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Monday, April 19, 2021

उच्च शिक्षा : विश्वविद्यालय सिखाएं ही नहीं, खुद सीखें भी (पत्रिका)

संजय शर्मा, सहायक प्रोफेसर, डॉ. हरीसिंह गौर, केंद्रीय विश्वविद्यालय, सागर

दुनिया में विश्वविद्यालयों की स्थापना का इतिहास इस बात को दिखाता है कि इन्हें एक विशिष्ट उद्देश्य के तहत स्थापित किया गया। विश्वविद्यालय भौगोलिक सीमाओं और धार्मिक विश्वासों से परे सम्पूर्ण मानवता का पथ-प्रदर्शन करने की भूमिका निभाते हैं। इन ज्ञान केन्द्रों को स्थापित करने का एक अनिवार्य उद्देश्य यह भी होता है कि यह सीखने-सिखाने की परम्पराओं और गतिविधियों को समृद्ध करेंगे। सिखाने के अपने उद्देश्यों में वे आमतौर पर अधिक सक्रिय होते हैं, किन्तु सीखने की संचेतना और प्रक्रिया के संदर्भ में भारतीय विश्वविद्यालय न तो सक्रिय दिखाई पड़ते हैं और न ही इनके भीतर इस तरह की कोई पहल दिखाई पड़ती है। अधिकतर भारतीय विश्वविद्यालयों ने अपने ऐतिहासिक स्थापना के समय से ही दूसरे विश्वविद्यालयों से सीखने को कभी महत्त्व नहीं दिया, जिसका असर यह हुआ कि आज ये विश्वविद्यालय वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान के संकट से जूझ रहे हैं।

ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय की बात करें, तो हम यह पाते हंै कि पिछले नौ सौ वर्षों में इस संस्थान ने स्वयं को आत्मनिर्भर बनाते हुए एक शैक्षिक नेतृत्वकर्ता के रूप में वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान बनाई है। टाइम्स हायर एजुकेशन रैंकिंग (2021) के अनुसार यह संस्थान पिछले पांच वर्षों से दुनिया का सिरमौर बना हुआ है । ब्रिटेन की आर्थिक उन्नति के संदर्भ में ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय की बात करें तो यह विश्वविद्यालय प्रतिवर्ष स्थानीय अर्थव्यवस्था में 2.3 बिलियन पाउंड का योगदान देता है। यहां के लगभग 91 प्रतिशत विद्यार्थी स्नातक पाठ्यक्रम पूरा करने के छह माह के भीतर ही रोजगार से जुड़ जाते हैं। वैश्विक स्तर पर इस विश्वविद्यालय की पहचान के पीछे विश्वविद्यालय से सम्बद्ध अनुषंगी महाविद्यालयों, शोध केंद्रों आदि में अकादमिक, शोध कार्यों तथा उनके समाज-उपयोगी व्यावहारिक अनुभवों से समय-समय पर स्वयं को परिमार्जित करते रहने की सोच है।

यहां यह बात गौरतलब है कि भारत में विश्वविद्यालय एक दूसरे से आपस में सीखते हों, इसका कोई दस्तावेजी और आनुभविक साक्ष्य नहीं मिलता है। यही कारण है कि हमारे यहां बाकी उन्नत राष्ट्रों की तुलना में विरासतीय परम्परा के ऐसे ज्ञान केन्द्रों का अभाव है, जिन्हें आदर्श मान कर कोई संस्थागत मार्गदर्शन प्राप्त किया जा सके। आश्चर्यजनक रूप से आज भी भारत के अधिकतर विश्वविद्यालय अपने एकाकी चरित्र को ही जी रहे हैं। इसका मुख्य कारण यह है कि हमारे विश्वविद्यालयों में दूसरे श्रेष्ठ संस्थाओं से जुड़ कर परस्पर सीखने की संरचनाओं, प्रक्रियाओं एवं अवसरों को महत्त्व नहीं दिया जाता है। अधिकतर विश्वविद्यालयों के पास स्व-मूल्यांकन की कोई व्यवस्थित, ज्ञानात्मक एवं संरचनात्मक दृष्टि नहीं है, ताकि वेे अपने उत्तरोत्तर विकास के लक्ष्य को सदैव अपने सामने रख सकें। देश में कुछ ऐसे भी विश्वविद्यालय हैं, जिनके पास अंतरराष्ट्रीय शिक्षा केन्द्रों में पढ़े शिक्षक मौजूद हैं, किन्तु संस्थानों में मौजूद संरचनात्मक जड़ता, बौद्धिक पदानुक्रम एवं सीखने की संस्कृति के अभाव के कारण उनका रचनात्मक उपयोग संभव नहीं हो पा रहा है। इस संदर्भ में विश्वविद्यालयों की यह नैतिक जिम्मेदारी है कि वे एक दूसरे से सीखते हुए स्वयं को समृद्ध, नवाचारी और जीवंत बनाए रखें।

सौजन्य - पत्रिका।
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नेपाली कांग्रेस की सरकार बनाने की पहल शुभ संकेत (पत्रिका)

के.एस. तोमर, वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक

नेपाल भगवान पशुपतिनाथ की भूमि है। मानवमात्र के लिए वह कल्याणकारी, परम दयालु और शांति प्रदानकर्ता हैं, पर राजनीतिक उथल-पुथल ने इस आध्यात्मिक देश के लोगों को निराशा की ओर धकेल दिया है। वह भी ऐसे वक्त, जब महामारी हर गुजरते दिन के साथ भयावह रूप लेती जा रही है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 2018 में पशुपतिनाथ मंदिर और मुक्तिनाथ मंदिर जाकर पूजा-अर्चना कर दोनों देशों के लोगों के जीवन में शांति, प्रगति और समृद्धि की कामना की थी। उनका विश्वास था कि दोनों देशों के सदियों पुराने संबंध और मजबूत होंगे, पर भारत को तब झटका लगा जब कम्युनिस्टों के नेतृत्व वाली वहां की सरकार ने चीन समर्थक कट्टर नीति अपना ली। कम्युनिस्ट सरकार के प्रधानमंत्री के.पी. ओली ने नया नक्शा खींचते हुए दोनों देशों के संबंधों को खराब करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

उधर, ओली ने अवैध रूप से पिछले वर्ष 20 दिसम्बर को संसद भंग कर दी, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने 24 फरवरी 2021 को अंसंवैधानिक करार देते हुए उन्हें 7 मार्च को संसद में बहुमत साबित करने का आदेश दिया। हालांकि, शीर्ष कोर्ट के एक अन्य आदेश, जिसमें सत्तारूढ़ नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के धड़ों के एकीकरण को रद्द कर दिया गया था, के कारण बहुमत साबित करना स्थगित कर दिया गया।

इस फैसले से सत्तारूढ़ एनसीपी को एक और झटका लगा। दरअसल, आम चुनाव से पहले ओली के नेतृत्व वाली सीपीएन-यूएमएल और पुष्प कमल दहल प्रचंड की कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (माओवादी सेंटर) ने चुनावी गठबंधन किया था। ओली फरवरी 2018 में माओवादी सेंटर के समर्थन से प्रधानमंत्री बन गए। दोनों दलों ने मई 2018 में अपने विलय की घोषणा करते हुए नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी नाम से नया दल बनाया। कोर्ट ने आदेश दिया था कि दोनों धड़ों को अपनी स्वतंत्र पहचान के लिए चुनाव आयोग में जाना चाहिए। इसका मतलब है कि 275 सदस्यों वाली संसद में ओली के पास 121 और दहल के पास 53 सांसद रह जाएंगे। इस अस्थिर परिदृश्य में मुख्य विपक्षी दल नेपाली कांग्रेस ने कम्युनिस्ट पार्टी (दहल के नेतृत्व वाली माओवादी सेंटर) और समाजबादी पार्टी की मदद से वैकल्पिक सरकार बनाने
का फैसला किया है, जिसके लिए बहुमत के जादुई आंकड़े 135 तक पहुंचना मुश्किल नहीं होगा। इससे नेपाली लोगों में आशा का किरण प्रतिबिंबित हुई है।

नेपाली कांग्रेस की यह पहल कामयाब होती है, तो यह भारत के लिए शुभ संकेत होगा। ठीक इसी तरह समाजबादी पार्टी के भी संबंध भारत के साथ मधुर हैं। इसी ने 2015 में मधेशियों के संवैधानिक अधिकारों के संरक्षण के लिए अपनी सरकार को बाध्य किया था। विश्लेषकों का मानना है कि प्रचंड गुट, ओली सरकार से समर्थन वापस लेगा और नेपाली कांग्रेस से हाथ मिला लेगा। उधर, एक ओर चीन ओली को बचाने के लिए खुले रूप से अपने राजदूत होउ यांकी के जरिए नेपाल के आंतरिक मामलों में दखल दे रहा है, तो दूसरी तरफ प्रचंड की सिफारिश पर उन्हीं के दल के सदस्य चार मंत्रियों के पार्टी में न लौटने पर संसद सदस्यता खत्म कर दी गई थी। हालांकि ये सदस्य अगले छह माह के लिए मंत्री पद पर बने रहेंगे।

विशेषज्ञों का मानना है कि जब भी तीनों दल साझा न्यूनतम कार्यक्रम का प्रयास करेंगे, ओली को इस्तीफा देना पड़ जाएगा। तब गेंद राष्ट्रपति बिद्या देवी भंडारी के पाले में आ जाएगी, जो सांसदों की संख्या के मद्देनजर वैकल्पिक सरकार की संभावनाएं तलाशेंगी।

सौजन्य - पत्रिका।
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वियना वार्ता के बहाने शक्ति संतुलन का नया ताना-बाना (पत्रिका)

सुरेश यादव, (अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार)

नतांज परमाणु केन्द्र पर हमले के बाद ईरान ने इस संयंत्र में यूरेनियम का साठ फीसदी तक संवर्धन शुरू कर दिया है। ईरान के इस फैसले ने यह प्रमाणित कर दिया कि दुनिया में शक्ति संतुलन तेजी से बदल रहा है। वियना में विश्व शक्तियां अमरीका की ईरान न्यूक्लियर डील में वापसी के लिए प्रयासरत हैं, पर अमरीकी प्रतिबंधों की मार झेल रहे ईरान के साठ फीसदी संवर्धन के फैसले ने साझा प्रयासों के अर्थ को कम किया है।

विगत एक दशक से रेडियोधर्मी पदार्थ यूरेनियम के दुरुपयोग के लिए चर्चा में रहे ईरान ने 10 अप्रैल को अपने राष्ट्रीय परमाणु तकनीक दिवस के अवसर पर नतांज स्थित भूमिगत परमाणु संयंत्र में स्थापित अत्याधुनिक 164 आइआर-6 व 30 आइआर-5 सेंट्रीफ्यूज मशीनों के उद्घाटन समारोह की नुमाइश कर अपने इरादे अंतरराष्ट्रीय समुदाय के समक्ष स्पष्ट कर दिए थे। इसके अगले ही दिन पावर ग्रिड में आई खामी के कारण संयंत्र को ब्लैकआउट का सामना करना पड़ा और आइआर-1 सेंट्रीफ्यूज मशीनें क्षतिग्रस्त हो गईं। ईरान ने इस घटना को नाभिकीय आतंकवाद करार दिया और अपने क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वी इजरायल को घटना के लिए जिम्मेदार ठहराया।

बेशक इजरायल ने अब तक इस हमले की जिम्मेदारी नहीं ली, पर अमरीकी रक्षा मंत्री लॉयड ऑस्टिन से मुलाकात के दौरान प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने स्पष्ट कर दिया कि परमाणु समझौते को रोकने के लिए उनके बस में जो भी होगा वह करेंगे। बीते वर्ष जुलाई में इसी संयंत्र में विस्फोट से आगजनी, स्टक्सनेट साइबर हमला और शीर्ष परमाणु वैज्ञानिकों की हत्याओं में इजरायल की कथित संलिप्तता के चलते इस ताजा साइबर हमले को लेकर भी इजरायली इंटेलीजेंस एजेंसी मोसाद पर उंगली उठना कोई आश्चर्य की बात नहीं है।

परमाणु शक्ति बनने का ख्वाब देख रहा ईरान अपने महत्त्वपूर्ण परमाणु संवर्धन केन्द्र नतांज की सुरक्षा करने में विफल रहा है। घटना के बाद आइएईए के निरीक्षक दल ने नतांज का दौरा किया और बताया कि ईरान ने यूरेनियम के संवर्धन को साठ फीसदी तक करने की तैयारी लगभग पूरी कर ली है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि परमाणु कार्यक्रम की तैयारी के मुताबिक ईरान एक वर्ष मे ही 'वेपन ग्रेड' का शुद्ध यूरेनियम एकत्रित कर सकता है। ईरान की इस तरह की तैयारी ने षड्यंत्र की उन संभावनाओं को जन्म दे दिया है जिसमें हमले की आड़ में अंतरराष्ट्रीय परमाणु समझौते की सभी शर्तों-मर्यादाओं को बेझिझक तोड़ा जा सके। ईरानी राष्ट्रपति ने भी घटना के महज तीन दिन बाद ही तेजी से संवर्धन शुरू करने के फैसले को इजरायल की 'दुष्टता' का जवाब करार दिया।

भले ही पूर्व अमरीकी राष्ट्रपति ट्रंप के परमाणु समझौते से मई 2018 में बाहर होने और ईरान पर प्रतिबंध लगाए जाने से ईरानी अर्थव्यवस्था मुश्किल में आ गई है, पर ईरान को घरेलू और अंतरराष्ट्रीय मोर्चे पर चीन के रूप में एक बेहतरीन विकल्प मिल गया है। ईरान ने चीन के साथ पिछले माह तेहरान में 400 बिलियन डॉलर की 25 वर्षीय 'कॉम्प्रिहेन्सिव स्ट्रेटजिक पार्टनरशिप' कर मध्य-पूर्व में पश्चिमी गुट को चिंता में डाल दिया है।

बहरहाल, जो बाइडन को ईरानी विदेश मंत्री जावेद जरीफ की 'नो आल्टरनेटिव, नो मच टाइम' की थ्योरी पर समय रहते विचार करना चाहिए। ईरान के इरादे बताते हैं कि वह जल्द नई परमाणु शक्ति बनकर उभरेगा, तो उसे इजरायल की चुनौती का भी सामना करना होगा। इस बीच जिस तरह रूस ने खुलकर ईरान का समर्थन किया है, जाहिर है कि चीन-ईरान-रूस का त्रिकोण क्षेत्र में संतुलन का नया अध्याय लिखेगा।

सौजन्य - पत्रिका।
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बीस साल लम्बी जंग के बाद भी खतरे बरकरार (पत्रिका)

बीस साल लम्बे महायुद्ध के बाद अफगानिस्तान से अमरीका और मित्र देशों की फौज की वापसी का ऐलान हो गया है। फौज हटाने की अटकलें कई साल से चल रही थीं। बाइडन प्रशासन इसे जमीनी हकीकत में तब्दील कर रहा है। ऐलान के मुताबिक फौज की वापसी 1 मई से शुरू होगी। यह प्रक्रिया 9/11 की बीसवीं बरसी यानी 11 सितम्बर तक पूरी हो जाएगी। बीस साल पहले अमरीका के तत्कालीन राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू. बुश ने 'दहशतगर्दी के खिलाफ जंग' का ऐलान करते हुए अपनी फौज अफगानिस्तान भेजी थी, तब अमरीका ने भी शायद कल्पना नहीं की होगी कि यह जंग इतनी लम्बी चलेगी। उसे इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी।

तालिबान के सर्वोच्च कमांडर मुल्ला उमर का यह कथन काफी हद तक सही साबित हुआ कि 'दुनियाभर की घडिय़ां अमरीकियों के पास हैं, लेकिन वक्त हमारे साथ है।' तालिबान के खिलाफ इस जंग में अमरीका को अपने 2,400 फौजी गंवाने पड़े। अब तक वह 150 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च कर चुका है। अब जबकि फौज की वापसी पर फैसला हो चुका है, अमरीका के पास गिनाने के लिए कई उपलब्धियां हैं। यह कि ओसामा बिन लादेन मारा गया, सामूहिक रक्षा जिम्मेदारियों के लिए नाटो देशों को एकजुट किया, पाकिस्तान को तटस्थ रहना सिखाया, आतंकी नेटवर्क को तहस-नहस किया, सऊदी अरब और तालिबान के रिश्तों के तार काटे आदि।

इन तथाकथित उपलब्धियों से इतर गौर किया जाए, तो अफगानिस्तान में हालात बद से बदतर हुए हैं। इस देश में सभ्यता सदियों से अवनति की ओर लुढ़कने को अभिशप्त है। उन्नीसवीं सदी में वहां रूस और ब्रिटेन ने 'बड़ा खेल' खेला। फिर 1979 में सोवियत फौज ने काबुल में दाखिल होकर खून-खराबा मचाया। तभी से अफगानिस्तान जंग के मैदान में तब्दील होने लगा था। रही-सही कसर मध्ययुगीन कल्पना लोक में जीने वाले तालिबान ने पूरी कर दी, जिसने अफीम और सूखे मेवे उगलने वाली जमीन पर उन्मादी जिहादियों की प्रयोगशालाएं खड़ी कर दी। बीस साल लम्बे महायुद्ध के बावजूद इन प्रयोगशालाओं का पूरी तरह सफाया नहीं हुआ है। भारत समेत दूसरे दक्षिण एशियाई देशों की चिंता का यह सबसे बड़ा सबब है।

अमरीकी फौज जब तक अफगानिस्तान में थी, तालिबान गुफाओं में दुबका हुआ था। फौज हटने के बाद उसके फिर सक्रिय होने का खतरा मंडरा रहा है। भारत के लिए इस लिहाज से यह बड़ा खतरा है कि तालिबान उसके खिलाफ जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा सरीखे आतंकी संगठनों की मदद करता रहा है। भारतीय संसद पर हमला करने वाले जैश के आतंकियों ने तालिबान से प्रशिक्षण हासिल किया था। तालिबान को हद में रखने के लिए भारत को पड़ोसी देशों के साथ मिलकर कूटनीतिक अभियान शुरू कर देना चाहिए। अफगानिस्तान में राजनीतिक स्थिरता और शांति बहाली के लिए भी भारत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

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आधी आबादी: वैचारिक शक्ति के मामले में पुरुषों से कमजोर नहीं हैं महिलाएं (पत्रिका)

ज्योति सिडाना, समाजशास्त्री

प्रसिद्ध नारीवादी वर्जिनिया वुल्फ ने अपनी एक चर्चित पुस्तक में लिखा था कि महिला का अपना खुद का कमरा/ स्पेस होना चाहिए, जहां वह स्वयं को इतना स्वतंत्र अनुभव करे कि वह खुद को काल्पनिक एवं गैर-काल्पनिक (फिक्शन एवं नॉन-फिक्शन) दोनों रूपों में देख सके। जिस तरह काल्पनिक लेखन करते समय हम स्वतंत्र होकर जो मन में आता है वह लिखते हैं और अपनी कल्पनाओं को उड़ान देते हैं, ठीक उसी प्रकार निजी स्पेस में महिला को बिना किसी भय के हर स्तर की उड़ान भरने की स्वतंत्रता प्राप्त करनी चाहिए, ताकि उसकी सूक्ष्म और वृहद् स्तर की बौद्धिकता प्रतिबिंबित हो सके। वुल्फ तर्क देती हैं कि महिलाओं की कथा साहित्य लेखन में कम उपस्थिति का कारण उनमे प्रतिभा की अनुपस्थिति की बजाय अवसर की कमी का परिणाम है।

महिलाओं को सिर्फ शरीर के रूप में ही देखा जाता है। इसी वजह से महिलाओं के खिलाफ हिंसा और अपराध की घटनाओं में लगातार वृद्धि हो रही है। उसके पास ज्ञान, अर्थतंत्र, शक्ति, विचार और राजनीतिक समझ भी है, लेकिन इसकी हमेशा से उपेक्षा की जाती रही है। समाज में अनगिनत ऐसे उदाहरण हैं, जो यह सिद्ध करते हैं कि महिलाओं की इन सभी क्षेत्रों में सक्रिय सहभागिता रही है। मुश्किल यह है कि समाज उसके शरीर को केंद्र में रखकर इन सभी प्रक्रियाओं में उसकी सहभागिता और योगदान को हाशिए पर धकेल देता है। ऐसा नहीं है कि प्राचीनकाल से अब तक महिलाओं की स्थिति में कोई सकारात्मक बदलाव नहीं आया हो, परन्तु यह भी सच है कि महिलाओं के प्रति पुरुष समाज की मानसिकता में कोई विशेष परिवर्तन नहीं आया।

एक समतामूलक और लैंगिक विभेद मुक्त समाज के निर्माण के लिए आवश्यक है कि किसी एक जेंडर का किसी दूसरे जेंडर पर प्रभुत्व स्थापित न हो। दोनों में कोई एक दूसरे से श्रेष्ठ या अधीनस्थ नहीं है, अपितु समान है। महिलाओं के प्रति समाज की सोच को बदलना होगा। महिलाओं की प्रतिभा को कम करके आंकना, उन्हें परिवार तक सीमित रखने का तर्क देना, उन्हें केवल शरीर के रूप में स्वीकारना, यह मानना कि उनमें निर्णय लेने की क्षमता का अभाव होता है, कुछ ऐसे पक्ष हैं जो उन्हें भय मुक्त होकर अपनी अस्मिता को स्थापित करने से रोकते हैं। इसलिए उसे एक सुरक्षित समाज बनाने के लिए इन सब बाधाओं को समाप्त कर सशक्तीकरण का रास्ता तलाशना है।

सौजन्य - पत्रिका।
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Sunday, April 18, 2021

यदा यदाहि... (पत्रिका)

- गुलाब कोठारी

समय आ गया है भीतर के कृष्ण को जगाने का। हर व्यक्ति के भीतर बैठा है:-

'ईश्वर: सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।' (गीता 18/61)
उसने मानव जाति को आश्वासन भी दिया है:-
'परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥' (गीता 4/8)

आज केवल भारत में ही नहीं, सम्पूर्ण विश्व में मानव जीवन चरमरा उठा है। त्राहि-त्राहि मच रही है। भविष्य के संकेत सुख का आश्वासन भी नहीं दे रहे। कोरोना का असुर किसी भी दूसरी महामारी से बड़ा होता जा रहा है। पहले अपना परिचय दे गया था। हमने हल्के में लिया और मान बैठे कि भगा दिया साऽऽऽले को। निकल पड़े सड़कों पर, बेधड़क होकर-मानो 'हम चौड़े, सड़कें छोटी।'

अहंकार की सीमा नहीं होती। यही बुद्धिजीवियों की पहचान होती है। हरिद्वार में महाकुंभ की घोषणा कर दी। दक्षिण-पूर्व के पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव घोषित कर दिए। हर तरफ मानो संक्रमितों की बाढ़ आ गई। स्थान कम पड़ गए; डॉक्टर, अस्पताल और ऑक्सीजन कम पड़ गए। केवल वैक्सीन के भरोसे इतना बड़ा झंझावत कैसे नियंत्रण में आएगा? श्मशानों की स्थिति दिनों-दिन वीभत्स होती जा रही है। न प्रशासन ने कुंभ रोका, न ही मुख्य चुनाव आयुक्त ने चुनावों को। सबको अपनी-अपनी मूंछ का सवाल बड़ा लग रहा है। मरे कोई, इनकी बला से।

ऐसा नहीं है कि प्राकृतिक आपदा पहले कभी न आई हो। अकाल तो राजस्थान की मुख्य पहचान रहा है। बाढ़ देश के कई प्रदेशों (असम-बिहार जैसे) में हर साल ताण्डव करती आई है। भूकम्प के झटके भी धरती को हिलाते रहे हैं। फिर भी आज के कोरोना का वातावरण भिन्न है। मानो इंसान का इंसान से मिलना अपराध हो गया। बिना चुनाव लड़े हर व्यक्ति अपने बाड़े में बन्द रहने को मजबूर हो रहा है। एक-एक करके शहरों में लॉकडाउन या कफ्र्यू लगने शुरू हो गए। उद्योग फिर से बन्द हो रहे हैं, पलायन का ज्वार चढऩे लगा है। स्कूलें बंद, बच्चे टीवी पर। कार्यालयों पर इस बार बड़ी और लम्बी अवधि की गाज गिरने वाली है। कोरोना की दूसरी लहर, पहली लहर से अधिक प्राणलेवा साबित हो रही है। असर भी लम्बे काल तक दिखाई पड़ रहा है। शास्त्रों में सुनते आए हैं कि कलियुग के बाद प्रलय आती है। यदि हम नहीं जागे और सरकारों के भरोसे बैठै रहे, तो आ भी सकती है।

कभी नहीं! हर्गिज नहीं आने देंगे। इस बार विश्व को दिखा देंगे कि आज भी भारत विश्व गुरु है-कल भी रहेगा। हमें 'वसुधैव कुटुम्बकम्' का नारा दोहरा देना है। यह आपातकाल भयंकर है तो हम भी कम नहीं हैं। हर व्यक्ति, हर समाज को इस युद्ध में अपनी पहचान मिटाकर माटी का कर्ज चुकाने के लिए कूद पडऩा है। 'सामूहिक सेवा, घर-घर सेवा', 'नर सेवा ही नारायण सेवा', 'परहित सरिस धर्म नहीं भाई...।' ऐसे कई उद्घोष याद हैं हमको। कोरोना के दो मुख्य निर्देश हैं-मास्क लगाओ, दूरी बनाकर रखो। जिस प्रकार हवा में रोग फैल रहा है, दूरियां भी कितनी कारगर होंगी? सरकारें तो इससे ज्यादा कारगर नहीं होने वाली। इनको तो जीत के जुलूस निकालने दें। हमें तो अपनी रक्षा स्वयं करनी है। अपने बूते पर। 'पत्रिका' के भरोसे। चौबीस घंटे, चौबीस कैरेट के विश्वास के साथ। कई तरह की बाधाएं आने वाली हैं। सरकारें अपना काम करें। हमें तो कोरोना से जंग की कमान अपने हाथ में ले लेनी है। पलायन करने वालों के साथ पिछली बार क्या हुआ था, याद होगा।

हर व्यक्ति कोरोना-कर्मवीर बन जाए। जरूरी सामग्री और जरूरी सूचना पहुंचने में रुकावट न आए। अपने-अपने मोहल्ले के प्रत्येक घर में तन-मन-धन से मदद पहुंचानी है। जरा चूके, तो घर वाले भी शत्रु साबित हो सकते हैं। कोरोना की लड़ाई भी आजादी की लड़ाई से कम नहीं, जहां हर व्यक्ति अपने घर में कैद है।

आज देश में 2-2 लाख लोग प्रतिदिन संक्रमित हो रहे हैं। संक्रमितों की मौत का आंकड़ा भी चिंता पैदा कर रहा है। पिछले चौबीस घंटों में ही 1341 जनों की मौत हो गईं। कहीं ऑक्सीजन की कमी की शिकायतें आ रहीं हैं तो कहीं वैक्सीन की। महाराष्ट्र में तो जैसे सरकारी इंतजामों की परीक्षा हो रही है। कल तक चौबीस घंटे में वहां नए संक्रमित 64 हजार के करीब थे। प्रदेशों में भी संक्रमण और मौतों के रोज नए कीर्तिमान बनते दिख रहे हैं। राजस्थान में तो एक्टिव केस 50 हजार के पार हो चुके हैं। इधर केन्द्र सरकार का दावा है कि12 करोड़ पात्र लोगों को टीका लग चुका है। लेकिन टीके की यह रफ्तार क्या संक्रमण की शृंखला को जल्दी ही तोड़ पाएगी? चुनाव परिणामों के बाद यह आंकड़ा कहां पहुंचेगा, कहा नहीं जा सकता। दो दिन पहले के ही आंकड़े बता रहे हैं कि एक पखवाड़े में ही चुनाव वाले राज्य, पश्चिम बंगाल में 420 फीसदी, असम में 532 फीसदी, तमिलनाडु में 159 फीसदी, केरल में 103 फीसदी व पुड्डुचेरी में कोरोना संक्रमण के165 फीसदी केस बढ़ गए। इन राज्यों में मौतों में भी औसतन 45 फीसदी का इजाफा हुआ।

सत्ता के मतवाले आज भी लाखों लोगों की जानें चुनाव में झौंककर सत्ता के गीत गा रहे हैं। कोई कानून उनको रोकने में सक्षम दिखाई नहीं देता। जैसे अपराधियों को चुनाव लडऩे से रोकने वाला कोई नहीं है। लोगों को कोरोना से बचाने की तस्वीर भी देश के सामने स्पष्ट है। हमको ही अपने जीवन को बचाने के लिए मिल-जुलकर संघर्ष करना पड़ेगा। कहते हैं कि-आप मरे बिना स्वर्ग नहीं मिलता। गड़ जाओ जमीन में-बांट दो छाया और फल समाज को-पेड़ बनकर। विश्व में यह चमत्कार केवल भारत में ही देखा जाता है। कर दिखाओ, इस बार भी। पत्रिका साथ-साथ है, गांव-गांव है।

सौजन्य - पत्रिका।
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Friday, April 16, 2021

साइंस एंड टेक : ब्लू ऑरिजिन मिशन के अंतरिक्ष में कदम (पत्रिका)

डैल्विन ब्राउन (इनोवेशंस रिपोर्टर)

द वॉशिंगटन पोस्ट
अंतरिक्ष पर्यटन हमेशा ही लोगों को आकर्षित करता रहा है। इंसान को अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन तक पहुंचाने के लिए अमेजन के संस्थापक जेफ बेजोस की निजी स्पेस कम्पनी ब्लू ऑरिजिन के मिशन ने भी कदम बढ़ाए हैं। ब्लू ऑरिजिन ने बुधवार को अपने सब-ऑर्बिटल स्पेस फ्लाइट न्यू शेपर्ड के जरिए 'एस्ट्रोनॉट रिहर्सल' को सफलतापूर्वक अंजाम दिया। बताते चलें कि न्यू शेपर्ड पूरी तरह ऑटोनॉमस सिस्टम है। ब्लू ऑरिजिन के कार्मिकों ने अंतरिक्ष यात्री के रूप में जाने से पहले कैप्सूल में प्रवेश किया। इस वर्ष यह दूसरी बार था जब रॉकेट सफलतापूर्वक लांच हुआ। ब्लू ऑरिजिन ने इसके लिए पूरी तैयारी कर रखी थी क्योंकि उसे उम्मीद है कि एक दिन आएगा जब मिशन किराया भुगतान कर अंतरिक्ष यात्रा करने वालों को साथ लेकर जाएगा। पश्चिमी टेक्सास में ब्लू ऑरिजिन की लांच साइट से शुरू हुआ यह मिशन अंतरिक्ष यात्रियों के लिए एक कदम का गवाह बना।

ब्लू ऑरिजिन ने एक बयान में कहा है कि रिहर्सल के एक हिस्से के रूप में आज हमारा कदम ठीक उसी दिशा में उठा है जैसा कि भविष्य में यात्री लांच के दिन अनुभव करेंगे। कंपनी ने इस आयोजन को लाइव दिखाया। कैप्सूल के लैंडिंग के वक्त बादलों में धूल के गुबार दिखाई पड़ रहे थे। लांचिंग से स्टैण्ड-इन एस्ट्रोनॉट्स ने लांच टावर पर चढ़कर चालक दल के चैम्बर में कदम रखा। उन्होंने खुद को उपकरणों से सुसज्जित किया और कमांड सेंटर के साथ संचार माध्यमों की जांच की। उन्होंने 60 फुट लम्बे रॉकेट के क्रू क्वार्टर्स से निकलने के पहले दरवाजे को धीरे से बंद किया। न्यू शेपर्ड उड़ान भरता हुआ 60 मील से अधिक 'कारमन लाइन' (जिसे उस बिन्दु के रूप में पहचाना जाता है जहां से अंतरिक्ष शुरू होता है, यह लाइन पृथ्वी के वायुमंडल से बाह्य अंतरिक्ष को अलग करती है) तक गया। इसके बाद बूस्टर्स चालक दल के कैप्सूल से अलग हो गए और धीरे-धीरे पृथ्वी पर उध्र्वाधर लैंडिंग के लिए वापस चले गए। इंजन से अलग होने के बाद क्रू कैप्सूल ने कुछ मिनट माइक्रो ग्रैविटी में बिताए। यात्रा का कुल समय सिर्फ दस मिनट से ज्यादा का रहा। वर्ष 2015 के बाद से कंपनी की यह 15वीं टेस्ट फ्लाइट थी। इस अभ्यास को एनएस-15 नाम दिया गया है। कंपनी का कहना है कि उसका एयरक्राफ्ट बहुत जल्द ही यात्रियों को अंतरिक्ष में ले जाएगा।

न्यू शेपर्ड को इस तरह डिजाइन किया गया है कि उसमें छह यात्री जा सकते हैं। इसमें बड़ी खिड़कियां लगी हैं जिससे यात्री बाहर के दृश्यों का आनंद ले सकते हैं। व्हीकल का नामकरण 1961 में अंतरिक्ष में उड़ान भरने वाले पहले अमरीकी एलेन शेपर्ड के नाम पर किया गया। स्पेसएक्स संभवत: इस वर्ष तक सबसे पहले सभी सिविलियन क्रू को अंतरिक्ष में ले जाने की योजना बना रहा है। दशकों के सरकारी एकाधिकार के बाद इंसान की अंतरिक्ष यात्रा जल्द ही निजी उद्यम बन सकती है। ब्रिटिश उद्यमी रिचर्ड ब्रैनसन की कंपनी वर्जिन गैलेक्टिक भी इसी दिशा में प्रयासरत है।

सौजन्य - पत्रिका।
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Wednesday, April 14, 2021

बाबा साहेब आम्बेडकर जयंती विशेष: सामाजिक जनतंत्र की उदात्त दृष्टि के प्रणेता (पत्रिका)

कलराज मिश्र, राज्यपाल (राजस्थान)

बाबा साहेब आम्बेडकर के चिंतन और उनकी उदात्त दृष्टि पर जब भी मन जाता है, सामाजिक जनतंत्र के लिए किए उनके कार्य जहन में कौंधने लगते हैं। संविधान सभा की आखिरी बैठक में भी उनका उद्बोधन सामाजिक जनतंत्र पर ही केंद्रित था। उनका कहना था कि जाति प्रथा और लोकतंत्र साथ-साथ नहीं रह सकते। इसीलिए भारतीय संविधान में ऐसे नियमों की पहल हुई जिनमें देश में किसी भी हिस्से में रहने वाले नागरिकों के लिए जातीय और भाषायी आधार पर कोई भेद-भाव नहीं हो। संविधान का जो प्रारूप उन्होंने बनाया उसमें मूल बात यही थी कि प्रथमत: देश के सभी नागरिक भारतीय हैं और बाद में उनकी कोई और पहचान। नवम्बर, 1948 में उन्होंने कहा था कि हमने भारत वर्ष को राज्यों का संघ नहीं, बल्कि एक संघ राज्य कहा है। वह भारत में सामाजिक विभक्तिकरण से चिंतित थे इसीलिए उन्होंने कहा कि लोकशाही की राह के रोड़ों को हमें पहचानना ही होगा क्योंकि जनतंत्र में जनता की निष्ठा की नींव पर ही संविधान का भव्य महल खड़ा हो सकता है।

बाबासाहेब ने इस बात पर भी जोर दिया कि राष्ट्र कोई भौतिक इकाई नहीं है। राष्ट्र भूतकालीन लोगों द्वारा किए गए सतत प्रयासों, त्याग और देशभक्ति का परिणाम है। राष्ट्रीयता सामाजिक चेतना है और इसी से बंधुता की भावना विकसित होती है। इसमें संकीर्णता के विचार सबसे बड़ी बाधा है। बतौर भारतीय संविधान शिल्पी उन्होंने फ्रेंच रेवलूशन से तीन शब्द लिए - 'लिबर्टी, इक्वलिटी और फ्रैटर्निटी'। संविधान के मूल में सम्मिलित इन शब्दों ने उनके राजनीतिक और सामाजिक जीवन दर्शन को भी गहरे से प्रभावित किया। इसीलिए संविधान के मूल अधिकारों में अनुच्छेद 14 से 18 के माध्यम से समानता के अधिकार की व्याख्या है। इसी संबंध में संविधान के अनुच्छेद 19 से 22 के माध्यम से स्वतंत्रता का अधिकार दिया गया है और अनुच्छेद 23 और 24 में शोषण के विरुद्ध अधिकार दिया गया है। अनुच्छेद 19(2) में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार में भी किसी भी जाति, वर्ग या समुदाय के विरुद्ध अनर्गल अभिव्यक्ति को बाधित किया गया है। संविधान के अंतर्गत इसमें किसी भी तरह देश की सुरक्षा, सम्प्रभुता और अखंडता को नुकसान नहीं होना चाहिए और इनके संरक्षण के लिए अगर कोई कानून है या बन रहा है, तो उसमें भी बाधा नहीं आनी चाहिए। अनुच्छेद 25 से 28 के माध्यम से भारतीय संविधान में धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार दिया गया है। मैं यह मानता हूं कि विश्वभर के संविधानों में यह भारतीय संविधान ही है जिसमें इस तरह से मूल अधिकारों की विषद् व्याख्या की गई है।

बंबई की महिला सभा में उन्होंने कहा था - 'नारी राष्ट्र की निर्मात्री है, हर नागरिक उसकी गोद में पलकर बढ़ता है, नारी को जागृत किए बिना राष्ट्र का विकास संभव नहीं है।' भारतीय संदर्भ में संभवत: वह पहले ऐसे अध्येता थे जिन्होंने जातीय संरचना में महिलाओं की स्थिति को जेंडर की दृष्टि से समझने की कोशिश की। उनका मूल दृष्टिकोण यही था कि कैसे समाज में सभी स्तरों पर समानता की स्थापना हो। इसीलिए उन्होंने समाज को श्रेणीविहीन और वर्णविहीन करने पर निरंतर जोर दिया। उनका यह कहा तो सदा ही मन को आलोकित करता है कि 'क्रांति लोगों के लिए होती है, न कि लोग क्रांति के लिए होते हैं।' यहां यह जानना भी जरूरी है कि संविधान में अनुच्छेद 370 उनकी इच्छा के विरुद्ध जोड़ा गया था। बाबासाहेब के समग्र चिंतन और दृष्टि को एकांगी दृष्टि से देखने की बजाय उस पर समग्रता से गहराई से विचार करने की जरूरत है। ऐसा करेंगे तो पाएंगे कि देश की एकता और अखण्डता के साथ समानता के बीज वहां पर हैं। समानता और न्याय के साथ 'बहुजन हिताय बहुजन सुखाय' का उनका दर्शन इसीलिए आज भी प्रासंगिक है और आने वाले कल में भी प्रासंगिक रहेगा।

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भीमराव आम्बेडकर जयंती : नई पीढ़ी की परवरिश में बाबासाहेब के विचारों का समावेश ही सच्ची श्रद्धांजलि (पत्रिका)

विजय रूपाणी, मुख्यमंत्री, गुजरात

Babasaheb BR Ambedkar Jayanti : बाबा साहेब भीमराव आम्बेडकर (1891-1956) आधुनिक भारत के अग्रणी राष्ट्र निर्माताओं में से एक थे। वे कई पहलुओं में अपने समकालीन नेताओं से अलग थे। वे महान विद्वान, सामाजिक क्रांतिकारी और राजनेता थे, जिनमें ऐसी विशेषताओं का संयोजन था जो उन्हें उस समय के दूसरे बौद्धिक व्यक्तियों से अलग बनाता था। एक बौद्धिक और रचनात्मक लेखक के रूप में उन्होंने ज्ञान को पूर्ण रूप से आत्मसात किया था। राजनीति में अपनी विद्वत्ता का अनुसरण करते हुए उन्होंने अपने समय के महत्त्वपूर्ण विषयों को समझा और भारतीय समाज की समस्याओं का समाधान खोजा। भारत में 1920 से 1950 के दशक के मध्य तक शायद ही ऐसा कोई विषय रहा होगा जिसके समाधान के लिए उन्होंने संघर्ष न किया हो, फिर चाहे वह राज्यों के पुनर्गठन की बात हो या फिर विभाजन की। संविधान निर्माण की प्रक्रिया हो या फिर स्वतंत्र भारत के लिए राजनीतिक और आर्थिक ढांचे का सवाल हो।

एक विचारक और बुद्धिजीवी का मूल्यांकन इस बात पर नहीं होता कि वे प्रश्न का क्या उत्तर देते हैं, बल्कि इस बात से होता है कि वे क्या सवाल उठाते हैं? बाबासाहेब ने अपने समय में कुछ ऐसे महत्त्वपूर्ण विषयों को उठाया जिनके बारे में बात करने में उस समय के बड़े व्यक्तित्व वाले व्यक्ति भी छोटे पड़ जाते थे। अपने तीन दशक से अधिक के सार्वजनिक जीवन के दौरान वह दृढ़ता से यह मानते रहे कि राजनीति न्याय के लिए लडऩे का साधन होना चाहिए, ताकि स्वतंत्र भारत के सभी नागरिक सही मायनों में स्वतंत्रता का अनुभव कर सकें।

स्वतंत्र भारत के संविधान निर्माता बाबासाहेब ने भारत में वर्तमान लोकतांत्रिक व्यवस्था की भी नींव रखी थी। उनका मानना था कि लोकतंत्र की जड़ें सरकार के स्वरूप में नहीं, बल्कि सामाजिक संबंधों में निहित होती हैं। वे जानते थे कि भारत में जाति व्यवस्था, लोकतंत्र के मार्ग में एक गंभीर समस्या है। इसी संदर्भ में उन्होंने एक बार कहा था, 'लोकतंत्र के सफल संचालन के लिए सबसे पहली शर्त यही है कि समाज में किसी भी प्रकार की कोई विषमता नहीं होनी चाहिए। दूसरा यह कि शोषितों और पीडि़तों के हितों की रक्षा के लिए और उनके दु:खों को कम करने के लिए वैधानिक प्रावधान होना चाहिए। सामाजिक स्वतंत्रता को सुनिश्चित करने के लिए समाज स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के सिद्धांतों पर आधारित होना चाहिए।' इसी विचार के संबंध में वे अक्सर अपने वक्तव्यों में अमरीका के पूर्व राष्ट्रपति और महान वक्ता अब्राहम लिंकन को संदर्भित भी किया करते थे, जिन्होंने एक बार कहा था कि 'ऐसा घर जिसके लोग स्वयं का ही नुकसान करने में लगे हुए हों, वह घर कभी समृद्ध नहीं बन सकता है।'

यह बहुत ही दुर्भाग्य की बात है कि महान मानवतावादी भीमराव आंबेडकर केवल शोषित समुदाय के सबसे बड़े उद्धारक के रूप में ही जाने जाते हैं, जबकि उनकी महानता इससे भी बहुत आगे थी। वह केवल भारतीय समाज में छुआछूत की समस्याओं से ही चिंतित नहीं थे। उन्होंने मानव जीवन के हर पहलू को छुआ था, जिनमें सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक, मानवशास्त्रीय, धार्मिक, ऐतिहासिक, जाति वगैरह शामिल हैं। वह चाहते थे कि भारत में सामाजिक लोकतंत्र को संजोना चाहिए। संविधान को लागू करते हुए उन्होंने इस दिशा में राष्ट्र को बताया था कि, '26 जनवरी 1950 को, हम अपने अंतर्विरोधों के जीवन में प्रवेश करने जा रहे हैं।' उस समय उन्होंने ऐसा इसलिए कहा था क्योंकि कई दशकों बाद देश एक संविधान की सीमा में बंधने जा रहा था और ऐसे में यह बहुत ही स्वाभाविक था कि हमें कई सामाजिक अंतर्विरोधोंं का सामना करना पड़े। लेकिन यह तब की बात थी। और आज आजादी के इतने वर्षों बाद, यह चर्चा करना जरूरी है कि बाबासाहेब ने जिस दिशा में भारत को आगे बढ़ाया था, क्या भारत आज उसी दिशा में आगे बढ़ रहा है? क्या जिन अंतर्विरोधों के बीच भारत के संवैधानिक लोकतंत्र की शुरुआत हुई थी, आज भी हमारा देश उन्हीं अंतर्विरोधोंं से गुजर रहा है? क्या भारत देश, भारतीय समाज, भारतीय राजनीति और भारतीय अर्थनीति बाबासाहेब के सिद्धांतों के तहत आगे बढ़ रही है जिसके लिए उन्होंने अपना जीवन समर्पित किया? वर्तमान परिदृश्य का यदि गहरा विश्लेषण किया जाए तो यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि बाबासाहेब ने संघर्ष के जो बीज बोए थे वो अब फलदार हो रहे हैं। आज का भारत पहले से कहीं अधिक संयुक्त और विविधिता में एकता से परिपूर्ण है। आज एक ओर देश के हर कोने में सामाजिक समरसता है तो वहीं हर वर्ग को समानता का अधिकार भी है। आज भारत न केवल आर्थिक तौर पर यानी व्यापार, उद्योग और रोजगार के दृष्टिकोण से सशक्त है, बल्कि सामाजिक तौर पर भी यानी शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छता और सुरक्षा की दृष्टि से भी काफी मजबूत हो रहा है। जहां पहले भारत अपनी गरीबी और छुआछूत के लिए कुख्यात था, वहीं आज भारत देश अपने संघीय ढांचे, मजबूत लोकतंत्र और नागरिकों की सामनता के लिए पूरे विश्व में अपनी अलग पहचान रखता है।

देश की इस उपलब्धि के पीछे नि:संदेह देश की समस्त राज्य और केंद्र सरकारों का योगदान रहा है लेकिन मैं यह पूरे विश्वास और गर्व से कह सकता हूं कि पिछले दो दशक से भी अधिक समय से जिस तरह से गुजरात सरकार ने राज्य में बाबासाहेब के विचारों को अपनी योजनाओं और नीतियों में समाहित किया है वह सही मायने में उनके प्रति हमारी एक सच्ची श्रद्धांजलि है। आज देश बाबासाहेब की 130वीं जन्मजयंती मना रहा है। इस अवसर पर यदि भारत उनको सच्ची श्रद्धांजलि देना चाहता है, तो ऐसा करने का सबसे अच्छा तरीका यह होगा कि नई पीढ़ी की परवरिश में बाबासाहेब के विचारों को पिरोया जाए और उनके सपनों को फलीभूत बनाया जाए।

इस तथ्य में भी कोई संशय नहीं है कि बाबासाहेब ने अपने संघर्षों और अपने दूरदर्शी विचारों का ऐसा दर्पण प्रस्तुत किया है जो हमें चिरकाल तक विषम परिस्थितियों से लडऩे और आगे बढऩे के लिए प्रेरित करता रहेगा और मार्गदर्शन भी देता रहेगा। सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास के विचार के साथ हमें आगे बढ़ते रहना होगा ताकि हम भविष्य में बाबासाहेब भीमराव आम्बेडकर के सपनों के भारत को निर्मित कर सकें।

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कोरोना से जंग : टीकाकरण बढ़ने पर ही होगा सुरक्षा घेरा मजबूत (पत्रिका)

कोरोना संक्रमण के बनते जा रहे भयावह हालात के बीच यह राहत की खबर है कि केन्द्रीय औषधि मानक नियामक संगठन (डीसीजीआइ) ने रूसी वैक्सीन स्पूतनिक-वी के भी भारत में आपात इस्तेमाल की अनुमति दी है। संक्रमण के प्रसार को रोकने के लिए वैक्सीन लगाने की प्रक्रिया में तेजी होनी ही चाहिए। ऐसे में देश में दो की जगह पांच-सात तरह की वैक्सीन भी उपलब्ध हो सकें, तो इसमें हर्ज ही क्या है। इसलिए स्पूतनिक-वी के भारत में आपात इस्तेमाल को मंजूरी मिलने का स्वागत किया जाना चाहिए। अब विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) से मंजूर दूसरी वैक्सीन का भारत में आपात इस्तेमाल का मार्ग भी प्रशस्त हो गया है। संकट के इस दौर में इंसान की जान बचाना ही सबकी प्राथमिकता होनी चाहिए।

बेहतर वैक्सीन चाहे देश में बनी हो या फिर विदेश में, उनकी व्यापक उपलब्धता ज्यादा जरूरी है, क्योंकि टीकों की उपलब्धता यदि आबादी के हिसाब से नहीं हुई, तो प्रक्रिया में समय लगने के साथ-साथ संक्रमण का खतरा लगातार बना रहेगा। हमारे यहां कोविशील्ड और कोवैक्सीन लगना जब से शुरू हुईं, तब से टीकाकरण की गति दुनिया के दूसरे कई देशों की अपेक्षा कहीं बेहतर है। लेकिन, संक्रमण से ज्यादा प्रभावित महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, कर्नाटक, केरल और पंजाब में जिस गति से टीकाकरण होना चाहिए था, वह दिख नहीं रहा।

पिछले दिनों टीकों की कमी को लेकर आई खबरों के बीच विपक्ष ने भी कई सवाल खड़े किए। खास तौर से यह कि सरकार अपने देश के लोगों को खतरे में डालकर दुनिया के दूसरे देशों को वैक्सीन क्यों भेज रही है? इस बीच रूस तक ने संकेत दिया है कि वह भारतीय टीके का रूस में भी उत्पादन कर सकता है। सही मायने में चुनौती के इस दौर में फार्मा क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक-दूसरे के सहयोग की ज्यादा जरूरत है। ऐसे में दुनिया के तमाम सक्षम देशों को आगे आना चाहिए। देश में अभी टीकों की मांग और आपूर्ति के बीच बड़ा अंतर है। सबसे बड़ी समस्या यह भी है कि पात्र श्रेणी के सभी लोगों तक टीके की पहुंच हो ही नहीं पाई है। टीकों को लेकर जनजागरूकता का अभाव भी समस्या है। टीकाकरण को लेकर लोगों में बैठे डर व भ्रांतियों को दूर किए बगैर कोविड से सुरक्षा का घेरा मजबूत करना आसान नहीं होगा।

हमें यह भी याद रखना चाहिए कि जिन लोगों को टीका लगा है, उनमें अधिकतर वे हैं जिन्हें फिलहाल टीके की एक ही डोज लगी है। ऐसे में जब दूसरी डोज लेने की बारी आए, तो संबंधित वैक्सीन की आसान उपलब्धता भी सुनिश्चित की जानी चाहिए।

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जान जोखिम में... घातक कोरोना के साथ-साथ पैर पसार रही एक और महामारी! (पत्रिका)

लीना एस. वेन

मोटापे से ग्रस्त लोग यदि कोरोनावायरस संक्रमण की चपेट में आ जाते हैं तो उनके कई गंभीर स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं की चपेट में आ जाने और जान गंवाने की आशंका बढ़ जाती है। एक अध्ययन के अनुसार कोरोना की वजह से जो लोग अस्पताल में भर्ती किए गए, उनमें 30 फीसदी मोटापे के शिकार थे। वर्ल्ड ओबेसिटी फेडरेशन के मुताबिक जिन देशों की ज्यादातर आबादी ओवरवेट की शिकार है, वहां कोविड से मौत का खतरा दस गुना ज्यादा है।

जब कोरोना के चलते स्वास्थ्य के प्रति हमारी चिंता में मोटापे को लेकर व्यापक साक्ष्य हैं तो सवाल उठता है कि आर्थिक और जन नीतियों में इस पर अधिक ध्यान क्यों नहीं दिया गया? इसका उत्तर बहुआयामी है। हृदयरोग विशेषज्ञ और टफ्ट्स फ्रीडमैन स्कूल ऑफ न्यूट्रीशन साइंस के डीन दारूश मोजाफेरियन कहते हैं, 'मोटापे की धीमी महामारी कोविड-19 की जानलेवा महामारी के साथ गुंथी हुई है। लेकिन हम केवल तीव्र संकट पर ध्यान केन्द्रित कर रहे हैं, अत्यंत गंभीर रूप ले चुके संकट पर नहीं।' जॉर्ज वाशिंगटन विश्वविद्यालय के प्रोफेसर विलियम डाइट्ज, जिन्होंने मोटापे पर लैंसेट आयोग की सह-अध्यक्षता की थी, संबंधित अध्ययन का हवाला देते हैं जिसमें महामारी शुरू होने के बाद 42 प्रतिशत लोगों ने वजन बढऩे की जानकारी दी थी।

यह ऐसे समय में समझने योग्य तथ्य है कि जब अमरीकियों ने ज्यादा तनाव का अनुभव किया, उनकी शारीरिक गतिविधियां कम हो गईं थीं और स्वस्थ भोजन विकल्पों के बिना रहना पड़ा था। जैसा कि हार्वर्ड मेडिकल स्कूल के चिकित्सक जैसन ब्लॉक कहते हैं कि एक बार वजन बढ़ गया तो फिर घटना मुश्किल है। मुझे आश्चर्य नहीं होगा यदि हम अगले कुछ वर्षों तक मोटापे की दर को बढ़ता हुआ देखें। वास्तव में, जब विशेषज्ञ कहते हैं कि 70 प्रतिशत से अधिक अमरीकी आबादी ओवरवेट या ओबेसिटी की शिकार है तो यह किसी की व्यक्तिगत समस्या नहीं हो सकती। यह स्व-स्पष्ट रूप से सामाजिक मुद्दा है जिस पर नीतिगत स्तर पर बड़े बदलाव की जरूरत है। मोजाफेरियन मानते हैं कि हमें स्वास्थ्य देखभाल के ढांचे को फिर से पारिभाषित करना चाहिए ताकि भोजन को दवा के रूप में देखा जाए। कुछ लोग असहमत होंगे कि क्या ऐसा करने का यह समय है? लेकिन जैसा कि ब्लॉक कहते हैं-मोटापे के कारण हमारे बच्चों की जीवन प्रत्याशा हमारी तुलना में कम रह सकती है। हमें इससे छुटकारा पाना होगा।
(लेखक जॉर्ज वाशिंगटन यूनिवर्सिटी के मिल्केन इंस्टीट्यूट स्कूल ऑफ पब्लिक हैल्थ की विजिटिंग प्रोफेसर हैं)
द वॉशिंगटन पोस्ट

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Saturday, April 10, 2021

कोरोना: टीकाकरण बढ़ने के साथ कम होता जाएगा जान का खतरा (पत्रिका)

कैथी ओ'नील स्तम्भकार (ब्लूमबर्ग)

अमरीका में कोविड-19 के मामलों को फिर बढ़ते देखना हतोत्साहित कर सकता है, विशेषकर तब जबकि देश ने टीकाकरण में प्रभावशाली प्रगति की है। लेकिन यहां कुछ और आश्वस्त करने वाली खबरें हैं: यह विश्वास करने की पर्याप्त वजहें हैं कि कोरोना से मौतें नहीं होंगी जिस तरह से पिछले समय में हुईं थी।

इसमें कोई संदेह नहीं कि अमरीका में सामान्य स्थिति बहाल करने का प्रबंधन बेहतर तरीके से किया जा सकता है। जैसे कि टेक्सास में बेसबॉल स्टेडियम पूरी क्षमता के साथ मास्क की अनदेखी करते हुए खोल देना बहुत ही जल्दबाजी में लिया गया फैसला है। कई अधिकारी मूर्खतापूर्ण और जोखिम भरी चीजें कर रहे हैं जिससे कोरोना के मामले बढऩा तय है और यह अनावश्यक मौतों का सबब बनता है। इसके बावजूद मैं आशावादी हूं और इसकी वजह टीकाकरण में आई तेजी है, जिससे संक्रमण के नए मामले पहले जितने जानलेवा नहीं रह गए हैं। विचार करें सबसे अधिक जोखिम वाली आबादी के बारे में, जो 65 वर्ष से ज्यादा की है। मार्च के आंकड़ों के अनुसार अमरीका में इस वय के लोगों की सर्वाधिक मौतें हुईं - करीब 4,30,000। जबकि इसके विपरीत 65 वर्ष से कम आयु के लोगों की मृत्यु का आंकड़ा 1,04,000 था। अब लगभग 55 % वृद्धों का वैक्सीनेशन हो गया है और कम से कम 75 % को पहली खुराक दी जा चुकी है। इससे संकेत हैं कि लगभग 65 % वरिष्ठ नागरिक कोविड के कारण मौत से संभवत: बचाए जा चुके हैं। यदि पिछले वर्ष के मामले फिर दोहराए गए तो वृद्ध लोगों की श्रेणी में मौतों की संख्या आधे से भी कम हो जाएगी।

इस तथ्य पर भी गौर करें - क्रिसमस सीजन में रोजाना 2,50,000 मामले आए और हर दिन 3,300 मौतें हुईं (1.3 प्रतिशत की मृत्यु दर से)। वर्तमान में प्रतिदन 65,000 मामले सामने आ रहे हैं। टीकाकरण जैसे-जैसे आगे बढ़ेगा, मौतों की संख्या कम होगी और यह आंकड़ा प्रतिदिन 320 तक हो सकता है (0.5 प्रतिशत की मृत्यु दर से)। मृत्यु दर अभी तक शून्य नहीं हुई है लेकिन यह उतने खराब स्तर पर नहीं है जिसका सामना एक समय अमरीका कर रहा था। यह सम्भव है कि नए मामले वहां दिखेंगे जहां लोगों का वैक्सीनेशन नहीं हुआ है। अब तक हालांकि ऐसा नहीं है। आंकड़े दर्शाते हैं कि नए मामले उन राज्यों में ज्यादा उभर रहे हैं जो अधिक टीकाकरण कर रहे हैं। सबसे बड़ा खतरा उन लोगों की वजह से हैं जो टीकाकरण से बच रहे हैं, जिन्हें वैक्सीन सुलभ नहीं है और जो ऐसे बुजुर्गों या अतिसंवेदनशील परिजन के साथ रहते हैं जिन्हें वैक्सीन नहीं लगी है। बहरहाल, वह दिन करीब है, जब केसों की गणना का ज्यादा मतलब नहीं रहेगा क्योंकि केसों से ज्यादा खतरा नहीं होगा।

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Friday, April 9, 2021

जेंडर गैप रिपोर्ट 2021: कब तक बढ़ाते रहेंगे प्रतिनिधित्व की समस्या (पत्रिका)

प्रांजल शर्मा

प्रौद्योगिकी क्षेत्र इतना महत्त्वपूर्ण है कि इसे अकेले पुरुषों के हाथों में रहने देना ठीक नहीं है। अफसोस कि रोजमर्रा की जिंदगी में तकनीक की महती आवश्यकता के बावजूद भावी प्रौद्योगिकी के निर्माण में महिलाओं की भागीदारी पर्याप्त नहीं है। दुनिया के हर देश और उद्योग जगत में यही चलन देखा जा रहा है।

वल्र्ड इकोनॉमिक फोरम (डब्ल्यूईएफ) द्वारा जारी 'जेंडर गैप रिपोर्ट 2021' में प्रौद्योगिकी क्षेत्र में कई खामियां बताई गई हैं। चौथी औद्योगिक क्रांति के चलते कई तरह के जॉब खत्म हुए हैं तो कई नई नौकरियों का सृजन भी हुआ है। हालांकि भावी नौकरियों में महिलाओं की संख्या न के बराबर है और 2018 से इसमें कोई बढ़ोतरी नहीं देखी गई है। डब्ल्यूईएफ रिपोर्ट में ही शामिल लिंक्डइन डेटा के हवाले से बताया गया है कि 'बाधाएं दूर करने वाले' यानी 'डिसरप्टिव' तकनीकी कौशल से जुड़ी भूमिकाओं में लैंगिक भेद साफ दिखाई देता है। यह अंतर कितना है, इसी का अंदाजा लगाने के लिए रिपोर्ट में तेजी से बढ़ते जॉब रोल आठ श्रेणियों में बांटे गए - मार्केटिंग, सेल्स, पीपुल एंड कल्चर, कंटेंट प्रोडक्शन, प्रोडक्ट डवलपमेंट, क्लाउड कम्प्यूटिंग, इंजीनियरिंग, डेटा और आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस (एआइ)। लिंक्डइन द्वारा जुटाए गए डेटा से पता चलता है कि क्लाउड कम्प्यूटिंग, इंजीनियरिंग, डेटा और एआइ श्रेणी में लैंगिक असमानता अधिक है, क्योंकि इनमें 'डिसरप्टिव' तकनीकी कौशल में माहिर पेशेवरों जैसे फुल स्टैक डवलपरों, डेटा इंजीनियरों और क्लाउड इंजीनियरों की जरूरत होती है। केवल क्लाउड कम्प्यूटिंग में जरूर महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है। फरवरी 2018 में यह जहां मात्र 0.2 फीसदी थी, 2021 में बढ़ कर 14.2 प्रतिशत हो गई। वहीं डेटा और एआइ में महिलाओं की भागीदारी 32.4 प्रतिशत और 0.1 प्रतिशत है।

डब्ल्यूईएफ रिपोर्ट से जाहिर है कि उनके दावों के बावजूद ज्यादातर कंपनियां अब भी महिलाओं को जॉब के समान अवसर उपलब्ध नहीं करवा रही हैं। विश्व के हर कोने में प्रौद्योगिकी क्षेत्र में नौकरी देने के मामले में महिलाओं के मुकाबले पुरुषों को ही प्राथमिकता दी जाती है, भले ही उनकी योग्यता समान हो। प्रौद्योगिकी के बल पर,जहां बिजनेस मॉडल, प्रबंधन सिद्धांत, सांगठनिक ढांचा और विकास रणनीतियां बदल रही हैं, वहीं महिलाओं को इस क्षेत्र में नौकरी देने के मामले में अब भी पुराना ढर्रा चला आ रहा है।

कंटेंट क्रिएशन, मानव संसाधन और मीडिया में महिला कर्मचारियों की संख्या 50 प्रतिशत से अधिक है। जबकि आर्टिफिशल इंटेलीजेंस विशेषज्ञ, डेटा साइंटिस्ट और एनालिटिक्स कंसलटेंट जैसे पदों पर महिलाओं की संख्या मात्र 25 से 35 प्रतिशत अथवा इससे भी कम है। श्रम बाजारों के संकेत महिलाओं और छात्रों के लिहाज से काफी चिंताजनक हैं और तकनीकी पदों पर नियुक्ति में लैंगिक असमानता जारी है। डब्ल्यूईएफ विश्लेषण के मुताबिक 'साइंस, टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग और मैथ्स क्षेत्रों यानी 'स्टैम' में महिलाओं की संख्या को अक्सर 'आपूर्ति समस्या' बताया गया, जबकि इसे व्यापक स्तर पर मौजूद लैंगिक भेदभाव के रूप में देखा जाना चाहिए और यही महिला कर्मचारियों के जॉब बदलने की प्रवृत्ति का ***** है।Ó

लिंक्डइन के ग्लोबल पब्लिक पॉलिसी प्रमुख स्यू ड्यूक कहते हैं, 'अधिकांश तेजी से उभरती भूमिकाओं में महिलाओं का प्रतिनिधित्व पर्याप्त नहीं है, जिसका मतलब यह है कि महामारी से जंग में आगे बढ़ते हुए हम प्रतिनिधित्व की समस्या को बढ़ाते जा रहे हैं। ये वह भूमिकाएं हैं जिनका तकनीक के तमाम पहलुओं को आकार देने में अहम योगदान है। सीधे-सीधे कार्यानुभव और औपचारिक शैक्षणिक योग्यता के बजाय कौशल और संभावनाओं पर पेशेवरों का आकलन इसके लिए सबसे जरूरी है। तभी हम अपनी अर्थव्यवस्थाओं और समुदायों को और अधिक समावेशी बना पाएंगे।'

इसका सीधा अर्थ यह है कि कंपनियों को अपनी मानसिकता बदलनी होगी। मौजूदा दौर में सदियों से चले आ रहे भेदभाव को जारी रखना न्यायोचित नहीं है। सतत सीखने की प्रक्रिया में पूर्व में हासिल की गई शैक्षणिक योग्यता का बहुत अधिक महत्त्व नहीं रह जाता। कुल मिलाकर यह महिला एवं पुरुषों दोनों के लिए एक प्रकार का सोपान है, जिसके बाद उन्हें भावी जॉब के लिए अपने आपको कौशल से परिपूर्ण करना है। महिलाएं भी भूमिका बदलने और कौशल सीखने में पुरुषों के समान उत्साह और तत्परता दिखा सकती हैं। नियोक्ताओं का दायित्व है कि वे महिलाओं को पुरुषों के समान अवसर दें।

तकनीक संबंधी नौकरियों में महिलाओं के साथ भेदभाव समाज में व्याप्त लैंगिक असमानता का ही एक अंग है। 2021 में आया यह अंतर कई बड़ी जनसंख्या वाले देशों में राजनीति में बढ़ती लैंगिक असमानता में भी परिलक्षित होता है। 156 सूचीबद्ध देशों में से आधे से अधिक देश सुधार दर्शा रहे हैं, फिर भी विश्व भर में महिला सांसदों की संख्या मात्र 26.1 प्रतिशत है तथा महिला मंत्रियों की संख्या मात्र 22.6 प्रतिशत। मौजूदा हालात को देखते हुए लगता है कि राजनीतिक मोर्चे पर लैंगिक असमानता मिटाने में करीब 145 साल लग सकते हैं जबकि डब्ल्यूईएफ की २०२० की रिपोर्ट में यह अवधि 95 साल बताई गई थी। यानी इसमें 50 प्रतिशत से अधिक समय और लगेगा। वहीं आर्थिक स्तर पर लैंगिक असमानता में थोड़ा सुधार देखा गया है। इसे खत्म होने में करीब 267 साल लगेंगे।

इन सबके बीच अच्छी खबर यह है कि शिक्षा और स्वास्थ्य में लैंगिक असमानता करीब-करीब खत्म होने को है। शिक्षा के क्षेत्र में 37 देश लैंगिक समानता हासिल कर चुके हैं। स्वास्थ्य के संदर्भ में लैंगिक असमानता 95 प्रतिशत से अधिक खत्म हो चुकी है।

(लेखक आर्थिक विश्लेषक, सलाहकार और किताब 'इंडिया ऑटोमेटिड' के राइटर हैं)

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आर्ट एंड कल्चर : सिनेमा पर लेखन के लिए पुरस्कार (पत्रिका)

विनोद अनुपम

हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में सर्वश्रेष्ठ लेखन के लिए दिए जाने वाले पुरस्कारों पर सबसे कम चर्चा हुई। इस वर्ष सिनेमा पर लेखन पुरस्कार के लिए बनाई गई चयन समिति का अध्यक्ष सैबल चटर्जी को बनाया गया था। उनकी अध्यक्षता में राघवेन्द्र पाटिल और राजीव मसंद की जूरी ने हार्पर कोलिंस से प्रकाशित संजय सूरी की पुस्तक 'ए गांधीयन अफेयर-इंडियाज क्यूरीअस पोट्र्रेयल ऑफ लव इन सिनेमा' का चयन स्वर्ण कमल के लिए किया, जबकि अशोक राणे की मराठी किताब 'सिनेमा पहाराना मानुष' और पीआर रामदास नायडू की कन्नड़ में लिखी 'कन्नड़ सिनेमा-जगाथिका सिनेमा विकास प्रेरणा पराभव' का सिनेमा लेखन में योगदान के लिए विशेष उल्लेख किया गया। इसी के साथ विभिन्न सामाजिक मुद्दों और विभिन्न विषयों पर लंबे समय से लिखने वाली और रामनाथ गोयनका अवार्ड से सम्मानित सोहिनी चट्टोपाध्याय का चयन सर्वश्रेष्ठ समीक्षक के रूप में किया गया।

उल्लेखनीय है कि सिनेमा पर लेखन के लिए अभी तक भारत में सिर्फ 'राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार' के अंतर्गत सम्मानित किया जाता है। इसमें सभी भारतीय भाषाओं के लिए दो पुरस्कार मात्र हैं, एक फिल्म समीक्षा के लिए और दूसरा फिल्म पर लिखी पुस्तक के लिए। वास्तव में सिनेमा को सामाजिक जागरूकता और मानवीय सौंदर्यबोध के अनुरूप विकसित करने की जिस अपेक्षा से राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार स्थापित किए गए थे, उस परंपरा के सूत्रधार की जवाबदेही सिनेमा पर लेखन ही उठा सकती है। बावजूद इसके पुरस्कार की यह श्रेणी किसी भी लोकप्रिय अवार्डों में अभी तक शामिल नहीं की गई है। शायद इसलिए कि हिन्दी सिनेमा ने कभी नहीं चाहा कि उसे एक प्रबुद्ध दर्शक मिले और उनकी अपेक्षाओं के अनुरूप अपने को विकसित करने का उस पर दबाव बढ़े।

वास्तव में फिल्म पर लेखन एक नितान्त ही जटिल और गंभीर काम है। माना जाता है कि कमोबेश फिल्म पर लिखने वाले की समझ का स्तर पटकथा लेखक और निर्देशक के समकक्ष होना चाहिए, ताकि वह फिल्म बनने की प्रक्रिया में प्रवेश कर उसे वर्तमान सामाजिक मुद्दों और और सौंदर्यबोध की कसौटी पर परख सके। सवाल यह है कि इतने अध्यवसाय के साथ कोई ऐसे क्षेत्र में क्यों सक्रिय रहना चाहेगा, जिसकी प्रतिष्ठा ही न हो। न तो उनकी नजर में जिनके लिए वह लिख रहा होता है, न ही उनकी नजर में जिन पर लिख रहा होता है।

क्षेत्रीय सिनेमा के प्रोत्साहन के लिए संविधान के बाहर की भाषाओं में भी बन रही फिल्मों को सम्मानित किया जाता रहा है। बेहतर होता फिल्मों पर लेखन के लिए सभी क्षेत्रीय भाषाओं के लिए एक-एक रजत कमल तथा स्वर्ण कमल दिए जाते। समीक्षाओं से ही सिनेमा पर विचार करने वाली पौध को एक नई ऊर्जा मिल पाती है।
(लेखक राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार प्राप्त कला समीक्षक हैं)

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साइंस एंड टेक : बड़े धोखे हैं क्रिप्टो करंसी की राह में! (पत्रिका)

जोआना ओसिंजर, एडिटर, क्रॉस ऐसेट मार्केट (ब्लूमबर्ग)

सिंगापुर क्रिप्टो करंसी की ट्रेडिंग के लिहाज से बीते एक साल में प्रमुख बाजार बनकर उभरा है। सिंगापुर सरकार ने इसके मद्देनजर एक बार फिर बिटकॉइन और इस तरह की अन्य क्रिप्टोकरंसी में निवेश को लेकर लोगों को आगाह किया है। हालांकि सिंगापुर में क्रिप्टोकरंसी का बाजार अपेक्षाकृत छोटा ही है लेकिन बीते कुछ समय में इसमें महत्वपूर्ण बढ़ोतरी देखने को मिली है।

सिंगापुर के मौद्रिक प्राधिकरण के चेयरमैन थर्मन शनमुगारत्नम ने हाल ही संसद में एक सवाल का जवाब देते हुए कहा कि क्रिप्टोकरंसी अत्यधिक परिवर्तनशील हो सकती हैं क्योंकि उनकी कीमत किसी भी आर्थिक बुनियाद से जुड़ी हुई नहीं होती हैं। उन्होंने यह भी चेताया कि क्रिप्टोकरंसी, निवेश के मामले में बहुत ही जोखिमपूर्ण हैं और निश्चित रूप से छोटे निवेशकों के लिए उपयुक्त नहीं है। उन्होंने यह भी जानकारी दी कि क्रिप्टोकरंसी फंड खुदरा निवेशकों को बेचे नहीं जा सकते हैं। थर्मन, जो कि समाज कल्याण से जुड़ी नीतियों के समन्वयक भी हैं, के मुताबिक प्राधिकरण के पास डिजिटल टोकन सेवा प्रदाताओं पर अतिरिक्त प्रावधान लागू करने की भी शक्तियां हैं, जिसके तहत जरूरत पडऩे पर क्रिप्टोकरंसी ट्रेडिंग से जुड़े एक्सचेंज नियमित किए जाते हैं।

थर्मन का बयान ऐसे वक्त आया है जब क्रिप्टोकरंसी का कुल बाजार मूल्य पहली बार दो ट्रिलियन डॉलर से आगे पहुंच गया है। संस्थागत मांग में इजाफा हुआ है और पिछले लगभग दो महीनों में इसमें दो गुनी वृद्धि हुई है। निवेशकों की क्रिप्टो में दिलचस्पी बढऩे से बिटकॉइन टूटा है। इसकी एक वजह यह है कि निवेशक नकदी पर रिटर्न को बढ़ावा देने के लिए क्रिप्टो पर दांव लगा रहे हैं, क्योंकि दुनिया में ब्याज दरें शून्य के करीब हैं। टेस्ला ने भी बीते माह कहा था कि वह कार खरीदने के एवज में क्रिप्टो करंसी में भुगतान स्वीकार करेगी।

थर्मन यह भी कहते हैं कि क्रिप्टोकरंसी की ट्रेडिंग सिंगापुर में शेयरों और बॉण्डों की ट्रेडिंग की तुलना में काफी कम है - औसत दैनिक ट्रेडिंग वॉल्यूम का महज 2 प्रतिशत, जिसमें बिटकॉइन, एथरियम और एक्सआरपी सभी शामिल हैं। हालाांकि एलन मस्क, मार्क क्यूबन और पॉल ट्यूडर जोन्स ने क्रिप्टोकरंसी को अपना समर्थन दिया है, लेकिन कदम-कदम पर धोखे की आशंका वाली इस इंडस्ट्री के प्रति आगाह करने वाले थर्मन अकेले नहीं हैं। यूरोपियन सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज कमीशन के नए प्रमुख गैरी जेंसलर ने भी हाल ही बिटकॉइन में तेजी के बाद निवेशकों के लिए 'पर्याप्त' जोखिम की चेतावनी दी थी। जेंसलर ने कहा था कि यह सुनिश्चित करना कि क्रिप्टो बाजार धोखाधड़ी से मुक्त है, एजेंसी के लिए बड़ी चुनौती है।

सिंगापुर में संबंधित अधिकारियों ने क्रिप्टोकरंसी से जुड़े मनी-लॉन्ड्रिंग और आतंकवाद के वित्त पोषण के जोखिमों से मुकाबले की कोशिशें तेज कर दी हैं। प्राधिकरण ने क्रिप्टो सेक्टर की निगरानी बढ़ाई है ताकि संदिग्ध नेटवर्क और उच्च जोखिम वाली गतिविधियों की पहचान की जा सके।

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Thursday, April 8, 2021

अतिसंवेदनशील लोगों को प्राथमिकता से मिले वैक्सीन (पत्रिका)

- डेरेन वॉकर, अध्यक्ष, फोर्ड फाउंडेशन

अमरीका में तेजी से चल रहे कोरोना टीकाकरण कार्यक्रम से कई अमरीकियों ने राहत की सांस ली है। एक मई तक हर अमरीकी वयस्क टीकाकरण करवाने की अर्हता प्राप्त कर लेगा। लेकिन यह अर्हता, स्वाभाविक न्याय से बहुत दूर है, जबकि दुनिया भर में महामारी के खत्म होने के कोई आसार नजर नहीं आ रहे हैं। वैक्सीन तक पहुंच में समानता कहीं नहीं दिखाई दे रही, न तो देशों के भीतर और न देशों के बीच - खास तौर पर एफ्रो वंशजों और स्वदेशी समुदायों को लेकर व्यापक विषमताएं उभर रही हैं। देश के भीतर ही भेदभाव साफ दिखाई देता है। मार्च के अंत तक श्वेत रंग वाले लोगों को अन्य लोगों के मुकाबले वैक्सीन लगने की संभावना दो गुनी रही।

वास्तविकता यह है कि गत सप्ताह तक विश्व के समृद्ध देशों ने दुनिया की 80 प्रतिशत कोरोना वायरस वैक्सीन पर अधिकार कर लिया है। निम्न आय वाले देशों को एक प्रतिशत वैक्सीन का भी दसवां भाग ही मिलेगा। विश्व में अब तक वैक्सीन की केवल 60 करोड़ खुराक ही लगाई जा सकी हैं (विश्व की 7.8 बिलियन आबादी में केवल 4 प्रतिशत लोगों को)।

टीकाकरण में असमानता का कारण स्पष्ट है कि संपन्न देश वैक्सीन की जमाखोरी कर रहे हैं। यूरोपीय संघ ने वैक्सीन निर्यात पर पूरी तरह रोक लगा दी है और अमरीका ऐस्ट्राजेनेका की 30 मिलियन खुराक पर अधिकार जमाए हुए है।

वैक्सीन राष्ट्रवाद की यह लहर विश्व में जरूरतमंदों तक वैक्सीन पहुंचाने की राह में बाधक बन गई है। वैक्सीन राष्ट्रवाद के परिणाम घातक हो सकते हैं। इससे वैश्विक स्तर पर महामारी से बचने की गति धीमी होगी। दुनिया में कोरोना से जंग का सामना कर रहे अग्रिम पंक्ति के कर्मचारियों की मृत्यु होने की आशंका है, जिसमें फोर्ड फाउंडेशन के कई एनजीओ साझेदारों की मृत्यु भी शामिल है। हमारे दर्जनों साहसी साथी कोरोना संक्रमण से मारे गए। यह बहुत बड़ी क्षति है। अन्य शब्दों में कहा जाए तो वैक्सीन असमानता ने विश्व में व्याप्त असमानता को उजागर कर दिया है। इससे निपटने के लिए तीन उपाय हैं।

पहला, अमरीका अपने पास जमा बड़ी संख्या में वैक्सीन खुराकों को अमरीकी सेना अैर अन्य स्रोतों के जरिये विश्व भर में वितरण का जिम्मा उठाए जैसे पूर्व राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू. बुश ने एड्स से राहत के लिए अपात योजना बनाकर किया था। दूसरा, यूरोपीय संघ, यूके और अमरीका पेटेंट संरक्षण हटा कर अधिक देशों को वैक्सीन बना कर इस्तेमाल करने की अनुमति दें। भारत और दक्षिण अफ्रीका ने विश्व स्वास्थ्य संगठन के लिए एक प्रस्ताव तैयार किया है, जिसके तहत कोरोना वायरस वैक्सीन से अस्थायी तौर पर पेटेंट संरक्षण हटाने की मांग की गई है और 57 देशों ने उनका समर्थन किया है। पेटेंट से अस्थायी तौर पर पाबंदी हटाने से लोकतांत्रिक मूल्यों और पूंजीवाद के बीच संबंध बेहतर बनाने में मदद मिलेगी। तीसरा उपाय है - हमें बहुपक्षीय पहल कर अधिक सुदृढ़ और
लचीला स्वास्थ्य तंत्र तैयार करना होगा ताकि इस महामारी व अन्य किसी भावी महामारी का मुकाबला किया जा सके।

बिल गेट्स और मेलिंडा गेट्स के संगठन ने गैर लाभकारी साझेदारों, सरकारों और डब्ल्यूएचओ के साझा कार्यक्रम कोवैक्स का समर्थन कर वैश्विक संस्थानों को वैक्सीन राष्ट्रवाद से विमुख हो कर वैक्सीन समानता की ओर प्रेरित किया है।

हमें उन लोगों व समुदायों पर फोकस करना होगा, जो कोविड-19 के सर्वाधिक शिकार हुए हैं। वैक्सीन असमानता संकट का समाधान व्यक्तिगत, संस्थानिक और औद्योगिक स्तरों पर स्वास्थ्य तंत्र, अर्थव्यवस्था और लोकतंत्र को बेहतर बनाने का अवसर है।

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रोजगार बढ़ाने के लिए व्यावहारिक नीति जरूरी (पत्रिका)

- तृप्ति पांडेय, पर्यटन और संस्कृति विशेषज्ञ

नीति निर्माता किस तरह के अव्यावहारिक निर्णय लेते हैं, इसके उदाहरण देशभर में अक्सर सामने आते रहते हैं। अभी हाल ही राजस्थान सरकार की कैबिनेट मीटिंग में बिना किसी साक्षात्कार के छह हजार गाइडों की ट्रेनिंग का निर्णय किया गया। इतनी बड़ी संख्या में गाइडों को लाइसेंस देने का निर्णय बेरोजगारी की समस्या से निपटने के लिए किया गया। सबको पता है कि ये गाइड लाइसेंस जादू की ऐसी छड़ी नहीं हैं, जिनसे तुरंत रोजगार मिल ही जाएगा। असल में ऐसे निर्णय हां में हां मिलाने की अफसरों की प्रवृत्ति के कारण होते हैं। यदि इस तरह के निर्णय कहीं कोर्ट कचहरी में पहुंच जाते हैं, तो मुंबई हाईकोर्ट की तरह से अफसरों से पूछा जा सकता है कि आप क्यों नहीं बोले ... क्यों आपने ये नहीं सोचा की छह हजार लाइसेंस पाने वाले गाइड रोजगार कहां से पाएंगे? फिर आपने उनके व्यक्तित्व को देखा परखा तक भी नहीं? यह तो ठीक वैसे ही हुआ जैसे बिना ड्राइविंग टेस्ट के ड्राइविंग लाइसेंस दे देना।

एक बार ये तो सोचिए कि गाइड का काम और भूमिका क्या है। जी हां, गाइड हमारा राजदूत यानी एंबेसेडर है। उसका ज्ञान, आचार - विचार, भाषा पर पकड़ बिना साक्षात्कार के कैसे परख सकते हैं? यदि छह हजार लाइसेंस दे भी दिए, तो आप कोरोनाकाल में उन्हें रोजगार कैसे देंगे? आप ट्रैवल एजेन्सी और पर्यटकों पर अपने तरीके से बनाए गए गाइड इस्तेमाल करने का दबाव नहीं डाल सकते। अब जब टेक्नोलॉजी स्मार्टफोन बन कर पर्यटक की जेब में पहुंच गई है और ऐतिहासिक इमारतों को विश्वस्तरीय बनाने के लिए ऑडियो गाइड लगाए जा रहे हैं, तो वे छह हजार लाइसेंसी गाइड कहां जाएंगे? क्या सरकार ने एक बार फील्ड की तरफ नजर डाली है?

इस बात को समझना होगा कि बेरोजगारी की समस्या का समाधान इस तरह के लाइसेंसों से नहीं होगा। कृपया, सपने मत बेचिए। बतौर लेक्चरर मुझे केंद्र और राज्य स्तर पर गाइड ट्रेनिंग के लिए आमंत्रित किया गया था। इस दौरान कई गाइडों के साथ बातचीत हुई। आज भी उनमें से कुछ गाइड अचानक जब मिल जाते हैं, तो उनसे जुड़े मुद्दों पर चर्चा होती है। कुछ तो गाइड का काम करने की बजाय हैंडीक्राफ्ट की दुकानों पर काम कर रहे हैं। उनका लाइसेंस खरीदार को पकडऩे में मदद करता है। इससे इन लाइसेंस गाइडों की स्थिति का पता चलता है।गौर करने की बात यह है कि छह हजार गाइडों की ट्रेनिंग का निर्णय तब हुआ है, जब कोरोना संक्रमण फैला हुआ है। यह ऐसा समय है, जब लोगों से घरों में रहने के लिए ही कहा जा रहा है। अपेक्षा की जा रही है कि लोग
अनावश्यक रूप से घूमने न जाएं। स्थितियां ऐसी हैं कि जिन लोगों के पास गाइड का लाइसेंस है, वे भी काम के लिए बेचैन हैं। अब आप किसी भी बेहतर गाइड का चयन साक्षात्कार किए बिना नहीं कर सकते। यानी सिर्फ खाली लेखन परीक्षा से काम नहीं चलेगा।

इस बात को भी समझना होगा कि यह नौकरी नहीं है। फिर इस तरह के कार्यक्रमों में आरक्षण के प्रावधानों का क्या काम? जहां तक राज्य के बाहर स्थित पर्यटन कार्यालयों की बात है, तो सिवाय दिल्ली के कोई भी कार्यालय राज्य पर्यटन की आवश्यकता नहीं है। यदि कुछ अच्छा करना है, तो अपने मुख्य कार्यालय और क्षेत्रीय कार्यालयों को और मजबूत बनाएं और उनका कार्य क्षेत्र बढ़ाएं और वहां युवाओं को रोजगार दें। जयपुर एअरपोर्ट और कुछ रेलवे स्टेशनों पर स्वागत केंद्र उपयोगी होंगे, पर तब ही जब वहां सारी तकनीकी व्यवस्था उबलब्ध हो और वहां जवाब देने वाला अधिकारी मौजूद रहे।

यदि पर्यटन को उद्योग मानते हैं, तो होटलों की बिजली दर को कम करने की मांग को देखें। साथ ही फॉरेस्ट डिपार्टमेंट को याद दिलाएं कि अभी कोरोना गया नहीं है। सफारी की दर कम कराएं। वेबसाइट को बेहतर बनाना भी आवश्यक है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि कोरोना को देखते हुए ही नीतियां बनाई जानी चाहिए और जबरदस्ती के मार्केटिंग के आयोजनों से बचा जाना चाहिए।

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Tuesday, April 6, 2021

भारतीय थाली को ट्यूना की क्या जरूरत ! (पत्रिका)

मेनका गांधी

अमरीका में खाद्य एवं औषधि विभाग ने पीले रंग के फिन वाली ट्यूना फिश के सारे उत्पाद बाजार से वापस लेने का आदेश दिया है। इसका कारण है कि इन उत्पादों से एक खास प्रकार की फूड पॉइजनिंग, स्कोम्ब्रॉइड फिश पॉइजनिंग का डर है। ऐसा तब होता है, जब लोग ऐसी मछली का सेवन कर लेेते हैं, जो हिस्टमीन नामक तत्व से दूषित हो चुकी हो। हिस्टमीन के कारण शरीर में एलर्जी के लक्षण दिखाई देते हैं।

यह दोष तब आता है जब फिश को समुचित रूप से फ्रीज नहीं किया जाता और बैक्टीरिया त्वचा के जरिये फिश के अंदर चला जाता है और वह उच्च स्तरीय हिस्टमीन से दूषित हो जाती है। स्कोम्ब्रॉइड पॉइजनिंग की पहचान यह है कि दूषित मछली के सेवन के बाद मुंह में जलन होने लगती है, मुंह सूज जाता है, त्वचा पर रैशेज दिखने लगते हैं और खुजली होती है। मरीज में जी घबराने, उल्टी और डायरिया के लक्षण दिखाई देते हैं। मुुंह लाल हो जाता है, सिर दर्द और बेहोशी के साथ ही कई बार आंखों के आगे अंधेरा छा जाना, पेट में ऐंठन, सांस लेने में तकलीफ होना एवं दम घुटने का आभास होना या मुंह का स्वाद बिगड़ जाना कुछ अन्य लक्षण हैं। ये लक्षण मछली के सेवन के बाद पांच से तीस मिनट के बीच ही दिखाई देने शुरू हो जाते हैं। कुछ घंटों में ये ठीक हो जाते हैं लेकिन कई लोगों में ज्यादा दिन तक ये लक्षण दिखाई देते हैं, उन्हें एंटी-हिस्टमीन लेने से लाभ हो सकता है। कई बार मरीज को आपात स्थिति में अस्पताल भी ले जाना पड़ता है। अस्थमा व दिल के रोगियों के लिए हिस्टमीन फूड पॉइजनिंग जानलेवा हो सकती है। इसके लक्षण हृदय रोग जैसे भी हो सकते हैं, इसलिए रोग की जांच में उचित चिकित्सीय सावधानी की जरूरत है। भारत के चिकित्सा समुदाय में इस संबंध में व्यापक जानकारी का अभाव है।

ट्यूना फिश के अलावा माही-माही, ब्लू फिश, सार्डिन, एन्कॉवी और हैरिंग नामक मछलियों में भी हिस्टमीन की आशंका पाई जाती है। मछलियों के अलावा हिस्टमीन अन्य खाद्य पदार्थों जैसे चीज, वाइन, अचार और स्मोक्ड मीट में भी पाया जा सकता है। अमरीकी बाजारों से लिए गए ट्यूना उत्पादों में हिस्टमीन लेवल मानक 50 पीपीएम से कहीं अधिक पाया गया। इन उत्पादों में यह 213 से 3,245 पीपीएम के बीच था। बर्गर और सैंडविच में इस्तेमाल होने वाला ट्यूना कई बार फ्रीजर से निकाल कर वापस रख दिया जाता है जबकि यह तापमान के उतार-चढ़ाव और बैक्टीरिया दोनों से ही प्रदूषित हो सकता है। सुशी, सैंडविच और सलाद में ट्यूना कच्ची प्रयोग की जाती है जबकि फिलेट्स, स्टीक्स और बर्गर में यह पकी हुई होती है। तेल, खारे पानी, पानी और सॉस में डिब्बाबंद मिलने वाली ट्यूना फिश का इस्तेमाल सैंडविच और सलाद में किया जाता है। कैन में भी बैक्टीरिया जनित हिस्टमीन जीवित रह सकता है। ट्यूना फिश को पकड़ते ही फ्रीज करने की जरूरत होती है लेकिन भारतीय मछुआरे तेज धूप में इसे कुछ घंटों बाद बंदरगाह पहुंचाते हैं। वहां से यह रेफ्रिजरेटेड ट्रकों में भेजी जाती है। विषाक्त मछली के सेवन से दुनिया में जितनी भी मौतें होती हैं, उनमें संभवत: हिस्टमीन ही बहुत बड़ा कारण है। ट्यूना फिश, गिल-जाल में पकड़ी जाती हैं, जान बचाने की जद्दोजहद में इनकी त्वचा छिल जाती है और जब तक इन्हें जाल से निकाला जाता है, हिस्टमीन बन जाता है। भारत में ट्यूना फिश खुले में बिना बर्फ पर रखे बेची जाती है, जबकि इसे पानी से निकालते ही फ्रीजर में रखना जरूरी होता है। इसलिए यहां हिस्टमीन को 100 पीपीएम से नीचे रखना मुश्किल है।

अब तक ट्यूना केरल और गोवा में ज्यादा बेची जाती थी और घरेलू बाजार में यह प्रमुख रूप से नहीं पाई जाती क्योंकि इसे यहां पारम्परिक तौर पर नहीं पकड़ा जाता। मत्स्य पालन और जैवविविधता संरक्षण के विश्व बैंक द्वारा वित्तीय सहायता प्राप्त प्रोजेक्ट और चेन्नई स्थित बे ऑफ बंगाल प्रोग्राम अंतर सरकारी संगठन (बीओबीपी-आइजीओ) के माध्यम सेे घरेलू ग्राहकों के बीच इसे बढ़ावा दिया जा रहा है। केंद्रीय समुद्री मत्स्य शोध संस्थान के अनुसार भारतीय समुद्र में मछली की नौ प्रजातियां पाई जाती हैं लेकिन बाहर से लाई जाने वाली ट्यूना को सही ढंग से नहीं रखा जाता। अगर अमरीका और फ्रांस से प्रतिस्पद्र्धा करनी हो तो ज्यादा ट्यूना रखनी होगी, जिसके लिए ऑन बोर्ड रेफ्रिजरेशन की सुविधा सुनिश्चित करने की जरूरत है। परन्तु जो मछली स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है, उसका प्रचार करना कहां तक उचित है? ट्यूना व कुछ अन्य मछलियों में मर्करी और धात्विक तत्व पाए जाते हैं जो शरीर के तंत्रिका तंत्र पर बुरा असर डालते हैं। बच्चों का तंत्रिका तंत्र वैसे भी विकसित होने की प्रक्रिया में होता है, इसलिए इस पर मर्करी का दुष्प्रभाव पड़़ सकता है। मार्च 2004 में अमरीका ने एक दिशानिर्देश जारी कर गर्भवती महिलाओं, नई माताओं और बच्चों को ट्यूना फिश का इस्तेमाल कम करने की सलाह जारी की थी। 2008 की एक रिपोर्ट के अनुसार, सुशी ट्यूना की कुछ किस्मों में मर्करी का स्तर खतरनाक मात्रा में पाया गया था।

अंतरराष्ट्रीय सी-फूड सस्टेनबिलिटी फाउंडेशन के अनुसार हिन्द महासागर में पीले फिन वाली ट्यूना, प्रशांत महासागर में बिगये ट्यूना और उत्तरी अटलांटिक में अल्बाकोर ट्यूना पाई जाती हैं। पैसिफिक कम्यूनिटी सचिवालय द्वारा 2012 में जारी की गई ट्यूना फिशरी असेसमेंट रिपोर्ट 2010 के अनुसार, हर किस्म का ट्यूना मत्स्य पालन कम कर देना चाहिए। क्या भारतीय जलवायु में न रह सकने वाली ट्यूना का भारतीय थाली में होना जरूरी है?

जो मछली स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है, उसका प्रचार करना कहां तक उचित है? ट्यूना व कुछ अन्य मछलियों में मर्करी और धात्विक तत्व पाए जाते हैं जो शरीर के तंत्रिका तंत्र पर बुरा असर डालते हैं।

(लेखिका लोकसभा सदस्य, पूर्व केंद्रीय मंत्री और पशु अधिकार कार्यकर्ता हैं)

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एक और नदी जल विवाद... मिस्र व इथियोपिया में बढ़ रही टकराव की आशंका (पत्रिका)

एजेदीन सी. फिशर, (द पोस्ट के दूसरे जमाल खशोगी फेलो और 'द इजिप्टियन असैसिन' के लेखक)

नील नदी पर ग्रैंड इथियोपियन रेनेसां डैम बनाए जाने और उसके संचालन को लेकर चल रही वार्ता विफल हो गई है, क्योंकि मिस्र को डर है कि कहीं इससे देश में सूखा न पड़ जाए। बीते सप्ताह मिस्र के राष्ट्रपति ने चेतावनी दी थी कि 'कोई भी मिस्र से पानी की एक बूंद भी नहीं ले सकता और अगर कोई ऐसा करना चाहता है तो कोशिश करके देख ले।' इसके अगले दिन ही मिस्र और सूडान ने 'नील ईगल्स' नाम से संयुक्त वायु सेना अभ्यास का ऐलान किया। सूडान भी काफी हद तक इथियोपिया से आने वाले नील नदी के पानी पर निर्भर है।

इस बीच इथियोपियाई सरकार बांध के जलाशय को भरने की योजना बना रही है। वह 2023 तक यह कार्य पूरा कर लेना चाहती है। 2015 में दोनों देशों ने इस बांध को लेकर एक समझौता किया थे, जो अब अर्थहीन हो गया है। मिस्र व सूडान ने हाल ही मध्यस्थता प्रस्ताव भी रखा, जिसे इथियोपिया ने नकार दिया। मिस्र की नील नदी का 85 फीसदी पानी ब्लू नील से आता है। मिस्र, जहां न के बराबर बारिश होती है, सदियों से पानी से जुड़ी तमाम जरूरतों के लिए इसी पानी पर निर्भर हैं। इसलिए इस पानी में कटौती मिस्र को अस्तित्व पर संकट की तरह लगती है। इथियोपिया (संयुक्त राष्ट्र मानव विकास सूचकांक में 173वें पायदान पर) को लगता है कि इस जल स्रोत के बल पर वह देश के लोगों का जीवन स्तर सुधार सकता है।

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Monday, April 5, 2021

चुनाव प्रचार की जंग में ममता साबित हो रहीं 'बड़ी दीदी (पत्रिका)

द. 24 परगना (पश्चिम बंगाल) से मुकेश केजरीवाल

 कोलकाता के व्यस्त, विशाल 'मां' फ्लाईओवर के दोनों ओर चमचमाते-जगमगाते इलाके हों या दक्षिण 24 परगना के जयनगर के छोटे से श्रीपुर गांव की गंवई गलियां...एक तस्वीर, एक नारा और एक चिह्न ही आपको पूरे पश्चिम बंगाल में चप्पे-चप्पे पर दिखेगा। गांवों में फर्क सिर्फ इतना होगा कि इनका आकार छोटा होगा। प्रचार में भाजपा अगर मास्टर है तो ममता उनकी भी बड़ी दीदी साबित हो रही हैं। हर ओर मौजूद प्रचार, प्रचार में छवि, छवि में संदेश और संदेश में सटीकता... सब जैसे भाजपा की किताबों से उतारा गया हो। कुछ तैयारी और कुछ अपने शासन का जोर... तृणमूल कांग्रेस ने भाजपा के प्रचार को कोने में सिमटा दिया है। हालांकि यह भी नहीं भूलना चाहिए कि ऐसे प्रचार का हार-जीत में सीमित रोल ही होता है।

उठ रहे सवाल-
पूरे राज्य में पटे पड़े इन होर्डिंग को पार्टियों के कार्यकर्ता गर्व से अपनी बढ़त का सबूत बता रहे हैं। यहां के बारीपुर कॉलेज में पढऩे वाले गौतम सवाल उठाते हैं, इतने गरीब राज्य में इन होर्डिंग पर सैकड़ों करोड़ रुपए खर्च करना कहां तक ठीक है। इसी तरह मगराहाट पूर्व के माकपा उम्मीदवार चंदन साहा कहते हैं, तृणमूल कांग्रेस और भाजपा दोनों उद्योगपतियों की पार्टी है। हम लोग जनता से चंदा लेते हैं और ये लोग अडानी, अंबानी से। जनता समझ रही है।

चुनावी नारे चढ़ रहे जुबान पर-
बंगाल चुनाव में लोगों की जुबान पर सबसे ज्यादा चढ़ा है, 'खेला होबे'। तृणमूल ने इसी बोल से फास्ट बीट पर रैप सॉन्ग तो बाद में बनाया, पहले से ही वे इसका इस्तेमाल भाजपा वालों को चिढ़ाने के लिए करते रहे हैं। जयनगर के दुर्गापुर मोड़ पर चंदा बिस्वास मुस्कुराते हुए कहती हैं, 'जानेन ना? ऐटी राजनैतिक बिद्रूप' (यह राजनीतिक व्यंग्य है)। फिर वे कहती हैं कि राज्य में खेल-कूद से लोगों को बहुत लगाव है, इसलिए चुनावी जुमले भी इसी पर गढ़े जा रहे हैं।

चुनाव खर्च सीमा से बेपरवाह-
आप देश के किसी भी हिस्से में चले जाइए, हाल के चुनावों में आपको लगातार प्रचार के ऐसे रंग हल्के होते दिखे हैं क्योंकि हर झंडे, पोस्टर और बैनर के खर्च का हिसाब देना होता है। लेकिन यहां खास तौर पर सत्तारूढ़ तृणमूल वालों को इसकी कोई परवाह नहीं दिख रही। पांच-छह युवक निकलते हैं और सामने आने वाले मकानों की जो भी दीवार, छज्जे या छत पसंद आ जाती हैं, वहां बड़े-बड़े पोस्टर टिका देते हैं। ना तो इन पर यह ब्योरा दर्ज है कि कितनी संख्या में छापे गए हैं और ना ही जिसकी इमारत पर लगाया जाता है, उससे कोई सहमति ली जाती है।

मां की जगह बेटी...
दस साल पहले दीदी ने 'मां, माटी, मानुष' का नारा देकर वाम दलों को बाहर किया था। इस बार प्रचार सामग्री में ममता की मुस्कुराती तस्वीर है और इन पर सिर्फ एक ही नारा है- 'बांग्ला निजेर मेयकेई चाय' यानी बंगाल को खुद अपनी बेटी ही चाहिए। वैसे तो 66 साल की मुख्यमंत्री दीदी के नाम से बुलाई जाती हैं, लेकिन खुद को बेटी बताने से ज्यादा उनका इरादा भाजपा के चेहरे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बाहरी बताने का है। भाजपा का प्रचार जहां मोदी की तस्वीर पर केंद्रित है। इसमें गृह मंत्री अमित शाह, भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा और राज्य अध्यक्ष दिलीप घोष को भी शामिल किया गया है।

सौजन्य - पत्रिका।
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