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रोजगार के अवसर कैसे बढ़ सकते हैं?

शिक्षा प्रणाली को रोजगारोन्मुखी बनाया जाए
गांवो में कृषि के अलावा फूड प्रोसेसिंग, टेक्सटाइल डिजाइनिंग जैसे छोटे-छोटे उद्योग स्थापित कर रोजगार के अवसर बढ़ाए जा सकते हैं। साथ ही बढ़ती हुई जनसंख्या पर रोक लगानी होगी और शिक्षा प्रणामी में समुचित परिवर्तन करना होगा। ऐसी शिक्षा दी जाए, जिसे पाकर युवा रोजगार की दिशा में अग्रसर हो सके। हमें शिक्षा प्रणाली को रोजगारोन्मुखी बनाना होगा। लघु उद्योग, कुटीर उद्योग को अपनी क्षमता के अनुसार विकसित कर रोजगार पाया जा सकता है। पापड़ उद्योग, सूती वस्त्र उद्योग, तौलिया निर्माण जैसे कई उद्योग हैं, जिनको अपनाकर रोजगार अर्जित किया जा सकता है।
-विद्याशंकर पाठक, सरोदा, डूंगरपुर
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सरकार और समाज मिलकर प्रयास करें
हमारे देश में युवाओं की काफी बड़ी संख्या है, मगर तेजी से बढ़ती बेरोजगारी आज विकराल समस्या बनती जा रही है । हर वर्ष लाखों शिक्षित युवा बेरोजगारों पंक्ति में शामिल हो रहे हैं। रोजगार बढऩा तो दूर बल्कि जिन हाथों में रोजगार था वे हाथ भी अब रोजगार विहिन हो गए हैं। बेरोजगारी से निपटने के लिए सरकार और समाज को मिलकर प्रयास करने की जरूरत है। आज कृषि पर विशेष ध्यान देना होगा। साथ ही लघु व कुटीर उद्योग भी बेरोजगारी को कम करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। युवाओं को रोजगार के साधन उपलब्ध कराए जाएं।
-साजिद अली, इंदौर
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लघु उद्योगों को बढ़ावा दे सरकार
वर्तमान में सम्पूर्ण देश आर्थिक मंदी के दौर से गुजर रहा है। देश की वर्तमान स्थिति अत्यंत ही चिंताजनक है। अब समय है नोट बंदी के दौरान बन्द हुए लघु उद्योगों को बढ़ावा देने का, जिससे न केवल बेरोजगारों को रोजगार मिलेगा, साथ ही देश की मंद पड़ती अर्थव्यवस्था को भी सहारा मिलेगा। उद्योगों को बढ़ावा देकर सरकार देश के व्यवसाइयों में भी आत्मविश्वास उत्पन्न कर पाएगी। साथ ही कौशल शिक्षा को बढ़ाने के प्रयास किए जाने चाहिए, जिससे युवाओं को रोजगार सृजित करने के अधिक से अधिक अवसर प्राप्त हो सकें।
-डॉ.अजिता शर्मा, उदयपुर
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हर पंचायत मुख्यालय पर फ़ैक्टरी खोली जाए
रोजगार के अवसर बढ़ाने का एक ही तरीका है कि हर पंचायत मुख्यालय पर फ़ैक्टरी खोली जाए और बेरोजगारों को ऋण दिया जाए। मुश्किल यह है कि जो अपना धंधा करना चाहता है उसको लोन नहीं मिलता है।
-प्रताप सिंह लूणवा, नावा, नागौर
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कुटीर उद्योग को प्राथमिकता दी जाए
देश में लघु कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देने की जरूरत है। स्वदेशी अपनाने के लिए जन जागरण अभियान चलाया जाए। मुश्किल यह है कि सरकार स्वदेशी उत्पादों पर बहुत ज्यादा टैक्स लगा देती है। इससे उनका बाजार मूल्य बढ़ जाता हैं और ये वस्तुएं विदेशी सस्ती वस्तुओं के आगे टिक नहीं पातीं। इस ओर भी सरकार को ध्यान देना होगा।
-लता अग्रवाल, चित्तौडग़ढ़
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शिक्षा प्रणाली में सुधार की जरूरत
वर्तमान शिक्षा प्रणाली में स्कूल या कॉलेज स्तर पर व्यावसायिक शिक्षा सहित अन्य रोजगारपरक विषयों को कोई विशेष स्थान नहीं दिया गया है। लघु व कुटीर उद्योग व्यापक रूप से बेरोजगारी की समस्या को दूर कर सकते हैं, किन्तु वर्तमान में अपनी शिक्षा पूर्ण कर लेने के बाद युवा इस स्थिति में नहीं होता है कि वह समझ सके कि उसे क्या करना है और कैसे करना है। अत: स्कूली स्तर से ही रोजगारपरक विषयों को पाठ्यक्रम में विशेष स्थान दिया जाए, जिससे कि रोजगार के अवसर बढ़ सके ताकि रोजगार के लिए केवल सरकारी नौकरियों पर निर्भरता नहीं रहे।
-शिवराज मालव, तालेड़ा, बूंदी
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सरकार की भूमिका महत्त्वपूर्ण
रोजगार बढ़ाने में सरकार की भूमिका अहम है। ग्रामीण क्षेत्र में सरकार के सहयोग से जल, भू एवं पर्यावरण संरक्षण पर ध्यान दिया जाए। सौर ऊर्जा उत्पादन के कार्य वृहद् स्तर पर संचालित हों। हस्त निर्मित उद्योगों को बढ़ावा मिले और ऑटोमेटिक मशीनों से बने उत्पादों पर रोक लगे। श्रम पर जोर दिया जाय। साथ ही पशुपालन, दुग्ध उत्पादन के क्षेत्र में विशेष कार्य करने की नितांत आवश्यकता है। शहरी क्षेत्रों में भी मनरेगा योजना रोजगार के अवसर बढ़ाने में सहायक सिद्ध हो सकती है।
-भगवान प्रसाद गौड़, मीरानगर,उदयपुर
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कृषि को बढ़ावा दिया जाए
कृषि का भारत की जीडीपी में बड़ा योगदान है। हमें कृषि औऱ सम्बद्ध गतिविधियों को बढ़ावा देना होगा। इनमें आधुनिक टेक्नोलॉजी का प्रयोग कर आय बढ़ाने में मदद करनी चाहिए। देश में पारम्परिक-पैतृक कार्य की ओर रुझान को प्रोत्साहित करने और उनके उत्पाद को बाजार उपलब्ध कराने से रोजगार सृजन में सहयोग मिलेगा। देश के लुप्त कुटीर उद्योग को पुनर्जीवित करना चाहिए। हमारे टैक्स के ढांचे को सरल बनाकर और नए उद्योगों को राहत दे कर औद्योगिक निवेश को प्रोत्साहित करना आवश्यक है। युवाओं को नौकरी की बजाय स्वरोजगार के लिए प्रेरित करने से रोजगार के ज्यादा अवसर बढ़ सकते हैं।
-सुभाष चंद्र पारीक, जयपुर
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जनसंख्या नियंत्रण जरूरी
रोजगार के अवसर बढ़ाने के लिए जनसंख्या वृद्धि को रोकें। महज डिग्री नहीं, अपितु रोजगारपरक शिक्षा दी जाए। शिक्षण में प्रायोगिक, व्यावहारिक और अनुप्रयोग आधारित शिक्षा का समावेश हो। स्वरोजगार को प्रोत्साहन देने के लिए आसानी से ऋण मुहैया करवाया जाना चाहिए। सरकारी नौकरी की जगह लघु, मझौले उद्योगों या स्वरोजगार को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
-मोहित सोनी, कुक्षी
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नियमों का सरलीकरण जरूरी
रोजगार के अवसर बढ़ाने के लिए जरूरी है कि सरकार उद्योग लगाने से सम्बंधित नियमों में सुधार करे और उन्हें सरल बनाए। इससे उद्योग क्षेत्र को बढ़ावा मिलेगा और लोगों को ज्यादा रोजगार मिलेगा। इसके साथ ही हम सबको स्वदेशी वस्तुओं को बढ़ावा देना होगा। घरेलू एवं लघु उद्योगों को बढ़ावा देना होगा।
-लालू वैष्णव, अगवरी, जालौर
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उद्योग व कृषि क्षेत्र पर ध्यान दिया जाए
सरकार को उद्योग धंधो व कृषि क्षेत्र पर फोकस करके योजनाएं बनानी चाहिए, ताकि अधिक से अधिक रोजगार के अवसर प्राप्त हो सकें। कृषि क्षेत्र में सुविधाओं का विस्तार करके हम ग्रामीण आबादी को रोजगार के अवसर गांव में ही मुहैया करा सकते हंै, ताकि उन्हें शहरों की तरफ पलायन ना करना पड़े। देश की युवा शक्ति के लिए कौशल विकास प्रशिक्षण आरम्भ करने चाहिए और उनको वित्तीय सहायता भी दी जाए, जिससे वे स्वयं का उद्योग शुरू कर सकें।
-गुमान दायमा हरसौर, नागौर
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कौशल शिक्षा जरूरी
गांवों में लघु एवं कुटीर उद्योगों, मत्स्य पालन, डेयरी उद्योग, कृषि तकनीक में वृद्धि करने से पलायन कम होगा। उद्योगों में मशीनों की अपेक्षा मानवशक्ति का प्रयोग किया जाना चाहिए तथा स्कूल स्तर पर छात्रों को कौशल शिक्षा प्रदान कर स्वरोजगार में बढ़ावा देना चाहिएं।
-गोपाल यादव, दुगर्, छत्तीसगढ़
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छोडऩा होगा सरकारी नौकरी का मोह
कई लोग सिर्फ सरकारी नौकरी को अच्छा मानते हुए सिर्फ वही पाने की जुगत में रहते हंै। इससे बेरोजगारों की संख्या बढ़ती है। कौशल उन्नयन के साथ लोगों के मन से किसी कार्य के प्रति पूर्वाग्रह किया जाना चाहिए। साथ ही हर क्षेत्र में ज्यादा से ज्यादा लघु उद्योग लगाए जाएं।
-मोहित पाटीदार, धामनोद, मध्यप्रदेश
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पशुपालन को बढ़ावा दिया जाए
भारत में रोजगार के अवसर बढ़ाने के लिए लघु एवं कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देना होगा। पशुपालन के ऊपर ध्यान केंद्रित करना होगा। खेती की नई तकनीक से युवाओं को प्रशिक्षित कर रोजगार के अवसर को बढ़ाया जा सकता है। साथ ही जनसंख्या नियंत्रण पर ध्यान दिया जाना चाहिए।
-उर्मिला सिसोदिया, बेंगलुरु
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कौशल प्रशिक्षण पर ध्यान दिया जाए
सरकारी नौकरी की चाहत में अधिकतर युवा बेरोजगार बैठे हुए हैं। युवा वर्ग को केवल इस पर ही निर्भर नहीं रहना चाहिए। जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित करना होगा। सभी को कृषि शिक्षा पर ध्यान देना होगा। साथ ही कौशल प्रशिक्षण बढ़ावा देना होगा। लघु उद्योगों को बढ़ावा देकर रोजगार बढ़ाए जा सकते हैं।
-शिवजीत परमार, धौलपुर
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हस्तशिल्प को बढ़ावा दिया जाए
खादी उद्योग और हाथ से बनाए जानेवाले सामान और कपड़ों के उद्योग को बढ़ावा दे कर सरकार रोजगार के नए अवसर पैदा कर सकती है। इससे निर्यात को भी बढ़ावा मिलेगा। पूरी दुनिया में भारत के हस्तशिल्प की मांग है। इसलिए भारत सरकार को हथकरघा उद्योग और हाथ से की गई कढ़ाई, सिलाई और बुनाई को सरकारी उद्योग की तरह विकसित करना चाहिए।
-मधूलिका राय, जयपुर
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निजी क्षेत्र को बढ़ावा दिया जाए
रोजगार के अवसर बढ़ाने के लिए निजीकरण महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। भारत में निजी सेक्टर ही सबसे अधिक रोगजार प्रदान करता है। सरकार से रोजगार की आशा करना ही अब तो व्यर्थ सा लगने लगा है। आज के समय मेें राजकीय विद्यालयों से ज्यादा निजी विद्याालय, राजकीय अस्पतालों से ज्यादा निजी अस्पताल, राजकीय बैंकों से ज्यादा निजी बैंक और,रोडवेज बसों से ज्यादा निजी बसों से रोजगार मिल रहा है।
-शुभम आजाद, सवाई माधोपुर
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ग्रामीण क्षेत्र में उद्योग लगाए जाएं
रोजगार के अवसर बढ़ाने के लिए हमें लघु और कुटीर उद्योग को प्राथमिकता देनी चाहिए। युवा उद्यमियों को कम दर पर ऋण मिले, जिससे वे आसानी से काम कर सकें। ग्रामीण क्षेत्र में लोगों को छोटे उद्योग लगाने के लिए प्रोत्साहित किया जाए।
-विजेंद्र कुमार जाँगिड़ जयपुर

सौजन्य - पत्रिका।
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अर्थव्यवस्था में गिरावट का होगा विपरीत असर

डाॅ.सत्यनारायण सिंह, पूर्व आईएएस




पब्लिक एडमिनिस्टेशन का महत्वपूर्ण एवं मान्य सिद्धान्त है ”प्रायरप्रिपरेशन प्रिवैन्टस पूअर परफारमेन्स निर्णय के प्रभावी व सफल क्रियान्वयन के लिए पूर्व प्लानिंग व तैयारी आवश्यक है’। कोरोना महामारी के प्रकोप और उसकी रोकथाम के लिए लगाई लम्बी पूर्ण बन्दी से देश की पूर्वसे नरमी में फंसी अर्थव्यवस्था पर अत्यन्त बुरा प्रभाव पड़ा है और भारतीयअर्थव्यवस्था तब तक के सबसे बुरे दौर से गुजर रही है। जब किसी अर्थव्यवस्था में लगातार गिरावट उपभोग में कमी, औद्योगिक उत्पादन में गिरावट, बेरोजगारी का बढ़ना, कर्जाे की मांग में कमी, शेयर बाजार में कमी, बाजार में तरलता में कमी, खाद्य पदार्थो के मूल्य में बढ़ोतरी, जैसे संकेत दिखाई देते है तब यह स्पष्ट है कि अर्थव्यवस्था गम्भीर मंदी की चपेट मे है।


सरकारी आकड़ों के अनुसार चालू वित्त वर्ष 2020-21 की अप्रेल-जून तिमाही में अर्थव्यवस्था में 23.9 फीसदी की अब तक की सबसे बड़ी गिरावट आई है। इस दौरान कृषि को छोड़कर विनिर्माण, निमार्ण और सेवा समेत सभी क्षेत्रों का प्रदर्शन खराब रहा है। सबसे अधिक प्रभाव निर्माण उद्योग पर पड़ा है जो 50 फीसदी से भी अधिक गिरा है। राष्ट्रीय सांख्यिकीं (एनएसओ) के आंकड़ो के अनुसार सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में इससे पूर्व 2019-20 की इसी तिमाही में 5.2 की वृद्धि हुई थी। सरकार ने विचार नहीं किया, लम्बी लाॅक डाउन का अर्थव्यवस्था, उत्पादन, रोजगार में मांग पर कैसा प्रभाव पड़ेगा व बगैर तैयारी व आवश्यक कदम उठाये 25 मार्च से 68 दिन का पूरे देश में पूर्ण बन्दी की इसका असर अर्थव्यवस्था के सभी क्षेत्रों पर पड़ा। विनिर्माण क्षेत्र में सकल मूल्यसंवर्धन (जीवीए) में 2020-21 की पहली तिमाही में 39.3 फीसदी की गिरावट हुई जबकी एक साल पहले इसी तिमाही में इसमें 3 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी। निर्माण क्षेत्र में जीवीए में 50.3 की गिरावट आई, खनन क्षेत्र में उत्पादन 23.3 प्रतिशत गिरावट आई। बिजली, गैस, जल आपूर्ति, उपयोगी सेवा क्षेत्र में सात फीसदी गिरावट आई जबकि पूर्व वर्ष में 8.8 की वृद्धि हुई थी।



व्यापार, होटल, परिवहन, संचार और प्रसारण से जुड़ी सेवाओं में 47 प्रतिशत की गिरावट आई। लोकप्रशासन, रक्षा व अन्य सेवाओ मंें 10 प्रतिशत कि गिरावट आई। देश के आठ बुनियादी ढ़ाचों क्षेत्र के उद्योगों में इस्पात एवं रिफाइनरी उत्पादन में आई भारी गिरावट से जुलाई में उत्पादन में 9.6 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई। लगातार पांच माह से, प्रत्येक क्षेत्र में गिरावटबढ़ रही है।

केन्द्र सरकार का राजकोषीय घाटा जुलाई में ही वार्षिक बजट अनुमान से उपरनिकल गया है। राजकोषीय घाटा वार्षिक अनुमान की तुलना में 103.1 फीसदीयानि 8.21 लाख करोड़ तक पहंुच गया है। खाद्य वस्तुओं की महंगाई दर जुलाई में 6.38 फीसदी रही, जिसके आधार पर गेेहूं आटा, सरसों तेल, दूध, हरि सब्जियां, बस का किराया, पेट्रोल, सिलाई शुल्क आदि के सूचकांक में बढ़ोतरी हई है। लाॅकडाउन में कामवाली बाई का काम छूट गया, ठेकेदारों ने मजदूर भगा दिये, सेठों ने सेल्समैनों को हटा दिया, पूरे अंसगठित क्षेत्र की दुर्दशा हो गई। रोज कुआं खोदकर पानी पीने वालों की संख्या करीब 40 करोड़ हैं। 2 करोड़ वेतन भोगी बेरोजगार हुए। 10 करोड़ रोजी-रोटी कमाने वाले गांव से शहर आए।



तेल, साबुन, सिन्दूर, कास्मेटिक आदि कि बिक्री नहीं होती। किसानों को उपज में लाभ कम हो गया। चीन 3.2 प्रतिशत जीडीपी विकास दर के झटके से निकल गया। भारत नये आर्थिक भवर में फस गया। लाॅकडाउन खुलने के बाद स्थितियां बद से बदतर हो गई। मजदूरो का पेशा बदलने पर भी राहत नहीं मिली।

पैट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ने से टैक्सी उद्योग भी खत्म हो गया। अन्र्तराष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुसार इसमें कोई विवाद नहीं है कि भारत में गरीबी बढे़गी। नेशनल संेपल सर्वे के अनुसार 2017-18 में देश की 21.2 प्रतिशत यानि 27 करोड़ लोग गरीबी की सीमा रेखा के नीचे रहते थे। नवीन गणना के अनुसार 7.1 करोड़ लोग कोविड-19 के झटके से गरीब हो गये। भारत में गरीबी की दर 46.3 प्रतिशत हो गई, 35.4 करोड़ गरीब बढ़ गये। 2011-12 के मुकाबले 62.3 करोड़ हो जायेंगे।



2012 के बाद बेरोजगारी व घरेलू कर्ज में वृद्धि हुई है, न्यूनतम जीवन स्तर बनाए रखना भी मुश्किल हो गया है। हाल की घोषित योजनाओं का लक्ष्य गरीबों की समस्या सुलझाने से अधिक, वोट जुटाने का है। 2017-18 में 3 करोड़ या 6.81 प्रतिशत श्रमिक शक्ति बेरोजगार थी। 2020-21 में आर्थिक हालात और बिगड़ जायगा। बेरोजगारों की संख्या प्रधानमंत्री सलाहकार परिषद के अनुसार ही 4 से 5 करोड़ तक बढ़ जायेंगे। आबादी के सबसे गरीब तबके की हालत और खराब कर देगी। 2013 के अखिल भारतीय ऋण व सर्वेक्षण के अनुसार 9 करोड़ किसान परिवारों में 51.9 प्रतिशत कर्जदार थे, वह कर्ज उपभोग के लिए था, कृषि के लिए नहीं।

यदि इस वक्त गरीबों को आय की गारंटी नहीं मिलती तो सामाजिक संघर्ष बढ़ जायेगा। लाॅक डाउन के दौरान सर्वेक्षण में शामिल 11,100 प्रवासी श्रमिकों में से 98 प्रतिशत ने बताया उन्हें कोई सहायता नहीं मिली। ग्रामीण क्षेत्रों के आधे, शहरी क्षेत्रों के एक तिहाई श्रमिको को सरकार से नकद हस्तांतरण नहीं मिला। 37 प्रतिशत ने बताया खर्च को चलाने के लिए कर्ज लेना पड़ा रहा है। पढ़ लिखे युवाओं को काम नहीं मिल रहा। नकद स्थानान्तरण की सख्त आवश्यकता है। सरकार डीबीटी के तहत प्रति व्यक्ति दर महिने 312 रूपया देती है तो अधिकांश लोग कोविड-19 से पहले के एमपीसीई के स्तर पर पहुंच सकते है। 10.9 करोड़ या 60-65 प्रतिशत ग्रामीण परिवार ऐसे है जिन्हें न्यूनतम आय गारन्टी के लाभार्थी के रूप में शाामिल किया जायें।


सौजन्य - पत्रिका।

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आपराधिक गठजोड़ का दौर चिंताजनक : Patrika Editorial

रोहित कौशिक, वरिष्ठ पत्रकार

कानपुर के गांव में कुख्यात अपराधी विकास दुबे को पकड़ने गए पुलिस दल के आठ पुलिस कर्मियों की हत्या हमारी व्यवस्था पर भी कई सवाल खड़े करती है। यह सही है कि ऐसे समय पुलिस कर्मियों पर खतरा मंडराता रहता है और वे अपनी जान पर खेल कर इस तरह के काम को अंजाम देते हैं। लेकिन यह भी सच है कि सत्ता, राजनीति और पुलिस व्यवस्था का गठजोड़ ही विकास दुबे जैसों को पैदा करता है। इस तरह के अपराधी राजनेताओं का साथ पाकर अपने सारे कुकर्माें पर पर्दा डालते रहते हैं। विडम्बना यह है कि इस दौर की राजनीति बाहें फैलाकर ऐसे तत्वों का स्वागत करती है। यानी एक तरफ गुंडे , राजनेताओं के माध्यम से अपना व्यापार चलाते हैं तो दूसरी तरफ राजनेता इनके माध्यम से अपने अनेक काम साधते हैं।


समय-समय पर पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठते रहते हैं। यह किसी से छिपा हुआ नहीं है कि पुलिस आपराधिक प्रवृत्ति के राजनेताओं और गुंडों को अनेक तौर-तरीकों से संरक्षण प्रदान करती है। कई मामलों में पुलिस भी पड़ताल के नाम पर अमानवीयता की हद पार कर देती है। इस दौर में सबसे बड़ा सवाल यह है कि पुलिस कब तक अमानवीय बनी रहेगी ? यह कटु सत्य है कि एक तरफ हमारे देश की पुलिस पर काम का अत्यधिक बोझ है तो दूसरी तरफ पुलिस की कार्यप्रणाली आम आदमी को कोई राहत नहीं दे पाती है। इसका सीधा प्रभाव कानून व्यवस्था पर पड़ता है। हमारे देश की पुलिस में धर्य और विवेक जैसे मानवीय मूल्यों की भारी कमी है। यह दुर्भाग्यपूर्ण ही है कि पुलिस अनेक तौर-तरीकों से समाज में अनावश्यक डर पैदा करने की कोशिश करती है।


सवाल यह है कि हमारे देश में पुलिस की भूमिका एक रक्षक की है या फिर भक्षक की ? इस माहौल में यह जरूरी हो गया है कि सरकार पुलिस बल को सुधारने की तीव्रता से पहल करें। पुलिस बल के सुधार की प्रक्रिया में जहां एक ओर हमें पुलिस पर काम का बोझ कम करने पर ध्यान देना होगा वहीं दूसरी ओर पुलिस के व्यवहार को सुधारने पर भी काम करना होगा। तभी पुलिस बल में सुधार का असली उद्देश्य पूर्ण हो पाएगा। पुलिस का काम कानून और व्यवस्था के तंत्र को सुधारना है न कि उसे बिगाड़ना। पुलिस के संदिग्ध क्रियाकलापों से न केवल कानून और व्यवस्था की स्थिति बिगड़ती है बल्कि जनता के बीच उसकी छवि भी धूमिल होती है। यह सुनिश्चित करना पुलिस का कर्तव्य है कि समाज में अनावश्यक डर भी पैदा न हो और कानून व्यवस्था की स्थिति भी स्थिर बनी रहे।


दरअसल अनेक बार सत्ता अपने हित के लिए पुलिस का इस्तेमाल करती है। ऐसी स्थिति में भी पुलिस का रवैया एकपक्षीय हो जाता है और वह न्याय नहीं कर पाती है। यह विडम्बना ही है कि कुछ राज्यों में पुलिस मानवाधिकारों की रक्षा तो कर ही नहीं पा रही है बल्कि एक कदम आगे बढ़कर जनता से जानवरों जैसा बर्ताव कर रही है।


इसमें कोई शक नहीं है कि आजादी के बाद हमारे देश की राजनीति लगातार मूल्यविहीन होती चली गई। अभी भी राजनीति में मूल्यविहीनता का सिलसिला लगातार जारी है। यह सही है कि सभी राजनेताओं को एक ही पंक्ति में खड़ा नहीं किया जा सकता लेकिन इस स्थिति के बावजूद राजनीति का मौजूदा स्वरूप आशा की कोई किरण नहीं दिखाता। आज जिस तरह से राजनीति का अपराधीकरण हुआ है, वह निश्चित रूप से राजनेताओं की विश्वसनीयता घटाने के लिए जिम्मेदार हैं। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि आज अधिकांश राजनेता अपनी विश्वसनीयता बढ़ाने के लिए कोई प्रयास करते हुए दिखाई नहीं देते ।


सवाल यह है कि क्या हमारे राजनेताओं के निजी स्वार्थ की परिधि में जनता के व्यापक सरोकार आ पाएंगे ? जो राजनेता करोड़ों रुपए लगाकर उल्टे-सीधे तरीकों से चुनाव जीतने का स्वप्न देखते हैं ,क्या वे ईमानदारी के रास्ते पर चल पाएंगे ? जाहिर है कि वे इन करोड़ों रुपयों को जनता या फिर सरकारी योजनाओं के माध्यम से ही वसूलना चाहेंगे। इस दौर में राजनीति एक ऐसा व्यवसाय बनती जा रही है जिसमें जनसेवा का मुखौटा लगाकर जनता के लिए किए गए कार्यों की जनता से ही कीमत वसूली जाती है। राजनीति की यह जो अलग धारा निकली है ,इस पर व्यवसाय के सभी नियम-कानून लागू होते हैं। इस धारा से निकली हुई बेल लगातार फल-फूल रही है।

सौजन्य - पत्रिका।
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पुतिन के रूस में लोकतंत्र का नया चोला : Patrika Editorial

एन.के.सोमानी, विदेश मामलों के जानकार

रूस की 78 फीसदी जनता ने इस बात को स्वीकार कर लिया है कि रूस की उन्नति और तरक्की के लिए राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को साल 2036 तक राष्ट्रपति पद पर कार्य करना चाहिए। पुतिन के राष्ट्रपति पद का दूसरा कार्यकाल साल 2024 में पूरा होने वाला था, लेकिन अब संविधान संशोधन के बाद वे साल 2036 तक पद पर बने रह सकते हैं। अगर पुतिन 2036 तक इस पद पर रह पाते हैं, तो वे रूस की सत्ता पर सबसे लंबे समय तक में रहने वाले नेता बन जाएंगे। इससे पहले जोसफ स्टालिन तीन (1922-1953) दशक तक सत्ता में रहे थे।


वर्तमान संशोधन के लागू होने से पहले तक रूसी संविधान में इस बात की व्यवस्था की गयी थी कि कोई व्यक्ति लगातार दो कार्यकाल से ज्यादा राष्ट्रपति पद पर नहीं रह सकता है। पुतिन 2000 से 2008 तक दो बार राष्ट्रपति रह चुके हैं। बाद में उन्होंने अपने नजदीकी मेदवेदेव को राष्ट्रपति पद सौंप कर, खुद प्रधानमंत्री बन गए । इस बीच संविधान में संशोधन कर राष्ट्रपति का कार्यकाल चाल साल से बढ़ाकर छह साल कर दिया गया। पुतिन 2012 में फिर से राष्ट्रपति बने। 2018 के आम चुनाव में भी उनकी शानदार जीत हुई और वे चौथी बार रूस के राष्ट्रपति निर्वाचित हुए। संवैधानिक प्रावधानों के चलते 2024 के बाद पुतिन का राष्ट्रपति पद पर बने रहना मुश्किल था। लेकिन अब संशोधन प्रस्ताव के पारित हो जाने के बाद पुतिन को दो और कार्यकाल के लिए पद पर रहने की मंजूरी मिल जाएगी और वह 2036 तक राष्ट्रपति पद पर बने रह सकेंगे।


हालांकि पुतिन रूसी परंपराओं की पालना करने वाले ऐसे राष्ट्रवादी नेता के रूप में जाने जाते हैं, जो संविधान को भावुकता व जल्दबाजी में बदलने के विरोधी रहे हैं। वे अक्सर इस बात का दंभ भरते रहे हैं कि वे रूस के ऐसे इकलोते राष्ट्रपति हैं, जिन्होंने संविधान में कोई बदलाव नहीं किया। लेकिन अब कोरोना संकट के बीच उन्होंने जिस तरह से संविधान में महत्वपूर्ण परिर्वतन किए है, उसे देखते हुए प्रश्न यह उठ रहा है कि इन संशोधनों के जरिए पुतिन क्या प्राप्त करना चाहते हैं। एक सवाल यह भी है कि जब रूस की संसद व संवैधानिक न्यायलय ने संशोधन प्रस्तावों को पास कर दिया था, तो पुतिन को जनमत संग्रह की आवश्यकता क्यों पड़ी।


दरअसल, पुतिन जिस वक्त अपने संविधान संशोधन के विचार पर आगे बढ़ रहे थे उस वक्त उनके दिलो-दिमाग में यह सवाल जरूर रहा होगा कि साल 2024 में जब उनका कार्यकाल समाप्त हो जाऐगा तब रूस का क्या होगा। हो सकता है, पुतिन इस बात को लेकर भी शंकित रहे हो कि जिस मेहनत और लगन से उन्होंने नए रूस की रचना की है, उसको उनके उत्तराधिकारी उस रूप में बनाए रख पाएंगे या नहीं। कंही ऐसा तो नहीं हो कि कमजोर नेतृत्व के अभाव में ’सुपर पाॅवर’ रूस एक बार फिर ’क्षेत्रीय शक्ति’ के रूप में सिमट कर रह जाए। पश्चिमी शक्तियांे के साथ रूस की तनातनी को देखते हुए पुतिन की चिंता जायज भी है। संशोधन प्रस्तावों पर जनमत संग्रह का एक कारण यह भी बताया जा रहा है कि संशोधनों के जरिए पुतिन देश के भीतर अपनी लोकप्रियता का अनुमान लगाना चाहते हैं। मार्च 2018 में न्यूनतम मजदूरी व पेंशन सुधार कानून लागू किए जाने के बाद पुतिन की अनुमोदन रेटिंग लगातार घट रही थी। इसके अलावा संविधान के मौजूदा प्रावधान उनके सत्ता विस्तार के विचार में बाधा बन रहे थे, अब संशोधनों के जरिए उन्होंने उन बाधाओं को दूर कर लिया है।


हालांकि विपक्ष संशोधन प्रस्तावों व जनमत संग्रह की प्रक्रिया पर लगातार सवाल उठा रहा है। विपक्ष का आरोप है कि अपेक्षित नतीजे हासिल करने के लिए मतदान में धांधली की गई। विपक्ष का यह भी कहना है कि जनमत संग्रह केवल औपचारिक व दिखावा मात्र था। विपक्ष के आरोपों में कुछ सत्यता भी है। प्रस्तावित जनमत संग्रह के लिए मतदान शुरू होने से कम से कम दो सप्ताह पहले ही मास्को के कई बड़े बुकशाॅप पर नए संशोधनों के साथ रूसी संविधान की प्रतियां बेची जा रही थी। ऐसे में पुतिन के पक्ष में आए मतदान के आंकडे शक के घेरे में तो आते ही हैं।


साल 1952 में सेंट पीट्सबर्ग में पैदा हुए पुतिन ने अपने दो दशकों के कार्यकाल में देशवासियों को एक ऐसा रूस दिया, जो न केवल आंतरिक और बाहरी रूप से मजबूत हुआ है, बल्कि वैश्विक परिस्थितियों को भी मनचाहा रूप देने की हैसियत रखता है। सीरियाई युद्ध में पुतिन ने जिस तरह से पश्चिमी शक्तियों का विरोध करते हुए राष्ट्रपति बशर अल असद का साथ दिया, इससे न केवल सीरिया में बल्कि पूरे मध्य पूर्व में रूस का प्रभाव बढ़ा। इन वर्षो में पुतिन ने चीन के साथ भी संबंध मजबूत बनाये हैं। 2014 में पुतिन ने पड़ोसी देश युक्रेन के प्रायद्वीप क्रीमिया को रूस में मिलाकर पश्चिमी शक्तियों को बड़ा झटका दिया। टाइम मैग्जीन ने उन्हें साल 2007 में पर्सन आफ द ईयर चुना। फोब्र्स ने उनको (2013-2016) में दुनिया का सबसे शक्तिशाली नेता माना। कुल मिलाकर कंहे तो आज रूस एक हद तक अमरीकी नेतृत्व वाली दुनिया को सीधे चुनौती देने की स्थिति में आ गया है।


मार्च 2000 में जब पुतिन पहली बार रूस के राष्ट्रपति बने थे उस वक्त वे 48 वर्ष के थे, आज वे 68 वर्ष के हो चुके हैं। बीते 20 वर्षों में रूस में काफी कुछ बदला है। करवट लेती अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के अनुरूप रूस को वैश्विक फलक पर पुर्नस्थापित करने में पुतिन का अहम योगदान रहा है। पुतिन की छवि एक राष्ट्रवादी नेता की है, वे रूस को दुबारा महाशक्ति बनाना चाहते हैं। उनका कहना है कि संवैधानिक सुधारों के जरिए वे रूस में बेहतर लोकतंत्र और अच्छी सरकार की स्थापना करगें।


निसंदेह पुतिन इस समय रूस के सर्वोच्च और सर्वमान्य नेेता है। पिछले दो दशक से वह रूस पर राज कर रहे हैं। रूस की राजनीति, उसकी अर्थव्यवस्था और संस्कृति पर उनकी गहरी छाप है। जनता भी पुतिन की मुरीद है, वह चाहती है कि रूस का नेतृत्व एक ऐसे शक्तिशाली और दबंग व्यक्ति के हाथ में हो जो किसी भी सूरत में पश्चिमी देशों के सामने न झुके। पुतिन इस शर्त को पुरा करने का मादा रखते हैं। वैसे भी हाल-फिलहाल रूस की जनता के सामने पुतिन से बेहतर कोई विकल्प नहीं है।

सौजन्य - पत्रिका।
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नए बंधुआ


भुवनेश जैन
राजस्थान सहित अनेक राज्यों ने बजट की कमी का रोना रोते हुए सरकारी कर्मचारियों की भर्ती पर अपेक्षित रोक लगा रखी है। एक तरफ भर्ती नहीं हो रही, दूसरी ओर सेवानिवृत होने वाले अफसरों को सेवा विस्तार मिलता जा रहा है। कर्मचारियों की कमी दूर करने के लिए एक गली निकाल ली गई है- संविदा यानी कॉन्ट्रेक्ट पर नियुक्ति की।
भारत सरकार और सभी राज्य सरकारों ने सरकारी कामकाज पूरा करने के लिए भर्ती नीति और नियम बना रखे हैं। पदों की संख्या तय है। नए कार्य जुड़ने पर पदों की संख्या घट-बढ़ जाती है। पर दुर्भाग्य यह है कि निर्धारित पदों में से हजारों पद खाली रह जाते हैं। जो भी 'भर्तियां' की जा रही हैं- संविदा पर की जा रही हैं। अकेले राजस्थान में आज करीब एक लाख 62 हजार कर्मचारी संविदाकर्मी के रूप में नियुक्त हैं। इन्हें तरह-तरह के नाम दे रखे हैं- विद्यार्थी मित्र, पंचायत सहायक, लोकजुंबिशकर्मी, पैराटीचर्स, एनआरएचएम कर्मी, प्रेरक, फार्मासिस्ट, जनताजल योजना कर्मी, मनेरगा कर्मी आदि-आदि। जिन विभागों में संविदाकर्मियों की संख्या ज्यादा है, उनके बारे में समझ लेना चाहिए कि उसके मंत्रियों में दम नहीं है या विभाग के प्रमुख अफसर जरूरत से ज्यादा 'होशियार' है।
बहुत से संविदाकर्मी बरसों से काम कर रहे हैं, लेकिन सरकारी कर्मचारियों के अनुसार वेतन व अन्य सुविधाओं के लाभ से वंचित हैं। जब भी नई सरकार आती है, उन्हें आगे स्थाई करने की गाजर लटका दी जाती है। कुछ विभागों में अनुभव, बोनस अंक जैसी गलियां निकाल कर संविदाकर्मियों को स्थाई किया गया है, पर अधिकांश सरकारी शोषण का शिकार हैं।
होना यह चाहिए कि एक समय सीमा निर्धारित कर उस समय तक भर्ती संविदाकर्मियों को स्थाई किया जाए और भविष्य में इस बात पर कड़ाई से रोक लगाई जाए कि संविदा पर भर्ती नहीं होगी। अदालतों से भी समय-समय पर इस तरह के आदेश आए हैं। लेकिन होता कुछ नहीं है। बड़े अफसरों के लिए बजट की कमी कहीं आड़े नहीं आती। समय-समय पर पदोन्नति, वेतन वृद्धि, बंगले, वाहन आदि और अन्य सभी लाभ मिलते हैं। यहां तक कि सेवानिवृत होने वाले बड़े अफसर भी कहीं न कहीं 'एडजस्ट' कर दिए जाते हैं। उनकी सुविधाओं में कोई कटौती नहीं होती। ऐसे अफसरों के घरों में संविदाकर्मी चाकरी करते नजर आते हैं। इससे यह भी पता लगता है कि जन प्रतिनिधि नहीं, बल्कि अफसर ही सही मायने में सरकारें चलाते हैं।
दूसरी ओर, संविदा पर काम करने वालों की स्थिति दैनिक मजदूरी करने वालों से भी खराब है। वेतन के नाम पर न्यूनतम राशि, अनिश्चित भविष्य और अपने-अपने विभागों में बंधुआ मजदूरों सा व्यवहार। बहुत सी जगह ऐसे कर्मचारी अफसरों के निजी काम करते नजर आते हैं। आज राजस्थान में आठ लाख से ज्यादा कर्मचारी हैं, इनमें से 20 प्रतिशत से ज्यादा संविदा पर काम कर रहे हैं। भर्ती नियमों के अनुसार नियुक्तियां होती नहीं है। अफसर अलग-अलग मदों में से पैसा निकाल कर संविदा पर कर्मचारी रख लेते हैं। कई बार रिकार्ड में उनके नाम दर्शाए ही नहीं जाते।
अफसरों की चलती रही तो 'संविदा नियुक्ति' जैस तदर्थ (एडहॉक) फैसलों से ही देश और राज्य चलते रहेंगे। इच्छा शक्ति तो चुनी हुई सरकारें ही दिखा सकती हैं। अब यह सरकारों पर निर्भर है कि वे अफसरों के नीचे रहना चाहती है या ऊपर।
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