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-Rajeev Kumar (Editor-in-chief)

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Saturday, January 23, 2021

कोविड-19: आगे और कड़े कदम उठाने होंगे बाइडन को (पत्रिका)

लीना एस. वेन, विजिटिंग प्रोफेसर, मिल्केन इंस्टीट्यूट स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ, जॉर्ज वाशिंगटन यूनिवर्सिटी

अमरीका के नए राष्ट्रपति जो बाइडन ने कोविड-19 को लेकर जो रणनीति बनाई है, उसकी हर हाल में तारीफ की ही जानी चाहिए। उनकी रणनीति से पता चलता है कि वह देश को किस दिशा में ले जाना चाहेंगे। पदभार ग्रहण करने के चौबीस घंटे से भी कम समय में उन्होंने कोविड-19 से निपटने के लिए राष्ट्रीय रणनीति का मसौदा जारी कर दिया। महामारी से निपटने के लिए उन्होंने संघीय सरकार के नेतृत्व वाली भूमिका को दृढ़ता के साथ स्थापित किया है। पूर्व के ट्रंप प्रशासन ने इस महामारी से निपटने को लेकर अस्वीकार करने का, कमतर आंकने का और शर्तों से ओतप्रोत जो रुख अपनाया था, उसके यह ठीक विपरीत है। बाइडन की रणनीति व्यापक, विस्तृत है। मैं उनके मजबूत इरादों की कद्र करती हूं, लेकिन यह समय और भी आक्रामकता से काम करने का है।

आइए, बाइडन द्वारा उठाए गए पहले कदम से ही शुरुआत करते हैं। उन्होंने संघीय कार्यालयों में मास्क लगाने वाला पहला आदेश जारी किया है। उन्होंने अंतरराज्यीय यात्राओं के लिए भी मास्क जरूरी किया है। यह आदेश अमरीकियों के लिए यह स्पष्ट संदेश है कि नया प्रशासन जनस्वास्थ्य के निर्देशों का पालन करने के लिए तत्पर है। जबकि यह साफ है कि मास्क लगाना जीवन का कवच है, तो फिर बाइडन ने क्यों नहीं पूरे देश के लिए ऐसा आदेश जारी किया। कुछ लोगों का कहना है कि संघीय भवनों और अंतरराज्यीय व्यापार से परे किसी आदेश को कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है। पूरे राष्ट्र के लिए आदेश जारी करने का स्पष्ट संकेत होगा कि देश संकट में है। इस अधिकार का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। मुझे विश्वास है कि बाइडन मास्क की पूर्ति के लिए राजकीय कोष से जुड़े कई अधिकारों का इस्तेमाल करेंगे। इससे राज्यों के गवर्नर भी फैसला लेने को मजबूर होंगे।

कुछ और कदम भी उठाने चाहिए: बाइडन को चाहिए कि वे इनडोर सामाजिक कार्यक्रमों को नजरअंदाज करने के लिए अमरीकियों को प्रेरित करें और कड़ा आदेश जारी करें। अन्य देशों ने भी व्यापारिक बैठकों और घर से बाहर जाने पर रोक लगाई है, लॉकडाउन किया है। ब्रिटेन ने तो कम्युनिटी सदस्यों के एक-दूसरे से मिलने पर अर्थदंड लगाया है जो ट्रैफिक टिकट की तरह का है। महामारी के मोर्चे पर केवल एक ही रास्ता है - बड़े पैमाने पर वैक्सीनेशन। दस करोड़ लोगों का सौ दिनों में वैक्सीनेशन करने का मकसद अच्छा है, लेकिन यह काफी कम है। अऩुमान लगाइए - यदि दस लाख लोगों को प्रति व्यक्ति दो डोज की दर से टीके लगाए जाते हैं तो इसमें वर्ष 2022 तक का समय लग जाएगा।

बाइडन की टीम ने तेज गति और समानता वाली महत्वाकांक्षी योजना बनाई है। हमें एक दिन में कम से कम पच्चीस लाख टीकाकरण करने की जरूरत है। पिछले हफ्ते तत्कालीन स्वास्थ्य सेवा सचिव एलेक्स अजार ने स्वीकार किया था कि वैक्सीन का कोई रिजर्व नहीं है। हो सकता है कि बाइडन की टीम को आपूर्ति की समस्याएं आएं। ऐसी हालत में उन्हें अमरीकियों को सब कुछ बता देना चाहिए। बाइडन को हमारे समय की सबसे बड़ी समस्या विरासत में मिली है। उनके पूर्ववर्ती की उपेक्षा से हालात और बदतर हुए हैं। बाइडन ने लोगों की अपेक्षाएं जागृत की हैं। इस समय बाइडन को और मजबूत होना चाहिए। यही आका ंक्षाएं ही सूर्य की नई किरणें हैं।

द वॉशिंग्टन पोस्ट

सौजन्य - पत्रिका।
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ट्विटर को क्यों रोक लगानी चाहिए ईरान के सर्वोच्च नेता के अकाउंट पर ? (पत्रिका)

मसीह अलीनेजाद (ईरानी पत्रकार, वॉइस ऑफ अमेरिका की पर्शियन सेवा के लिए टॉक शो 'टैब्लिट' का संचालन करती हैं।)

यूएस कैपिटल पर 6 जनवरी को हमले के चलते ट्विटर और फेसबुक ने पूर्व राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के अकाउंट अपने-अपने प्लेटफॉर्म पर निलंबित कर दिए - शुरुआत में अस्थायी तौर पर। बाद में फेसबुक ने कहा कि इसका प्रतिबंध अनिश्चितकाल के लिए जारी रहेगा, जबकि ट्विटर ने प्रतिबंध को स्थायी करार दे दिया। अपने कदम के लिए ट्विटर ने वजह बताई - 'और हिंसा भड़कने का खतरा।' कितने ही ईरानी मानवाधिकार कार्यकर्ता अक्सर इस बात पर आश्चर्यचकित होते हैं कि इस्लामिक गणराज्य के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामनेई और अन्य सरकारी अधिकारियों ने 8 करोड़ 30 लाख ईरानी लोगों को ट्विटर पर प्रतिबंधित किया, जबकि वे खुद अपने झूठ का प्रचार करने के लिए लगातार सोशल प्लेटफॉर्म का पूरा इस्तेमाल करते आ रहे हैं - और वह भी बिना किसी चेतावनी के।

इस बात से तो यही कहा जा सकता है कि सोशल मीडिया के मंच का रुख तानाशाहों के पक्ष में झुका हुआ रहता है। बीते अक्टूबर माह के दौरान सीनेट के सामने पेश हुए ट्विटर के सीईओ जैक डोर्सी ने कहा था कि खामनेई के यहूदी-विरोधी ट्वीट और इजरायल का नामोनिशान मिटाने के नारों से कंपनी के नियमों का उल्लंघन इसलिए नहीं होता क्योंकि ये 'कोरी धमकियां मात्र' हैं। डोर्सी ने दावा किया क्योंकि खामनेई के जुबानी हमले अपने नागरिकों के खिलाफ नहीं हैं, इसलिए वे स्वीकार्य हैं। यह कोरा झूठ है और इसमें दूरदर्शिता का अभाव है। नवंबर 2019 के विरोध प्रदर्शन इसका उदाहरण हैं, जब शासन ने कम से कम एक सप्ताह के लिए इंटरनेट बंद कर दिया था। इंटरनेट बहाल होने पर सामने आए वीडियो दिल दहला देने वाले थे।

अमरीकी नागरिकों को जिस तरह की लोकतांत्रिक संस्थाएं सुलभ हैं, ईरानी नागरिकों के लिए उनका अभाव है और उनके लिए सोशल मीडिया का मंच ही अपनी बात कहने का उपकरण है। अब समय आ गया है कि सोशल मीडिया कंपनियां तानाशाहों को नफरत फैलाने के लिए इन प्लेटफॉर्म का दुरुपयोग करने से रोकें।

- द वॉशिंग्टन पोस्ट

सौजन्य - पत्रिका।
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Friday, January 22, 2021

बाइडन का भाषण, घायल अमरीकी मन पर मरहम (पत्रिका)

कुमार प्रशांत

राजनीतिक रूप से अत्यंत अप्रभावी, सामाजिक रूप से बेहद विछिन्न और आर्थिक रूप से लडख़ड़ाते अमरीका के 46वें राष्ट्रपति बनने के बाद कैपिटल हिल की ऐतिहासिक सीढिय़ों पर खड़े हो कर जो बाइडन ने जो कुछ कहा, वह ऐतिहासिक महत्त्व का है। क्यों? इसलिए कि अमरीका के इतिहास का ट्रंप-काल बीतने के बाद बाइडन को जो कुछ भी कहना था वह अपने अमरीका से ही कहना था, और ऐसे में वे जो भी कहते वह ऐतिहासिक ही हो सकता था। इसलिए तब खूब तालियां बजीं, जब बाइडन ने कहा कि यह अमरीका का दिन है, यह लोकतंत्र का दिन है। यह एकदम सामान्य-सा वाक्य था जो ऐतिहासिक लगने लगा, क्योंकि पिछले पांच सालों से अमरीका ऐसे वाक्य सुनना और गुनना भूल ही गया था। यह वाक्य घायल अमरीकी मन पर मरहम की तरह लगा।

लोकतंत्र है ही ऐसी दोधारी तलवार जो कलुष को काटती है, शुभ को चालना देती है। यह अलग बात है कि तमाम दुनिया में लोकतंत्र की आत्मा पर सत्ता के भूख की ऐसी गर्द पड़ी है कि वह खुली सांस नहीं ले पा रहा है। तंत्र ने उसका गला दबोच रखा है। हम पहले से जानते थे कि बाइडन, बराक ओबामा की तरह मंत्रमुग्ध कर देने वाले वक्ता नहीं हैं, बल्कि वह एक मेहनती राजनेता हैं। चूंकि अमरीका को ट्रंप से मुक्ति चाहिए थी, इसलिए भी इतिहास ने इस भूमिका के लिए बाइडन का कंधा चुना। ट्रंप बौद्धिक रूप से इतने सक्षम थे ही नहीं कि अपने देश की राजनीतिक व सांस्कृतिक विरासत को समुन्नत करने की स्वाभाविक व पदसिद्ध जिम्मेवारी को समझ पाते। इस जिम्मेवारी के निर्वहन में विफल कितने ही महानुभाव हमें इतिहास के कूड़ाघर में मिलते हैं। डंपिंग ग्राउंड केवल नगरपालिकाओं के पास नहीं होता, इतिहास के पास भी होता है।

शपथ ग्रहण करने के बाद बाइडन जब कहते हैं कि हम एक महान राष्ट्र हैं, हम अच्छे लोग हैं तब वह अमरीका के मन को ट्रंप के दौर की संकीर्णता से बाहर निकालने की कोशिश करते हैं। जब उन्होंने कहा कि मैं सभी अमरीकियों का राष्ट्रपति हूं- सारे अमरीकियों का, हमें एक-दूसरे की इज्जत करनी होगी और यह सावधानी रखनी होगी कि सियासत ऐसी आग न बन जाए जो सबको जलाकर राख कर दे तो वह गहरे बंटे हुए अपने समाज के बीच पुल भी बना रहे थे और अमरीकियों को सत्ता व राजनीति की मर्यादा भी समझा रहे थे।

बाइडन ने अमरीकी सीमा के बाहर के लोगों से यानी दुनिया से सिर्फ इतना ही कहा कि हमें भविष्य की चुनौतियों से ही नहीं, आज की चुनौतियों से भी निबटना है। ट्रंप ने आज को ही तो इतना विद्रूप कर दिया है कि भविष्य की बातों का बहुत संदर्भ नहीं रह गया है। राष्ट्र को संबोधित करने की यह परंपरा अमरीका के पहले राष्ट्रपति जॉर्ज वाशिंगटन ने 30 अप्रेल 1789 को शुरू की थी। यह परंपरा और कुछ नहीं, राष्ट्र-मन को छूने और उसे उदात्त बनाने की कोशिश है। बाइडन के इस सामान्य भाषण में असामान्य था अनुभव की लकीरों से भरे उनके आयुवृद्ध चेहरे से झलकती ईमानदारी। वह जो कह रहे थे मन से कह रहे थे और अपने मन को अमरीका का मन बनाना चाहते थे। वहां शांति, धीरज व जिम्मेवारी के अहसास से भरा माहौल था।

उन्होंने गलती से भी ट्रंप का नाम नहीं लिया जैसे उस पूरे दौर को पोंछ डालना चाहते हों। चुनावी उथलापन, खोखली बयानबाजी, अपनी पीठ ठोकने और सीना दिखाने की कोई छिछोरी हरकत उन्होंने नहीं की। गीत-संगीत व संस्कृति का मोहक मेल था लेकिन कहीं चापलूसी और क्षुद्रता का लेश भी नहीं था। यह एक अच्छी शुरुआत थी। लेकिन बाइडन न भूल सकते हैं, न अमरीका उन्हें भूलने देगा कि भाषण का मंच समेटा जा चुका है। अब वह हैं और कठोर सच्चाइयों के सामने खुला उनका सीना है। इनका मुकाबला वह कैसे करते हैं और अमरीका का मानवीय चेहरा दीपित करते हैं, यह हम भी और दुनिया भी देखना चाहती है।

(गांधी शांति प्रतिष्ठान,दिल्ली के अध्यक्ष)

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नवाचार: 'स्मार्ट' शहरों की नींव बनेगी लिडार तकनीक! (पत्रिका)

डैल्विन ब्राउन,
(इनोवेशंस रिपोर्टर)

भविष्य के शहरी समुदायों के निर्माण के लिए मोबिलिटी विश्लेषक, शहरी नियोजक और आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस कंपनियां लिजार तकनीक को अहम कड़ी की तरह देख रही हैं। उनका मानना है कि इस तकनीक का सहारा लेकर स्मार्ट शहरों की नींव रखी जा सकती है जहां ऑटोनमस वाहन, स्मार्ट घर और आधारभूत ढांचा आपसी तालमेल के साथ काम करते हैं। 'लाइट डिटेक्शन एंड रेंजिंग' (लिडार), सेंसर आधारित तकनीक है और जब ट्रैफिक लाइट, पार्किंग स्थलों और अधिकांश वाहनों पर इसे लगा दिया जाता है तो तकनीक की मदद से शहर ऊर्जा और सुरक्षा का बेहतर प्रबंधन करने में सक्षम हो सकते हैं। यातायात अवरुद्ध होने की समस्या का निवारण भी इसकी मदद से संभव है।

हालांकि यह तकनीक बीती सदी के ७० के दशक से अस्तित्व में है, लेकिन इसे व्यापक इस्तेमाल के लिए बहुत महंगा और जटिल समझा जाता रहा है। दक्षिण कोरिया स्थित कम्प्यूटर विजन कंपनी सोल रोबोटिक्स के संस्थापक हानबिन ली के मुताबिक, 'अब तक ऐसा था, लेकिन अब नहीं है। कीमतें अब इतनी नीचे आ चुकी हैं कि आइफोन के नवीनतम मॉडल में भी यह तकनीक पाई जाती है। इस साल के वैश्विक तकनीक सम्मेलन सीईएस में पेश किए गए कई उत्पादों के केंद्र में यही तकनीक है।' फैक्ट्री, रिटेलर, ऑटोमेकर आदि के लिए लाइट व राडार डेटा का विश्लेषण करने वाली सॉफ्टवेर व हार्डवेयर सर्विस 'डिस्कवरी' को हाल ही सोल रोबोटिक्स ने लांच भी किया है। कंपनी इसे इस्तेमाल में आसान 'प्लग एंड प्ले' लिडार प्रणाली बता रही है, जिसके 3-डी सेंसर की मदद से कई तरह की संस्थाएं लाभान्वित हो सकती हैं।

साभार : द वाशिंगटन पोस्ट

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दुधारू विभाग (पत्रिका)

- भुवनेश जैन

कितने 'गर्व' की बात है कि राजस्थान पथ परिवहन निगम अपना खर्च चलाने के लिए 400 करोड़ रुपए का कर्ज लेने जा रहा है। इस उपलब्धि के लिए परिवहन मंत्री को तमगा दिया जाना चाहिए। शायद मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ की राह पर चलते हुए राजस्थान में वे भी रोडवेज को समाप्त करने का 'श्रेय' हासिल कर लें।

राजस्थान में रोडवेज ही नहीं, पूरा परिवहन विभाग ही गर्त में जा रहा है। राजस्थान रोडवेज तो 15 साल से घाटे में है। सरकार के अनुदान के भरोसे किसी तरह गाड़ी चल रही है। ऋण का भार बढ़ता जा रहा है। इसे चुकाएगा कौन, इसकी चिन्ता किसी को नहीं है। आखिर में पैसा आम नागरिकों से ही वसूला जाएगा। रोडवेज में ऊपर से नीचे तक भ्रष्टाचार का बोलबाला है। हर माह औसतन 100 परिचालक बिना टिकट यात्री ले जाते पकड़े जाते हैं। परिचालक और डिपो मैनेजर की मिलीभगत के मामले भी पकड़े जा चुके हैं। पर ये अपने आकाओं की कृपा से फिर उसी सीट पर आ बैठते हैं। स्पष्ट है कि भ्रष्टाचार की कमाई ऊपर तक जाती है। भ्रष्टाचार के मामले में एपीओ हुए अफसरों को वापस उसी सीट पर लगा दिया जाता है। बसों की खरीद में और बड़े घपले होते हैं।

हाल ही में चौंकाने वाली यह बात सामने आई कि राजस्थान रोडवेज की बसों से मिलती-जुलती अवैध बसें रोडवेज के रूटों पर चल रही हैं। रोडवेज की बसें उन रूटों से हटा ली गईं। क्या इतना बड़ा भ्रष्टाचार बिना ऊपरी संरक्षण के हो सकता है? परिवहन विभाग की हालत तो और भी ज्यादा खराब है। इंस्पेक्टर व बाबू एक सीट पर ज्यादा नहीं जम पाए, इसके लिए रोस्टर प्रणाली बनाई गई। यह दिखावा बनकर रह गई। निजी बसें और अन्य वाहन धड़ल्ले से बिना परमिट के चल रहे हैं। मंत्री स्तर पर यह निर्णय लिए जा रहे हैं कि कौन किस सीट पर बैठेगा। कमाई वाली सीटों की बोली भी ऊंची लगती है। पिछले साल भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ने मासिक बंधी के आरोप में आठ दलालों और छह अफसरों को पकड़ा था। अब उन्हें भी वापस पोस्टिंग देने की कोशिश हो रही है। ऑटोमैटिक ड्राइविंग ट्रैक का काम निजी कंपनी को दे दिया गया और इसके लिए लाइसेंस फीस बढ़ा दी गई। फिर परिवहन विभाग की फौज किस काम के लिए है?

परिवहन विभाग में बार-बार रोडवेज के निजीकरण की चर्चा हो रही है। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ की तरह राजस्थान में भी बहुत से राजनेताओं की बसें चल रही हैं। ऐसे ही नेताओं ने मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में रोडवेज का बंटाधार करवाया है। एक-एक नेता की दो-दो सौ बसें चल रही हैं। जिन मार्गों पर यात्री भार कम होता है, वहां ये निजी बसें चलती ही नहीं। दूरस्थ गांव-कस्बों के हजारों यात्री परेशान हैं। दोनों प्रदेशों में सरकारों को ऐसे यात्रियों की तकलीफों से कोई मतलब नहीं है। कहने को तो लोकतंत्र में 'लोक' की तकलीफें दूर करने के दावे किए जाते हैं, पर बस माफियाओं से गठजोड़ जनता की पीड़ा पर भारी पड़ता है। चाहे भारतीय जनता पार्टी हो या कांग्रेस, परिवहन विभाग को दोनों पार्टियों ने अपने-अपने शासन में जम कर दुहा है। 'लोक कल्याण' के मुखौटे के पीछे जनता की लूट-खसोट राजनीतिक पार्टियों के चरित्र में शामिल हो चुकी है।

पानी रे पानी

समर्थन मूल्य या अवमूल्यन

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चीन को साधने के लिए भारत और यूएस साझेदारी अहम (पत्रिका)

विनय कौड़ा
(अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ)

अमरीका के राष्ट्रपति पद पर जो बाइडन के काबिज होने के मायने भारत के लिए क्या होंगे, इस सवाल के जवाब से पहले यह जानना अहम होगा कि हाल ही अमरीका ने 2018 के हिन्द प्रशांत सामरिक प्रारूप को गोपनीय दस्तावेज श्रेणी से बाहर कर दिया है। 2018 में तैयार किए गए इस दस्तावेज को लीक से हटकर महज दो साल बाद इसी माह ट्रंप-काल के अंतिम दिनों में जारी किया गया। दस्तावेज में चीन व हिन्द-प्रशांत क्षेत्र को लेकर अमरीका के दृष्टिकोण पर प्रकाश डाला गया है। इसके अनुसार, अमरीका की हिन्द-प्रशांत रणनीति इस क्षेत्र में उसके सहयोगी और साझेदारों से प्रभावित होगी, खास तौर पर भारत से। नई साझेदारी एवं विषय परक गठबंधन, मौजूदा विश्व सुरक्षा परिदृश्य की जरूरत है क्योंकि हिन्द-प्रशांत क्षेत्र में भारत, अमरीका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के बीच चतुर्भुजीय संवाद 'क्वाड' विकसित हो रहा है।

भारत के साथ संबंध सुदृढ़ कर उसे क्षेत्र में मुख्य भूमिका देकर अमरीका, चीन के साथ संतुलन कायम करने की कवायद शुरू कर चुका है। दस्तावेज में चीन के किसी आकस्मिक हमले से अपनी उत्तरी सीमाओं की रक्षा करने में भारत की क्षमताओं को तो रेखांकित किया ही गया है, यह भी कहा गया है कि भारत सतत रूप से दक्षिण एशियाई सुरक्षा के मुख्य संरक्षक की भूमिका निभा रहा है। भले ही चुनाव प्रचार के दौरान राष्ट्रपति जो बाइडन 'हिन्द-प्रशांत' शब्द-युग्म का इस्तेमाल करने से बचते दिखे हों, लेकिन शीर्ष अमरीकी कूटनीतिज्ञ कर्ट एम. कैम्पबेल को 'हिन्द-प्रशांत समन्वयक' नियुक्त करके जो बाइडन प्रशासन ने चीन के प्रति नीतियों को लेकर सहयोगियों व साझेदारों की आशंकाओं को निर्मूल करने का प्रयास ही किया है। महत्त्वपूर्ण है कि अमरीका के 'हिन्द-प्रशांत' शब्द-युग्म को तवज्जो देने के चलते भारत, जापान, ऑस्ट्रेलिया और यूरोप के कुछ देशों जैसे फ्रांस, जर्मनी और यूके को हिन्द-प्रशांत क्षेत्र में बड़ी भूमिका निभाने का प्रोत्साहन मिलता है। चीन के प्रति ट्रंप प्रशासन की नीतियों को पलटना बाइडन के लिए इसलिए भी मुश्किल है।

वर्ष 2020 में चीन व अमरीका के बीच तकनीकी प्रतिस्पर्धा चरम पर रही। टिकटॉक और वीचैट को प्रतिबंधित करने का आदेश देते हुए ट्रंप ने राष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी निर्णय के लिए भारत का उदाहरण भी दिया था। हालांकि चीन स्वयं को अमरीका के दबाव से मुक्त करने की कोशिश में लगा हुआ है। हाल ही चीन ने यूरोपीय संघ के साथ नए मुक्त व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर भी किए हैं। भले ही चीन के लिए यह राहत की बात हो लेकिन अमरीका-चीन के बीच तकनीकी क्षेत्र में चल रहा संघर्ष 2021 में खत्म होता दिखाई नहीं देता। दूसरी ओर, ऑस्ट्रेलिया के थिंक टैंक के साथ विचार-विमर्श के दौरान हाल ही भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भी कहा था कि भारत-चीन संबंध 'गंभीर रूप' से खराब हो चुके हैं और इनका फिर से सुधरना मुश्किल होगा। जैसे चीन अपनी सेना के आधुनिकीकरण पर बल दे रहा है, वैसे ही भारत को भी सीमा पर और समुद्र क्षेत्र में बहुआयामी खतरे को देखते हुए अपने दृष्टिकोण में बदलाव लाने और अन्य महाशक्तियों की भांति दीर्घावधि नीति की परम्परा स्थापित करने की जरूरत है, जो फिलहाल चुनाव कार्यक्रमों व नौकरशाही के अनुरूप और काफी छोटी अवधि के लिए होती है।

बाइडन जानते हैं कि हालिया वर्षों में भारत के साथ संबंध प्रगाढ़ करने में अमरीका ने काफी निवेश किया है। हालांकि इसकी एक वजह चीन के बढ़ते प्रभुत्व से मुकाबला करना रही। भारत की 'रणनीतिक स्वायत्तता' की पैरवी अमरीका के साथ द्विपक्षीय संबंधों में रुकावट भी नहीं बनी। कारण, दोनों देशों के मौलिक सिद्धांतों में समानता है, जिसके बल पर भारत की अमरीका के साथ रणनीतिक साझेदारी सुदृढ़ हुई है। ऐसे में विश्व के ये दोनों देश ही हैं जो आज मिलकर चारों रणनीतिक चुनौतियों- भू-सामरिक, आर्थिक, तकनीकी और सुशासन- पर चीन की बढ़त को संतुलित करने में सक्षम हैं।

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Saturday, January 16, 2021

संख्या और संसाधनों में सैन्य मजबूती जरूरी (पत्रिका)

भारतीय सेना ने 15 जनवरी को अपना 73वां स्थापना दिवस मनाया। वर्ष 1949 में इसी दिन फील्ड मार्शल के एम करियप्पा ने सर फ्रांसिस बुशर से भारतीय सेना प्रमुख की कमान ग्रहण की थी। तब से भारतीय सेना और सैनिकों ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। जब भी मौका आया, सामने चाहे चीन हो या पाकिस्तान, हमारे संसाधनों से सेना ने अपना सर्वोत्तम देश को दिया। वर्ष 1947-48 का जम्मू-कश्मीर का कबायली संघर्ष, 1962 में चीन से और 1965, 1971 और 1999 में पाकिस्तान से हुए युद्ध, सब गवाह हैं।

वर्ष 1971 में पाकिस्तान से हुए युद्ध में भारतीय सेना ने जो चमत्कार दिखाया वह तो हजारों सालों तक विश्व के सैन्य इतिहास में पढ़ा-पढ़ाया जाता रहेगा। बांग्लादेश के रूप में अलग राष्ट्र का निर्माण और 95 हजार पाक फौजियों का आत्मसमर्पण। यह सब हमारी सेना ने तब किया जब अत्याधुनिक हथियारों के पैमाने पर पाक फौजें हमसे बहुत आगे थीं। पाकिस्तान को अमरीका का अंधसमर्थन था। उसकी नौसेना का सातवां बेड़ा तो हमारे सामने आ ही पहुंचा था, फ्रांस सहित कई विकसित देशों के विमान उसके पास थे। यही हाल सैनिकों के पास हथियारों का था। हमारी वायुसेना के पास छोटे से नेट विमान थे और नौसेना जंगी जहाज विक्रांत के भरोसे थी। लेकिन जो सबसे बड़ी चीज हमारे पास थी, वह देश के लिए मर-मिटने का हमारे सैनिकों का जज्बा। इस जज्बे और तत्कालीन सोवियत संघ के मजबूत समर्थन से हमने यह करिश्मा कर दिखाया। शुक्रवार को भी दिल्ली छावनी में परेड को संबोधित करने के दौरान भारतीय सेनाध्यक्ष मनोज मुकुंद के पास यही हौसला था। उन्होंने सही कहा कि आज चुनौतियां पहले से कहीं ज्यादा बड़ी हैं।

पहले चीन पाकिस्तान के पीछे था, आज साथ है। अमरीका न पहले हमारे साथ था, न आज है। उसके चक्कर में हमने टूटकर भी ताकतवर हुए रूस को अपने से दूर कर दिया। फिर भी नरवणे का यह विश्वास कि चुनौतियां भले ही उन चोटियों से बड़ी हों, जिनकी हमारे सैनिक रक्षा कर रहे हैं, लेकिन सैनिकों का मनोबल उनसे भी ऊंचा है, भारतीय सेना के साहस को दिखाता है। सेना और सैन्य अफसर तो अपना काम करे ंगे, लेकिन यह जिम्मा भारत की सरकार और उसके एक-एक नागरिक का है कि वह सेना के तीनों अंगों की हर जरूरत को प्राथमिकता से पूरा करे। हमें अपने खाने-खर्च, ऐशोआराम में भी कटौती करनी पड़े तो करनी चाहिए, लेकिन उनकी जरूरतें हर हाल में पूरी करनी चाहिए। याद रहे कि इस बार लड़ाई सीधे चीन-पाक दोनों से होगी, लिहाजा हमारी सेना को भी दोनों के बराबर मजबूत करना होगा, संख्या में भी और ससाधनों में भी।

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आत्म-दर्शन : ठीक नहीं है उदासीनता (पत्रिका)

- पोप फ्रांसिस (ईसाई धर्मगुरु)

आज के समय की सबसे बड़ी चुनौती है दूसरे के करीब आना, उनकी स्थिति के करीब होना, उनकी समस्याओं को समझने की कोशिश करना। उदासीनता की संस्कृति निकटता की दुश्मन है। उदासीनता की संस्कृति हमारे बीच की दूरी को बढ़ा देती है। इसलिए 'मैं' को 'हम' में बदलना जरूरी है। उदासीनता हमें मार डालती है, क्योंकि यह हमें दूसरों से दूर करती है। इसकी बजाय संकट से बाहर निकलने के तरीकों का ***** शब्द है निकटता। अगर लोगों में एकता या निकटता की भावना नहीं है, तो राज्यों के भीतर भी सामाजिक तनाव पैदा हो सकते हैं। संकट के समय तो पूरे शासक वर्ग को 'मैं' कहने का अधिकार नहीं है।

उन्हें 'हम' कहना चाहिए और संकट के समय एकता पर जोर देना चाहिए। जिस राजनेता या धर्माध्यक्ष के पास 'मैं' की बजाय 'हम' कहने की क्षमता नहीं है, वह संकट की स्थिति को सही तरीके से समझ ही नहीं पाएगा। ऐसे समय में आपसी विवादों को छुट्टी पर भेजा जाना चाहिए और एकता के लिए जगह बनानी चाहिए। याद रहे महामारी ने 'फेंकने की संस्कृति' को बढ़ा दिया है। इसके शिकार समाज के सबसे कमजोर सदस्य जैसे गरीब, प्रवासी और बुजुर्ग भी हो रहे हैं।

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जैक डोर्सी के लिए गले पड़ी मुसीबत से पीछा छुड़ाना काफी नहीं (पत्रिका)

- सनी बंच कल्चर एडिटर, द बुलवर्क

अमरीकी राष्ट्रपति ट्रंप का ट्विटर अकाउंट स्थायी रूप से प्रतिबंधित करने के बाद ट्विटर के सीइओ जैक डोर्सी ने बुधवार को इस पर चुप्पी तोड़ी। उन्होंने लिखा कि यह फैसला गुस्से से कहीं ज्यादा अफसोस में लिया गया था। हालांकि यह जरूरी हो गया था क्योंकि ट्रंप के शब्द जनसुरक्षा के लिए खतरा बनते जा रहे थे। उन्होंने यह भी लिखा है कि अंतत: ट्रंप के अकाउंट पर बैन लगाना स्वस्थ संवाद को बढ़ावा देने की हमारी कोशिशों की विफलता है। दरअसल, सोशल मीडिया नेटवर्क समाज के सूक्ष्म रूप से ज्यादा कुछ नहीं है और समाज को बड़े पैमाने पर हमेशा समाजकंटकों को हटाने के लिए एक तरीके की जरूरत होती है।

ट्विटर ने उत्पीडऩ कम करने की दिशा में उपकरण उपलब्ध कराने का अच्छा काम किया है। उनमें अनेक ऐसे फिल्टर हैं जो कम गुणवत्ता वाले अकाउंट्स के जवाबों को छिपाते हैं और नियंत्रण रखते हैं। ट्रंप की बात की जाए तो उन्होंने 2020 के चुनाव के बारे में नाटकीय रूप से इस विशाल प्लेटफार्म का उपयोग किया। इतना कि उन्होंने अमरीका की महान परम्परा 'सत्ता का शांतिपूर्ण हस्तांतरण' को जोखिम में डाल दिया।

ऐसे में समाज को बुरी तरह से प्रभावित करने की ट्रंप की क्षमता को बाधित करना सही है। लेकिन ट्विटर की समस्या नियम लागू करने में निरंतरता का अभाव है। ट्रंप पर प्रतिबंध लगाने, लेकिन चीन के शिनजियांग में चल रहे बंदी शिविरों के बारे में दुष्प्रचार के लिए ट्विटर के इस्तेमाल पर प्रतिबंध नहीं लगाने के पीछे क्या कारण है? डोर्सी क्या तर्क देंगे कि अमरीकी चुनाव प्रक्रिया में भरोसे को कमतर करने के लिए अमरीकी राष्ट्रपति को मौन कर दिया जाए, पर कोरोना वैक्सीन को लेकर ईरानी धर्मतंत्र के मुखिया को षडयंत्रकारी धारणाएं फैलाने दी जाएं। मेरा हमेशा से ही मानना है

कि सोशल मीडिया वही है जैसा हम इसे बनाते हैं, और यही बात समाज पर लागू होती है। लेकिन समाज पुलिस, जजों और जेलों की न्याय व्यवस्था के बिना नहीं रह सकता। सुनिश्चित करना होगा कि असामाजिक तत्व समाज से दूर रहें। डोर्सी को सोशल मीडिया की न्याय प्रणाली बनाने पर अधिक ध्यान केन्द्रित करना चाहिए, बजाय गले पड़ी मुसीबत से किसी तरह पीछा छुड़ाने का रास्ता तलाशने के।
- द वॉशिंगटन पोस्ट

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शब्दों का दरवेश - प्रकृति और संस्कृति के सुरीले पाठ (पत्रिका)

- विनय उपाध्याय (कला, साहित्य समीक्षक, टैगोर विश्व कला एवं संस्कृति केन्द्र के निदेशक)

आदिम स्मृतियों के एक ऐसे सफर पर चल पडऩे का यह आमंत्रण था, जहां इंसानी वजूद की कही-अनसुनी दास्तानों में अपनी ही धड़कनों को सुना जा सकता था। दरअसल, यह जनजातीय जीवन और उनकी लोक आस्थाओं के आसपास रचे-बसे उन सूत्रों को थामने की कोशिश थी, जहां से हमारी तरक्की और खुशहाली शुरू होती है। इसी के आस-पास दत्तोपंत ठेंगड़ी शोध संस्थान की पहल पर भोपाल के जनजातीय संग्रहालय में तीन दिन तक अध्येता और शोधार्थियों ने अपने तर्क-वितर्क साझा किए। दिलचस्प यह है कि संग्रहालय की जिस चारदीवारी में यह वैचारिक अनुष्ठान हुआ, उसका जर्रा-जर्रा हमारे जन-पुरखों की विलक्षण जीवन दृष्टि को बयान करता है। जंगलों से गुजरते स्मृतियों के जगमग संसार ने यहां अपना बसेरा खोजा है। भोपाल की शामला पहाड़ी की सख्त चट्टानों पर एक सुंदर कविता की तरह उभर आई इस इमारत में गोंड, बैगा, भील, कोरकू और सहरिया जैसी जनजातीय बिरादरियां अपने पुरखों, देवताओं, मिथकों, गाथाओं और मनौतियों की विरासत थामें परंपरा का गौरव गा रही हैं। श्रद्धा, आस्था और समर्पण के बीच सांसें भरती एक सामुदायिक इच्छाशक्ति है, जो अपने परिवेश और प्रकृति के प्रति वफादारी का सबक देती है। जन्म से लेकर इस नश्वर संसार को अलविदा कहने तक ये सबक और सौगंध पूरे होते हैं।

हमारा शहरी मन इसे माने, न माने लेकिन जीवन की मृगतृष्णा के असल सच को सदियों पहले भांप चुका वनवासी समुदाय आदिम सुख के अमृत को पाकर अपनी धरोहर का सच्चा पहरेदार रहा है। इसी रंग-रोशनी से उतरकर कुछ सवाल आधुनिकता की चौखट पर खड़े होते हैं कि अपनी धरती, अपने पर्यावरण और जीवन के प्रति सच्ची वफादारी हमारे समय में कहां, कितनी बाकी है। साधक-ऋषियों ने जिस अद्वैत की अवधारणा में परमतत्व को खोजने का उपदेश दिया, जंगलों में रहने वाले समुदाय उसके जीवंत साक्ष्य बन गए। यहां हर गतिविधि, हर क्रियाकलाप और अनुष्ठान पंच तत्वों के उजास से भरे हैं कि हमारा होना

भूमि, पानी, आसमान, आग और हवा होना है। यहां कुछ भी बेमानी नहीं है। मिट्टी का छोटा सा कतरा और घास का तिनका भी अपने मकसद के साथ जीवन का अभिन्न हिस्सा है। आंगन-देहरी, दीवार, पर जो रंग छटके हैं और जो छटाएं बिखरी हैं, प्रकृति ही उनका स्रोत है। आस्था का हर आयाम यहां मिथकों से जुड़ा है। ये मिथक पूर्वजों की कथा कहते हैं जो एक सनातन को आत्मसात करने और उसे विरासत की तरह आने वाली पीढ़ी को हस्तांतरित करने की गवाही देते हैं। यह सुंदर दुनिया किसी मठ या गुरुकुल से पाए उपदेश की प्रेरणा नहीं है। प्रकृति के पन्नों पर लिखे सुनहरे पाठ हैं, जिसे अहोभाव से जस का तस जीवन में उतारने का मौन स्वीकार है।

यहां परंपरा में जीवन अपनी आंखें खोलता है। यहां विवाह के सुंदर मंडम में ब्रह्मांड की कल्पना की जा सकती है। यहां बासिन कन्या समूचे जीवन पर आच्छादित हो सकती है। पूर्वजों की शक्तियां अश्व के प्रतीकों में इच्छाओं की तरह रह सकती हैं। दीवार पर पिठौरा की आकृतियों में जल-देवता इन्द्र की आहट सुनी जा सकती हैं। यहां जो है, समय में है। आज और अभी के जीवन में है। चलते रहने में है। एक ऐसी गति, जिसकी गंतव्य में नहीं, यात्रा में ही सार्थकता है। उसका सारा पुरुषार्थ, सारी प्रार्थनाएं इस धरती और प्रकृति के प्रति उसका हार्दिक आभार है।

सौजन्य - पत्रिका।
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Friday, January 15, 2021

ई-बाइक करेंगी कारों से बातें! (पत्रिका)

डैल्विन ब्राउन, इनोवेशंस रिपोर्टर (द वॉशिंग्टन पोस्ट)

यदि साइकिल और ई-स्कूटर की सड़कों पर कारों से बातचीत संभव हो जाए तो बाइक चालक संभव है कि ज्यादा सुरक्षित होगा। यह पहली बार में कल्पना-मात्र लगता है, लेकिन बाइक और स्कूटर निर्माता इस विचार को जमीन पर उतारने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं, जिसमें माइक्रोमोबिलिटी के सभी साधन आसपास की कारों के साथ संवाद करने में सक्षम होंगे। इसके लिए नए सेफ्टी सॉफ्टवेयर को विकसित करने और उसका परीक्षण करने की कवायद चल रही है। इसके लिए डेट्रॉयट स्थित टोम सॉफ्टवेयर ने फोर्ड मोटर कंपनी, ट्रेक बाइसाइकिल और बॉश जैसी कंपनियों के साथ मिलकर पहल की है।

इस कोशिश के केंद्र में एक ऐसा मानक सॉफ्टवेयर है जिससे व्यापक तरीके के वाहनों के लिए वास्तविक समय में जानकारी साझा करना संभव हो सकेगा। इससे बड़े शहरों और घने ट्रैफिक वाले क्षेत्र में बाइक सवारों के लिए उन वाहनों के बारे में जानना भी आसान होगा, जो उनकी नजर के दायरे से बाहर हो सकते हैं। इसकी मदद से बाइसाइकिल के पैनल पर तब अलर्ट भी प्रस्तुत हो सकते हैं, जब कारें बहुत नजदीक हों।

इस संबंध में घोषणा टोम सॉफ्टवेयर की ओर से हाल ही टेक कॉन्फ्रेंस सीईएस में की गई, जिसका आयोजन इस वर्ष डिजिटल फॉरमेट में किया जा रहा है। टोम सॉफ्टवेयर के संस्थापक और सीईओ जेक सिगाल ने कहा कि ऑन-रोड डेटा कलेक्शन पायलट और 2021 टेस्टिंग के जरिए हमारी शोध और विकास प्रक्रिया जारी है और हमने क्रॉस-इंडस्ट्री सहयोग में महत्त्वपूर्ण उपलब्धि हासिल कर ली है।

सौजन्य - पत्रिका।
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Wednesday, January 13, 2021

'गृहिणियों के श्रम का महत्त्व भी समझें' (पत्रिका)

यह धारणा कि गृहिणियां खास काम नहीं करती हैं या वे घर में आर्थिक मूल्य नहीं जोड़ती हैं, एक समस्यापूर्ण विचार है, जिस पर कई वर्षों से तर्क-वितर्क किया जा रहा है। न्यायाधीश एन वी रमना ने मोटर दुर्घटना क्षतिपूर्ति से संबंधित एक अपील में 5 जनवरी 2021 को दिए गए एक फैसले में भी इस मुद्दे को उठाया। निश्चित रूप से घरेलू महिलाओं के काम को निर्धारित करने के लिए भी मौद्रिक परिमाणीकरण की आवश्यकता है, लेकिन उन्हें पैसे दिए जाएं, इस विचार से गृह लक्ष्मी अपमानित भी महसूस कर सकती है। इसके बावजूद यह तथ्य चौंकाने वाला है कि भारत के उच्चतम न्यायालय ने एक गृहिणी की मासिक आय 6,000 रुपए (नोशनल) निर्धारित की है। पहले यह राशि 3000 रुपए प्रति माह थी।

गौरतलब है कि एक मोटर व्हीकल ट्रिब्यूनल ने मुआवजा तय करते वक्त अपने फैसले में यह राशि तय की थी। अदालत ने इसे दोगुना कर दिया, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि नई राशि गृहिणियों के श्रम का सही मूल्यकांन ही है। अपने बच्चों को स्वयं पालने के लिए कितनी ही उच्च शिक्षित महिलाएं घर को ही प्राथमिकता देती हैं। एमबीए, इंजीनियर, बैंकर्स महिलाएं भी अपनी लाखों की नौकरी छोड़कर बच्चों को संभालती हैं, क्योंकि प्यार और मातृत्व का कोई मोल नहीं हो सकता।

भारत जैसे देश में केवल 22 प्रतिशत महिलाएं कार्यबल का हिस्सा हैं और उनमें से 70 प्रतिशत उन कृषि गतिविधियों से जुड़ी हैं, जो प्रकृति में अनौपचारिक रूप से कम या बिना किसी पारिश्रमिक या सामाजिक मान्यता और सामाजिक सुरक्षा के लगभग शून्य पहुंच के साथ जुड़ी हैं। इसके अलावा खाना पकाने, सफाई, पानी और जलाऊ लकड़ी जुृटाने जैसी अवैतनिक घरेलू गतिविधियों को पूरा करने में भी वे लगी रहती हैं।

अब समय आ गया है कि हम गृहिणियों के श्रम को महत्त्व दें और कानूनों और नीतियों के माध्यम से इसे पहचानें। जैसे प्रधानमंत्री किसान निधि के तहत प्रति वर्ष 6,000 रुपए की सहायता देश भर के सभी किसान परिवारों को दी जा रही है। यह राशि हर चार महीने में 2,000 रुपए की तीन बराबर किस्तों में प्रदान की जा रही है। क्या इसी तर्ज पर सरकार गृहिणियों के लिए कोई नीति नहीं बना सकती? क्या उनका हक नहीं बनता कि वे भी अपने पैरों पर खड़ी हों और आर्थिक रूप से स्वतंत्र हों? सरकार को एक ऐसी योजना लानी चाहिए, जिसमें गृहिणी की शिक्षा राज्य प्रायोजित हो और बाद में नौकरी प्रदान की जाए। उन्हें इस तरीके से भी प्रशिक्षित किया जा सकता है कि वे अपना ऑनलाइन व्यवसाय शुरू करने में सक्षम हो जाएं। ऐसी गृहिणियों को कुछ छूट दी जानी चाहिए और उन्हें अपने व्यवसाय को शुरू करने के लिए सरकार द्वारा मौद्रिक मदद दी जानी चाहिए। यह कदम न केवल अवैतनिक श्रम के मुद्दे को हल करेगा, बल्कि भारत को आर्थिक स्वतंत्रता के मामले में लैंगिक समानता हासिल करने में भी मदद करेगा।
लेखिका - आभा सिंह
(सुप्रीम कोर्ट में अधिवक्ता)

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Saturday, January 9, 2021

विज्ञान वार्ता - आपके घर की बनावट (पत्रिका)

- गुलाब कोठारी

हमारे अध्यात्म में स्थूल, सूक्ष्म और कारण—ये तीन प्रकार के शरीर कहे गए हैं। इनमें कारण शरीर आयुमय, सूक्ष्मशरीर इन्द्रियरूप तथा स्थूल शरीर रस-रक्त-मांसादि धातुरूप है। इन तीनों शरीरों का निर्माण क्रमश: आदित्यमय द्युलोक, वायुमय अन्तरिक्ष तथा अग्निमय पृथ्वी से होता है। मनुष्य शरीर के पंचकोशों में से स्थूल शरीर में अन्नमय कोश, सूक्ष्म शरीर में प्राणमय, मनोमय तथा विज्ञानमय कोश और कारण शरीर में आनन्दमय कोश स्थित है।

अन्न से बनने वाला शरीर अन्नमय कोश है। पृथ्वी, जल, तेज, वायु आकाश—इन पंचभूतों की समष्टि ही यह शरीर है। इसमें कठिन अर्थात् हड्डियों सहित कठोर भाग पृथ्वी से बनता है। रक्त अर्थात् बहने वाला भाग जल से, उष्ण भाग तेज से, गति वाला भाग वायु से तथा खाली भाग आकाश से निर्मित होता है। पृथ्वी धारण करने वाली है। जल से स्नेहन होता है। पिण्ड निर्माण के लिए जल आवश्यक है। सूखी मिट्टी से लोष्ठ निर्माण (लोन्धा/लोया बनाने) के लिए जल का प्रयोग किया जाता है। प्रकाश करने के लिए तेज आवश्यक है। अंधकार को दूर करने का साधन प्रकाश है। प्रकटीकरण के साधन को प्रकाश कहते हैं। हमारी चक्षु इन्द्रियां ही तेज हैं। इसी को चाक्षुष कृष्ण कहा गया है। संचरणशीलता के लिए वायु आवश्यक है क्योंकि गति ही जीवन है। गति का रुकना ही मृत्यु है। अत: हमारे प्राण वायु तत्त्व हैं, जो शरीर में हर समय संचार करते रहते हैं। आकाश, अवकाश को कहते हैं। किसी भी वस्तु की उत्पत्ति के लिए खाली स्थान का होना आवश्यक है। हमारा यह स्थूल अन्नमय शरीर अन्न के रस से निर्मित होता है। अत: इसको आहार शरीर भी कहते हैं। इसमें अन्न शुद्धि प्रधान मानी गई है। आहार-विहार के संयम और पवित्रता, आसन सिद्धि और प्राणायाम का नियमित अभ्यास करने से अन्नमय कोश की शुद्धि होती है। इससे निरोगी, चिरयौवन तथा दीर्घ जीवन की प्राप्ति होती है।

अन्नमय तथा आनन्दमयकोश की सत्ता का मूलाधार प्राणमय, मनोमय तथा विज्ञानमय कोश यानी सूक्ष्म शरीर ही है। स्थूल शरीर और कारण शरीर का वास्तविक संचालक सूक्ष्म शरीर ही है।

मन के साथ पांच ज्ञानेन्द्रियों के संयोग से बनने वाला मनोमय कोश कहा जाता है। जब ज्ञानेन्द्रियों के साथ बुद्धि का योग होता है तो वह विज्ञानमय कोश कहलाता है। पांच प्राणों तथा कर्मेन्द्रियों के मेल से बनने वाला कोश प्राणमय कोश कहलाता है। प्राणमय कोश क्रिया शक्ति से सम्पन्न तथा कर्मरूप है। मनोमय कोश इच्छा शक्ति से सम्पन्न और कारण रूप है। विज्ञानमय कोश ज्ञानशक्ति से सम्पन्न कर्तारूप है। ये तीनों कोश सूक्ष्म शरीर से सम्बद्ध हैं।

अन्नमय कोश के कण-कण में प्राण रहते हैं। प्राण-अपान-व्यान-समान-उदान इन पांच प्राणों (वायु) से ही अन्नमय कोश की समस्त क्रियाएं संचालित होती हैं। यह क्रिया प्रधान कोश है। श्वसन क्रिया में भीतर-बाहर आने-जाने वाला प्राण, शरीर की क्रियाशीलता को बनाये रखने तथा आवश्यक ऊर्जा प्रदान करने का कार्य करता है। भोजन को पचाना, शरीर में रसों को समान भाव से वितरित करके उस रस से शरीर को पुष्ट करना तथा रक्त के साथ मिलकर मलों को बाहर निकालने का कार्य प्राणमय कोश करता है। अत: प्राणतत्त्व को ऊर्जा या लाइफ एनर्जी भी कहते हैं। साधारण भाषा में शरीर 'ठंडा होना' का अर्थ है—मृत्यु होना। गर्मी जीवन को सूचित करती है। अन्नमय कोश या स्थूल शरीर की यह गर्मी प्राण के द्वारा ही होती है।

मृत्यु होने पर अथवा चिर समाधि में, जब प्राणों को नियंत्रित कर लिया जाता है, तब अन्नमय कोश की समस्त क्रियाएं बंद हो जाती हैं। यहां तक कि मल-मूल त्याग तथा नाखून व बालों का बढऩा भी रुक जाता है। अत: अन्नमय कोश में होने वाली समस्त क्रियाएं प्राणमय कोश के बल पर ही चलती हैं। शरीर स्वयं जड़ है।

मूर्धातत्त्व (ज्ञान) और हृदय तत्त्व (संवदेन शक्ति) वाले मनोमय कोश की शक्ति से ही प्राणमय कोश कार्य करता है। अन्नमयकोश की संवेदन-ज्ञान-क्रियाओं को पूर्ण करने के लिए प्राणमय कोश को आदेश देना मनोमय कोश का कार्य है। स्थूल शरीर की सूक्ष्म चेतना ही मन है। यह मन समस्त शरीर का संचालक है। अत: मन को ग्यारहवीं इन्द्रिय कहा गया है। आचार-विचार, विश्वास-अभिरुचि-आकांक्षा- दृष्टिकोण इत्यादि का निर्धारण मनोमय कोश पर निर्भर करता है। हर व्यक्ति के मन की ये विशेषताएं अलग होती हैं इसलिए मन के कारण ही हर व्यक्ति दूसरे से अलग होता है। मन ही इच्छाओं के उत्पन्न होने का केन्द्र है।

मन को आत्मकल्याण की ओर बढ़ाने के लिए प्राणों की साधना करनी आवश्यक है, क्योंकि मन ही मनुष्यों के बंधन व मोक्ष का कारण कहा गया है। 'मन एवं मनुष्याणां कारणं बंधमोक्षयो:'। (मैत्रायणी उपनिषद् ४/ट)।

मनोमय कोश को प्रेरणा देने वाला विज्ञानमय कोश स्थूल से सूक्ष्म की ओर विचरण करता है। यह मन, प्राण तथा अन्नमय कोश का मूल कोश है क्योंकि यहां मन और ज्ञान, संवेदन तथा क्रियातत्त्व एक साथ कार्य करते हैं। इसी को प्रज्ञा भी कहते हैं। हमारे मनोमय कोश के कार्य वर्तमान से सम्बद्ध रहते हैं। उस कार्य-व्यापार के लिए जब भूतकाल के ज्ञान को जोडऩे की आवश्यकता होती है, तब विज्ञानमय कोश का सहारा लेना पड़ता है। विज्ञानमयकोश हमारे पूर्व संचित ज्ञान का संग्रहागार ही कहा जा सकता है। इस कोश की साधना करने वाला असत्य, भ्रम, मोह, आसक्ति से विरत होता हुआ योगक्रियाओं के अभ्यास से संसार से मुक्त हो जाता है।

अन्न, मन व प्राण को संचालित करने वाले विज्ञानमय कोश की शक्ति का स्रोत आनन्दमयकोश है। 'आनन्दो वै ब्रह्मÓ—इस श्रुति वचन में आनन्द को ब्रह्म कहा गया है। मन-वचन और कर्म की शुद्धता से इस कोश की सिद्धि मिलती है। गीता में स्थितप्रज्ञ की जो स्थिति कही गई है वही आनन्द की स्थिति है। इस कोश में पहुंचा हुआ जीव अन्य चार कोशों को भली प्रकार समझ जाता है।

आनन्दमय कोश जागृत होने पर जीव अपने को अविनाशी, ईश्वर अंश, सत्य, शिव, सुन्दर मानता है। शरीर, मन और साधन आदि को मात्र जीवनोद्देश्य के उपकरण मानता है। यह स्थिति ही आत्मज्ञान कहलाती है। यह उपलब्ध होने पर मनुष्य हर घडी़ सन्तुष्ट एवं उल्लसित हो जाता है। ये पांचों कोश पंचभूतों की दिव्य शक्तियों के भण्डार हैं।

सामान्य अर्थों में कह सकते हैं कि सीमित, सन्तुलित और सात्विक भोजन करना, अन्नमय कोश की साधना है। साहस, संकल्प, पराक्रम, अनुसन्धान को कठोरता से अपनाने पर प्राणमय कोश सधता है। श्रेष्ठ ही देखने-खोजने और सोचने-विचारने से मनोमय कोश सध जाता है। इसी तरह संकीर्णता छोड़कर विशालता के साथ जुड़ जाने पर विज्ञानमय कोश सधता है। सादा जीवन की, बालकों जैसी निश्छलता की आदत डालने पर, हार-जीत में हंसते रहने वाले प्रज्ञावानों की तरह हर किसी अवसर में आनन्दित रहने पर आनन्दमय कोश सध जाता है।

पंचकोशों का जागरण जीवन चेतना के क्रमिक विकास की प्रक्रिया है। इन सभी कोषों का तटस्थ होना ही आध्यात्मिक अर्थों में उनका शुद्ध होना है क्योंकि इससे ही जीवात्मा अपने स्वरूप में सहजता से व्याप्त होकर मोक्षमार्ग (पुरुषार्थ) पर अग्रसर रहता है।

ये पांचों कोश एक-दूसरे से उसी प्रकार घनिष्ठता से जुड़े रहते हैं जैसे कि विश्व ब्रह्माण्ड के पांच पर्व। मानव शरीर के ये पांच कोश इन पांचों पर्वों के मूल तत्त्वों से बने हैं। वस्तुत: इन पांचों कोशों को साधने से उन सब तत्त्वों का व्यक्ति जानकार हो जाता है, जो ब्रह्माण्ड के भी मूल तत्त्व हैं।

क्रमश:

सौजन्य - पत्रिका।
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Thursday, January 7, 2021

जटिल समस्याओं के हल के लिए सामुदायिक भागीदारी जरूरी (पत्रिका)

नीलम कौशिक, प्रोफेसर, स्ट्रेटेजिक एरिया, आइआइएम बेंगलूरु

आत्मनिर्भर भारत अभियान में एक बात अवश्य निहित है कि यह नवाचार और समस्याओं के समाधान की संस्कृति विकसित करने के सतत प्रयास का अवसर देता है। कोरोना संकट के दौरान नवाचार की चुनौतियों को गति देने और भारत के संदर्भ में पेश आ रही विशिष्ट चुनौतियों को संबोधित करने के लिए कराए गए हैकाथॉन इसी दिशा में उम्मीद जगाने वाला कदम कहे जा सकते हैं। मार्च में लॉकडाउन के बाद देश में 20 से ज्यादा कोविड वर्चुअल हैकाथॉन और इनोवेशन चैलेंज लॉन्च किए गए। अत्याधुनिक संचार तकनीक और सहयोगी टूल्स के चलते इनमें लोगों की अच्छी खासी भागीदारी देखने को मिली। इन आयोजनों को विभिन्न संगठनों और सरकारी संस्थाओं का सहयोग मिला, जैसे एमईआइटीवाइ, एमएचआरडी, नीति आयोग आदि।

महामारी के कारण जो चुनौतियों पेश आईं, उनके इर्द-गिर्द की जटिलताओं और अनिश्चितताओं ने कोविड-19 की समस्या को कम ही आंका है। स्वास्थ्य क्षेत्र में कमजोर आधारभूत ढांचे जैसी व्यवस्थागत समस्याएं इस जटिल समस्या को और मुश्किल बना रही हैं। हैकाथॉन और नवाचार प्रतियोगिताएं बुद्धिजीवियों के समूह से समस्या के समाधान पाने का मार्ग प्रशस्त करती हैं, वह भी वित्तीय पुरस्कारों के जरिए।

नोबेल पुरस्कार विजेता लाइनस पॉलिंग के अनुसार, 'एक अच्छा आइडिया तभी सामने आता है, जब आपके पास बहुत सारे आइडिया हों।' एक ओर जहां आइडिया प्रतियोगिताएं, हैकाथॉन और नवाचार प्रतियोगिताओं का आयोजन बहुत से आइडिया और समाधान प्रस्तुत करता है, वहीं दूसरी ओर जटिल समस्याओं के समाधान के लिए मात्र आइडिया एकत्र करने की नहीं, बल्कि आपसी समन्वय और सहयोग के साथ काम करने की जरूरत होती है। इसलिए समस्या विशेष के समाधान के लिए समुदायों के बीच सतत सहयोग के प्रयास किए जाने चाहिए। इससे विभिन्न स्तर पर विशेषज्ञों से मिले विविध विचारों और दृष्टिकोण को एक सूत्र में पिरोने का अवसर मिलता है।

सरकारी निकाय मॉडल विकास और पायलट प्रोजेक्ट के लिए वित्तीय एवं अन्य प्रकार की सहायता उपलब्ध करवा सकते हैं। सामुदायिक विचार-विमर्श से ही कारगर आइडिया जन्म लेते हैं और उन पर संपूर्ण समुदाय का अधिकार होता है, व्यक्ति विशेष का नहीं। इसके अलावा समस्या के समाधान के लिए 'समझ' पर आधारित मानव केंद्रित रवैया महत्त्वपूर्ण होगा, जैसा लोक सेवाओं की अदायगी में होता है। खुले नवाचार मंच ओपनआइडियो (डिजाइन थिंकिंग फर्म आइडीईओ से संबद्ध) से प्रेरणा ली जा सकती है। इस फर्म का अपना विश्व स्तरीय भागीदारों का समुदाय है और यह जटिल सामाजिक समस्याओं के समाधान के लिए डिजाइन थिंकिंग सिद्धांतों का इस्तेमाल करती है, जैसे कि घाना में निम्न आय वर्ग समुदाय के लिए स्वच्छता सुधार। दूसरी ओर, कोविड चुनौतियों और हैकाथॉन के आंकड़ों से जाहिर है कि इस क्षेत्र में तकनीकी क्षेत्र के लोगों का प्रतिनिधित्व जरूरत से ज्यादा रहा। जरूरत है समाज विज्ञान, कला, नीति आदि विभिन्न क्षेत्रों से लोगों की भागीदारी की, जिनके समृद्ध दृष्टिकोण यह बताते हैं कि जटिल समस्याओं के समाधान के संदर्भ में तकनीक की अपनी सीमाएं हैं।

जाहिर है देश में समस्या समाधान की संस्कृति विकसित करने की दिशा में दूरगामी प्रयास साबित होगा भारत के विभिन्न वर्गों की युवा प्रतिभाओं की विचारधारा को एक सूत्र में पिरोने की राह तलाशना। इसे साकार करने के लिए प्रशासनिक तंत्र के साथ चलना होगा, नागरिक विज्ञान परियोजनाओं और जटिल समस्याओं के समाधान के लिए जानकारी जुटानी होगी। समस्या समाधान मॉडल प्रस्तुत करने के लिए हैकाथॉन जैसे कार्यक्रमों में भागीदारों के प्रोत्साहन की आवश्यकता को भी समझना होगा।

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Monday, January 4, 2021

लोकतंत्र पर चोट (पत्रिका)

- भुवनेश जैन

मध्यप्रदेश सरकार ने पिछली गली से प्रदेश में एक काला कानून लागू कर दिया है। भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 की धारा 17-ए के अन्तर्गत जारी एक आदेश में कहा गया है कि किसी लोक सेवक के मामले में सरकारी कामकाज के दौरान हुए अपराध की जांच या पूछताछ से पहले सरकार की अनुमति लेनी होगी। सीधा सा अर्थ हुआ कि अब अफसरों को भ्रष्टाचार के कीचड़ में गोते लगाने की छूट मिल गई है। भ्रष्टाचार के मामलों की जांच के लिए बनाई गई एजेंसियां अब उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाएंगी। लोकायुक्त और आर्थिक अपराध शाखा (ईओडब्ल्यू) जैसी एजेंसियों को अफसरों के खिलाफ जांच शुरू करने से पहले सरकार से अनुमति लेनी होगी। यानी परोक्ष रूप से स्वयं अफसर ही तय करेंगे कि उनके बंधुओं के खिलाफ जांच होनी चाहिए या नहीं।

जब सत्ता बल का अहंकार सिर चढऩे लगता है तो व्यक्ति सबसे पहले स्वयं का भविष्य सुरक्षित करता है। हर प्रकार की सजा से स्वयं को अभयदान दे देता है। रूस के प्रधानमंत्री पुतिन का उदाहरण सामने ही है। उन्होंने बाकायदा कानून बनवा कर जीवन पर्यन्त स्वयं को सुरक्षित कर लिया। भारत में भी जब-तब ऐसे प्रयास होते रहे हैं। केन्द्र सरकार और कुछ राज्य सरकारें भी चुपचाप ऐसे कानून या नियम बना चुकी हैं, जिनमें अफसरों को संरक्षण के नाम पर 'अभयदान' दिया गया है। राजस्थान में पिछली सरकार ने भी ऐसा ही एक काला-कानून अध्यादेश के माध्यम से लाकर भ्रष्ट अफसरों को अभयदान देने की चेष्टा की थी। उस समय 'पत्रिका' ने इस कानून के खिलाफ 'जब तक काला-तब तक ताला' जैसा अभियान चलाकर सरकार को कानून वापस लेने के लिए मजबूर कर दिया था।

मध्यप्रदेश में दो साल पहले ऐसा ही एक और लोकतंत्र विरोधी नियम लागू करने की कोशिश की गई थी। विधायकों के प्रश्न पूछने के अधिकार पर ही एक तरह से सेंसरशिप लागू की जा रही थी। तब भी 'पत्रिका' ने इस मुद्दे पर आवाज उठाई। 'पत्रिका' की पहल को व्यापक जनसमर्थन मिला और विधानसभा को अपना निर्णय बदलना पड़ा। आश्चर्य यह है कि जनता के हित चिन्तन की बात करने वाले मीडिया का एक बड़ा हिस्सा सरकारों के इस तरह के लोकतंत्र विरोधी कदमों पर मौन रह जाता है। राजस्थान और मध्यप्रदेश में ऐसे कानूनों का 'पत्रिका' ने न सिर्फ विरोध किया, बल्कि सरकारों को उन्हें वापस लेने को मजबूर किया।

मध्यप्रदेश के सामान्य प्रशासन सचिव डॉ. श्रीनिवास शर्मा के हस्ताक्षर से जारी इन आदेशों से लोकायुक्त और ईओडब्ल्यू जैसी एजेंसियां शक्तिविहीन हो जाएंगी। सबसे बड़ी आशंका यह है कि सरकारें राजनीतिक आधार पर इन नियमों का दुरुपयोग करेंगी। चहेते अफसरों के मामले में जांच करने की अनुमति नहीं दी जाएगी। इससे ईमानदारी से काम करने वाले लोक सेवकों का मनोबल टूटेगा और भ्रष्टाचार का बोलबाला बढ़ेगा।

इस तरह के नियम सरकारों को स्वच्छन्दता की ओर बढ़ाते हैं। मध्यप्रदेश सरकार का लोकतंत्र में विश्वास है तो काले कानून को प्रतिष्ठित करने वाले आदेश को तुरन्त वापस लेना चाहिए। यदि सरकार इसे वापस न ले तो भ्रष्टाचार को पालने-पोसने वाले इस कानून को उसे रद्द कर देना चाहिए।

सौजन्य - पत्रिका।
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हैप्पी न्यू ईयर (पत्रिका)

- गुलाब कोठारी

मेरे भारत को 'इंडिया' खा गया। जैसे 'मेक इन इंडिया' हो गया। हमारी आत्मनिर्भरता का अर्थ भारत नहीं इंडिया ही होगा। जैसे आज पूरा देश 'न्यू ईयर ईव' मनाएगा। हैप्पी का एक अर्थ है-खाओ-पीओ, नाचो-गाओ। शरीर है हैप्पी, तो हम हैप्पी। आनन्द का कोई सम्बन्ध नहीं इससे। हो भी कैसे! हमारे कोई सपने जुड़े हुए नहीं, इस हैप्पी होने से। जिस कलैण्डर के आधार पर यह 'हैप्पी न्यू ईयर' मनाया जाता है, उसमें क्या रहता है? यह मात्र महीनों और दिनों का एक क्रम देता है और उसमें कहां-कहां छुट्टियां होंगी। यह नौकरी करने वालों का, छुट्टियां गिनाने वाला, कलैण्डर है। छुट्टियां ही हैप्पी होने का आधार है। माह खोलते ही छुट्टियां गिनी जाती हैं। पहले ही सप्ताह में दो छुट्टियां मिलती हैं। क्या किसी शुक्रवार अथवा सोमवार की भी छुट्टी है? वह तो मेरे 'लौंग वीक-एण्ड' हो जाएगा। कहीं घूमने-फिरने जा सकता हूं। जो देश पुरुषार्थ के लिए जीता था, आज कर्महीनता से हैप्पी हो रहा है। बिना कर्म किए जीने को उत्सुक है। वरन्, आम आदमी के लिए क्या अर्थ है इस नव वर्ष का? यह नकल करने का अथवा चिरस्थायी अंग्रेजी मानसिकता का प्रभाव ही कहा जाएगा, जो हमारी मूल संस्कृति को ही लील गया। हम आज कितने गौरवान्वित हैं कि हम भी पश्चिमी देशों की तरह विकसित हो गए हैं। हमें बांधकर रखा था-

'मातृदेवो भव।'
'पितृदेवो भव।'
'आचार्य देवो भव।'

जैसे आदर्श वाक्यों ने। आज मैं मुक्त हूं-'मदर्स डे' 'फादर्स डे' और 'टीचर्स डे' के नाम पर। वर्ष में बस एक दिन। बाकी 365 दिन, उनकी वे जाने। सब अपने तरीके से जीवन जीना चाहते हैं। अवश्य जीना चाहिए पर इस बात पर विचार कर लेना चाहिए कि हमारे लिए कौन सा रास्ता उचित है।

खान-पान ही क्या, सम्पूर्ण जीवनशैली ही बदल गई। शिक्षा से भारतवर्ष ही नदारद है। देर से सोना, 'हैप्पी' होना है। ब्रह्म मुहूर्त और स्वाध्याय जीवन से बाहर हो गए। आज कहीं रात्रि भोज के लिए जाना हो, तो नौ-दस बजे से पहले कोई पहुंचते ही नहीं। फिर पहले शराब और अन्त में खाना। असुरों का श्मशान जगाने का समय हो जाता है। पश्चिम के किसी देश में ऐसा नहीं है। हमने कहां सीखा? भारत में तो 'ब्यालू' करते थे।

खाना तो कहां से कहां चला गया। अन्न, कभी ब्रह्म था। आज केवल 'भ्रम' रह गया है। रात का भोजन प्रात: 'बासी' हो जाता है। जो तामसी कहा जाता है। आज तो 'ब्रेड/डबल रोटी' (हम रोटी खाते हैं) ५-७ दिन पुरानी खाकर हैप्पी होते हैं। इसी तरह दूध १०-१५ दिन पुराना। क्योंकर हैप्पी हो सकते हैं! अनाज तो पहले ही विष हो चुका है। मौसम के अनुरूप खाना विदेशी खाने (भिन्न-भिन्न देशों के आयातित व्यंजन) के साथ ही समाप्त होने लग गया। वहां पूरे वर्ष एक जैसा खाना खाया जाता है। हैप्पी तो रह ही नहीं सकते।

जीवन के प्रति दृष्टिकोण भी विकास के नाम पर सारे बन्धन तोड़ रहा है। हम अपने भीतरी स्वरूप को भूलकर बाहर ही बाहर जी रहे हैं। जीवन का शाश्वत भाव लुप्त हो गया, मात्र नश्वर स्वरूप रह गया। इसका अर्थ है कि शरीर तो मनुष्य का है और जीवन पशु सदृश्य रह गया। मनुष्य आत्म भाव से दूर होता जा रहा है।
किसी को बंधे रहकर-सदाचारी बनकर-जीने की कहां पड़ी है? शिक्षा में केवल पेट भरना, स्वयं के जीवन को अन्य के अधीन कर देना (नौकरी) के सिवाय क्या मिलता है? जीवन अर्थहीन हो गया। शिक्षित व्यक्ति रिटायर होकर मर जाना श्रेष्ठ मानता है। किसी अन्य के काम आना शिक्षा का लक्ष्य ही नहीं है।

एक बड़ा परिवर्तन शादी की उम्र बढ़ जाने का आया। समय पर (प्रकृति के नियमानुसार) कोई जीने को तैयार ही नहीं। स्वच्छन्दता जीवन में बहुत बड़ा संकट बनती जा रही है। समाज भी मौन है, और मां-बाप भी उत्तरदायित्व उठाना नहीं चाहते। बड़ी उम्र की लड़कियों को कितना संघर्ष करना पड़ रहा है-नजदीकी रिश्तेदारों से, बाहरी तत्त्वों से, नौकरी में वरिष्ठ अधिकारियों से, ये दृश्य तो मीडिया में आम बात हो गई। मां-बाप भी लड़की को ससुराल में, घर बसाकर, जीने को तैयार ही नहीं करते। बल्कि अपने पांवों पर खड़ा होना सिखाकर भेजने लगे हैं। मीडिया ने शादी के प्रति दृष्टिकोण ही बदल डाला। 'लव जिहाद' जैसे काण्ड चारों ओर होने लगे हैं। मां-बाप पूरी उम्र बेटी को कष्ट में देखकर कैसे सुखी रहने वाले हैं? इनके लिए 'मातृ देवो भव' के स्थान पर 'मदर्स डे' उचित ही है।
लड़की शादी के साल गिनना सीख गई। भारत में पत्नी सीधे घर में प्रवेश करती थी, यानी कि चलकर आती थी, और लेटकर (मृत्यु के बाद) जाती थी। सात जन्म के रिश्ते कहे जाते थे। आज पश्चिम की तरह वर्षगांठ मनाते हैं। वहां तो दो-तीन बार शादियां हो जाती हैं। हर एक के साथ काल गणना होती है। हम भी नकलची हैं।

सभी परम्परागत देशों ने अपनी मातृभाषा के सहारे ही विकास किया-चीन, रूस, जापान आदि। विज्ञान में भी पिछड़े नहीं हैं। भारत के लोग ही क्यों उधार के ज्ञान के सहारे ठोकरें खाने को मजबूर हैं? सत्तर साल में भी अंग्रेजी से मुक्त होकर हैप्पी नहीं हो पाए।

सौजन्य - पत्रिका।
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Wednesday, December 30, 2020

खेती के लिए खास होगा 2021 (पत्रिका)

ईयरएंडर स्पेशल

एक्सपर्ट व्यूः डॉ. त्रिलोचन महापात्र, सचिव, कृषि अनुसंधान और शिक्षा, भारत सरकार

हम जानते तो पहले से थे, कोरोना में फिर से मानने को मजबूर हुए हैं कि किसान अपनी फसल का साथ कभी नहीं छोड़ता। ना कभी हमें भूखा रहने देता है। बीत रहे साल के दौरान कोरोना के साये में भी किसानों ने अच्छी फसल उगाई। दूध और पोल्ट्री का उत्पादन भी बढ़ाया। निर्यात के स्तर पर भी अच्छा किया। जल्दी खराब होने वाले उत्पाद को ले कर किसानों को समस्या हुई, क्योंकि लॉकडाउन की वजह से बाजार बंद थे। लेकिन अब यह समस्या दूर हो चुकी है। अब जो फसलें खेत में हैं वे भी अच्छा कर रही हैं। खेती के लिहाज से अगला वर्ष भी अच्छा रहने की पूरी उम्मीद रखिए।

अगला वर्ष खेती और जुड़ी हुई गतिविधियों के लिए बहुत अहम होने वाला है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2022 तक किसानों की आय दुगनी करने का जो लक्ष्य दिया है उसे हासिल करने के लिए युद्ध स्तर पर काम करना है। इसी वर्ष भारत की आजादी का 75वां साल भी लग जाएगा। किसानों, पशुपालकों, मत्स्य पालकों के लिए यह खास मौका बनाना है। इसके लिए फूड प्रोसेसिंग और इनसे जुड़े सुक्ष्म, लघु व मंझोले उद्योगों पर भी खास ध्यान दिया जा रहा है।

अगले कुछ वर्षों में हम देश से कुपोषण और भूख की समस्या को भी खेती की मदद से दूर करने में जुटे हैं। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आइसीएआर) के 2028 में 100 साल पूरे हो रहे हैं। इसी तरह भारत ने 2030 तक अपने यहां से कुपोषण और भूख को समाप्त करने का लक्ष्य तय किया है। फसलों में पोषण बढ़ाने के लिए बायो फोर्टिफाइड किस्मों पर काम तेजी से किया जा रहा है। 2014 तक सिर्फ एक-दो ही ऐसी किस्में थीं। अब तक हमने 17 तैयार कर ली हैं। अगले आठ साल में इसे 80-100 तक पहुंचाना है। इन्हें इतना सहज और लोकप्रिय बनाना है कि किसान इन्हें उगाएं।

दूसरी चुनौती है रसायन के उपयोग को कम करना। यह भी ध्यान रखना है कि ऐसा करते हुए हम कृषि उत्पादन को कम नहीं कर सकते। क्योंकि बढ़ती हुई जनसंख्या के लिए हमारी जरूरतें भी बढ़ रही हैं। लेकिन दुरुपयोग को कम करना है। साथ ही जहां तक संभव हो आर्गेनिक फार्मिंग की जाए, जिसमें खाद और रसायनों का उपयोग होता ही नहीं है। माइक्रोबियल कंसोर्टियम तैयार कर रहे हैं जिससे खाद का उपयोग कम हो। नैनो खाद से उर्वरक का इस्तेमाल 25-30 प्रतिशत तक कम हो जाएगा। नई-नई पद्धतियां और तकनीक का उपयोग किया जाएगा।


आशंकाएं होंगी दूर

किसान बिलों के माध्यम से बड़े सुधार की जमीन तैयार की गई है। किसान मौजूदा मंडियों में तो बेचे ही, उसके पास और विकल्प भी हों। धीरे-धीरे इसको ले कर आशंकाएं दूर होंगी और गतिरोध समाप्त होगा।

कॉपरेटिव बनाने पर होगा जोर

छोटे और सीमांत किसानों के लिए किसान कॉपरेटिव खड़े करने होंगे ताकि उनका उत्पादन बेहतर हो और साथ ही बाजार में उनकी शक्ति भी ज्यादा हो। दुग्ध उत्पादन में कॉपरेटिव की वजह से सभी संबंधित पक्षों को फायदा हुआ है। हमें निर्यात के लायक कृषि उत्पादन करना होगा। साथ ही प्रोसेसिंग पर भी ध्यान देना होगा। अभी 5-7 प्रतिशत तक ही उत्पादन की प्रोसेसिंग हो रही है।

तकनीक का होगा उपयोग

नए साल में खेती में नई तकनीक, डेटा एनालिटिक्स, रिमोट सेंसिंग, ड्रोन, प्रिसिजन एग्रीकल्चर जैसे डिजिटल सिस्टम का उपयोग बढ़ेगा। पशुओं और फसलों की बीमारी पर नजर रखनी होगी। निर्यात बढ़ेगा।

इंटरव्यूः मुकेश केजरीवाल

सौजन्य - पत्रिका।
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Thursday, December 24, 2020

भागीदारी से ही संवरेगा शहरों का भविष्य (पत्रिका)

रोहिणी निलेकणी, लेखिका, सामाजिक कार्यकर्ता और 'अघ्र्यम' की संस्थापक-अध्यक्ष

इस साल मैं कई बार बेंगलूरु से काबिनी गई और लौटी। जितनी बार मैं जंगलों या ग्रामीण क्षेत्रों का दौरा करके आती, अपनी आंखों और मन में वहां की ताजगी समेट लाती। इससे मेरा अपने गृह नगर को देखने का नजरिया बदला। सबसे ज्यादा व्यथित करने वाली बात थी - इस मेट्रो सिटी का नवीनीकरण। ऊपर देखो तो कंक्रीट का खतरा और नीचे निगाह डालो तो मलबे के ढेर। सलेटी रंग के कैनवस वाली मेरे शहर की इस तस्वीर में अगर कोई रंग भरता है तो वे हैं शहर के लोग, जो यातायात के बीच बिना समुचित दृश्यता और साइनबोर्ड के आवागमन कर रहे हैं। हालत यह है कि आगे चल रहे वाहन ही पीछे वालों के लिए नेविगेशन का काम कर रहे हैं, चाहे मूडी ट्रैफिक सिग्नल हो या आगे घुमावदार सर्किल आने वाला हो। लगता है जैसे देश के अन्य शहरों की तरह बेंगलूरु भी अपने निवासियों की परीक्षा ले रहा हो। आधा-अधूरा आधारभूत ढांचा मानो भविष्य बेहतर होने का दिलासा दे रहा हो।

शहर नागरिकों के धैर्य, विश्वास और उम्मीद पर टिका होता है। शहरवासी यहां स्वीकार्यता अनुभव करते हैं तो थकान भी और अंतत: उबाऊपन के शिकार हो जाते हैं। जब मैं घर पहुंचती हूं तो ऐसा लगता है जैसे कि मैं उसी जंगल के शहरी स्वरूप वाली जगह पहुंच गई हूं, जहां से अभी-अभी लौटी हूं। मेरे पड़ोस में पेड़ों का घना झुरमुट है। हालांकि बेंगलूरु शहर पूरा एक जैसा नहीं है और कभी बाग-बगीचों के शहर के रूप में विख्यात इस शहर में मेरे आस-पास के प्राकृतिक दृश्य अपवाद हैं। शहर की अकर्मण्यता जरूर एक अजीबोगरीब सामंजस्य बिठाती है। इससे विशिष्ट वर्ग के 'कुछ अलग' होने का आभास खत्म हो जाता है। यातायात का शोरगुल, प्रदूषण और तंग होती निजी जगह खुशफहमी को खत्म करती दिखाई देती है। परन्तु इसी बीच उम्मीद की एक किरण अब भी बाकी है, वह है शहर के भविष्य निर्माण से जुडऩे के अवसर।

राष्ट्रीय स्तर पर इस बात के प्रयास हो रहे हैं कि नागरिकों को शहर से दोबारा जुड़ाव महसूस करने के लिए प्रोत्साहित किया जाए। मौजूदा तकनीकी जगत सभ्यता का स्वरूप निर्धारित करने में सामूहिक भागीदारी के अनुकूल माहौल प्रदान करता है। मेट्रोपॉलिटन इलाकों में बहुत से डिजिटल सिविल सोसाइटी संगठन हैं, जिनके संचालक युवा हैं और डिजिटल उपकरण व माध्यम इस्तेमाल करने की उनकी क्षमता शहरों के भविष्य निर्धारण में सरकारी प्रभुत्व को चुनौती देती नजर आती है। रेजिडेन्ट्स वेलफेयर एसोसिएशन एवं सिविल सोसाइटी संगठन शहरों का मौलिक स्वरूप लौटाने के लिए प्रतिबद्ध हैं।

इसके कुछ उदाहरण हमारे सामने हैं, जैसे युगान्तर ने लॉकडाउन के दौरान झुग्गी-झोंपडि़य़ों की संख्या और आबादी के बारे में पता लगाने के लिए ग्रेटर हैदराबाद म्यूनिसिपल कॉर्पोरेशन में आरटीआइ याचिका दाखिल की। फिर यही जानकारी स्थानीय एनजीओ के साथ साझा की ताकि लक्षित राहत कार्य का बेहतर प्रबंधन किया जा सके। स्थानीय स्तर पर चलाया गया कार्यक्रम हय्या - 'हैल्थ ओवर स्टिग्मा' के तहत स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं को सुरक्षित, गैर आलोचनात्मक यौन एवं प्रजनन स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करने के लिए जवाबदेह ठहराता है, खास तौर पर अविवाहित महिलाओं के लिए। इसी प्रकार बेंगलूरु के ही एक संगठन 'रीप बेनिफिटÓ ने एक सार्वजनिक नागरिक मंच बनाया है। वॉट्सएप चैटबोट, वॉट्सएप वेब और नागरिक फोरम को इसमें शामिल किया गया है। चैटबोट यूजर्स को सादे स्टेप्स के जरिए विभिन्न नागरिक चुनौतियों के विषय में अवगत करवाता है।

हल्के-फुल्के मनोरंजन के साथ ये स्टेप्स यूजर को जोड़े रखने में कामयाब साबित हुए हैं। मान लीजिए आपको सड़क पर चलते हुए एक गड्ढा दिखा तो आप उसके फोटो खींच कर भेज सकते हैं। अब इससे अगले कदम के बारे में सोचिए, आप इस पर कार्रवाई शुरू करने लगें। यहां तकनीक ने एक अभियान को कार्रवाई तक पहुंचाया और समस्या के दर्शक को उसका समाधानकर्ता बना डाला।

'सिविस' संस्था के अनुसार, पर्यावरण विधेयक यदि ज्यादा तकनीकी हो तो सिविल सोसाइटी की भागीदारी से वंचित हो सकता हैै। मार्च 2020 में पर्यावरण मंत्रालय ने कुछ नए नियमों के साथ एक अधिसूचना पत्र का मसौदा प्रस्तुत कर जनता की राय मांगी थी। 'सिविस' ने इस मसौदे को जनता के समक्ष सरल रूप में पेश किया। नतीजा यह रहा कि इसमें ज्यादा से ज्यादा लोग प्रत्यक्ष भागीदारी निभा सके और परामर्श दे सके।

हमें उक्त प्रयासों और समाज से जुड़े ऐसे ही अन्य सराहनीय कदमों को प्रोत्साहित करना चाहिए। अधिक महत्त्वपूर्ण यह है कि हम सभी को इन प्रयासों में भागीदारी की अपनी-अपनी राहें तलाशनी चाहिए। लोकतंत्र में केवल मूकदर्शक बनने से काम नहीं चलेगा। सुशासन का सपना मिलकर साकार करना होगा, केवल उसका उपभोगकर्ता बनने से काम नहीं चलेगा। हम चाहे जो कोई भी हों, सर्वप्रथम हम नागरिक हैं, अपने समाज का एक अंग। मुझे पूरा विश्वास है कि केवल समाज और सामाजिक संस्थाएं ही हैं जो व्यापक जनहित में सरकार की जवाबदेही तय कर सकते हैं और हमारे शहरों को सबके रहने लायक बना सकते हैं। सौभाग्य से हम तकनीक के उस दौर मेें हैं, जहां समाज में भागीदारी करना अपेक्षाकृत अधिक आसान हो गया है। यह केवल कम्प्यूटर या मोबाइल पर क्लिक करने की बात नहीं है। मेरा आशय तकनीकी रूप से सक्षम सामाजिक परिवेश से है, जहां समस्या के समाधान की क्षमताएं विभिन्न चरणों में निहित हैं। ये क्षमताएं नागरिक भागीदारी का लोकतांत्रिकीकरण करने में सक्षम हैं। यानी कि शहर के भविष्य निर्माण में लोगों की सहभागिता तय करने के लिए सहायक सिद्ध हो सकती हैं।

इस डिजिटल युग में सिविल सोसाइटी को और अधिक डिजिटल बनाने की जरूरत है, क्योंकि एक संबद्ध व प्रतिबद्ध डिजिटल समाज ही तकनीकी सहयोग को अधिक जवाबदेह बना सकता है। साथ ही ऐसे घटकों से सुरक्षित रख सकता है जो राजनीतिक और लोकतांत्रिक प्रक्रिया को ठेस पहुंचाने, व्यक्तिगत व सामूहिक एजेंसी का महत्त्व कम करने वाले हों। इस लिहाज से शहरी गतिविधियां काफी संवेदनशील होती हैं। कोरोना महामारी ने हमें इस बारे में सोचने पर विवश किया है कि भविष्य के शहरों का स्वरूप क्या हो? अब नागरिकों के पास शहरी परिवर्तन में भागीदारी निभाने के अवसर और अधिक बढ़ गए हैं। युवा नेता ऐसे विकल्प तैयार करने में जुटे हैं जो सशक्त नागरिकों के लिए अधिक मानवीय माहौल तैयार करने में सहायक हों। ऐसा माहौल जो गांव की आबो-हवा से निकल कर वापस शहर लौटने पर असहनीय नहीं, बल्कि जीवंत लगे।

(ई-गव फाउंडेशन के कनेक्ट फॉर इम्पैक्ट वेबिनार 'हमारे शहरों के निर्माण में नागरिकों और समुदायों की भूमिका' में व्यक्त उद्गारों का रूपांतरण)

सौजन्य -पत्रिका।
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Tuesday, December 22, 2020

निगहबान : सफर मेवाड से पावन रिश्ते का (पत्रिका)

संदीप पुरोहित

राजस्थान पत्रिका सूचनाओं का सम्प्रेषक मात्र नहीं है। लोकशाही के कथित चौथे स्तंभ मीडिया के प्रतिमानों का दर्पण है। समाचार पत्र को जैसा व्यवहार करना चाहिए ठीक उसी के अनुरूप हम कार्य कर रहे हैं। हमारी परिधि के केंद्र में सत्ता लोभ लालच नही हमारा पाठक है। उसी का परिणाम है कि पत्रिका का उदयपुर में 40 वां स्थापना दिवस मनाया।
सत्य परखता, पारदर्शिता, निष्पक्षता और निडरता के कारण ही पाठक और पत्रिका का यह पावन सम्बंध स्थापति हुआ है। हमारे इस सम्बंध के बारे में क्या लिखूं। समझ नहीं आता। इसका क्या वर्णन करूं। जो वर्णन परे है। कहते हैं कि ईश्वर को देखने के लिए मरना होता है। जो तपस्या करके सशरीर देखता है वह सिद्ध होता है। पाठक का और पत्रिका का सम्बंध भी इसी श्रेणी में आता है। हम अपने मूल्यों के तप के साथ अपने अधिपति से रोज मिलते हैं। हमारा पाठक ही हमारा राजहंस हैं।

विगत वर्षो में मेवाड के गौरव और उसकी अस्मिता के मूल्यों के संस्थापन में पत्रिका ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। धरोहर के संरक्षण से लेकर विकास के हर मुददे को उठाया। आदिवासियों को वन अधिकार पत्र दिलाने से लेकर उदयपुर को स्मार्ट सिटी में शामिल कराने में पत्रिका के भागीरथी प्रयासों को कौन नहीं जानता है। झीलों और पहाडों के संरक्षण,पासपोर्ट का कार्यालय, रिंग रोड,सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट, छोटे तलाबों की पैमाइश, उदयपुर-अहमदाबाद आमान परिवर्तन ऐसे अनेक मामले हैं जो पत्रिका ने उठाए। इनकी फेहरिस्त बहुत लंबी है।

पत्रिका की टीम ने बिना राग-द्वेष काम किया। हमने खबरों की मंडी नहीं सजाई बल्कि भाव के भाव, जस के तस जो देखा उसे अपने पाठकों के समक्ष रखा। सदाबाहर के फूलों को कोई भी ऋतु प्रभावित नहीं करती है। ठीक उसी तरह हमारी खबरें कभी भी प्रभावित नहीं होती हैं। हम तो सिर्फ खबरों के ट्रस्टी मात्र हैं।
आदिवासी अंचल के इस क्षेत्र में पत्रिका समाज के आखिरी पायदान पर खड़े लोगों का प्रतिनिधि के रूप में कार्य कर रहा है। उनके संघर्ष की जिजीविषा हमारे लिए चटकारे का विषय नही रहा बल्कि उनके साथ कदम से कदम मिलाकर उनके हक की लडाई लडी है।

पत्रिका कोई सोशल मीडिया या ट्विटर हैंडल से खबरें निकाल कर ड्राइंगरूम की शोभा बढ़ाने वाला समाचारपत्र नहीं है। बल्कि आवाम के दुख दर्द में सहभागी है। हमारी समाचारों में ओज है तो पीड़ित की लाचारियों की अभिव्यक्ति भी है। समाज को बदलने की ललक है पर झूठी जिद नहीं है। कुरीतियों पर प्रहार है पर अपनी मान्यताओं और गौरवमयी परंपराओं के संरक्षण का पावन संकल्प भी है।

भावनाओं की आभामयी रंगिनियों के इंद्नधनुष को कल्पना की उड़ान के साथ, रचना के शिल्प को हम आपके सामने लेकर आते रहेंगे। यह क्रम अनवरत 39 साल से जारी है। जारी रहेगा। 40वां स्थापना दिवस है मना रहे। आपका स्नेह और विश्वास हमें संबल देता है। ताकत देता है। अनैतिकता के खिलाफ लड़ने का साहस देता है। बस यही आकांक्षा है कि आप यह विश्वास बनाए रखें।

सौजन्य - पत्रिका।
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Monday, December 21, 2020

निगहबान : सफर मेवाड से पावन रिश्ते का (पत्रिका)

संदीप पुरोहित

राजस्थान पत्रिका सूचनाओं का सम्प्रेषक मात्र नहीं है। लोकशाही के कथित चौथे स्तंभ मीडिया के प्रतिमानों का दर्पण है। समाचार पत्र को जैसा व्यवहार करना चाहिए ठीक उसी के अनुरूप हम कार्य कर रहे हैं। हमारी परिधि के केंद्र में सत्ता लोभ लालच नही हमारा पाठक है। उसी का परिणाम है कि पत्रिका का उदयपुर में 40 वां स्थापना दिवस मनाया।
सत्य परखता, पारदर्शिता, निष्पक्षता और निडरता के कारण ही पाठक और पत्रिका का यह पावन सम्बंध स्थापति हुआ है। हमारे इस सम्बंध के बारे में क्या लिखूं। समझ नहीं आता। इसका क्या वर्णन करूं। जो वर्णन परे है। कहते हैं कि ईश्वर को देखने के लिए मरना होता है। जो तपस्या करके सशरीर देखता है वह सिद्ध होता है। पाठक का और पत्रिका का सम्बंध भी इसी श्रेणी में आता है। हम अपने मूल्यों के तप के साथ अपने अधिपति से रोज मिलते हैं। हमारा पाठक ही हमारा राजहंस हैं।

विगत वर्षो में मेवाड के गौरव और उसकी अस्मिता के मूल्यों के संस्थापन में पत्रिका ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। धरोहर के संरक्षण से लेकर विकास के हर मुददे को उठाया। आदिवासियों को वन अधिकार पत्र दिलाने से लेकर उदयपुर को स्मार्ट सिटी में शामिल कराने में पत्रिका के भागीरथी प्रयासों को कौन नहीं जानता है। झीलों और पहाडों के संरक्षण,पासपोर्ट का कार्यालय, रिंग रोड,सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट, छोटे तलाबों की पैमाइश, उदयपुर-अहमदाबाद आमान परिवर्तन ऐसे अनेक मामले हैं जो पत्रिका ने उठाए। इनकी फेहरिस्त बहुत लंबी है।

पत्रिका की टीम ने बिना राग-द्वेष काम किया। हमने खबरों की मंडी नहीं सजाई बल्कि भाव के भाव, जस के तस जो देखा उसे अपने पाठकों के समक्ष रखा। सदाबाहर के फूलों को कोई भी ऋतु प्रभावित नहीं करती है। ठीक उसी तरह हमारी खबरें कभी भी प्रभावित नहीं होती हैं। हम तो सिर्फ खबरों के ट्रस्टी मात्र हैं।
आदिवासी अंचल के इस क्षेत्र में पत्रिका समाज के आखिरी पायदान पर खड़े लोगों का प्रतिनिधि के रूप में कार्य कर रहा है। उनके संघर्ष की जिजीविषा हमारे लिए चटकारे का विषय नही रहा बल्कि उनके साथ कदम से कदम मिलाकर उनके हक की लडाई लडी है।

पत्रिका कोई सोशल मीडिया या ट्विटर हैंडल से खबरें निकाल कर ड्राइंगरूम की शोभा बढ़ाने वाला समाचारपत्र नहीं है। बल्कि आवाम के दुख दर्द में सहभागी है। हमारी समाचारों में ओज है तो पीड़ित की लाचारियों की अभिव्यक्ति भी है। समाज को बदलने की ललक है पर झूठी जिद नहीं है। कुरीतियों पर प्रहार है पर अपनी मान्यताओं और गौरवमयी परंपराओं के संरक्षण का पावन संकल्प भी है।

भावनाओं की आभामयी रंगिनियों के इंद्नधनुष को कल्पना की उड़ान के साथ, रचना के शिल्प को हम आपके सामने लेकर आते रहेंगे। यह क्रम अनवरत 39 साल से जारी है। जारी रहेगा। 40वां स्थापना दिवस है मना रहे। आपका स्नेह और विश्वास हमें संबल देता है। ताकत देता है। अनैतिकता के खिलाफ लड़ने का साहस देता है। बस यही आकांक्षा है कि आप यह विश्वास बनाए रखें।

सौजन्य - पत्रिका।
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