद जिस तरह से रोज नए-नए खुलासे हो रहे हैं, वे उन्हीं किस्सों की नई कडिय़ां हैं। इसीलिए जब मुंबई के हटाए गए पुलिस कमिश्नर परमबीर सिंह की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस सुधार के लिए 2006 में दिए गए अपने ही फैसले को याद किया तो यह समझना आसान हो गया कि क्यों सरकारें पुलिस सुधार के उपायों को लागू नहीं करना चाहती हैं। परमबीर सिंह ने महाराष्ट्र के गृहमंत्री अनिल देशमुख की अवैध गतिविधियों की सीबीआइ से जांच कराने की मांग की थी।

सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस एसके कौल की डिविजन बेंच ने कहा कि प्रकाश सिंह बनाम केंद्र सरकार मामले में पुलिस सुधार के लिए व्यापक दिशा-निर्देश दिए गए थे, लेकिन सरकारों ने उसे लागू करने में कोई गंभीरता नहीं दिखाई। हालांकि विभिन्न मौकों पर इन सुधारों का मंत्र की तरह जाप जरूर किया जाता रहा है। सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों में पुलिस को राजनीतिक और सरकारी दबाव से मुक्त रखने के पर्याप्त उपाय किए गए थे। अदालत का मानना था कि पुलिस के काम में बेवजह हस्तक्षेप करने से कोई बाज नहीं आना चाहता। शीर्ष अदालत का ऑब्जर्वेशन एकदम सच है। सरकार चाहे किसी भी दल की हो, पुलिस के कार्य में बेजा दखल देना अपना अधिकार समझती है। कोई राजनेता तब तक अपने को ताकतवर नहीं समझता, जब तक पुलिस उसके इशारे पर न नाचने लगे। यदि कोई पुलिस अफसर ऐसा नहीं होने देता, तो तुरंत उसका तबादला करा देना जैसे वह अपना अधिकार समझता है। अपनी पैठ के बूते अक्सर वह सफल हो जाता है, क्योंकि सरकार में बैठी पार्टी को अगले चुनाव में अपनी ताकत दिखानी होती है। यही वजह है कि पुलिस सुधार के तमाम उपाय गोल-गोल घूमकर हर बार वहीं पहुंच जाते हैं, जहां से शुरू किए गए थे। अब जब सुप्रीम कोर्ट यह समझ गया है, तो क्या हमें यह उम्मीद नहीं करनी चाहिए वह कुछ और सख्ती दिखाए और सरकारों को अपनी गाइडलाइन मानने के लिए बाध्य करे।

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नक्सली बंदूक नहीं वोट पर भरोसा करना सीखें (पत्रिका)

छत्तीसगढ़ के अबूझमाड़ इलाके में नक्सली हमले में 5 जवान शहीद हो गए। पिछले कुछ समय से देश में नक्सली गतिविधियां कम हुई हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ इसका अपवाद है। इस बार छत्तीसगढ़ में यह हमला इसलिए ज्यादा व्यथित करता है कि कुछ दिन पहले ही नक्सलियों के एक संगठन ने शांति वार्ता की पेशकश की थी। इस नक्सली हमले के बाद शांति वार्ता के प्रयासों में बाधा आएगी। यह पहली बार नहीं है जब नक्सलियों ने आइईडी ब्लास्ट के जरिए जवानों पर हमला किया है। आमतौर पर नक्सली जवानों को निशाना बनाने के लिए उनके रास्ते में विस्फोटक सामग्री बिछा देते हैं। ताजा हमले के बाद क्या यह नहीं माना जाएगा कि नक्सलियों की दिलचस्पी किसी भी तरह की शांति वार्ता में नहीं है? यह भी गौरतलब है कि शांति वार्ता के लिए नक्सलियों की शर्तों को लेकर सरकारी पक्ष के विरोधाभासी बयान सामने आए। संभव है कि सरकार पर दबाव बनाने के लिए भी नक्सलियों ने इस हमले को अंजाम दिया हो।

बस्तर में सीपीआइ (माओवादी) की दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी (डीकेएसजेडसी) के प्रवक्ता की ओर से जारी एक पर्चे में कहा गया था कि वे शांति वार्ता के लिए तैयार हैं, बशर्ते नक्सलवाद प्रभावित क्षेत्रों से पुलिस और सुरक्षाबलों के शिविर हटा दिए जाएं। साथ ही उनकी पार्टी पर लगा प्रतिबंध खत्म हो। जेल में बंद उनके नेताओं को रिहा करने की शर्त भी लगाई गई। नक्सलियों ने जिस तरह की शर्तें रखी हैं, उनको मानना जोखिम भरा है, क्योंकि माना जाता है कि नक्सली अपनी बात पर कायम नहीं रहते और शांति की बात करते-करते हमलावर हो जाते हैं। छत्तीसगढ़ में वर्ष 2019 में नक्सली हमलों में 22 जवान शहीद हुए थे, लेकिन 2020 में 36 जवान नक्सली हमलों में शहीद हो गए। यह वाकई चिंता की बात है। सरकार को नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में नई रणनीति के साथ काम करने की जरूरत है। अपनी पुरानी रणनीति की समीक्षा भी करनी होगी। साथ ही नक्सलियों की तरफ से आए शांति वार्ता के प्रस्ताव को सरकार को तुरंत खारिज नहीं करना चाहिए, हालांकि इसमेें कुछ जोखिम है, लेकिन शांति के लिए इतना जोखिम लिया जा सकता है।

नक्सल प्रभावित राज्यों को उन क्षेत्रों में विकास की गति भी बढ़ानी होगी, जहां नक्सलियों का प्रभाव है। विकास का नेटवर्क बढ़ेगा तो प्रभावित इलाकों में नक्सलियों की पकड़ भी कमजोर होने लगेगी। बेहतर तो यह है कि नक्सली भी समय को देखते हुए हिंसा का रास्ता त्यागें। उनको यह बात स्वीकार करनी चाहिए कि लोकतंत्र में परिवर्तन बंदूक के जरिए नहीं, बल्कि जनता के वोट की ताकत के बल पर होता है।

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प्रवाह : तोड़ो दीवारें (पत्रिका)

- भुवनेश जैन

सेना और पुलिस। देश में मुख्य रूप से ये दो बल हैं। सेना पर दुश्मन से देश की सीमाओं की रक्षा करने की जिम्मेदारी है तो पुलिस पर अपराधियों से देश की जनता को बचाने की। आज आजादी के 74 साल बाद इन दोनों बलों की आम जनता में छवि की तुलना की जाए तो दो विपरीत ध्रुवों पर खड़े बलों की स्थिति सामने आती है। सेना के लिए हर देशवासी के हृदय में सम्मान के भाव प्रकट होते हैं, वहीं पुलिस के लिए ठीक उल्टे भाव हैं। आम जनता पुलिस थानों के पास से गुजरने में ही घबराने लगी है। पता नहीं किस अपराध में पकड़ कर अंदर डाल दें।

मैंने इसी स्तंभ में दिनांक 11 मार्च 2021 को महिलाओं के साथ पुलिस की ज्यादतियों पर 'निर्वस्त्र होती पुलिस' शीर्षक से टिप्पणी लिखी थी। इस टिप्पणी को पढऩे के बाद जनता के जितने फोन, संदेश या पत्र आए, उतने पहले शायद ही कभी आए होंगे। मुझे अंदाज नहीं था कि राजस्थान की जनता में अपनी ही पुलिस के प्रति इतना आक्रोश है। यह एक चिंतनीय विषय बन चुका है, जिस पर जल्दी से जल्दी विचार कर सुधारात्मक कदम उठाने की जरूरत है। राजस्थान की छवि देश के सबसे कम अपराधों वाले और अमन-चैन वाले राज्य की रही है। इसमें यहां के अमन पसंद नागरिकों के साथ ही पुलिस की भी भूमिका रही है। फिर पिछले कुछ वर्षों से यह भूमिका बदली हुई क्यों दिखाई दे रही है? बजरी माफियाओं से मिलीभगत, हिरासत में अत्याचार, महिलाओं के साथ ज्यादतियां और सबसे बड़ी बात- बिना गाली-गलौच बात नहीं करने की प्रवृति, इन सबने पुलिस के प्रति जनता के विश्वास को डगमगा दिया है। लोग मजाक में कहने लगे हैं कि राजस्थान पुलिस को अपना ध्येय वाक्य 'अपराधियों में भय, जनता में विश्वास' से बदल कर 'जनता में भय, अपराधियों में विश्वास' रख देना चाहिए। पुलिस की छवि में आई गिरावट के कई कारण गिनाए जा सकते हैं। इनमें राजनीति का अपराधीकरण, पुलिस सुधार आयोग की रिपोर्टों की उपेक्षा, संसाधनों की कमी, कठोर दिनचर्या, सम्पूर्ण समाज में आई नैतिक गिरावट का असर जैसे बीसियों कारण हो सकते हैं। लेकिन इन कारणों की आड़ में पुलिस में आ रही चारित्रिक गिरावट को जायज नहीं ठहराया जा सकता।

यह भी सही है कि पूरी पुलिस फोर्स में सभी लोग गड़बड़ नहीं है। लेकिन सबकुछ होते देखते हुए भी मौन रहने वाले भी गिरावट में बराबर के भागीदार माने जाएंगे। व्यवहारगत खामियों का बड़ा कारण प्रशिक्षण की कमी है। सेना में जहां वर्षपर्यंत तरह-तरह के प्रशिक्षण चलते रहते हैं, पुलिस में एक बार भर्ती हो जाने के बाद प्रशिक्षण पर ध्यान ही नहीं दिया जाता। यहां तक कि फिटनेस टेस्ट भी नहीं होते। दूसरी ओर, जनता से दूरी के बीच संवादहीनता की दीवारें खड़ी हैं। जनता का भरोसा हिल चुका है। दरअसल जब कोई पीडि़त थाने पर शिकायत दर्ज कराता है तो वहीं तैनात पुलिस दूसरे पक्ष को भी परस्पर शिकायत दर्ज कराने के लिए उकसाती है। ऐसे में किसी को न्याय नहीं मिलता, उल्टे दोनों पक्ष पुलिस की 'सेवा' में जुट जाते हैं। राजनीति का भी कुछ हद तक अपराधीकरण हो चुका है। ऐसे में कैसे उम्मीद की जाए कि पुलिस स्वतंत्र होकर न्याय करेगी। सवाल यह भी है कि क्या सरकार महत्वपूर्ण पदों पर चयन से पहले अफसरों का सर्विस रिकॉर्ड जांचती है। बल्कि यह देखा जाता है कि कौन अफसर पार्टी और सरकार के कितने हित निभा पाएगा।

उपरोक्त सब बातें राजस्थान के भविष्य के लिए चिंताजनक हैं। हम अपनी आने वाली पीढिय़ों के लिए बेहतर वातावरण छोडऩा चाहते हैं तो नागरिकों और पुलिस के बीच संवाद कायम करने के लिए कदम उठाने होंगे। पुलिस भी सरकार का अंग है और सरकार की स्वामी जनता है। इसलिए जनता को ही आगे आना होगा। राजस्थान पत्रिका अपने पाठकों के भरोसे के बूते पर जनता और पुलिस के बीच आई संवादहीनता को तोड़कर संवेदनशील वातावरण निर्मित करने का बीड़ा उठा रहा है। इसके लिए पुलिस के शीर्ष प्रशासन के सहयोग से पूरे प्रदेश में पुलिस के साथ जनता का संवाद बनाने का कार्यक्रम है ताकि दोनों एक दूसरे को समझ सकें। खोया हुआ विश्वास पुन: लौट सके और सबसे बढ़कर प्रदेश की पुलिस की छवि पुन: उज्ज्वल हो सके। यह कार्यक्रम हम आने वाले कुछ महीनों तक चलाना चाहेंगे। समाज के विभिन्न वर्गों के साथ पुलिस विभाग में विभिन्न स्तर पर चर्चाएं होंगी। उम्मीद की जा सकती है कि संवादहीनता की दीवारें गिरेंगी तो भरोसे की इमारतें आकार लेंगी। ऐसा हो सका तो राजस्थान पुन: शांति और कानून-व्यवस्था के मामले में अग्रणी प्रदेश बन जाएगा।


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तानाशाही का जरिया है डेटा पर एकाधिकार (पत्रिका)

- प्रो. युवाल नोआ हरारी, बेस्ट सेलर्स ‘सैपियंस’, ‘होमो डेस’ और ‘२१ लेसंस फॉर द ट्वेंटी फर्स्ट सेंचुरी’ के लेखक

जिस तरह वैज्ञानिक और राजनेता महामारी से निपटने के लिए अपने-अपने हिस्से की भागीदारी कर रहे हैं, वैसे ही इंजीनियर भी नए डिजिटल प्लेटफॉर्म और निगरानी उपकरण सृजित कर रहे हैं जिनसे लॉकडाउन में कामकाज सुचारु रखना संभव हो सका है। लेकिन डिजिटलीकरण और निगरानी ने हमारी निजता को खतरे में डाल दिया है और अप्रत्याशित रूप से सर्वाधिकारवादी शासन व्यवस्था के सिर उठाने के रास्ते खोल दिए हैं। सारी शक्ति मिलने की राह आसान कर दी है। 2020 में जनसमूह पर निगरानी रखे जाने को न केवल ज्यादा वैधानिकता मिल चुकी है, बल्कि यह पहले से अधिक सामान्य भी हो गया है।

महामारी के खिलाफ जंग जरूरी है, लेकिन क्या इस प्रक्रिया में यह जरूरी है कि हमारी स्वतंत्रता खत्म हो जाए? वाजिब निगरानी और निजता संबंधी आशंकाओं के बीच संतुलन बिठाना राजनेताओं का काम है, न कि इंजीनियरों का। महामारी के वक्त में भी, डिजिटल तानाशाही से हमारी सुरक्षा को सुनिश्चित करने में ये तीन मूल सिद्धांत अहम साबित हो सकते हैं - पहला, जब भी किसी व्यक्ति से संबंधित कोई जानकारी जुटाई जाए, विशेषकर उनके शरीर में क्या घटित हो रहा है इससे संबंधित, तो उस जानकारी का इस्तेमाल सिर्फ और सिर्फ उनकी सहायता के लिए ही होना चाहिए न कि जानकारी का दुरुपयोग कर लोगों को नियंत्रित करने या उन्हें नुक सान पहुंचाने के लिए। महामारी पर निगरानी के लिए जो भी व्यवस्था हम बनाते हैं, उसके लिए विश्वास की वैसी ही अवधारणा को प्रमुखता देना जरूरी है, निजी जानकारियों को लेकर जो भरोसा एक मरीज और उसके निजी चिकित्सक के बीच होता है। दूसरा यह कि निगरानी का तंत्र दोतरफा होना चाहिए यानी आम लोगों पर व्यक्तिगत निगरानी के साथ ही सरकार और बड़े कार्पोरेट घरानों की भी निगरानी होनी चाहिए। उदाहरण के लिए, कोरोना काल में सरकार भारी मात्रा में फंड जारी कर रही है। इस प्रक्रिया में और अधिक पारदर्शिता लाने की जरूरत है।

एक नागरिक के तौर पर मैं चाहूंगा कि यह जानना बेहद आसान हो कि सबको क्या मिल रहा है, और कौन तय कर रहा है कि पैसा कहां जाना है। मैं यह भी सुनिश्चित करना चाहूंगा कि पैसा कारोबारियों में उन्हीं को मिले जिन्हें सख्त जरूरत है बजाय उन औद्योगिक घरानों के, जिनके मालिक किसी मंत्री के मित्र हैं। यदि सरकार कहती है कि महामारी के चलते ऐसा निगरानी तंत्र तैयार करना बेहद जटिल है, तो इस पर भरोसा मत करें। यदि आम जनता की निगरानी शुरू करना जटिल नहीं है, तो इसकी निगरानी भी जटिल नहीं है कि सरकार क्या कर रही है।

तीसरा सिद्धांत यह कि एक ही जगह बहुत सारा डेटा एकत्रित न किया जाए। न तो महामारी के दौरान और न ही महामारी खत्म होने के बाद। डेटा पर एकाधिकार, तानाशाही का जरिया साबित होता है। इसलिए अगर हम महामारी को रोकने के लिए लोगों का बायोमीट्रिक डेटा जुटा रहे हैं तो यह कार्य स्वतंत्र स्वास्थ्य निकाय को करना चाहिए न कि पुलिस को। ऐसी कवायद के चलते जो डेटा जुटाया जाए, उसे सरकार के बाकी मंत्रालयों और बड़े निगमों के डेटा केंद्रों से अलग रखा जाना चाहिए। निस्संदेह इससे काम का अनावश्यक बोझ बढ़ेगा और दक्षता घटेगी, लेकिन यह डिजिटल तानाशाही पर अंकुश के लिए जरूरी समाधान है, कोई ‘बग’ नहीं।

२०२० की अप्रत्याशित वैज्ञानिक और तकनीकी उपलब्धियां कोविड-19 संकट का समाधान करने में नाकाम रहीं। उन्होंने कोरोना महामारी को एक प्राकृतिक आपदा से राजनीतिक दुविधा में तब्दील कर दिया। जब ‘काली मौत’ से लाखों लोग मारे गए थे तो किसी ने शासन से उस संकट के समाधान की अधिक अपेक्षा नहीं की थी। एक तिहाई अंग्रेजों की मौत के बावजूद इंग्लैंड के किंग एडवर्ड तृतीय को गद्दी नहीं छोड़नी पड़ी थी। चूंकि शासकों की शक्तियां सीमित थीं और वे महामारी के आगे लाचार थे इसलिए किसी ने उन्हें जिम्मेदार नहीं ठहराया। परन्तु आज वियतनाम से लेकर ऑस्ट्रेलिया तक विभिन्न राष्ट्रों के पास विज्ञान के ऐसे साधन हैं जो बिना वैक्सीन के भी कोविड-19 को थाम सकते हैं। हालांकि इन साधनों का आर्थिक और सामाजिक मूल्य कहीं ज्यादा है। हम वायरस को हरा तो सकते हैं, लेकिन इस बारे में निश्चिंत नहीं हैं कि हम जीत की कीमत चुकाना चाहते हैं या नहीं; इसीलिए वैज्ञानिक उपलब्धियों ने राजनेताओं की जिम्मेदारी कई गुना बढ़ा दी है। दुर्भाग्य है कि कई राजनेता इस जिम्मेदारी की गंभीरता समझने में विफल रहे हैं। जैसे एक समय अमरीका और ब्राजील के जवादी राष्ट्रपतियों ने कोरोना के खतरे को गंभीरता से नहीं लिया, विशेषज्ञों की राय सुनने से इनकार कर दिया और महामारी को साजिश बताने वाली कहानियों को हवा दी। उन्होंने रोकथाम के लिए खुद कोई ठोस संघीय कार्ययोजना नहीं बनाई, बल्कि राज्यों और स्थानीय निकायों की कोशिशों को भी विफल कर दिया। ट्रंप और बोल्सोनारो प्रशासन की लापरवाही से दोनों देशों में लाखों लोग जान से हाथ धो बैठे। ब्रिटेन में शुरुआत में सरकार कोविड -19 से ज्यादा ब्रेग्जिट में व्यस्त रही। बोरिस जॉनसन प्रशासन वायरस से ब्रिटेन को आइसोलेट करने में नाकान रहा, जो वास्तव में सर्वाधिक महत्वपूर्ण था। कोविड-19 से निपटने में इजरायल भी राजनीतिक कुप्रबंधन का शिकार हुआ। ताइवान, न्यूजीलैंड और साइप्रस की तरह इजरायल में प्रवेश का मुख्य द्वार एक ही है - बेन गुरियन एयरपोर्ट। जिस वक्त कोरोना चरम पर था, नेतन्याहू सरकार ने न यात्रियों को क्वारंटीन किया, न सही तरह से स्क्रीनिंग की, बल्कि अपनी लॉक डाउन नीतियां लागू करने में भी नाकाम रही।

Copyright - Yuval Noah Harari 2021/ फरवरी 2021 में यह लेख फाइनेंशियल टाइम्स में प्रकाशित हुआ।

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Thursday, March 25, 2021

नई दवाइयों और परीक्षण पर शोध आवश्यक (पत्रिका)

- डॉ. महावीर गोलेच्छा

हर वर्ष 24 मार्च को सम्पूर्ण विश्व में टीबी (ट्यूबरलोसिस) दिवस मनाया जाता है। यह दिवस इसलिए मनाया जाता है, ताकि इस बात की जागरूकता लाई जा सके कि इस भयानक रोग से मानव जाति को अभी मुक्ति मिलना बाकी है। इस रोग की रोकथाम और उपचार के संबंध में किए जा रहे प्रयासों की समीक्षा भी होती है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की वैश्विक टीबी रिपोर्ट-2020 के अनुसार एड्स के बाद टीबी विश्व की सबसे गम्भीर स्वास्थ्य समस्या है। लगभग 20 साल पहले डब्ल्यूएचओ ने टीबी को वैश्विक स्वास्थ्य आपातकालीन समस्या घोषित किया था। हालांकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किए गए प्रयासों से टीबी की रोकथाम में कुछ सफलता मिली, लेकिन ये पर्याप्त साबित नहीं हुए। लाखों लोगों को टीबी का उपचार प्राप्त होता है, परन्तु जो लोग इससे वंचित रह जाते हैं या जिनमें इस रोग की जांच नहीं हो पाती है, वे सामुदायिक स्वास्थ्य के लिए बड़ा खतरा हैं। इसलिए इस रोग के प्रति जागरूकता पैदा करना बहुत जरूरी है।

भारत में विश्व के सर्वाधिक टीबी रोगी हैं। टीबी के उपचार में सबसे बड़ी चुनौती इस क्षेत्र में नई दवाइयों तथा परीक्षण पर ध्यान नहीं देना है। एसटेंसिवली ड्रग रजिस्टेंट (एसडीआर) तथा मल्टी ड्रग रजिस्टेंट (एमडीआर) टीबी का इलाज बहुत ही मुश्किल है, जांच करना भी कठिन है। इसलिए इलाज के लिए नई तकनीक एवं दवा के लिए शोध की गति बढ़ाना बहुत जरूरी है। भारत में ग्रामीण क्षेत्रों में आधारभूत सुविधाओं जैसे जांच के लिए प्रयोगशालाओं, गुणवत्तापूर्ण दवाओं और स्वास्थ्यकर्मियों की कमी टीबी उन्मूलन में सबसे बड़ी बाधा है। सरकार को इस पक्ष पर ध्यान देना चाहिए।

टीबी के आधे से ज्यादा मरीज निजी चिकित्सालयों में इलाज कराते हैं। अध्ययनों में पाया गया है कि ऐसे कुछ संस्थानों में टीबी की दवाओं का तार्किक रूप से सही उपयोग नहीं किया जाता है। जिन मरीजों को यह बीमारी नहीं होती, उनको भी टीबी की दवा दे दी जाती है। गौण रोगों के लिए एंटीबायोटिक दवाइयां दी जाती हैं, जिससे एमडीआर टीबी होने की आशंका बढ़ जाती है। इसलिए सरकारी एवं निजी चिकित्सकों को इससे जुड़ा विशेष प्रशिक्षण भी देना चाहिए। भारत में बिना चिकित्सकीय परामर्श के भी एंटीबायोटिक दवाइयां मिल जाती हैं। सख्त कानून बनाकर इस प्रवृत्ति को रोकना जरूरी है। सरकार को निजी क्षेत्र के साथ मिलकर टीबी उन्मूलन के लिए साझा प्रयास करने चाहिए। पोलियो उन्मूलन हमारे सामने साझा प्रयासों का उदाहरण है।

यद्यपि भारत ने टीबी उन्मूलन के लिए काफी सराहनीय प्रयास किए हैं। डॉट्स कार्यक्रम को वैश्विक स्तर पर सराहा जाता है। लेकिन टीबी उन्मूलन के लिए अभी काफी लंबी लड़ाई लडऩी होगी। यदि भारत अपनी राष्ट्रीय स्ट्रेटेजिक योजना को प्रभावी रूप से मजबूत राजनीतिक इरादों एवं स्वास्थ्य क्षेत्र में व्यापक प्रशासनिक एवं नीतिगत सुधारों के साथ लागू करे, तो हम डब्ल्यूएचओ के 2050 के टीबी मुक्त विश्व के सपने को साकार कर सकते हैं।

सौजन्य - पत्रिका।
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Wednesday, March 24, 2021

जीत का आधार विज्ञान, हार का राजनीति (पत्रिका)

प्रो. युवाल नोआ हरारी, (बेस्टसेलर्स 'सैपियंस', 'होमो डेस' और '21 लेसंस फॉर द ट्वेंटी फस्र्ट सेंचुरी' के लेखक हैं)

इतिहास के व्यापक परिप्रेक्ष्य में कोरोना का एक साल! इसका सार मानवता को भविष्य के लिए कितने ही सबक दे गया है। हालांकि बहुत से लोगों का मानना है कि कोरोना जिस तरह कई लोगों की मौत का कारण बना उससे यही जाहिर होता है कि कुदरती कहर के आगे मानवता बेबस है, लेकिन सच यह है कि 2020 ने दुनिया को दिखा दिया है कि मानवता किसी भी प्रकार से लाचार या असहाय नहीं है। अब कोई महामारी ऐसी नहीं, जिस पर नियंत्रण न किया जा सके। विज्ञान ने इतनी तरक्की कर ली है कि ऐसी चुनौतियों का सामना करना संभव हो गया है। इसके बावजूद इतनी संख्या में लोग संक्रमित क्यों हुए और कई लोगों की जानें क्यों गईं? जवाब है- गलत राजनीतिक फैसलों के कारण।

पुराने जमाने में जब प्लेग फैला था तो लोगों ने इसे 'काली मौत' (ब्लैक डेथ) का नाम दिया। उन्हें जरा भी अंदाजा नहीं था कि इस बीमारी का कारण क्या है और इस पर कैसे काबू पाया जा सकता है? 1918 में जब इंफ्लुएंजा ने दस्तक दी तो विश्व के सर्वश्रेष्ठ वैज्ञानिक भी इस जानलेवा वायरस की पहचान नहीं कर सके। इसकी रोकथाम के लिए किए गए कई उपाय धरे के धरे रह गए। साथ ही इसके लिए टीका बनाने के प्रयास भी व्यर्थ रहे। यह कोविड-19 से काफी अलग थी। दिसम्बर 2019 के अंत में महामारी की पहली आहट सुनाई दी थी। 10 जनवरी 2020 तक वैज्ञानिकों ने न केवल महामारी के लिए जिम्मेदार वायरस को अलग कर लिया, बल्कि इसकी जीनोम संरचना का अनुक्रम भी तैयार कर लिया और इसे ऑनलाइन प्लेटफॉम्र्स पर प्रकाशित भी कर दिया। कुछ ही महीनों में यह स्पष्ट हो गया कि कौन-से उपाय कोरोना संक्रमण की शृंखला को तोड़ इसकी रफ्तार को धीमा कर सकते हैं। वायरस का मुकाबला करने के लिए साल भर के भीतर ही कई तरह की वैक्सीन का उत्पादन होने लगा। मानव और रोगाणु के बीच जंग में मानव इससे पहले कभी इतना शक्तिशाली नहीं देखा गया।

जैव-तकनीक की अप्रत्याशित उपलब्धियों के साथ ही कोविड वर्ष ने सूचना तकनीक की शक्ति को भी रेखांकित किया। पुराने जमाने में मानव कभी-कभार ही ऐसी महामारियों को रोक पाता था, क्योंकि मनुष्य रियल टाइम में संक्रमण की शृंखला की निगरानी कर पाने में अक्षम था और लॉकडाउन जैसे उपायों का आर्थिक भार उठाना उसके लिए संभव नहीं था। 1918 में गंभीर फ्लू से संक्रमित व्यक्ति को क्वारंटीन तो किया जा सकता था, लेकिन तब बीमारी के लक्षणों वाले प्रीसिम्प्टोमैटिक और असिम्प्टोमैटिक संक्रमण वाहकों की गतिविधियों को ट्रेस नहीं किया जा सकता था। तब अगर सारी आबादी को कई हफ्तों तक घर में ही रहने को कह दिया जाता तो अर्थव्यवस्था ठप हो जाती, सामाजिक ताना-बाना बिखर जाता और भुखमरी फैल सकती थी। 2020 के डिजिटल निगरानी युग में संक्रमण की ट्रेसिंग और उसके नियंत्रण की राह आसान हो गई। इससे बढ़कर ऑटोमेशन और इंटरनेट की वजह से लॉकडाउन सफल हो सका, कम से कम विकसित देशों में तो जरूर। एक ओर, विकासशील दुनिया के कुछ हिस्सों में मानवता ने जो भुगता उसने प्लेग महामारी के दिनों की याद दिलाई, वहीं डिजिटल क्रांति ने विकसित दुनिया के अधिकांश हिस्सों में सब कुछ बदल दिया।

खेती की बात करें तो सैकड़ों वर्षों से खाद्यान्न उत्पादन मानव श्रम पर ही निर्भर था। 90 प्रतिशत लोग खेतीबाड़ी का काम करते थे। आज विकसित देशों में ऐसा नहीं है। अमरीका में केवल 1.5 प्रतिशत आबादी खेतों में काम करती है और न केवल देशवासियों के लिए पर्याप्त खाद्यान्न की पैदावार होती है, बल्कि अमरीका खाद्यान्न का अग्रणी निर्यातक भी है। खेतों में सारा काम मशीनों से होता है, जिनके संक्रमित होने का कोई खतरा नहीं रहता। आज जीपीएस संचालित मशीन से सारी फसल काटी जा सकती है, वह भी ज्यादा दक्षता के साथ। इसीलिए इसीलिए लॉकडाउन के बावजूद गेहूं, मक्का, चावल जैसे खाद्यान्नों की वैश्विक पैदावार पर कोविड का कोई असर नहीं पड़ा?

लेकिन खाद्यान्न को जनता तक पहुंचाने के लिए क्या फसल उगाना और काटना ही काफी है? नहीं। कई बार कृषि उपज को हजारों किलोमीटर दूर पहुंचाना भी होता है और इसके लिए परिवहन के साधनों की जरूरत होती है। इतिहास पर गौर करें तो पाएंगे कि व्यापार, महामारी की कहानी के मुख्य खलनायकों में से एक साबित होता था। जानलेवा रोगाणु समुद्री जहाजी बेड़ों और लंबी दूरी तय करने वाले कारवां के जरिए दुनिया के तमाम हिस्सों में पहुंचे। 'काली मौतÓ भी इसी तरह सिल्क रोड के रास्ते पूर्वी एशिया से मध्य-पूर्व तक पहुंची।

2020 में वैश्विक व्यापार कमोबेश सहजता से जारी रह सकता है क्योंकि इसमें मानव संसाधन की जरूरत पहले की तुलना में काफी कम हुई है। व्यापक तौर पर आज के दौर के स्वचालित कंटेनर जहाज कई टन माल के परिवहन में सक्षम हैं। यह सही है कि कोविड-19 संक्रमण फैलाने में क्रूज जहाजों और यात्रियों से भरे हवाई जहाजों का बड़ा हाथ रहा है, लेकिन यह भी सही है कि वैश्विक व्यापार का अनिवार्य हिस्सा नहीं है टूरिज्म और ट्रैवल। पर्यटक घर में सुरक्षित रह सकते हैं और व्यापारी जूम पर मीटिंग कर सकते हैं, जबकि स्वचालित जहाज और मानव रहित ट्रेन वैश्विक अर्थव्यवस्था को थमने से रोक सकते हैं। 2020 में अंतरराष्ट्रीय पर्यटन हालांकि आसमान से जमीन पर आ गया, लेकिन वैश्विक समुद्री व्यापार में महज 4 प्रतिशत की गिरावट ही दर्ज की गई।
Copyright © Yuval Noah Harari 2021 / / फरवरी 2021 में यह लेख फाइनेंशियल टाइम्स में प्रकाशित हुआ।

बीती सदियों में यों बदली दुनिया -
-1918 में फ्लू से संक्रमित व्यक्ति को क्वारंटीन किया जा सकता था, लेकिन कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग संभव नहीं थी। 2020 में न केवल यह संभव हुआ, महामारी पर नियंत्रण की राह भी आसान हुई है।
- पहले 90% लोग खेतों में जुटते थे, आज अमरीका में महज 1.5% आबादी खेतों में काम करती है और ऑटोमेशन के जरिए ज्यादा दक्षता के साथ अधिक पैदावार हासिल करती है।
- 1582 में यात्री और माल परिवहन के लिए इंग्लिश मर्चेंट फ्लीट की कुल क्षमता 68 हजार टन थी, जिसे १६ हजार नाविकों की जरूरत थी। 2017 में लांच किए गए ओओसीएल हांगकांग कंटेनर शिप की माल परिवहन क्षमता २ लाख टन है, जिसके लिए सिर्फ 22 सदस्यों के चालकदल की जरूरत है।

सौजन्य - पत्रिका।
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Tuesday, March 23, 2021

सेहत : अब जरूरी हो गया है पितृत्व अवकाश (पत्रिका)

डॉ. चंद्रकांत लहारिया

गर्भवती महिला और होने वाले (और उसके बाद भी) बच्चे के पालन-पोषण की जिम्मेदारी पारम्परिक तौर पर भारत में केवल गर्भवती महिला या ज्यादा से ज्यादा घर की अन्य महिला सदस्यों की मानी जाती है। देखा जाता है कि पत्नी के गर्भधारण के बाद बच्चे के होने वाले पिता का दैनिक कामकाज पूर्व की तरह यथावत चलता रहता है। अध्ययनों में पाया गया है कि भारतीय पुरुष, गर्भवती पत्नियों की देखभाल, बच्चे के जन्म की योजना और फिर उसकी देखभाल में बहुत ही कम वक्त देते हैं। यह काम परिवार की अन्य महिला सदस्यों का माना जाता है।

यही वजह है कि जब क्रिकेटर विराट कोहली के बाद कॉमेडी शो होस्ट कपिल शर्मा ने भी बच्चे के जन्म के समय, पत्नी व बच्चे की देखभाल के लिए काम से छुट्टी लेने का फैसला किया, तो यह चर्चा का विषय बना। ये कुछ अच्छे उदाहरण हंै, जिन्हें हमें नए समय के लिहाज से कुछ रूढि़वादी परम्पराओं की पड़ताल करने के लिए इस्तेमाल करने चाहिए। आइए, गर्भवती पत्नी और नवजात शिशु की देखभाल में पिता की जिम्मेदारी पर विचार करें।

चिकित्सकीय और वैज्ञानिक साक्ष्यों की भरमार है, जो तीन चीजों की तरफ इशारा करते हैं। पहला, मां और शिशु एक ही इकाई हैं। उन्हें अलग नहीं समझा जाना चाहिए। बिना स्वस्थ गर्भवती महिला के स्वस्थ बच्चे का पैदा होना संभव नहीं है। दूसरा, हालांकि गर्भधारण सामान्य शारीरिक प्रक्रिया है (और कोई बीमारी नहीं है), लेकिन गर्भधारण के कुछ स्वास्थ्य संबंधी जोखिम अवश्य होते हैं। इसलिए गर्भवती महिलाओं और होने वाले बच्चे, दोनों के अच्छे स्वास्थ्य के लिए, नियमित स्वास्थ्य देखभाल की जरूरत होती है। तीसरा, भ्रूण और शिशु के जीवन के पहले 1000 दिन काफी महत्त्वपूर्ण होते हैं। इसमें गर्भावस्था के 9 माह यानी 270 दिन और जन्म के बाद दो वर्ष यानी 730 दिन शामिल हंै। इस पूरी अवधि में मां की सेहत, भ्रूण और तत्पश्चात शिशु के शारीरिक और मानसिक विकास का मुख्य आधार होते हैं। बच्चे के करीब 80 फीसदी मस्तिष्क का विकास इन्हीं शुरुआती 1000 दिनों में होता है। अगर इस दौरान मां और बच्चे की पर्याप्त देखभाल नहीं की गई, तो बच्चे की उम्र के दो साल बाद कितने भी अतिरिक्त प्रयास कर लें, इस अवधि की भरपाई नहीं हो सकती।

संयुक्त परिवार की बरसों पुरानी व्यवस्था के धीरे-धीरे खत्म होने और बढ़ते एकल परिवारों ने इस चुनौती को और बढ़ा दिया है। एकल परिवारों में सिर्फ पति और पत्नी ही होते हैं। इसलिए शिशु और पत्नी की देखभाल में पिता की भूमिका ज्यादा महत्त्वपूर्ण हो गई है। इसके अन्य सामाजिक पहलू भी हैं। देखा गया है कि कामकाजी महिलाओं को गर्भधारण के बाद नौकरी और शिशु की देखभाल में से किसी एक को चुनना होता है। महिलाएं अक्सर बच्चे के जन्म के बाद नौकरी पर नहीं लौट पाती हैं। बच्चे की देखभाल में अगर पिता भी साथ दे, तो महिलाएं सशक्त होंगी और कामकाजी वर्ग में महिलाओं की संख्या बढ़ेगी। इसके लिए सरकारी और निजी क्षेत्र में भी नीतिगत पहल की जा सकती है, जैसे पिता को 'पितृत्व अवकाश' दिया जाए। इस अवकाश के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति न हो, अवकाश विदेशों की तरह पर्याप्त संख्या में दिया जाए। देश में हमें गर्भवती महिलाओं और नवजात शिशु की देखभाल में पुरुषों की भागीदारी बढ़ाना सुनिश्चित करना होगा और ऐसा संभव है।

(लेखक सार्वजनिक स्वास्थ्य, टीकाकरण और स्वास्थ्य तंत्र विशेषज्ञ)

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जीत का आधार विज्ञान, हार का राजनीति ! (पत्रिका)

प्रो. युवाल नोआ हरारी, (बेस्टसेलर्स 'सैपियंस', 'होमो डेस' और '21 लेसंस फॉर द ट्वेंटी फस्र्ट सेंचुरी' के लेखक हैं)

इतिहास के व्यापक परिप्रेक्ष्य में कोरोना का एक साल! इसका सार मानवता को भविष्य के लिए कितने ही सबक दे गया है। हालांकि बहुत से लोगों का मानना है कि कोरोना जिस तरह कई लोगों की मौत का कारण बना उससे यही जाहिर होता है कि कुदरती कहर के आगे मानवता बेबस है, लेकिन सच यह है कि 2020 ने दुनिया को दिखा दिया है कि मानवता किसी भी प्रकार से लाचार या असहाय नहीं है। अब कोई महामारी ऐसी नहीं, जिस पर नियंत्रण न किया जा सके। विज्ञान ने इतनी तरक्की कर ली है कि ऐसी चुनौतियों का सामना करना संभव हो गया है। इसके बावजूद इतनी संख्या में लोग संक्रमित क्यों हुए और कई लोगों की जानें क्यों गईं? जवाब है- गलत राजनीतिक फैसलों के कारण।

पुराने जमाने में जब प्लेग फैला था तो लोगों ने इसे 'काली मौत' (ब्लैक डेथ) का नाम दिया। उन्हें जरा भी अंदाजा नहीं था कि इस बीमारी का कारण क्या है और इस पर कैसे काबू पाया जा सकता है? 1918 में जब इंफ्लुएंजा ने दस्तक दी तो विश्व के सर्वश्रेष्ठ वैज्ञानिक भी इस जानलेवा वायरस की पहचान नहीं कर सके। इसकी रोकथाम के लिए किए गए कई उपाय धरे के धरे रह गए। साथ ही इसके लिए टीका बनाने के प्रयास भी व्यर्थ रहे। यह कोविड-19 से काफी अलग थी। दिसम्बर 2019 के अंत में महामारी की पहली आहट सुनाई दी थी। 10 जनवरी 2020 तक वैज्ञानिकों ने न केवल महामारी के लिए जिम्मेदार वायरस को अलग कर लिया, बल्कि इसकी जीनोम संरचना का अनुक्रम भी तैयार कर लिया और इसे ऑनलाइन प्लेटफॉम्र्स पर प्रकाशित भी कर दिया। कुछ ही महीनों में यह स्पष्ट हो गया कि कौन-से उपाय कोरोना संक्रमण की शृंखला को तोड़ इसकी रफ्तार को धीमा कर सकते हैं। वायरस का मुकाबला करने के लिए साल भर के भीतर ही कई तरह की वैक्सीन का उत्पादन होने लगा। मानव और रोगाणु के बीच जंग में मानव इससे पहले कभी इतना शक्तिशाली नहीं देखा गया।

जैव-तकनीक की अप्रत्याशित उपलब्धियों के साथ ही कोविड वर्ष ने सूचना तकनीक की शक्ति को भी रेखांकित किया। पुराने जमाने में मानव कभी-कभार ही ऐसी महामारियों को रोक पाता था, क्योंकि मनुष्य रियल टाइम में संक्रमण की शृंखला की निगरानी कर पाने में अक्षम था और लॉकडाउन जैसे उपायों का आर्थिक भार उठाना उसके लिए संभव नहीं था। 1918 में गंभीर फ्लू से संक्रमित व्यक्ति को क्वारंटीन तो किया जा सकता था, लेकिन तब बीमारी के लक्षणों वाले प्रीसिम्प्टोमैटिक और असिम्प्टोमैटिक संक्रमण वाहकों की गतिविधियों को ट्रेस नहीं किया जा सकता था। तब अगर सारी आबादी को कई हफ्तों तक घर में ही रहने को कह दिया जाता तो अर्थव्यवस्था ठप हो जाती, सामाजिक ताना-बाना बिखर जाता और भुखमरी फैल सकती थी। 2020 के डिजिटल निगरानी युग में संक्रमण की ट्रेसिंग और उसके नियंत्रण की राह आसान हो गई। इससे बढ़कर ऑटोमेशन और इंटरनेट की वजह से लॉकडाउन सफल हो सका, कम से कम विकसित देशों में तो जरूर। एक ओर, विकासशील दुनिया के कुछ हिस्सों में मानवता ने जो भुगता उसने प्लेग महामारी के दिनों की याद दिलाई, वहीं डिजिटल क्रांति ने विकसित दुनिया के अधिकांश हिस्सों में सब कुछ बदल दिया।

खेती की बात करें तो सैकड़ों वर्षों से खाद्यान्न उत्पादन मानव श्रम पर ही निर्भर था। 90 प्रतिशत लोग खेतीबाड़ी का काम करते थे। आज विकसित देशों में ऐसा नहीं है। अमरीका में केवल 1.5 प्रतिशत आबादी खेतों में काम करती है और न केवल देशवासियों के लिए पर्याप्त खाद्यान्न की पैदावार होती है, बल्कि अमरीका खाद्यान्न का अग्रणी निर्यातक भी है। खेतों में सारा काम मशीनों से होता है, जिनके संक्रमित होने का कोई खतरा नहीं रहता। आज जीपीएस संचालित मशीन से सारी फसल काटी जा सकती है, वह भी ज्यादा दक्षता के साथ। इसीलिए इसीलिए लॉकडाउन के बावजूद गेहूं, मक्का, चावल जैसे खाद्यान्नों की वैश्विक पैदावार पर कोविड का कोई असर नहीं पड़ा?

लेकिन खाद्यान्न को जनता तक पहुंचाने के लिए क्या फसल उगाना और काटना ही काफी है? नहीं। कई बार कृषि उपज को हजारों किलोमीटर दूर पहुंचाना भी होता है और इसके लिए परिवहन के साधनों की जरूरत होती है। इतिहास पर गौर करें तो पाएंगे कि व्यापार, महामारी की कहानी के मुख्य खलनायकों में से एक साबित होता था। जानलेवा रोगाणु समुद्री जहाजी बेड़ों और लंबी दूरी तय करने वाले कारवां के जरिए दुनिया के तमाम हिस्सों में पहुंचे। 'काली मौतÓ भी इसी तरह सिल्क रोड के रास्ते पूर्वी एशिया से मध्य-पूर्व तक पहुंची।

2020 में वैश्विक व्यापार कमोबेश सहजता से जारी रह सकता है क्योंकि इसमें मानव संसाधन की जरूरत पहले की तुलना में काफी कम हुई है। व्यापक तौर पर आज के दौर के स्वचालित कंटेनर जहाज कई टन माल के परिवहन में सक्षम हैं। यह सही है कि कोविड-19 संक्रमण फैलाने में क्रूज जहाजों और यात्रियों से भरे हवाई जहाजों का बड़ा हाथ रहा है, लेकिन यह भी सही है कि वैश्विक व्यापार का अनिवार्य हिस्सा नहीं है टूरिज्म और ट्रैवल। पर्यटक घर में सुरक्षित रह सकते हैं और व्यापारी जूम पर मीटिंग कर सकते हैं, जबकि स्वचालित जहाज और मानव रहित ट्रेन वैश्विक अर्थव्यवस्था को थमने से रोक सकते हैं। 2020 में अंतरराष्ट्रीय पर्यटन हालांकि आसमान से जमीन पर आ गया, लेकिन वैश्विक समुद्री व्यापार में महज 4 प्रतिशत की गिरावट ही दर्ज की गई।
Copyright © Yuval Noah Harari 2021 / / फरवरी 2021 में यह लेख फाइनेंशियल टाइम्स में प्रकाशित हुआ।

बीती सदियों में यों बदली दुनिया -
-1918 में फ्लू से संक्रमित व्यक्ति को क्वारंटीन किया जा सकता था, लेकिन कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग संभव नहीं थी। 2020 में न केवल यह संभव हुआ, महामारी पर नियंत्रण की राह भी आसान हुई है।
- पहले 90% लोग खेतों में जुटते थे, आज अमरीका में महज 1.5% आबादी खेतों में काम करती है और ऑटोमेशन के जरिए ज्यादा दक्षता के साथ अधिक पैदावार हासिल करती है।
- 1582 में यात्री और माल परिवहन के लिए इंग्लिश मर्चेंट फ्लीट की कुल क्षमता 68 हजार टन थी, जिसे १६ हजार नाविकों की जरूरत थी। 2017 में लांच किए गए ओओसीएल हांगकांग कंटेनर शिप की माल परिवहन क्षमता २ लाख टन है, जिसके लिए सिर्फ 22 सदस्यों के चालकदल की जरूरत है।

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आत्म-दर्शन: मनुष्य का लक्ष्य (पत्रिका)

स्वामी अवधेशानंद गिरी, आचार्य महामंडलेश्वर, जूना अखाड़ा

जन्म लेना और फिर अपनी शारीरिक आवश्यकताओं को पूरा करते-करते मर जाना जीवन की परिभाषा नहीं है, मनुष्य जीवन की तो कतई नहीं। मनुष्य के रूप में जन्म की शास्त्रों में प्रशंसा ऐसे ही नहीं की गई है। देवता भी मनुष्य जीवन प्राप्त करने को तरसते हैं। इसका कारण है, इस जीवन में छिपी अनन्त संभावनाएं। स्वयं को सही रूप में जानना इस जीवन की सफलता है। इसे आत्म-साक्षात्कार, ईश्वर दर्शन, मुक्ति, निर्वाण, इष्ट प्राप्ति आदि कई नामों से संबोधित किया जाता है। आत्मोन्नति ही मनुष्य का ध्येय है, लक्ष्य है। इस आत्मोन्नति का मूल साधन धर्म है। धर्म के बिना जीवन शून्य है। धर्मत्व जीवन का नियामक है। धर्म ज्ञान होने से ही मनुष्य अन्य सभी प्राणियों से श्रेष्ठ है। सभी जीव धर्म के द्वारा ही न केवल रक्षित हैं, बल्कि परिचित भी हैं। मनुष्य इस विषय में अनेक अंशों में स्वाधीन है। अन्य जीव प्रकृति के अधीन हैं। अत: धर्मसाधना के लिए मनुष्य शरीर ही सबसे उपयुक्त है।

यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि केवल मनुष्य मात्र होने से ही उसे धर्म ज्ञान प्राप्त नहीं हो जाता, क्योंकि आज भी ऐसे लोग हैं जो न तो धर्म से परिचित हैं और न ही धर्म का अनुशीलन करते हैं। जो मनुष्य धर्म का अनुशीलन करते हैं, यथार्थ में वे ही मनुष्य हैं। और, जो आहार, निद्रा, भय व मैथुन आदि में रत हैं वे मनुष्य शरीर में पशु हैं। अत: मनुष्य जीवन प्राप्त होने पर धर्मज्ञान प्राप्त करना प्रधान कत्र्तव्य है। प्रभु ने असीम कृपा कर मानव को वह शक्ति दी है, जिससे उन्नति की चरम सीमा पर पहुंचा जा सकता है। इसी साधना-क्षमता के कारण मनुष्य सृष्टि की श्रेष्ठतम रचना है।

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Monday, March 22, 2021

युद्ध से कम न थे हालात, नए भारत की तस्वीर उभरी (पत्रिका)

संदीप घोष, (ब्लॉगर, लेखक और इंडस्ट्री एक्सपर्ट)

ज्यादातर राष्ट्र अपने युद्ध विजय दिवस को यादगार के तौर पर मनाते हैं। भारत में 16 दिसम्बर को विजय दिवस मनाया जाता है, जिस दिन वर्ष 1971 में भारत ने पाकिस्तान को परास्त कर युद्ध जीता था। हालांकि कुछ युद्ध जीतने में अधिक समय लग जाता है। जैसे प्रथम विश्व युद्ध चार साल जबकि द्वितीय विश्व युद्ध छह साल चला था। इसी प्रकार कोविड-19 को भी विश्व युद्ध (जैविक) कहा जा रहा है। लॉकडाउन के एक साल बाद भी हम इससे जीत नहीं पा रहे हैं। इस युद्ध में जीत की निर्णायक घोषणा से पूर्व हमें अब भी काफी लंबा सफर तय करना है। परन्तु इन 12 महीनों में काफी प्रगति हुई है और हमने बहुत कुछ सीखा है। इनमें सर्वाधिक उल्लेखनीय है-वैक्सीन बनाना। दुनिया के कई देशों को वैक्सीन उपलब्ध करवाने में भी भारत अग्रणी भूमिका निभा रहा है। इससे भविष्य के प्रति आशा की किरण दिखाई देती है।

कोरोना वायरस ने बिना किसी भेदभाव के हरेक को संक्रमण का शिकार बनाया। अमीर-गरीब से लेकर देश की सीमाओं को भी पार किया। इसलिए विश्व को इस ग्रह के सबसे बड़े दुश्मन के रूप में सामने आए कोरोना से जंग के लिए एकजुट होना ही पड़ा। इस प्रकार मानव जाति को ''वसुधैव कुटुम्बकम का अर्थ समझ आया। भारत में हमने पाया कि स्वास्थ्य संबंधी आपात काल राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरे जितना ही गंभीर विषय है। यह किसी देश को विभिन्न मोर्चों पर एक साथ प्रभावित कर सकता है, केवल लोगों की जान को ही नहीं, खतरा और भी मोर्चों पर हो सकता है।

एक दूसरे की मदद, हिम्मत और हौसले ने दिलाई जीत
महामारी केवल अर्थव्यवस्था को ही कमजोर नहीं करती बल्कि बाहरी ताकतें भी हम पर हावी होने की कोशिश करती हैं। लद्दाख में भारत-चीन सीमा पर तनाव इसका एक उदाहरण है। जिस विशेषता के चलते हम इस अप्रत्याशित संकट से उबर पाए, वह है आत्म निर्भरता और मानवता की भावना, जिसे कोटि-कोटि नमन! लॉकडाउन के शुरूआती दिनों जिंदगी की रफ्तार रुक सी गई है, जिसकी हमने कभी कल्पना नहीं की थी। आम लोग एक दूसरे की मदद के लिए आगे आए। दूध वाला, सब्जी वाले और छोटे किराना दुकानदारों ने खाद्य आपूर्ति श्रृंखला सुचारू बनाए रखी। जनता के इन्हीं सामूहिक प्रयासों ने अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों द्वारा जताई गई खाद्य संकट और भुखमरी जैसी तमाम आशंकाओं को निर्मूल साबित कर दिया। हालांकि ये सब केवल मानवता के सिद्धान्तों की जीत नहीं है। शुरुआती अनुभव ने हमारा आत्म विश्वास बढ़ाया है और विभिन्न मोर्चों पर राष्ट्रीय क्षमता भी बढ़ी है, जो पहले इस प्रकार स्पष्ट रूप से नहीं दिखाई देती थी। प्रशासनिक मशीनरी और जन स्वास्थ्य तंत्र हरकत में आए और युद्ध स्तरीय दक्षता के साथ काम किया। विफलताओं की चर्चा ज्यादा होती है लेकिन कई बार उपलब्धियां अधिक होती हैं। आज ये उपलब्धियां ही हमें विश्व के समक्ष मिसाल के तौर पर प्रस्तुत कर रही हैं। दूसरा, इससे डिजिटल भारत रणनीति को गति मिली है। शहरों से भारी संख्या में लोगों के गांव को पलायन के बवाजूद ग्रामीण अर्थव्यवस्था को स्थिर बनाए रखा। इससे ग्रामीण इलाकों में मांग बढ़ी और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने में मदद मिली। इस प्रकार भारत उच्चतम जीडीपी वृद्धि की आशा करने में सक्षम है (अगले राजकोषीय वर्ष 21-22 में 11 प्रतिशत की वृद्धि)।

इसी प्रकार डिजीटल मोर्चे पर देखा जाए तो 'वर्क फ्रॉम होम' और रिमोट वर्किंग से कार्य करने के तरीकों बदलाव आया। डिजीटल लेन-देन में अचानक बढ़ोत्तरी देखी गई। इसका लाभ यह हुआ कि कर अदायगी में वृद्धि हुई है और अर्थव्यवस्था सुदृढ़ हुई है। 90 के दशक में जैसे आईटी बूम आया था ठीक वैसे ही इस बार भारत में डिजीटल बूम आया है, परिणाम स्वरूप भारत कौशल विकास और नई शिक्षा नीति के लिए समुचित प्रारूप बनाने और सहायक नियमन करने में कामयाब हो सका है।

ऐसे लाभों की सूची लंबी है। यह स्थिति ठीक वैसी ही है कि ''गिलास आधा भरा है या आधा खाली।'' हमें गिलास आधा भरा हुआ दिखा और हमने संकट को अवसर में बदल दिया। कोविड-19 और लॉकडाउन ''अग्नि परीक्षा'' साबित हुए। कोविड का सबसे बड़ा असर यह हुआ कि हमारा आत्म विश्वास बढ़ा। यही है नया भारत, जिसकी ओर विश्व आशा भरी नजर से देख रहा है।

अमीर-गरीब के बीच खाई बढ़ी-
कोरोना महामारी ने गरीब व अमीर के बीच की खाईं को और बढ़ा दिया। लॉकडाउन के दौरान जहां अमीर मालामाल हो गए तो वहीं गरीब कंगाल हो गए। गरीबी उन्मूलन के लिए काम करने वाली संस्था ऑक्सफैम ने इनइक्वालिटी वायरस रिपोर्ट जारी की है।
35% बढ़ी अरबपतियों की संपत्ति लॉकडाउन में
12.2 करोड़ महिलाओं की छिन गईं नौकरी लॉकडाउन के दौरान
1.7 करोड़ लोगों की नौकरियां गई लॉकडाउन में
1.7 लाख लोगों की नौकरी गई हर घंटे अप्रेल माह में
84% घरों को आर्थिक समस्याओं से गुजरना पड़ा इस दौरान
1 घंटे में मुकेश अंबानी ने जितने कमाए, उतना कमाने में मजदूरों को 10 हजार साल लगेंगे

सौजन्य - पत्रिका।
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